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बूँदों की बैरक

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बूँदों के तीर्थ ‘पुस्तक’

हम इस समय उज्जैन जिले की सीमावर्ती महिदपुर के गाँवों में हैं। काचरिया गाँव से होलकर रियासत का खास रिश्ता रहा है। यहाँ होलकरों की एक विशाल छावनी मौजूद रहती थी। इस छावनी में होलकरों के सैनिकों और अधिकारियों को दुश्मनों से मुकाबले के प्रशिक्षण भी दिये जाते थे। इस छावनी के अवशेष आपको आज भी मिल जाएँगे। यहाँ अभी भी गंगावाड़ी का मेला लगता है।

काटरिया में सबसे पहले कुंडी बनाने वाले श्री हीरालाल राठौर अब आप ही सोचिए, छावनी का गाँव भला कभी चुप बैठ सकता है। समाज ने यहाँ लम्बे समय से सूखे का सामना किया। गाँव का पानी गाँव और खेत से बहकर निकल जाता। बरसात बाद पीने के पानी का भी संकट होने लगता, लेकिन समाज ने पानी आन्दोलन के तहत व्यवस्था के साथ जमकर भागीदारी की। छावनी के सैनिकों की माफिक इस बार ‘जल-योद्धाओं’ ने सूखे के खिलाफ जंग शुरू की।

...अब गाँव का परिदृश्य बदल गया है। यहाँ आपको ‘कुंडियों की छावनी’ नजर आएगी। बूँदों की ‘बैरकें’ आपको डग-डग पर मिल जाएँगी। यहीं तो छुपकर नन्हीं-नन्हीं बूँदें सूखे को आँखे बताती हैं। यही तो ‘रसद’ भी है इस जंग की। ...और डबरियों के रूप में आपको मिलेंगे पानी के ‘टैंक’। इन्हें देखकर ही भला बेचारा सूखा किसी और गाँव के रास्ते निकल जाएगा। भाईसाहब! पूरी तरह जंग जैसा ही जज्बा नजर आता है। यह तो समाज और प्रकृति की अकाल और रेगिस्तान से जंग है। स्वाभाविक है, समाज को ताकतवर होना जरूरी है। अब इसी समाज की हांडी में से एक ‘पुराना चावल’ उठाते हैं…!

अल्लाह मियां, इन्हें बूँदों को थामकर खुशियों की नेमत बरसाने वाले किरदार निभाने की खूब ताकत दें! जनाब का नाम है मोहिनुद्दीन पटेल। प्रेरक व्यक्तित्व, दबंग आवाज। गाँव-परिवेश के लिये कुछ कर गुजरने की इबादत जितनी इनके ललाट पर पढ़ी जा सकती है, उससे कहीं ज्यादा गाँव-समाज के होंठों पर इनके लिये कुछ कहने की कोशिश में खोजी जा सकती है। एक बार यदि आप भी मिलेंगे तो यही कह उठेंगे, हर गाँव में इनके जैसा समाज का एक नेता होना चाहिए - जो गाँव को आगे बढ़ाने के लिये अपने आप में एक छोटा-मोटा वाटर मिशन हो।

हांडी के और भी बहुत से ‘चावल’ आपको इसी तरह पसन्द आएँगे। क्या गुलाबसिंह, अहमद भाई, नारायणसिंह, भैरोसिंह और क्या मदनसिंह…! इन जल योद्धाओं की एक लम्बी श्रृंखला है जो ऊपर पहाड़ी वाले गाँव में तोलारामजी के रूप में भी आपको मिल जाएगी। महिदपुर से खेड़ाखजुरिया होते हुए कांचरिया गाँव की शुरुआत में ही आपको पानी जागृति के दीदार होते हैं। रियासत काल के दौरान ही यहाँ एक तलैया बनाई गई थी, जो जल संवर्द्धन के माध्यम से छावनी के सैनिकों को पानी उपलब्ध कराने में मददगार थी। कालान्तर में यह तलैया, जीर्ण-शीर्ण हो गई व पानी रोकने की स्थिति में ही नहीं रही। गाँव में जब पानी आन्दोलन ने कामकाज शुरू किया तो बुजुर्ग लोगों ने बताया कि इसका जीर्णोद्धार पानी के नये साधन तैयार करेगा। गाँव में इस तलैया को लेकर कई भ्रान्तियाँ प्रचलन में आ गई थीं।

किसी जमाने में यह घने जंगल में थी। लोगों ने यहाँ अंधेरे में जाना छोड़ दिया था और इसे ‘डाकन-तलाई’ के नाम से जानने लगे थे, लेकिन इसके गहरीकरण में समाज ने बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की। लगभग 200 दिन में यह कार्य पूरा गया। गुलाबसिंह, अहमद भाई व अन्य लोगों ने अपने ट्रैक्टरों से इसकी गाद हटाई। अब यहाँ पानी दिख रहा है। इसके पानी से तलैया के नीचे के सात-आठ कुएँ जिन्दा हो गये हैं। पानी आन्दोलन के महेश शर्मा कहते हैं- “इससे करीब 8 हेक्टेयर में रबी की फसल ली जा रही है। 10-10 फीट पानी इन कुओं में भरा है। इसके पूर्व ये कुएँ बरसात के बाद ही खाली हो जाया करते थे।” तलैया के पास मौजूद काचरिया के नारायणसिंह कहने लगे- “तलैया गहरीकरण से अब यहाँ पानी दिखने लगा है। गाँव के सारे मवेशी यहीं पानी पीने आते हैं। पहले ये पानी के लिये भटकते रहते थे। काचरिया के अलावा पालिया गाँव के मवेशी भी यहीं पानी पीते हैं। तलैया के गहरीकरण के दौरान खंतियों में से पानी निकलने लगा था। यह पानी इतना शुद्ध था कि काम के दौरान इसे पीने के उपयोग में भी लाते थे।”

मोहिनुद्दीन पटेल पानी समिति और ग्राम रक्षा समिति के अध्यक्ष भी हैं। गाँव में अनेक कुंडियों की कहानी सुनाते और उन्हें दिखाते वे कहते हैं- पानी का यह काम गाँव-समाज के लिये किसी जादुई काम से कम नहीं है। यहाँ 10 बाय 10 और 10 बाय 12 फीट की कुंडियाँ तैयार की गई हैं। हमारा लक्ष्य तो 70 कुंडियों का था, लेकिन 117 कुंडियाँ खोद लीं। इन कुंडियों ने हमें मई-जून में भी पानी पिलाया है। कुछ कुंडियों के पानी से तो सिंचाई भी की जा रही है। ऊपरी हिस्से पर तालाब और डबरियाँ बनाई गई हैं, जहाँ से पानी का रिसाव होता है।

...अब हम आपको पानी से जुड़ी भगवान सत्यनारायण की वह ‘कथा’ सुनाते हैं, जो काचरिया के घर-घर में चर्चा का विषय बनी हुई है। महिदपुर क्षेत्र में पानी आन्दोलन के परियोजना अधिकारी श्री एस.सी. गुप्ता और तकनीकी विशेषज्ञ एम.एल. वर्मा कहते हैं- “यहाँ पानी की बहुत किल्लत थी। तालाब के बारे में सोचा जा रहा था, लेकिन डबरियों की आवश्यकता ज्यादा महसूस की जा रही थी। भगवान सत्यनारायण की कथा में एक बड़ा छुपा सन्देश यह भी है कि अच्छा विचार रखते हैं तो फल भी अच्छा मिलता है। पानी का संकल्प करना प्रारम्भ कर दें तो देवता भी प्रसन्न होकर मदद के लिये आगे आने लगते हैं।”

पानी आंदोलन में जुटा काचरिया का समाज भैरोसिंह व उनके पुत्र मदनसिंह सुनाते हैं- “हमने यहाँ पानी आन्दोलन के तहत कुण्डी बनाने के दौरान यह संकल्प लिया था कि इस कुण्डी में यदि पानी अच्छा निकल गया तो वे भगवान सत्यनारायणजी की कथा कराएँगे।”

...जैसे भगवान भी पानी के इस संकल्प और प्रयास के आगे प्रसन्न हो गये हों। भैरोसिंहजी ने कुण्डी खोदी। पानी इतना निकला कि पम्प लगाना पड़ा। तुरन्त भगवान सत्यनारायण की कथा कराई गई और संयोग से गुप्ताजी और वर्माजी ने भी यहाँ पहुँचकर प्रसाद ग्रहण किया।

पानी के संकल्प की कोशिश यहीं खत्म नहीं हुई। इन लोगों के सामने गाँव-समाज और पानी समिति के अध्यक्ष मोहिनुद्दीन पटेल ने यह संकल्प लिया कि गाँव में 101 डबरियाँ तैयार करेंगे। पहले 13 और फिर 53 डबरियाँ तो तैयार हो चुकी हैं। 101 का लक्ष्य छूने के लिये समाज की कोशिश जारी है।

...अब थोड़ा कुण्डी की कहानी भी सुनिये! इस कुण्डी के हमने साक्षात दर्शन किये। पानी की कुण्डी पानी से सराबोर। यहीं हमें अहसास हुआ कि होलकरों की छावनी गाँव से जरूर समाप्त हो गई, लेकिन ‘बूँदों की छावनी’ तो यहाँ मौजूद है। थोड़ा आप भी महसूस कीजिये।

जमीन के भीतर सफर करके इन कुण्डियों में थमी नन्हीं-नन्हीं बूँदें काचरिया के समाज को यह कहती सुनाई देती हैं : “सूखे से डरना मत! हम नन्हीं बूँदें, आसमान से आती हैं। कहीं तालाब तो कहीं डबरियाँ और कुण्डियों के माध्यम से मेहमान बनकर इन कुण्डियों में हरदम तैयार हैं। यही हमारी ‘बैरकें’ हैं। हम रेगिस्तान को आने नहीं देंगी…!” मदनसिंह कहते हैं- “पहले पानी की बिल्कुल व्यवस्था नहीं थी। अब गाँव के अधिकांश लोग यहीं से पानी पीते हैं। इस कुण्डी से 8 बीघा में सिंचाई भी की जा रही है। यहाँ गेहूँ और चने की फसल बोई है। पिछली पूरी गर्मी में इस कुण्डी की वजह से हमें पानी की परेशानी नहीं हुई थी।” यहीं पर मौजूद अनुविभागीय अधिकारी पंकज शर्मा कहने लगे- “जल संरचनाओं से भीषण सूखे के बावजूद किसान बन्धु रबी की फसल ले रहे हैं। पानी रोको आन्दोलन से बड़े पैमाने पर सामाजिक-आर्थिक विकास हुआ है। वाटर मिशन वाले गाँवों में अन्य गाँवों की अपेक्षा पानी की स्थिति अच्छी है। डबरियाँ सूखे से निपटने का एक चमत्कारिक प्रयास है। इनसे पेयजल की उपलब्धता के साथ-साथ सिंचाई भी हो रही है।” महिदपुर के अनुविभागीय अधिकारी (पुलिस) श्री पुरोहित कहते हैं- “पानी के अभाव में सूखे के दौरान अपराध बढ़ते हैं। जहाँ पानी रोका जाता है, वहाँ अपराधों में कमी आती है। विश्वास है, ये डबरियाँ और कुंडियाँ अपराध कम करने में भी महती भूमिका अदा करेंगी।”

हमने गाँव में इसी तरह की कुछ और भी कुंडियाँ देखीं। मोहिनुद्दीन पटेल कहते हैं- “गाँव की कुंडियों से रबी की फसल ली जा रही है। 117 में से शेष कुंडियों का पानी जमीन के भीतर रिचार्ज होकर क्षेत्र के लगभग 100 कुओं का भूजल स्तर बढ़ा रहा है।”

. अनेक स्थानों पर परिणाम यह देखने में आया कि जहाँ कुएँ 10 मिनट भी नहीं चल पाते थे, वहाँ अब वे घंटे भर चल रहे हैं। गाँव के ढोली नट के कुएँ को ही लीजिये, वह पहले दस मिनट भी नहीं चल पाता था - अब चार बीघा रबी की फसल सिंचित कर रहा है। उसका इंजिन एक दिन में सात-सात घंटे तक चल रहा है। उसके पास 8 बीघा सिंचाई तक भी क्षमता का पानी आ गया, लेकिन जमीन 4 बीघा ही है।

...और यह है बावन रूण्डा तालाब। रियासत के दौरान यहाँ एक टेकरी हुआ करती थी। इसे बावन रुण्डा के नाम से जाना जाता था। यहीं एक छोटी-सी तलैया भी थी। पानी आन्दोलन के दौरान इसका गहरीकरण किया गया। इसके पूर्व यहाँ निचले हिस्से के कुओं में पानी नहीं था, लेकिन अब लगभग 50 कुओं में पानी का स्तर बढ़ा है।

पानी समिति के अध्यक्ष मोहिनुद्दीन पटेल कहते हैं- “पहले यहाँ 100 बीघे में रबी की फसल ली जा रही थी, लेकिन अब यहाँ 250 बीघे में खेती की जा रही है। सूखे के उपरान्त भी पूरे गाँव-क्षेत्र में रबी का रकबा लगभग 800 बीघा है।”

किसान उमरावसिंह की मिसाल हमने देखी। इनके कुएँ पर पिछले साल केवल 4-5 घंटे इंजिन चलता था। इस बार यह 8 घंटे तक चल रहा है। यहाँ इस कुएँ से 12 बीघा जमीन सिंचित की जा रही है। इस तलैया पर काचरिया के अलावा लुवारखेड़ा, कटारिया ढाबला, तारौद, घुमराखेड़ा, रावतखेड़ी के मवेशी पानी पीने आते हैं।

...और ये है कुण्डी नम्बर-वन।

जी हाँ, यह गाँव की पहली कुण्डी है और ‘पानीदार’ किसान हैं श्री हीरालालजी राठौर। श्री राठौर ने बड़ी दिलचस्पी के साथ विस्तार से हमें इस कुण्डी की कहानी सुनाई। इसमें तो खुदाई के समय ही पानी आ गया और गाँव वालों ने सबसे पहले यहाँ से अपने पीने के पानी की समस्या का समाधान किया। हीरालालजी ने बड़े जतन से स्वयं इसकी खुदाई करवाई है। फिलहाल इसमें 12 फीट तक पानी भरा है। हीरालालजी को इस कुण्डी से आत्मीयता हो गई है। वे कहने लगे- “इसका भरा पानी देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। कुण्डी खुदाई के लिये गुप्ताजी और मोहिनुद्दीन पटेल ने प्रेरित किया। चार हाथ की खुदाई के दौरान ही गीलापन आ गया था, ...और चार हाथ खोदने पर पानी आ गया। इसके बाद भी उसे गहरा किया गया। इसकी कुल लागत मात्र पाँच हजार रुपये आई। सरकार की ओर से 12 सौ रुपये प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई।”

काचरिया में डबरी निर्माण से श्री भगवानलाल के कुएँ में रबी के सीजन में भी है पन्द्रह फीट पानी दरअसल, इस कुण्डी ने गाँव में कुण्डियों को तैयार करने के अभियान में प्रकाश स्तम्भ का काम किया। गाँव के लोग एक-दूसरे से चर्चा करते और कुण्डियाँ तैयार होती गईं। बकौल श्री एस.सी. गुप्ता- “गाँव में तैयार 117 कुंडियों में से 70 में पानी आ रहा है।” वे सुनाते हैं- “पानी आन्दोलन की जमीन तैयार करने में शुरू में दिक्कतें आती हैं। लोग एकदम विश्वास नहीं करते, लेकिन जब कुछ-एक स्थानों पर सफलता दिखने लगती है तो काम आसान होने लगता है। पहले पानी को लेकर गाँव में कई तरह की समस्याएँ थीं। गाँव की महिलाओं को पानी के लिये दूसरे गाँवों में जाना पड़ता था। मवेशियों के लिये भी पानी का भारी संकट था। पानी नहीं होने के कारण लोगों की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी, लेकिन अब इन सभी स्थितियों में सुधार आया है। इसका एकमात्र राज पानी रोकना है। यहाँ यह कुल 5 तालाब व तलैया तैयार किये हैं। इसके अलावा एक आर.एम.एस. भी बना है।”

पानी आन्दोलन के नेता मोहिनुद्दीन पटेल ने अपनी साढ़े 12 बीघा जमीन में से डेढ़ बीघा जमीन में 6 डबरियाँ बनाई हैं। इसमें 8 फीट पानी भरा रहता था, जो धीरे-धीरे रिचार्ज होता गया। इस डबरी तथा तालाब से नीचे की ओर के 25 कुएँ जिन्दा हो गये हैं। जहाँ सूखे में भी गेहूँ व चने की फसल ली जा रही है। 25 कुओं के रिचार्ज होने का सीधा मतलब है - 25 परिवारों का लाभान्वित होना।

कभी ‘बिन पानी सब सून’ रहने वले गाँव में एक किसान ने सन्तरे का बगीचा लगाने का साहस दिखाया है। इसने ट्यूबवेल खुदवाया तो गर्मी में भी भरपूर पानी निकला। पटेल कहते हैं- “गाँव में कुल 30 ट्यूबवेल हैं। पहले बरसात बाद सभी सूख जाया करते थे। अब 8 ट्यूबवेल फुल चल रहे हैं।”

कुंडियों की कहानी और भी है। थोड़ा दूर चलिये, आप एक कुण्डी और खुशहाली साथ-साथ पाएँगे।

बालूसिंह अपनी कुंडी से 4 बीघा में रबी की उपज ले रहे हैं, तो गंगाराम ने फैसला किया है कि वह अपनी कुण्डी से सिंचाई अगली बार करेगा। कितनी सुन्दर-सी रचनाएँ हैं ये कुंडियाँ…!

...गाँव की कांकड़ पर समाज ने हमसे अलविदा कहा!
आपको, कैसी लगी ये कुंडियाँ…?
...थोड़ा इनमें झाँकिये तो सही!

...नन्हीं-नन्हीं बूँदें यहाँ ऐसी नजर आएँगी, मानो महिदपुर की ‘छावनी’ वाली पहचान के साथ वे अपनी इन खूबसूरत ‘बैरकों’ में तैनात हैं। देखें, कोई सूखा या रेगिस्तान आ तो जाये!!

...सैल्यूट बूँदों!!!

 

बूँदों के तीर्थ


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

बूँदों के ठिकाने

2

तालाबों का राम दरबार

3

एक अनूठी अन्तिम इच्छा

4

बूँदों से महामस्तकाभिषेक

5

बूँदों का जंक्शन

6

देवडूंगरी का प्रसाद

7

बूँदों की रानी

8

पानी के योग

9

बूँदों के तराने

10

फौजी गाँव की बूँदें

11

झिरियों का गाँव

12

जंगल की पीड़ा

13

गाँव की जीवन रेखा

14

बूँदों की बैरक

15

रामदेवजी का नाला

16

पानी के पहाड़

17

बूँदों का स्वराज

18

देवाजी का ओटा

18

बूँदों के छिपे खजाने

20

खिरनियों की मीठी बूँदें

21

जल संचय की रणनीति

22

डबरियाँ : पानी की नई कहावत

23

वसुन्धरा का दर्द

 


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