लेखक की और रचनाएं

SIMILAR TOPIC WISE

कितना पानीदार केन्द्रीय बजट (2018-19)


महाराष्ट्र राज्य की मात्र 20 प्रतिशत कृषि भूमि ही सिंचित क्षेत्र में है। स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की फिलहाल 80 प्रतिशत कृषि भूमि असिंचित क्षेत्र में आ चुकी है और उसके अधिकांश भूजल भण्डार संकटग्रस्त स्थिति में है। ऐसे में 30 प्रतिशत सिंचित क्षेत्रों में भूजल सिंचाई योजना को जाने की बजट घोषणा से महाराष्ट्र के भूजल दोहन में और अधिक तेजी आएगी। दोहन की यह तेजी, महाराष्ट्र के भूजल संकट को आगे चलकर और अधिक बढ़ाने वाली साबित होगी। ''आलू, प्याज, टमाटर को कीमतों के उतार-चढ़ाव से मुक्त करने के लिये 500 करोड़ रुपए का 'आॅपरेशन ग्रीन्स', सुगन्धित और औषधीय खेती के लिये 200 करोड़ रुपए, राष्ट्रीय बाँस मिशन हेतु 1290 करोड़ रुपए, खाद्य प्रसंस्करण हेतु 1400 करोड़ रुपए, 22,000 ग्राम हाटों को ग्रामीण कृषि बाजार में तब्दील करने हेतु 2,000 करोड़ रुपए तथा कृषि क्षेत्र हेतु संस्थागत कर्ज को गत वर्ष के 10 लाख की तुलना में बढ़ाकर इस वर्ष 11 लाख रुपए करने की घोषणा।

मवेशी व मत्स्य क्षेत्र में बुनियादी ढाँचा विकास हेतु 10,000 करोड़ रुपए और इनके पालकों को भी किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा तथा कृषि फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागत का डेढ़ गुना करने की घोषणा। इनके साथ-साथ मनरेगा के जरिए वर्मी कम्पोस्ट, खाद्य भण्डारण गोदाम, जी पी भवन/भारत निर्माण सेवा केन्द्र की घोषणा।''

दोगुनी आय की मंशा पर सवाल-जवाब


जाहिर है कि ये बजटीय घोषणाएँ ही हैं, जिनके भरोसे राजग समर्थक कह रहे हैं कि केन्द्रीय बजट (2018-19), किसानों की आय दोगुनी करने की शासकीय मंशा का प्रतिबिम्ब है। यदि यह सच है, तो फिर 191 किसान संगठन वाली अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति, 12 से 19 फरवरी के बीच देशव्यापी आन्दोलन की तैयारी क्यों कर रही है? समिति क्यों कह रही है कि कृषि क्षेत्र के नाम पर किये गए बजट प्रावधान, महज एक धोखा है?

समिति का कथन है कि बजट में न तो किसानों की सम्पूर्ण कर्जा मुक्ति का कोई प्रावधान है और न ही कृषि लागत का डेढ़ गुना दाम देने का कोई प्रावधान किया गया है। समिति का यह भी आरोप है कि लागत आकलन, न तो स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिश के अनुरूप है और न ही मौजूदा वास्तविक लागत के। यह फर्जी आँकड़ों के आधार पर किया गया ऐसा लागत आकलन है, जो कि मौजूदा वास्तविक लागत से काफी कम है।

बजट अभिभाषण कह रहा है कि जब बाजार मूल्य, न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम होगा, तो न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की व्यवस्था करेगी। किसान, पूछ रहे हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बिक्री की गारंटी देने वाला जब यह ढाँचा ही मौजूद नहीं है, तो फिर भरोसा करें तो करें कैसे? आय बढ़ाने के लिये, लागत घटाने के प्रावधान तो इस बजट में सिरे से गायब हैं। किसान की दोगुनी आय करने के मार्ग में बाधक सिर्फ लागत और न्यूनतम समर्थन मूल्य सम्बन्धी पहलू ही नहीं, घटिया बीज, नकली उर्वरक और नकली कीटनाशक भी हैं। क्या इस बजट में इस बाबत कुछ ध्यान दिया गया है?

बजट ने बटाईदारों को लाभ देने को लेकर संकेत किया है। उत्तर प्रदेश की सरकार ने बटाईदारी के नियमों में परिवर्तन कर इसे 'संविदा खेती' के लिये खोलने की घोषणा कर दी है। सोचिए कि यदि खेती, कम्पनियों अथवा बड़े किसानों के हाथों चली गई, तो कृषि उत्पाद बिक्री बाजार पर कुछ हाथों के एकाधिकार का दृश्य सामने आएगा ही। ऐसे में छोटे, सीमान्त किसानों को अन्ततः नफा होगा या नुकसान? ऐसे में किसी किसान की आय बढ़ी, तो महंगाई बढ़ने से व्यय भी बढ़ेगा; यह गारंटी है। इससे छोटे-सीमान्त किसानों का अन्ततः नुकसान होगा? मालिक से मजदूर बनना तो सुनिश्चित ही है।

दोगुनी आय का लक्ष्य और घटते उत्पादन की आशंका


माननीय केन्द्रीय वित्त मंत्री जी पीठ ठोक रहे हैं कि वर्ष 2016-17 में लगभग 275 मिलियन टन खाद्यान्न और लगभग 300 मिलियन टन फलों और सब्जियों का ऐतिहासिक उत्पादन हुआ है। आर्थिक सर्वे-2017 कह रहा है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से वार्षिक कृषि उत्पादन में 15 से 18 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है और भारतीय कृषि में असिंचित क्षेत्रों का रकबा, 20 प्रतिशत बढ़ सकता है।

असिंचित यानी वर्षा आधारित कृषि क्षेत्र


समाधान के तौर पर, वित्त मंत्री जी ने घोषणा की है कि हर खेत की पानी योजना के तहत भूजल सिंचाई योजना को सिंचाई से वंचित ऐसे जिलों में शुरू करेंगे, जहाँ 30 प्रतिशत से कम खेतों में सिंचाई सुनिश्चित हो पा रही है। इसके लिये 2600 करोड़ के आवंटन का जिक्र है और सूक्ष्म सिंचाई निधि के लिये 2000 करोड़ रुपए का। सिंचाई के लिये सौर ऊर्जा से संचालित पम्प स्थापित करने का तंत्र विकसित करेंगे। सिंचाई सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये दीर्घावधि अवसंरचना सिंचाई कोष बनाएँगे। कोष का पैसा, विशिष्ट कमांड एरिया परियोजनाओं पर खर्च करेंगे।

भूजल- दोहन पर जोर, भण्डारण उपेक्षित


विशेषज्ञ कह रहे हैं कि ये तो धरती से ज्यादा-से-ज्यादा पानी खींच लेने की घोषणाएँ हैं। ये घोषणाएँ तो तब फलदायी होंगी, जब भूजल के भण्डार संकटग्रस्त नहीं होंगे। भारत के भूजल भण्डार जिस रफ्तार से खाली हो रहे हैं, उस रफ्तार से न तो वर्षाजल संचयन पर काम हो रहा है और न ही भूजल के उपयोग को अनुशासन सुनिश्चित करने पर। ऐसे में ज्यादा जल दोहन को बढ़ावा देना कितना उचित है। यह तो एक बीमारी का इलाज के लिये, दूसरी बीमारी को बढ़ावा देने जैसी चिकित्सा शैली है। क्या यह उचित है?

इस प्रश्न के जवाब में महाराष्ट्र का उदाहरण सामने रखते हुए 'सैंड्रप' के अध्ययनकर्ता श्री हिमांशु ठक्कर कहते हैं कि महाराष्ट्र राज्य की मात्र 20 प्रतिशत कृषि भूमि ही सिंचित क्षेत्र में है। स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की फिलहाल 80 प्रतिशत कृषि भूमि असिंचित क्षेत्र में आ चुकी है और उसके अधिकांश भूजल भण्डार संकटग्रस्त स्थिति में है। ऐसे में 30 प्रतिशत सिंचित क्षेत्रों में भूजल सिंचाई योजना को जाने की बजट घोषणा से महाराष्ट्र के भूजल दोहन में और अधिक तेजी आएगी। श्री ठक्कर के बयान से स्पष्ट है कि दोहन की यह तेजी, महाराष्ट्र के भूजल संकट को आगे चलकर और अधिक बढ़ाने वाली साबित होगी। ऐसा न हो; इसके लिये जरूरी है कि भूजल सिंचाई योजना को ऐसे इलाकों में ले जाने से पहले भूजल-पुनर्भरण की योजना को ऐसे इलाकों में जाना चाहिए। क्या इस बजट में इस पर विशेष प्रावधान किया गया है?

वित्त मंत्री के बजट अभिभाषण के हिन्दी दस्तावेज के अन्त में दर्शाई सारणियों में 1.30 लाख जल संचयन के सृजन और पुनरुद्धार और उससे 5.01 लाख किसानों के लाभ का आँकड़ा दिया गया है। आँकड़ों पर सवाल उठाते पानी कार्यकर्ता जानना चाहते हैं कि वर्ष 2016-2017 और वर्ष 2017-18 बजट में जिन 10 लाख जल संचयन ढाँचों के निर्माण और पुनरुद्धार का जिक्र गया था, उनमें से कितने ढाँचे जमीन पर उतरे? क्या कोई बताएगा? क्या ऐसे जल संचयन ढाँचों के नाम, पते, रकबे और लागत की कोई सूची अब तक सार्वजनिक की गई है?

पीपीपी हाथों में जाती जलापूर्ति


केन्द्रीय बजट (2018-19) में राष्ट्रीय जलापूर्ति योजनाओं और सामुदायिक जलशुद्धिकरण संयंत्रों के जरिए 84000 निवासियों हेतु अवसंरचना विकास का जिक्र है। 500 शहरों के सभी परिवारों को जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिये 77,640 करोड़ राज्य स्तरीय योजनाओं के अनुमोदन की बात है। 19,428 करोड़ की लागत से 494 परियोजनाओं हेतु जलापूर्ति संविदाएँ और 12,429 करोड़ रुपए लागत वाली 272 परियोजनाओं हेतु सीवेज कार्य की संविदा प्रदान करने का जिक्र है। गौर कीजिए कि गत वर्ष के बजट में 20 हजार ग्रामीण बसावटों का सुरक्षित पेयजल मुहैया कराने तथा सामुदायिक भागीदारी से सरकार अथवा कम्पनी द्वारा जलशोधन संयंत्र लगाने व लागत में सामुदायिक भागीदारी की घोषणा की गई थी। वह घोषणा कितनी आगे बढ़ी? इसका जिक्र न बजट में है और न ही आर्थिक सर्वे में।

हाँ, अपने बजट अभिभाषण में वित्त मंत्री महोदय ने नमामि गंगे का उल्लेख अवश्य किया है। वित्त मंत्री ने कहा - ''गंगा को साफ करना, राष्ट्रीय महत्त्व का काम है और इसके प्रति हम दृढ़ प्रतिबद्ध हैं। सदस्यों को यह जानकर खुशी होगी कि इस काम ने रफ्तार पकड़ ली है। 'नमामि गंगे' कार्यक्रम के अन्तर्गत ढाँचागत विकास, नदी सतह की सफाई, ग्रामीण स्वच्छता और अन्य हस्तक्षेप के लिये 16,713 करोड़ रुपए की लागत वाली 187 परियोजनाएँ स्वीकृत की जा चुकी हैं। इनमें से 47 को पूरा कर लिया गया है; शेष का कार्य अलग-अलग चरण में है। गंगा किनारे के सभी 4465 गाँवों को 'खुले में शौच से मुक्त' घोषित कर लिया गया है।''

बजट से गायब, असल वायु प्रदूषक


वायु प्रदूषण के मोर्चे पर देखें, तो विज्ञान पर्यावरण केन्द्र के अध्ययनकर्ता स्वागत कर रहे हैं कि यह बजट, फसल अवशेष प्रबन्धन के लिये विशेष योजना लेकर आया है। किन्तु वह सवाल भी कर रहे हैं कि वायु प्रदूषण को राष्ट्रीय आपदा है, तो योजना, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली मात्र के लिये सीमित क्यों? विज्ञान पर्यावरण केन्द्र की कार्यकारी निदेशक - अनुमिता राॅयचौधरी का कथन है कि भारत का हर बड़ा नगर वायु प्रदूषण का शिकार है। ऐसे में जब खासतौर पर स्वच्छ ईंधन और परिवहन पर खास ध्यान देने की जरूरत है, बजट ने वायु प्रदूषण के शहरी चुनौतियों और कारकों की उपेक्षा की है।

हकीकत यह है कि किसान को राजधानी दिल्ली के वायु प्रदूषण का असल दोषी किसान को बताकर लाया गया फसल अवशेष प्रबन्धन हेतु नई मशीनरी का बजट फंडा, कृषि लागत तो बढ़ाने वाला तो साबित होगा ही; वायु प्रदूषण के ज्यादा गम्भीर कारणों की ओर से ध्यान हटाने की कोशिश भी साबित होगा। वरना कोई बताए कि वायु प्रदूषण बढ़ाने वाले औद्योगिक, ठोस, मलीय, रासायनिक तथा धूल जैसे प्रदूषकों को नियंत्रित करने के प्रावधान कहाँ है?

सुविधा पर मुखर, असल समाधान पर चुप्पी


समग्र दृष्टि से देखें, तो टिप्पणी करें, तो कहना न होगा कि बजट (2018-19) सुविधा बढ़ाने वाला तो है, लेकिन सूखती-प्रदूषित होती नदियों, उतरते-प्रदूषित होते भूजल और बढ़ते वैश्विक ताप के मूल कारकों की व्यापक चुनौती तथा गरीब और अमीर के बीच बढ़ती आर्थिक खाई के समाधान की दिशा में चुप्पी साधता ही दिखाई देता है। अतः बजट के आइने में विचारने लायक प्रश्न फिलहाल यही है कि यदि नदियाँ सूख गईं, भूजल उतर गया, आसमान तप गया और मौसम पूरी तरह अस्थिर हो गया, तो क्या तमाम प्रयासों के बावजूद किसी गरीब किसान की आय दोगुनी करना सम्भव होगा? विचारें।

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
2 + 10 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.