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बुन्देलखण्ड में सूखे का सामना

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राइजिंग टू द काल, 2014

अनुवाद - संजय तिवारी

. बुन्देलों का इतिहास मुठभेड़ और मुकाबलों से भरा रहा है। अपनी समृद्धि को बचाने के लिये वो सदियों बाहरी आक्रमणकारियों से लड़ते भिड़ते रहे हैं। आजादी के बाद भले ही उनको अब बाहरी आक्रमणकारियों से लड़ने की जरूरत न हो लेकिन अब उनकी लड़ाई अपनी समृद्धि को पाने के लिये जारी है। सूखे का भयावह शिकार बन चुके बुन्देलखण्ड की यह लड़ाई उनकी अपनी परम्पराओं को पाने की लड़ाई है। उनकी अपनी प्रकृति और पर्यावरण ही उनके लिये आक्रांता बन गये हैं लेकिन अब बुन्देले इस आपदा से निपटने के लिये भी कमर कसकर तैयार हैं।

खुनशू वंशकार बांस की टोकरी बनाते हैं और इसे स्थानीय हाट बाजार में बेचकर नकद आय करते हैं। उनकी पत्नी गेहूँ की ढेरी संजो रही है। उन दोनों के चेहरों की मुस्कान बता रही है कि अपनी समृद्धि से वो खुश हैं। लेकिन खुनशू इतने समृद्ध पहले न थे। पहले वो अपने खेतों में बाजरे की खेती करते थे लेकिन अब तीन साल से वो गेहूँ भी पैदा कर रहे हैं। अब तो उन्होंने हरी सब्जियोंं की खेती भी शुरू कर दी है जिससे साल भर उनके लिये नकद आय का इंतजाम हो जाता है। लेकिन कुछ साल पहले उनका सूखे के कारण सबकुछ उजड़ गया था और वो पलायन करने को मजबूर हो गये थे।

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के तालबहेट प्रखण्ड के विजयपुर गाँव ने सूखे से अपनी लड़ाई जीत ली है और अब वो अपने लिये एक नयी अर्थव्यवस्था गढ़ रहे हैं। सूखे ने जिस तरह से इन लोगों की जिन्दगी में सूखा ला दिया था अब वह हरियाली में परिवर्तित हो गया है।

मौसम विभाग का कहना है कि 1961 से 2002 के बीच अगर मौसम के आंकड़ों को देखें तो बुन्देलखण्ड में औसत बारिश 270 मिलिलीटर से घटकर 200 मिलीलीटर रह गयी है। बारिश का यह अभाव लोगों के लिये अभाव लेकर ही आया जिससे खुनशू भी नहीं बच सके। लगातार बढ़ते सूखे की वजह से 2004 में वो अपनी पत्नी के साथ यहाँ से पलायन कर गये। उनका पहला ठिकाना दिल्ली के पास फरीदाबाद बना। उनकी नौ एकड़ जमीन उनको दो वक्त की रोटी देने लायक भी पैदावार नहीं दे सकती थी। लगातार पड़ते सूखे ने खेत को खलिहान से अलग कर दिया। जब खेत में पैदावार ही खत्म हो गयी तो खलिहान से क्या रिश्ता रखते? ‘जैसे-जैसे बारिश कम होती गयी मेरे खेत की पैदावार भी कम होती गयी।’ खुनशू राम कहते हैं कि हालात इतने खराब हो गये कि जानवरों के लिये चारे तक का इंतजाम करना मुश्किल हो गया। जैसे गाँव में दूसरे लोगों ने अपने जानवरों को खूँटे से आजाद कर दिया वैसे ही खुनशू राम ने भी अपने जानवरों का खूँटा तोड़ दिया। 85 साल के काजू बौरिली कहते हैं कि ‘कोई जानवरों को हाथ नहीं लगा रहा था क्योंकि जानवरों को खिलाने के लिये किसी के पास कुछ नहीं बचा था।’

भगवान भरोसे बुन्देलखण्ड


अच्छा मानसून अच्छी फसल और अच्छे जीवन की गारंटी देता है लेकिन 2003 से 2007 के बीच पड़े भीषण सूखे ने अच्छी फसल और अच्छा जीवन दोनों छीन लिया। यह वही समय था जब बुन्देलखण्ड राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था। 70 हजार वर्गकिलोमीटर में फैले बुन्देलखण्ड की आबादी 2.1 करोड़ है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को मिलाकर बुन्देलखण्ड में 13 जिले पड़ते हैं। यही बुन्देलखण्ड जो अभी तक अपनी वीरता और समृद्धि के लिये जाना जाता था अब अपने सूखे और विपन्नता के लिये पहचाना जाने लगा।

इस सूखे से निपटने के लिये केन्द्र और राज्य सरकार दोनों सामने आयीं और दोनों की तरफ से अपनी-अपनी तरह से कोशिशें शुरू हुईं। इस बार जो सूखा पड़ा था वह 1987 के सूखे से भी भयावह था इसलिये राज्य सरकारों ने बड़े स्तर पर इससे निपटने की योजना बनायी। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों ने दो-दो सौ करोड़ रुपये जारी किये। साथ ही बुन्देलखण्ड के विकास के लिये विशेष पैकेज का ऐलान किया। केन्द्र सरकार ने सम्बंधित मंत्रालयों की एक समिति गठित की जिसे जिम्मेदारी दी गयी कि वह सूखे का अध्ययन करके उपाय सुझायेगा। इसके साथ ही बुन्देलखण्ड में मौसम की दशा दुरुस्त करने के लिये चार हजार करोड़ रुपये की योजना का ऐलान किया गया।

वर्तमान हालात कुछ ऐसे हैं कि मौसम बिगाड़ने का काम धनवान करते हैं और उसकी कीमत निर्धन लोग चुकाते हैं। मौसम की मार हमेशा गरीबों पर ही सबसे अधिक पड़ती है। बुन्देलखण्ड में दो दशक से काम कर रहे संजय सिंह बताते हैं कि “बुन्देलखण्ड इस बात का उदाहरण है कि पर्यावरण के साथ की जाने वाली छेड़-छाड़ की कीमत गरीब सबसे अधिक कैसे चुकाता है।” इस कीमत में सबसे भयावह है पलायन। बुन्देलखण्ड में भी सूखे की मार के कारण लोगों ने यहाँ से बड़े स्तर पर पलायन शुरू कर दिया। खुनशू बताते हैं कि अकेले उनके गाँव से करीब तीस परिवार गाँव छोड़कर चले गये थे। वो सब गाँव के गरीब और निचले तबके के लोग थे।

बुन्देलखण्ड की नब्बे प्रतिशत भूमि वर्षा आधारित खेती पर निर्भर है। इनमें भी ज्यादातर वो किसान हैं जिनकी जोत बहुत छोटी है और उनके पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वो सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था कर सकें। सूखा आया तो यहाँ से चले जाने के अलावा इनके सामने विकल्प ही क्या था?

बुन्देलखण्ड आज भले ही अपने सूखे के लिये जाना जाता हो लेकिन यह क्षेत्र अपने तालाबों के लिये जाना जाता था। इन तालाबों के भरोसे ही इस क्षेत्र की 60 प्रतिशत भूमि की सिंचाई सुनिश्चित होती थी। लेकिन सूखा आने से पहले ही ये तालाब सूख चुके थे। कुछ आधुनिक शिक्षा ने इन्हें उपेक्षित किया और कुछ नयी तरह की योजनाओं ने। लेकिन जो नयी तरह की योजनाएँ और परियोजनाएँ लाई गयीं वो भी पूरी न हो सकीं। इस तरह एक तरफ परम्परागत तालाब नष्ट हो गये तो दूसरी तरफ नयी तरह की योजनाएँ भी लागू न हो सकीं। नतीजा, सूखा और जल अभाव जो समय के साथ गहराता चला गया।

स्थानीय राजस्व विभाग के आंकड़े बताते हैं कि बुन्देलखण्ड में सूखे के कारण साठ से सत्तर प्रतिशत खेती करना बंद कर चुके थे और रोजी-रोटी की तलाश में पलायन कर जाते थे। खुनशू भी जब अपने घर से निकले तो दिल्ली के पास फरीदाबाद पहुँचे। एक साल वहाँ अपनी पत्नी के साथ मजदूरी किया। इसके बाद एक साल दिल्ली और दो साल आगरा में रहकर मजदूरी किया। लेकिन इसके बाद भी वो हर साल मानसून आने से पहले गाँव आ जाते थे इस उम्मीद में कि अगर इस साल अच्छी बारिश हो गयी तो वो शहर नहीं जाएँगे। लेकिन जैसे मानसून तो बुन्देलखण्ड से मुँह ही मोड़ चुका था।

समाज ने खोजा रास्ता


लगातार तीन साल तक पड़े सूखे ने जहाँ एक तरफ लोगों को परेशान किया वहीं यह सूखा उम्मीद की रोशनी लेकर भी आया। पहली बार लोगों ने अपने परम्परागत साधनों और संसाधनों की तरफ देखना शुरू किया। उम्मीद की यह रोशनी लगातार फैलती गयी और आज तीन सौ गाँव अपने परम्परागत जलस्रोतों को पुनर्जीवित करके उसके भरोसे अच्छी खेती भी कर रहे हैं और पलायन से भी मुक्त हो गये हैं। अब उनके पास सूखे से निपटने के लिये एक योजना और तैयार है। स्थानीय ग्राम पंचायतें भी ऐसे सामाजिक सरोकार में साझीदार बन रही हैं और मनरेगा के तहत तालाबों के संरक्षण का काम शुरू कर दिया। 2009 में जालौन की एक समाजसेवी संस्था परमार्थ समाज सेवी संस्था ने चेक-डैम और छोटे तालाबोंं का निर्माण शुरू किया। उत्तर प्रदेश के तालबेहट प्रखंड के 40 गाँवों के साथ-साथ मध्य प्रदेश में टीकमगढ़ जिले के जतरा प्रखंड में भी काम कर रही है।

बुन्देलखण्ड के इलाके में सूखा ही एकमात्र समस्या नहीं है। यहाँ सूखे के साथ-साथ अतिवृष्टि भी होती है। इसलिये परमार्थ समाज सेवी संस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाएँ बनाते समय सिर्फ स्थानीय परिस्थितियों को ही ध्यान में नहीं रखा बल्कि मौसम के इस दोहरे व्यवहार को भी ध्यान में रखा। सिर्फ जल संरक्षण की ही व्यवस्था नहीं की गयी बल्कि अतिवृष्टि की स्थिति में पानी के बहाव को बरकरार कैसे रखा जाए इसे भी सुनिश्चित किया गया।

फिर भी नया प्रयोग कहीं भी विरोध तो होता ही है। यहाँ भी हुआ। शुरूआत में स्थानीय ग्रामीणों ने अपने खेत में ऐसे किसी जल संरक्षण के प्रयोग को करने से मना कर दिया क्योंकि उन्हें डर था कि ये लोग खेत पर कब्जा कर लेंगे। इसलिये संस्थान की तरफ से एक ग्राम चेतना समिति का गठन किया गया जिसे जिम्मा दिया गया कि वह खेतों में जल संरक्षण के इन तरीकों के बारे में स्थानीय ग्रामीणों में जागरुकता पैदा करेगी। समिति ने सबसे पहले महिलाओं से बात करने का निश्चय किया क्योंकि ग्रामीण इलाकों में घर में पानी की जरूरतों को पूरा करने का जिम्मा महिलाओं के ही पास रहता है। इसी प्रयास में जल सहेली का निर्माण किया गया जिसने महिलाओं में पानी को लेकर जागरुकता पैदा करने का काम शुरू किया।

2008 में खुनशू ही वो पहले किसान थे जिन्होंने अपने खेत में पानी रोकने के लिये मेड़बंदी करने का फैसला किया। खेत में मेड़बंदी करने का पहला फायदा यह था कि बहता पानी खेत में ही रुक जाता और मिट्टी का कटाव भी नहीं होता। इस प्रक्रिया से भूजल का स्तर सुधरता है और वातावरण में नमी बनी रहती है। इस प्रक्रिया से खेतों में जो मेड़बंदी का खर्चा आता था उसमें एक चौथाई हिस्सा वह ग्रामीण वहन करता था जिसके खेत में पानी रोकने के लिये मेड़बंदी की जाती और बाकी दो तिहाई हिस्सा संस्था वहन करती है। गाँव के लोगोंं को ही इस काम में श्रमिक के रूप में शामिल किया गया।

खुनशू के खेत से काम शुरू हुआ तो खुनशू इस तकनीकि के पहले इंजीनियर भी बन गये जिनके कंधे पर गाँव के दूसरे ग्रामवासियों को प्रशिक्षित करने का जिम्मा आ गया। संस्था ने उनकी मदद की और इस तरह दो साल की मेहनत के बाद 55 एकड़ जमीन सिंचित हो गयी। खुनशू कहते हैं “मेरा पलायन बंद हो गया। पहले मैं केवल मक्का की फसल उगा पाता था लेकिन पानी की सुविधा मिलते ही मैंने गेहूँ उगाना शुरू कर दिया। बाकी खेतों में भी मैंने पानी रोकने के इस तरीके को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।” खुनशू ने यह भी बताया कि सूखे से पहले वो अपने खेत में प्रति एकड़ चार से पाँच क्विंटल अनाज पैदा करते थे लेकिन इस तकनीकि को अपनाने के बाद उनके अनाज की पैदावार आठ क्विंंटल प्रति एकड़ पहुँच गयी। खुनशू ने गेहूँ के साथ सब्जियों की खेती भी शुरू कर दी जो साल भर उनके लिये नकद आय का जरिया बन गया है। खुनशू की खुशहाली देखकर आस-पास के किसानों ने भी खेतों में एक से ज्यादा अनाज की खेती शुरू कर दी।

खेतों में पानी रोकने के इस तरीके से खुनशू इतने प्रभावित हुए कि उन्होंंने स्थानीय ग्रामीणों के साथ मिलकर एक छोटा चेकडैम भी बना लिया जिससे न केवल 270 एकड़ जमीन सिंचित भूमि बन गयी बल्कि स्थानीय कुओं का जलस्तर भी ऊपर उठ गया। यह मॉडल इतना सफल रहा कि आस-पास के 35 गाँवों में इसे अपनाया गया।

जल सहेली और पानी पंचायत


साल 2013 में बुन्देलखण्ड में एक बार फिर बारिश ने धोखा दे दिया। नतीजा ये हुआ कि बुन्देलखण्ड में पानी की चोरी शुरू हो गयी। समाचार मिले कि बुन्देलखण्ड में लोग खेती के लिये पानी की चोरी कर रहे हैं। एक तो बारिश नहीं हुई और ऊपर से सरकारी सहायता भी नगण्य थी, इसके कारण हालात बद से बदतर हो गये।

मनरेगा लेकिन इस बदतर हालात में भी उत्तर प्रदेश के तीन जिलों में परिस्थितियाँ सामान्य रहीं। जालौन, हमीरपुर और ललितपुर ने अपने उपायों से अपने लिये पानी का प्रबंध बरकरार रखा। इसका कारण ये हुआ कि 2011 में 60 ग्राम पंचायतों की महिलाओं ने अपने यहाँ पानी पंचायत की स्थापना कर ली थी। यह पानी पंचायत स्थानीय स्तर पर पानी के प्रबंधन का बड़ा जरिया बन चुकी थी। यह पानी पंचायत जल सहेली का ही विस्तार थी जिसमें ज्यादातर दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाएँ थी। इन महिलाओं ने परम्परागत ज्ञान और आधुनिक तकनीकी के आधार पर पानी के स्रोतों की मरम्मत, उनके पुनर्जीवन और नये जलस्रोतों का निर्माण कर लिया था। हमीरपुर के सरीला ब्लॉक में जलालपुर गाँव की पानी पंचायत सदस्य सुनीता देवी का कहना है कि “इस काम के लिये हमने मनरेगा का सहारा लिया और अपने गाँव के सभी परम्परागत जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया तथा जहाँ जरूरी था वहाँ नये तालाब भी बनाये।”

पानी पंचायत की स्थापना इसी उद्देश्य के साथ की गयी थी कि जल प्रबंधन में महिलाओं की भूमिका बढ़े और इसका परिणाम भी सामने आया। पानी पंचायत से ही जुड़ी जामुनी देवी कहती हैं कि पहले लोग तालाब में कूड़ा कचरा फेंक देते थे जिसके कारण स्थानीय हैंडपम्प में भी खराब पानी आने लगा था जिसके कारण लोगों में बीमारियाँ फैलने लगी थीं। लेकिन तालाबों की रखवाली और देखभाल से जहाँ एक तरफ भूजल का स्तर ऊपर उठा वहीं दूसरी तरफ हैंडपंप से भी पीने का साफ पानी मिलने लगा। तालाबों की सफाई के बाद पीलिया और डायरिया जैसे केस इक्का दुक्का लोगों को ही हुए। पानी की सेहत सुधरते ही लोगों की सेहत भी सुधर गयी और अब महिलाओंं को पानी के लिये चार पाँच किलोमीटर दूर जाने की जरूरत भी नहीं रही।

जालौन, हमीरपुर और ललितपुर में कुल 96 पानी पंचायतों का गठन किया जा चुका था जिसमें कुल तीन हजार से ज्यादा महिलाएँ जुड़ी हुई थीं। इन महिलाओं का नेतृत्व 172 जल सहेली करती हैं। परमार्थ समाज सेवी संस्था के संजय सिंह कहते हैं कि धीरे-धीरे ही सही जल संसाधनों पर स्थानीय लोगों का नियंत्रण और प्रबंधन दिखाई देने लगा है। जल सहेली का प्रयास सफल होने लगा तो वन विभाग ने भी ग्राम पंचायतों से सलाह मशविरा करके उनके मॉडल को तीन चेक डैम बनाने में इस्तेमाल किया।

इसके साथ ही परमार्थ समाज सेवी संस्था ने जालौन के हिम्मतपुरा पंचायत की मदद से जिला प्रशासन पर दबाव डाला कि गंदानाला पर एक चेक डैम बनाया जाए। गंदानाला की जलधारा हिम्मतपुर पंचायत के उत्तर पश्चिम में बहता था। 2006 में सरकार ने चेक डैम बनवा दिया जिसके कारण वहाँ आस-पास की 100 एकड़ जमीन सिंचित भूमि हो गयी। इस गंदा नाला पर परमार्थ समाज सेवी संस्था ने अलग-अलग जगहों पर और छह चेक डैम बनवाये। जिसके कारण न सिर्फ हिम्मतनगर पंचायत को बल्कि आस-पास की कई दूसरी पंचायतोंं को भी फायदा हुआ। एक ग्रामीण रामशंकर का कहना है कि “पानी के इन उपायों के कारण हमारी उपज में वृद्धि हुई। पहले हम जहाँ एक एकड़ में एक क्विंटल अनाज पैदा करते थे अब हमारी उपज चार से छह क्विंटल हो गयी है। अब हम विविध प्रकार के अनाज उपजाते हैं और हमारे कुओं का जलस्तर भी पहले से ऊपर आ गया है।”

साफ है बुन्देलखण्ड के निवासियों ने प्रकृति का कोप भाजन बनने की बजाय उसको प्रसन्न करने का उपाय समय रहते शुरू कर दिया। इसमें स्थानीय समाज सेवी संस्थाओं से लेकर शासन प्रशासन और खासकर मनरेगा का बड़ा योगदान रहा जिन्होंने परम्परागत जलस्रोतों के पुनर्जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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