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आमंत्रण : रन फॉर गंगा (गंगा दौड़)

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नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन एन.जी.आर.बी.ए. पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार के तत्वाधान में आयोजित रन फॉर गंगा (गंगा दौड़)

दिनांक : 19 जनवरी 2014
समय : प्रातः 9 बजे
उद्घाटन स्थल : चंद्रशेखर आजाद पार्क, इलाहाबाद (सेंट जोसेफ कॉलेज गेट के समीप)
समापन स्थल : मदनमोहन मालवीय स्टेडियम, इलाहाबाद


गंगा एक नदी नहीं भारत की अस्मिता है, उसको निर्मल एवं स्वच्छ बनाए रखना हर भारतवासी का कर्तव्य है। भारत सरकार का पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (एन.जी.आर.बी.ए.) राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के अंतर्गत गंगा संरक्षण के लिए कृत संकल्पित हैं। इसी क्रम में रन फॉर गंगा का आयोजन प्रारंभ किया गया है, जिसमें खेल के माध्यम से पूरे देश के जनमानस को इस मिशन से जोड़ना है।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने सभी से अपील की है कि लोग रन फॉर गंगा में शामिल होकर गंगा के प्रति अपने कर्तव्य को निभाकर गंगा संरक्षण जन-जागरूकता कार्य में प्रतिभागी बनें और गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने का संकल्प लें।

यमुना के गंदे पानी के खिलाफ पंचायत 19 को

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नेशनल दुनिया, 17 जनवरी 2014
फरीदाबाद। मथुरा और बरसाने के यमुना रक्षक दल के बाद अब फरीदाबाद और पलवल जिले के लोगों ने यमुना मैया को गंदगी से मुक्त करने के लिए कमर कस ली है। यमुना शुद्धीकरण के लिए इलाके के लोगों की एक जल पंचायत 19 जनवरी को प्याला गांव में ग्राम सेवा समिति द्वारा आयोजित की जाएगी।

जल पंचायत के आयोजक सुरेंद्र चौहान, कर्नल वीके गौड़, कर्नल महेंद्र बीसला ने यहां प्रेस वार्ता में बताया कि केंद्र सरकार यमुना की सफाई पर 2400 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। फिर भी यमुना साफ नहीं हो सकी। सोनीपत तक यमुना के पानी का मानक तीन से पांच बीओडी पहुँचता है, लेकिन दिल्ली के बाद जब यमुना फरीदाबाद में पहुँचती है, तो उसका बीओडी लेवल बढ़कर 30 से 55 तक हो जाता है। इसका कारण है कि दिल्ली के 15 बड़े नालों की गंदगी बिना ट्रिटमेंट किए यमुना में मिल जाती है। कभी इस जिले के लोग यमुना का पानी पीते थे।

‘टेक पू टू द लू’ प्रतियोगिता

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डॉ. विजय राघवन चरियर
फार्म जमा करने की अंतिम तिथि - 07 जनवरी 2014
आईआईटी दिल्ली द्वारा स्वच्छता पर राष्ट्रीय गोलमेज सम्मेलन में सम्मानित करने की तिथि - 21 जनवरी 2014
स्थान : आईआईटी दिल्ली


. खुले में शौच से होने वाली बीमारियों और समस्याओं के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए आईआईटी दिल्ली और यूनिसेफ ने मिलकर एक जागरूकता अभियान की पहल की है। जिसे ‘टेक पू टू लू’ यानि 'शौच शौचालय में जाए' का नाम दिया है। इसका मकसद युवाओं को खुले में शौच से होने वाली समस्याओं से अवगत कराना और समस्याओं से निपटने के लिए एक मुहिम शुरू करना है। यह अभियान पूर्ण रूप से डिजिटल माध्यमों द्वारा चलाया जा रहा है।

इस अभियान में चार तरह की प्रतियोगिताएं रखी गई हैं।


1. सेनिटेशन पर लघु फिल्म प्रतियोगिता
2. सेनिटेशन पर एनिमेशन फिल्म प्रतियोगिता
3. सेनिटेशन पर पोस्टर डिज़ाइन प्रतियोगिता
4. सेनिटेशन पर मोबाइल एप डिज़ाइन प्रतियोगिता

देवरिया में नया मीडिया पर संगोष्ठी 21 दिसम्बर को

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प्रवक्ता डॉट कॉम
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प्रवक्ता डॉट कॉम
पूर्वी उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले में आगामी दिसम्बर महीने में नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। दिल्ली के इंडियन कॉफी हाउस में 17 नवंबर की शाम हुई बैठक में नया मीडिया से जुड़े समाज के विभिन्न व्यवसायों एवं क्षेत्रों से आने वाले बुद्धिजीवियों की हुई बैठक में यह फैसला लिया गया। उक्त बैठक में पत्रकारिता, इंजीनियरिंग एवं अन्य क्षेत्रों से जुड़े लगभग एक दर्जन से ज्यादा लोग सम्मिलित हुए।

बैठक में आम सहमति से यह तय हुआ कि आगामी दिसंबर महीने की 21 तारीख (दिन शनिवार) को उक्त विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन देवरिया शहर स्थित एक सभागार में दोपहर 2:00 बजे से सायं 5:00 बजे तक किया जाएगा। उक्त कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता दिल्ली से श्री शंभूनाथ शुक्ल (पूर्व संपादक, अमर उजाला), श्री पंकज चतुर्वेदी (संपादक,एनबीटी), श्री कांत सिंह (विभागाध्यक्ष इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी वि.वि भोपाल), श्री उमेश चतुर्वेदी (वरिष्ठ पत्रकार लाइव इंडिया एवं स्तंभकार) मौजूद रहेंगे। कार्यक्रम में श्री पंकज कुमार झा (संपादक एवं स्तंभकार), श्री यशवंत सिंह, (सीईओ, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम), श्री संजीव सिन्हा (संपादक, प्रवक्ता.कॉम) सहित प्रमुख पत्रकारों का हस्तक्षेप भाषण होगा।

‘मीडिया चौपाल - 2013’ “जन-जन के लिए विज्ञान, जन-जन के लिए मीडिया”

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मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद
दिनांक : 14-15 सितंबर 2013
स्थान : विज्ञान भवन, नेहरू नगर, भोपाल


महोदय/महोदया,
आपको स्मरण होगा कि पिछले वर्ष 12 अगस्त 2012 को ‘विकास की बात विज्ञान के साथ – नए मीडिया की भूमिका’ विषय को आधार बनाकर एक दिवसीय ‘मीडिया चौपाल - 2012’ का आयोजन किया गया था। इस वर्ष भी यह आयोजन किया जा रहा है। कोशिश है कि ‘मीडिया चौपाल को सलाना आयोजन का रूप दिया जाए। गत आयोजन की निरंतरता में इस वर्ष भी यह आयोजन14-15 सितंबर 2013 (शनिवार-रविवार) को किया जा रहा है। यह आयोजन मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद तथा स्पंदन (शोध, जागरूकता और कार्यक्रम क्रियान्वयन संस्थान) द्वारा संयुक्त रूप से हो रहा है। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य विज्ञान के माध्यम से विकास में मीडिया की सकारात्मक भूमिका को बढ़ावा देना है। ‘मीडिया चौपाल – 2013’ हेतु “जन-जन के लिए विज्ञान, जन-जन के लिए मीडिया” थीम निर्धारित किया गया है। इसी संदर्भ में विभिन्न चर्चा-सत्रों के लिए विषयों का निर्धारण इस प्रकार किया गया है

संगोष्ठी : उत्तराखंड बचाने की चुनौतियां

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उत्तराखंड पीपुल्स फोरम
दिन : शनिवार,
तिथि : 20 जुलाई 2013,
स्थान : गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली
समय : सायं 5 बजे से


गत माह के मध्य में उत्तराखंड में जो हुआ वह हिमालय के ज्ञात इतिहास की सबसे बड़ी त्रासद घटना है, जिसमें 10 से 25 हजार के बीच देश भर के लोगों के मारे जाने की अनुमान है। प्रश्र है ऐसा क्यों हुआ? क्या इन घटनाओं को रोका जा सकता था या रोका जा सकता है? अगर नहीं रोका जा सकता है तो क्या भविष्य में विनाश के इस तांडव का सिलसिला यों ही चलता रहेगा या और बढ़ेगा? यह याद रखना जरूरी है कि हिमालय मात्र उन लोगों का नहीं है जो हिमालय में रहते हैं; उन लोगों का भी नहीं है जो इसका दोहन करने में लगे हैं; उन लोगों का भी नहीं है जो इस पर शासन कर रहे हैं या हमारे नीति नियंता हैं; हिमालय का संबंध पूरे भारतीय उप महाद्वीप से है। यह मात्र सांस्कृतिक या धार्मिक ही नहीं है बल्कि भौगोलिक भी है। यानी हिमालय में होने वाले भूगर्भीय, भौगोलिक और पर्यावरणीय घटनाओं के व्यापक परिणामों से यह उपमहाद्वीप बच नहीं सकता।

स्पष्ट है कि इस घटना के दो पक्ष हैं, पहला, अगर यह प्राकृतिक आपदा है तो ऐसा क्यों हुआ और इसे किस तरह समझा तथा व्याख्यायित किया जा सकता है? दूसरा, अगर यह मानवनिर्मित है तो सवाल है इसकी पुनरावृत्ति को किस तरह और कैसे रोका जा सकता है?

आमंत्रण : उत्तराखंड की आवाज सुनो

तिथि- 16 जुलाई, 2013, दिन-मंगलवार
समय -प्रातः 10 बजे से सायं 5 बजे तक।
स्थान- गांधी शांति प्रतिष्ठान,
221-223 दीनदयालउपाध्याय मार्ग, (निकट आईटीओ), नई दिल्ली


निवेदक: उत्तराखंड के लोग

अपील


प्रिय मित्रों,
उत्तराखंड के बारे में आपने मीडिया में जो कुछ देखा, हकीकत उससे कई गुना ज्यादा व्यापक और डराने वाली है। साथियों से मिलकर मैंने महूसस किया कि अपनी तबाही से उत्तराखंड अत्यंत दुखी है और गुस्सा भी। दुखी इसलिए कि इस तबाही ने उन अच्छे-सच्चे ग्रामीणों व अन्य जीव-वनस्पतियों की भी बलि ली, जो इसके दोषी नहीं हैं। गुस्सा इसलिए कि जिन गतिविधियों को खतरनाक मानकर उत्तराखंडवासी लंबे अरसे से सरकारों को चेताते रहे हैं, उनकी आवाज को अब तक अनसुनी किया गया।

वे दो टूक चाहते हैं कि इस आपदा के दोषियों को दण्डित किया जाये; ताकि भाविष्य में कोई ऐसी हिमाकत न करे। वह आगे के रास्ते को भी लेकर दो टूक निर्णय के मूड में है। पुनर्वास के काम को भी वह अब सरकार भरोसे छोड़ने की गलती नहीं करना चाहते। यह ठीक ही है।

“गंगा- हिमालय संरक्षण संकल्प अभियान”

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मातृसदन
दिनांक : 23 जून-2013, सायं 4 बजे से
स्थान : अलकनंदा घाट (बिरला घाट के सामने), हरिद्वार, उत्तराखंड


सेवा में,
आदरणीय..


राष्ट्रीय नदी गंगा पर इसके हिमालयी क्षेत्र में ही बन रहे बांधों का विषय आज गंगा के अस्तित्व के सामने सबसे बड़ा संकट बन खड़ा है, पहले ही टिहरी, मनेरी व कोटेश्वर बांधों में गंगा की लगभग 120 किलोमीटर धारा सुरंगों व झीलों में कैद कर क्षत-विक्षत की जा चुकी है, आगे गंगा-भागीरथी, अलकनंदा व मंदाकिनी पर ही लगभग 70 बांधों का निर्माण प्रक्रिया में तथा इसके हिमालयी बेसिन में 500 से अधिक स्थान बांध निर्माण हेतु चिन्हित हैं। आज देव-भूमि की धारी देवी सिद्ध पीठ को 330 मेगावाट की श्रीनगर परियोजना की बलि चढ़ाये जाने की तैयारी है, कल इसी क्रम मं पंच-प्रयागों सहित देव-भूमि की संस्कृति ही भारी खिलवाड़ की ओर धकेली जा रही है। भौतिकवाद की आंधी में भोगप्रधान जीवनशैली को विकास बताकर भूकंप, भूस्खलन एवं पर्यावरण के प्रति अत्यंत संवेदनशील हिमालयी जोन में गंगा के साथ ऐसा भीषण खिलवाड़ गंगा के मूल गुण-धर्मों सहित इसके प्रवाह से जुड़े सांस्कृतिक व आध्यात्मिक स्वरूप (गंगात्व) को ही नष्ट कर गंगा के प्राणों पर ही आघात है। वैज्ञानिक अध्ययन भी यह प्रमाणित कर रहे हैं। जिसके बाद मैदानी भागों में गंगा के नाम पर बहने वाला जल वास्तव में गंगा-जल ही नहीं रहेगा और तब आगे गंगा के नाम पर इस जल की सफाई/निर्मलता आदि के कार्य देश के साथ एक छलावा मात्र साबित होंगे।

विगत वर्षों से इस हेतु चल रहे संघर्ष के स्वर को लगातार दो बार संसद में भी उठाया गया।

भोपाल में 18 जून से 22 जून तक नर्मदा जीवन अधिकार सत्याग्रह एवं उपवास

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सर्वोदय प्रेस सर्विस, जून 2013
तारीख : 18-22 जून 2013
स्थान : भोपाल


इंदौर (सप्रेस)। नर्मदा बचाओ आंदोलन की ओर से जारी विज्ञप्ति में चित्तरूपा पालित, आलोक अग्रवाल, कलाबाई, रामविलास राठौर, कैलाश पाटीदार एवं गोविंद रावत ने बताया कि नर्मदा घाटी में बन रहे विशालकाय ओंकारेश्वर, इंदिरा सागर, महेश्वर, अपर बेदा और मान बांधों से विस्थापित होने वाले हजारों लाखों प्रभावितों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। इस अन्याय के खिलाफ नर्मदा बचाओ आंदोलन के बैनर तले इकट्ठे होकर विस्थापित किसान मजदूर, महिला-पुरुष पिछले कई सालों से लम्बा संघर्ष कर रहे हैं। इस संघर्ष के कारण हाल ही में ओंकारेश्वर बांध प्रभावितों ने एक महत्वपूर्ण जीत हासिल हुई है पर ओंकारेश्वर, इंदिरा सागर, महेश्वर, अपर बेदा और मान बांधों के हजारों परिवारों को उनके पुनर्वास के अधिकार मिलना बाकी है। इसलिए इन बांधों के हजारों प्रभावित आगामी 18 जून से 22 जून तक पांच दिन भोपाल में डेरा डालेंगे और कुछ प्रभावित पांच दिन का उपवास करेंगे।

ज्ञातव्य है कि नर्मदा बचाओ आंदोलन की याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं स्वीकार किया है कि राज्य सरकार ने पुनर्वास नीति के अंतर्गत एक भी किसान को जमीन नहीं दी और अपना एक भी कर्तव्य पूरा नहीं किया है।