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संवैधानिक तंत्र का बदलता चेहरा और मीडिया के विषय पर सातवाँ मीडिया सम्मेलन

सुखतवा , केसला (इटारसी)
29-30 जून, 1 जुलाई 2013
साथियों
ज़िन्दाबाद !


विकास और जनसरोकार के मुद्दों पर बातचीत का सिलसिला साल-दर-साल आगे बढ़ता ही जा रहा है | हालाँकि इस बार हम अपने तय समय से थोडा देर से करने जा रहे हैं, लेकिन कई बार मार्च में संसद और राज्य विधानसभाओं के सत्र और बजट की आपाधापी में फंसने के कारण बहुत सारे साथी आ नहीं पाते थे | तो इस बार सोचा थोड़ा लेट चलें, ताकि सभी लोग एक साथ मिल सकें |

आप सब जानते ही हैं कि यह सफ़र सतपुड़ा की रानी पचमढ़ी से शुरू हुआ | बांधवगढ़, चित्रकूट, महेश्वर, छतरपुर, फिर पचमढ़ी के बाद इस बार हम केसला में यह आयोजन करने जा रहे हैं | इस बार कई दौर की बैठकों के बाद केसला संवाद के लिए जो विषय चुना गया है, वह है |

संवैधानिक तंत्र का बदलता चेहरा और मीडिया


कृपया विषय व स्थान चयन के लिए अपनी-अपनी राय दर्ज कराएँ..और आखिर में इस निवेदन के साथ कि आपकी उपस्थिति इन विषयों पर सार्थक हस्तक्षेप के साथ सम्मेलन को सफल बनाएगी|

कृषि नीति और खाद्य सुरक्षा से जुड़े विषयों के जाने माने विशेषज्ञ डा.देविंदर शर्मा के साथ संवाद

Author: 
हिंदी इंडिया वाटर पोर्टल

06 जून 2013 को जरूर आईये/ भोपाल


विकास संवाद समय-समय पर विभिन्न मसलों के विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में मीडिया-कर्मियों के साथ संवाद का आयोजन करता रहा है। यह हम सभी का अपना फोरम है। इसमें हमने देश और समाज के सामने मौजूद मुद्दों पर अपनी राय रखी है, साथ ही इन्‍हें गहराई से समझा भी है।

आगामी छह जून 2013 को कृषि और विश्‍व व्‍यापार मामलों के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा भोपाल में होंगे। उनकी मौजूदगी पर विकास संवाद ने आप सभी मीडिया के साथियों के साथ ‘कृषि की मौजूदा बदहाली और खाद्य सुरक्षा – उपज के बाजार मूल्‍यों को प्रभावित करती नीतियां (सरकारी हस्‍तक्षेप के बरक्‍स)’ विषय पर एक अनौपचारिक संवाद का आयोजन किया है।

जैसा कि हम जानते हैं कि सरकारी समर्थन से देश में गेहूं-चावल की पैदावार तो लगातार बढ़ रही है, लेकिन दाल, तिलहन, ज्‍वार-बाजरा और बारीक अनाजों को सरकार की ओर से कोई प्रोत्‍साहन नहीं मिल रहा है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों को लगातार बढ़ावा मिलते रहने से खेती की लागत भी बढ़ रही है। सरकार ने संसद में खाद्य सुरक्षा विधेयक पेश कर दिया है। इसमें नकद राशि के हस्‍तांतरण की बात है।

गंगा में 3 मीटर गहराई सुनिश्चित करने हेतु भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण द्वारा बैठक का आयोजन

Source: 
दैनिक भास्कर, 28 मई 2013
गंगा नदी के इलाहाबाद-गाजीपुर खंड, राष्ट्रीय जलमार्ग – 1 में नौचालन हेतु 3 मीटर गहराई के विकास पर शेयरधारकों की बैठक।

स्थान : होटल रविशा कॉन्टिनेन्टल, पी.डी, टंडन मार्ग, सिविल लाईन्स, इलाहाबाद (उ.प्र),
दिनांक : 29 मई, 2013 (बुधवार), पूर्वाहन 10 बजे
इच्छुक आगंतुकों का स्वागत है।

सौजन्य : भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (भा.अ.ज.प्रा.), (पोत परिवहन मंत्रालय, भारत सरकार),
ए-13, सैक्टर-1, नौएडा (उ.प्र.), दूरभाष : 0120-2522969

E-mail : iwainoi@nic.in

दून घाटी में कोकाकोला का विरोध

Source: 
नवदान्या
तारीख : 29 मई 2013
स्थान : डाकपत्थर बैराज से छरबा गांव तक


उत्तराखंड सरकार ने हाल ही में कोकाकोला कंपनी के साथ दून घाटी के छरबा गांव में एक प्लांट लगाने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। सरकार के अनुसार इस प्लांट को विकासनगर के समीप यमुना नदी पर बने डाकपत्थर बैराज से पानी दिया जाएगा। हालांकि गांव के लोग और सभी स्थानीय समुदाय एकजुट होकर कोकाकोला का विरोध कर रहे हैं और उन्होंने कसम खाई है कि दून घाटी में कोकाकोला को घुसने नहीं देंगे।

स्थानीय समुदायों का साथ देने के लिए और यमुना नदी को बचाने के लिए एक रणनीति और भविष्य की कार्ययोजना की तैयारी के लिए छरबा गांव में 29 मई को एक सभा का आयोजन किया जा रहा है।

स्वर्गीय साथी आशीष मंडलोई की स्मृति में युवा नेतृत्व शिविर

Source: 
नर्मदा बचाओ आन्दोलन
तारीख : 18, 19, 20 मई, 2013
स्थान : गाँव छोटा बडदा, नर्मदा किनारे, तह-अंजड़, जिला-बड़वनी, मध्य प्रदेश


साथी आशीष मंडलोई की तीसरा स्मृति दिवस 20 मई, 2013 को होगा। आशीष भाई जैसे युवा साथियों ने देश के विभिन्न आंदोलनों में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। नर्मदा आंदोलन के पिछले 28 सालों में कई सारे युवाओं ने गाँव-गाँव को जगाने में, आंदोलन की वैचारिक भूमिका और रणनीति तय करने में, शासन को जनशक्ति के आधार पर चुनौती देने में अपना योगदान दिया है। हमारे साथ जुड़े पहाड़ी एवं मैदानी गाँवों में भी युवा पीढ़ी अब नेतृत्व करने के लिए आगे आती है, तभी और वही आंदोलन का संघर्ष एवं निर्माण का कार्य आगे बढ़ पाता है। चाहे आंदोलन की जीवनशालाएँ हो, चाहे कड़े जल सत्याग्रह, चाहे गांव में या कोर्ट, हर मोर्चे पर युवा कार्यकर्ता और आंदोलनकारियों की जरूरत महसूस होती है।

यही हकीकत.....शहरी ग़रीबों के घर बचाओं-घर बनाओ आंदोलन, वांग-मराठवाडी, टाटा या लावासा के विरोध के आंदोलन.......जैसे हमारे हर स्थानीय तथा राष्ट्रीय संगठन व आंदोलन की है।

अखिल भारतीय वनजन-श्रमजीवी यूनियन स्थापना सम्मेलन

Source: 
राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच
कार्यक्रम स्थल : टाउन हाल, पुरी, उड़ीसा
तारीख : 3-5 जून 2013


हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे
इक खेत नहीं इक देश नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे

-फै़ज़ अहमद ‘फै़ज़’

बड़े-बड़े बांध, बड़े-बड़े बिजली के पावर प्लांट, खदानें, कारख़ानों के ज़रिये से विकास के नाम पर जंगल उजड़ते गए, लोग बेघर होते गए और बेरोज़गारी बढ़ती गई। जब इन सबके विरोध में जनांदोलन शुरू हुए तो राजसत्ता की हिंसा भी बढ़ गई। धीरे-धीरे पूरा जंगल क्षेत्र हिंसा का गढ़ बन गया, नतीजा न तो जंगल बचा ना लोग और ना ही बची जैवविविधता। इस हिंसा और लूटमार को जारी रखने के लिए सरकार द्वारा और भी सख्त कानून बनाए गए। कभी वन्य जन्तु को बचाने के नाम पर, तो कभी पर्यावरण को बचाने के नाम पर।भारत के वनों में वनाश्रित श्रमजीवियों की एक भारी तादाद मौजूद है, जिसकी संख्या लगभग 15 करोड़ है, जो वनों में स्वरोज़गारी आजीविका से जुड़े हुए हैं। जैसे वनोपज को संग्रह करना, वनोपज को बेचना, वनभूमि पर कृषि करना, वृक्षारोपण, पशुपालन, लघु खनिज निकालना, वनोत्पादों से सामान बनाना, मछली पकड़ना, निर्माण कार्य, व आग बुझाना आदि। वनाश्रित समुदाय का एक बहुत छोटा सा हिस्सा, जोकि वनविभाग के कार्यों में मज़दूरों के रूप में प्लांटेशन करना, आग बुझाना व निर्माण का कार्य भी करते हैं। वनाश्रित श्रमजीवी समुदायों को मूल रूप से दो श्रेणियों में देखा जा सकता है, एक जो सदियों से जंगल में पारंपरिक तरीके से अपनी मेहनत से आजीविका चलाते चले आ रहे हैं, जिन्हें हम ‘‘वनजन’’ कहते हैं, जो मुख्यतः आदिवासी व मूलनिवासी समुदाय हैं और दूसरा जो कि अंग्रेज़ी शासन काल मे वनविभाग द्वारा जंगल क्षेत्र में वृक्षारोपण या फिर अन्य कामों के लिए बसाए गए थे जिन्हें ‘वनटॉगिया वनश्रमजीवी’ कहते हैं।

शिवगंगा निर्मल अभियान

Source: 
जलजोगिनी
अक्षय तृतीया, सोमवार, 13 मई, 2013

शिवगंगा सेवा समिति


“शिवगंगा सेवा समिति”, देवघर के ऊर्जावान युवकों का समूह है। इसके सदस्यों ने आस्था की पुनर्स्थापना के लिए पौराणिक शिवगंगा पर 101 साल तक “महाआरती” का संकल्प लिया है। इनके सौजन्य से शिवगंगा तट पर अबाधित रूप से हर शाम महाआरती हो रही है। यह समिति आस्थापूर्वक जल प्रदूषण के खिलाफ जनांदोलन तैयार करने में लगी है। समिति के सदस्य सामाजिक सरोकार को प्रधानता देते हैं और सांस्कृतिक प्रोत्साहन के काम में संलग्न हैं। समिति का ध्येय है कि समाज के अंतिम सिरे पर खड़े इंसान का उत्थान हो और बैद्यनाथ धाम आने वाले तीर्थयात्रियों को धर्म,

जल जन जोड़ो अभियान अवधारणा पत्र

Source: 
तरुण भारत संघ
तारीख : 18-19 अप्रैल 2013
स्थान : गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली


लक्ष्य


1. सभी को पेयजल सुरक्षा व जरूरत पूरी करना, जीविकोपार्जन से जूझते जलवायु परिवर्तन की मार से बचाने वाले संसाधन संवर्द्धन में लगा कर समता मूलक, शोषण, प्रदूषण, अतिक्रमण मुक्त समाज निर्माण की तरफ अग्रसर होने वाली परिवर्तन प्रक्रिया शुरू करना है।

उदे्दश्य


1. जीविकोपार्जन से जूझने वालों के परंपरागत जल स्रोतों पर अधिकार दिलाने तथा ताल-पाल झीलों को पुनर्जीवित करने वाली जुम्बिश पैदा करना।
2. भारत के सभी राज्यों में एक आदर्श सामुदायिक जल स्रोतों की स्थानीय सामुदायिक विकेन्द्रित प्रबंधन प्रक्रिया इकाई निर्माण करना।
3. जल साक्षरता, जलाधिकार, सामुदायिक जल प्रबंधन की वकालत करने वाली नीति और नियम निर्माण की सरकारी प्रक्रिया आरम्भ करने वाले प्रत्येक राज्य में जल संदर्भ केन्द्र निर्माण करना।

गाँवों से ज्यादा शहरों में जल संरक्षण साक्षरता की जरूरत

Author: 
प्रतिभा शुक्ल
Source: 
जनसत्ता, 15 अप्रैल 2013
पानी साक्षरता की जरूरत गाँवों की बजाए शहरों में ज्यादा है। लिहाजा अब नई आवाज़, नए संवाद शुरू करने की जरूरत है। शिक्षकों, पत्रकारों और नेताओं के साथ-साथ आम जन को पानी के मसले से जोड़ना होगा। तरुण भारत संघ के अगुआ राजेंद्र सिंह ने यह विचार रखे। उन्होंने कहा कि इसी मकसद से जल्दी ही दिल्ली में जल जन जोड़ो अभियान शुरू किया जाएगा। इसका आगाज राष्ट्रीय रणनीति योजना संगोष्ठी के साथ 18 अप्रैल को होगा। दो दिन की इस गोष्ठी में देश भर में पानी के संरक्षण व संवर्धन पर काम कर रहे लोग भी शरीक होंगे। वे पानी के विकेंद्रित और आत्मनिर्भर व्यवस्था पर रोशनी डालेंगे। इसके तहत छोटी-छोटी फिल्मों के जरिए स्कूली बच्चों में पानी की अहमियत के प्रति समझ पैदा की जाएगी।