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ताल नहीं सूख रहा है भोपाल

भोपाल का तालभोपाल का तालउमाशंकर मिश्र/भोपाल

`जब तक भोपाल ताल में पानी है, तब तक जियो।´ आशीर्वाद देते समय इन शब्दों का प्रयोग बड़े-बूढे करते रहे हैं। क़रीब एक हज़ार साल पुराने `भोपाल ताल´ का जिक्र लोगों की इस मान्यता का गवाह है कि बूढ़ा तालाब कभी सूख नहीं सकता। लेकिन शहर की गंदगी, कचरे और मिट्टी जमाव के कारण बूढ़ा तालाब 31 वर्ग किलोमीटर के विशाल दायरे से सिमटकर महज 7 वर्ग किलोमीटर में रह गया है। आज भोपाल ताल के सूखने से मानों हर भोपाली सूख रहा है।

पढ़ने या सुन भर लेने से किसी बात के मर्म तक नहीं पहुंचा जा सकता, जब तक कि वस्तुस्थिति से स्वयं साक्षात्कार न हो जाये। `ताल तो भोपाल ताल, और सब तलैया।´ भोपाल ताल के बारे में यह कहावत तो बचपन से

फ़रहाद कॉण्ट्रेक्टर

फ़रहाद कॉण्ट्रेक्टरफ़रहाद कॉण्ट्रेक्टर

एक कर्मठ शिष्य, एक “जल-दूत” हैं


एक पुस्तक किस प्रकार किसी व्यक्ति का समूचा जीवन, उसकी सोच, उसकी कार्यक्षमता और जीवन के प्रति अवधारणा को बदल सकती है, उसका साक्षात उदाहरण हैं गुजरात के फ़रहाद कॉण्ट्रेक्टर, जिन्हें उनकी विशिष्ट समाजसेवा के लिये “संस्कृति अवार्ड” प्राप्त हुआ है और जिनकी कर्मस्थली है सतत सूखे से प्रभावित राजस्थान की मरुभूमि। फ़रहाद जब भी कुछ कहना शुरु करते हैं, वे उस पुस्तक का उल्लेख करते हैं, सबसे पहले उल्लेख करते हैं, अपने कथन के अन्त भी उसी पुस्तक के उद्धरण देते हैं। बीच-बीच में वे पुस्तक के बारे में बताते चलते हैं, कि किस प्रकार कोई पुस्तक किसी को इतना प्रभावित कर सकती है।

एक झील का दर्द : वेम्बानाड

वेम्बानाड झीलवेम्बानाड झील'' वेम्बानाड गंदी और प्रदूषित हो गई है। आर्द्रभूमि पर खेती का अर्थशास्त्र में चावल की खेती के खिलाफ है।'' केरल को 'परमेश्वर की धरती' कहा जाता है। नावों की दौड़, पानी, हरे-भरे धान के खेत, जहां-तहां केले के पेड़ पर्यटकों को मन बरबस ही अपनी ओर खींच लेते हैं। यहां वे न केवल नावों की सैर का आनन्द उठाते हैं बल्कि शान्त, ग्रामीण नजारों का मजा भी लेते हैं। पर अफसोस! उन्हें नहीं मालूम कि जैसा दिख रहा है वैसा है नहीं। पूरा केरल इतना सुन्दर नही है। हां, हमारा इशारा कुटटानाड जिले की वेम्बानाड झील की तरफ है।

आश्वस्त हुई काली बेई

Source: 
विमल भाई
काली बेईकाली बेईदेश में तालाबों को पुनर्जीवित करने की मुहिम शुरू हो गई है। जिसका श्रेय निर्विवाद रूप से पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र को जाता है। देश में जगह-जगह 'आज भी खरे है तालाब' की लाखों प्रतियां विभिन्न भाषाओं में अनूदित हो कर लोगों तक पहुंची हैं। उनकी प्रेरणा से राजेन्द्र सिंह का राजस्थान में तालाब का काम चालू हुआ। फिर राजस्थान में तालाबों के संरक्षण से पहली बार कुछ किलोमीटर की 'अरवरी नदी' का पुनर्जन्म हुआ। बाद में वहां ऐसी कई और नदियों का भी जन्म हुआ।

जल निकाय का परिचय

खोदकर बनाया गया तालाबखोदकर बनाया गया तालाबदेश के अन्तर्देशीय जल संसाधन निम्न रूप में वर्गीकृत हैं नदियां और नहरें, जलाशय, कुंड तथा तालाब; बीलें, आक्सबो झीलें, परित्यक्त जल; तथा खारा पानी। नदियों और नहरों से इतर सभीजल निकायों ने लगभग 7 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्र घेर रखा है। जहां तक नदियों और नहरों का सवाल है, उत्तर प्रदेश का पहला स्थान है क्योंकि उसकी नदियों और नहरों की कुल लम्बाई 31.2 हजार किलोमीटर है जो कि देश के भीतर नदियों और नहरों की कुल लम्बाई का लगभग 17 प्रतिशत बैठती है। इस सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के बाद जम्मू तथा काश्मीर और मध्य प्रदेश का स्थान आता है। अन्तर्देशीय जल संसाधनों के शेष रूपों में कुण्डों और तालाबों ने सर्वाधिक क्षे

जल-स्प्रिंग की भण्डारण क्षमता का आंकलन

जल-स्प्रिंग जल-स्प्रिंग जल-स्प्रिंग पर जलापूर्ति हेतु कई गॉंव के लोग निर्भर हैं। इसलिए यह आकलन भी आवश्यक है कि किसानों की पेयजल, गृह कार्यो, पशु पेयजल तथा सिंचाई की मॉंग हेतु कितने जल भण्डारण की आवश्यकता होगी। इस दृष्टि से प्रतिमाह जल की मॉंग के अनुरूप कम से कम जल-स्प्रिंग-1 व जल-स्प्रिंग-2 के लिए क्रमशः 694.79 तथा 184.9 घन मी0 क्षमता के टैंक या टैंक-समूहों की आवश्यकता होगी। इसी प्रकार इन जल-स्प्रिंगों के लिए जल की मॉंग व न्यूनतम आवश्यक संचय क्षमता के बीच निम्नवत्‌ सम्बन्ध पाये गये-


जल-स्प्रिंग-1:
स = 188.38 म - 873.11
जल-स्प्रिंग-2:
स = 190.61 म - 1517.7

प्राकृतिक जल स्रोतों का पुनर्जीवीकरण एवं उपयोग

पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक जल स्रोतपर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक जल स्रोतजल एक ऐसा प्राकृतिक संसाधन है, जिसके बिना जीवन सम्भव नहीं है, तथा जिसकी कमी के कारण जीवन की प्रत्येक कार्य प्रणाली पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त कृषि कार्यो में आरम्भ से अन्त तक जल का विशेष महत्व है, तथा जल की कमी के कारण कृषि उत्पादन में भारी कमी आ जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों में लगभग 90 प्रतिशत् आबादी कृषि पर आधारित है, परन्तु यहॉं लगभग 11 प्रतिशत् पर्वतीय भागों में ही उपलब्ध है, अर्थात 89 : क्षेत्रफल वर्षा पर आधारित है जो मुख्यतः ऊपरी पर्वतीय भागों में उपलब्ध है। लगभग दो-तीन दशकों पूर्व पर्वतीय क्षेत्रों में बड़ी म

प्राकृतिक जल स्रोत

प्राकृतिक जल स्रोतप्राकृतिक जल स्रोतपर्वतीय क्षेत्रों में भूगर्भ स्थिति के अनुसार, पर्वतों से भू-जल स्रोत बहते हैं। ऐसे स्रोत मौसमी या लगातार बहने वाले होते हैं।

कुछ तथ्य-

पर्वतीय क्षेत्रों में लगभग 60 प्रतिशत् जनसंख्या अपनी प्रतिदिन की जलापूर्ति हेतु जल-स्प्रिंग पर निर्भर है।

गत दो दशकों में पर्यावरण असंतुलन के कारण लगभग आधे जल-स्प्रिंग या तो सूख गये हैं या उनका बहाव बहुत कम हो गया है।

उत्तराखण्ड में ऊपरी एवं मध्य ऊँचाई पर स्थित लगभग 8000 गॉवों में पेय जल की गम्भीर समस्या है।