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देहरादून में पेयजल योजनाओं में अनियमितताएं

Source: 
अमर उजाला, 18 अप्रैल, 2018

कहीं लोग पानी के लिये तरस रहे हैं तो शहर के कई स्थानों पर पेयजल बहकर बर्बाद हो रहा है। पाइप लाइनें कई स्थानों पर लीक हो गई हैं। इसके अलावा कई स्थानों पर पाइप लाइनों को खुला छोड़ दिया गया है। इससे लगातार पानी बहकर बर्बाद हो रहा है।

पानी टिकेगा तो संस्कृति टिकेगी (Relations between water and culture)

Author: 
डॉ. दत्ता देशकर
Source: 
जलसंवाद, मार्च 2018

. दुनिया की सभी संस्कृतियों का उद्गम पानी के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। भटकने वाले मानव की स्थिरता पानी की वजह से ही आई। नदी किनारे पर आने के बाद मानव की बहुत सी आवश्यकताएँ पूरी होने लगीं। इस वजह से वह नदी किनारे पर स्थिर हुआ और वहाँ से ही उसका सभी अर्थों से सही विकास शुरू हुआ। उसे और उसके जानवरों का बिना अवरोध पानी मिलने लगा और नदी किनारे पर ही रहने के लिये वह लालायित हुआ। खेती करना शुरू होने के बाद उसे पानी का महत्त्व समझ में आ गया। पानी का खुद को स्वच्छ रखने के लिये, जानवरों के लिये, खेती के लिये, यातायात के लिये जैसे-जैसे उपयोग बढ़ने लगा वैसे-वैसे जल संस्कृति अस्तित्व में आने लगी, विकसित होने लगी और उसे स्थिरता मिली।

जिन चीजों से उसे स्थिरता मिली उन चीजों को ही उसने भगवान माना। पानी यह दो धारों वाला शस्त्र है, यह भी उसके ध्यान में आ गया। पानी जीवन के लिये जिस प्रकार उपकारक है, उसी प्रकार वह प्रलय भी कर सकता है यह उसके ध्यान में आने लगा। इसलिये पानी अपने नियंत्रण में रखना अवश्यमेव है यह वह जान गया। अगर पानी को अपने जीवन में इतना महत्त्व है तो उसे बह जाने से बचाकर रोककर रखा तो वह ज्यादा हितकारी होगा, यह भावना बलवान हुई।

कैसे बचे अपना पानी

Source: 
कादम्बिनी, जनवरी 2018

भारत में जल संकट दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और यह कोई प्राकृतिक समस्या नहीं है, यह मानव निर्मित समस्या है। हमने भूजल के परम्परागत संरक्षण पर कभी ध्यान ही नहीं दिया और उसका लगातार शोषण किया है। अगर हम अब भी नहीं चेते तो यह समस्या इतनी विकराल हो जाएगी कि जीवन ही संकट में पड़ जाएगा। इक्कीसवीं शताब्दी भारत के जल संकट के लिये बहुत ही दुखद चित्रण करती है। इस शताब्दी में भारत का गाँव और शहर, खेती और उद्योग, सिंचित और असिंचित- इन सबके बीच में युद्ध का वातावरण बन रहा है। इसका बड़ा कारण जल संकट है। इस जल संकट के कारण भारत की नदियाँ दूषित, प्रदूषित और शोषित होकर मर जाएँगी। छोटी नदियाँ सूखेंगी, बड़ी नदियाँ गन्दे नाले बनेंगी। उनका पानी पीने और उपयोग के लायक नहीं बचेगा।

भारत का भूजल का भण्डार अभी 72 प्रतिशत खाली हो चुका है और 54 प्रतिशत पानी पीने योग्य नहीं बचा है। हमारा हाल यह है कि हम सतही वर्षाजल को समुद्र में भेज देते हैं और गन्दे जल को नदियों में बहाकर धरती का पेट गन्दे जल से भरते हैं। आज की हमारी 66 प्रतिशत बीमारियाँ नदियों के औद्योगिक और मानव जल के प्रदूषण से फैल रही हैं। इन बीमारियों को रोकना सम्भव नहीं दिखता।

भारत की जल संरचनाओं पर नदी नाले, तालाब, जोहड़, झील सब पर अतिक्रमण हो रहा है। अतिक्रमण को रोकने के लिये भारत सरकार को जल संरचनाओं का सीमांकन, चिन्हीकरण और मानचित्र बनाकर राजपत्रीकरण करा देना चाहिए। दूसरा संकट प्रदूषण है। आज कोई भी नदी, नाला, कोई भी तालाब, जोहड़, झील प्रदूषणमुक्त नहीं हैं। सबमें वर्षाजल के अच्छे पानी में गन्दा पानी मिलता है। इसे रोकने के लिये वर्षाजल और गन्दे जल के लिये अलग-अलग व्यवस्थाएँ करनी पड़ेंगी।

सूख गईं नदियाँ, रह गईं तो बस कहानियाँ


दम तोड़तीं नदियाँदम तोड़तीं नदियाँगर्मी ने दस्तक दिया नहीं कि जल संकट की खबरें आम हो जाती हैं। पर मध्य-प्रदेश के सतपुड़ा व अन्य इलाकों की स्थिति कुछ अलग है। यहाँ पानी की किल्लत मौसमी न रहकर स्थायी हो गई है। ज्यादातर नदियां सूख गई हैं। नरसिंहपुर और होशंगाबाद जिले की, सींगरी, बारूरेवा, शक्कर, दुधी, ओल, आंजन, कोरनी, मछवासा जैसी नदियां पूरी तरह सूख गई हैं। इनमें से ज्यादातर बारहमासी नदियां थीं। पीने के पानी से लेकर फसलों के लिए भी पानी का संकट बढ़ गया है।

उत्तराखण्ड के 71 नगरों में पीने के लिये पर्याप्त पानी नहीं

Author: 
रवि बीएस नेगी
Source: 
हिन्दुस्तान 09 अप्रैल, 2018

जल संकटजल संकट देहरादून! राज्य के 92 में से 71 नगर ऐसे हैं, जहाँ तय मानक के अनुरूप पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। सिर्फ 21 नगर ऐसे हैं, जहाँ मानक के अनुसार प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 135 लीटर पानी उपलब्ध कराया जा रहा है। राज्य में पिछले कुछ सालों में सरकारों ने नगर पालिका, नगर पंचायतों की संख्या बढ़ाकर नगरों की संख्या बढ़ा दी है। पाँच साल पहले राज्य में सिर्फ 63 नगर थे। ये संख्या अब बढ़कर 92 हो गई है। सरकारों ने गाँवों को नगर तो बना दिया लेकिन मानक के अनुसार पीने के पानी का इंतजाम नहीं कर पा रही है।

1. मानक के अनुसार चाहिए 135 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी
2. राज्य के कई नगरों में 17 लीटर प्रति व्यक्ति, प्रति दिन तक ही मिल पा रहा है पानी

सिर्फ 21 नगरों में भरपूर पानी


राज्य में 21 नगर ऐसे हैं, जहाँ 135 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन के लिहाज से पानी मिल रहा है। इनमें नंदप्रयाग, गौचर, भीमताल, रामनगर, लालकुंआ, गूलरभोज, शक्तिनगर, कपकोट, देवप्रयाग, झबरेड़ा, हरिद्वार, लंढौरा, सतपुली, कोटद्वार, स्वर्गाश्रम जौंक, श्रीनगर, उत्तरकाशी, डोईवाला, ऋषीकेश, देहरादून, और विकासनगर शामिल हैं।

मांग और उत्पादन में 140 एमएलडी का अंतर


राज्य में पेयजल की मांग व उत्पादन में करीब 140 एमएलडी का अंतर है। राज्य के सभी नगरों को मानक अनुसार पानी देने के लिये 701 एमएलडी की पानी की जरूरत है। जबकि 561 एमएलडी पानी ही उपलब्ध है।

 

युद्ध और शान्ति के बीच जल - भाग तीन


(प्रख्यात पानी कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र सिंह के वैश्विक जल अनुभवों पर आधारित एक शृंखला)
आत्मघाती टर्की, दबंग इज़रायल और बेपानी फिलिस्तीन

जल संकटजल संकटआज टर्की-सीरिया-इराक विवाद ने शिया-सुन्नी और आतंकवादी त्रासदी का रूप भले ही ले लिया हो, शुरुआती विवाद तो जल बंटवारा ही रहा है। टर्की कहता है कि अधिक योगदान करने वाले को अधिक पानी लेने का हक है। सीरिया और इराक कह रहे हैं कि उनकी ज़रूरत ज्यादा है। अतः उन्हे उनकी ज़रूरत के हिसाब से पानी मिलना चाहिए। टर्की का दावा है कि इफरीटिस नदी में आने वाले कुल पानी में 88.7 प्रतिशत योगदान तो अकेले उसका ही है। वह तो कुल 43 प्रतिशत पानी ही मांग रहा है।

संग्रामपुर में अब पानी बचाने के लिये संग्राम


1990 से पहले तक जहाँ 30 से 38 डिग्री तक रहने वाला पारा अब बढ़कर 49 डिग्री को छूने लगा है यानी दस डिग्री का जबरदस्त उछाल। बारिश लगातार कम होती जा रही है। कभी 60 दिनों तक होने वाली बारिश अब 35 से 40 दिन भी नहीं होती, यानी करीब आधी। नब्बे के दशक में 971 मिमी बारिश होती थी जो अब घटकर 679 मिमी तक आ गई है। बारिश की कमी का सीधा असर इलाके के मौसम तथा जलस्रोतों पर पड़ा है। कभी मार्च तक भरे रहने वाली नदी-नाले, तालाब और कुएँ-कुण्डियाँ अब दिसम्बर तक भी साथ नहीं निभाते हैं। संग्रामपुर और उसके आसपास के दर्जन भर से ज्यादा गाँव इन दिनों एक बड़े संग्राम के दौर से गुजर रहे हैं। पानी के लिये संग्राम। ये गाँव पहले कभी 'पानीदार' हुआ करते थे लेकिन अब बूँद-बूँद को भी मोहताज हो चुके हैं। गाँव के लोग अब पानी का मोल पहचान रहे हैं और पानी बचाने के लिये जी-जान से जुटे हैं। यहाँ प्रदेश का पहला यूएनडीपी पायलट प्रोजेक्ट लागू किया गया है, जो पानी बचाने की विभिन्न तकनीकों से इलाके का पानी सहेजने की कोशिश कर रहे हैं। खास बात यह है कि स्थानीय विधायक तथा प्रदेश की महिला बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनिस भी आम राजनेताओं की छवि से हटकर अपने क्षेत्र के ग्रामीणों को पानी के जमीनी काम से जोड़ रही हैं।

35 प्रतिशत आबादी को मयस्सर नहीं पानी

Author: 
वीणा सबलोक पाठक

अभी तो वैद्य कॉलोनियों को ही पानी देने की मुश्किल आ रही है तो अवैध को देना कैसे संभव है। इन कॉलोनियों में कुछ स्थान पर बोर कराए हैं लेकिन भूजलस्तर कम होने पर वह काम नहीं कर रहे हैं। नर्मदा जल आने पर ही इन कॉलोनियों में पानी सप्लाई हो सकेगी। - कृष्णा गौर, महापौर

भोपाल, 15 अक्टूबर। किसी ने ठीक ही भविष्यवाणी की है कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिये ही लड़ा जाएगा। पानी का संकट जिस प्रकार दिन प्रतिदिन गंभीर होता जा रहा है, उसे देखकर लगता है कि जल्द ही यह बात सही भी साबित हो जाएगी। जल समस्या की बात यदि विश्व, देश और प्रदेश की ना करके केवल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की करें तो स्थिति एकदम स्पष्ट हो जाती है क्योंकि भोपाल की 30 से 35 प्रतिशत आबादी आज भी पानी की एक-एक बूँद के लिये तरस रही है। राजधानी को भले ही महानगर की श्रेणी में लाने के लिये अत्याधुनिक सुख सुविधाएँ विकसित की जा रही हो, लेकिन यहाँ की 30 से 35 प्रतिशत आबादी अब भी कुएँ, बावड़ी बोर जैसे पानी के स्रोतों के बिना है।

भूजल गटक रहे 31 हजार प्रतिष्ठान

Source: 
दैनिक जागरण, 31 मार्च, 2018

दून में 150 से अधिक बड़ी आवासीय परियोजनाएँ, 200 से अधिक ऑटोमोबाइल के वर्कशॉप हैं, जो भारी मात्रा में भूजल का दोहन करते हैं। जबकि भूजल रीचार्ज की बात करें तो ढूँढे भी ऐसे उदाहरण नहीं मिल पाते। वह तो भला हो मानसून का, जिससे भूजल का 1.26 बिलियन क्यूबिक मीटर रीचार्ज हो जाता है। जबकि अन्य स्रोतों से महज 0.24 बीसीएम ही जल रीचार्ज हो पाता है। दूसरी तरफ भूजल पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है, ऐसे में एक समय वह भी आएगा, जब मानसून से होने वाला रीचार्ज भी नाकाफी साबित होने लगेगा।