साफ पानी का सपना

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डाउन टू अर्थ, जून, 2018

जल संकटजल संकट गैर लाभकारी अन्तरराष्ट्रीय संगठन वाटरऐड के अनुसार, भारत उन देशों की सूची में पहले स्थान पर है जहाँ लोगों के घरों के पास साफ पानी की व्यवस्था सबसे कम है। इथियोपिया और नाइजीरिया ने हमसे बेहतर प्रदर्शन किया है। यह हालात तब हैं जब भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जिसने लोगों तक पानी पहुँचाने में काफी सुधार किया है।

भारत भूमिगत जल-स्तर के नीचे जाने, सूखे, कृषि और उद्योग की ओर से पानी की माँग, प्रदूषण और गलत जल प्रबन्धन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। यह चुनौती जलवायु परिवर्तन के कारण अतिशय मौसम की घटनाओं से और बढ़ेगी। नवम्बर 2017 को भारत सरकार ने अपने ग्रामीण जल कार्यक्रम को संशोधित किया था ताकि 90 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों तक 2022 तक पाइपलाइन के जरिए पानी पहुँचाया जा सके। लेकिन अगर पिछले अनुभव पर नजर डालें तो हम पाएँगे कि यह लक्ष्य हासिल करना बेहद मुश्किल है।

कहाँ गये 3403 चाल-खाल

Author: 
सुमन सेमवाल
Source: 
दैनिक जागरण, 16 जून, 2018

चाल-खालचाल-खाल भूजल रिचार्ज करने और अन्य प्राकृतिक जल-स्रोतों में पानी का प्रवाह बनाये रखने के लिये प्रदेशभर में बनाये गये 3403 चाल-खाल का अता-पता नहीं है। ये चाल-खाल वर्तमान में बचे भी हैं या क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, इनके रिकॉर्ड जल संस्थान के पास हैं ही नहीं।

जल संस्थान मुख्यालय में इस बात के रिकॉर्ड तो हैं कि विभाग के गठन से लेकर अब तक प्रदेशभर में 3403 चाल-खाल का निर्माण किया गया। इनका उल्लेख विभाग अपनी उपलब्धि के रूप में बाकायदा करता है। हालांकि मौजूदा समय में इनमें पानी एकत्रित भी हो रहा है या नहीं, इसका पता अधिकारियों को नहीं है। यदि अधिकारियों को इसकी जानकारी होती या चाल-खाल बेहतर स्थिति में होते तो विभाग के 719 स्रोतों का पानी सूखने के कगार पर न पहुँचता। कई स्रोतों का पानी तो 90 फीसद तक कम भी हो चुका है। इसके बाद भी अधिकारी अब यह पता कराने की जहमत भी नहीं उठा रहे कि जिन चाल-खाल का निर्माण कराया गया था, उनकी ताजा तस्वीर क्या है। न ही जल संस्थान की कार्य योजना में चाल-खाल के भौतिक सत्यापन कराने का ही जिक्र है।

नये चाल-खाल की प्रगति सुस्त

मौजूदा वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिये जल संस्थान ने 410 चाल-खाल के निर्माण का लक्ष्य रखा है। 2155.24 घनमीटर क्षेत्रफल पर बनने वाले इन चाल की प्रगति देखी जाए तो अभी महज 11.46 फीसद लक्ष्य ही हासिल किया जा चुका है। जबकि, वित्तीय वर्ष के करीब तीन माह पूरे होने जा रहे हैं। बेहतर होता कि मानसून सीजन तक अधिक-से-अधिक चाल-खाल का निर्माण पूरा कर लिया जाता। क्योंकि इस सीजन में इनमें भरपूर पानी जमा होता और फिर इनमें भूजल व पानी के अन्य स्रोत रिचार्ज हो पाते।

बारिश से नहीं बुझ रही धरती की प्यास

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दैनिक जागरण, 12 जून, 2018

हमारा दून किस भविष्य की तरफ बढ़ रहा है। एक ओर पानी के लिये भूजल पर हमारी निर्भरता 90 फीसद तक बढ़ गई है और दूसरी तरफ हम भूगर्भ के भण्डार के पुनर्भरण की तरफ भी ध्यान नहीं दे रहे। भवनों में वर्षा जल संग्रहण के लिये छत पर टैंक निर्माण की बात तो दूर सिस्टम की अनदेखी ने प्राकृतिक रूप से वर्षा जल रिचार्ज की राह भी बाधित कर दी है। एमडीडीए के ट्रांसपोर्ट प्लानर जगमोहन सिंह के ताजा शोध पर गौर करें तो अनियोजित शहरी विकास के चलते दून की जमीन महज 15 फीसद वर्षाजल ही सोख पा रही है।

शोध के अनुसार राज्य गठन से पहले जब दून के 20 फीसद हिस्से पर शहरीकरण था, तब 42 फीसद तक बारिश का पानी जमीन में समा जाता था। राज्य गठन के कुछ समय बाद तक 50 फीसद हिस्से पर शहरीकरण में भी 35 फीसद तक वर्षाजल भूगर्भ में समा जाता था। आज शहरीकरण ने 75 फीसद भूभाग को अपनी चपेट में ले लिया है और अब महज 15 फीसद ही वर्षा जल वापस धरती के गर्भ में समा रहा है।

शहरीकरण से अधिक अनियोजित विकास घातक

शहरीकरण में कोई बुराई नहीं, दिक्कत सिर्फ इस बात की है कि दून अनियोजित विकास की भेंट चढ़ गया है। बिना ले-आउट पास कराये किये भवन निर्माण के चलते मानक के अनुरूप ग्रीन बेल्ट दून के हिस्से नहीं आ पाई। शहर के भीतर जहाँ सड़कों का निर्माण भी किया गया है, वहाँ किनारों पर तक खाली जगह नहीं छोड़ी गई है, जिससे वर्षा जल के प्राकृतिक रिचार्ज में भी दिक्कत आ रही है।

आखिर कब तक रहेंगे मानसून के भरोसे

स्रोतों का 2.2 करोड़ लीटर पानी घटा

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दैनिक जागरण, 10 जून, 2018

कोई भी सम्पदा कितनी ही अधिक क्यों न हो, यदि उसका संरक्षण न किया जाये तो एक दिन उसे समाप्त होने से कोई नहींं रोक सकता। जल भी ऐसी ही एक सम्पदा है, जिसे संरक्षण के बिना महफूज रख पाना सम्भव नहीं। राज्य गठन से अब तक के 18 साल के अन्तराल की बात करें तो पानी को हमने सिर्फ दोहन का जरिया समझा है। सतह के स्रोत (नदी,झरने) सूखने लगे तो एक पल गँवाए बिना धरती का सीना चीरकर भूजल गटकने लगे। पानी की सिर्फ भोगने वाली प्रवृत्ति का ही नतीजा है कि दून के चार स्रोतों के पानी में 2.2 करोड़ लीटर की कमी आ गई है। दूसरी तरफ रीचार्ज के इंतजाम किये बिना भूजल गटकने के चलते दून के दशकों पुराने 20 ट्यूबवेल के पानी में प्रति मिनट 8255 लीटर की कमी आ गई है।

भूजल व पानी सतह वाले स्रोतों के प्रवाह में कमी के ये आँकड़े सरकारी रिकॉर्ड में लम्बे समय से दर्ज हैं। इसके बाद भी स्रोतों को रीचार्ज करने व भूजल स्तर को बनाए रखने की जगह अधिकारी नये ट्यूबवेल की खुदाई में अधिक दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इस समय दून में 279 से अधिक ट्यूबवेल से रात-दिन पानी का दोहन किया जा रहा है। नये ट्यूबवेल से बेशक पानी की आपूर्ति बढ़ गई है, लेकिन भूजल पर दबाव भी उसी अनुपात में बढ़ रहा है। दूसरी तरफ भूजल रीचार्ज के भी प्रयास नहीं किये जा रहे।

अगर इस ओर ध्यान दिया जाता तो जिन ट्यूबवेल से लम्बे समय तक पेयजल का दोहन किया गया, आज उनकी साँसे उखड़ती नहीं। दून में तीन ट्यूबवेल ऐसे है, जो 60 के दशक से सेवाएँ दे रहे हैं। इनमें पानी की कमी की बात करें तो अधिकतम 1450 लीटर प्रति मिनट की कमी आ गई है। ऐसे में एक समय वह भी आएगा, जब नये ट्यूबवेलों का पानी भी घटने लगेगा। क्योंकि जमीन के भीतर भले ही अभी पानी पर्याप्त मात्रा में हो, मगर रीचार्ज के बिना उस पर भी संकट बढ़ना तय है। जिस तरह अधिकारी नये ट्यूबवेल पर बल दे रहे हैं और पुराने ट्यूबवेल की रीचार्ज नहीं किया जा रहा, उससे एक समय ऐसा भी आएगा, जब नये ट्यूबवेल के लिये शहर में जगह भी नहीं बच पाएगी। लिहाजा, यदि हम नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ी को गम्भीर पेयजल संकट से जूझना पड़ेगा।

प्रकृति ही इलाज

Author: 
भरत शर्मा
Source: 
दैनिक जागरण, 10 जून, 2018

भारतीय परिस्थितियों में पानी की समस्या से बचने के लिये कई अहम कदम उठाने होंगे। जैसे नगर पालिकाओं की जवाबदेही बढ़ाना। इनकी तकनीकी और प्रबन्धन क्षमता को बढ़ाया जाना चाहिए। सप्लाई किये जाने वाले पानी को विभिन्न स्रोतों से लिया जाना चाहिए, जैसे भूजल, सतह पर मौजूद जल, संरक्षित किया हुआ वर्षाजल और शोधित किया हुआ दूषित जल। शहर या कस्बों के निर्माण की योजना बनाते समय चाहे अमीरों के लिये गगनचुम्बी इमारतें बनाई जाएँ या गरीबों के लिये बस्तियाँ बसाई जाएँ, उसमें साफ और सस्ते पानी की उपलब्धता अनिवार्य होनी चाहिए।

प्यास भर तो बचा रहे पानी

Author: 
योगिता यादव
Source: 
दैनिक जागरण, 10 जून, 2018

जल संकटजल संकट कथा है कि कभी कश्मीर की जगह सतीसर हुआ करता था। पुंछ में अब भी नागसर, कटोरासर सहित ‘सर’ शब्द से सम्बोधित कई झीलें हैं। राजौरी के चश्मे अब भी धार्मिक और ऐतिहासिक महत्त्व के रूप में सांस्कृतिक पहचान संजोए हुए हैं। वहीं ऊधमपुर को बावलियों वाला शहर कहा जाता है। जम्मू-कश्मीर राज्य के अन्तिम छोर कठुआ में झरनों और झीलों के वे प्राकृतिक स्रोत भले ही न हों पर बुजुर्गों ने तालाबों में पानी सहेजने का हुनर बचाया हुआ था।

जिस शहर के बीचो-बीच से गुजरती है तविषी नदी, वहीं आज हालत यह है कि पानी की किल्लत के मद्देनजर रेलवे ट्रैक और हाइवे जाम किये जा रहे हैं। लोग सूखे हलक और खाली बर्तन लिये पानी के लिये त्राहि-त्राहि कर रहे हैं जबकि अभी कुछ ही दिन पहले मई माह में भी यहाँ के रहवासी बिन मौसम बरसात का लुत्फ उठा रहे थे।

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मामलों के जानकार डॉ. ओम गोस्वामी कहते हैं, “जम्मू-कश्मीर पानी के लिये किसी पर निर्भर कभी नहीं रहा। बल्कि यहाँ की नदियों पर लगी पनबिजली परियोजनाएँ अन्य राज्यों को बिजली आपूर्ति करती हैं। हमारी नदियों का पानी दूसरे राज्यों ही नहीं, दूसरे देशों को भी चला जाता है। फिर भी यहाँ के लोगों को पानी के लिये तरसना पड़ रहा है तो यह सिर्फ दुखद ही नहीं एक बड़ी आपदा का संकेत भी है कि अगर पहाड़ी राज्यों का यह हाल है तो मैदानों का क्या हाल होगा? इन संकेतों को समझकर जल्द-से-जल्द इस संकट से निपटने के इन्तजाम करने होंगे।”

वाटर बैंक थीं खातरियाँ

गर्मी में जल संकट और दून का कल

Author: 
दीपिका नेगी
Source: 
दैनिक जागरण, 26 मई 2018

बीते डेढ़ दशक में आबादी का ग्राफ 40 फीसद तक बढ़ गया और उसके अनुसार धड़ाधड़ 235 नलकूप (ट्यूबवेल) लगा दिये गये। लेकिन भूजल रिचार्ज की तरफ ध्यान नहीं दिया गया। जिसका नतीजा है कि शहर के 20 नलकूपों के पानी में प्रति मिनट 13,255 लीटर डिस्चार्ज की कमी आई है।

रूठे को मनाना होगा


बिना जल के हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। अतीत में कई बार प्राकृतिक कारणों से विषम परिस्थितियाँ आईं, लेकिन पानी ने धरती से कभी जीवन को नष्ट नहीं होने दिया। अब जब हम खुद पानी को नष्ट करने पर उतारू हैं, तो पानी भी हमसे रूठ रहा है।

कहाँ बह जाती हैं बड़ी-बड़ी योजनाएँ

Author: 
मनोहर सिंह राठौर
Source: 
कादम्बिनी, मई, 2018

जल समस्या के समाधान के लिये हर सरकार ने बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाई हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर न तो ये योजनाएँ दिखाई दीं और न ही इनके परिणाम। जल समस्या जस की तस है। आखिरकार ये योजनाएँ गईं तो कहाँ गईं।