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लुप्त होतीं हिमालय की जलधाराएँ


सूखती जलधाराएँ समाज में बढ़ती जटिलताओं और उसके समक्ष भविष्य में आने वाले पर्यावरणीय एक चेतावनी है। हकीकत तो यह है कि ग्रामीणों की बजाय विकसित और जटिल होता समाज पर्यावरण को अधिक क्षति पहुँचा रहा है। इस जटिलता के पीछे वह कथित विकास है, जिसके तहत औद्योगिक गतिविधियों को बेलगाम बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही बढ़ता शहरीकरण और पहाड़ों को पर्यटन के लिये आधुनिक ढंग से विकसित किया जाना भी है। हिमालय से निकलने वाली 60 प्रतिशत जलधाराएँ सूखने की कगार पर हैं। इनमें गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों की जलधाराएँ भी शामिल हैं। इन और हिमालय से निकलने वाली तमाम नदियों की अविरलता इन्हीं जलधाराओं से प्रवाहमान रहती हैं। इन जलधाराओं की स्थिति इस हाल में आ गई है कि अब इनमें केवल बरसाती मौसम में पानी आता है। यह जानकारी नीति आयोग के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा जल-सरंक्षण के लिये तैयार की गई एक रिपोर्ट में सामने आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत के मुकुट कहे जाने वाले हिमालय के अलग-अलग क्षेत्रों से पचास लाख से भी अधिक जलधराएँ निकलती हैं। इनमें से करीब 30 लाख केवल भारतीय हिमालय क्षेत्र से ही निकलती हैं। हिमालय की इन धाराओं में हिमखण्डों के पिघलने, हिमनदों का जलस्तर बढ़ने और मौसम में होने वाले बदलावों से पानी बना रहता है। किन्तु यह हाल इसलिये हुआ, क्योंकि हम हिमालय में नदियों के मूल स्रोतों को औद्योगिक हित साधने के लिये हम निचोड़ने में लगे हैं।

आर्द्रभूमि को लेकर सूख रही आँखों की नमी

विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2 फरवरी 2018 पर विशेष


लोकटक झीललोकटक झील2 फरवरी को दुनिया भर में विश्व आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) दिवस मनाया जाता है। सन 1971 में इसी दिन वेटलैंड्स को बचाने के लिये ईरान के रामसर में पहला सम्मेलन किया गया था। इसलिये इस सम्मेलन को रामसर सम्मेलन (कन्वेंशन) भी कहा जाता है।

इस कन्वेंशन में एक अन्तरराष्ट्रीय समझौता किया गया था। इस समझौते की बुनियाद में विश्व भर की आर्द्रभूमि की सुरक्षा का संकल्प था।

समुद्री खारे पानी को मीठा बनाने का उपहार


दुनिया के वैज्ञानिक इन कोशिशों में लगे हैं कि खारे पानी को मीठा बनाने के सरल व सुविधायुक्त संयंत्र ईजाद कर लिये जाएँ। लेकिन अभी इजराइल जैसी सफलता किसी अन्य देश को नहीं मिली है। ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों के एक दल ने ग्रैफीन की एक ऐसी चलनी विकसित की है, जो समंदर के खारे पानी से नमक को अलग कर देती है। ग्रैफीन ग्रेफाइट की पतली पट्टी जैसा तत्व है, जिसे प्रयोगशाला में आसानी से तैयार किया जा सकता है।

असामान्य है पिंडारी ग्लेशियर का पीछे खिसकना

Author: 
दीप सिंह बोरा
Source: 
दैनिक जागरण, 18 जनवरी, 2018

हिमनद क्षेत्र में हालात बहुत अच्छे नहीं रहे। पर्यावरणविद प्रकाश जोशी के अनुसार दिसम्बर व जनवरी में यहाँ बेहतर बर्फबारी हुआ करती थी, जिससे पिंडार नदी का जलप्रवाह थम सा जाता था। तापमान सामान्य से 15-20 डिग्री नीचे गिर जाता था। अब तापमान ज्यादा नहीं गिरता। जो बर्फ गिरती भी है, वह जल्द पिघल जाती है। इससे सर्दियों में जलप्रवाह बढ़ रहा है, लेकिन गर्मियों में पानी नाममात्र को भी रहेगा।

ये प्यास कब बुझेगी

Author: 
अंकित सैनी
Source: 
दैनिक जागरण, 31 दिसम्बर 2017

पेयजल निगम ने एनआरडीडब्ल्यूपी व वर्ल्ड बैंक की सहायता से ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 5613 पेयजल योजनाओं का निर्माण किया था, जिनका रख-रखाव ग्राम पंचायतों के पास है। अब स्थिति ये है कि आपदा के दौरान इनमें चार हजार से ज्यादा योजनाएँ क्षतिग्रस्त हालत में पड़ी हैं। चूँकि, ग्राम पंचायतों के पास योजनाओं का पुनर्निर्माण व नई योजनाएँ बनाने के लिये बजट की व्यवस्था नहीं है तो इन योजनाओं का पुनर्निर्माण करने की जिम्मेदारी भी पेयजल निगम की है।

यमुना में अमोनिया पेयजल संकट

Source: 
प्रयुक्ति, 01 जनवरी, 2018

दिल्ली में पहले से ही प्रदूषित हवा की मार झेल रहे राजधानीवासियों को नए साल में पेयजल संकट से जूझना पड़ेगा। यमुना नदी में अमोनिया प्रदूषण का स्तर बढ़ जाने के कारण वजीराबाद, चंद्रावल, हैदरपुर-1, हैदरपुर-2, ओखला, द्वारका, बवाना तथा नांगलोई वाटर ट्रीटमेंट प्लान्ट में जलशोधन कार्य ठप हो गया है। दिल्ली जल बोर्ड ने कहा है कि अगले 48 घंटे तक इन जलशोधन संयंत्रों से पानी का शोधन नहीं हो सकता।

यमुना नदी जल बोर्ड के अनुसार इस परेशानी की वजह से नॉर्थ, सेंट्रल, वेस्ट, साउथ, दिल्ली कैंट तथा नई दिल्ली नगर पालिका क्षेत्र (एनडीएमसी) क्षेत्र सहित तकरीबन आधी से ज्यादा राजधानी क्षेत्र में पानी आपूर्ति प्रभावित रहेगी। जल बोर्ड ने कहा है कि लोग आवश्यकतानुसार पानी रख लें तथा जरूरी होने पर उपभोक्ता जल बोर्ड के केन्द्रीय नियंत्रण कक्ष के फोन नम्बर- 1916-23527679, 23634469, 23513073 व 1800117118 पर सम्पर्क कर पानी का टैंकर मँगा सकते हैं।

हरियाणा की फैक्ट्रियों से यमुना में मिलता है केमिकल

पहाड़ टूट रहे हैं पेड़ों पर

Author: 
सुरेश भाई
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, दिसम्बर 2017

केदारनाथ मार्ग पर काकड़ा गाड़ से लेकर मौजूदा सेमी-गुप्तकाशी तक के मार्ग को बदलने के लिये 10 किमी से अधिक सिंगोली के घने जंगलों के बीच से नया इलाईमेंट लोहारा होकर गुप्तकाशी किया जा रहा है। इसी तरह फाटा बाजार को छोड़कर मैखंडा से खड़िया गाँव होते हुए नई रोड का निर्माण किया जाना है। फाटा और सेमी के लोग इससे बहुत आहत हैं। यदि ऐसा होता है तो इन गाँवों के लोगों का व्यापार और सड़क सुविधा बाधित होगी। इसके साथ ही पौराणिक मन्दिर, जलस्रोत भी समाप्त हो जाएँगे। आज कल चारधाम-गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ मार्गों पर हजारों वन प्रजातियों के ऊपर पहाड़ टूटने लगे हैं। ऋषिकेश से आगे देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, अगस्त मुनि, गुप्तकाशी, फाटा, त्रिजुगीनारायण, गौचर, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, चमोली, पीपल कोटी, हेंलग से बद्रीनाथ तक हजारों पड़ों का सफाया हो गया है।

उत्तराखण्ड सरकार का दावा है कि वे ऑल वेदर रोड के नाम पर 43 हजार पेड़ काट रहे हैं। लेकिन सवाल खड़ा होता है कि 10-12 मीटर सड़क विस्तारीकरण के लिये 24 मीटर तक पेड़ों का कटान क्यों किया जा रहा है? और यह नहीं भूलना चाहिए कि एक पेड़ गिराने का अर्थ है दस अन्य पेड़ खतरे में आना इस तरह लाखों की संख्या में वन प्रजातियों का सफाया हो जाएगा।

सड़क चौड़ीकरण के नाम पर देवदार के अतिरिक्त बांज, बुरांस, तुन, सीरस, उत्तीस, चीड़, पीपल आदि के पेड़ भी वन निगम काट रहा है। जो वन निगम केवल ‘वनों को काटो और बेचो’ की छवि पर खड़ा है, उससे ये आशा नहीं की जा सकती है कि वह पेड़ों को बचाने का विकल्प दे दें। यहाँ एक तरफ तो सड़क चौड़ीकरण है और दूसरी तरफ वन निगम की कमाई का साधन एक बार फिर उछाल पर है।

मालवा की मानव निर्मित मौत

Author: 
राम प्रताप गुप्ता
Source: 
डाउन टू अर्थ, दिसम्बर 2017

मालवा के जल संसाधनों पर ग्रहण उस समय लगा जब बाँधों की श्रृंखला में गाँधीसागर बाँध शामिल हुआ।

पश्चिमी मध्य प्रदेश के 8 जिलों- धार, इंदौर, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच को प्रायः मालवा कहा जाता है। आजादी के समय क्षेत्र की प्रमुख नदी, चम्बल या उसकी प्रमुख सहायक नदियों गम्भीर, क्षिप्रा, छोटी कालसिंध, शिवना आदि में ही नहीं, छोटे नालों में भी वर्ष भर पानी बहता था। क्षेत्र में राजाओं द्वारा जंगली जानवरों के शिकार हेतु वनों की रक्षा की जाती थी। क्षेत्र की प्रमुख रियासत होल्कर एस्टेट के 1930 के गजेटियर में लिखा है कि होल्कर एस्टेट में 30 प्रतिशत क्षेत्र में वन थे। पश्चिमी मानसून से औसतन 36 इंच वर्षा होती थी। क्षेत्र की काली मिट्टी कपास की खेती के लिये उपयुक्त थी और कपास के अच्छे उत्पादन के फलस्वरूप यहाँ 6-7 कपड़ा मिल थीं। वर्षा के जल को सिंचाई और पेयजल हेतु संग्रहित करने के लिये कितने तालाब थे, इस बारे में कोई आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन 1954-60 के मध्य चम्बल घाटी विकास परियोजना के अन्तर्गत बने प्रथम गाँधीसागर बाँध के जलाशय में 95 तालाब डूब में आए थे। जलाशय का क्षेत्र 560 वर्ग किमी था। 5.89 वर्ग किमी में एक तालाब था। इस हिसाब से गाँधीसागर के जलग्रहण क्षेत्र में 3800 के आस-पास तालाब रहे होंगे।

. मालवा क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में वन होने, मिट्टी में जैविक पदार्थों की पर्याप्त मात्रा के होने से इस क्षेत्र की भूमि में आर्द्रता का स्तर अच्छा था और असिंचित क्षेत्र में भी अच्छी खेती होती थी। असिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले कठिया गेहूँ की माँग अच्छी थी। अच्छी वर्षा, नदियों-नालों में वर्ष भर पानी बहने, अच्छे स्तर के कृषि उत्पादन को देखते हुए किसी जनकवि ने मालवा की विशेषताओं को इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया है-

तालाब सूखने लगा तो पानी की हाहाकार


पहले से ही लगातार गिरते जलस्तर का सामना कर रहे मध्यप्रदेश के कई इलाकों में इस बार सामान्य से भी कम बारिश हुई है। यही कारण है कि हर बार ठंड खत्म होने पर सुनाई देने वाली जल संकट की आहट इस बार अभी से सुनाई देने लगी है। देवास जिले के पीपलरावाँ क़स्बे के लोगों का मानना है कि बीते करीब डेढ़ सौ सालों में पहली बार उनके यहाँ दिसम्बर शुरू होते ही पानी की त्राहि–त्राहि मचने लगी है। यहाँ तक कि पचास के दशक में यहाँ पड़े अकाल के दौरान खेती नहीं होने से अन्न की परेशानी तो हुई थी लेकिन तब भी यहाँ के कुएँ–कुण्डी गर्मियों में पानी पिलाते रहे थे। तो क्या इस बार हालात उस अकाल के दौर से भी बदतर है?

नार्मदीय तालाब इन दिनों पीपलरावाँ में दिसम्बर के पहले हफ्ते से ही जल संकट की आहट शिद्दत से सुनाई देने लगी है। हालात इतने बुरे हैं कि अभी से यहाँ तीन से चार दिनों में केवल एक बार मात्र 15 से 20 मिनट तक ही जल प्रदाय किया जा रहा है। यहाँ जल संकट गहरा गया है तथा महिलाओं को पानी की खोज में दूर–दूर जाकर गहराते जा रहे कुएँ–कुण्डियों में रस्सियों से पानी उलीचकर लाना पड़ रहा है।