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जल की कठोरता : कारण और निवारण

Author: 
संजय कुमार पाठक
Source: 
ज्ञान-विज्ञान शैक्षिक निबन्ध, पुस्तक माला - 3

परिचय


जीवन की गुणवत्ता में योगदान देने वाले तीन प्रमुख कारकों में पहला है उस वायु की शुद्धता जिसमें हम साँस लेते हैं, दूसरा, उस जल की शुद्धता जिसे हम पीने के लिये एवं दैनिक उपयोगों हेतु इस्तेमाल करते हैं तथा तीसरा उस पर्यावरण की शुद्धता जिसमें हम निवास करते हैं। यद्यपि ये तीनों कारक एक-दूसरे पर निर्भर हैं फिर भी जल सम्बन्धी समस्या को बहुत गम्भीर माना जाता है। जल प्रकृति में व्याप्त एक ऐसा अद्भुत पदार्थ है जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जीवन सम्बन्धी सभी प्रक्रियाओं के लिये जल अतिउपयोगी है और पृथ्वी पर विद्यमान सभी रासायनिक पदार्थों में जल सर्वाधिक मात्रा में मौजूद है। प्रारम्भ में जल को एक तत्व के रूप में माना जाता था। हेनरी कैवेंडिश ने सन 1781 में दो भाग हाइड्रोजन तथा एक भाग ऑक्सीजन के मिश्रण को दहनकर जल की प्रयोगशाला निर्माण विधि की पुष्टि की। तब से यह सत्यापित हो गया कि जल हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन से बना एक यौगिक है जिसे रासायनिक सूत्र H2O द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

पानी की बूँद-बूँद बचाने का संकल्प (Resolve to save water)

Author: 
ओपी शर्मा
Source: 
भगीरथ, जनवरी-मार्च 2016, केन्द्रीय जल आयोग, भारत

आज समूचा विश्व गम्भीर जल संकट से जूझ रहा है। दिनों-दिन बढ़ रही आबादी इसका बहुत बड़ा कारण है। साथ ही आधुनिकता व विकास ने पानी की खपत में अभूतपूर्व वृद्धि की है इसलिये पानी की आपूर्ति माँग से बेहद कम है।

बूँद नदियों का जल प्रदूषित हो रहा है और ऐसा जल पीने से लोग बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। दूसरी तरफ, कई नदियाँ विलुप्त होने के कगार पर पहुँच रही हैं। कड़वा सच यह भी है कि विकासशील देशों में साफ पानी न मिलने के कारण बच्चे व बड़े भी बीमारियों से मौत के मुँह में चले जाते हैं। देश में महिलाओं एवं लड़कियों को खासतौर से पहाड़ी व मरुस्थलीय क्षेत्रों में पानी सिर और कन्धे पर रखकर लाना पड़ता है।

हमारे यहाँ पानी की किल्लत या संकट के पीछे मूल कारण है जल उपलब्धता की तुलना में माँग में वृद्धि। जिसका प्रमुख कारण है तेजी से बढ़ती आबादी, पानी की बेतहाशा बर्बादी को भी नकारा नहीं जा सकता। पाइप लाइनों की टूट-फूट, रख-रखाव व लापरवाही के चलते अन्धाधुन्ध पानी बेकार बहता रहता है। हमारी आबादी बढ़ रही है। साथ-ही-साथ ऊर्जा की आवश्यकता भी बढ़ रही है। औद्योगीकरण तेजी से बढ़ रहा है। परिणामस्वरूप पानी का उपयोग, उपभोग भी बढ़ रहा है।

वास्तव में पानी की कीमत अभी हमने जानी ही नहीं। बिना इसे बेशकीमती समझे जल का संरक्षण, इसकी बर्बादी रोकना तथा एकाधिक उपयोग समझ मे आएगा ही नहीं।

नैनी झील के घटते जलस्तर एवं उस पर किये गए वैज्ञानिक अध्ययन क्या कहते हैं (भाग 3)

Author: 
डॉ. राजेंद्र डोभाल

झील के पानी में गिरावट के कारण


लोगों के बेरुखी से सूखने के कगार पर झील पर्यावरण और पर्यटन आकर्षण के संदर्भ में नैनी झील नैनीताल में सबसे महत्त्वपूर्ण जल निकाय है। अन्य कुमाऊं झीलों की तुलना में, नैनीताल झील में सबसे बड़े मानव निर्मित परिवर्तन और क्षेत्र की जलवायु परिस्थितियों में चरम परिवर्तन का भी अनुभव होता है। नैनीताल झील के जलस्तर में गिरावट पर्यावरणविदों के बीच एक चिंता का कारण है, जिसका प्रमुख कारक गर्मियों के दौरान जल आपूर्ति के उद्देश्यों के लिये झील के पानी के अत्यधिक इस्तेमाल करना है। हाल के वर्षों में, अनियोजित निर्माण, अतिक्रमण और पुनर्भरण क्षेत्र में वृद्धि, 2015-2016 में सर्दी की वर्षा में कमी और 2015 की शुरुआत में मानसून में कमी के कारण झील जलस्तर में लगभग 20 फीट तेजी से गिरावट आई थी।

नैनी झील के जल की विशेषता, वनस्पति एवं जीव के वैज्ञानिक विश्लेषण (भाग-2)

Author: 
डॉ राजेंद्र डोभाल

झील के जल की विशेषता


जल प्रकृति में क्षारीय है (पीएच मान- 8.0- 9.0)। झील के आस-पास के जलग्रहण बेसिन से प्रवाह मिलता है जिसमें पहाड़ी ढलान और स्प्रिंग्स शामिल हैं।

नैनी झील में दिखते मैदान पम्पिंग सिस्टम नैनीताल- पानी की आपूर्ति पम्पिंग की एक जटिल प्रणाली पर आधारित है। वसंत के स्रोत से, एक्यू पाइपलाइन तल्ली वितरण (Free distribution) के लिये मुख्य रूप से सार्वजनिक स्टैंडपोस्टों के लिये जाती है। झील के किनारे ट्यूबवेल से, पानी एक जलीय जलाशय में पंप किया जाता है। नैनीताल में 100 वर्ष पुरानी पाइपयुक्त पानी की आपूर्ति (supply) है, जो कि कुमाऊं क्षेत्र में सबसे पुरानी है। पहले समय में स्टीम इंजन द्वारा स्प्रिंग्स से पानी खींचा जाता था (मुख्य वसंत: पर्दा धार)। 1914 में डीजल इंजन स्थापित किए गए थे। 1955 में, बढ़ती आबादी के कारण बढ़ती हुई पानी की मांग को पूरा करने के लिये spring के अलावा पंप द्वारा पानी की आपूर्ति के लिये प्रावधान किया गया था।

नैनीताल झील पर वैज्ञानिक विश्लेषण – (भाग-1)

Author: 
डॉ. राजेंद्र डोभाल

. नैनीताल झील एक प्राकृतिक झील है। यह झील भारत के उत्तराखण्ड राज्य के नैनीताल शहर में स्थित है। अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिये जहाँ विश्व प्रसिद्ध है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 1,937 मीटर है। सम्पूर्ण झील 1,410 मीटर लम्बी, 445 मीटर चौड़ी, 26 मीटर गहरी है। विशालदर्शी सात पहाड़ियों से घिरा हुआ नैनीताल झील, प्रसिद्ध रूप से नैनी झील के नाम से जाना जाता है, नैनीताल नगर का प्रमुख आकर्षण है। नैनीताल के दिल में स्थित, नैनी झील के शांत पानी में नौकाओं के चमकीले रंग आकर्षक सौंदर्य लाते हैं। यह चंद्र-आकार नैनी झील दक्षिण-पूर्व के अंत में एक आउटलेट है। नैनी झील कुमाऊं पहाड़ियों में स्थित चार बड़ी झीलों (तीन अन्य सातताल झील, भीमताल झील और नौकुचियाताल झील) में से एक हैं। बलिया नाला नैनीताल झील के मुख्य आउटलेट है, जो दक्षिण-पूर्वी दिशा की तरफ बहती है। झील के बेसिन क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 1294.5 मिमी (43.15 इंच) होने की सूचना है। अधिकतम तापमान 24.6 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 0.5 डिग्री सेल्सियस के साथ उष्णकटिबंधीय मानसून जलवायु दर्ज की गई है।

स्थान

बढ़ती आबादी के कारण जीना होगा मुहाल


विश्व जनसंख्या दिवस 11 जुलाई पर विशेष

. आज दुनिया बढ़ती आबादी के विकराल संकट का सामना कर रही है। यह समूची दुनिया के लिये भयावह चुनौती है। असलियत यह है कि इस सदी के अंत तक दुनिया की आबादी साढ़े बारह अरब का आंकड़ा पार कर जायेगी। विश्व की आबादी इस समय सात अरब को पार कर चुकी है और हर साल इसमें अस्सी लाख की बढ़ोत्तरी हो रही है। शायद यही वजह रही है जिसके चलते दुनिया के मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने कहा है कि पृथ्वी पर टिके रहने में हमारी प्रजाति का कोई दीर्घकालिक भविष्य नहीं है। यदि मनुष्य बचे रहना चाहता है तो उसे 200 से 500 साल के अंदर पृथ्वी को छोड़कर अंतरिक्ष में नया ठिकाना खोज लेना होगा। बढ़ती आबादी समूची दुनिया के लिये एक बहुत बड़ा खतरा बनती जा रही है। सदी के अंत तक आबादी की भयावहता की आशंका से सभी चिंतित हैं। दरअसल आने वाले 83 सालों के दौरान सबसे ज्यादा आबादी अफ्रीका में बढ़ेगी।

जल संकट की चपेट में देहरादून


दून घाटी में बढ़ता जल संकटदून घाटी में बढ़ता जल संकटअब मात्र 10 से 15 दिनों के बाद उत्तराखण्ड में मानसून दस्तक दे देगा, जैसा की मौसम विभाग की भविष्यवाणी है। किन्तु इतने दिनों तक राज्यवासियों के हलक कैसे तर होंगे? जो अहम सवाल है। लगातार राज्य में भूजल का स्तर गिरते जा रहा है और सम्बन्धित विभाग है जो कुम्भकरणी नींद में डूबा है।

प्राकृतिक जलस्रोत सूख रहे हैं, भूजल का स्तर अब आठ मीटर से भी नीचे चला गया है, राज्य में जनसंख्या बढ़ रही है। इसके अलावा राज्य में लोग गाँव छोड़कर पास के कस्बों में आकर बस रहे हैं। ऐसे में शहर व बाजार का रूप लेते छोटे कस्बों में पानी की किल्लत का होना लाजमी है। मगर जो जल उपलब्धता पूर्व से थी वह अब आधी हो चुकी है। जलस्रोत कैसे रीचार्ज होंगे? पेयजल की सुचारू व्यवस्था कब होगी? ऐसे तमाम सवाल राज्य में लोगो के गले में कौंध रहे हैं।

उत्तराखण्ड राज्य की अस्थायी राजधानी देहरादून का उदाहरण इस बात के लिये काफी है कि लोग पेयजल की किल्लत से कैसे जूझ रहे हैं। जबकि इस अस्थायी राजधानी में सत्ता प्रतिष्ठानों के सभी लाव-लश्कर मुस्तैद रहते हैं फिर भी लोग पेयजल संकट का सामना करते ही हैं। देहरादून में बांदल नदी का एक ऐसा प्राकृतिक जलस्रोत है जिससे प्रतिदिन 220 लाख लीटर पानी लगभग दो लाख लोगों की पेयजल की आपूर्ति करता है।

कुओं में पानी आया, तो गाँव में गूँज उठी शहनाई

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 18 जून 2017

. अलवर। शहर से करीब 21 किमी दूर पहाड़ी की तलहटी में बसा गाँव ढहलावास। ढाई हजार आबादी वाले इस गाँव में कुछ दिन पहले तक लोग अपने बेटे-बेटियों की शादी करने से भी कतराते थे। वहीं दूसरे गाँव के लोगों ने इनसे नाता तोड़ बेटियाँ देना बंद कर दिया था। इन हालात में गाँव में कुँवारों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। इसकी वजह रहा गाँव में पानी की किल्लत और कुएँ-तालाबों का सूखना। ऐसे में जल संरक्षण के ग्रामीणों के प्रयास व मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन योजना रंग लाई और गाँव के कुओं का जलस्तर बढ़ गया। पिछले साल जोहड़ खुदाई हुई, जो बारिश के बाद लबालव हो गया और आस-पास के कुओं में भी पानी आ गया। पानी आने से गाँव के बेटे-बेटियों की शादी से गाँव में फिर शहनाई गूँज उठी।

12-15 फीट पर पानी


ग्रामीणों के अनुसार पिछले साल जोहड़ खुदाई से पूर्व जो कुएँ सूखे थे, उनमें भी 12-15 फीट पर पानी आ गया। बताते हैं पहले 400-450 फीट पर भी पानी नहीं था।

40 फीसदी युवा थे कुँवारे


पानी की कमी से गाँव के लगभग 40 फीसदी युवा कुँवारे थे। साल में गाँव के एकाध युवा की बामुश्किल शादी होती थी। दूसरे गाँव के लोग इनसे रिश्ता जोड़ने से घबराते थे। खेती व पशुओं के लिये भी पानी का संकट बना हुआ था। इस साल गाँव के कुएँ-तालाबों में पानी आने से गाँव में रिकार्ड 10-15 युवाओं की शादी हुई है।

चार एनीकट और बनें


ग्रामीणों के अनुसार गाँव में जोहड़ से ही आधा दर्जन से अधिक कुओं में पानी आ गया। यदि गाँव में चार और एनीकट सीरावास, बागराज, नाकवा के पास, पहाड़ी पार व बैढाढ़ा के पास बन जाएँ तो पूरे गाँव की पेयजल समस्या समाप्त हो जाए।

प्राकृतिक संसाधनों की बदहाली से विचलित सोनांचल विकास मंच


. मध्य प्रदेश राज्य के पूर्व में छत्तीसगढ़ राज्य की सीमा से सटे अनूपपुर, उमरिया और शहडोल जिलों को मिलाकर शहडोल संभाग बना है। इस संभाग की कुल आबादी लगभग 24.60 लाख है। संभाग प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न है। अच्छी खासी बरसात होती है। इस क्षेत्र में कोयले की बहुत सी खदानें हैं। उन खदानों के कारण पूरे देश में इस इलाके की पहचान मुख्य कोयला उत्पादक क्षेत्र के रूप में है। कोयले के अलावा इस इलाके में घने जंगल हैं। इस इलाके की मुख्य नदी सोन है। संभाग की पहचान अपेक्षाकृत पिछड़े इलाके के रूप में है। इस संभाग में अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं।