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35 प्रतिशत आबादी को मयस्सर नहीं पानी

Author: 
वीणा सबलोक पाठक

अभी तो वैद्य कॉलोनियों को ही पानी देने की मुश्किल आ रही है तो अवैध को देना कैसे संभव है। इन कॉलोनियों में कुछ स्थान पर बोर कराए हैं लेकिन भूजलस्तर कम होने पर वह काम नहीं कर रहे हैं। नर्मदा जल आने पर ही इन कॉलोनियों में पानी सप्लाई हो सकेगी। - कृष्णा गौर, महापौर

भोपाल, 15 अक्टूबर। किसी ने ठीक ही भविष्यवाणी की है कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिये ही लड़ा जाएगा। पानी का संकट जिस प्रकार दिन प्रतिदिन गंभीर होता जा रहा है, उसे देखकर लगता है कि जल्द ही यह बात सही भी साबित हो जाएगी। जल समस्या की बात यदि विश्व, देश और प्रदेश की ना करके केवल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की करें तो स्थिति एकदम स्पष्ट हो जाती है क्योंकि भोपाल की 30 से 35 प्रतिशत आबादी आज भी पानी की एक-एक बूँद के लिये तरस रही है। राजधानी को भले ही महानगर की श्रेणी में लाने के लिये अत्याधुनिक सुख सुविधाएँ विकसित की जा रही हो, लेकिन यहाँ की 30 से 35 प्रतिशत आबादी अब भी कुएँ, बावड़ी बोर जैसे पानी के स्रोतों के बिना है।

भूजल गटक रहे 31 हजार प्रतिष्ठान

Source: 
दैनिक जागरण, 31 मार्च, 2018

दून में 150 से अधिक बड़ी आवासीय परियोजनाएँ, 200 से अधिक ऑटोमोबाइल के वर्कशॉप हैं, जो भारी मात्रा में भूजल का दोहन करते हैं। जबकि भूजल रीचार्ज की बात करें तो ढूँढे भी ऐसे उदाहरण नहीं मिल पाते। वह तो भला हो मानसून का, जिससे भूजल का 1.26 बिलियन क्यूबिक मीटर रीचार्ज हो जाता है। जबकि अन्य स्रोतों से महज 0.24 बीसीएम ही जल रीचार्ज हो पाता है। दूसरी तरफ भूजल पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है, ऐसे में एक समय वह भी आएगा, जब मानसून से होने वाला रीचार्ज भी नाकाफी साबित होने लगेगा।

घट रहा है पानी


पानी की 80 प्रतिशत से ज्यादा जरूरतें हम भूजल से ही पूरी करते हैं, लेकिन इनका पुनर्भरण नहीं करते। इन लापरवाहियों के चलते ही केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने चेताया है कि पाँच साल पहले तक देश की 121 नदियाँ प्रदूषित थीं, जिनकी संख्या अब बढ़कर 275 हो गई है। इस प्रदूषण का कारण औद्योगिक और शहरी नालों की नदियों में निकासी है। साथ ही नदियों पर बाँधों का बेतरतीब निर्माण और नदियों से रेत निकालना भी है। इन कारणों के चलते आज हमारी गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियाँ भी बज-बजाते नालों में तब्दील हो गई हैं। भारत के लिये यह एक कड़ी चेतावनी है कि वह विश्व-भूगोल में उन देशों में शुमार हो गया है, जहाँ निकट भविष्य में भयंकर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की ताजा रिपोर्ट में यह चिन्ताजनक पहलू रेखांकित किया गया है कि आने वाले 30 साल के भीतर देश के जल भण्डारों में 40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

इस नाते देश की बढ़ती आबादी के परिप्रेक्ष्य में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता तेजी से घटेगी। उत्तर-पश्चिमी भारत तो पहले से ही भीषण जल संकट से रूबरू है। अब देश के अन्य हिस्से भी इसके दायरे में आते जा रहे हैं। ऐसा अनुमान है कि 2050 तक जलस्रोतों में 22 फीसदी पानी ही शेष रह जाएगा। वर्ष-1991 और 2011 के बीच प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में 70 फीसदी की कमी दर्ज की गई है।

युद्ध और शान्ति के बीच जल - भाग दो


(प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह के वैश्विक जल अनुभवों पर आधारित एक शृंखला)

सीरिया, दुष्काल के चंगुल में


जल संकटजल संकट20 से 25 अक्टूबर, 2015 को टर्की के अंकारा में संयुक्त राष्ट्र संघ का एक सम्मेलन था। यह सम्मेलन, रेगिस्तान भूमि के फैलते दायरे को नियंत्रित करने पर राय-मशविरे के लिये बुलाया गया था। चूँकि, अलवर, राजस्थान के ग्रामीणों के साथ मिलकर तरुण भारत संघ इस विषय में कुछ सफल कर पाया है; लिहाजा, मुझे वहाँ की नोट स्पीकर के तौर पर आमंत्रित किया गया था।

दून के लिये सौंग-सूर्याधार प्रोजेक्ट से पानी

Source: 
हिन्दुस्तान, 23 मार्च 2018

सिंचाई विभाग की अत्यंत महत्वाकांक्षी सौंग नदी बाँध और सूर्याधार बैराज प्रोजेक्ट के लिये राज्य सरकार ने बजट में चालीस करोड़ रुपये की व्यवस्था की है। इससे इस योजना के जल्द शुरू होने के आसार हैं। अगले 30 साल तक समूचे देहरादून की पेयजल समस्या को दूर करने के लिये डिज़ायन किए गए इस प्रोजेक्ट के लिये सरकार ने लगभग एक हजार करोड़ रुपये विश्व बैंक और दूसरे संसाधनों से जुटाने का लक्ष्य रखा है।

दून घाटी में बढ़ता जल संकट राज्य बनने के बाद राजधानी में जिस तेजी से आबादी का दबाव बढ़ा है, उसी तेजी से जरूरतें भी बढ़ी हैं। सबसे अहम है पीने का पानी। गर्मियों में दून में पानी की डिमांड और उपलब्धता के बीच भारी अन्तर को देखते हुए सौंग बाँध जैेसे बड़े प्रोजेक्ट के बारे में सरकार भी गम्भीर हुई है। सौंग बाँध और थानों रोड पर सूर्याधार में बनने वाले बैराज से करीब 12 लाख लोगों की प्यास बुझाई जा सकेगी। दून कैनाल डिवीजन के अधिशासी अभियन्ता डीके सिंह ने बताया, सौंग नदी व सूर्याधार प्रोजेक्ट के अस्तित्व में आने के बाद पूरे शहर को ग्रेविटी से पानी की सप्लाई दी जाएगी। इसके साथ ट्यूबवेल पूरी तरह से बन्द कर दिए जाएँगे, जिससे भूजल स्तर भी बना रहेगा। सौंग बाँध पर 990 करोड़ और सूर्याधार बैराज पर 45 करोड़ रुपये खर्च का अनुमान है। इस योजना में छोटे-छोटे चेकडैम बनाकर बारिश के पानी को भी संरक्षित किया जाएगा। प्रोजेक्ट पूरा करने का लक्ष्य 2021 है। सूर्याधार बैराज के लिये टेंडर भी जारी हो चुके हैं।

- 40 करोड़ रुपये की व्यवस्था बजट में की है सरकार ने
- 01 हजार करोड़ रुपये बाहर से जुटाएगी सरकार

केप टाउन का जलसंकट भारत के लिये भी सबक


पानी के लिये कतार में खड़े केप टाउनवासीपानी के लिये कतार में खड़े केप टाउनवासीदक्षिण अफ्रीका की राजधानी केप टाउन बन्दरगाह, बाग-बगीचों व पर्वत शृंखलाओं के लिये मशहूर है।

यह एक खूबसूरत टूरिस्ट स्पॉट भी है, जो दुनिया भर के लोगों को अपनी ओर खींचता है।

यहाँ पहले जनजातियाँ रहा करती थीं। इस क्षेत्र में यूरोपियनों की घुसपैठ 1652 में हुई। चूँकि यह जलमार्ग से भी जुड़ता था, इसलिये इसे व्यापारिक केन्द्र के रूप में भी विकसित किया जाने लगा और धीरे-धीरे यह शहर दुनिया के सबसे सुन्दर शहरों में शुमार हो गया।

जल के लिये प्रकृति के आधार पर समाधान (Solution based on nature for water)

विश्व जल दिवस, 22 मार्च 2018 पर विशेष


हम अपने परम्परागत जलस्रोत को भूलाते जा रहे हैंहम अपने परम्परागत जलस्रोत को भूलाते जा रहे हैंजल संकट का स्थायी तथा सहज समाधान केवल-और-केवल प्रकृति ही कर सकती है। प्रकृति ने हजारों सालों से पानी की सुगम उपलब्धता ही नहीं, पर्याप्तता बनाए रखी है। हमारा तत्कालीन समाज सदियों से प्रकृति के संग्रहित पानी का बुद्धिमत्ता और प्राकृतिक नीति-नियमों के अनुसार ही कम-से-कम जरूरत का पानी लेता रहा। उसने बारिश के संग्रहित पानी का दोहन तो किया लेकिन लालच में आकर अंधाधुंध शोषण नहीं किया।

जलसंकट के भंवर में भारत


जल संकटजल संकटलिओनार्दो दा विंची की एक उक्ति है-
पानी पूरी प्रकृति की संचालक शक्ति है।

लिओनार्दो कोई वैज्ञानिक नहीं थे। न ही वह कोई पर्यावरण विशेषज्ञ थे। वह पानी को लेकर काम करने वाले एक्सपर्ट भी नहीं थे।

युद्ध और शान्ति के बीच जल


प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह के वैश्विक जल अनुभवों पर आधारित एक शृंखला

विश्व जल दिवस, 22 मार्च 2018 पर विशेष


यह दावा अक्सर सुनाई पड़ जाता है कि तीसरा विश्व युद्ध, पानी को लेकर होगा। मुझे हमेशा यह जानने की उत्सुकता रही कि इस बारे में दुनिया के अन्य देशों से मिलने वाले संकेत क्या हैं? मेरे मन के कुछेक सवालों का उत्तर जानने का एक मौका हाल ही में मेरे हाथ लग गया। प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह, पिछले करीब ढाई वर्ष से एक वैश्विक जलयात्रा पर हैं। इस यात्रा के तहत वह अब तक करीब 40 देशों की यात्रा कर चुके हैं। यात्रा को 'वर्ल्ड पीस वाटर वाॅक' का नाम दिया गया है। मैंने राजेन्द्र सिंह से निवेदन किया और वह मेरी जिज्ञासा के सन्दर्भ में अपने वैश्विक अनुभवों को साझा करें और वह राजी भी हो गए। मैंने, दिनांक 07 मार्च, 2018 को सुबह नौ बजे से गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान के कमरा नम्बर 103 में उनसे लम्बी बातचीत की। प्रस्तुत हैं राजेन्द्र सिंह जी से हुई बातचीत के कुछ महत्त्वपूर्ण अंश
जलपुरुष राजेन्द्र सिंह के साथ लेखक अरुण तिवारीजलपुरुष राजेन्द्र सिंह के साथ लेखक अरुण तिवारीइस वक्त जो मुद्दे अन्तरराष्ट्रीय तनाव की सबसे बड़ी वजह बनते दिखाई दे रहे हैं, वे हैं - आतंकवाद, सीमा विवाद और आर्थिक तनातनी। निःसन्देह, सम्प्रदायिक मुद्दों को भी उभारने की कोशिशें भी साथ-साथ चल रही हैं। स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाली ताकतें अपनी सत्ता को निवासी-प्रवासी, शिया-सुन्नी, हिन्दू-मुसलमान जैसे मसलों के उभार पर टिकाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में यह कथन कि तीसरा विश्व युद्ध, पानी को लेकर होगा; आगे चलकर कितना सही साबित होगा?