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दलितों को तालाबों से पानी पीने का हक

अम्बेडकर जयन्ती 14 अप्रैल 2017 पर विशेष



धरती के भीतर के पानी और उसकी सतह पर बने प्राकृतिक नदी-नालों और तालाबों पर आखिर किसका अधिकार होता है, यह बहस आज भी कई बार उठती है और लोग इस पर अपनी-अपनी तरह से बात करते हुए तर्क भी रखते हैं लेकिन बाम्बे हाईकोर्ट का 1937 का यह निर्णय आज भी हमारे सामाज के लिये मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह बताता है कि किस तरह पानी पर अन्ततः समाज का ही अधिकार होता है। उस समाज का, जो उसके पानी का उपभोग करता है। यह बात करीब 80-90 साल पुरानी है, जब बाबा साहब अम्बेडकर ने सबसे पहले सार्वजनिक तालाबों से दलितों को पीने के पानी का हक दिलाया था। इसके लिये उन्हें लम्बा संघर्ष करना पड़ा, महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में महाड़ कस्बे में उन दिनों पीने के पानी का संकट था और दलितों के जलस्रोतों में पानी नहीं था। उन्हें जीवित रहने के लिये पानी की जरूरत थी लेकिन उन दिनों समाज में छुआछूत की प्रवृत्ति बहुत अधिक होने से सार्वजनिक तालाबों से उन्हें पानी नहीं लेने दिया जा रहा था। अम्बेडकर ने इस संघर्ष की अगुवाई की और लोगों को पानी का अधिकार दिलाया।

पानी का गणित

Author: 
डॉ. के.एस. तिवारी
Source: 
भारतीय धरोहर, सितम्बर-अक्टूबर, 2014

जल संकट के इस गम्भीर दौर में पानी के गणित को समझना होगा। अब हम समझ लें कि भारत में स्थानीय समस्याओं, स्थिति, भूगोल, भूगर्भ की रचना के साथ पानी के संरक्षण, प्रबंधन और संग्रहण को कैसे किया जाए। यह जरूरी है कि सतही जल प्रणालियों को फिर से जिंदा करें। परम्परागत जल स्रोत भूमिगत जल को रिचार्ज करने में चमत्कारिक परिणाम दे सकते हैं।


पानी का व्यवसाय अब एक बड़ा आकार ले चुका है। भारत में वाटर बॉटलिंग उद्योग 50,000 करोड़ रुपए तक पहुँच चुका है। 1100 लाख घनमीटर प्रतिवर्ष पानी की कमी के नतीजे आने वाले वर्षों में दिखेंगे। हम इन खौफनाक हालात के बाद भी पानी का मूल्य और महत्त्व नहीं समझे। इमारतों में सुंदर नक्काशीदार लकड़ी की कारीगरी से हरे भरे जंगले कई गुना अधिक मूल्यवान हैं। हमारी नदियाँ, स्टॉक मार्केट से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। देखा जाए तो तेल और खनिजों की तुलना में पानी ही अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल पानी है जो पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिये दुनिया की अर्थव्यवस्था में 20 हजार करोड़ की दर से सर्वाधिक योगदान देता है।

जल संकट की चपेट में दक्षिणी राज्य

Author: 
बी शेखर
Source: 
राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 8 अप्रैल 2017

उत्तरी कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आखिर के कुछ हफ्तों में अच्छी बारिश हुई थी, लेकिन बेवक्त की बरसात के कारण ज्यादातर फसलें बर्बाद हो गईं। इसकी वजह से प्रति हेक्टेयर पैदावार में भी कमी आएगी। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने हाल में कहा था कि राज्य को 25 हजार करोड़ रुपए का फसली नुकसान हुआ है। सूखे की इस समस्या से निपटने के लिये कर्नाटक सरकार ने केन्द्र सरकार से 4702.54 करोड़ रुपए के पैकेज की माँग की है। पूरा दक्षिण भारत अभूतपूर्व भीषण सूखे की चपेट में है। यह 50 साल का सबसे भीषण सूखा है। सबसे बड़ी चिन्ता यह है कि इन राज्यों में बारिश लाने वाला दक्षिणी-पश्चिमी मानसून अभी तीन महीने दूर है। इस दौरान जल की उपलब्धता को लेकर क्या हालात पैदा होंगे, कुछ नहीं कहा जा सकता। केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु के लगभग सभी बाँध न्यूनतम भण्डारण क्षमता तक सूख चुके हैं। नतीजतन, इन राज्यों में खेती की सारी गतिविधियाँ ठप पड़ी हैं।

कर्नाटक और तमिलनाडु की हालत सबसे ज्यादा खराब है क्योंकि पिछले साल दक्षिणी-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी, दोनों मानसून में बादलों ने धोखा दिया था, जिसकी वजह से फसलों को भारी नुकसान हुआ था। परिणाम यह हुआ कि किसानों द्वारा बैंकों से लिये गए कर्ज की अदायगी में चूक की घटनाएँ बहुत तेजी से बढ़ने लगीं। ऐसे लोगों को उबारने के लिये बैंक नया कर्ज भी नहीं दे रहे हैं और इस तरह उनके परिवारों की जिन्दगी अन्धेरे के गर्त में डूबती जा रही है।

सँवरने के बाद बिखरता सुखोमाजरी

Author: 
सुष्मिता सेनगुप्ता
Source: 
डाउन टू अर्थ, मार्च 2017

1970 व 80 के दशक में जलस्तर बढ़ने लगा था, जो अब घटने लगा है। बाँध का पानी और भाबर घास के खरीदारों की संख्या भी काफी कम हो गई है। एचआरएमएस की आय सन 1996 में 1.7 लाख रुपए थी, जो साल 2016-17 में घटकर 10 हजार रुपए रह गई है। एचआरएमएस के सदस्य पिछले दस वर्षों से नहीं मिले हैं। विकास के अपने ही मॉडल में आज सुखोमाजरी के लोगों की दिलचस्पी नहीं है। इसे प्रकृति से लोगों का टूटता नाता कहें या सरकारी कार्यक्रमों का दोष कि सुखोमाजरी अस्सी के दशक में जिस तेजी से चमका था, उसी तेजी से अपनी चमक खोता जा रहा है। करीब 120 देशों के लोग हरियाणा के पंचकुला जिले में बसे गाँव का दौरा कर चुके हैं। कोई गाँव प्राकृतिक संसाधनों के सामुदायिक प्रबन्धन से अपनी गरीबी कैसे दूर कर सकता है, सुखोमाजरी इसकी मिसाल रहा है।

दुर्भाग्यवश ‘चक्रीय विकास प्रणाली’ से हासिल समृद्धि का चक्र अब थम-सा गया है। इस मॉडल के तहत गाँव के संसाधनों से प्राप्त राजस्व को वापस उसी के विकास पर खर्च किया जाता था। लेकिन आज हालात काफी बदल चुके हैं। एक नया संकट भी सुखोमाजरी के सामने है। हरियाणा अरबन डवलपमेंट अथॉरिटी (हुडा) द्वारा पंचकूला-शिमला हाइवे पर प्रस्तावित 7.3 किलोमीटर लम्बा बाइपास इस गाँव की पहचान मिटा सकता है।

विश्व के प्रमुख शहरों की जल प्रबन्धन व्यवस्था

Author: 
सुशील कुमार

पानी की कमी शहरों के लिये चुनौती तथा अवसर दोनों है। नए स्रोतों की तलाश करना तथा कम कीमत पर जल आपूर्ति करना इसमें प्रमुख है। भारत तथा अन्य विकासशील देशों के लिये यह एक गम्भीर चुनौती है। यहाँ बड़े पैमाने पर औद्योगिक कारखानों को बढ़ावा दिये जाने की वजह से कृषि तथा पीने के पानी की आपूर्ति इन्हीं कारखानों से की जाती है। चेन्नई में ग्रामीण इलाकों के जल को नहर के जरिए शहर में पहुँचाए जाने की वजह से खेती के लिये पानी का संकट खड़ा हो गया। मानव इतिहास के अन्तर्गत मानव विकास, सभ्यता तथा पारिस्थितिकी तंत्र के लिये जल एक महत्त्वपूर्ण घटक माना जाता है। पानी के इर्द-गिर्द ही मानव सभ्यताएँ पनपी। प्राचीन काल से ही अनेक शहरों की बसावट तथा मानव बस्तियाँ नदियों के किनारे ही बसीं। दैनिक उपयोग हेतु लोगों को आसानी से पानी उपलब्ध हो सके यह इसका एक प्रमुख कारण था।

लेकिन आज के सन्दर्भ में देखें तो ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में भी पानी तथा स्वच्छता से जुड़ी समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हैं। जितनी तेजी से मानव सभ्यताएँ विकसित हुईं, उतनी ही तेजी से ये समस्याएँ भी उभरकर सामने आई हैं। इनमें जल, स्वच्छता तथा मैले पानी का उचित निस्तारण एक प्रमुख मुद्दा है।

अगर हम इन समस्याओं को वैश्विक दृष्टि से देखें तो विकासशील देशों के शहर विकसित देशों के शहरों की अपेक्षा अधिक प्रभावित हैं। गौरतलब है कि विकासशील देशों ने तीव्र शहरीकरण की शुरुआत न्यूयार्क तथा लंदन जैसे वैश्विक शहरों की तर्ज पर की। जिससे इन शहरों में लोगों को समान स्तर से मूलभूत सुविधाओं की आपूर्ति में बड़ी बाधक साबित हुई।

पानी पर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना आमने-सामने


कावेरी जल को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु में, कृष्णा नदी के जल पर महाराष्ट्र, आंध्र और कर्नाटक में लंबे समय से विवाद रहा। इसी तरह गोदावरी के जल को लेकर महाराष्ट्र, आंध्र समेत पाँच राज्यों में विवाद है। बातचीत के जरिये हल नहीं निकलने पर केन्द्र सरकार ने इन विवादों को ट्रिब्यूनल को हवाले किया। उसके बाद भी विवाद सुलझ नहीं सके। जल की जरूरत हर राज्य को है। तर्क यह है कि जब किसी राज्य के पास अपने लिये पर्याप्त पानी नहीं है तो वह दूसरे राज्यों को पानी कैसे देगा। चुनावों के समय राजनीतिक दलों के एजेंडे में पानी भले न हो लेकिन बाद के दिनों में वे पानी को लेकर जंग करने लगते हैं। ताजा विवाद आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों का है। जहाँ पानी को लेकर तकरार है। अभी हाल तक एक राज्य रहे आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इन दिनों नदियों के जल और बिजली के बँटवारे को लेकर शीतयुद्ध छिड़ा हुआ है। आलम यह है कि इस जुबानी जंग में दोनों प्रदेशों के नेता संसदीय परम्पराओं को ताक पर रखते हुए एक-दूसरे पर हमले बोल रहे हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को धोखेबाज कहा तो पूरी की पूरी तेलुगु देशम पार्टी के चंद्रशेखर राव पर हमलावर हो गई। आंध्र प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री डॉ. उमाशंकर राव ने कहा कि जिस तरह की भाषा का चंद्रशेखर राव इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे तेलुगु लोगों का सिर शर्म से झुक जा रहा है। उनके निकम्मेपन की सजा तेलंगाना की जनता भोग रही है। कृष्णा नदी जल बँटवारे पर वह तेलंगाना के मुख्यमंत्री से सार्वजनिक बहस करने के लिए तैयार हैं।

432 करोड़ की नर्मदा-क्षिप्रा लिंक पर उठे सवाल


नदी की भी अपनी एक सीमा है और अब वह जमीनी हकीकत सामने नजर भी आने लगी है। इससे नर्मदा और क्षिप्रा दोनों के ही प्राकृतिक नदी तंत्र बिगड़े हैं और इसका फायदा भी लोगों को नहीं मिल पा रहा है। 432 करोड़ की लागत से नर्मदा नदी का पानी क्षिप्रा में भेजे जाने की महत्त्वाकांक्षी योजना को लेकर अब गम्भीर सवाल उठने लगे हैं। पर्यावरणविद तो इसे लेकर योजना के प्रारम्भ से ही इसका विरोध करते रहे हैं लेकिन इस बार ख़ास बात यह है कि ये सवाल प्रदेश में काबिज भाजपा सरकार के ही एक विधायक ने उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि क्षिप्रा को सदानीरा और साफ़ करने के लिये प्रदेश सरकार बीते दो सालों में 650 करोड़ रूपये खर्च कर चुकी है लेकिन वह अब भी मैली ही है। साथ ही उन्होंने लिंक योजना को भी पूरी तरह से विफल करार दिया है।

गर्मी की दस्तक, मध्य प्रदेश में जल संकट शुरू


निमाड़ के खंडवा, बड़वानी और खरगोन में भी गर्मी बढ़ने के साथ जल संकट पड़ने लगा है। खंडवा में जलापूर्ति का प्रमुख स्रोत नर्मदा जल योजना है। इसके अलावा सुक्ता बैराज से भी पानी मिलता है। बीते साल यहाँ पानी को लेकर किया गया निजीकरण का फार्मूला फेल साबित हुआ है। इसी कारण कई बार पानी के लियेे प्रदर्शन और चक्का जाम हुए। यहाँ तक कि महापौर और आयुक्त का घेराव भी किया गया। फिलहाल यहाँ 35 एमएलडी पानी की दरकार है और करीब इतना ही पानी अभी उपलब्ध भी है। एक तरफ समृद्ध प्राकृतिक संसाधन, अथाह जैवविविधता, सोना उगलते खेत और उद्योगों की बड़ी फेहरिस्त से मध्य प्रदेश विकसित राज्यों की दौड़ में खड़ा नजर आता है, लेकिन दूसरी तरफ इससे ठीक उलट प्रदेश में हर साल गर्मियों की दस्तक के साथ ही लोग बाल्टी-बाल्टी पानी को मोहताज होने लगते हैं। खासकर मालवा, निमाड़, बुन्देलखण्ड और विंध्य इलाकों में पानी का संकट भयावह होता जा रहा है।

दर्जन भर से ज्यादा बड़े शहरों में अभी से पानी को लेकर कोहराम शुरू हो गया है। कई शहरों में एक से चार दिन छोड़कर जल प्रदाय करना पड़ रहा है। अधिकांश शहर नर्मदा के पानी पर ही निर्भर हैं सूबे की सरकार ने सात शहरों में पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिये दो सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।

इस बार होली पर बचाएँ पानी और जंगल

होली पर विशेष


एक तरफ हमारे जंगल तेजी से खत्म होते जा रहे हैं। जंगल खत्म होते जाने का सीधा असर बारिश कम होने तथा पर्यावरण तंत्र के नुकसान के रूप में सामने है, दूसरी तरफ लकड़ी जलाने से वायुमण्डल दूषित होता है। इसका बड़ा खामियाजा हमारे स्वास्थ्य को भुगतना पड़ता है और कई गम्भीर बीमारियों का कारण भी बनता है। हमें अपने पर्यावरणीय सरोकारों के प्रति गम्भीरता से सोचने और इस दिशा में काम करने का। अब भी यदि हम कुछ नहीं कर सकें तो नई पीढ़ी के लिये हम कौन-सी और किस तरह की दुनिया छोड़ जाएँगे, कहना मुश्किल है। होली उमंग, उत्साह और खुशियों का त्योहार है। हर बार की तरह इस बार भी आप होली खूब उत्साह से मनाएँ पर दो खास बातों का ध्यान रखेंगे तो आगे की हमारी कई पीढ़ियाँ भी इसी उत्साह से यह त्योहार मना सकेंगी। यदि हमने आज ध्यान नहीं रखा तो आने वाली पीढ़ी के लिये न तो पानी बचेगा और न ही जंगल।

हम सब जानते हैं कि भूजल भण्डार खत्म होते जाने से हम साल-दर-साल पानी के संकट से जूझते जा रहे हैं। हर साल गर्मियों की आहट आते ही हर शहर, कस्बों और गाँवों तक में पानी के लिये हाहाकार शुरू हो जाता है। ऐसे में यह सवाल मौजूं है कि परम्परा के नाम पर लाखों गैलन पानी की फिजूलखर्ची और बर्बादी कहाँ तक उचित है। होली को सूखे रंगों और कम-से-कम पानी का इस्तेमाल करते हुए भी मनाई जा सकती है।