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भारत में जल की समस्या पर निबंध (Essay on water problem in India)

Author: 
राजीव कुमार सिंह
Source: 
अनुसंधान विज्ञान शोध पत्रिका, 2016

सारांश


वर्षाजल संग्रहण पिछले कुछ दशकों से जल संकट भारत के लिये बहुत बड़ी समस्या है। इन दिनों जल संरक्षण शोधकर्ताओं के लिये मुख्य विषय है। जल संरक्षण की बहुत सी विधियाँ सफल हो रही हैं। जल संकट और जल संरक्षण से सम्बन्धित अनेक विषयों पर इस लेख में विचार किया गया है।

Abstract - Water crisis has been a huge problem for past few decades in India. Water conservation is an investigative area for researchers these days. There are many successful methods implemented so for to conserve water. Various issues related to water crisis & its conservation has been discussed briefly in this paper.

सतलुज-यमुना लिंक (एसवाईएल) विवाद की गांठ है कि खुलती नहीं

Author: 
अंकुर कुमार
Source: 
प्रथम प्रवक्ता, 01 अगस्त, 2017

पंजाब की सरकारों ने सतलुज यमुना सम्पर्क नहर (एसवाईएल) के निर्माण में बाधाएँ उत्पन्न करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। दोनों राज्य लम्बे समय से इस मुद्दे का हर चुनाव में राजनीतिक इस्तेमाल करते आ रहे हैं। हाल में सर्वोच्च न्यायालय से आए फैसले से साफ है कि अब पंजाब को अपने क्षेत्र में अधूरी पड़ी नहर का निर्माण करना ही होगा। परन्तु प्रश्न यही है कि जिस जमीन को सरकार किसानों को वापस कर चुकी है, उस पर निर्माण कैसे करेगी और यदि नहीं करती है तो सर्वोच्च अदालत के आदेश का पालन कैसे होगा।

सार्क देशों में सुरक्षित पेयजल उपलब्धता में आठवें स्थान पर भारत (India ranked 8th in safe drinking water availability in South Asia)

Source: 
इंडिया साइंस वायर, 22 अगस्त, 2017

पूरे भारत में लोग नल, हैंडपंप ट्यूबवेल या बोरवेल, नहर, नदी अथवा नालों, टैंक या तालाब और अन्य स्रोत से पेयजल प्राप्त करते हैं। एक ओर शहरीकरण और औद्योगीकरण से जल चक्र प्रभावित हो रहा है, वहीं भूजल के रिचार्ज में भी कमी आई है। अपशिष्ट निपटान से जल निकायों में भौतिक-रासायनिक गुणों में बदलाव होने से जल की गुणवत्ता भी खराब हो रही है। वैज्ञानिकों ने ऐसे परिवर्तनों को चिन्हित करके पेयजल स्रोतों की पहचान करने के सुझाव दिए हैं।

कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा : भरी बारिश में जल संकट


. तेजी से बिगड़ते पर्यावरण के नुकसान अब हमें साफ़–साफ़ दिखने लगे हैं। इस मानसून में देश के अलग–अलग हिस्सों में कहीं भयावह बाढ़ के हालातों का सामना करना पड़ रहा है तो कहीं लोग पीने के पानी तक को मोहताज हुए जा रहे हैं। मानसून का आधे से ज़्यादा मौसम बीत गया है लेकिन इतनी भी बारिश नहीं हुई है कि नदी–नाले, कुएँ–बावड़ी और तालाब भर सकें। अकेले मध्यप्रदेश के आधे से ज़्यादा जिलों में पर्याप्त बारिश नहीं हो सकी है। कुछ दिनों में हालात नहीं सुधरे तो स्थिति बिगड़ सकती है। अभी यह दृश्य है तो इस पूरे साल पानी के भयावह संकट की कल्पना से ही सिहरन होने लगती है।

मध्यप्रदेश के मालवा–निमाड़ इलाके में जहाँ कुछ सालों पहले तक 'पग–पग रोटी, डग–डग नीर' से पहचाना जाता था, आज हालत यह हो चुकी है कि इस इलाके और आस-पास के करीब 20 जिलों में अभी से पानी को लेकर कोहराम शुरू हो गया है। यहाँ एक जून से लेकर 15 अगस्त तक महज सामान्य से 20 फीसदी बारिश ही हुई है। यहाँ के तमाम जलस्रोत सूखे पड़े हैं।

जल संकट (Water Crisis)

Author: 
डॉ. सेवा नन्दवाल
Source: 
भगीरथ, जुलाई-सितंबर, 2010, केन्द्रीय जल आयोग, भारत

. आजादी के बाद के छः दशकों में निःसंदेह हमने बहुत विकास की गाथाएँ लिखी हैं, इसके विपरीत उसकी कीमत पर खोया भी बहुत कुछ है। यह किस तरह का विकास है कि हमारा जीवनदाता जल स्वयं संकट में पड़ गया है। जल ही नहीं हमारा राष्ट्रीय पशु ‘बाघ’ संकट में पड़ गया है।, हमारे पेड़, जंगल और पर्यावरण संकट में पड़ गए हैं और-तो-और हमारे जीवनमूल्य खतरे में पड़ गए हैं। कहीं-न-कहीं आजादी की सार संभार में हमसे भयंकर चूक अवश्य हुई है अन्यथा विकास की कीमत पर संकटों को आमंत्रित नहीं करते।

ताजे पानी की घटती उपलब्धता आज की सबसे ज्वलंत समस्या है। कहाँ तो कुछ वर्ष पूर्व यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि सन 2025 तक संसार के एक तिहाई लोग पानी के भयावह संकट से जूझेंगे लेकिन उस संभावित विषम परिस्थिति ने तो समयपूर्व अभी से दस्तक दे दी। यानि 2025 तक शायद यह संकट दो तिहाई आबादी को अपनी चपेट में ले लेगा।

जल के संकट से उबरने का सही तरीका यह है कि पानी को पानी की तरह न बहाया जाए वरन अमृत की तरह उपयोग किया जाए। माना कि मानसून पर किसी का जोर नहीं चलता इसलिए जितना भी पानी आसमान से बरसता है उसके संरक्षण के लिये पहले से खाका बनाकर ठोस रणनीति पर काम किया जाए तो संकट का हल निकल सकता है।

जल-संकट विशेषज्ञ कनाडा की माउथी बारलो लिखती हैं- 20वीं शताब्दी में वैश्विक जनसंख्या तीन गुना हो गई है लेकिन पानी का उपयोग सात गुना बढ़ गया है। सन 2030 में हमारी जनसंख्या में तीन अरब नए लोग और जुड़ चुके होंगे, तब मनुष्यों की जल आपूर्ति में 80 प्रतिशत वृद्धि की आवश्यकता होगी। कोई नहीं जानता यहाँ अतिरिक्त पानी कहाँ से आएगा?

पानी की समस्या (Water Problem in Hindi)

Author: 
विनोद कुमार मिश्र
Source: 
भगीरथ - जनवरी-मार्च, 2009, केन्द्रीय जल आयोग, भारत

. लम्बे समय से अनेक विद्वान और चिंतक आम जनता को सचेत करते आए हैं कि आने वाले समय में बढ़ती आबादी और औद्योगिकरण के कारण पानी की विकराल समस्या खड़ी होगी। यह भी कह दिया गया है कि अगला विश्वयुद्ध शायद पानी की समस्या को लेकर होगा। वैसे तो पूरे विश्व में पानी की समस्या विकराल रूप धारण कर रही है पर भारत में यह ज्यादा तीव्रगति से बढ़ रही है। भारत में पानी के दो प्रमुख स्रोत हैं:

1. बहती नदियाँ तथा 2. भौम जल जो कुओं, ट्यूबवेलों आदि के माध्यम से निकाला जाता है।

इन दोनों ही स्रोतों में भारी कमी आई है। आइए, पहले देखते हैं कि भारत में पानी की मांग कितनी है और आने वाले समय में कितनी हो जाएगी।

यदि 1997 के जल प्रयोग को आधार माना जाये और उसके आधार पर आगे की मांग का अनुमान लगाया जाये तो निम्न आंकड़े उभरते हैं:

 

वर्ष

एक सबक

Author: 
विकास बरुआ
Source: 
भगीरथ - जनवरी-मार्च 2011, केन्द्रीय जल आयोग, भारत

. सबेरे-सबेरे मिश्रा जी हाथों में बाल्टी लेकर सड़क पार कर रहे थे। तभी पीछे से आवाज आई-

क्यों मिश्रा जी आज भी पानी आया नहीं क्या?

हाँ मोहन जी, इस पानी की हाहाकार ने तो नाक में दम किया हुआ है। आज दो दिन हो गए पानी नहीं आया और मैं लगातार दो दिनों से चौधरी जी के घर के कुएँ से पीने का पानी ला रहा हूँ। लेकिन वह भी शायद अब बंद कर देंगे क्योंकि चौधरी जी के कुएँ का पानी बहुत नीचे चला गया है।

वह तो होना ही था। दरअसल यह पानी की समस्या या अभाव हमारे शहरों में बढ़ती हुई कई मंजिलों वाले अपार्टमेंटों की वजह से हो रही है।

वह कैसे

अरे इस अपार्टमेंटों में पानी की व्यवस्था के लिये जमीन को कई फीट नीचे तक छेद कर मशीन द्वारा पानी निकाला जाता है। जितना बड़ा अपार्टमेंट उतना गहरा छेद।

लेकिन उससे हमारे पानी के अभाव का क्या संबंध?

संबंध है और वह भी बहुत गहरा। जमीन छेद कर पानी निकालने की प्रक्रिया में कभी तो सिर्फ 30-50 फीट नीचे खोदने से ही पानी मिल जाता है और कभी 200-300 फीट नीचे तक खोदना पड़ता है। इस तरह मशीन द्वारा जमीन के नीचे से पानी नित दिन निकालते रहने से कुछ साल बाद आस-पास की जगहों में पानी कम होने लगता है जिससे आस-पास के कुएँ और पंपों में पानी कम आने लगता है।

लेकिन हमारे घर में तो नल का पानी आता है। जिसकी आपूर्ति नगर निगम द्वारा की जाती है और जिसके लिये हम कर (टैक्स) भी अदा करते हैं। फिर भी हमें जरूरत का पानी नसीब नहीं होता। ऐसा क्यों?

अरे नगर निगम भी तो कोई-न-कोई बड़ा तालाब, झरना या नदी से पानी की व्यवस्था करता है और अगर उन सब में पानी कम हो जाए या सूख जाए तो फिर वह भी विवश हो जाता है।

जल संकट और संरक्षण पर निबंध (Essay on water crisis and conservation in Hindi)

Author: 
डॉ. अमित शुक्ल
Source: 
भगीरथ - जनवरी-मार्च 2011, केन्द्रीय जल आयोग, भारत

जब तक जल के महत्व का बोध हम सभी के मन में नहीं होगा तब तक सैद्धांतिक स्तर पर स्थिति में सुधार संभव नहीं है। इसके लिये लोगों को जल को सुरक्षित करने के लिये सही प्रबंधन के अनुसार कार्य करना होगा यदि वक्त रहते जल संरक्षण पर ध्यान न दिया तो हो सकता है कि जल के अभाव में अगला विश्वयुद्ध जल के लिये हो तो इसमें आश्चर्य नहीं और हम सब इसके लिये जिम्मेदार होंगे, अर्थात यह संपूर्ण मानव समाज।

जल, जीवन और साहित्य दशा-दिशा (Essay on ‘Water, Life and Literature’)

Author: 
डॉ. अमित शुक्ल
Source: 
भगीरथ - जुलाई-सितम्बर 2011, केन्द्रीय जल आयोग, भारत

सभी भूजल पर निर्भर होते चले जा रहे हैं इसका परिणाम यह हो रहा है कि ‘भूजल’ स्तर हर साल एक फुट की रफ्तार से नीचे जा रहा है। इससे उत्तर भारत के 11 करोड़ से अधिक लोग भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं। यह आकलन अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा ने किया था। जमीन का सीना चीरकर लगातार पानी खींचने का ही परिणाम है कि आज देश के 5723 में से 839 ब्लाक डार्क जोन में आ चुके हैं और यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। जल जीवन है, यह सत्य है कि इंसान भोजन के बिना कई दिन जीवित रह सकता है पर पानी के बिना नही! जल और जीवन का घनिष्ट सम्बन्ध है। यदि जल है तो कल है, जल नहीं तो कल नहीं। जैसे पहले रहीम जी ने कहा था कि बिन पानी सब सून यह वाक्य जीवन में पानी के महत्त्व को व्यक्त करता है। जीवन और प्रकृति का सम्पूर्ण सौन्दर्य पानी पर ही निर्भर है। इसलिये जल को जीवन कहा गया है। पानी के बिना जीवन की कल्पना करना असम्भव है।

सून से आशय शून्य से और निरर्थक होने से है। पानी के और भी अर्थ होते हैं जैसे चमक या कान्ति और स्वाभिमान हर जगह और हर अर्थ में पानी अपनी विशिष्टता में अद्वितीय और अनिवार्य है। पानी मनुष्य के लिये ही आवश्यक नहीं है बल्कि यह पशु, पक्षी, पेड़, पौधे, प्रकृति सभी के लिये उपयोगी एवं आवश्यक है। यह मनुष्य को मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ रखते हुए बल में वृद्धि करता है।