Latest

पानी व्यवस्था की प्रबन्धक भारतीय महिलाएँ

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस 08 मार्च 2017 पर विशेष


पानी की व्यवस्था में लगीं महिलाएँपानी की व्यवस्था में लगीं महिलाएँमार्च का पहला सप्ताह 8 मार्च को मनाए जाने वाले अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के चलते विश्व स्तर पर नारीमय होने लगता है। हमारे भारत में भी इस समय महिला सशक्तिकरण सप्ताह मनाया जा रहा है। वैसे हमारी भारतीय महिलाओं के लिये किसी ने बहुत पहले कहा था कि यदि प्रबन्धन सीखना हो तो किसी भारतीय पत्‍नी से सीखो।

यह बात सौ प्रतिशत सच भी है, क्योंकि भारत में स्त्रियाँ जन्मजात प्रबन्धक होती हैं। वैसे तो एक कुशल प्रबन्धन समाज के हित में व्यक्ति का विकास करता है, लेकिन किसी समाज की सबसे आधारभूत इकाई, परिवार, में प्रबन्धन उस घर की मुख्य महिला ही करती है, जो भारत में दादी, माँ या पत्नी हो सकती है। इनके अलावा परिवार में जो अन्य महिला सदस्य होती हैं, वे प्रमुख महिला प्रबन्धक की सहायिकाओं के रूप में घरेलू प्रबन्धन में अपने-अपने अनुकूल हाथ बटाँती हैं।

बुन्देलखण्ड में पानी के मुद्दे पर लहलहाती है सिर्फ राजनैतिक फसल

Author: 
आशीष तिवारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुन्देलखण्ड में एक रैली में कहा था जो सेटेलाइट छोड़े गए हैं उनसे बुन्देलखण्ड में अवैध खनन रोका जाएगा। सेटेलाइट से पता किया जाएगा कि कहाँ पर कैसे अवैध खनन हो रहा है। सेटेलाइट जब होगा तब होगा बेहतर हो कि अधिकारियों पर नकेल कसी जाये। ताकि यहाँ हो रहे अवैध खनन को रोका जाये। अवैध खनन से नदियों का रुख मुड़ जाता है और जरूरत के मुताबिक लोगों को पानी नहीं मिल पाता। नतीजतन लोग बर्बाद हो रहे हैं। खेती किसानी सब बन्द है। करीब डेढ़ दशक हो चुका है बुन्देलखण्ड को सूखे की मार झेलते हुए। न जाने कितने किसानों ने असमय ही मौत को गले लगा लिया। न जाने कितने घर परिवार बर्बाद हो गए लेकिन आज तक यहाँ पर पानी कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बना। कहने को एक दशक पहले इस इलाके को सूखाग्रस्त घोषित किया गया। उम्मीद की गई थी हालात सुधरेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गुरुवार को बुन्देलखण्ड के सात जिलों की विधानसभा सीटों पर वोट पड़े। नतीजे क्या होंगे इसका कोई अन्दाजा नहीं लेकिन इतना तय है कि एक बार फिर से सूखे की मार झेल रहे इस इलाके में नेताओं की 'राजनैतिक फसल' खूब लहलाहाएगी।

कई दशक से इस इलाके में रिपोर्टिंग कर रहे बांदा के अशोक निगम कहते हैं कि किसी भी राजनेता ने यहाँ के लोगों के दर्द को अपना दर्द नहीं समझा। यही वजह है कि पानी का मुद्दा नहीं बना। राजनैतिक पार्टियों के मैनिफेस्टो में जो वायदे नोएडा के लिये तैयार होते हैं वहीं बुन्देलखण्ड के लिये तो बताइए भला कैसे यहाँ के किसानों का दर्द समझा जाएगा।

पानी का सच

Author: 
डॉ. के.एस. तिवारी
Source: 
भारतीय धरोहर, जुलाई-अगस्त, 2012

धरती की सतह पर मौजूद पानी और समुद्रों का पानी सूर्य की तपन से वाष्प बनकर बादल बनता है। यही पानी वर्षा या बर्फ के रूप में वापस धरती पर लौटता है। इस पानी का कुछ भाग झीलों, झरनों में रहता है और नदियों में बहते हुए समुद्र में जा मिलता है।

हमसे दूर जाता पानी

Author: 
डॉ. के.एस. तिवारी
Source: 
भारतीय धरोहर, सितम्बर-अक्टूबर, 2011

हमसे दूर जाते पानी को रोकने के लिये हमें एक बार फिर पीछे लौटना होगा यानी पानी सँजोने की जाँची-परखी परम्पराओं को फिर से जीवित करना होगा। भारत में पानी के प्रबंधन की परम्पराएँ हजारों वर्ष तक व्यवहार में रही हैं। जल समस्याओं के स्थाई हल निकालने होंगे। पानी के विवेकपूर्ण प्रबंधन हेतु संस्थागत बदलाव भी जरूरी है। यह अत्यंत सतर्कता का समय है।

बेहाल बुन्देलखण्ड पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

Author: 
विजय विद्रोही
Source: 
नवोदय टाइम्स, 22 फरवरी, 2017

. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी बुन्देलखण्ड की रैलियों में बिल्कुल सही कहा कि पाँच-पाँच नदियों के होने के बाद भी बुन्देलखण्ड प्यासा है क्योंकि समस्या पानी के सही प्रबंधन की है। इसके आगे का सच यही है कि समस्या की पहचान होने के बावजूद इसे सुधारा नहीं गया है। चाहे यूपी हो या मध्य प्रदेश या फिर केंद्र… न जाने कितनी सरकारें आईं और चली गईं लेकिन बात बुन्देलखण्ड पैकेज के आगे से नहीं बढ़ी। अब पैकेज का किस तरह इस्तेमाल होता है यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। यमुना, चंबल, धसान, बेतवा जैसी नदियाँ जहाँ बहती हों वहाँ से तीस लाख लोग पलायन कर जाएँ। पिछले दस सालों में चार हजार किसान ख़ुदकुशी कर चुके हों। यह अपने आप में हैरतअंगेज लगता है। लेकिन, इससे ज्यादा हैरानी होती है कि यहाँ से सियासी दल सिर्फ वायदे करके और जीतकर निकल जाते हैं और स्थानीय स्तर पर कोई बड़ा आंदोलन भी खड़ा नहीं होता है।

जल त्रासदी के मुहाने पर खड़ा देश

Author: 
सुधीर कुमार
Source: 
डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट, 23 जनवरी, 2017

पैसा खर्च कर पानी पीते समय उसकी एक-एक बूँद महत्त्वपूर्ण लगने लगती है, लेकिन फिर यह वैचारिकी तब धूमिल पड़ने लगती है, जब पुन: हमें बड़ी मात्रा में पानी मिलने लगता है। सवाल यह है कि जल संरक्षण के प्रति हम गम्भीर क्यों नहीं हैं। भलाई इसी में है कि हम सब जल की बूँदों को बेवजह बर्बाद करने सम्बन्धी अपनी गतिविधियों को नियंत्रित कर जल संरक्षण के प्रति अपने आस पड़ोस के लोगों को भी जागरूक करें...

निकम्मी नहर की हानिकर योजना के विस्तार में लगी सरकार

Author: 
अमरनाथ

भूजल स्तर कम होने से इस क्षेत्र में कुएँ खोदना बहुत ही आसान था। जरूरत पड़ने पर कुएँ खोदकर सिंचाई कर लिया जाता था। छोटे तालाब भी बनाए जाते थे जिसमें वर्षाजल का संग्रह किया जा सके। मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और वैशाली जिलों में गंडक और बूढ़ी गंडक के बीच एक त्रिकोण बनता है जिसमें विभिन्न प्रकार के मसाले, सब्जियाँ और तम्बाकू जैसी फसलें उपजाई जाती थीं जिनको पानी की सीमित जरूरत होती थी। अल्प वर्षा वाले वर्षों में भी थोड़ी मेहनत कर फसल को बचा लिया जाता था। और यह पूरा इलाका सम्पन्न माना जाता था। जिस नहर का निर्माण 1979 में रोक दिया गया था, उसे फिर से बनाने की नई योजना का तीखा विरोध हो रहा है। मामला गंडक नहर परियोजना के अन्तर्गत तिरहुत मुख्य नहर का है। इस नहर की वजह से बहुत बड़े इलाके में जल जमाव की समस्या उत्पन्न हो गई। नहर की वितरणी शाखाओं का पर्याप्त संख्या में निर्माण नहीं होने से सिंचाई का लाभ भी कम ही इलाके को मिल पाया।

विवादित स्थल मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर जिलों का सीमावर्ती क्षेत्र है जिसमें विभिन्न प्रकार के मसाले, धनिया, हल्दी, अदरक, लहसून, मिर्च, विभिन्न प्रकार की हरी सब्जियाँ, आलू, ओल आदि पानी की कम जरूरत वाली नगदी फसलें खूब उपजती है। इसलिये लोगों को वह जमीन छोड़ना मंजूर नहीं है जिस पर नहरें बनेगी। उनके अनुसार इस नहर से कोई फायदा नहीं होने वाला, बल्कि नुकसान ही होगा।

कहाँ गए मोल्डा गाँव के दो जलधारे


भूमनेश्वर यानि भूमि से निकला हुआ जलधारा और मूर्ति। पवनेश्वर यानि हवा के जैसे उड़कर दूसरी जगह पर स्थापित होना और वहाँ भी जलधारे व मूर्ति के रूप में प्रकट होना। ऐसे नामों से दो जलधारे हैं उत्तरकाशी के मोल्डा और पौंटी गाँव में।

मोल्डा गाँव का भूमनेश्वर जलधारा व पौंटी गाँव का पवनेश्वर जलधारा वर्तमान में संकट से गुजर रहे हैं। कई मर्तबा ग्रामीणों ने इन जलधारों का सौन्दर्यीकरण सीमेंट से पोतकर किया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब से इन जलधारों पर सीमेंट पोता गया और जलधारों के नजदीक गन्दगी का अम्बार होने लग गया, तब से जलधारे सूखने की कगार पर आ गए हैं। एक सवाल के जबाव में ग्रामीणों ने बताया कि वे अब पेयजल के लिये पाइप लाइन पर ही निर्भर हो चुके हैं। समाज ने ही ‘जल की संस्कृति’ कायम की है, चाहे उन्हें तीर्थाटन के रूप में हो या ‘जलस्रोतों’ को देवतुल्य मानते हुए पूजनीय माना हो। परन्तु वर्तमान की हालातों पर गौर करें तो लोक समाज में मौजूद जल संरक्षण की लोक संस्कृति पीछे छूटती जा रही है।

यही वजह है कि अब गाँव, कस्बों व बसासतों में आये दिन ‘जल संकट’ उभरकर आ रहा है। हालात इस कदर है कि लोग पाइप लाइन पर ही निर्भरता बढ़ा रहे हैं, और तो और ‘जल संरक्षण’ के पुरातन आयामों को बजट के रूप में देखा जा रहा है। कारण इसके इस बजट से पानी की महत्ता कम ही होती जा रही है और जलभण्डारण यानि भूजल घटता ही जा रहा है।

जल प्रदूषण और जल संकट का गढ़ बनता पिथौरागढ़


पिथौरागढ़ में नौलापिथौरागढ़ में नौला पिथौरागढ़ नगर के सभी प्राकृतिक जलस्रोतों की हालत बदतर होती जा रही है। देख-रेख के अभाव के कारण इन जलस्रोतों के आसपास कूड़े के ढेर बनने लगे हैं। अभी सर्दी का मौसम है मगर गर्मियों में यही हाल रहा तो ये सूखने की कगार पर आ रहे प्राकृतिक जलस्रोत ही बीमारियों को न्यौता देेंगे। बता दें कि पहाड़ों में अधिकांश गाँव उसी स्थान पर बसे हैं जहाँ प्रकृतिक जलस्रोत मौजूद हैं।

आज भी लोग इन्हीं प्राकृतिक जलस्रोतों से अपनी छोटी-मोटी जरूरतें पूरी कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में दिन की शुरुआत इन प्राकृतिक जलस्रोतों को साफ करते देखा जा सकता है। जबकि जो क्षेत्र पिथौरागढ़ के अनुसार नगरीय हो चले हैं वहाँ पर लोग ऐसे सहभागिता के कामों के लिये नगर प्रशासन पर निर्भर हो जाते हैं।

अब देखा यह जा रहा है कि पिथौरागढ़ नगरार्न्तगत के नौलों, धारों व अन्य जलस्रोतों की हालत बेहद खराब दिखाई दे रही है। हाल ही में कुमाऊ मण्डल ऑनर्स यूनियन के बस स्टेशन के नजदीक का जलधारा कभी लोेगों से गुलजार रहा करता था। पर आज लोेग वहाँ स्थायी रूप से नहीं रहते परन्तु बस अड्डे के कारण वहाँ पर लोगों को आना-जाना भारी मात्रा में होता है।

मौजूदा समय में इस क्षेत्र की देख-रेख नगर प्रशासन के अधीन है। हालात इस कदर है कि मुसाफिर लोग इस जलधारे के हालात पर रोना रो रहे हैं तो पालिका प्रशासन की उदासीनता के चलते यह नौला भी बुरे दौर से गुजर रहा है। वैसे पूर्व में एक बार पालिका द्वारा इस जगह पर महंगी टाइल्स बिछाई गई थी और इस नौले के पास महिलाओं व पुरुषों के लिये अलग-अलग जगह बनाई गई थी। लेकिन महिलाओं के लिये बनाई गई जगह को खुला रखा गया।