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कानपुर का पानी

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जागरण याहू
उत्तराखंड के पहाड़ों से उतरकर उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्र में अपने पूरे बहाव में गंगा सर्वाधिक कानपुर डाउनस्ट्रीम में प्रदूषित है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पिछले वर्ष गर्मी के मौसम में मई-जून और इस वर्ष के इसी अवधि के आंकड़े हकीकत को बयान करते हैं।

सूबे में गंगा आठ शहरों-गाजियाबाद, बुलंदशहर, कन्नौज, कानपुर, रायबरेली, इलाहाबाद, वाराणसी और गाजीपुर से होकर बहती है। बोर्ड इस पूरे बहाव में 13 बिंदुओं पर इसकी जल की गुणवत्ता की जांच करता है। एक ही मौसम में 2008 और 2009 दोनो ही में कानपुर डाउनस्ट्रीम में गंगा का जल सबसे अधिक प्रदूषित मिला।

उत्तर प्रदेश में सिंचाई संकट

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उत्तर प्रदेश
लखनऊ, 10 जुलाई (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश में मानसून की बेरुखी के चलते झ्झील, तालाब और पोखर तेजी से सूख रहे हैं, जिससे सिंचाई व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। बारिश न होने से राज्य सिंचाई विभाग के अधीन 50 से ज्यादा झीलों का 75 फीसदी पानी सूख चुका है।

सिंचाई विभाग के अधिकारियों के मुताबिक बुंदेलखंड क्षेत्र के झांसी, महोबा, चित्रकूट, ललितपुर और बांदा जिलों में फैली 24 झीलें लगभग सूख चुकी हैं। यही हाल मिर्जापुर जिले की झ्झीलों का हो चुका है। जिले की घोरी झ्झील में केवल 13 फीसदी, बेलन में पांच फीसदी, अदवा में पांच फीसदी और बाखर में चार फीसदी पानी शेष बचा है।

22 साल बाद दिखा जवाई का पैंदा

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patrika.com
जोधपुर। मानसून की बेरूखी ने मारवाड़ के सबसे बड़े जवाई बांध का पैंदा दिखा दिया है। यह स्थिति लगभग 22 साल बाद उत्पन्न हुई है कि 65 फीट भराव वाले बान्ध का जलस्तर घटकर माइनस (-) 9.80 फीट तक पहुंच गया है। इसके डेड स्टोरेज से अभी भी पम्पिंग कर पानी लिया जा रहा है। चार-पांच दिन बाद बांध का डेड स्टोरेज भी पूरी तरह सूख जाएगा।

अरावली पर्वतमाला की तराई में जवाई नदी पर बना यह बांध यदा-कदा ही पूरी तरह से खाली हुआ है। जल संसाधन विभाग के अनुसार वर्ष 1987 में इस बांध का जल स्तर (-) 9 फीट तक पहुंचा था। इसके बाद एक-दो बार इसका जल स्तर (-) 6 फीट तक पहंुचा। वर्षो बाद फिर बांध का पानी पैंदे बैठा है।

कम हो गया डेड स्टोरेज

उज्जैन में पानी पर पहरा

दिसंबर / प्रदेश में कम बारिश होने की वजह से करीब 35 जिले पानी के संकट से जूझ रहे हैं। एक-एक कर जल स्रोत सूख रहे हैं और पेयजल आपूर्ति करने वाले जल संग्रहण स्थलों में पानी निरंतर कम होता जा रहा है। इसका नतीजा है कि इन जिलों के अधिकांश हिस्सों में दो से तीन दिन में एक बार जलापूर्ति की जा रही है। ठंड के मौसम में भी यहां के जल के स्रोत सूखते जा रहे हैं। एक तरफ जहां इंदौर में फरवरी तक पानी का आपातकाल लगाने की तैयारी है, वहीं उज्‍जैन में अब हालत यह है कि जल स्रोतों को सुरक्षित रखने के लिए पुलिसबल तैनात किया गया है।

मुद्दा : बढ़ती आबादी और पेयजल संकट

..प्रवीण प्रभाकर/ राष्ट्रीय सहारा

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट ने भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में पेयजल की स्थिति की कलई खोल दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रत्येक साल करीब सात लाख 83 हजार लोगों की मौत दूषित पानी और खराब साफ-सफाई की वजह से होती है। इसमें से लगभग साढे़ तीन लाख लोग हैजा, टाइफाइड और आंत्रशोथ जैसी बीमारियों से मौत की भेंट चढ़ जाते हैं। ये बीमारियां दूषित पानी और भोजन, मानव अपशष्टिटों से फैलती हैं। साथ ही हर साल 15000 से ज्यादा लोग मलेरिया, डेंगू और जापानी बुखार की चपेट में आकर दम तोड़ देते हैं। इन बीमारियों के वाहक दूषित पानी, जल जमाव यानी कि पानी के खराब प्रबंधन से फैलते हैं।

बेकाबू होता जल संकट

संजय गुप्तसंजय गुप्तबात चाहे देश की राजधानी दिल्ली की हो अथवा सुदूर इलाकों के गांवों की-हर जगह पेयजल की किल्लत पिछले वर्षो के मुकाबले अधिक नजर आ रही है। यह घोर निराशाजनक है कि आजादी के साठ वर्षो के बाद भी देश की एक तिहाई जनता को पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। इसी तरह करीब 70 प्रतिशत आबादी सामान्य जन सुविधाओं से भी वंचित है। शायद यही कारण है कि प्रतिवर्ष जल जनित बीमारियों के चलते 15 लाख बच्चे काल के गाल में समा जाते है और काम के अनगिनत घंटों का नुकसान होता है। समस्या यह है कि केंद्र एवं राज्य सरकारे पेयजल संकट को दूर करने के लिए गंभीर नहीं, जबकि वे इससे परिचित है कि आने वाले समय में पानी के लिए युद्ध छिड़ सकते है।