नहर किनारे खेत, फिर भी फसलों को नहीं मिल रहा पानी


भीषण गर्मी के चलते क्षेत्र का भूजल स्तर काफी नीचे गिर गया है। जिससे कुएँ व अन्य जलस्रोतों में भी सिंचाई व मवेशियों को पिलाने के लिये पानी नहीं बचा है। मानसून में भी देरी है। ऐसे में पानी के अभाव में किसानों की फसलें सूख रही हैं। जबकि द्वितीय चरण की नहरों में पानी नदी व नालों में व्यर्थ बहाया जा रहा है।

जल-समृद्धि के देश में क्यों है ऐसी प्यास


.पिछले कई सालों से यह बात जुमले की तरह अक्सर सुनने को मिल जाती है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिये होगा। यह तो खैर कब होगा, क्या होगा, पर मैं तो यह याद दिलाना चाहता हूँ कि जो हो रहा है, वह ही कहाँ कम है। आज भी दो प्रदेशों के बीच युद्ध हो रहा है, दो देशों के बीच भी हो रहा है। बांग्लादेश और भारत पानी को लेकर लड़े। पंजाब से निकलने वाली नदियाँ, जो पाकिस्तान में जाती हैं, उनके लेकर भारत-पाकिस्तान में विवाद रहा।

अपने देश को लें तो तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी को लेकर जंग छिड़ी। पंजाब-हरियाणा, पंजाब-राजस्थान, कहाँ नहीं है जंग? हाँ, इसका स्वरूप जरूर बदल रहा है। राज्यों ने भी अपनी नदियों पर बाँध बनवाए हैं और सार्वजनिक होते हुए भी पानी का निजीकरण हुआ है और अब, समाधान के तौर पर हो रहा निजीकरण अपने-आप में ही एक संकट बन रहा है।

जल संकट - राहत नहीं समाधान चाहिए


.मौजूदा जल संकट बेहद गम्भीर है। उसे तत्काल समाधान की आवश्यकता है क्योंकि देश के दस राज्यों की लगभग 70 करोड़ आबादी सूखे से प्रभावित है। प्रभावित आबादी का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों से है। इन इलाकों में पानी का मुख्य स्रोत कुएँ, तालाब, नदी या नलकूप हैं। वे ही सूख रहे हैं। प्रभावित लोग पानी के लिये तरस रहे हैं।

इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोकने और राहत प्रदान करने की गरज से मनरेगा व्यवस्थाओं को चाक-चौबन्द किया जा रहा है। सूखे से उत्पन्न पेयजल संकट पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट संज्ञान ले रहे हैं। कुछ इलाकों में अभी से लू चलने लगी है। गर्मी के कारण मरने का सिलसिला प्रारम्भ हो गया है। अभी से पारा, अनेक इलाकों में 45 डिग्री को छू रहा है।

संविधान, जल नीति और मौजूदा जल संकट


.मौजूदा जल संकट की गम्भीरता का अनुमान सुप्रीम कोर्ट की 6 अप्रैल 2016 की उस टिप्पणी से लगाया जा सकता हैं जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से कहा है कि देश के दस राज्य सूखे की मार झेल रहे हैं। पारा 45 डिग्री पर पहुँच रहा है। लोगों के पास पीने का पानी नहीं है। उनकी मदद कीजिए। हालात बताते हैं कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, कर्नाटक, ओड़िशा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान, और आन्ध्र प्रदेश अप्रैल माह से ही सूखे का दंश भोग रहे हैं।

महाराष्ट्र के लगभग 20 हजार गाँव सूखे की चपेट में हैं। मराठवाड़ा में हालात इतने खराब हैं कि अस्पताल और जेल तक शिफ्ट करने की नौबत आ चुकी है। सौराष्ट्र इलाके के जलाशयों में केवल दो माह के लिये पानी बचा है। बुन्देलखण्ड में पलायन की स्थिति है। पानी पर पहरा है। पानी की कमी झेल रहे इलाकों में रेल द्वारा पानी पहुँचाने पर विचार हो रहा है।

पानी का संकट : निजात पाने के लिये ठोस कदम जरूरी

Author: 
नरेश उपाध्याय
Source: 
नेशनल दुनिया, 07 मई, 2016

तालाब कुएँ और नदियाँ ही पारम्परिक जलस्रोत रहे हैं। लेकिन बदलते दौर और लोगों की बदलती सोच के कारण कुएँ, तालाब और नदियाँ उपेक्षा का शिकार हो गईं। सफाई न होने से तालाब पटने लगे या उन पर अवैध कब्जे होने लगे, जिससे बरसात के जल संचयन की प्राकृतिक प्रणाली प्रभावित हुई है। हैण्डपम्पों की सुविधा मिलने के साथ ही कुएँ भी बदहाली के शिकार हो गए। अब हालत यह है कि शहरों में ही नहीं, गाँवों में भी कुएँ या तो सूख गए हैं या पट गए हैं।

मौसम से तालमेल में छुपा है बुन्देलखण्ड के संकट का समाधान


.बरसात के मामले में बुन्देलखण्ड अंचल कतई गरीब नहीं है। बुन्देलखण्ड में लगभग 95 सेंटीमीटर बारिश होती है। यह मात्रा राजस्थान के मरुस्थली इलाकों, मराठवाड़ा या विदर्भ की तुलना में काफी अधिक है। यह अनन्तपुर या कालाहांडी इलाके में होने वाली बरसात से भी ज्यादा है। मौसम भी खेती के लिये कभी बुरा नहीं रहा इसलिये, जरूरी है कि उन कारणों की पड़ताल हो जो बुन्देलखण्ड की बदहाली के लिये जिम्मेदार हैं।

बुन्देलखण्ड में बार-बार पड़ने वाले सूखे पर काफी चिन्तन-मनन हुआ है। बहुत सारे सुझाव, योजनाएँ और पैकेज आये हैं पर बुन्देलखण्ड का सूखा, अंगद का पैर बना बैठा है। पिछली नाकामियों या अस्थायी सफलताओं के कारण, नदियों को जोड़ने की बात हो रही है लेकिन उस योजना के हानि-लाभ को लेकर देश का एक वर्ग आश्वस्त नहीं है।

पानी चाहिए तो हिमालय बचाना होगा

हिमालय दिवस 9 सितम्बर 2015 पर विशेष


.अलवर, राजस्थान स्थित तरुण भारत संघ ने वर्ष 2007 में एक पुस्तक छापी थी- भारतीय जल दर्शन। इसके एक अध्याय- प्रलयकाल में जल का वर्णन- में पुराणों के हवाले से कहा गया है कि प्रलय का समय आने तक मेघ पृथ्वी पर वर्षा नहीं करते। किसी को अन्न नहीं मिलता, ब्रह्माण्ड गोबर के उपले की तरह धू-धूकर जलने लगता है... सब कुछ समाप्त हो जाता है... इसके बाद सैकड़ों वर्षों तक सांवर्तक वायु चलती है और इसके पश्चात असंख्य मेघ सैकड़ों वर्षों तक वर्षा करते हैं। सब कुछ जलमग्न हो जाता है...”

नहीं मालूम कि यह पौराणिक आख्यान कितना सच होगा पर आज इस सबकी अनुभूति सी होने लगी है। वर्षा का चक्र बिगड़ गया है, अन्न की कमी हो ही चुकी है और पृथ्वी उपले की तरह तो नहीं जल रही पर तापमान खूब बढ़ गया है और वैसा ही कुछ अहसास दे रही है।

जलवायु वैज्ञानिकों का एक वर्ग भी मानता है कि हर एक लाख वर्ष के बाद धरती 15-20 हजार वर्ष तक गर्म रहती है और वर्तमान जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया कोई 18 हजार वर्ष पहले शुरू हो गई थी।

प्यासे प्रायद्वीप को जलदान

Author: 
अरविंद घोष
Source: 
योजना, जुलाई 2004
भारत के पश्चिमी और पूर्वी घाटों का विशाल इलाका सूखे से बराबर त्रस्त रहता है। राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी ने इन इलाकों तक पानी पहुँचाने की जो अन्तर्जलीय सम्पर्क परियोजना तैयार की है, उसके कार्यान्वयन से प्रायद्वीप के पूर्वी हिस्से के बहुत बड़े भू-भाग को पानी के अभाव की समस्या से मुक्ति मिलने की आशा है। देश में आम चुनाव के अनेक सकारात्मक पहलुओं में प्रमुख है अनेक समाचार-पत्रों के संवाददाताओं का ग्रामीण क्षेत्रों में दौरा। इस दौरान उन्हें सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों के असंख्य लोगों से सीधी बातचीत के जरिए उनकी समस्याओं से रू-ब-रू होने का मौका मिलता है। उनके मानस में चल रही उथल-पुथल की जानकारी प्राप्त करने का अवसर अखबारों के माध्यम से देश भर में अपने पाठकों के सामने उजागर कर सकते हैं। सम्भवतः इस प्रकार के दौरे आम चुनाव के अतिरिक्त अन्य अवसरों पर सम्भव नहीं हो पाते।

अंग्रेजी और अन्य अनेक भारतीय भाषाओं में प्रकाशित इस प्रकार की रिपोर्टों से लोग भारत के ग्रामीण क्षेत्रों की ऐसी समस्या से अवगत हो सकते हैं जिनका प्रचार बहुत कम होता है। पेयजल के अभाव की कमी हमारे ग्रामीण भारत के बहुत बड़े भाग का खुला दस्तावेज है जिससे पूरे साल का कम-से-कम आधा भाग यानी दिसम्बर से मई महीने तक ग्रामीणों के इस समस्या से जूझते रहना पड़ता है। वास्तव में यह कहने में कोई हिचक तो नहीं कि कई राज्यों में लगातार दूसरे अथवा तीसरे वर्ष भी सूखे की भयानक मार ने आम चुनावों के नतीजों को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

विकट होता जल संकट

Author: 
एम. अफसर खां सागर
Source: 
डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 24 दिसम्बर 2014
योजना आयोग के आँकड़ों के मुताबिक देश का 29 फीसदी इलाका पानी के गम्भीर संकट से जूझ रहा है। एक पुराना आकलन देखें तो केंद्रीय भू-जल बोर्ड के अनुमान के मुताबिक भूमिगत जल का दोहन इसी तरह रहा तो देश के 15 राज्यों में भूमिगत जलस्रोत 2025 तक खाली हो जाएगा। प्रकृति की मूल रचना के साथ जब भी छेड़छाड़ होती है, तब वही चीजें इंसानों के लिए विनाश का सबब बन जाती हैं। इंसान अक्सर अपने ही बुने जाल में फँसकर तड़पता नजर आता है और जब उसे होश आता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। कुछ यही स्थिति पानी के सम्बन्ध में है। पिछले कुछ सालों में पर्यावरणीय असन्तुलन बढ़ा है। जिस वजह से पानी को लेकर भी दिक्कतें बढ़ी हैं। नदियों में पानी की कमी व सूखते जल स्रोत तथा भूमिगत जल के अन्धाधुन्ध दोहन की वजह से मुल्क में भू-जल स्तर में तेजी से गिरावट आ रही है। गर्मी के दिनों में इस कारण देश के ज्यादातर इलाकों में नल व कुँओं के सूखने की खबर मिलती है।

पानी के बिना जीवन की कल्पना बेमानी है। जल जीवन की मूलभूत जरूरतों में से एक है, जिसका उपयोग पीने, भोजन बनाने, सिंचाई, पशु-पक्षियों के साथ औद्योगिक इकाइयों के लिए बेहद जरूरी है। बहुत ज्यादा वक्त नहीं बीता है, जब मालदीव में जल संकट उत्पन्न हो गया था। जिसमें भारत की तरफ से 12 सौ टन से ज्यादा ताजा जल भेजा गया। जल संकट का यह तो केवल संकेत मात्र है। पूरे विश्व में हालात कितने विकराल होंगे, यह कह पाना बेहद मुश्किल है।