जल संकट आज की चुनौती

Author: 
डॉ. मनवीर सिंह
Source: 
कुरुक्षेत्र, जून 2008
आज सम्पूर्ण विश्व की जनसंख्या अत्यन्त तीव्रता से बढ़ रही है, अतः जल की माँग का बढ़ना भी स्वाभाविक ही है, परन्तु हमें अपनी इस धारणा को बदलना चाहिये कि जल का असीमित भण्डार है और वह खत्म नहीं होगा, क्योंकि जल का भण्डार सीमित है और इसी का परिणाम है कि प्रत्येक वर्ष सम्पूर्ण विश्व का बहुत बड़ा भू-भाग रेगिस्तान व बंजर भूमि में तब्दील होता जा रहा है। पेयजल और स्वच्छता का चोली-दामन का साथ है। जल न केवल जीवन की मूलभूत आवश्यकता है बल्कि वह सभी के लिए स्वास्थ्य सम्बन्धी लक्ष्य प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण भी है। इस तथ्य पर दृष्टिपात करना भी अत्यन्त आवश्यक है कि सामान्य रोगों में लगभग 80 प्रतिशत रोग असुरक्षित पेयजल के कारण होते हैं। वैश्विक सन्दर्भ मंं हर व्यक्ति को पर्याप्त और स्वच्छ पेयजल सुविधाएँ प्राप्त करने का अधिकार है, परन्तु सवाल यह उठता है कि वह अपने लक्ष्य को कहाँ तक प्राप्त कर पाता है? भारतीय ग्रामीण सन्दर्भ में भारत के प्रत्येक गाँव में उचित सफाई व्यवस्था व पेयजल आपूर्ति सुविधाओं का होना भी नितान्त आवश्यक है। इन दोनों का अभाव राष्ट्रीय स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डालता है।

नीतिगत कोताही का नतीजा है जल संकट

Author: 
अनंत विजय, वरिष्ठ टीवी पत्रकार
Source: 
नेशनल दुनिया, 20 जून 2014
अभी दिल्ली सरकार ने राजधानी में पचास वाटर एटीएम खोलने की अनुमति दी है। इसके पहले भी दिल्ली में वाटर एटीएम लगाए जा चुके हैं। इन वाटर एटीएम से आप तीस पैसे प्रति लीटर के हिसाब से पानी निकाल सकते हैं। यह कोई मामूली घटना नहीं है। इससे हमें पानी की महता और आगे आने वाले दिनों में होने वाली दिक्कतों का अंदाजा लगा सकते हैं।

ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब दिल्ली विधानसभा के चुनाव में पानी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा था और सत्ताधारी दल को उसका उचित प्रबंधन नहीं कर पाना काफी महंगा पड़ा था। उससे भी अहम बात है कि देश की राजधानी दिल्ली के पूर्वी और दक्षिणी इलाके में पानी को लेकर हुए झगड़े में दो लोगों की हत्या हो चुकी है। यह एक बड़े खतरे की आहट है जिसे हमें समझना होगा और इसको रोकने के लिए गंभीरता से उपाय करने होंगे, नहीं तो दो हत्या एक बड़ी जंग में तब्दील हो सकती है।

जल संरक्षण के लिए लोगों को शिक्षित और जागरूक होना अनिवार्य है। उन्हें इस बात को समझना होगा कि पानी बेशकीमती है और उसे बेवजह बर्बाद करने से हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी दरअसल, हमारे देश में जैसे-जैसे शहरों का फैलाव होता चला गया या फिर नई जगह पर नए शहरों को बसाया जाने लगा उसके परिणामस्वरूप जलस्तर लगातार नीचे जाने लगा। इस अंधाधुंध विकास की होड़ और पानी के इस्तेमाल को लेकर सख्त कानून के अभाव में दिल्ली और उसके आसपास के इलाके में प्राकृतिक संसाधनों का जमकर दोहन जारी है।

પાણીના ગંભીરતમ પ્રશ્નોને કાયમી ધોરણે કઇ રીતે ઉકેલી શકાય ?

Author: 
વિનીત કુંભારાણા

પાણીનો પ્રશ્નએ વિશ્વનો ગંભીરતમ પ્રશ્ન છે. ઘણા દેશો પીવાના પાણીની આયાત કરે છે. એમ કહવાય છે કે હવે પછીનું યુધ્દ્ધ પાણી માટે થશે. મોટા ભાગનું પાણી બરફના સ્વરૂપમાં થીજી ગયેલું છે. વિશ્વમાં જમીન પરના કુદરતી અને કૃત્રિમ જળસંગ્રહ સ્થાનોમાં કુલ મીઠા પાણીનો ભાગ ૧ ટકા પણ નથી, માત્ર ૦.૩૬૬ ટકા જ છે. વર્ષ ૨૦૨૫ સુધીમાં વિશ્વના ૪૮ દેશોમાં પાણીની કારમી કટોકટી પ્રવર્તશે અને તેના કારણે પાણી રમખાણો, યુધ્ધો, સંઘર્ષો<, હિંસા ફાટી નીકળશે. અત્યારે વિશ્વના દેશો કે જેમાં ૪૦ ટકા પ્રજા રહે છે, ત્યાં પાણીના ગંભીરતમ પ્રશ્નો છે.

આપણા દેશમાં ૫૦ ટકાથી વધારે લોકોને શુધ્દ્ધ સલામત પીવાનું પાણી મળતું નથી. પાણીના પ્રદૂષ્ણના પ્રશ્નો ગંભીર બની રહ્યા છે. દેશની મહાનદીઓ સૌથી વધારે પ્રદુષિત છે. ગુજરાત રાજયના ૧૫ જિલ્લાઓમાં ફલોરાઇડવાળા પાણીના અને ૧૬ જિલ્લાઓમાં ખારા પાણીના પ્રશ્નો છે. બોરવેલ દ્રારા મેળવાતા પાણીમાં ફલોરાઇડ અને નાઇટ્રેટનું પ્રમાણ વધતું જાય છે. ખારાશની તીવ્ર સમસ્યાવાળા ગામોની સંખ્યા ૪૫૦થી વધારે છે, તો ૪૦૦ ગામોમાં પાણીમાં નાઇટ્રેટના પ્રશ્નો છે. ગુજરાતમાં ૮૫ ઉપરાંત નદીઓ છે. પણ બારમાસી નદીએા તો ૮ જ છે.

એક અભ્યાસ પ્રમાણે ભારતમાં ૧ ઘનમીટર પાણીના ઉપયોગ દ્રારા ૭.૫ અમેરિકન ડોલરના મૂલ્યનું ઉત્પાદન થાય છે. જયારે આટલા જ પાણીના ઊપયાગથી બ્રિટનમાં ૪૪૩.૭ ડોલર અને સ્વીડનમાં ૯૨.૨ ડોલરના મૂલ્યનું ઉત્પાદન થાય છે. આમ, આપણા દેશમાં વધારે પાણીથી ઓછું ઉત્પાદન થાય છે. ખેતીના પાકોની તરાહ એવી છે કે તેમાં વધારે પાણીની જરૂર છે, તો ઉદ્યોગોને પણ મોટા પ્રમાણમાં પાણીની જરૂર છે.

સેન્ટર ફોર સાયન્સ એન્ડ એન્વાયર્મેન્ટના અભ્યાસ પ્રમાણે ભારતના ઉદ્યોગો ૧ લીટર પાણીના વપરાશ સામે ૫થી ૮ લીટર પાણી પ્રદુષિત કરે છે. ભારતીય ઉદ્યોગો પ્રતિ વર્ષ આશરે ૪૦ અબજ ઘનમીટર પાણીનો વપરાશ કરે છે. અને ૨૦૦થી ૩૨૦ અબજ ઘનમીટર પાણી પ્રદુષિત કરે છે.

इस तरह बिक जाएगा नर्मदा का पानी

Author: 
जय नागड़ा
Source: 
इंडिया टुडे, मई 2012

नर्मदा जल के सपने दिखाकर लघु-मध्यम शहरी ढांचागत विकास योजना (यूआइडीएसएसएमटी) के तहत निगम ने 106.72 करोड़ रु. की योजना बना डाली, जिसमें केंद्र सरकार ने 80 और राज्य ने 10 फीसदी का अनुदान मंजूर किया। इसके बाद बाकी 10 फीसदी यानी 10.67 करोड़ रु. निगम को देने थे, लेकिन उसने इसके लिए पीपीपी का सहारा लिया और समूची योजना विश्वा युटिलिटी के हवाले कर पल्ला झाड़ लिया। निगम के पूर्व महापौर ताराचंद अग्रवाल योजना पर सवाल उठाते हैं, “यह काम निगम महज 25-30 करोड़ रु. में कर सकता था।”

ठेठ अंचल में हैं पानी की पाठशालाएं

Author: 
संदीप शर्मा
Source: 
दैनिक भास्कर, 29 अप्रैल 2011

सोचने पर विवश हूं कि जिन लोगों ने किताबें नहीं पढ़ीं, पन्ने नहीं पलटाए, अक्षर नहीं समझे, वे पानी को लेकर इतने संस्कारित हैं। विरासत ही इन्हें ऐसा बनाए हुए है। हर पीढ़ी अपनी आने वाली पीढ़ी को पानी का ये संस्कार देती आ रही है।

ठेठ अंचल में पानी की अलग कहानी सुनने और देखने को मिलती है। कहानी यहां आकर हकीकत में तब्दील हो जाती है। इंदौर जिले का आदिवासी अंचल पानी को लेकर एक सबक अपने में समेटे है। ये वो बात है, जो शहर के मुकाबले उस पिछड़े अंचल को कतार में आगे खड़ा करती है। वे भले ही पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन गुने अवश्य हैं। पानी को लेकर उनका अपना फलसफा है, जिसे वे सालों से अपने जीवन का हिस्सा बनाए हुए हैं। महू तहसील का आदिवासी तबका पानी को लेकर बेहद संजीदा है। पानी की कमी ने उन्हें हमेशा से सजग और जिम्मेदार बनाए रखा है। शहर में पानी की कोई कद्र नहीं, लेकिन आवश्यकता बहुत है और बावजूद इसके दुरुपयोग रोकने को लेकर कोई गंभीर नहीं है।

देश में सबसे ज्यादा बारिश और सबसे सूखे स्थान से सीधी रिपोर्ट

Source: 
दैनिक भास्कर, 22 मार्च 2011

हम क्यों बचाएं पानी और कैसे? जिसके पास पानी की कमी नहीं है, वह यही सवाल पूछता है। सहज मासूमियत से। देश के पूर्वी छोर में स्थित मेघालय के चेरापूंजी कस्बे का आम बाशिंदा भी यही सवाल करता है। इस सवाल का जवाब चेरापूंजी में ही बढ़ रहे पेयजल संकट और पश्चिमी छोर में स्थित जैसलमेर की सदियों पुरानी जल संरक्षण परंपरा के मूल में मौजूद है। दैनिक भास्कर ने देश के इन दोनों छोर पर पहुंचकर अपने पाठकों के लिए खास तौर पर इस सवाल का जवाब खंगाला। पर्यावरण विशेषज्ञों और यहां रह रहे लोगों की जल संस्कृति के जरिए।

जनता द्वारा, जन हित हेतु : विश्व भर में जल की रक्षा

Author: 
वेनोना हॉटर
Source: 
निरंतर पत्रिका दल

मानवाधिकार बनने की बजाय जल बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कमाई का ज़रिया बन गया है


दुनिया भर में ऐसे लोगों के बीच की खाई दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है जिनके पास पानी पर्याप्त है और जो पानी को तरस रहे हैं। जल की उपलब्धता बड़ी समस्या है यह तो सभी मानते है पर इस से जुड़ी समस्याओं के हल पर आपसी सहमती और समन्वय न के बराबर है। प्रकृति की नेमत जल जो दरअसल एक मानवाधिकार होना चाहिये बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कमाई का ज़रिया बन गया है। प्रस्तुत आलेख में अमरीका स्थित “पब्लिक सिटिज़न्स वॉटर फॉर ऑल” नामक अभियान की निर्देशिका वेनोना हॉटर कह रही हैं कि पानी जैसी मूल सेवाओं में निजी निवेशक को नहीं वरन् नागरिकों की सीधी भागीदारी को बढ़ावा मिलना चाहिए।

तेरा पानी, मेरा पानी!

Author: 
अशोक खन्ना
Source: 
दैनिक ट्रिब्यून, मार्च 2010

सागर में गागर

खबर है कि भविष्य में पानी पेट्रोल के भाव बिकेगा। आज भी पानी की बोतल दस से बीस रुपए लिटर के बीच बिक ही रही है। बस अड्डों और स्टेशनों पर एकाध नल को छोड़कर बाकी खराब रहते हैं या खराब कर दिए जाते हैं। इधर गाड़ी या बस आती है, उधर प्यासों का लम्बी क्यू लग जाता है। लम्बा क्यू और गाड़ी छूटने के भय से लोगों को मजबूरन बच्चों की प्यास बुझाने के लिए हॉकर से पानी की बोतल खरीदनी ही पड़ती है।

पानी का अभाव – धारणाएँ, समस्याएँ और समाधान

Author: 
निरंतर पत्रिका दल
Source: 
निरंतर पत्रिका दल

2025 तक विश्व की आधी आबादी भीषण जलसंकट झेलने पर विवश होगी। क्या है इस संकट की जड़?


जल मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है, इसे मानवाधिकार का दर्जा भी दिया जाता है। इसके बावजूद दुनिया भर में लगभग 100 करोड़ लोगों के पास शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं होता। कहा जाता है कि सन् 2025 तक विश्व की 50 फीसदी आबादी भयंकर जल संकट झेलने को मजबूर होगी। इस संकट की जड़ क्या है? इस से मुकाबला कैसे किया जाये ताकि “सबके लिये पानी” का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके? प्रस्तुत है इन सारे विषयों और जल से जुड़े अन्य मुद्दों पर विहंगम दृष्टि डालता चंद्रिका रामानुजम व राजेश राव का यह आलेख।

लेखक द्वयः एसोशियेशन फॉर इंडियाज़ डेवेलपमेंट (ऍड) की स्थानीय शाखा से संबद्ध स्वयंसेवक हैं। मुख्यतः शिक्षा तथा पानी से जुड़े मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने वाली चंद्रिका पानी से संबंधित मुद्दों पर शोध हेतु ऍड के फोकस समूह का संयोजन करती हैं। राजेश पानी से जुड़े विकास के मुद्दों पर नज़र रखते हैं। चंद्रिका पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और राजेश इंजीनियर। दोनों ही लेखक आस्टीन, टेक्सास में रहते हैं।

राजस्थान के शुष्क इलाकों में महिलाओं को रोज़ाना घरेलू ज़रूरत का पानी लाने के लिये तकरीबन 4 घंटे चलना पड़ता है।

• दिसंबर 2003 में कर्नाटक ने तमिलनाडु को ज्यादा पानी देने के उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर आपत्ति जतायी।