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देश में गहराता जल संकट


हमारे भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, मरकरी और यूरेनियम का मिलना आम बात हो गई है। हाल के वर्षों का सूखा और किसानों की आत्महत्या स्थिति की गम्भीरता को दर्शाती है। मानसून परिवर्तन ने भी नई चुनौतियाँ पेश की हैं, इनसे बाढ़ और सूखा पर भी असर पड़ा है। देश के शहरों में लगभग 400 करोड़ लीटर सीवेज प्रतिदिन तैयार होता है , जिसमें से लगभग 20 प्रतिशत का शोधन हो पाता है। बारिश का पानी बाढ़ बन जाता है और गन्दा पानी घरों में घुस जाता है और बीमारियों को भी न्योता देता है। भारत में भूजल का सबसे अधिक उपयोग होता है। पीने का पानी, सिचाईं, उद्योग, कल-कारखानों से लेकर धुलाई-सफाई तक में भूजल का ही हम उपयोग करते हैं। भूजल के बारे में हमारी आम धारणा यह है कि यह कभी समाप्त नहीं होगा। जितना चाहें उतना पानी हम जमीन के अन्दर से निकाल सकते हैं। लेकिन यह सच नहीं है। जल का दोहन करने से हमारा भूजल भण्डार कम हो रहा है। एक आँकड़े के मुताबिक देश में अस्सी फीसदी लोग भूजल ही उपयोग में लाते हैं। यह सिंचाई की जरूरतों का लगभग दो तिहाई है। आजादी के कुछ वर्षों के बाद से ही हमारे देश में चौरासी फीसदी सिंचाई भूजल से हो रहा है।

बिन पानी का दृष्टि पत्र, संकल्प पत्र और घोषणा पत्र

विधानसभा चुनाव 2017 पर विशेष


पानीपानी2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखण्ड में कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा सहित लगभग दो दर्जन से अधिक राजनीतिक पार्टियों ने अपने-अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। कुल 70 विधानसभाओं के लिये 634 उम्मीदवार मैदान में हैं। कांग्रेस ने संकल्प पत्र और भाजपा ने दृष्टि पत्र तथा बाकि अन्य पार्टियों ने घोषणा पत्र जारी किया है।

पूर्व के चुनाव की भाँति इस बार भी लोक-लुभावन वायदे के साथ ये पार्टियाँ अपने-अपने घोषणा पत्र में विकास की इबारत लिखने की बात करने से बाज नहीं आये। ताज्जुब हो कि एक भी ऐसा वायदा नहीं है जिसके सुहावने सपने इनके घोषणा पत्र में अंकित ना हो। बस! एक बात को इन पार्टियों ने बेपरवाह कर दी कि जिन मुद्दों व वायदों के साथ आजकल ये पार्टियाँ लाउडस्पीकर लेकर घूम रहे हैं वे वायदे कैसे जीवित रहेंगे इसकी फिक्र शायद इन्हें नहीं है।

पंजाब चुनाव में पानी का मुद्दा, कितना कारगर

विधानसभा चुनाव 2017 पर विशेष


सतलुज-यमुना लिंक नहरसतलुज-यमुना लिंक नहरपंजाब विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों में पानी के मुद्दे पर होड़ मची है लेकिन दुखद यह है कि इसमें पंजाब के लोगों के पानी की चिन्ता कम और अपना हित साधने की हड़बड़ी ज्यादा नजर आती है। पानी जैसे आम लोगों से जुड़े और जरूरी एवं अहम मुद्दे पर भी सिर्फ बयानबाजी ही की जा रही है।

महज सतलुज-यमुना लिंक नहर योजना के मुद्दे को ही पानी का समग्र मुद्दा मान लिया गया है। जबकि यह पूरे प्रदेश के पानी की किल्लत के मद्देनजर एक छोटा-सा अंश भर है। इस चिन्ता में न तो खेती में पानी को बचाने की तकनीकों की कोई बात है, न ही बारिश के पानी को जमीन में रिसाने की चिन्ता और न ही तेजी से खत्म होती जा रही पानी के परम्परागत संसाधनों को लेकर कोई बात है। पंजाब के सूखे इलाकों में पानी को लेकर दलों के पास फिलहाल कोई दृष्टि (विजन) नहीं है।

पड़ोसी गाँव से लाये फसलों के लिये पानी


किसानों के लिये यह भी हैरत की बात थी कि जहाँ उनके गाँव में इतने गहरे जाने पर भी पानी नहीं मिल पा रहा था, वहीं यहाँ से करीब दो किमी दूर पड़ोस के गाँव भौंडवास की जमीन में खूब पानी है। यहाँ 200 फीट पर ही पानी है। अब भौंडवास में पानी तो है पर वहाँ का पानी यहाँ के खेतों के किस काम का। इस पर भी किसानों ने रास्ता निकाला और भौंडवास में उन्होंने पहले कुछ प्लाटनुमा जमीन खरीदी, फिर इस जमीन में बोरवेल कराया। इसमें पानी निकलने पर यहाँ से दो किमी लम्बी पाइपलाइन डालकर अब पानी फरसपुर के खेतों में दिया जा रहा है। भूजल भण्डार खत्म होते जाने से हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। अब मरती हुई फसलों को बचाने के लिये किसान तरह-तरह के जतन कर रहा है। अब हालात इतने बुरे हो चले हैं कि ठंड के दिनों में ही जमीनी पानी सूखने लगा है। मध्य प्रदेश के इन्दौर और देवास जिलों में किसान अपनी खड़ी फसलों को सूखने से बचाने के लिये पानी के इन्तजाम में जुटे हैं। दूर-दूर से पाइपलाइन के जरिए पानी लाकर फसलों को दिया जा रहा है। हद तो तब हो गई, जब एक गाँव में पानी नहीं होने से कुछ किसानों ने लाखों रुपए खर्च कर दो किमी दूर पड़ोसी गाँव में जमीन खरीदकर ट्यूबवेल करवाए और अब वहाँ से पाइपलाइन बिछाकर पानी अपने गाँव की फसलों तक पहुँचा रहे हैं।

प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और संरक्षण पर जन घोषणा पत्र


विभिन्न आध्यात्मिक संस्थाओं, आन्दोलनकारी समूहों, पंचायत प्रतिनिधियों, स्वयंसेवी संगठनों, बुद्धिजीवियों के साथ आयोजित वार्ताओं व जनसंवाद के दौरान यह दस्तावेज तैयार किया गया है। इस दस्तावेज को आगामी विधानसभा चुनाव-2017 से पहले सभी प्रमुख राजनैतिक दलों के अध्यक्षों को इस आशा के साथ सौंपा जा रहा है कि जनता के इस घोषणा पत्र पर सभी दल विचार करेंगे और अपने-अपने सम्बन्धित दलों के घोषणा पत्र में इसे स्थान देंगे-
सुरेश भाई-जन घोषणा पत्र के मुख्य सम्पादक और पर्यावरण मामलों के जानकार

काश पंच महाभूत भी होते वोटर

विधानसभा चुनाव 2017 पर विशेष



पारम्परिक जलस्रोतों की अनदेखी ने बढ़ाया जल संकटपारम्परिक जलस्रोतों की अनदेखी ने बढ़ाया जल संकटपंजाब, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, गोवा और मणिपुर - पाँच राज्य, एक से सात चरणों में चुनाव। 04 फरवरी से 08 मार्च के बीच मतदान; 11 मार्च को वोटों की गिनती और 15 मार्च तक चुनाव प्रक्रिया सम्पन्न। मीडिया कह रहा है - बिगुल बज चुका है। दल से लेकर उम्मीदवार तक वार पर वार कर रहे हैं।

रिश्ते, नाते, नैतिकता, आदर्श.. सब ताक पर हैं। कहीं चोर-चोर मौसरे भाई हो गए हैं, तो कोई दुश्मन का दुश्मन दोस्त वाली कहावत चरितार्थ करने में लगे हैं। कौन जीतेगा? कौन हारेगा? रार-तकरार इस पर भी कम नहीं। गोया जनप्रतिनिधियों का चुनाव न होकर युद्ध हो। सारी लड़ाई, सारे वार-तकरार.. षड़यंत्र, वोट के लिये है। किन्तु वोटर के लिये यह युद्ध नहीं, शादी है।

बर्बादी रोकनी है, तो नमभूमि बचाएँ

विश्व नम भूमि दिवस - 02 फरवरी, 2017 पर विशेष


लोकटक झीललोकटक झीलहर्ष की बात है कि विश्व नमभूमि दिवस - 2017 से ठीक दो दिन पहले आस्ट्रेलिया सरकार ने 15 लाख डॉलर की धनराशि वाले ‘वाटर एबंडेंस प्राइज’ हेतु समझौता किया है। यह समझौता, भारत के टाटा उद्योग घराने और अमेरिका के एक्सप्राइज घराने के साथ मिलकर किया गया है।

विषाद का विषय है कि जल संरक्षण के नाम पर गठित इस पुरस्कार का मकसद हवा से पानी निकालने की कम ऊर्जा खर्च वाली सस्ती प्रौद्योगिकी का विकास करने वालों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ाना है।

करोड़ों का सरकारी खर्च, आदिवासी बच्चे प्यासे


बच्चों को पीने के पानी के लिये पूरे साल भटकना पड़ता है। यहाँ सड़क के पार गाँव में जाकर बच्चों को पानी पीना पड़ता है। कई बार बच्चे तेज रफ्तार वाहनों से दुर्घटनाग्रस्त भी हो जाते हैं। बिलिडोज के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में दो बार हैण्डपम्प के लिये खुदाई हो चुकी है, लेकिन बच्चों की किस्मत में यहाँ भी पानी नहीं है। एक में पानी नहीं निकला तो दूसरे पर अब तक उपकरण ही नहीं लग सका है। इसी तरह हक्कू फलिया कुंडला के प्राथमिक विद्यालय में भी अब तक बच्चे उपकरण के इन्तजार में हैं।

वही जख्म, वही दर्द

Author: 
परवेज अहमद
Source: 
दैनिक जागरण, 13 जनवरी, 2017

आजादी के बाद दूसरे क्षेत्र जब विकास की राह बढ़े, तब यह इलाका दुश्वारियों के घेरे में फँसना शुरू हुआ। पानी की किल्लत पहले से थी। ऊपर से पोखरे समतल कर दिये गए। जंगलों की अन्धाधुन्ध कटान हुई। अन्ना प्रथा बढ़ी। बेरोजगारी, उद्योगों का अभाव, किसानों की आत्महत्या, अवैध खनन सुर्खियाँ बनीं। राजनीतिज्ञों ने इसे कुर्सी हासिल करने का किस्सा बनाया, मगर यहाँ के ‘पानी’ (इज्जत) की लड़ाई नहीं लड़ी। चुनाव फिर है। पुराने जख्म कुरेदे जा रहे हैं मगर, इससे ऊबे बुन्देलखण्डवासी अब अपनी पुरानी पहचान वापस चाहते हैं। बात बुन्देलखण्ड के पूर्वी क्षेत्र यानी चित्रकूट के पाठा से। आजादी के पानी की विभीषिका का जिक्र करते हुए किसी ने विरह गीत लिखा- ‘भौंरा तोरा पानी गजब करि जाए, गगरी न फूटै खसम मरि जाए!’ अर्थ यह कि एक घड़ा पानी बचा रहना चाहिए, चाहे पति की मौत क्यों न हो जाये। आजादी की आधी शताब्दी बाद भी यह दर्द बना हुआ है। बांदा, महोबा, हमीरपुर, जालौन, ललितपुर, झाँसी का भी यही हाल है। अतीत को छोड़ एक दशक का हाल देखें तो अन्ना प्रथा, सूखा, कर्ज के बोझ से दबे किसानों की आत्महत्याएँ यहाँ की पहचान हैं। तीस अप्रैल 2011 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बुन्देलखण्ड पहुँचे। पैकेज का एलान किया। मगर वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। अभी हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी महोबा गए। उन्होंने भी सिर्फ उम्मीदें जगाई। इसके पहले राहुल गाँधी ने महोबा के सूपा से ‘बुन्देलखण्ड बचाओ’ पदयात्रा की शुरुआत की। क्षेत्रीय लोगों की ओर से तैयार आँकड़ों को सच मानें तो अप्रैल वर्ष 2003 से मार्च 2015 तक 3280 किसानों ने आत्महत्या की। बेमौसम बारिश और ओलों ने किसान परिवार को हलाकान कर डाला। ब