मुंबई की प्यास

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सुशील मिश्र और अरुण यादव / May 11, 2009/ बिजनेश स्टैंडर्ड
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में पीने के पानी की किल्लत अपने आप में एक बड़ी समस्या है। इसकी मुख्य वजह जरुरत के हिसाब से पानी की आपूर्ति न हो पाना है। हैरानी की बात यह है कि ऊंची इमारतों में रहने वालों के घरों में तो पानी की आपूर्ति ठीक-ठाक हो जाती है लेकिन मुंबई की पहचान चाल और झोपड़पट्टी इलाके में पानी की आपूर्ति की समस्या हमेशा बनी रहती है।

मुंबई की करीबन एक करोड़ तीस लाख जनसंख्या के लिए मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) हर दिन लगभग 340 करोड़ लीटर पानी की आपूर्ति करती है, लेकिन इतने पानी से मुबंई की प्यास नहीं बुझती है। मुंबईकरों की प्यास बुझाने के लिए प्रति दिन 410 करोड़ लीटर से भी ज्यादा पानी की जरुरत है। जितने पानी की आपूर्ति की जाती है, वह भी लोगों के पास पूरी तरह से नहीं पहुंच पाता है।
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http://hindi.business-standard.com/

पानी का हिसाब-किताब

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सचिन कुमार जैन / sachinwriteson blog
शिवपुरी की छर्च पंचायत की सत्तर साल की विधवा पांचोनाय कुशवाहा के लिये जीवन के बचे हुये दिन किसी औपचारिकता से अधिक नहीं है। वह किसी जनकल्याणकारी योजना की पात्र नहीं है। आज वह सरकार द्वारा चलाये जा रहे राहत कार्य के अन्तर्गत पानी रोकने वाली संरचना पर कठिन शारीरिक श्रम कर रही हैं। दिन भर तपती धूप में काम करने के बाद शाम को यदि उसने 100 क्यूबिक फिट की खंती बनाई होगी तभी उसे मिलेगी न्यूनतम मजदूरी वर्ना अगले दिन यह काम पूरा करना होगा। पांचोनाय को फिर भी किसी से कोई शिकायत नहीं है, बस वह चाहती है कि यहां छांव तो मिल नहीं सकती, अगर पीने को पानी ही मिल जाये तो अच्छा है यह जानकर उसे आश्चर्य होता है कि फैमाईन कोड के अनुसार राहत कार्य स्थल पर मजदूरों के लिये छाया-पानी दोनों की व्यवस्था होना चाहिए। फिर

उत्तराखंड में पानी

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nainitalsamachar in
उत्तराखंड के नौले धोरे सूख रहेउत्तराखंड के नौले धोरे सूख रहेउत्तराखंड में इस साल अब तक पानी की स्थिति बहुत विकट रही है। जाड़ों में बहुत कम हिमपात होने के कारण सन् 2009 की गर्मियों में बर्फ पिघलने से मिलने वाले पानी की बहुत कमी रही। हिमनद से बनने वाली भागीरथी और अलकनन्दा जैसी नदियों में गर्मियों में पानी का औसत प्रवाह लगभग 50 प्रतिशत कम हो गया। गर्मियों में अतिरिक्त जल विद्युत का उत्पादन करने वाले उत्तराखंड राज्य को इस बार अन्य राज्यों से बिजली खरीदनी पड़ी। जाड़ों में कम वर्षा व कम हिमपात होने के कारण ही इस बार जल स्रोत व धारे जल्दी ही सूख गए,

ग्वालियर बचाओ अपना 1000 अरब लीटर पानी

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bundelkhandlive.com / 05 July 2009

वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था नहीं


ग्वालियर- पानी के अंधाधुंध दोहन के कारण भू-जल स्तर और गिरता जा रहा है। वर्षा के जल को संरक्षित करने के लिए शहर में वाटर हार्वेस्टिंग जैसी कोई तैयारी फिलहाल नहीं है। शहर में एक लाख से अधिक मकान व बहुमंजिला भवन हैं लेकिन इनमें से पांच फीसदी में भी रूफ वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था नहीं की गई है। जिला प्रशासन, नगर निगम, जिला पंचायत, लोक निर्माण विभाग सहित अन्य सभी सरकारी महकमों के बड़े-बड़े भवनों पर वाटर हार्वेस्टिंग की योजना कागजों में तैयार हो चुकी है लेकिन उसका क्रियान्वयन अभी पूरी तरह नहीं हो पाया है। वाटर हार्वेस्टिंग के अभाव में बरसात का साफ पानी शहर के गंदे नाले-नालियों में बहकर बेकार हो जाएगा।

बारिश के दिनों की संख्या घटी: कैसे होगा सूखे का सामना

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सचिन कुमार जैन / raviwar.com
बुंदेलखंड में अकालबुंदेलखंड में अकालबुंदेलखंड में अकाल और सूखे के घाव गहरे होते जा रहे हैं. जीवन की संभावनाएं क्रमशः कम होती जा रही हैं. लोग बड़ी उम्मीद से आसमान में टकटकी लगाए देख रहे हैं लेकिन साल दर साल बादल धोखा दे कर निकल जा रहे हैं. पिछले 10 सालों में बारिश के दिनों की संख्या 52 से घट कर 23 पर आ गई है.
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http://raviwar.com/

पानी के दोहन से फट रही है जमीन

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भारत डोगरा/ नवभारत टाइम्स
बुंदेलखंड क्षेत्र एवं उत्तर प्रदेश के कुछ अन्य जिलों में बारिश के शुरुआती दौर में ही जमीन फटने की कई वारदातें हुई हैं। इससे काफी पहले हमीरपुर जिले के जिगनी गांव में जमीन फटने की घटना बेहद चर्चित हुई थी। वहां जाकर देखने पर पता चला कि जमीन काफी दूर तक फटी है। यहां के लोगों ने इतने बड़े और भारी ओले गिरने की बात भी कही थी, जितने बड़े ओले उन्होंने जीवन भर में कभी नहीं देखे थे।

हिमालय की तबाही वाली परियोजनाएं

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ऐन कैथरिन श्नायडर/ भाषांतरः मानषी आशर / Raviwar.com
आज दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के कारण संकट के बादल मंडरा रहे हैं लेकिन अन्य क्षेत्रों के मुकाबले हिमालय के पर्वतीय इलाकों में बढ़ते तापमान के असर सबसे साफ़ नज़र आ रहे है. एशिया और हिमालय की महानदियों- सिन्धु, गंगा और नू के तेज़ी से पिघलते ग्लेशियर इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं.

उज्जैन के सामने फिर जल संकट ?

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भास्कर संवाददाता , August 21, 2009
उज्जैन. जलसंकट से मुक्त हुए अभी ज्यादा समय नहीं बीता है। पानी के लिए कितनी परेशानियां उठानी पड़ी इसे नागरिक भूले नहीं होंगे। पार्षदों ने अपने मतदाताओं को तकलीफों से बचाने के लिए कितने जतन किए और प्रशासन तथा नगर निगम अधिकारियों कर्मचारियों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, इसका अहसास भी उन्हें होगा।

फिर क्या कारण है कि उज्जैन का टैंक ‘गंभीर डेम’ में तेजी से पानी कम होने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। पानी का अपव्यय और नुकसान रोकने के प्रति विभाग सचेत नहीं हो रहा। यदि यही ढर्रा रहा तो जल्दी ही गंभीर की झोली पानी से खाली हो जाएगी और शहर एक बार फिर गर्मी आते-आते जलसंकट के मुहाने पर खड़ा होगा। शहर में प्रतिदिन जलप्रदाय किया जा रहा है।
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भास्कर

बांधों में नहीं आया पानी

टोंक। सावन माह आधा बीतने के बाद भी अच्छी बारिश नहीं होने से टोंक जिले में सिंचाई विभाग के सभी बांध रीते हैं। बांध पानी को तरस रहे हैं। भूजल स्तर गहराने से प्रशासन चिंतित है। जून माह में बारिश का दौर शुरू हो जाता है, लेकिन जिले में इस बार मानसून कमजोर रहा। गत साल (08) में टोंक जिले में 25 जुलाई तक 228.92 बारिश हुई, लेकिन इस साल मात्र 152.71 एमएम बारिश ही हुई है। जिले के गलवा बांध, टोरडीसागर, गलवानिया व दौलतसागर बांध में गत सत्र में पानी की अच्छी आवक हुई, पर वर्तमान सत्र में बांध पानी को तरस रहे हैं।
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patrika.com