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जल निकाय

देश के अन्तर्देशीय जल संसाधन निम्न रूप में वर्गीकृत हैं नदियां और नहरें, जलाशय, कुंड तथा तालाब; बीलें, आक्सबो झीलें, परित्यक्त जल, तथा खारा पानी। नदियों और नहरों से इतर सभी जल निकायों ने लगभग 7 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्र घेर रखा है। जहां तक नदियों और नहरों का सवाल है, उत्तर प्रदेश का पहला स्थान है क्योंकि उसकी नदियों और नहरों की कुल लम्बाई 31.2 हजार किलोमीटर है जो कि देश के भीतर नदियों और नहरों की कुल लम्बाई का लगभग 17 प्रतिशत बैठती है। इस सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के बाद जम्मू तथा काश्मीर और मध्य प्रदेश का स्थान आता है। अन्तर्देशीय जल संसाधनों के शेष रूपों में कुण्डों और तालाबों ने सर्वाधिक क्षेत्र (2.9 मिलियन हैक्टेयर) घेर रखा है जिनके बाद जलाशयों (2.1 मिलियन हैक्टेयर) का स्थान आता है।

नदियां

भारत में नदियों की भरमार है। 252.8 मिलियन हैक्टेयर (एमएचए) के आवाह क्षेत्र सहित 12 नदियां वृहद नदियों के रूप में वर्गीकृत हैं। वृहद नदियों में गंगा-ब्रह्मपुत्र मेघना प्रणाली, जिसका आवाह क्षेत्र लगभग 110 मिलियन हैक्टेयर है जो कि देश की सभी वृहद नदियों के आवाह क्षेत्र के 43 प्रतिशत से बढ़ कर है सबसे विशाल प्रणाली है।

10 मिलियन हैक्टेयर से अधिक के आवाह क्षेत्र सहित अन्य वृहद नदियां इस प्रकार हैं सिंधु (32.1 मिलियन हैक्टेयर), गोदावरी (31.3 मिलियन हैक्टेयर), कृष्णा (25.9 मिलियन हैक्टेयर) तथा महानदी (14.2 मिलियन हैक्टेयर)। मध्यम आकार की नदियों का आवाह क्षेत्र लगभग 25 मिलिनय हैक्टेयर है तथा 1.9 मिलियन हैक्टेयर के आवाह क्षेत्र सहित सुबर्णरेखा देश की मध्यम आकार की नदियों में सबसे विशाल नदी है।

कृषि-जलवायु क्षेत्र

कृषि अर्थव्यवस्था के क्षेत्रीकरण सम्बन्धी पूर्व अध्ययनों की जांच करने के बाद योजना आयोग ने यह सिफारिश की कि कृषि-आयोजना कृषि-जलवायु क्षेत्रों के आधार पर तैयार की जानी चाहिए। संसाधन विकास के लिए देश को कृषि-जलवायु विशेषताओं, विशेष रूप से तापमान और वर्षा सहित मृदा कोटि, जलवायु और जल संसाधन उपलब्धता के आधार पर स्थूलतः निम्नानुसार पंद्रह कृषि जलवायु क्षेत्रों में बांटा गया हैः

i. पश्चिमी हिमालयी प्रभाग

ii. पूर्वी हिमालयी प्रभाग

iii. निचला गांगेय मैदानी क्षेत्र

iv. मध्य गांगेय मैदानी क्षेत्र

v. उच्च गांगेय मैदानी क्षेत्र

vi. गांगेय-पार मैदानी क्षेत्र

vii. पूर्वी पठार तथा पर्वतीय क्षेत्र

viii. केन्द्रीय पठार तथा पर्वतीय क्षेत्र

ix. पश्चिमी पठार तथा पर्वतीय क्षेत्र

तापमान

तापमान में भिन्नताएं भी भारतीय उप-महाद्वीप की विशेष पहचान है। नवम्बर से फरवरी तक के सर्दियों के महीनों के दौरान देश के अधिकांश हिस्से में महाद्वीपी हवाओं के कारण तापमान में दक्षिण से पश्चिम की तरफ गिरावट आ जाती है।

दिसम्बर और जनवरी के सबसे अधिक ठण्डे महीनों के दौरान औसत अधिकतम तापमान महाद्वीप के कुछ हिस्सों में 29 डिग्री सेंटीग्रेड से लेकर उत्तर में लगभग 18 डिग्री सेंटीग्रेड तक जबकि औसत न्यूनतम तापमान सुदूर दक्षिण में लगभग 24 डिग्री से लेकर उत्तर में 5 डिग्री सेंटीग्रेड से कम तक रहता है।

मार्च से मई तक आमतौर पर तापमान में सतत और तेज वृद्धि होती है। अधिकतम तापमान उत्तर भारत में, विशेष रूप से उत्तर-पश्चिम के रेगिस्तानी क्षेत्र में जहां का अधिकतम तापमान 48 डिग्री सेंटीग्रेड से बढ़कर होता है, देखने में आता है।

वर्षा

भारत में वर्षा दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी मानसून की घटती-बढ़ती मात्रा, उथले चक्रवातीय अवनमन और विक्षोभ तथा तेज स्थानीय तूफानों पर निर्भर करती है जो ऐसे क्षेत्रों का निर्माण करते हैं जिनमें समुद्र की ठंडी नमीदार बयार पृथ्वी से उठने वाली गरम सूखी बयार से मिलती है और तूफानी स्थिति को प्राप्त होती है। भारत में (तमिलनाडु को छोड़कर) अधिकांश वर्षा जून से सितम्बर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून के कारण होती है; तमिलनाडु में वर्षा अक्टूबर और नवम्बर के दौरान उत्तर-पूर्व मानसून से प्रभावित होती है। भारत में वर्षा की मात्रा अत्यधिक भन्निता, विषमतापूर्ण मौसमी वितरण और उससे भीअधिक विषमतापूर्ण भौगोलिक वितरण तथा अक्सर सामान्य से कमी-अधिकता की परिचायक है।

जलवायु

उत्तर में हिमालय पर्वत की विशाल पर्वतमालाओं और उनके वुजारोधों तथा दक्षिण में महासागर की मौजूदगी भारत की जलवायु पर सक्रिय दो प्रमुख प्रभाव हैं। पहला प्रभाव केन्द्रीय एशिया से आने वाले शीत बयारों के प्रभाव को अवेद्य रूप से रोकता है और इस उप-महाद्वीप को उष्णकटिबन्धीय प्रकार की जलवायु के तत्व प्रदान करता है। दूसरा प्रभाव भारत पहुचंने वाली शीतल नमी-धारक बयारों का स्रोत है और वह महासागरीय प्रकृति की जलवायु के तत्व उपलब्ध कराता है।

जल का भू-आकृति-विज्ञान

भू-आकृति-विज्ञान की दृष्टि से भारत को सात सुपरिभाषित क्षेत्रों में बांटा जा सकता है जो इस प्रकार हैं:

(i)हिमालय की विशाल पर्वतमालाओं सहित, उत्तरी पर्वतमालाएं;

(ii) विशाल मैदानी क्षेत्र जिसके आर-पार सिंधु और गंगा ब्रह्मपुत्र नदी प्रणालियां मौजूद हैं। इसका एक तिहाई भाग पश्चिमी राजस्थान के सूखे-क्षेत्र में पड़ता है, शेष इलाका अधिकाशंतः उर्वर मैदानी क्षेत्र है;

(iii)केन्द्रीय उच्च भूमि जिसमें पश्चिम में अरावली पर्वतमालाओं से शुरू होकर पूर्व-पश्चिम दिशा में जाती हुई और पूर्व में एक गहरे कगार पर समाप्त होती पर्वतमालाएं शामिल हैं। यह क्षेत्र विशाल मैदानी-क्षेत्र तथा दक्षिणी पठार के बीच स्थित है;