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जलाशयों की मरम्मत, जीर्णोद्धार व नवीकरण स्कीम पर नोट

Source: 
जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार

प्रस्तावना


पानी प्रधान प्राकृतिक संसाधन, मानव की बुनियादी जरूरत और बहुमूल्य राष्ट्रीय सम्पदा है। संसाधन के लिहाज से पानी को बांटा नहीं जा सकता है; बारिश, नदी के पानी और भूतल पर मौजूद तालाब व झीलों तथा भूगर्भ के पानी एक इकाई हैं जिनके सर्वांगीण व प्रभावी प्रबंधन की जरूरत है ताकि इसकी गुणवत्ता और उपलब्धता लम्बे समय तक सुनिश्चित की जा सके।

भारत की ग्रामीण आबादी का मूल पेशा कृषि है। भारत के कृषि उत्पादन और विकास में सिंचाई ने महती भूमिका निभाई है। राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तरों पर कृषि का विकास सिंचाई में विकास के पैटर्न से जुड़ा हुआ है। सिंचाई के क्षेत्र में निवेश ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने व ग्रामीण विकास की कुंजी है। लम्बे समय से मानव की सम्पन्नता के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए कृषि उत्पादन में सिंचाई के विभिन्न व्यवस्थाअों के माध्यम से जल संसाधन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाया है। भारत में लघु सिंचाई व्यवस्था के जरिये जल संसाधन का इस्तेमाल उसके प्राकृतिक रूप में किया गया। 2000 हेक्टेयर खेत में जब सिंचाई होती है तो उसे लघु सिंचाई कहा जाता है।

लघु सिंचाई के लिए पाँच तरह के ढांचे की व्यवस्था की जाती है - कुआँ खुदाई, सतही ट्यूबवेल, गहरा ट्यूबवेल, सरफेस लिफ्ट सिस्टम और सरफेस फ्लो सिस्टम।सरफेस फ्लो सिस्टम को छोड़ दें तो सभी सतही जल के ढांचे हैं।

मानव निर्मित हो या प्राकृतिक इन जलाशयों, टैंकों, पोखरों और इसी तरह के दूसरे ढांचों ने भारतीय कृषि को सदियों से पुष्पित व पल्लवित कर रखा है।

श्री श्री-यमुना विवाद : राष्ट्रीय हरित पंचाट का आदेश

Source: 
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल

हिंदी प्रस्तुति: अरुण तिवारी

.विश्व सांस्कृतिक उत्सव आयोजन के यमुना भूमि पर किए जाने से उपजे विवाद से आप परिचित ही हैं। विवाद को लेकर राष्ट्रीय हरित पंचाट ने दिनांक नौ मार्च, 2016 अपना आदेश जारी कर दिया है। खबर है कि प्रारम्भिक मुआवजा राशि के आदेश से असंतुष्ट श्री श्री रविशंकर जी ने सर्वोच्च न्यायालय में जाने का निर्णय लिया है। मेरा मानना है कि आदेश ने पर्यावरणीय सावधानियों के अलावा प्रशासनिक कर्तव्य निर्वाह के पहलुओं पर भी दिशा दिखाने की कोशिश की है।

मूल आदेश अंग्रेजी में है। पाठकों की सुविधा के लिए आदेश का हिंदी अनुवाद करने की कोशिश की गई है। यह शब्दवार अनुवाद नहीं है, किंतु ध्यान रखा गया है कि कोई तथ्य छूटने न पाये। समझने की दृष्टि से कुछ अतिरिक्त शब्द कोष्ठक के भीतर जोङे गये हैं। अनुरोध है कि कृपया अवलोकन करें, विश्लेषण करें और अपने विश्लेषण/प्रतिक्रिया से हिंदी वाटर पोर्टल को अवगत करायें।

आदेश दस्तावेज की हिंदी प्रस्तुति

जल प्रबंधन में राज्यों के अधिकारों में दखल नहीं : प्रधानमंत्री

Author: 
जनसत्ता ब्यूरो
Source: 
जनसत्ता, 29 दिसंबर 2012
भूजल स्तर में आने वाली गिरावट के संदर्भ में प्रधानमंत्री ने कहा कि इसके अत्यधिक महत्व के बावजूद इसे निकालने और इसके इस्तेमाल में तालमेल से जुड़ा कोई नियमन नहीं है। उन्होंने कहा कि भू-जल के दुरुपयोग को कम से कम करने के लिए हमें इसे निकालने में बिजली के इस्तेमाल के नियमन के कदम उठाने होंगे। नई दिल्ली, 28 दिसंबर 2012। राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करने के प्रधानमंत्री के आश्वासन के बीच शुक्रवार को राज्यों ने असहमति जताने के बावजूद राष्ट्रीय जल नीति को स्वीकार कर लिया। कई राज्य सरकारों ने चिंता जताई थी कि नीति में प्रस्तावित कानूनी रूपरेखा उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। प्रधानमंत्री का यह आश्वासन इन्हीं आशंकाओं को दूर करने की कोशिश थी।

प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद के छठें सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि केंद्र सरकार किसी भी तरह से राज्यों के संवैधानिक अधिकारों या जल प्रबंधन को केंद्रीयकृत करने के लिए हस्तक्षेप नहीं करना चाहती। उन्होंने कहा कि मैं प्रस्तावित राष्ट्रीय कानूनी रूपरेखा को उचित दृष्टिकोण से देखने की जरूरत पर जोर देना चाहूंगा। सम्मेलन में ही राष्ट्रीय जल नीति को स्वीकार किया गया। जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने सम्मेलन के बाद कहा कि नीति का मसविदा दोबारा तैयार नहीं किया जाएगा। राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए कुछ संशोधन किए जाएंगे।

पर्यावरण एवं विकास

Author: 
डॉ. अरुणा पाठक

ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर पिघलने एवं वनों की अत्यधिक कटाई से नदियों में बाढ़ आ रही है। समुद्र का जलस्तर सन् 1990 के मुकाबले सन् 2011 में 10 से 20 सेमी. तक बढ़ गया है। जिससे तटीय इलाकों में मैंग्रोव के जंगल नष्ट हो रहे हैं। परिणाम स्वरूप समुद्री तुफानों की संख्या बढ़ती जा रही है। प्रतिवर्ष समुद्र में करोड़ों टन कूड़े-कचरे एवं खर-पतवार के पहुंचने से विश्व की लगभग एक चौथाई मुंगे की चट्टाने नष्ट हो चूकी है। जिसमें समुद्री खाद्य प्रणाली प्रभावित होने से परिस्थिति तंत्र संकट में पड़ गया है।

आदिवासी क्षेत्रों के विशेषाधिकार समाप्त करने की साजिश

Author: 
भारत डोगरा
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, फरवरी 2012

लंबे इंतजार के बाद राजस्थान में पेसा कानून को लेकर बनाए गए नियम जब सार्वजनिक हुए तो यह बात सामने आई कि इनके माध्यम से आदिवासी समुदाय की स्वायत्ता को समाप्त करने का प्रयत्न किया गया है। आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकार की इस कार्यवाही का विरोध किया जाए और इस बात के प्रयास किए जाए कि देशभर में आदिवासी समुदाय के लिए अनुकूल नियम बने। इस कानून की मूल भावना को बनाए रखा जाए। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए राजस्थान सरकार को शीघ्र ही पेसा कानून के नियमों का जरूरी सुधार करना चाहिए। अन्य राज्य सरकारों को भी चाहिए कि वे उचित व न्यायसंगत नियम बनाकर पेसा कानून को उसकी मूल भावना के अनुकूल लागू करें।

कहीं ‘काली’ साबित न हों हरित अदालतें

Source: 
स्वदेश, 09 मई 2011

जीएम बीजों और कीटनाशकों के फसलों पर छिड़काव से भी बड़ी मात्रा में इनसे जुड़े लोगों की आजीविका को हानि और खेतों को क्षति पहुंच रही है। दुनिया के पर्यावरणविदों और कृषि वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जीएम बीजों से उत्पादित फसलों को आहार बनाने से मानव समुदायों में विकलागंता और कैंसर के लक्षण सामने आ रहे हैं। खेतों को बंजर बना देने वाले खरपतवार खेत व नदी नालों का वजूद खत्म करने पर उतारू हो गए हैं। बाजार में पहुंच बनाकर मोंसेंटो जीएम बीज कंपनी ने 28 देशों के खेतों को बेकाबू हो जाने वाले खरपतवारों में बदल दिया हैं। यही नहीं, जीएम बीज जैव विविधता को भी खत्म करने का कारण बन रहे हैं।

इस खबर के स्रोत का लिंक: 
http://swadesh.in

निजी कंपनी भी हो सकती है सूचना-अधिकार के दायरे में, अगर

Source: 
मंथन अध्ययन केन्द्र

एनटीएडीसीएल सूचना-अधिकार के दायरे में : मद्रास उच्च न्यायालय


हाल ही में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप परियोजना से संबंधित एक महत्वपूर्ण फैसले में मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा न्यू तिरुपुर एरिया डिवेलपमट कार्पोरेशन लिमिटेड, (एनटीएडीसीएल) की याचिका खारिज कर दी गई है। कंपनी ने यह याचिका तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग के उस आदेश के खिलाफ दायर की थी जिसमें आयोग ने कंपनी को मंथन अध्ययन केन्द्र द्वारा मांगी गई जानकारी उपलब्ध करवाने का आदेश दिया था।

एक हजार करोड़ की लागत वाली एनटीएडीसीएल देश की पहली ऐसी जलप्रदाय परियोजना थी जिसे प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत मार्च 2004 में प्रारंभ किया गया था। परियोजना में काफी सारे सार्वजनिक संसाधन लगे हैं जिनमें 50 करोड़ अंशपूजी, 25 करोड़ कर्ज, 50 करोड़ कर्ज भुगतान की गारंटी, 71 करोड़ वाटर शार्टेज फंड शामिल है। परियोजना को वित्तीय दृष्टि से सक्षम बनाने के लिए तमिलनाडु सरकार ने ज्यादातर जोखिम जैसे नदी में पानी की कमी

राजस्थान राज्य जल नीति 2010

वेब/संगठन: 
daily news network in
राजस्थान की जल नीति को 15 फरवरी 2010 को कैबिनेट सब-कमेटी ने प्रदेश की पहली जल नीति के रूप में मंजूरी दे दी है।

राज्य जल नीति के उद्देश्य हैं: सस्टेनेबल आधार पर नदी बेसिन और उप बेसिन को इकाई के रूप में लेते हुए जल संसाधनों की योजना, विकास और प्रबंधन को एकीकृत और बहुक्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाना, और सतही और उपसतही जल के लिये एकात्मक दृष्टिकोण अपनाना। नीति में पानी की पहली प्राथमिकता पेयजल,

पेयजल और स्वच्छता नीति का मसौदा

बिहार सरकार 22 मार्च 2010 को विश्व जल दिवस के अवसर पर पेयजल और स्वच्छता नीति की घोषणा करेगी। लोक स्वास्थ्य और अभियांत्रिकी मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि बिहार सरकार बहुत तेजी से जल और स्वच्छता के बारे में एक मुकम्मल नीति बनाना चाहती है। इस मसौदे पर काम चल रहा है।

मसौदा के बारे में श्री चौबे ने स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार की नीति में पीने के पानी को शीर्ष प्राथमिकता होगी। सरकार दोहरी जल आपूर्ति पर भी काम कर रही है। ताकि जल को साफ किया जा सके। सरकार जिला स्तर और राज्य स्तर पर निगरानी समितियाँ भी बनायेगी जो सतही पानी, जमीनी पानी और वर्षा जल के अधिकतम के समूचित उपयोग पर नियंत्रण रखेंगी। बिहार सरकार एक भूजल विनियामक प्राधिकरण भी स्थापित करेगी जो भूजल संरक्षण और उपयोग पर नियंत्रण रखेगी।