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भूजल के लिए प्रतिस्पर्धा और टकराव

Source: 
इण्डिया टूगेदर

महानदी घाटी की पहचान विभिन्न किस्म की भूगर्भीय संरचनाओं और शैलों की भारी विविधता से होती है। जहाँ घाटी का ज्यादातर हिस्सा स्फटिक और अवसादी किस्म के शैल से आच्छादित है वहीं पूर्वी इलाका हाल में महानदी मुहाने में बनी कछारी मिट्टी से ढका है। महानदी घाटी की भूगर्भीय परतों की विविधता घाटी की जलगर्भीय संरचनाओं में भी परिलक्षित होती हैं। जलगर्भीय परतों की विविधता इस बात का संकेत है कि महानदी की घाटी में जलराशि की स्थितियाँ विषमता भरी होंगी।

महानदी बेसिन में बाढ़ प्रबंधन

Author: 
अनिल कुमार लोहनी, अनिल कुमार कार, मनोज गोयल
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011
महानदीमहानदीभारत के मुख्य बेसिन में से एक महानदी बेसिन पूर्वी भारत में स्थित है। इस बेसिन का कुल अपवाह क्षेत्र 141569 वर्ग कि.मी. है। इसमें छत्तीसगढ़ व उड़ीसा राज्य के बड़े भाग सम्मिलित हैं। यह बेसिन पूर्वी देशान्तर के 80.30। से 86.50। और उत्तरी अक्षांश के 19.20। से 23.35। तक के बीच स्थित है। महानदी बेसिन के मध्य भाग में एक बड़ा जलाशय हीराकुंड स्थित है। इस जलाशय का कुल अपवाह क्षेत्र 83400 वर्ग कि.मी. है। वास्तव में हीराकुंड के नीचे लगभग 50000 वर्ग कि.मी. की निचली धारा का भाग बाढ़ में सहयोग करता है।

इस भाग में किसी भी प्रकार की ऐसी प्रणाली का प्रयोग नहीं किया जाता जिससे बाढ़ की भविष्यवाणी की जा सके। इस भाग में तीन मुख्य सहायक नदियाँ टेल, लौंग और जीरा हैं। इनका अपवाह क्षेत्र क्रमशः 25045, 5128 व 2383 वर्ग कि.मी. है। टेल नदी का अपवाह क्षेत्र अधिक है। इसीलिए बाढ़ में इसका सहयोग सर्वाधिक होता है। वर्ष 2008 की बाढ़ भी इसी नदी के कारण आयी थी उस वर्ष इसने 33762 क्यूसेक का उच्च रिसाव पैदा किया था।

संरचनात्मक विधि से बाढ़ को रोकना काफी कठिन व अपर्याप्त होता है। बाढ़ से हो रही जान माल की भारी ताबाही को रोकने के लिए एक उच्च श्रेणी के माडल की आवश्यकता है, जो समय पर बाढ़ की भविष्यवाणी कर सके। प्रस्तुत अध्ययन में महानदी में बाढ़ की समस्याओं पर विस्तार से चर्चा की गई है और महानदी बेसिन में बाढ़ की समस्याओं को कम करने के लिए प्रयोग की जा रही विभिन्न बाढ़ प्रबन्धन विधियों पर भी प्रकाश डाला गया है।

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छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी महानदी

Author: 
प्रो. अश्विनी केशरवानी
Source: 
रचनाकार
महानदी का विहंगम दृश्यमहानदी का विहंगम दृश्यमानव सभ्यता का उद्भव और संस्कृति का प्रारंभिक विकास नदी के किनारे ही हुआ है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में नदियों का विशेष महत्व है। भारतीय संस्कृति में ये जीवनदायिनी मां की तरह पूजनीय हैं। यहां सदियों से स्नान के समय पांच नदियों के नामों का उच्चारण तथा जल की महिमा का बखान स्वस्थ भारतीय परम्परा है। सभी नदियां भले ही अलग-अलग नामों से प्रसिद्ध हैं लेकिन उन्हें गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, महानदी, ताप्ती, क्षिप्रा नदी के समान पवित्र और मोक्षदायी मानी गयी हैं। कदाचित् इन्हीं नदियों के तट पर स्थित धार्मिक स्
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http://www.rachanakar.org

महानदी के पानी का अध्ययन करने के लिए प्रोजेक्ट तैयार

Source: 
न्यूज आज डॉट इन
महानदीमहानदीरायपुर।29 अप्रैल।न्यूज़ आज: छत्तीसगढ़ व उड़ीसा के लाखों लोगों की प्यास बुझाने वाली महानदी के पानी की विषाक्तता का अध्ययन करने के लिए केंद्र सरकार एक प्रोजेक्ट तैयार कर रही है। राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार महानदी के पानी पर अध्ययन करने के लिए इतना बड़ा प्रोजेक्ट तैयार किया जा रहा है। कृषि और अन्य क्षेत्रों में नाइट्रोजन युक्त फर्टिलाइजर के उपयोग के कारण भूमि जल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ गई है। यह मानव शरीर और जीव जंतुओं के लिए दीर्घकाल में हानिकारक हैं। केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ अर्थ को प्रारंभिक जांच में महानदी के पानी में नाइट्रेट की मात्रा मि
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http://m.newsaaj.in

महानदी की संस्कृति

Source: 
शांति यदु
इस तरह से महानदी एक ओर देव संस्कृति को तो दूसरी ओर कृषि-संस्कृति को भी विकसित करने में सहायक है। जल ही जीवन का पर्याय है और महानदी में जल नहीं, बल्कि लोगों की जीवन धारा प्रवाहित हो रही है और सलिला के रूप में बिना किसी भेदभाव के एक माँ की तरह समस्त जीवधारियों को अपना तरल ममत्व लुटा रही है।

छत्तीसगढ़ में है नदियों का गुम्फन

Author: 
शांति यदु
हमारी भारतीय संस्कृति में अन्य प्राकृतिक उपादानों की तरह नदियों का भी अपना एक अलग विशेष महत्व है। वेद पुराणों में नदियों की यशोगाथा विद्यमान है। नदियाँ हमारे लिए प्राणदायिनी माँ की तरह हैं। नदियों के साथ हमारे सदैव से भावनात्मक संबंध रहे हैं औऱ हमने नत-मस्तक होकर उनके प्रति अपनी श्रद्धा व आस्था प्रकट की है। नदियाँ केवल जल-प्रदायिनी एवं मोक्षदायिनी ही नहीं हैं, बल्कि संस्कारदायिनी भी हैं। नदियाँ विश्व की माताओं की तरह हैं। जिस तरह शिशु माँ के सान्निध्य में अँगुली पकड़कर चलना सीखता है। उसी तरह नदियों के बहते जल का वेग हमें जीवन के हर मोड़ पर गतिशील बने रहने का संदेश देता है। माँ के ममत्व से जिस तरह बच्चे तृप्त होते हैं, उसी तरह पावन नदियों का जल ग्रहण कर हम अपनी तृषा की तृप्ति करते है

महानदी नदी

महानदी उपग्रह से लिया गया चित्रमहानदी उपग्रह से लिया गया चित्र छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा अंचल की सबसे बड़ी नदी है। प्राचीनकाल में महानदी का नाम चित्रोत्पला था। महानन्दा एवं नीलोत्पला भी महानदी के ही नाम हैं। महानदी का उद्गम रायपुर के समीप धमतरीजिले में स्थित सिहावा नामक पर्वत श्रेणी से हुआ है। महानदी का प्रवाह दक्षिण से उत्तर की तरफ है। सिहावा से निकलकर राजिम में यह जब पैरी और सोढुल नदियों के जल को ग्रहण करती है तब तक विशाल रुप धारण कर चुकी होती है। ऐतिहासिक नगरी आरंग और उसके बाद सिरपुर में वह विकसित होकर शिवरीनारायण में अपने नाम के अनुरुप महानदी बन जाती है। महानदी की धारा इस धार्मिक स्थल से मुड़ जाती है और दक्षिण से उत

महानदी की संस्कृति

Author: 
शांति यदु
इस तरह से महानदी एक ओर देव संस्कृति को तो दूसरी ओर कृषि-संस्कृति को भी विकसित करने में सहायक है। जल ही जीवन का पर्याय है और महानदी में जल नहीं, बल्कि लोगों की जीवन धारा प्रवाहित हो रही है और सलिला के रूप में बिना किसी भेदभाव के एक माँ की तरह समस्त जीवधारियों को अपना तरल ममत्व लुटा रही है।