मुझे गंगा की जीत पर यकीन है

Author: 
सुधीर कुमार पांडेय
Source: 
दैनिक जागरण, 6 मई, 2018

यमुना की जंग जीतकर हम दुनिया में संकट में पड़ी नदियों को जीवन दे सकते हैं। मगर इसके लिये सबसे पहले अपनी आत्मा के पास जाना होगा। यमुना की जीत इस बात से दर्ज होगी कि आपने दिल्ली में नालों का गिरना रोक दिया है। कुछ लोग कहते हैं कि यह असम्भव है, लेकिन अहमदाबाद ने ऐसा कर दिखाया। मल-जल संयोजन कैसे करना है, वहाँ जाकर देख लीजिये। अपना कचरा नदियों में डाल दो? नई दिल्ली। गंगा की गठरी उठाये घूम रहा हूँ। बार-बार पराजित होता हूँ और पीठ की धूल झाड़कर जख्म सहलाता खड़ा होने की कोशिश करता हूँ... और फिर ललचाई निगाहों से आपकी ओर देखता हूँ। गंगा मिट्टी बदलती है और समय की मिट्टी भी वही बदलेगी। गंगा जीतेगी और यमुना भी...।

नदियों को बचाने निकल पड़े एक कवि का यह यकीन केवल कविताओं तक सीमित नहीं है। उसने नदियों को नजदीक से देखा है और अब तो नदियों का किनारा ही उसका बसेरा है। उसने नदियों के लिये माया नगरी छोड़ी और घर भी।

निलय उपाध्याय का नदियों के लिये यह समर्पित प्रेम अनूठा है, औरों को प्रेरणा देता है। गंगा को नजदीक से जानने के लिये उन्होंने गंगोत्री से गंगा सागर तक साइकिल से यात्रा की। नदियों से नाता इस कदर जुड़ा कि उनके किनारे ही अपना निलय (आवास) बना लेते हैं।

गंगोत्री से गंगा सागर तक, पॉपकॉर्न विद परसाई, यमुना का हत्यारा कौन, मुम्बई की लोकल और पहाड़ जैसी प्रसिद्ध पुस्तकों के लेखक निलय अब नदियों के साथ रहते हैं। इलाहाबाद में संगम तट और दिल्ली में यमुना किनारे भी रुके। दिल्ली में यमुना की दुर्दशा देखी, उसकी सिसकियाँ सुनीं। इस समय पटना में हैं और नाला रोको पानी छोड़ो, जल-चक्र से नाता जोड़ो अभियान छेड़ रखा है।

संकट से निपटना ही होगा

Author: 
अभिषेक कुमार
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 5 मई 2018

यमुना के सूखने से बढ़ता जल संकटयमुना के सूखने से बढ़ता जल संकट (फोटो साभार - इण्डियन एक्सप्रेस)नदियों- झीलों की पहचान पानी से है। नदियों को देखें तो कुछ नदियाँ, सदानीरा हैं, जिनमें हमेशा पानी रहता है,कुछ ऐसी हैं, जिनमें किसी मौसम विशेष में पानी आता है। गंगा-यमुना जैसी नदियाँ सदानीरा हैं, थोड़ी-बहुत घट-बढ़ के साथ उनमें पानी का ऐसा अकाल नहीं पड़ता कि लोग त्राहि-त्राहि करने लगें। लेकिन अब ये हालात बदलते दिख रहे हैं।

इधर यमुना सूख रही है, जिससे दिल्ली और हरियाणा में जल संकट पैदा हो रहा है। उधर, निचले इलाकों में गंगा का पानी भी तट छोड़ गया है। बनारस के घाट गंगा का प्रवाह सिकुड़ जाने के कारण सूने नजर आने लगे हैं। यमुना का जल संकट देश की राजधानी के अलावा हरियाणा और यूपी के लिये भी दिक्कतें पैदा करने वाला है।

हाल में ( 2 मई, 2018) हालात ये हुए कि हथनी कुण्ड बैराज से यमुना का जल-स्तर घटकर मात्र 1348 क्यूसेक रह गया, जिसके चलते उत्तर प्रदेश को पानी की सप्लाई बन्द करनी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की वजह से दिल्ली को 352 क्यूसेक पानी की सप्लाई यमुना से की जा रही है और दिल्ली इसकी मात्रा लगातार बढ़ाने की माँग करता रहा है। पर समस्या यह है कि जिस हरियाण से उसे यमुना का पानी मिलना चाहिये, वह खुद संकट में है।

जलमंत्री कपिल मिश्रा को भी लगा राजरोग


वर्ल्ड कल्चरल फेस्टिवल का पोस्टरवर्ल्ड कल्चरल फेस्टिवल का पोस्टरपरसों खबर मिली कि विशेषज्ञ समिति ने माना है कि श्री श्री रविशंकर द्वारा गत वर्ष यमुना पर किये आयोजन के कारण यमुना की क्षति हुई है। कल खबर मिली कि दिल्ली के जलसंसाधन मंत्री श्री कपिल मिश्रा ने विशेषज्ञ समिति के निष्कर्षों का मजाक ही नहीं उड़ाया, बल्कि श्री श्री को पुनः यमुना तट पर आयोजन हेतु आमंत्रित भी किया है। मजाक भी किसी प्राइवेट लिमिटेड विशेषज्ञ समिति का नहीं, बल्कि खुद भारत सरकार के जलसंसाधन मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञ समिति का उड़ाया गया है।

दुखद भी, अविश्वसनीय भी


मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि पर्यावरण विशेषज्ञ समिति का मजाक उड़ाने वाला यह शख्स वही है, जिसे मैंने पर्यावरण के जाने-माने विशेषज्ञ स्व. श्री अनुपम मिश्र की अन्तिम संस्कार के मौके पर गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान से लेकर निगम बोध घाट तक हर जगह घंटों हाथ बाँधे खड़ा देखा था।

गंगा-यमुना जैसा अधिकार नर्मदा को क्यों नहीं


नर्मदा नदीनर्मदा नदीहाल ही में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने देश की गंगा-यमुना नदियों को जीवित इकाई मानते हुए इन्हें वही अधिकार दी है, जो एक जीवित व्यक्ति को हमारे संविधान से स्वतः हासिल हैं। इससे पहले न्यूजीलैंड की नदी वांगानुई को भी ऐसा ही अधिकार मिल चुका है। हालांकि यह नदी वहाँ के माओरी अदिवासी समुदाय की आस्था की प्रतीक रही है और वे लोग इसे बचाने के लिये करीब डेढ़ सदी से संघर्ष कर रहे थे। 290 किमी लम्बी यह नदी अपना अस्तित्व खोती जा रही थी। बेतहाशा खनन और औद्योगिकीकरण से नदी के खत्म होने का खतरा बढ़ गया था। यहाँ की संसद ने इसके लिये बाकायदा माफी माँगते हुए कानून बदला और अन्ततः इसे जीवित इंसान की तरह का दर्जा देकर इसे प्रदूषण से बचाने की दुनिया में अपनी तरह की अनूठी पहल की।

अब न्यायालय से गंगा-यमुना को जीवित इकाई मान लिये जाने के फैसले के बाद देश के नदियों, विविध जलस्रोतों और उसके पर्यावरणीय तंत्र से जुड़े जंगल, पहाड़ और तालाबों को भी इसी तरह की इकाई मानकर उन्हें प्रदूषण से बचाने की माँग जगह-जगह से उठने लगी है। खासतौर पर मध्य प्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा को भी यह दर्जा देने की माँग को लेकर कई जन संगठन सामने आये हैं।

नदी बनी इंसान बदलेगी पहचान

Author: 
भरत शर्मा
Source: 
दैनिक जागरण, 26 मार्च, 2017

उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में हमारी जीवनदायिनी गंगा और यमुना नदियों को जीवित इंसान का दर्जा दिया है। संविधान में जिस तरीके के अधिकार किसी भारतीय नागरिक को प्राप्त हैं, अब ये नदियाँ भी उन अधिकारों के बूते अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ सकेंगी। इनको बीमार करने या मारने की कोशिश करने वालों के खिलाफ किसी जीवित व्यक्ति को मारने या ऐसी कोशिश के आरोप में मुकदमा चलाया जा सकेगा। इन पर अत्याचार के मामलों में मानवाधिकार का दरवाजा भी खटखटाया जा सकता है। गंगा और यमुना देश की पवित्र नदियों में से एक हैं। प्रत्येक भारतीय के दिल में इनका विशेष स्थान है। विभिन्न संस्कृतियों के समावेश से बने इस देश में इन नदियों का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व है। दुर्भाग्यवश पिछले कई दशकों से ये अवहेलना का शिकार हैं। बढ़ती आबादी ने इनकी दुर्दशा कर दी है। अशोधित सीवेज नदियों में प्रदूषण की प्रमुख वजह बन गया है। सॉलिड वेस्ट, औद्योगिक कचरा, कृषि रसायन और पूजा पाठ की सामग्री नदियों में प्रदूषण के स्तर को बढ़ा रही है। सूखे महीनों में ये कचरा नदियों के प्रवाह को अवरुद्ध कर देता है। गंगा के आस-पास बसे इलाकों में उत्पन्न होने वाले दूषित पानी में से केवल 26 फीसद का शोधन होता है बाकी सीधे नदी में छोड़ दिया जाता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक 138 नालों के जरिए रोजाना छह अरब लीटर दूषित पानी गंगा में छोड़ा जा रहा है। देश की तकरीबन 25 करोड़ आबादी खुले में शौच करती है। इससे सीधे तौर पर लोगों की सेहत पर खतरा मँडरा रहा है। और तो और इससे बड़े स्तर पर जल भी प्रदूषित हो रहा है।

एक नदी के ‘इंसान’ होने के मायने

Author: 
सुशील कुमार

यमुना नदीयमुना नदीविश्व जल दिवस 2017 से दो दिन पूर्व उत्तराखण्ड हाईकोर्ट का नदियों के सम्बन्ध में आया फैसला काफी महत्त्वपूर्ण है। हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले में गंगा, यमुना तथा उसकी सहायक नदियों को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया है। न्यायालय का ऐसा करने का अर्थ बिलकुल स्पष्ट है, वह नदियों को जीवित के समान अधिकार देकर लोगों से इन नदियों के प्रति मनुष्यों के समान व्यवहार करने की अपेक्षा रखती है।

आधुनिक पूँजीवादी युग ने नदी, पानी, तथा अनाज जैसी दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर अपना नियंत्रण कर लिया है। ये वर्ग अपने निजी लाभ के लिये बड़े पैमाने पर प्रकृति को नुकसान पहुँचा रहे हैं। पहाड़ से लेकर रेगिस्तान तक का प्राकृतिक असन्तुलन बिगाड़ने में पूँजीवादी वर्ग जिम्मेदार हैं। नदियों में बढ़ता प्रदूषण का स्तर, जंगलों का विनाश, पहाड़ों पर तोड़-फोड़ इनमें प्रमुख हैं।

स्पर्श के लायक भी नहीं रहा यमुना का पानी

Author: 
प्रमोद भार्गव

वर्तमान स्थितियों में प्रदूषण सम्बन्धी तमाम रिपोर्टों के बावजूद यमुना दिल्ली में 25 किलोमीटर और आगरा में 10 किमी लम्बे नालों में तब्दील हो चुकी है। अकेली दिल्ली में अनेक चेतावनियों के बावजूद प्रतिदिन 3296 मिलियन गैलन लीटर गन्दा पानी और औद्योगिक अवशेष विभिन्न नालों से यमुना में उड़ेले जा रहे हैं। करीब 5600 किमी लम्बी सीवर लाइनों से मल-मूत्र बहाया जा रहा है। हालांकि 17 स्थलों पर 30 सीवर ट्रीटमेंट प्लांट क्रियाशील हैं, लेकिन उनकी गन्दे मल को स्वच्छ जल में परिवर्तित करने की दक्षता सन्दिग्ध है। इसे देश और नदियों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हमारी जीवनदायी नदियों का पानी अछूत होता जा रहा है। यमुना नदी के पानी की जो ताजा रिपोर्ट आई है, उसके अनुसार नदी जल में अमोनिया की मात्रा इस हद तक बढ़ गई है कि उसे छूना भी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

यह रिपोर्ट जल संस्थान आगरा ने दी है। इस पानी में अमोनिया की मात्रा खतरे के स्तर को पार कर चुकी है। इस कारण फरवरी 2016 को दिल्ली के वजीरावाद और चंदावल जल शोधन संयंत्रों को दो दिनों के लिये बन्द भी कर दिया गया था। दरअसल दिल्ली क्षेत्र में यमुना में अमोनिया की मात्रा 1.12 पार्टिकल्स पर मिलियन (पीपीएम) तक पहुँच गई थी, जबकि पानी में अमोनिया की मात्रा शून्य होनी चाहिए।

एक नदी की व्यथा-कथा

Author: 
विवेक भटनागर
Source: 
दैनिक जागरण, 09 अक्टूबर, 2016

दिल्ली और यमुना का नाता बहुत पुराना है। पौराणिक नदी यमुना ने जिस दिल्ली को जन्म दिया, उसके ही बाशिंदों ने यमुना को बदहाली की कगार पर पहुँचा दिया है। पूजा मेहरोत्रा की यह पुस्तक यमुना के दर्द को शिद्दत से बयाँ करती है…

दिल्ली में प्रदूषित यमुना जिस नदी के किनारे श्रीकृष्ण ने बाल गोपालों के साथ बाललीला की, गोपियों के संग रासलीला की, जिस नदी के प्रति लोगों के मन में श्रद्धा है, वही पौराणिक नदी यमुना आज सिसक रही है। इसके प्रदूषण का स्तर खतरनाक तरीके से बढ़ गया है। जिस नदी में कालिया नाग के होने की मिथकीय कथा है, उसमें मछलियों समेत तमाम जल-जीवों का अस्तित्व संकट में है। पौराणिक मान्यताओं में जिस नदी में आचमन मात्र कर लेने से सारे पाप धुल जाने का उल्लेख है, अब आलम यह है कि उसी नदी की गन्दगी को धोने की आवश्यकता है। नाले में तब्दील होती जा रही यमुना के दर्द को शिद्दत से महसूस किया है पत्रकार पूजा मेहरोत्रा ने। उन्होंने पर्याप्त शोध करके यमुना की गाथा को प्रस्तुत किया है पुस्तक ‘मैं यमुना हूँ मैं जीना चाहती हूँ’ में। श्रद्धालुओं की अन्ध-आस्था को भी पूजा ने निशाना बनाया है। उन्होंने कहा है कि यमुना से गुजरते हुए हम उसकी तरफ सिक्के उछाल देते हैं, उसमें फूल और अन्य कचरा डाल देते हैं, जबकि यमुना को पैसों या अन्ध-श्रद्धा की जरूरत नहीं, उसे स्वच्छ रखने की इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

यमुना की सफाई गंगा की स्वच्छता की दिशा में कारगर कदम

Author: 
गीता चतुर्वेदी

.पर्यावरणविदों की बरसों से माँग थी कि सहायक नदियों को साफ किये बिना गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता। देर से ही सही, जल संसाधन मंत्रालय को भी यह बात समझ में आई है। गंगा की सबसे बड़ी और पौराणिक नदियों में तीन का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। कान्हा के बचपन की अठखेलियों, किशोरावस्था की खेली क्रीड़ाओं और गोपियों के संग रास को लेकर यमुना जन-जन में विख्यात है।

गंगा की दूसरी सहायक नदी घाघरा है। त्रेता युग के प्रतापी अयोध्या राज के शासक रघुवंश की संस्कृति की यह नदी गवाह रही है। हिन्दुओं के आराध्य राम की क्रीड़ा स्थली रही घाघरा- जिसे जन-जन सरयू के रूप में जानता है, संयोगवश अभी वैसी प्रदूषित नहीं है।

उस पर कोई बड़ा बाँध भी नहीं है। लिहाजा उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा पर जब वह गंगा में विलीन होती है टिहरी के बाद से कृषकाय बन चुकी गंगा में नया आवेग आता है और यहीं से उसका प्रदूषण भी कम होता है। गंगा की तीसरी बड़ी सहायक नदी गंडक है। इनमें सबसे ज्यादा बुरी हालत में यमुना है। इसके बावजूद भाई दूज पर हर साल उत्तर प्रदेश स्थित कृष्ण जन्मभूमि मथुरा में स्नान के लिये लाखों लोग आते हैं।

यमुना के किनारे स्थित वृंदावन में तो रोजाना ही देशी-विदेशी तीर्थ यात्रियों का जनसमुद्र आता ही रहता है। बेशक मथुरा में कुछ लोग यमुना में स्नान कर लेते हैं, लेकिन वृंदावन में तो भूले-भटके ही लोग यमुना में डुबकी लगाते हैं। यमुना मैली तो यहाँ भी है, लेकिन वह सबसे ज्यादा बुरी हालत में देश की राजधानी दिल्ली के नजदीक नजर आती है।