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जल संसाधन की समस्यायें

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल संसाधन की समस्यायें
बाढ़ एवं जल जमाव :
बाढ़ :



‘‘Flood is a discharge which exceeds the natural channel capacity of a river and then spills on to the adjacent flood plain’’

नदियों की बाढ़ एक प्राकृतिक घटना है। बाढ़ से जनपद में चंबल, यमुना, क्वारी, सेंगर, अहनैया, पुरहा आदि नदियों के किनारों की भूमि डूब जाती है। कछारी क्षेत्र की फसलें नष्ट हो जाती हैं एवं यातायात अवरुद्ध हो जाता है। धन-जन की हानि होने से जनपद की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

सामान्यत: लगभग पाँच या दस वर्ष तक के अंतराल से जनपद की नदियों में बाढ़ आने का इतिहास है। सन 1996 की बाढ़ इतनी भयानक थी कि कानपुर से ग्वालियर राष्ट्रीय राजमार्ग बंद करना पड़ा था। चंबल नदी पर बने ‘बरई पुल’ एवं यमुना नदी पर बने इटावा पुल पर यातायात बंद कर दिया गया था। जनपद के लगभग सभी छोटे-छोटे पुल टूट गये थे। छोटे पुलों की निर्माण सामग्री तीव्र बहाव में बह गयी थी। इस वर्ष प्रभावित गाँवों की संख्या 154 थी। बहुत से गाँवों के संपर्क मार्ग जल में डूब जाने के कारण अनेक समस्यायें उत्पन्न हो गयीं। सरकार ने नौका आदि का प्रबंध किया, जो पर्याप्त नहीं था। बाढ़ से घिरे लोगों को 40000 हजार रुपये की खाद्य सामग्री डाली गयी। इस बाढ़ में 8 लोगों की मौत हो गयी। अनेक जानवर पानी के तेज बहाव के साथ बह गये। नदियों की तलहटी में बसे गाँवों के अंदर पानी भर गया जिसमें सैकड़ों घर पानी से डूब गये। कछारों में पानी भर जाने से फसल नष्ट हो गयी। बाद में बाढ़ पीड़ितों को भोजन वस्त्र एवं आवास व्यवस्था हेतु जिलाधीश इटावा द्वारा लगभग 11 लाख रुपये वितरित किये गये, जो पर्याप्त नहीं थे। जिलाधीश कार्यालय इटावा के एक अनुमान के अनुसार लगभग 20 लाख रुपये की खरीफ की फसलें नष्ट हो गयीं। 12 लाख रुपये के मकानों की एवं लगभग 50 हजार रुपये की पशुधन की हानि हुई। लगभग 5 लाख रुपयों के पुलों एवं सड़कों की क्षति हुई।

जल संसाधन का कृष्येत्तर क्षेत्रों में उपयोग

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

पेयजल के क्षेत्र में :


स्वच्छ एवं पर्याप्त पेयजल की उपलब्धता स्वस्थ मानव और सभ्य समाज की न केवल आधारभूत आवश्यकता है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का मूलभूत अधिकार भी है। हमारे संविधान में पेयजल की आपूर्ति विषयक प्राविधान सातवीं अनुसूची के भाग-दो में देते हुए इसे राज्य सरकारों के दायित्वों के अंतर्गत राज्य का विषय रखा गया है। प्रत्येक जनपद की सीमा के अंतर्गत सभी शहरी एवं नगरीय बस्तियों में शुद्ध एवं पर्याप्त पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित करना संबंधित राज्य सरकारों का दायित्व है तथा केंद्र सरकार राज्य सरकार द्वारा किये गये तत्संबंधी प्रयासों के लिये आर्थिक सहायता प्रदान करती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सामान्यत: शहरी क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु व्यापक प्रयास किये गये, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की ओर सरकार द्वारा यथोचित ध्यान देना बाद में प्रारंभ किया गया। अत: शहरी क्षेत्रों की तुलना में हमारे ग्रामीण क्षेत्र शुद्ध पेयजल की आपूर्ति में पिछड़े रहे हैं। पिछले दो तीन दशकों में ग्रामीण क्षेत्र में सभी ग्राम वासियों को पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये विभिन्न पेयजल योजनाओं एवं कार्यक्रमों को प्रभावपूर्ण तरीकों से संचालित किया जा रहा है।

मनुष्य के पीने, खाना बनाने, स्नान करने, बर्तनों की सफाई एवं घर की धुलाई तथा शौच व्यवस्था आदि हेतु जल की आवश्यकता होती है। परिणामत: शुद्ध एवं स्वच्छ जल के स्रोत सदैव से मानव आकर्षण के केंद्र रहे हैं। घरेलू कार्यों में जल के उपयोग की मात्रा यद्यपि तुलनात्मक रूप से कम है, फिर भी जल के इस उपयोग का महत्त्व अत्यधिक है। जनपद के निवासी तम्बू, झोपड़ी, कच्चे पक्के छोटे बड़े मकान बनाकर जलस्रोतों के सहारे ग्राम तथा नगरों में निवास कर रहे हैं। इस क्षेत्र में परिवार के रहन-सहन का स्तर तथा ग्रामीण नगरीय बस्तियों के अनुसार जलापूर्ति प्रतिरूप में प्रर्याप्त भिन्नता मिलती है। जो निम्नांकित वर्णन से स्पष्ट है।

ग्रामीण बस्तियों में जल का उपयोग :

लघु बाँध सिंचाई

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

प्रकृति ने प्राकृतिक संसाधन के रूप में अनेक निधियाँ प्रदान की हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों में जल सबसे बहुमूल्य है। पानी का प्रयोग प्राणीमात्र, मनुष्य, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ सभी करते हैं, इसीलिये जल को जीवन का आधार कहा गया है।

अध्ययन क्षेत्र में कूप एवं नलकूप सिंचाई

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल जीवन का आधार है। जल का सर्वाधिक उपभोग कृषि क्षेत्र में होता है। जो उसे कृत्रिम एवं प्राकृतिक साधनों द्वारा प्राप्त होता है। वर्षा के अभाव में कृत्रिम साधनों द्वारा खेतों को जल उपलब्ध कराया जाता रहा है। भाराीय वर्षा पूर्णत: मानसून से प्राप्त होती है, जो अनिश्चित, अनियमित तथा असामयिक होने के साथ-साथ विषम भी है। अत: कृषि के लिये सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। भारत में प्राचीन काल से ही सिंचाई के लिये कृत्रिम साधनों का प्रयोग होता आ रहा है। सिंचाई के लिये जल दो रूपों में प्राप्त होता है। धरातलीय जल तथा भूमिगत जल किंतु वायु की तरह जल यथेष्ठ मात्रा में उपलब्ध नहीं है। विभिन्न उपयोगों के लिये शुद्ध जल की आवश्यकता पड़ती है, जिसका प्रमुख स्रोत भूमिगत जल है। यह जलराशि धरातल के नीचे पाई जाती है। धरातलीय जल प्रवेश्य चट्टानों में निरंतर नीचे की ओर रिसता रहता है। वर्षा काल में जब धरातल पर जल की मात्रा बढ़ जाती है, जल का रिसाव भी बढ़ जाता है। इसके कारण बड़ी मात्रा में जल नीचे चला जाता है। फलत: भूमि के नीचे जल का स्तर ऊँचा हो जाता है। कूपों और नलकूपों के माध्यम से इस जल का उपयोग कर लेते हैं।

कूप एवं नलकूप ऐसे कृत्रिम साधन हैं, जिससे भूमिगत जल को बाहर निकाला जाता है। इस जल का उपयोग विभिन्न कार्यों में किया जाता है, जिनमें सिंचाई भी एक है। भारत में कूप एवं नलकूप सिंचाई के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। वर्तमान समय में इन दोनों साधनों के सम्मिलित योगदान से 55.90 प्रतिशत भू-भाग सींचा जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश में कूप एवं नलकूप 70.47 प्रतिशत क्षेत्र को सिंचन क्षमता उपलब्ध कराते हैं। कूप एवं नलकूप सिंचाई साधनों की अपनी अलग-अलग विशेषतायें हैं।

कूप


कूप भूमिगत जल निकालने का एक परंपरागत साधन है। इसका उपयोग प्राचीन काल से चला आ रहा है। भारत में कूपों की सहायता से कुल सिंचित भूमि के लगभग 22.47 प्रतिशत भाग में सिंचाई की जाती है। कुओं द्वारा वहीं सिंचाई की जाती है, जहाँ इनके निर्माण के लिये निम्न भौगोलिक दशाएँ अनुकूल हों।

अध्ययन क्षेत्र में नहर सिंचाई

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सिंचाई की अत्याधिक आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि यहाँ मौसमी वर्षा होने के कारण वर्ष भर मिट्टी में नमी संचित नहीं रह पाती है। यहाँ वर्षा की अनिश्चितता पाई जाती है, तथा वर्षा का वितरण भी सर्वत्र एक समान नहीं होता है। उष्ण उपोष्ण कटिबंध में स्थित होने के कारण जल का वाष्पीकरण अधिक होता है। इन परिस्थितियों में बिना सिंचाई किये फसलों का अच्छा उत्पादन करना संभव नहीं हो पाता है। यहाँ पर्याप्त मात्रा में जल बहुत थोड़े भाग को मिलता है, जबकि बहुत बड़ा क्षेत्र कम वर्षा से प्रभावित है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई किये अच्छा उत्पादन प्राप्त नहीं किया जा सकता। वर्तमान समय में तेज गति से बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण के लिये गहन कृषि की अत्यधिक आवश्यकता है। अत: गहन कृषि एवं जनपद के समुचित विकास के लिये सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य हो गयी है। सिंचाई स्रोतों में नहर सिंचाई सबसे सुलभ एवं सस्ता साधन है। अध्ययन क्षेत्र में सबसे अधिक क्षेत्र पर नहरों द्वारा सिंचाई की जाती है।

नहरों का वितरण एवं उनमें जल की उपलब्धता :

अध्ययन क्षेत्र में कृषि आयाम

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

भूमि उपयोग एवं जल संसाधन एक दूसरे के पूरक हैं, अत: जल संसाधन की उपलब्धता के अध्ययन के संबंध में भूमि उपयोग का अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है। भूमि उपयोग के प्रतिरूप का प्रभाव धरातलीय जल के पुनर्भरण पर पड़ता है। वन, झाड़ियों, उद्यानों, फसलों एवं घास के मैदानों द्वारा भूमि आच्छादित रहती है। भूमिगत जल के रिसाव को प्रभावित करने में वाष्पन एवं वाष्पोत्सर्जन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। भूमि उपयोग का अध्ययन हम निम्न बिंदुओं में करते हैं।

भूमि उपयोग प्रतिरूप :


भूमि उपयोग भौगोलिक अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। वास्तविक रूप में भूमि उपयोग शब्द स्वत: वर्णात्मक है। परंतु प्रयोग पारस्परिक शब्द उपयोग तथा भूमि संसाधन उपयोग के अर्थ की व्याख्या में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। फॉक्स के अनुसार - भूमि उपयोग, के अंतर्गत भू-भाग प्राकृत प्रदत्त विशेषताओं के अनुरूप रहता है। इस प्रकार यदि कोई भू-भाग प्राकृत मानवीय प्रभाव से वंचित है अथवा उसका उपयोग प्राकृतिक रूप से हो रहा है, तो उस भाग के लिये ‘‘भूमि प्रयोग’’ शब्द का प्रयोग उचित होगा। यदि किसी भू-भाग पर मानवीय छाप अंकित है या मानव अपनी आवश्यकता के अनुरूप उपयोग कर रहा है तो उस भू-भाग के लिये भूमि उपयोग शब्द का योग अधिक उचित होगा। इस प्रकार मानव के उपयोग के साथ भूमि संसाधन इकाई बन जाती है। जब भू-भाग का प्राकृतिक रूप लुप्त हो जाता हैं तथा मानवीय क्रियाओं का योगदान महत्त्वपूर्ण हो जाता है, तो उसे भूमि उपयोग कहते हैं। किसी स्थान की भूमि जल संसाधन उपयोग को अनेक प्रकार से प्रभावित करती है, क्योंकि जिन स्थानों की भूमि समतल होती हैं, पेड़-पौधे अधिक होते हैं, जल का अधिक पुनर्भरण होता है। जबकि इसके विपरीत क्षेत्र जहाँ पर वर्षा के बाद पानी बहकर नदियों में चला जाता है, और जल स्तर काफी नीचे चला जाता है। अत: जल संसाधन की उपलब्धता के अध्ययन में भूमि उपयोग प्रारूप का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।

जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण


जल मानव जीवन की अत्यंत महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है, प्राणों की रक्षा के लिये वायु के बाद द्वितीय स्थान जल का है। जल मुख्यत: दो रूपों में प्राप्त होता है- 1. सतही जल 2. भूमिगत जल। सतही जल एवं भूगर्भिक जल एक ही जल पद्धति के भाग हैं, जो एक दूसरे से अंत: संबंधित हैं तथा एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। भारत में संपूर्ण वैश्विक जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, परंतु भारतीय उपमहाद्वीप की नदियों में औसत मासिक जल प्रवाह का मात्र 4 प्रतिशत जल प्राप्त होता है। यह भारत में जल की आवश्यकता से कम उपलब्धता का द्योतक है। चीन की नदियों में यही औसत जल प्रवाह 8 प्रतिशत है, जिसे भारत से 25 प्रतिशत अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण करना पड़ता है।

भौतिक वातावरण

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

अवस्थिति एवं सीमा :


इटावा जनपद पश्चिमी गंगा-यमुना मैदान का एक भाग है, जो उत्तर प्रदेश के कानपुर मंडल के पश्चिमी भाग का एक जनपद है। भौगोलिक दृष्टि से इसका विस्तार 26' 21'' उत्तरी अक्षांश से 27' 01'' उत्तरी अक्षांश, 68' 45'' पूर्वी देशांतर से 79' 20'' पूर्वी देशांतर के मध्य है। इस जनपद के पूर्व में औरैया, उत्तर-पूर्व में फर्रुखाबाद, दक्षिण में जालौन तथा मध्य प्रदेश का भिंड जनपद स्थित है। इसके उत्तर में मैनपुरी तथा पश्चिम में आगरा जनपद स्थित है। इटावा जनपद का भौगोलिक क्षेत्रफल 2705.39 वर्ग किलोमीटर है तथा 2001 की जनगणना के अनुसार इटावा जनपद की कुल जनसंख्या 1338871 है। इस जनपद में 686 आबाद ग्राम एवं 8 गैर आबाद ग्राम है।

प्रस्तावना : इटावा जनपद में जल संसाधन की उपलब्धता, उपयोगिता एवं प्रबंधन (Availability Utilization & Management of Water Resource in District Etawah)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

संकल्पनात्मक ढाँचा :


जलमण्डल पृथ्वी पारितंत्र का अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटक है। जीवनदायनी होने के कारण ‘जल ही जीवन है’ उक्ति अक्षरश: सत्य है। मानव एवं अन्य जीव जंतुओं व वनस्पति के लिये जीवन का आधार होने के कारण जल सबसे प्रमुख प्राकृतिक संसाधन है। अत: विश्व में अभी तक जितने प्रकार के प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं उनमें से जल का सर्वप्रमुख स्थान है। प्राचीन काल में तो जल को देवतुल्य ही माना जाता था। ऋग्वेद में कहा गया है ‘‘जल ही औषधि है’’ जल रोगों का शत्रु है, यह सब व्याधियों का नाश करता है। केवल मानव विज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म पौराणिक कथाओं तथा शास्त्रों में भी जल की महत्ता का वर्णन है। मानव की विभिन्न सभ्यताओं से स्पष्ट है कि जल पर मानव जीवन का अस्तित्व निर्भर है। इतिहासकारों के अनुसार महान प्राचीन सभ्यताएँ उन क्षेत्रों में, जहाँ वनस्पति वृद्धि अधिक थी, नहीं उत्पन्न हुई बल्कि तुलनात्मक दृष्टि से शुष्क क्षेत्रों में उत्पन्न हुई, जहाँ मानव जल नियंत्रित करने तथा विभिन्न मौसमों में नदियों से इष्टतम मात्रा में जल प्राप्त करने में समर्थ था।