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जलवायु परिवर्तन (Climate Change)

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सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एजुकेशन

जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन जलवायु परिवर्तन ऐसे दो शब्द हैं, जिनके बारे में आप इन दिनों अक्सर सुन रहे होंगे। आखिर इस विषय पर इतनी चर्चा क्यों हो रही है? यह कुछ ऐसा विषय नहीं है जिसके लिये मौसम वैज्ञानिकों को चिन्ता करनी चाहिए? यह किस प्रकार से हमारे और आपके लिये चिन्ता का विषय है? हाँ! इसी बारे में हम मिलकर पता लगाएगे। यह पुस्तिका इसमें हमारी सहायता करेगी। आइए हम इनमें से प्रत्येक शब्द को समझते हुए आरम्भ करते हैं।

जलवायु क्या है?

एक कहावत के अनुसार जलवायु वह है जिसकी आप उम्मीद करते हैं; मौसम वह है जो कि हमें मिलता है। हम प्रायः ‘जलवायु’ एवं ‘मौसम’ शब्द में अन्तर नहीं कर पाते हैं। मौसम वह है जो रोज रात को टीवी पर दर्शाया जाता है जैसे विभिन्न स्थानों पर अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान, बादलों एवं वायु की स्थिति, वर्षा का पूर्वानुमान, आर्द्रता आदि। निर्धारित समय पर किसी स्थान पर बाह्य वातावरणीय परिस्थितियों में होने वाला परिवर्तन, मौसम कहलाता है।

जलवायु शब्द किसी स्थान पर पिछले कई वर्षों के अन्तराल में वहाँ की मौसम की स्थिति को बताता है।

लखनऊ महानगर: प्रदूषण नियंत्रण एवं पर्यावरण प्रबंध (Lucknow Metro-City: Pollution Control and Environmental Management)

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डॉ. आर.ए. चौरसिया
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शोध प्रबंध 'बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय पी.एच.डी. (भूगोल) उपाधि हेतु प्रस्तुत' भूगोल विभाग अतर्रा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अतर्रा (बांदा) 2001

लखनऊ महानगर प्रदूषण के विविध आयामों के अध्ययन, मूल्यांकन एवं नियंत्रण के उपायों पर पृथक-पृथक विश्लेषण किया गया है। लखनऊ महानगर में बढ़ते हुए बहुविधि प्रदूषण की स्थिति, प्रत्येक भूगोलवेत्ता एवं शोधकर्ता को नियंत्रण के उपायों एवं समुचित पर्यावरणीय प्रबंध के उपाय खोजने के लिये विवश करती है। लखनऊ महानगर की बढ़ती हुई जनसंख्या, विस्तृत होता आकार तथा पर्यावरणीय घटकों की सीमित क्षमता होने के कारण नगरीय जीवन को निरापद बनाए रखने के लिये प्रदूषण के वैज्ञानिक प्रबंधन एवं नियंत्रण की तात्कालिक एवं दीर्घकालिक आवश्यकता है। इसके लिये हमें सर्वप्रथम पर्यावरण प्रबंध का अर्थ परिभाषा एवं उसके दर्शन को सम्यक रूप से जान लेना चाहिए।

पर्यावरण प्रबंध का अर्थ एवं दर्शन


किसी भी प्रकार के प्रबंधन का उद्देश्य दीर्घकालिक एवं सार्वकालिक मानव कल्याण होता है। पर्यावरण प्रबंधन मानव अस्तित्व एवं उसके कल्याण से जुड़ी हुई एक अत्यंत जटिल प्रकिया है। चूँकि प्रत्येक नगर की भौगोलिक स्थिति, रचना एवं उसके विकास की दर भिन्न-भिन्न होती है। इसलिये पर्यावरण प्रबंधन की समुचित रणनीति का चयन एक कठिन कार्य होता है। अत: पर्यावरण प्रबंध का अर्थ एवं दर्शन जानने के पूर्व प्रबंधन का अर्थ जान लेना चाहिए।

प्रबंध का अर्थ (Meaning of Management) - प्रबंध का अर्थ है विविध वैकल्पिक सुझावों में से जागरूकता पूर्ण चयन जिसमें मान्य एवं वांछित लक्ष्यों के प्रति सोद्देश्य वचन बद्धता हो। प्रबंध के अंतर्गत वास्तविक लघुकालिक लक्ष्यों की पूर्ति हेतु निर्मित रणनीति अथवा रणनीतियों की सुविचारित स्वीकृति को सम्मिलित किया जाता है। इसमें दीर्घकालिक चयनों के संरक्षण के लिये पर्याप्त लचीलापन होना चाहिए।

लखनऊ महानगर: सामाजिक प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Social Pollution)

Author: 
डॉ. आर.ए. चौरसिया
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शोध प्रबंध 'बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय पी.एच.डी. (भूगोल) उपाधि हेतु प्रस्तुत' भूगोल विभाग अतर्रा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अतर्रा (बांदा) 2001

विकास प्रक्रिया में मानव ने प्रकृति के महत्त्व को अस्वीकार कर दिया परिणामत: मानव और प्रकृति के मध्य असंतुलन स्थापित हो गया। असंतुलन के परिणाम स्वरूप मानव की शारीरिक और मानसिक क्षमता का ह्रास हुआ, अत: उसके आचरण, विचार शैली और उत्तरदायित्व की भावना प्रदूषित हो गयी है। यह प्रदूषण समाज में निर्धनता, बेरोजगारी, जनसंख्या वृद्धि, अपराध, बाल अपराध, श्वेतवसन अपराध, मद्यपान एवं मादक द्रव्य व्यसन, छात्र असंतोष, वेश्यावृत्ति, आत्महत्या, भिक्षावृत्ति, आवासों की संकीर्णता, गंदीबस्तियों की समस्या, अशिक्षा, अस्वास्थ्यकर दशाएँ, श्रम समस्याएँ जातिवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद, आतंकवाद, भाषावाद, सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार, दहेज-प्रथा, बालविवाह, विवाह विच्छेद, बढ़ती हुई अनैतिकता तथा राष्ट्रीय चरित्र का अभाव आदि समस्याओं के रूप में देखने में आता है।

समाजशास्त्रीय विचारकों ने ऐसी सामाजिक दशा को सामान्यतया जीवन मूल्यों की दृष्टि से खतरे के रूप में देखा है रोब तथा सेल्जनिक1 ने सामाजिक समस्या को मानवीय सम्बन्धों से सम्बन्धित एक समस्या माना है, जो समाज के लिये एक गम्भीर खतरा पैदा करती है अथवा व्यक्तियों की महत्त्वपूर्ण आकांक्षाओं की पूर्ति में बाधाएँ उत्पन्न करती है।

“It is a problem in human relationship which seriously threatens society or impedes the important aspirations of many people.”

सामाजिक प्रदूषण का कारण जनसंख्या विस्फोट और औद्योगीकरण के परिणाम स्वरूप नगरीकरण में अति गतिशीलता आयी। परिणाम स्वरूप आज नगर समस्याओं के केंद्र बनकर रह गए हैं। स्वेडन के प्रकृति वैज्ञानिक के. करी लिण्डाल2 (K. Curri Lindall) ने ठीक कहा है –

The human population explosion is, in fact, the worst and basic from of pollution. All the major environmental problems that threaten the future of mankind are caused basically by one factor i.e, too many people.

लखनऊ महानगर: ध्वनि प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Noise Pollution)

Author: 
डॉ. आर.ए. चौरसिया
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शोध प्रबंध 'बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय पी.एच.डी. (भूगोल) उपाधि हेतु प्रस्तुत' भूगोल विभाग अतर्रा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अतर्रा (बांदा) 2001

किसी भी वस्तु से जनित श्रव्य तरंगों को ध्वनि कहते हैं। जब ध्वनि की तीव्रता अधिक हो जाती है, तथा वह कर्ण प्रिय नहीं रह जाती तो उसे शोर कहते हैं, अर्थात अधिक ऊँची ध्वनि को शोर कहते हैं। ऊँची ध्वनि या आवाज को जो मन में विक्षोभ उत्पन्न करे ध्वनि प्रदूषण कहते हैं। इस प्रकार उच्च तीव्रता वाली ध्वनि अर्थात अवांछित शोर के कारण मानव तथा समस्त जीव वर्ग में उत्पन्न अशांति एवं बेचैनी की दशा को ध्वनि प्रदूषण कहते हैं। हम ध्वनि की संज्ञा उसे देते हैं जो हमारी कर्णेन्द्रिय को सक्रिय करे। हमें अपने कानों और उसके उद्देश्य का ज्ञान तभी होता है जब ध्वनि उत्पन्न होती हैं। कानों द्वारा ग्रहण किए जाने पर मस्तिष्क उसका विश्लेषण कर हमें ध्वनि की प्रकृति का आभास कराता है अत: ‘‘ध्वनि कानों द्वारा ग्रहण की गयी तथा मस्तिष्क तक पहुँचाई गयी एक संवेदना है।’’

शोर ध्वनि प्रदूषण का प्रमुख अंग है। शोर मानव जनित एवं प्रकृति जनित दोनों प्रकार हो सकता है। प्राकृतिक ध्वनि प्रदूषण प्राकृतिक स्रोतों से उत्पन्न होता है यथा- बादलों की गर्जना , उच्चवेग की वायु, उच्च तीव्रता वाली वर्षा, उपलवृष्टि, जल प्रपात आदि। प्राकृतिक स्रोतों से उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण व्यापक छिटपुट, विपुल या विरल हो सकता है। कृत्रिम ध्वनि प्रदूषण मानव कार्यों द्वारा उत्पन्न तीव्रता वाली उच्च ध्वनि के कारण उत्पन्न होता है। इस प्रकार के कृत्रिम ध्वनि प्रदूषण को सामान्यतया मात्र ध्वनि प्रदूषण ही कहा जाता है।

लखनऊ महानगर: वायु प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Air Pollution)

Author: 
डॉ. आर.ए. चौरसिया
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शोध प्रबंध 'बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय पी.एच.डी. (भूगोल) उपाधि हेतु प्रस्तुत' भूगोल विभाग अतर्रा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अतर्रा (बांदा) 2001

पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति का कारण उसके चारों ओर गैसों का घेरा है जिसे वायुमंडल कहते हैं। ‘‘पृथ्वी को चारों ओर से घेरने वाले अभिन्न अंगभूत गैसों के लिफाफे को वायुमंडल की संज्ञा दी जाती है यह सैकड़ों मील की ऊँचाई तक विस्तृत है।’’

‘वायुमंडल’ शब्द यूनानी शब्द Atmos से बना है, जिसका अर्थ होता है वाष्प (Vapour) लेकिन फिर भी इसे वाष्पमंडल नहीं कह सकते, क्योंकि वायुमंडल में प्राप्त सभी गैसें वाष्पयुक्त नहीं होती है। अत: वायुमंडल के विषय में यह कहा जाता है कि पृथ्वी को चारों ओर से गैसों की एक चादर गुरुत्वाकर्षण शक्ति के द्वारा घेरे हुए है, जिसे वायुमंडल कहते हैं।

हमारा वायुमंडल अनेक प्रकार की गैसों का समिश्रण है। वायुमंडल में नाइट्रोजन (78.09%), ऑक्सीजन (20.99%), ऑर्गन (0.93%), कार्बनडाइऑक्साइड (0.032%), नियॉन (18.0 पीपीएम), हीलियम (5.2 पीपीएम), कार्बन मोनोऑक्साइड (0.25 पीपीएम), ओजोन (002 पीपीएम), सल्फर डाइऑक्साइड (0.001 पीपीएम), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (0.001 पीपीएम) आदि गैसें पाई जाती हैं। वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण क्रिया से मुक्त ऑक्सीजन के कारण स्थिर रहती है। परंतु पिछले 100 वर्षों में लगभग 24 लाख टन आॅक्सीजन वायुमंडल से समाप्त हो चुकी है तथा उसका स्थान 36 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड ले चुकी है।

वायु प्रदूषण : अर्थ एवं परिभाषा :


वायु प्रदूषण को परिभाषित करते हुए हेनरी एच. पार्किन्स1 (H. Parkins) ने कहा- ‘‘जब वायुमंडल में वाह्य स्रोतों से विविध प्रदूषक यथा- धूल, गैसें, दुर्गंध, धुंध, धुआँ और वाष्प आदि इतनी मात्रा में और अवधि में उपस्थित हो जाए कि उससे मानव स्वास्थ्य, सुखी जीवन और संपति को हानि होने लगे और जीवन की गुणवत्ता बाधित हो तो उसे वायु प्रदूषण कहते हैं।’’

लखनऊ महानगर: जल प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Water Pollution)

Author: 
डॉ. आर.ए. चौरसिया
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शोध प्रबंध 'बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय पी.एच.डी. (भूगोल) उपाधि हेतु प्रस्तुत' भूगोल विभाग अतर्रा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अतर्रा (बांदा) 2001

जल पर्यावरण का जीवनदायी तत्व है, जो जैवमंडल में विद्यमान संसाधनों में सर्वाधिक मुल्यवान है। जल मानव की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ भौतिक उन्नति में भी सहायक है। विद्युत उत्पादन, जल परिवहन, फसलों की सिंचाई, उद्योग धंधे, सफाई, सीवेज आदि के निपटान के लिये जल की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता होती है।

जल प्रदूषण के मुल्यांकन का आधार जल की गुणवत्ता में परिवर्तन है। जब जल का पीएच मान 7 से 8.5 पाया जाता है तो उसे शुद्ध जल कहा जाता है लेकिन जब पीएच मान 6.5 से कम या 9.2 से अधिक हो जाता है तो उसे प्रदूषित जल कहा जाता है। जल में निहित अपद्रव्यों की मात्रा से यह मान प्राप्ति किया जाता है। निर्धारित सीमा से अधिक या कम मानवाले जल को हानिकारक कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जल के अपद्रव्यों की सीमा निर्धारित करके जल की गुणवत्ता को जानने का एक औसत मापदंड प्रस्तुत किया है।

इस प्रकार ‘‘जल की भौतिक रासायनिक तथा जैवीय विशेषताओं में हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करने वाले परिवर्तन को जल प्रदूषण कहा जाता है।’’

विश्व स्वास्थ्य संगठन1 के अनुसार ‘‘प्राकृतिक या अन्य स्रोतों से उत्पन्न अवांछित बाहरी पदार्थों के कारण जल दूषित हो जाता है, तथा वह विषाक्तता एवं सामान्य स्तर से कम आॅक्सीजन के कारण जीवों के लिये हानिकारक हो जाता है तथा संक्रामक रोगों को फैलाने में सहायक होता है।’’

वाइवियर, पी.2 (Vivier. P.) के अनुसार ‘‘प्राकृतिक या मानव जनित कारणों से जल की गुणवत्ता में ऐसे परिवर्तनों को प्रदूषण कहा जाता है जो आहार, मानव एवं जानवरों के स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, मत्स्यन या आमोद-प्रमोद के लिये अनुपयुक्त या खतरनाक होते हैं।’’

साउथविक, सीएस3 (Southwick, C.S.) के अनुसार ‘‘मानव-क्रियाकलापों या प्राकृतिक जलीय प्रक्रियाओं से जल के रासायनिक भौतिक तथा जैविक गुणों में परिवर्तन को जल प्रदूषण कहते हैं।’’

लखनऊ महानगर: मृदा प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Soil Pollution)

Author: 
डॉ. आर.ए. चौरसिया
Source: 
शोध प्रबंध 'बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय पी.एच.डी. (भूगोल) उपाधि हेतु प्रस्तुत' भूगोल विभाग अतर्रा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अतर्रा (बांदा) 2001

मृदा, भूमि या मिट्टी प्रकृति का सर्वाधिक मूल्यवान संसाधन है। उपजाऊ मृदा क्षेत्र सदैव से मानव के आकर्षण केंद्र रहे हैं। नदी घाटी के उपजाऊ मृदा क्षेत्रों में ही सभ्यताओं का उदय हुआ और आज भी सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्रों में ही सर्वाधिक जनसंख्या निवास करती है। मृदा का उपयोग मुख्यतः कृषि कार्य के लिये होता है। यह मिट्टी हमारे जीवन के भरण पोषण से जुड़ी हुई है। मिट्टी का महत्त्व हमारे और समस्त जीव-जगत के लिये बहुत अधिक है। इसी महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए अथर्ववेद में ‘‘माता पृथ्वी पुत्रोऽहं पृथिव्या:’’ कहकर हमारे और पृथ्वी के सम्बन्धों की व्याख्या की गयी है। इसी पृथ्वी की ऊपरी सतह मृदा या मिट्टी के नाम से जानी जाती है। मृदा का वैज्ञानिक अध्ययन लगभग 200 वर्ष पहले प्रारम्भ हुआ था और आज मृदा विज्ञान का अध्ययन स्वतंत्र विज्ञान की सत्ता को प्राप्त कर चुका है।

मृदा की संरचना विविध शैलों के अपक्षय से हुई है। अपक्षय चक्र में समय चक्र के साथ मृदा पदार्थ का स्वरूप बदलता रहता है। इस प्रकार मृदा विकास प्रक्रिया में मृदा की एक विशिष्ट रूपा-कृति तैयार हो जाती है जिसे मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile) के नाम से जाना जाता है, जो किसी भी मिट्टी की स्वतंत्र पहचान एवं विलक्षणता है। मिट्टी विकास कालक्रमों के अनुसार कई संस्तरों में विभाजित हो जाती है। इन संस्तरों में मृदा का ऊपरी संस्तर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि यह उपजाऊ एवं कृषि कार्य में प्रयुक्त होता है। इस उपजाऊ पर्त के निर्माण में 3000 से 12000 वर्ष का समय लगता है1

JOFFe J.S2 के अनुसार ‘‘मिट्टियाँ, जंतु, खनिज एवं जैविक पदार्थों से निर्मित प्राकृतिक वस्तु होती है जिसमें विभिन्न मोटाई के विभिन्न मंडल होते हैं। मृदा के ये मंडल आकारकी, भौतिक एवं रासायनिक संगठन एवं जैविक विशेषताओं के दृष्टिकोण से निचले पदार्थों से अलग होते हैं।’’

पर्यावरण प्रदूषण की संकल्पना और लखनऊ (Lucknow Metro-City: Concept of Environmental Pollution)

Author: 
डॉ. आर.ए. चौरसिया
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शोध प्रबंध 'बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय पी.एच.डी. (भूगोल) उपाधि हेतु प्रस्तुत' भूगोल विभाग अतर्रा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अतर्रा (बांदा) 2001

पर्यावरण प्रकृति की सहज संरचना है। इस प्रकृति की स्वाभाविक दशा में हस्तक्षेप करके मनुष्य उसे प्रतिकूल बनाता है और प्रदूषण उत्पन्न करने में सहायक बनता है। वर्तमान समय में भौतिक सुख-सुविधाओं का भोगी मानव प्रदूषण की विभीषिका को दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक गहन और विस्तृत बनाता जा रहा है जिसकी परिणति विभिन्न प्रकार की नवीन बीमारियों का लगातार बढ़ता प्रकोप, संक्रामक रोगों का विस्तार, जलवायु परिवर्तन, वर्षा की अनियमितता, सूखा, बाढ़, अतिवृष्टि-अनावृष्टि, पृथ्वी का बढ़ता तापमान, समुद्र के जलस्तर की वृद्धि, तेजाबी वर्षा, ग्रीन हाउस प्रभाव, ओजोन छिद्र और वनस्पतियों एवं जीवों की विविध प्रजातियों का नष्ट होना है। जीव-जगत एवं प्रकृति के नि:शुल्क उपहार, लगातार संदूषित होते जा रहे हैं और उनके स्वस्थ रूपों का मनुष्य उपभोग नहीं कर पा रहा है, फलत: विविध प्रकार की बीमारियों से अस्वस्थ बनता जा रहा है। पर्यावरण का अपक्रम उसी समय से प्रारम्भ हो गया था, जबसे मनुष्य ने आग जलाना सीखा।

‘पर्यावरण’ : अर्थ एवं परिभाषा


‘पर्यावरण’ एक व्यापक शब्द है। इसके अंतर्गत सम्पूर्ण भौतिक परिवेश जलवायु, पेड़-पौधे, मिट्टी और प्रकृति के अन्य तत्व तथा जीव-जन्तु सम्मिलित हैं। जब पर्यावरण के सभी घटक पारस्परिक तालमेल नहीं रखते तो पारिस्थितिक असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। पर्यावरण के सभी तत्व प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से मानव स्वास्थ्य और मानव कल्याण को प्रभावित करते हैं।

‘‘पर्यावरण’’ शब्द ‘‘परि’’ और ‘‘आवरण’’ से मिलकर बना है, जिसमें सम्पूर्ण जड़ और चेतन सम्मिलित हैं। पृथ्वी के चारों ओर प्रकृति तथा मानव निर्मित समस्त दृश्य-अदृश्य पदार्थ पर्यावरण के अंग है। हमारे चारों ओर का वातावरण और उसमें पाये जाने वाले प्राकृतिक, अप्राकृतिक, जड़, चेतन सभी का मिला-जुला नाम पर्यावरण है और उसमें पारस्परिक ताल-मेल और अन्योन्य क्रिया व पारस्परिक प्रभाव को पर्यावरण संतुलन कहते हैं।

बिलासपुर जिले के जल का घरेलू, औद्योगिक एवं अन्य उपयोग (Domestic, Industrial and other uses of water in Bilaspur District)

Author: 
श्रीमती कावेरी दामड़कर
Source: 
शोध प्रबंध ‘बिलासपुर जिले में जल-संसाधन विकास : एक भौगोलिक अध्ययन (Water Resource Development in Bilaspur District : A geographical study)’, भूगोल विभाग, रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़

पेयजल आपूर्ति जल संसाधन का द्वितीय प्रमुख उपयोग है। बिलासपुर जिले की कुल जनसंख्या 2,95,336 व्यक्ति (1981) है, जो नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में आवासित है। पेयजल आपूर्ति की दृष्टि से जिले की जनसंख्या का 70 प्रतिशत आज भी पेयजल की समस्या से ग्रसित है। यद्यपि विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रशासन द्वारा पेयजल आपूर्ति की जा रही है तथापि जिले के 45 प्रतिशत ग्राम आज भी पेयजल की दृष्टि से समस्यामूलक है। नगरीय क्षेत्रों में विशेषतः जल संग्राहकों से दूर स्थित क्षेत्रों में, पानी का अभाव रहता है। साथ ही कई नगरीय क्षेत्रों में विशेषतः जल संग्रहकों से दूर स्थित क्षेत्रों में, पानी का अभाव रहता है। साथ ही कई नगरीय क्षेत्रों में जहाँ पेयजल आपूर्ति नदी से होती है। ग्रीष्म काल में जलस्रोत के सूख जाने के कारण जलाभाव की स्थिति रहती है।

ग्रामीण जल प्रदाय


बिलासपुर जिले के कुल 3,616 ग्रामों में पेयजल की परम्परागत व्यवस्था है। जिले के 3543 ग्रामों में ग्रीष्मावधि में एवं 10 ग्रामों में पेयजल की भीषण अभाव की स्थिति है। जिले की कुल ग्रामीण जनसंख्या 29,52,086 है एवं जल माँग 14,76,04,308 लाख लीटर है। विभिन्न साधनों से वर्तमान में जल आपूर्ति 1.03471 लाख घनलीटर है। जिले के लगभग 97.8 प्रतिशत ग्रामों में पेयजल की समस्या विद्यमान है।