Latest

इटावा जनपद के अध्ययन क्षेत्र में नहर सिंचाई (Canal irrigation in the study area of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सिंचाई की अत्याधिक आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि यहाँ मौसमी वर्षा होने के कारण वर्ष भर मिट्टी में नमी संचित नहीं रह पाती है। यहाँ वर्षा की अनिश्चितता पाई जाती है, तथा वर्षा का वितरण भी सर्वत्र एक समान नहीं होता है। उष्ण उपोष्ण कटिबंध में स्थित होने के कारण जल का वाष्पीकरण अधिक होता है। इन परिस्थितियों में बिना सिंचाई किये फसलों का अच्छा उत्पादन करना संभव नहीं हो पाता है। यहाँ पर्याप्त मात्रा में जल बहुत थोड़े भाग को मिलता है, जबकि बहुत बड़ा क्षेत्र कम वर्षा से प्रभावित है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई किये अच्छा उत्पादन प्राप्त नहीं किया जा सकता। वर्तमान समय में तेज गति से बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण के लिये गहन कृषि की अत्यधिक आवश्यकता है। अत: गहन कृषि एवं जनपद के समुचित विकास के लिये सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य हो गयी है। सिंचाई स्रोतों में नहर सिंचाई सबसे सुलभ एवं सस्ता साधन है। अध्ययन क्षेत्र में सबसे अधिक क्षेत्र पर नहरों द्वारा सिंचाई की जाती है।

नहरों का वितरण एवं उनमें जल की उपलब्धता :

इटावा जनपद के अध्ययन क्षेत्र में कृषि आयाम (Agricultural dimensions in the study area of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

भूमि उपयोग एवं जल संसाधन एक दूसरे के पूरक हैं, अत: जल संसाधन की उपलब्धता के अध्ययन के संबंध में भूमि उपयोग का अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है। भूमि उपयोग के प्रतिरूप का प्रभाव धरातलीय जल के पुनर्भरण पर पड़ता है। वन, झाड़ियों, उद्यानों, फसलों एवं घास के मैदानों द्वारा भूमि आच्छादित रहती है। भूमिगत जल के रिसाव को प्रभावित करने में वाष्पन एवं वाष्पोत्सर्जन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। भूमि उपयोग का अध्ययन हम निम्न बिंदुओं में करते हैं।

भूमि उपयोग प्रतिरूप :


भूमि उपयोग भौगोलिक अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। वास्तविक रूप में भूमि उपयोग शब्द स्वत: वर्णात्मक है। परंतु प्रयोग पारस्परिक शब्द उपयोग तथा भूमि संसाधन उपयोग के अर्थ की व्याख्या में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। फॉक्स के अनुसार - भूमि उपयोग, के अंतर्गत भू-भाग प्राकृत प्रदत्त विशेषताओं के अनुरूप रहता है। इस प्रकार यदि कोई भू-भाग प्राकृत मानवीय प्रभाव से वंचित है अथवा उसका उपयोग प्राकृतिक रूप से हो रहा है, तो उस भाग के लिये ‘‘भूमि प्रयोग’’ शब्द का प्रयोग उचित होगा। यदि किसी भू-भाग पर मानवीय छाप अंकित है या मानव अपनी आवश्यकता के अनुरूप उपयोग कर रहा है तो उस भू-भाग के लिये भूमि उपयोग शब्द का योग अधिक उचित होगा। इस प्रकार मानव के उपयोग के साथ भूमि संसाधन इकाई बन जाती है। जब भू-भाग का प्राकृतिक रूप लुप्त हो जाता हैं तथा मानवीय क्रियाओं का योगदान महत्त्वपूर्ण हो जाता है, तो उसे भूमि उपयोग कहते हैं। किसी स्थान की भूमि जल संसाधन उपयोग को अनेक प्रकार से प्रभावित करती है, क्योंकि जिन स्थानों की भूमि समतल होती हैं, पेड़-पौधे अधिक होते हैं, जल का अधिक पुनर्भरण होता है। जबकि इसके विपरीत क्षेत्र जहाँ पर वर्षा के बाद पानी बहकर नदियों में चला जाता है, और जल स्तर काफी नीचे चला जाता है। अत: जल संसाधन की उपलब्धता के अध्ययन में भूमि उपयोग प्रारूप का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।

इटावा जनपद का जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण (Assessment and Distribution of Water Resources of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण


जल मानव जीवन की अत्यंत महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है, प्राणों की रक्षा के लिये वायु के बाद द्वितीय स्थान जल का है। जल मुख्यत: दो रूपों में प्राप्त होता है- 1. सतही जल 2. भूमिगत जल। सतही जल एवं भूगर्भिक जल एक ही जल पद्धति के भाग हैं, जो एक दूसरे से अंत: संबंधित हैं तथा एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। भारत में संपूर्ण वैश्विक जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, परंतु भारतीय उपमहाद्वीप की नदियों में औसत मासिक जल प्रवाह का मात्र 4 प्रतिशत जल प्राप्त होता है। यह भारत में जल की आवश्यकता से कम उपलब्धता का द्योतक है। चीन की नदियों में यही औसत जल प्रवाह 8 प्रतिशत है, जिसे भारत से 25 प्रतिशत अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण करना पड़ता है।

इटावा जनपद का भौतिक वातावरण (Physical environment of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

अवस्थिति एवं सीमा :


इटावा जनपद पश्चिमी गंगा-यमुना मैदान का एक भाग है, जो उत्तर प्रदेश के कानपुर मंडल के पश्चिमी भाग का एक जनपद है। भौगोलिक दृष्टि से इसका विस्तार 26' 21'' उत्तरी अक्षांश से 27' 01'' उत्तरी अक्षांश, 68' 45'' पूर्वी देशांतर से 79' 20'' पूर्वी देशांतर के मध्य है। इस जनपद के पूर्व में औरैया, उत्तर-पूर्व में फर्रुखाबाद, दक्षिण में जालौन तथा मध्य प्रदेश का भिंड जनपद स्थित है। इसके उत्तर में मैनपुरी तथा पश्चिम में आगरा जनपद स्थित है। इटावा जनपद का भौगोलिक क्षेत्रफल 2705.39 वर्ग किलोमीटर है तथा 2001 की जनगणना के अनुसार इटावा जनपद की कुल जनसंख्या 1338871 है। इस जनपद में 686 आबाद ग्राम एवं 8 गैर आबाद ग्राम है।

प्रस्तावना : इटावा जनपद में जल संसाधन की उपलब्धता, उपयोगिता एवं प्रबंधन (Availability Utilization & Management of Water Resource in District Etawah)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

संकल्पनात्मक ढाँचा :


जलमण्डल पृथ्वी पारितंत्र का अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटक है। जीवनदायनी होने के कारण ‘जल ही जीवन है’ उक्ति अक्षरश: सत्य है। मानव एवं अन्य जीव जंतुओं व वनस्पति के लिये जीवन का आधार होने के कारण जल सबसे प्रमुख प्राकृतिक संसाधन है। अत: विश्व में अभी तक जितने प्रकार के प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं उनमें से जल का सर्वप्रमुख स्थान है। प्राचीन काल में तो जल को देवतुल्य ही माना जाता था। ऋग्वेद में कहा गया है ‘‘जल ही औषधि है’’ जल रोगों का शत्रु है, यह सब व्याधियों का नाश करता है। केवल मानव विज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म पौराणिक कथाओं तथा शास्त्रों में भी जल की महत्ता का वर्णन है। मानव की विभिन्न सभ्यताओं से स्पष्ट है कि जल पर मानव जीवन का अस्तित्व निर्भर है। इतिहासकारों के अनुसार महान प्राचीन सभ्यताएँ उन क्षेत्रों में, जहाँ वनस्पति वृद्धि अधिक थी, नहीं उत्पन्न हुई बल्कि तुलनात्मक दृष्टि से शुष्क क्षेत्रों में उत्पन्न हुई, जहाँ मानव जल नियंत्रित करने तथा विभिन्न मौसमों में नदियों से इष्टतम मात्रा में जल प्राप्त करने में समर्थ था।

कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियाँ : निष्कर्ष एवं सुझाव

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

विकास और उससे उत्पन्न समस्याओं का आश्य यह नहीं है कि धरा का कोष रिक्त हो गया है और भी भारत में अप्रयुक्त और अल्प प्रयुक्त संसाधनों का विपुल भंडार विद्यमान है आवश्यकता है विवेकपूर्ण विदोहन की, उर्वरक शक्ति का उपयोग करने के साथ-साथ लौटाने की विकास की प्रत्येक संकल्पना और परिकल्पना को पर्यावरण की कसौटी पर अहर्य सिद्ध होने पर ही विकास के लिये व्यवहार में लाना होगा।

कृषि उत्पादकता में वृद्धि के उपाय

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

स्वतंत्रता के लगभग 53 वर्ष बाद गत 28 जुलाई 2002 को केंद्रीय कृषि मंत्री श्री नीतीश कुमार ने नई राष्ट्रीय कृषि नीति संसद के पटल पर रखी, इसकी मुख्य विशेषता यह है कि सरकार ने अगले दो दसकों के लिये कृषि क्षेत्र में प्रतिवर्ष 4 प्रतिशत की विकास दर निर्धारित की है। 17 पृष्ठों की कृषि नीति में भूमि सुधार के माध्यम से गरीब किसानों को भूमि प्रदान करना, कृषि जोतों का समेकन, कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ाना, किसानों को फसल के लिये कवर प्रदान करना, किसानों के बीजों के लेन-देन के अधिकार को बनाये रखना जैसे लक्ष्यों को निर्धारित किया गया है। इसके अतिरिक्त मुख्य फसलों की न्यूनतम मूल्य नीति को जारी रखने का आश्वासन दिया गया है। इस नीति के तहत कृषि का सतत विकास रोजगार सृजन, ग्रामीण क्षेत्रों को स्वालंबी बनाना किसानों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने और पर्यावरण संरक्षित कृषि तकनीकि अपना अन्य मुख्य उद्देश्य है। नीति में कहा गया है कि अप्रयुक्त बंजर भूमि का कृषि और वनोरोपण के लिये प्रयोग बहु फसल और अंत: फसल के माध्यम से फसल गहनता बढ़ाने पर जोर दिया जायेगा। सरकार कृषि में जैव प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिये जोर देगी, इसके अंतर्गत देश में उपलब्ध विशाल जैव विविधता की सूची बनाने तथा उसे वर्गीकृत करने के लिये संबंद्ध कार्यक्रम बनाया जायेगा।

कृषक परिवारों के स्वास्थ्य का स्तर

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

स्वस्थ्य जीवन के लिये यह आवश्यक है कि व्यक्ति को ऐसा भोजन मिले जिसमें सभी पोषक तत्व उचित मात्रा में उपस्थित हों, ऐसा तभी संभव है जब उसको संतुलित भोजन प्राप्त हो परंतु हर व्यक्ति का संतुलित भोजन सामान्य नहीं हो सकता है। व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य संपादित करता है। अत: कार्य की विभिन्नता के आधार पर उसे भोजन की भी आवश्यकता होती है। समझदार व्यक्ति को अपना भोजन इस आयु, जलवायु, ऋतु तथा लिंग के अनुसार भी भोजन में पोषक तत्वों की आवश्यकताओं में अंतर आता है। जैसे गर्भवती स्त्री या स्तनपान कराने वाली स्त्री की भोजन आवश्यकता साधारण स्त्री की तुलना में अधिक कैलोरीयुक्त भोजन चाहिए। संतुलित आहार समस्त प्राणियों की एक प्रमुख आवश्यकता है। अत: संतुलित भोजन में समस्त तत्वों की उचित मात्रा का होना आवश्यक है।

संतुलित आहार की विभिन्नता :-


विभिन्न व्यक्तियों के लिये विभिन्न प्रकार के भोजन तथा विभिन्न प्रकार की मात्रात्मक आवश्यकता होती है जो निम्न बातों पर निर्भर करती है।

1. आयु : बाल्यावस्था में जब शरीर विकसित होता है तब बालक को वसा और प्रोटीन अधिक मात्रा में चाहिए वृद्धवस्था में पाचन शक्ति दुर्बल हो जाती है तब भोजन की कम मात्रा की आवश्यकता होती है।

2. जलवायु : शीत प्रधान देशों में ग्रीष्म प्रधान देशों की अपेक्षा ताप का अधिक उपयोग होता है। अत: शीत प्रधान देशों में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में भोजन की आवश्यकता होती है।

3. लिंग : पुरुष की अपेक्षा स्त्रियों में कम भोजन की आवश्यकता होती है।

4. परिश्रम : शारीरिक परिश्रम करने वाले व्यक्तियों के शरीर से अधिक ऊर्जा का ह्रास होता है अत: उसकी पूर्ति के लिये अधिक भोजन चाहिए। इनके भोजन में श्वेतसार की मात्रा अधिक होनी चाहिए। मानसिक श्रम करने वालों को भोजन की कम मात्रा चाहिए परंतु उसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होनी चाहिए।

भोजन के पोषक तत्व एवं पोषक स्तर

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

भोजन मनुष्य की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आधारभूत आवश्यकता है जिसके बिना कोई भी प्राणी जीवन की कल्पना नहीं कर सकता है। जीवन के प्रारंभ से जीवन के अंत तक शांत करने तथा शारीरिक विकास के लिये मनुष्य को भोजन की आवश्यकता होती है। डॉ. रंधावा के अनुसार ‘‘भोजन की आदत तथा पर्यावरण जिसमें मनुष्य जीवनयापन करता है, ये घनिष्ट संबंध होता है जिसके लिये मनुष्य सर्वप्रथम स्वयं पर्यावरण से संबंध स्थापित करता है तत्पश्चात उस पर्यावरण के अनुसार वह अपनी आदतें तथा स्वभाव को समायोजित करता है। इन आदतों में मनुष्य सर्वप्रथम भोजन की आदतों का समायोजन तथा बाद में अन्य आवश्यकताओं में संतुलन स्थापित करता है।’’ अली मोहम्मद 2 का मत है कि भोजन तथा खानपान की आदतों के निर्धारण में आय का आकार सार्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता है। खानपान की आदतों में लगभग समानता रहते हुए भी आय का आकार तथा भोज्य पदार्थों की भोजन की आदतों में न्यूननाधिक अंतर उत्पन्न करते हैं। ‘‘चौहान आरवी सिंह 2 वे समय अंतराल के साथ-साथ स्थाई आदतों, स्थाई पसंद तथा स्थाई रुचियों में परिवर्तित हो जाती हैं। परिस्थितिकीय अंतर आय का आकार परिवार का आकार खाद्य पदार्थों की उपलब्धता तथा लोगों के जीने का ढंग आदि लोगों की भोजन की आदतों में अंतर के लिये उत्तरदायी होते हैं।’’ इस दृष्टि से अध्ययन क्षेत्र जनपद प्रतापगढ़ में भोजन की आदतों में बहुत अधिक भिन्नता देखने को मिलती है। यद्यपि जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोग एक ही प्रशासन तंत्र के अंतर्गत नियंत्रित हैं परंतु फिर भी विभिन्न क्षेत्रों में परिस्थितिकीय अंतर, लोगों की भोजन संबंधी आदतों में अंतर उत्पन्न करती है।

1. भोजन की रासायनिक रचना