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प्रस्तावना : बस्तर जिले में जल संसाधन मूल्यांकन एवं विकास एक भौगोलिक विश्लेषण (An Assessment and Development of Water Resources in Bastar District - A Geographical Analysis

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

पृथ्वी पर जीवन को सतत बनाये रखने के लिये प्राण वायु के बाद जल दूसरा महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक भौतिक पदार्थ है। जल और मृदा प्रकृति के आधारभूत संसाधन हैं, जो जैव जगत के लिये पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता के अनुसार ही मानव समाज सांस्कृतिक भू-दृश्य की रचना करता है।

उपसंहार

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

राजस्थान में जल की भीषण स्थिति को देखते हुए भविष्य में जल विरासत को सहेज कर रखना अति आवश्यक है। जल संरक्षण की परम्परा के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को हाड़ौती के संदर्भ में देखने पर ज्ञात होता है कि मालवा के पठार की उपत्यका से बहकर आने वाली जल राशि एवं वर्षाजल को संरक्षित करने की दिशा में रियासत के समय से ही वहाँ के शासकों ने कदम उठाये हैं।

हाड़ौती के जलाशय निर्माण एवं तकनीक (Reservoir Construction & Techniques in the Hadoti region)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

प्राचीन ग्रंथों में प्रत्येक गाँव या नगर में जलाशय होना आवश्यक बतलाया गया है। राजवल्लभ वास्तुशास्त्र1 के लेखक मण्डन ने भी बड़े नगर के लिये कई वापिकाएँ, कुण्ड तथा तालाबों का होना अच्छा माना है। भारतीय धर्म में जलाशय निर्माण को एक बहुत बड़ा पुण्य कार्य माना गया है, किन्तु इस आध्यात्मिक भावना का भौतिक महत्त्व भी रहा है क्योंकि जलाशय एक ओर सिंचाई के श्रेष्ठ साधन बनते थे, वहीं दूसरी ओर जन सामान्य को पेयजल की कठिनाई से मुक्त भी करते थे। शासक एवं उनके सामन्त जलाशय निर्माण में पर्याप्त रुचि लेते थे।

जलाशयों में पाषाण की भित्तियां एवं घाटों का निर्माण हुआ करता था। घाटों में विभिन्न रेखाकृतियाँ उभार कर उन्हें कलात्मक बनाया जाता था। इनके ऊपरी भाग में छतरियाँ बनी रहती थी और चारों ओर से या एक ओर से सीढ़ियाँ बनी रहती थी, जो नीचे तक पहुँच जाती थी। जलाशय के पास ही जलाशय की स्थापना के अवसर पर एक स्तम्भ लगाने की भी परम्परा रही है। यह स्तम्भ भी कलात्मक हुआ करता था। स्तम्भ के ऊपरी भाग में मन्दिर के समान प्रायः वर्गाकृति में शिखर बना रहता था। शिखर के नीचे चारों ओर ताके होती थी जिनमें आराध्य देवताओं की प्रतिमाएँ उभारी जाती थी। ताकों में प्रायः गणपति की प्रतिमाएँ होती थी। ताकों के नीचे चतुष्कोणीय, षट्कोणीय, अथवा षोडश स्तम्भ बने रहते थे। स्तम्भ के मूल भाग पर प्रायः जलाशय निर्माता से सम्बन्धित व जलाशय निर्माण से सम्बन्धित सूचनाओं का लेख भी उत्कीर्ण करवा दिया जाता था। बावड़ी के प्रवेश मार्ग में अलंकरण की दृष्टि से कतिपय आकृतियाँ उर्त्कीण की जाती रही हैं तथा बीच-बीच में प्रतोलियो (पालों) का निर्माण भी होता रहा।2

बावड़ी स्थापत्य

हाड़ौती के प्रमुख जल संसाधन (Major water resources of Hadoti)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

भारत के प्राचीन ग्रंथों में आरम्भ से ही जल की महत्ता पर बल देते हुए इसके संचयन पर जोर दिया गया है। ‘जलस्य जीवनम’ के सिद्धान्त को चरितार्थ करते हुए विश्व की समस्त प्राचीन सभ्यताओं का विकास विभिन्न नदियों की घाटियों में हुआ है।1 इसका मुख्य कारण यह है कि जल मानव जीवन के सभी पक्षों से जुड़ा रहा है। जल की उपयोगिता के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए मानव समाज ने जल संचय अथवा जल संग्रह के ऐसे अनेक स्रोतों का निर्माण तथा अन्वेषण किया, जिनसे जलापूर्ति की समस्याओं का निराकरण किया जा सके।

हाड़ौती आरम्भ से अनेक जल स्रोतों से समृद्ध रहा है। लोक कल्याण की भावना से युक्त होने के कारण यहाँ के नरेशों ने समय-समय पर अनेक जल स्रोतों का निर्माण करवाया। हाड़ौती के कृषि प्रधान होने के कारण कृषि भूमि को सिंचित करने की आवश्यकता महसूस हुई परिणामस्वरूप यहाँ के शासकों ने अनेक तालाबों, कुण्डों, बावड़ियों को बनवाया। ये कुण्ड व बावड़ियाँ राज्य की जनता के लिये सदियों तक पीने योग्य पानी उपलब्ध करवाते रहे। हाड़ौती के यह जल स्रोत जहाँ एक ओर यहाँ के नरेशों की जन कल्याण की भावना की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं तो वहीं दूसरी ओर ये हमारी सांस्कृतिक जरूरतों को भी सदैव पूर्ण करते रहे हैं।

समाज के समृद्ध लोगों के अलावा कभी-कभी दास दासियों और कम सुविधा सम्पन्न लोग भी इन जलस्रोतों का निर्माण करवाते थे, जो निजी और सार्वजनिक उपयोग हेतु बनाये जाते थे। शहरी परकोटे के अन्दर बनी बावड़ियाँ निर्माता परिवार की महिलाओं के स्नान के उपयोग के लिये होती थी। विशेष अनुमति लेकर बावड़ियों का उपयोग रास्तों से गुजरने वाले व्यापारिक काफिलों द्वारा भी किया जाता था। इसके अलावा बाहर से साधारण या पेयजल स्रोत दिखने वाली ये बावड़ियाँ सैनिक अभियानों के समय व आपातकालीन स्थितियों में एक नये रूप में उभरकर सामने आती थी।2

पौधों में भी होती है निर्णय लेने की क्षमता

Source: 
दैनिक जागरण, 24 दिसम्बर, 2017

अपने आस-पास के माहौल की जानकारी लेकर उसके अनुसार प्रतिक्रिया करते हैं पौधे

रोपे गए पौधे बर्लिन : पौधे सिर्फ साँस ही नहीं लेते, बल्कि सोच-विचार करके और निर्णय लेकर अपने आप को बड़ा करते हैं। यह बात एक नवीन अध्ययन में सामने आई है। इसमें बताया गया है कि पौधे अपने आस-पास के माहौल की जटिल सूचनाओं को एकत्र करने में सक्षम होते हैं। इसके बाद वे अपने लिये सर्वश्रेष्ठ मार्ग की तलाश करते हैं और उसी के अनुसार बड़े होते हैं। पौधों के संदर्भ में इस अहम खोज से वैज्ञानिक बेहद उत्साहित हैं। उनका कहना है कि इस खोज की मदद से वे पौधों को दुनियाभर में और अधिक बढ़ाने के लिये रणनीति तैयार कर सकते हैं। जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ ट्यूबिंगन के जीव विज्ञानियों का दावा है कि पौधे अपने विरोधियों (आस-पास के दूसरे पौधों) के कद और घनत्व को समझते हैं और अपने बढ़ने के लिये वैकल्पिक प्रतिस्पर्धी मार्ग का चुनाव करते हैं।

कुछ पौधे देते हैं अलग प्रतिक्रिया : इस अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि कुछ पौधे जैसे कि क्लोनल पौधे तीसरी तरह की प्रतिक्रिया दिखाते हैं। इसमें वे अपने पड़ोसी पौधों के बढ़ने की दूसरी दिशा में बढ़ते हैं।

हाड़ौती क्षेत्र में जल के ऐतिहासिक स्रोत (Traditional sources of water in the Hadoti region)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

प्राचीनकाल से आधुनिक समय तक मानव अभिव्यक्ति के साधनों में मिट्टीपट, मुद्रा, ताम्र पत्र, पट्टिकाएँ और स्तम्भ आदि इतिहास का बोध कराते रहे हैं। प्रारम्भ में अक्षर ज्ञान के अभाव में मनुष्य ने अपनी अभिव्यक्ति शैलचित्रों में व्यक्त की थी परन्तु जैसे-जैसे अक्षर ज्ञान का विकास प्रारम्भ हुआ वैसे ही मनुष्य ने अभिव्यक्ति के साधनों में शैलचित्रों के स्थान पर शब्दों को पत्थर पर लिखना शुरू किया। शब्दोत्कीर्ण पत्थर ही शिलालेख के नाम से प्रतिष्ठित हैं।1 ये शिलालेख शिलाओं, प्रस्तर पट्टों, भवनों या गुफाओं की दीवारों, मन्दिरों के भागों, स्तूपों, स्तम्भों, मठों, तालाबों, बावड़ियों तथा खेतों के बीच गढ़ी हुई शिलाओं पर बहुधा मिलते हैं। इनकी भाषा संस्कृत, हिन्दी, राजस्थानी और फारसी तथा उर्दू में समय के अनुकूल प्रयुक्त हुई है। इनमें गद्य और पद्य दोनों का समावेश दिखाई देता है।

अभिलेख मानव जीवन के साक्षात दर्पण हैं। यह सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश ही नहीं डालते अपितु आने वाले भविष्य के निर्माण हेतु प्रेरणा भी प्रदान करते हैं। मनुष्य अपनी गतिविधियों को प्राचीन काल से ही कहीं न कहीं अंकित करता रहा है। कहीं शिलालेख के रूप में, कहीं ताड़ पत्रों पर तो कहीं चर्म पर्णों पर। अन्ततः कागज के आविष्कार के पश्चात मानव ने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम कागज को बनाया। आधुनिक पुरालेख राजकीय अथवा निजी संग्रहों में सुरक्षित ऐसे ही साधन हैं जो इतिहास हेतु अत्यन्त उपयोगी हैं।2

हाड़ौती क्षेत्र में जल का इतिहास एवं महत्त्व (History and significance of water in the Hadoti region)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

जल की उत्पत्ति


भारतीय संस्कृति की यह मान्यता सुविदित है कि मानव शरीर पाँच तत्वों का बना हुआ है। “पाँच तत्व का पींजरा तामे पंछी पौन” यह उक्ति प्रसिद्ध है। ये पाँच तत्व है-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। इन्हें पंचभूत भी कहते हैं क्योंकि ये वे तत्व हैं जिनसे सारी सृष्टि की रचना हुई है।1

आसीदिद तमोभूतम प्रज्ञातमलक्षणम।
अप्रतर्क्यमविज्ञेय प्रसुप्तमिव सर्वत। 7।
ततः स्वयं भूर्भगगवान व्यक्तो व्यंजयत्रिदम।
महा भूतादि वृतौजाः प्रादुरासीत्रमोनुदः। 8।


(भावार्थ - पहले यह संसार तम, अंधकार रूपी प्रकृति से घिरा था। इसमें कुछ भी प्रत्यक्ष ज्ञात नहीं था जिससे तर्क द्वारा लक्षण स्थिर किए जा सके। सभी तरफ अज्ञान और शून्य अवस्था के नाश करने वाले लक्षण सृष्टि की सामर्थ्य से युक्त स्वयंभू भगवान महा भूतादि पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु पंच तत्वों का प्रकाश करते हुए प्रकट हुए)

वेदकाल से लेकर आज तक जल का यह महत्त्व शास्त्रों और काव्यों में प्रतिफलित होता आया है। शास्त्रों में प्रसिद्ध है कि अव्याकृत ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना करनी चाही तो सबसे पहले उसने जल में सृष्टि का बीजवपन किया2 जल को नारा भी कहा गया है क्योंकि वह नर (ईश्वर) की सन्तान है व नारा (जल) ईश्वर का प्रथम आश्रय स्थल है, इसलिये ईश्वर को नारायण कहते हैं3। ऋग्वेद में वरुण देवता के साथ आपका उल्लेख हुआ है और इसी आप से सृष्टि की रचना हुई है। इसी प्रकार इन्द्र को आकाश, पृथ्वी, जल, व पर्वत का राजा माना है। इन्द्र के लिये कहा गया है कि वृत्र का वध करके वह आप (जल) को मुक्त कराता है4

हाड़ौती का भूगोल एवं इतिहास (Geography and history of Hadoti)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

चौहान राजपूतों की 24 शाखाओं में से सबसे महत्त्वपूर्ण हाड़ा चौहान शाखा रही है। इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड को हासी के किले से एक शिलालेख मिला था, जिसमें हाड़ाओं को चन्द्रवंशी लिखा गया है।1 सोमेश्वर के बाद उसका पुत्र राय पिथौरा या पृथ्वीराज चौहान राजसिंहासन पर बैठा। पृथ्वीराज चौहान शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी के साथ लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात चौहानों के हाथ से भारत-वर्ष का राज्य जाता रहा। फिर भी चौहान शाखाएँ यत्र-तत्र फैलती गयीं और चौहान क्षत्रिय जहाँ-तहाँ अपना शासन करते रहे।2 जब नाडोल के चौहान कुतुबुद्दीन ऐबक से हारकर भीनमाल में गये। उसी समय उस वंश के माणिक्यराय द्वितीय नामक वीर ने मेवाड़ के दक्षिण पूर्व में अपना राज्य स्थापित किया और बम्बावदा को अपनी राजधानी बनाया। माणिक्यराय की छठीं पीढ़ी में हरराज या हाडाराव नामक एक बड़ा प्रतापी वीर उत्पन्न हुआ। हरराज या हाड़ाराव के नाम पर चौहानवंश की इस शाखा का नाम हाड़ावंश पड़ा है, जिसमें कोटा-बूँदी राज्यों का समावेश होता है।3

हाड़ा शब्द की व्युत्पत्ति


हाड़ौती शब्द ‘हाड़ा’ से बना है। हाड़ा शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद रहा है। अभी तक इस सम्बन्ध में कोई सन्तोषप्रद मत प्रतिपन्न नहीं हो पाया है। अनेक किंवदन्तियाँ इस सम्बन्ध में प्रचलित हैं, परन्तु दो को अधिक आश्रय मिला है। उनमें से एक ‘‘अस्थि’’ शब्द से सम्बन्ध रखती है और दूसरी ‘‘हिडि’’ धातु से सम्बन्धित है। पहली अस्थि सम्बन्धित किंवदन्ती यह है कि बीसलदेव चौहान के पोते व अनुराग के बेटे इस्तपाल मुस्लिम शासक गजनी की सेना के साथ युद्ध करते हुए गंभीर रूप से घायल हो गए और उनकी तमाम हड्डी-पसली जर्जरित हो गई, उनके कटे हुए अंगों (हाड़ों) को एक स्थान पर एकत्रित किया गया। उस समय उनकी कुलदेवी ने आकर उन पर अमृत छिड़क दिया, जिससे वे पुनर्जीवित हो गये। इसी समय से उनके वंशजों को हाड़ा कहा जाने लगा।4

राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में जल विरासत - 12वीं सदी से 18वीं सदी तक (Water heritage in Hadoti region of Rajasthan - 12th Century to 18th Century)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

परिचय


जल विधाता की प्रथम सृष्टि है। विधाता ने सृष्टि की रचना करने से पहले जल बनाया फिर उसमें जीवन पैदा किया। मनुस्मृति कहती है ‘‘अप एवं सर्सजादो तासु बीज अवासृजन’’ जल में जीवन के बीज विधाता ने उगाये। जल प्रकृति का अलौकिक वरदान स्वरूप मानव, प्राणी तथा वनस्पति सभी के लिये अनिवार्य है।

आज सम्पूर्ण प्राणी जगत् जल का ही विकसित रूप माना जा सकता है। विश्व की सभी सभ्यताएँ नदियों के किनारे पनपी हैं, जल की अपार उपलब्धियों ने कृषि व व्यापार को विस्तार दिया है, जिससे सुविधा सम्पन्न सभ्यताएँ कला, संस्कृति एवं साहित्य से जुड़ गई, जिससे वह देश व राज्य सब तरह से सम्पन्न हो गया।

आज के इस विकसित युग में नवीन तकनीकों के विकास ने हमारी पुरातन जल-विरासत को नजरअन्दाज कर दिया है, जिस कारण प्राकृतिक प्रकोप, तापक्रम का बढ़ना, जलप्रदूषण, कुपोषण जैसे घातक प्रभाव अब हमारे सामने आने लगे हैं। वर्षा की अनिश्चितता एवं जल की कमी होने पर हमें बार-बार अपने परम्परागत तरीके याद आते हैं, परन्तु फिर भी हम उन्हें संरक्षित कर अपनाने का प्रयास नहीं कर पा रहे है। इन्ही सबका सूक्ष्म अध्ययन करने का प्रयास इस शोध में किया है। यह रिसर्च छः अध्यायों में विभाजित है।

अध्याय क्रम इस प्रकार हैं -
1 - हाड़ौती का भूगोल एवं इतिहास (Geography and history of Hadoti)
2 - हाड़ौती क्षेत्र में जल का इतिहास एवं महत्त्व ( History and significance of water in the Hadoti region)
3 - हाड़ौती क्षेत्र में जल के ऐतिहासिक स्रोत ( Historical sources of water in the Hadoti region)
4 - हाड़ौती के प्रमुख जल संसाधन ( Major water resources of Hadoti)
5 - हाड़ौती के जलाशय निर्माण एवं तकनीक ( Reservoir Construction & Techniques in the Hadoti region)
6 - उपसंहार