बिलासपुर जिले के जल संसाधनों का उपयोग (Use of water resources in Bilaspur district)

Author: 
श्रीमती कावेरी दामड़कर
Source: 
शोध प्रबंध ‘बिलासपुर जिले में जल-संसाधन विकास : एक भौगोलिक अध्ययन (Water Resource Development in Bilaspur District : A geographical study)’, भूगोल विभाग, रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़

बिलासपुर जिले में सिंचाई


बिलासपुर जिले में जल के उपयोग की दृष्टि से सिंचाई का स्थान सर्वोपरि है। जिले की लगभग 1,77378 हेक्टेयर भूमि विभिन्न साधनों से सिंचित है। यह सम्पूर्ण फसली क्षेत्र का 16.6 प्रतिशत है, जबकि मध्य प्रदेश का औसत 13.7 प्रतिशत है।

सिंचाई की आवश्यकता


बिलासपुर जिले की औसत वार्षिक वर्षा 139 से.मी. है परंतु वर्षा की अनिश्चितता एवं अनियमितता के कारण समय-समय पर बाढ़ आथवा सूखे की स्थिति बनी रहती है। पुन: वर्षा का सामयिक वितरण भी इस प्रकार है कि आवश्यकता के समय फसलों के लिये पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं हो पाता। जिले की मासिक वर्षा के आर्द्रता निदेशांक में मौसमी परिवर्तन इस बात का सूचक है कि यहाँ ऋतुगत सूखे की स्थिति है। वर्षा के मौसम की धनात्मक आर्द्रता सूखे मौसम की आर्द्रता से अधिक है। अत: वर्षा के जल की व्यवस्था करके क्षेत्र में उसका उपयोग करके न केवल फसलों को नष्ट होने से बचाया जा सकता है वरन दो फसली कृषि भी सम्भव है। जिले की मिट्टियों में पर्याप्त विभिन्नता है। जिले के उत्तर-पश्चिमी भाग के मुंगेली तहसील में गहरी कन्हार मिट्टी पायी जाती है, जिसकी जल धारण क्षमता अधिक है। फलत: कम सिंचाई ही पर्याप्त हो जाती है। वहीं सक्ती तथा जांजगीर तहसीलों में मटासी मिट्टी का विस्तार है, जिसकी जल धारण क्षमता मात्र 3.9 प्रतिशत है। अत: ऐसी भूमि को कृषि योग्य बनाए रखने के लिये बार-बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। जिले में सक्ती, जांजगीर तथा बलौदा विकासखण्डों के क्षेत्र में जलाभाव के कारण केवल वर्षाकालीन अवधि में ही कृषि हो पाती है।

सिंचाई हेतु सुविधाएँ


बिलासपुर जिले को दो प्रमुख भौतिक विभागों में विभक्त किया गया है (अग्रवाल, 1971)।

अ. उत्तरी रिमलैंड
ब. बिलासपुर का मैदान

बिलासपुर जिले की जल संसाधन संभाव्यता (Water Resource Probability of Bilaspur District)

Author: 
श्रीमती कावेरी दामड़कर
Source: 
शोध प्रबंध ‘बिलासपुर जिले में जल-संसाधन विकास : एक भौगोलिक अध्ययन (Water Resource Development in Bilaspur District : A geographical study)’, भूगोल विभाग, रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़

वर्षा तथा जलाधिशेष


जल संसाधन संभाव्यता, उपयोग एवं विकास की दृष्टि से वर्षा की मासिक एवं वार्षिक विचलनशीलता, वर्षा की प्रकृति एवं गहनता का अध्ययन समीचीन है।

बिलासपुर जिले की 95 प्रतिशत वार्षिक वर्षा दक्षिणी-पश्चिमी मानसून द्वारा जून से सितंबर के मध्य प्राप्त होती है। शेष वर्षा शीतकालीन चक्रवातों के परिणामस्वरूप प्राप्त होती है। वर्षा की प्रकृति, पर्वतीय एवं मानसूनी विशेषताओं से युक्त है (गुप्ता, 1979, 11)। सामान्यत: जिले में मानसून का आगमन 10 से 15 जून के मध्य होता है। एवं 10 अक्टूबर के आस-पास इसका निवर्तन हो जाता है (दास, 1968, 13)। जिले में जहाँ मानसून का प्रारंभ एकाएक होता है, वहीं इसका निवर्तन क्रमिक होता है। बिलासपुर जिले की औसत वार्षिक वर्षा 129 सेंटीमीटर है, जिसके वितरण में स्थानिक विशेषताएँ विद्यमान हैं।

वर्षा का मासिक एवं वार्षिक वितरण


बिलासपुर जिले के 6 वर्षामापी केंद्र से वर्ष 1956-1986 की अवधि के लिये प्राप्त आंकड़ों के आधार पर जिले की मासिक एवं वार्षिक वर्षा का अध्ययन किया गया है।

चार परम्परागत ऋतुओं में जिले में वर्षा की मात्रा का विवरण सारिणी क्रमांक 12 में दर्शाया गया है।

बिलासपुर जिले में जुलाई एवं अगस्त सर्वाधिक वर्षा के महीने हैं जबकि वार्षिक वर्षा का 60 प्रतिशत से अधिक वर्षा होती है। जिले में इस अवधि में बिलासपुर में वार्षिक वर्षा का 92.4 प्रतिशत तथा मुंगेली में 91.79 प्रतिशत जुलाई एवं अगस्त में प्राप्त होती है।

सितंबर-अक्टूबर में निवर्तन कालीन मानसून से अधिकतम 16 एवं न्यूनतम 4 प्रतिशत वार्षिक वर्षा प्राप्त होती है। सितंबर में प्राप्त होने वाली वर्षा की मात्रा में अनिश्चितता की स्थिति रहती है। सितंबर माह में जिले की औसत वर्षा 18 सेंटीमीटर से 29 सेंटीमीटर के मध्य रहती है। सितंबर के पश्चात वर्षा की मात्रा तीव्रता से कम होती है। अक्टूबर में औसतन कुल वार्षिक वर्षा की मात्रा का 4 प्रतिशत वर्षा प्राप्त होती है।

बिलासपुर जिले की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि (Cultural background of Bilaspur district)

Author: 
श्रीमती कावेरी दामड़कर
Source: 
शोध प्रबंध ‘बिलासपुर जिले में जल-संसाधन विकास : एक भौगोलिक अध्ययन (Water Resource Development in Bilaspur District : A geographical study)’, भूगोल विभाग, रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़

जनसंख्या एवं मानव अधिवास


जनसंख्या के घनत्व एवं वितरण में जल एक महत्त्वपूर्ण निर्धारक तत्व है। जल मानव की प्राथमिक आवश्यकता है, अत: धरातल पर जल उपलब्धता एवं मानव निवास एक दूसरे के पूरक हैं।

बिलासपुर जिले की जनसंख्या वर्ष 1981 की जनगणना के अनुसार 29,53,366 व्यक्ति है। बिलासपुर जिले में राज्य के क्षेत्रफल का 4.49 प्रतिशत राज्य की कुल जनसंख्या का 5.66 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। यह जिला मध्य प्रदेश में जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा स्थान रखता है।

बिलासपुर जिले में जनसंख्या का केंद्रीयकरण दक्षिणी मैदानी क्षेत्र में हुआ है। इन देशों में जल संसाधन का पर्याप्त विकास हुआ है। साथ ही धरातलीय जल उपलब्धता भी पर्याप्त है। जिले के बिलासपुर, मुंगेली, तखतपुर, अकलतरा एवं जांजगीर विचकासखंड जहाँ जनसंख्या अधिक है, यहाँ जल के अंतर्गत भूमि का प्रतिशत अधिक है (10-15)। इसके विपरीत उत्तरी विकासखंडों में यद्यपि जन संसाधन उपलब्धता की संभाव्य राशि पर्याप्त है परंतु विकास के अभाव में जनसंख्या का बसाव कम हुआ है।

जनसंख्या वृद्धि की प्रवृत्ति


बिलासपुर जिले में 1901-1911 का दशक जनसंख्या वृद्धि का दशक था। जबकि 23.69 प्रतिशत वृद्धि आंकी गई। अगले दशक 1911-1921 में यह दर घट कर 10.25 प्रतिशत हो गई। इस दशक में जनसंख्या वृद्धि दर की न्यूनता का एक प्रमुख कारण जलजनित रोग हैजे का प्रकोप एवं इन्फ्लूएंजा के कारण अधिक मृत्युदर है। 1921-1931 के दशक में जनसंख्या में वृद्धि दर नियंत्रण में रही। 1941-51 के दशक में जनसंख्या में वृद्धि दर अत्यंत न्यून 8.35 प्रतिशत हो गयी। महँगाई बढ़ने एवं आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण जीविका के लिये बड़ी संख्या में लोगों का पलायन ही इस दशक में जनसंख्या वृद्धि दर कम होने का प्रमुख कारण है। 1961-71 के दशक में यद्यपि जनवृद्धि हुई तथापि जनसंख्या वृद्धि दर नियंत्रण में रही। 1981 में परिवार नियोजन के प्रयासों की अधिक सफलता, आप्रवास में कमी के कारण जनवृद्धि दर कम रही।

जनसंख्या का घनत्व एवं वितरण

बिलासपुर जिले की भौतिक पृष्ठभूमि (Geographical background of Bilaspur district)

Author: 
श्रीमती कावेरी दामड़कर
Source: 
शोध प्रबंध ‘बिलासपुर जिले में जल-संसाधन विकास : एक भौगोलिक अध्ययन (Water Resource Development in Bilaspur District : A geographical study)’, भूगोल विभाग, रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़

बिलासपुर जिले का भौतिक पृष्ठभूमि : स्थिति एवं विस्तार


जल संसाधन से संपन्न बिलासपुर जिला मध्य प्रदेश के पूर्वांचल में अव्यवस्थित है। इस जिले का सर्वप्रथम अस्तित्व सन 1961 में आया। इसके पूर्व यह जिला मध्य प्रांत एवं बरार का एक भाग था। किंतु राज्यों के पुनर्गठन के बाद से (1956) यह मध्य प्रदेश के पूर्वी भाग का एक प्रतिनिधि जिला है।

बिलासपुर जिला 210-3’ से 230-7’ उत्तरी अक्षांश एवं 810-12’ से 830-40’ तक पूर्वी देशांतर के मध्य विस्तृत है। मध्य प्रदेश के रायपुर, दुर्ग, मंडला, शहडोल सरगुजा एवं रायगढ़ जिले, बिलासपुर जिले की सीमा बनाते हैं।

प्रशासकीय दृष्टि से 14 तहसीलों एवं 25 विकासखंडों में विभक्त इस जिले का क्षेत्रफल 1966.8 वर्ग किलोमीटर है, जो मध्य प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का 4.5 प्रतिशत है। जिले की उत्तर-दक्षिण चौड़ाई 128 किमी एवं पूर्व-पश्चिम लंबाई 192 किमी है। बिलासपुर जिले की जनसंख्या 29.53 लाख व्यक्ति (1981) है। जो जिले के 13 शहरों एवं 3616 ग्रामों में निवास करती है। जिले की नगरीय एवं ग्रामीण जनसंख्या क्रमश: 3.99 लाख व 25.5 लाख है।

भौतिक पृष्ठभूमि


वस्तुत: भौतिक पृष्ठभूमि आर्थिक क्रियाओं के संपादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। समष्टि के सभी भौतिक कारक भू-वैज्ञानिक, संरचना, अपवाह, जलवायु, वनस्पति आदि जल-संसाधन विकास की प्रक्रिया के आधार स्तंभ हैं।

बस्तर जिले के जल संसाधन विकास एवं नियोजन (Water Resources Development & Planning of Bastar District)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

विकास की सम्भावनाएँ, शासकीय विकास योजनाएँ, धरातलीय जल संसाधन विकास, अंतर्भौम जल संसाधन विकास, नगरीय एवं ग्रामीण पेयजल आपूर्ति विकास, मत्स्य पालन, मनोरंजन, नौ परिवहन एवं जल नियंत्रण के क्षेत्र में विकास, विकास के लक्ष्य एवं सुझाव।

जल-संसाधन विकास एवं नियोजन


जल संसाधन विकास की सम्भावनाएँ : बस्तर जिले में जल संसाधन की कमी है। जिले में वर्षा की वार्षिक मात्रा 1234 मिमी है। जिले का लगभग 75 प्रतिशत भाग पठारी एवं पहाड़ी होने के कारण अधिकांश जल व्यर्थ बह जाता है। संसाधन विकास का आयोजन अत्यंत कठिन प्रक्रिया है, क्योंकि इसके तहत योजनाकार भूत एवं वर्तमान से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर भविष्य का आयोजन करता है।

बस्तर जिले में जल संसाधन का पर्याप्त विकास हो रहा है। जिले के समस्त जल संसाधनों के वर्तमान उपयोग (घरेलू एवं सिंचाई) एवं विकास की दृष्टि से जिले को निम्नलिखित विभागों में विभक्त किया जा सकता है :

उपयोग गहनता सूचकांक


1. न्यूनतम जल उपयोगिता प्रदेश- 5 प्रतिशत से कम
2. न्यून जल उपयोगिता प्रदेश- 5-10 प्रतिशत
3. मध्यम जल उपयोगिता प्रदेश- 10-15प्रतिशत
4. उच्च जल उपयोगिता प्रदेश- 15 प्रतिशत से अधिक

(1) न्यूनतम जल उपयोगिता प्रदेश : बस्तर जिले के भैरमगढ़ बीजापुर, कोंटा, सुकमा, गीदम, दंतेवाड़ा, कुवाकोंडा, कटेकल्याण, बास्तानार, विकासखंड जल संसाधन विकास की दृष्टि से न्यूनतम विकसित क्षेत्र हैं इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा की मात्रा सही है तथा जल संसाधन प्रचुर मात्रा में है, तथापि तकनीकी समस्याओं, भौतिक (भौगोलिक) अवरोधों एवं अशिक्षा के कारण जल संसाधनों का समुचित विकास नहीं हो पाया है। इन विकासखंडों में जल संसाधन के विकास का स्तर 5 प्रतिशत से भी कम है। ये क्षेत्र जिले के दक्षिणी-मध्य भाग में मैदानी पठारी क्षेत्र में स्थित है।

बस्तर जिले के औद्योगिक और घरेलू जल का पुन: चक्रण (Recycling of industrial and domestic water in Bastar district)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

घरेलू एवं औद्योगिक जल का पुन: चक्रण


जल के वर्तमान तरीकों से उपयोग के कारण भविष्य में जल की गम्भीर समस्या का संकट सामने है। जल में भौतिक एवं रासायनिक अवयवों के विद्यमान होने से जल प्रदूषित हो जाता है और मानव उपयोग में हानिकारक प्रभावों के कारण जल जन्य रोग होता है (त्रिवेदी, 280 -281)। त्रिवेदी ने जल प्रदूषकों का मानक तैयार किया है।

बस्तर जिले में इन मानकों के आधार पर किये गये विश्लेषण से जगदलपुर, किरंदुल एवं बचेली में जल प्रदूषक तत्व पाये गये हैं। जिले के इन अपशिष्ट प्रदूषक जल बहिर्स्राव निम्नलिखित रूप में है :

(1) घरेलू बहिर्स्राव : विभिन्न घरेलू कार्यों जैसे खाना पकाने, नहाने, धोने तथा अन्य सफाई कार्यों में विभिन्न पदार्थों का उपयोग होता है, जो अंतत: अपशिष्ट पदार्थों के रूप में घरेलू बहिर्स्राव के साथ बहा दिये जाते हैं। सामान्य मलिन जल से अधिक गंभीर जल प्रदूषण नहीं होता है। परंतु यदि उसमें कीटनाशी तथा प्रक्षालक पदार्थ भी सम्मिलित हो, तब हानि की संभावना बढ़ जाती है।

बस्तर जिले के 93 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र 94635 किलो लीटर जल का उपयोग होता है। इसमें लगभग 20,000 किलो लीटर जल बह जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अपशिष्ट जल की निकासी कम मात्रा में होती है। क्योंकि ग्रामीण लोग तालाबों का अधिकतर प्रयोग करते हैं। जिसके कारण घरेलू बहिर्स्राव कम होता है। अत: इसका पुन: उपयोग श्रमसाध्य एवं खर्चिला है।

बस्तर जिले में शहरी क्षेत्रों में 18460 किलो लीटर जल का उपयोग होता है। जिसका 3700 किलो लीटर जल व्यर्थ बह जाता है। इस अपशिष्ट जल में रासायनिक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है। इस जल का उपचार करके जल का पुन: उपयोग किया जा सकता है।

बस्तर जिले के जल संसाधन समस्याएँ एवं समाधान (Water Resources Problems & Solutions of Bastar District)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

1. जल जनित रोग : रोगों के स्रोत, उनका स्थानिक वितरण एवं उनसे बचाव के उपाय
2. जल प्रदूषण : जल प्रदूषण के स्रोत, प्राकृतिक स्रोत, मानवीय स्रोत, प्रदूषण का स्थानिक स्वरूप, जल प्रदूषण की समस्याओं के निराकरण के उपाय

जल जनित रोग


जल जन्य रोग : जल संसाधन के अध्ययन में जल जनित रोगों का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है। यह जल की गुणवत्ता एवं जल उपयोग के मनुष्य स्वास्थ्य के साथ प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित है। प्राय: जल में प्राप्त जैविक प्रदूषण जल में शक्य रोग जनक जैवों के अनुसंकुलन या परिवर्धन है। इसके कारण जल का प्रयोग संकटकारी हो गया है। इस प्रकार प्रदूषित जल से जल जनित रोगों का प्रसार होता है (रघुवंशी, 1989, 126)।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के सर्वेक्षण के अनुसार विश्व के 80 प्रतिशत से अधिक रोग दूषित जल के कारण होते हैं। बस्तर जिले में भोजन एवं दूषित जल से रोग होता है। प्रथम, दूषित जल के प्रत्यक्ष उपयोग से जल जन्य रोग जैसे : हैजा, आंत्रशोध, डायरिया, मियादी बुखार, इत्यादि होते हैं। द्वितीय, जल एक संक्रमणकारी तत्व के रूप में भी रोगों को जन्म देता है, जैसे - स्कर्वी, स्ट्राकोमा आदि। तृतीय संक्रमणकारी कुछ रोग जल में कुछ बड़े परोपजीवियों की उपस्थिति से होते हैं, जैसे कृमि संक्रमण के कारण होने वाली सिस्टोसोलियासिस रोग। यह रोग सिस्टोसोमय नामक चपटे सधरे पणीभ कृमियों के कारण होता है, जो संदूषित जल में पाये जाते हैं (बाघमार, 1988, 189)।

बस्तर जिले के जल का अन्य उपयोग (Other uses of water in Bastar District)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

1. मत्स्य उत्पादन, स्थानिक वितरण, उत्पादन की मांग प्रकार एवं समस्याएँ
2. परिवहन तथा मनोरंजन


जल के अन्य उपयोग


मत्स्य उत्पादन हेतु जल उपयोग : मत्स्य पालन जल संसाधन विकास का महत्त्वपूर्ण पहलू है। बस्तर जिले में मत्स्योद्योग विकसित हो रहा है। जिले के अंतर्गत आने वाले सभी जल संसाधनों, जलाशयों, नदियों, तालाबों आदि में मत्स्य - पालन होता है। बस्तर जिले में उपलब्ध जल - क्षेत्र के 12,010.114 हेक्टेयर में मत्स्य पालन होता है। इसमें 1246.474 टन मछली का उत्पादन होता है।

जिले की मुख्य नदियों की कुल लंबाई 644 किमी है। इनमें इंद्रावती 376 किमी महानदी 64 किमी, शबरी 180 किमी, गोदावरी 24 किमी लंबी है। इन नदियों में मछलियाँ कम पाई जाती है। बस्तर जिले में व्यापारिक मछलियाँ (रोहू, कतला, मोंगरी) का मुख्य रूप से पालन एवं उत्पादन किया जाता है। जिले में मत्स्य उत्पादन की इकाइयों को (तालिका क्र. 7) में दर्शाया गया है।

तालिका क्र. 7.1 बस्तर जिला मत्स्य-पालन जिले में सिंचाई विभाग द्वारा 5737.325 हेक्टेयर क्षेत्र में मत्स्य पालन किया जाता है। उसके बाद निजी एवं मुंडा क्षेत्र के 1354.880 हेक्टेयर क्षेत्र में और ग्राम पंचायत के अंतर्गत 339.742 हेक्टेयर जल क्षेत्र में मत्स्य उत्पादन किया जाता है। बस्तर जिले में मत्स्य पालन मुख्यत: जगदलपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, कोंडागाँव, कांकेर, नारायणपुर परियोजनाओं में होता है।

बस्तर जिले के जल का घरेलू और औद्योगिक उपयोग (Domestic and Industrial uses of water in Bastar district)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

जल का घरेलू और औद्योगिक उपयोग, ग्रामीण तथा नगरीय जल प्रदाय, पेयजल योजना का विकास, जल पूर्ति के स्रोत, नदी, नाले, तालाब एवं नलकूप, जल की मात्रा तथा गुणवत्ता, जल शुद्धिकरण प्रक्रिया का विकास।

पानी पर सभी का जीवन आधारित है। यह मनुष्य के जीवन तथा स्वास्थ्य के लिये बहुत आवश्यक अवयव है। लोगों के लिये सुरक्षित पीने के पानी की आपूर्ति एक आधारभूत आवश्यकता है। प्रति व्यक्ति 150 से 200 लीटर प्रतिदिन जल आपूर्ति को पर्याप्त समझा जाता है। जल क उपयोग यद्यपि मौसम, रहन सहन के स्तर और मनुष्यों की आदतों पर निर्भर करता है। तथापि जल की ज्यादा मात्रा और गुणवत्ता होने से लोगों के स्वास्थ्य में वृद्धि होती है (पार्क, 1983, 143)। एक कहावत है - जल का अपव्यय न करो, अभाव नहीं होगा। हम जल का अभाव तब तक महसूस नहीं करते, जब तक कि कुआँ सूख न जाये। इसमें कोई शंका नहीं है कि जल की आवश्यकता सर्वाधिक है। प्रत्यक्षत: अक्षय होने की वजह से इसके उपयोग पर मानव प्रयास का मार्ग प्रशस्त हुआ है (गारलैंड, 1958, 203)।

जल का उपभोग, पीने, खाना पकाने, इत्यादि कार्यों में होता है, जिसके बिना मानव-सभ्यता नष्ट हो सकती है। जल की कमी होने की स्थिति में इस उपयोग को प्राथमिकता दिया जाता है।

अध्ययन क्षेत्र की जनसंख्या 22,71,314 है। यहाँ 3,715 गाँव हैं। जिले की जनसंख्या का 92.88 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र में और 7.12 प्रतिशत शहरी क्षेत्र में निवास करती है। इस अध्याय का उद्देश्य पीने के पानी का उपयोग, ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में इसके वितरण, पीने के पानी की गुणवत्ता और उन बीमारियों का आकलन करना है, जो जल प्रदूषण द्वारा उत्पन्न होती है।

शहरी क्षेत्र में जल आपूर्ति :


बस्तर जिले के शहरी क्षेत्र में जनसंख्या का केवल 7.12 प्रतिशत निवास करता है। जगदलपुर जिले का सबसे बड़ा शहर है। उसके बाद कोंडागाँव, कांकेर, किरंदुल एवं बचेली आते हैं।