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बस्तर जिले का जल संसाधन उपयोग (Water Resources Utilization of Bastar District)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

सिंचाई - सिंचाई का विकास, सिंचाई का वितरण, सिंचाई के साधन, सिंचाई परियोजनाएँ, सिंचित फसलें, सिंचाई के लिये अंतर्भोम जल की उपयोगिता, सिंचाई की समस्याएँ।

जल संसाधन उपयोग


जल के उपयोग में कुछ विशिष्टताएँ होती हैं। प्राय: जल की उपलब्धता और समस्याएँ स्थानीय या क्षेत्रीय होती हैं। सामान्यत: कृषि क्षेत्र की आवश्यकता साफ जल द्वारा पूरी की जाती है। जल के विभिन्न उपयोग समय तथा स्थान विशेष के साथ बदलते हैं। किसी विशेष क्षेत्र में जल की उपयोगिता प्रबल होती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में सहायक या महत्वहीन होती है। कई क्षेत्रों में जल की उपयोगिता एक-दूसरे का विरोध करती प्रतीत होती है। जैसे - घरेलू और सिंचाई, जबकि कुछ जल पूर्ति परिपूरक होती है, जैसे - प्रदूषण, बाढ़ की रोकथाम और मनोरंज (मोरे और रिआर्डन, 1969, 54) लेंडसबर्ग (1964, 123) ने शुद्ध जल के विविध उपयोगों को चार वर्गों तथा - जल निकास का उपयोग, बहाव उपयोग, स्थान पर उपयोग एवं नकारात्मक अथवा विपरीत उपयोग में बाँटा है।

बस्तर जिले में पहले प्रकार के जल उपयोग की प्रधानता है। यहाँ जल संसाधन का उपयोग मुख्यत: तीन कार्यों के लिये होता है - सिंचाई, औद्योगिक उपयोग एवं घरेलू जल आपूर्ति। जिले में सिंचाई और घरेलू उपयोग में जल संसाधन का सबसे अधिक उपयोग होता है।

सिंचाई : बस्तर जिले में बहुत कम, लगभग 37,993 हेक्टेयर भूमि विभिन्न साधनों से सिंचित है। यह संपूर्ण फसली क्षेत्र का केवल 4.30 प्रतिशत है। जबकि मध्य प्रदेश का औसत 13.7 प्रतिशत है।

बस्तर जिले का अंतर्भौम जल (Subsurface Water of Bastar District)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

अंतर्भौम जल : अंतर्भौम जल का स्थानिक प्रतिरूप, विशिष्ट प्राप्ति पारगम्यता, अंतर्भौम जलस्तर की सार्थकता, अंतर्भौम जल की मानसून के पूर्व पश्चात गहराई, अंतर्भौम जल की सममान रेखाएँ, अंतर्भौम जल का पुन: पूर्ण एवं विसर्जन।

भू-गर्भ जल


वर्षाजल का कुछ भाग मिट्टी के छिद्रों से रिसकर गुरुत्वाकर्षण के बल से नीचे चला जाता है, जिससे भूमिगत जल बनता है। यह जल भूमि के अंदर किसी अप्रवेश्य स्तर से मिलने तक नीचे रिसता रहता है और उसके पश्चात पार्श्वीय दिशा में आगे बढ़ता है। मिट्टी का वह भाग जिसके बीच में से भूमिगत जल का प्रवाह चल रहा हो। संतृप्त कटिबंध कहलाता है और इस कटिबंध के पृष्ट भाग को भूमिगत जल तल कहते हैं।

भूगर्भीय संरचना एवं प्रकृति भू-गर्भ जल की उत्पत्ति तथा वितरण का प्रमुख तत्व है। भू-गर्भ जल प्राचीन चट्टानों से नवीनतम चट्टानी संरचना में विद्यमान रहता है। नवीनतम चट्टानी संरचना में प्राचीन चट्टानी संरचना की तुलना में अधिक जल-धारण क्षमता होती है। भू-गर्भ जल उपलब्धता मुख्यत: चट्टानी कणों की विभिन्नता, उनका परस्पर संगठन चट्टानों की सरंध्रता एवं जलवहन क्षमता पर निर्भर है।

बस्तर जिले के विभिन्न जल प्रक्षेप की प्रमुख चट्टानी संरचना एवं उनकी विशेषताएँ भिन्न-भिन्न हैं। जिले की चट्टानी संरचनाओं में जल धारण संरचनाएँ निम्नलिखित हैं।

(1) लेटेराइट लौह अयस्क : यह अवसादी नूतन चट्टान हैं। यह चट्टान जिले के मध्य में बैलाडीला एवं भानुप्रतापपुर के मध्य में पहाड़ी क्षेत्र में पाया जाता है। इन चट्टानों में कई परतें एक दूसरे के ऊपर सटी रहती है। इन चट्टानों में जोड़ तथा संधियाँ पायी जाती हैं। इन संधियों में अपरदित सतह ही भू-गर्भ जल उपलब्धता को सुगम बनाते हैं। अपक्षयित चट्टान की अपरदित सतह की गहराई 25 से 35 मीटर तक है।

बस्तर जिले का धरातलीय जल (Ground Water of Bastar District)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

धरातलीय जल : अपवाह तंत्र, जलप्रवाह, वाष्पोत्सर्जन, जलप्रवाह, सतही जल, तालाब, नदी, नालों के जल का मूल्यांकन, तालाबों की संग्रहण क्षमता, जल की गुणवत्ता।

धरातलीय जल


जल जीवन के लिये अपरिहार्य है। जल के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है। इसलिये जल संसाधनों का सही आकलन, त्वरित गति से विकास, समुचित उपयोग एवं एकरूपता के लिये विभिन्न माध्यमों से किए जा रहे प्रयासों में परस्पर समन्वय हेतु समग्र दृष्टि से विश्लेषण आवश्यक है।

जल धाराओं का जल ही सतही जलपूर्ति के रूप में सामान्यत: उपलब्ध जल है। बस्तर जिला मुख्यत: इंद्रावती-गोदावरी एवं महानदी द्वारा अपवाहित है। तर्री, हटकुल एवं दूध, महानदी प्रक्रम की प्रमुख नदियाँ हैं। जिले की कुल सतही जल उपलब्धता का 5.58 प्रतिशत जल (1026 लाख घन मीटर) 2,660 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत महानदी क्रम की नदियों द्वारा संग्रहित किया जाता है। गोदावरी क्रम की इंद्रावती एवं सबरी नदी जिले के पश्चिमी भाग एवं दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में अपवाह का स्वरूप निर्मित करती है। इंद्रावती नदी जिले की कुल सतही जल उपलब्धता का 69.20 प्रतिशत जल (12,710 लाख घन मीटर) 26,560 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में संग्रहित करती है। सबरी नदी जिले के कुल सतही जल उपलब्धता का 14.33 प्रतिशत जल (2,632 लाघ घन मीटर) 5,700 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से संग्रहित करती है। निम्न गोदावरी नदी जिले के कुल सतही जल उपलब्धता का 10.87 प्रतिशत जल (1,997 लाख घन मीटर) 4,260 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से संग्रहित करती है।

जिले में सतही जल की कुल आवक 18,365 लाख घन मीटर वार्षिक है, जो 39,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से संग्रहित होती है। जिले में इन नदियों की लंबाई 640 किलोमीटर है, जिनके जल संग्रहण क्षेत्र एवं उपलब्ध जलराशि का विवरण तालिका क्र. 3.1 में दर्शाया गया है।

बस्तर जिले की जल संसाधन का मूल्यांकन (Water resources evaluation of Bastar)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

वर्षा : वर्षा का वितरण, वार्षिक वितरण, मासिक वितरण, वर्षा के दिन, वर्षा की तीव्रता, वर्षा की परिवर्तनशीलता, वर्षा की प्रवृत्ति एवं वर्षा की संभाव्यता।

वाष्पन क्षमता : मिट्टी में नमी एवं उसका उपयोग, नमी, जल अल्पता (जलाभाव), जलाधिक्य, सूखा (अनावृष्टि), जलवायु विस्थापन

जल संसाधन का मूल्यांकन


वर्षा : प्राकृतिक जल का बहाव एवं वाष्पोत्सर्जन की पूर्ति वर्षा द्वारा होती है। जल संसाधन संभाव्यता, विकास एवं उपयोग की दृष्टि से वर्षा की विचलनशीलता गहनता और प्रादेशिक व्यवस्था के लिये इसका विस्तृत ज्ञान आवश्यक है।

बस्तर जिले में 95 प्रतिशत वार्षिक वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसून के द्वारा जून से सितंबर के मध्य प्राप्त होती है। बस्तर जिले की औसत वार्षिक वर्षा 1,371 मिमी है। जिसके वितरण में स्थानिक विशेषताएँ विद्यमान है। जिले में जहाँ जून में मानसून का प्रारंभ एकाएक होता है, वहीं अक्टूबर के मध्य तक इसका निवर्तन हो जाता है।

बस्तर जिले की भौगोलिक पृष्ठभूमि (Geography of Bastar district)

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

भौतिक पृष्ठभूमि :


स्थिति एवं विस्तार, भू-वैज्ञानिक संरचना, धरातलीय स्वरूप, मिट्टी, अपवाह, जलवायु, वनस्पति।

सांस्कृतिक पृष्ठभूमि :

जनसंख्या
जनसंख्या का वितरण, घनत्व, जनसंख्या का विकास, आयु एवं लिंग संरचना, व्यावसायिक संरचना, अर्थव्यवस्था, भूमि उपयोग, कृषि तथा पशुपालन, खनिज परिवहन तथा व्यापार।

भौगोलिक पृष्ठभूमि


स्थिति एवं विस्तार :
बस्तर जिला भारत के मध्य प्रदेश राज्य के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। बस्तर जिला पूर्व में उड़ीसा, पश्चिम में महाराष्ट्र, दक्षिण में आंध्र प्रदेश एवं उत्तर में रायपुर तथा दुर्ग जिले द्वारा सीमांकित है।

बस्तर जिला दण्डकारण्य पठार का उत्तरी हिस्सा है। इस जिले से पूर्वी समुद्र तट की दूरी लगभग 200 किमी है। बस्तर का अधिकांश क्षेत्र पठारी है। इसका विस्तार 170-46’ उत्तरी अक्षांश से 20 0-35’ उत्तरी अक्षांश तक तथा 800-15’ पूर्वी देशांतर से 820-15’ पूर्वी देशांतर तक है। बस्तर जिले की उत्तर दक्षिण लंबाई लगभग 288 किमी तथा पूर्व-पश्चिम चौड़ाई 200 किमी है। इसका क्षेत्रफल 39,144 वर्ग किमी है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह जिला भारत के केरल, मणिपुर, मेघालय, जैसे राज्यों से तथा बेल्जियम, फिलीपींस और इजराइल जैसे देशों से भी बड़ा है।

जिले की समुद्र सतह से सबसे कम ऊँचाई कोंटा (278.37 मीटर) तथा अधिक ऊँचाई बैलाडीला (848 मीटर) की है। बस्तर जिला प्रशासनिक दृष्टि से 13 तहसीलों और 32 विकासखंडों में विभाजित है। बस्तर जिले में कुल 3,715 ग्राम 4 नगर और 3 नगरपालिका क्षेत्र है। जगदलपुर बस्तर जिले का सबसे बड़ा नगर है, जो जिला मुख्यालय है। इसके अतिरिक्त कांकेर, किरंदुल और कोण्डागाँव अन्य नगर हैं। जगदलपुर, कांकेर और कोण्डागाँव नगरपालिका क्षेत्र है। बस्तर जिले में सात एकीकृत आदिवासी विकास परियोजनाएँ -

1. कांकेर तथा भानुप्रतापपुर
2. कोंडागाँव
3. जगदलपुर
4. दंतेवाड़ा
5. सुकमा

प्रस्तावना : बस्तर जिले में जल संसाधन मूल्यांकन एवं विकास एक भौगोलिक विश्लेषण (An Assessment and Development of Water Resources in Bastar District - A Geographical Analysis

Author: 
कु. प्रीति चन्द्राकर
Source: 
भूगोल अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (म.प्र.), शोध-प्रबंध 1997

पृथ्वी पर जीवन को सतत बनाये रखने के लिये प्राण वायु के बाद जल दूसरा महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक भौतिक पदार्थ है। जल और मृदा प्रकृति के आधारभूत संसाधन हैं, जो जैव जगत के लिये पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता के अनुसार ही मानव समाज सांस्कृतिक भू-दृश्य की रचना करता है।

उपसंहार

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

राजस्थान में जल की भीषण स्थिति को देखते हुए भविष्य में जल विरासत को सहेज कर रखना अति आवश्यक है। जल संरक्षण की परम्परा के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को हाड़ौती के संदर्भ में देखने पर ज्ञात होता है कि मालवा के पठार की उपत्यका से बहकर आने वाली जल राशि एवं वर्षाजल को संरक्षित करने की दिशा में रियासत के समय से ही वहाँ के शासकों ने कदम उठाये हैं।

हाड़ौती के जलाशय निर्माण एवं तकनीक (Reservoir Construction & Techniques in the Hadoti region)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

प्राचीन ग्रंथों में प्रत्येक गाँव या नगर में जलाशय होना आवश्यक बतलाया गया है। राजवल्लभ वास्तुशास्त्र1 के लेखक मण्डन ने भी बड़े नगर के लिये कई वापिकाएँ, कुण्ड तथा तालाबों का होना अच्छा माना है। भारतीय धर्म में जलाशय निर्माण को एक बहुत बड़ा पुण्य कार्य माना गया है, किन्तु इस आध्यात्मिक भावना का भौतिक महत्त्व भी रहा है क्योंकि जलाशय एक ओर सिंचाई के श्रेष्ठ साधन बनते थे, वहीं दूसरी ओर जन सामान्य को पेयजल की कठिनाई से मुक्त भी करते थे। शासक एवं उनके सामन्त जलाशय निर्माण में पर्याप्त रुचि लेते थे।

जलाशयों में पाषाण की भित्तियां एवं घाटों का निर्माण हुआ करता था। घाटों में विभिन्न रेखाकृतियाँ उभार कर उन्हें कलात्मक बनाया जाता था। इनके ऊपरी भाग में छतरियाँ बनी रहती थी और चारों ओर से या एक ओर से सीढ़ियाँ बनी रहती थी, जो नीचे तक पहुँच जाती थी। जलाशय के पास ही जलाशय की स्थापना के अवसर पर एक स्तम्भ लगाने की भी परम्परा रही है। यह स्तम्भ भी कलात्मक हुआ करता था। स्तम्भ के ऊपरी भाग में मन्दिर के समान प्रायः वर्गाकृति में शिखर बना रहता था। शिखर के नीचे चारों ओर ताके होती थी जिनमें आराध्य देवताओं की प्रतिमाएँ उभारी जाती थी। ताकों में प्रायः गणपति की प्रतिमाएँ होती थी। ताकों के नीचे चतुष्कोणीय, षट्कोणीय, अथवा षोडश स्तम्भ बने रहते थे। स्तम्भ के मूल भाग पर प्रायः जलाशय निर्माता से सम्बन्धित व जलाशय निर्माण से सम्बन्धित सूचनाओं का लेख भी उत्कीर्ण करवा दिया जाता था। बावड़ी के प्रवेश मार्ग में अलंकरण की दृष्टि से कतिपय आकृतियाँ उर्त्कीण की जाती रही हैं तथा बीच-बीच में प्रतोलियो (पालों) का निर्माण भी होता रहा।2

बावड़ी स्थापत्य

हाड़ौती के प्रमुख जल संसाधन (Major water resources of Hadoti)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

भारत के प्राचीन ग्रंथों में आरम्भ से ही जल की महत्ता पर बल देते हुए इसके संचयन पर जोर दिया गया है। ‘जलस्य जीवनम’ के सिद्धान्त को चरितार्थ करते हुए विश्व की समस्त प्राचीन सभ्यताओं का विकास विभिन्न नदियों की घाटियों में हुआ है।1 इसका मुख्य कारण यह है कि जल मानव जीवन के सभी पक्षों से जुड़ा रहा है। जल की उपयोगिता के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए मानव समाज ने जल संचय अथवा जल संग्रह के ऐसे अनेक स्रोतों का निर्माण तथा अन्वेषण किया, जिनसे जलापूर्ति की समस्याओं का निराकरण किया जा सके।

हाड़ौती आरम्भ से अनेक जल स्रोतों से समृद्ध रहा है। लोक कल्याण की भावना से युक्त होने के कारण यहाँ के नरेशों ने समय-समय पर अनेक जल स्रोतों का निर्माण करवाया। हाड़ौती के कृषि प्रधान होने के कारण कृषि भूमि को सिंचित करने की आवश्यकता महसूस हुई परिणामस्वरूप यहाँ के शासकों ने अनेक तालाबों, कुण्डों, बावड़ियों को बनवाया। ये कुण्ड व बावड़ियाँ राज्य की जनता के लिये सदियों तक पीने योग्य पानी उपलब्ध करवाते रहे। हाड़ौती के यह जल स्रोत जहाँ एक ओर यहाँ के नरेशों की जन कल्याण की भावना की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं तो वहीं दूसरी ओर ये हमारी सांस्कृतिक जरूरतों को भी सदैव पूर्ण करते रहे हैं।

समाज के समृद्ध लोगों के अलावा कभी-कभी दास दासियों और कम सुविधा सम्पन्न लोग भी इन जलस्रोतों का निर्माण करवाते थे, जो निजी और सार्वजनिक उपयोग हेतु बनाये जाते थे। शहरी परकोटे के अन्दर बनी बावड़ियाँ निर्माता परिवार की महिलाओं के स्नान के उपयोग के लिये होती थी। विशेष अनुमति लेकर बावड़ियों का उपयोग रास्तों से गुजरने वाले व्यापारिक काफिलों द्वारा भी किया जाता था। इसके अलावा बाहर से साधारण या पेयजल स्रोत दिखने वाली ये बावड़ियाँ सैनिक अभियानों के समय व आपातकालीन स्थितियों में एक नये रूप में उभरकर सामने आती थी।2