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कृषकों का कृषि प्रारूप कृषि उत्पादकता एवं खाद्यान्न उपलब्धि की स्थिति

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के फसलों के प्रतिरूप में परिवर्तन की संभावना के विषय में दो मत हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि फसलों के प्रतिरूप में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है जबकि कुछ विद्वान मानते हैं कि सुविचारित नीति के सहारे इसे बदला जा सकता है। वसु केडी ने यह मत व्यक्त किया है ‘‘परंपराबद्ध तथा ज्ञान के अत्यंत निम्न स्तर वाले देश के कृषक प्रयोग करने की उद्यत नहीं होते हैं, वे प्रत्येक बात को विरक्ति और भाग्यवाद की भावना से स्वीकार करते हैं, उनके लिये कृषि वाणिज्य, व्यापार की वस्तु न होकर जीवन की एक प्रणाली है एक ऐसे कृषि प्रधान समाज में जिसके सदस्य परंपराबद्ध और अशिक्षित हैं, फसल में परिवर्तन की अधिक संभावना नहीं रहती है।’’ अब इस मत को सही नहीं समझा जाता है जैसा कि पंजाब में फसल परिवर्तन से स्पष्ट है। अब यह बात अधिकांश विद्वानों द्वारा स्वीकार कर ली गई है कि भारत जैसे देश में भी फसल प्रतिरूप बदला जा सकता है और इसे बदलना चाहिए। फसलों के प्रतिरूप को निर्धारित करने वाले बहुत से कारक होते हैं जैसे भौतिक एवं तकनीकी तत्व आर्थिक तत्व यहाँ तक कि राजनीतिक तत्व भी फसल प्रतिरूप को प्रभावित करते हैं। इनमें से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्व आर्थिक तत्व होते हैं।

(अ) भौतिक एवं तकनीकी तत्व :
किसी प्रदेश का फसल प्रतिरूप उसकी भौतिक विशिष्टताओं अर्थात मिट्टी, जलवायु, वर्षा तथा मौसम आदि पर निर्भर करता है। उदाहरण स्वरूप एक ऐसे शुष्क क्षेत्र में जिसमें थोड़ी वर्षा होती है तथा मानसून अनिश्चित रहता है वहाँ पर ज्वार तथा बाजरा फसलों की प्रधानता होती है क्योंकि ये फसलें कम वर्षा में भी उगाई जा सकती हैं। फसल चक्र बहुत कुछ भौतिक कारणों से प्रभावित होता है किंतु तकनीकी उपायों से फसल चक्र बदला जा सकता है, तो भी कुछ परिस्थितियों में भौतिक बाधा निर्णायक होते हैं। उदाहरण के लिये पंजाब के संगरूर और लुधियाना जिलों में जलरोध के कारण चावल के उत्पादन क्षेत्र में वृद्धि हुई है क्योंकि चावल की फसल अधिक पानी को सहन कर सकती है।

कृषि उत्पादकता एवं जनसंख्या संतुलन (भाग-2)

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

प्राकृतिक संसाधन किसी देश की अमूल्य निधि होते हैं, परंतु उन्हें गतिशील बनाने, जीवन देने और उपयोगी बनाने का दायित्व देश की मानव शक्ति पर ही होता है, इस दृष्टि से देश की जनसंख्या उसके आर्थिक विकास एवं समृद्धि का आधार स्तंभ होती है। जनसंख्या को मानवीय पूँजी कहना कदाचित अनुचित न होगा। विकसित देशों की वर्तमान प्रगति, समृद्धि व संपन्नता की पृष्ठभूमि में वहाँ की मानव शक्ति ही है जिसने प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और शासन द्वारा उन्हें अपनी समृद्धि का अंग बना लिया है, परंतु हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि जनसंख्या देश की मानवीय पूँजी की श्रेणी में तभी आ सकती है जबकि वह शिक्षित हो, कुशल हो, दूरदर्शी हो और उसकी उत्पादकता उच्च कोटि की हो। कदाचित यदि ऐसा नहीं होता है तो मानवीय संसाधन के रूप में वह वरदान के स्थान पर एक अभिशाप से परिणित हो जायेगी क्योंकि उत्पादन कार्यों में उसका विनियोजन संभव नहीं हो पायेगा। स्पष्ट है कि मानवीय शक्ति किसी देश के निवासियों की संख्या पर नहीं वरन गुणों पर निर्भर करती है।

कृषि उत्पादकता एवं जनसंख्या संतुलन

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

किसी भी क्षेत्र की कृषि जटिलताओं को समझने के लिये उस क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली समस्त फसलों का एक साथ अध्ययन आवश्यक होता है। इस अध्ययन से कृषि क्षेत्रीय विशेषतायें स्पष्ट होती हैं। सस्य संयोजन अध्ययन के अध्यापन के अभाव में कृषि की क्षेत्रीय विशेषताओं का उपयुक्त ज्ञान नहीं होता है। फसल संयोजन स्वरूप वास्तव में अकस्मात नहीं होता है अपितु वहाँ के भौतिक (जलवायु, धरातल, अपवाह तथा मिट्टी) तथा सांस्कृतिक (आर्थिक, सामाजिक तथा संस्थागत) पर्यावरण की देन है। इस प्रकार का अध्ययन मानव तथा भौतिक पर्यावरण के सम्बंधों को प्रदर्शित करता है। मानव तथा भौतिक पर्यावरण के पारस्परिक सम्बंधों द्वारा ही संस्कृति का विकास होता है। अत: सस्य संयोजन के परिसीमन से क्षेत्रीय कृषि विशेषताओं एवं भौतिक तथा सांस्कृतिक वातावरण का कृषि पर प्रभाव दृष्टिगोचर होता है जिससे वर्तमान कृषि समस्याओं को भली-भाँति समझ कर समायोजन योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जा सकता है।

कृषि भूमि उपयोग का तकनीकी स्तर

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

प्रकृति ने अपनी उदारता से मनुष्य को विविध आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये विभिन्न साधनों का नि:शुल्क उपहार दिया है। प्राकृतिक परिवेश से मनुष्य को विभिन्न उपयोगों के लिये प्राप्त इन प्राकृतिक नि:शुल्क उपहारों को प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है। इन प्राकृतिक संसाधनों को जितनी कुशलता से प्रयोग योग्य वस्तुओं एवं सेवाओं में परिवर्तित कर लिया जाये, उतने ही श्रेयष्कर रूप में व्यक्ति की भोजन, आवास, वस्त्र, स्वास्थ्य और चिकित्सा, यातायात एवं संसार की आवश्यकताएँ पूरी हो सकती है। अत: यह कहा जा सकता है कि किसी अर्थव्यवस्था का आर्थिक विकास स्तर वहाँ उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों की कोई भी कमी अर्थव्यवस्था के आर्थिक विकास के स्तर को कुछ अंशों में सीमित करने में समर्थ है, परंतु यह भी निर्विवाद है कि मानवीय उद्यमशीलता और प्रौद्योगिक परिवर्तन प्राकृतिक संसाधनों की कमी के अभाव को निरस्त कर सकते हैं या एक महत्त्वपूर्ण अंश में कम कर सकते हैं, इसलिये विकास की अनिवार्यता के रूप में संसाधनों के विदोहन का पक्ष भी सक्षम, उपयोगी और समाज के अनुकूल होना चाहिए।

सामान्य भूमि उपयोग एवं कृषि भूमि उपयोग

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

देश का कुल क्षेत्रफल उस सीमा को निर्धारित करता है जहाँ तक विकास प्रक्रिया के दौरान उत्पत्ति के साधन के रूप में भूमि का समतल विस्तार संभव होता है। जैसे-जैसे विकास प्रक्रिया आगे बढ़ती है और नये मोड़ लेती है, समतल भूमि की माँग बढ़ती है, नये कार्यों और उद्योगों के लिये भूमि की आवश्यकता होती है व परम्परागत उपयोगों में अधिक मात्रा में भूमि की माँग की जाती है। सामान्यतया इन नये उपयोगों अथवा परम्परागत उपयोगों में बढ़ती हुई भूमि की माँग की आपूर्ति के लिये कृषि के अंतर्गत भूमि को काटना पड़ता है और इस प्रकार भूमि कृषि उपयोग से गैर कृषि कार्यों में प्रयुक्त होने लगती है। एक विकासशील अर्थव्यवस्था के लिये जिसकी मुख्य विशेषतायें श्रम अतिरेक व कृषि उत्पादों के अभाव की स्थिति का बना रहना है। कृषि उपयोग से गैर कृषि उपयोगों में भूमि का चला जाना गंभीर समस्या का रूप धारण कर सकता है। जहाँ इस प्रक्रिया से एक ओर सामान्य कृषक के निर्वाह श्रोत का विनाश होता है, दूसरी ओर समग्र अर्थ व्यवस्था की दृष्टि से कृषि पदार्थों की माँग और पूर्ति में गंभीर असंतुलन उत्पन्न हो सकते हैं। कृषि पदार्थों की आपूर्ति में अर्थव्यवस्था में अनेक अन्य गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकती है। इसलिये यह आवश्यक समझा जाता है कि विकास प्रक्रिया के दौरान जैसे-जैसे समतल भूमि की माँग बढ़ती है उसी के साथ ही बंजर परती तथा बेकार पड़ी भूमि को कृषि अथवा गैर कृषि कार्यों के योग्य बनाने के लिये प्रयास करना चाहिए। प्रयास यह होना चाहिए कि खेती-बाड़ी के लिये उपलब्ध भूमि के क्षेत्र में किसी प्रकार की कमी न आये वरन जहाँ तक संभव हो कृषि योग्य परती भूमि में सुधार करें। कृषि कार्यों के लिये उपलब्ध भूमि में वृद्धि ही की जानी चाहिए।

अध्ययन क्षेत्र की वर्तमान स्थिति

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

भौगोलिक स्थिति वर्षा एवं आर्द्रता मिट्टी, प्राकृतिक वनस्पतियाँ कृषि उद्योग सहकारी समितियाँ परिवहन एवं संचार सुविधायें जनसंख्या :


किसी भी अर्थव्यवस्था का स्वरूप, निर्धनता एवं संपन्नता, विविधीकरण एवं जीवन-यापन की गतिविधियाँ वहाँ के पर्यावरण, जिसमें प्राकृतिक संसाधन अत्यंत प्रमुख है, से प्रभावित होता है। वे समस्त वस्तुयें जो मनुष्य को प्रकृति से बिना किसी लागत के उपहार स्वरूप प्राप्त हुई है प्राकृतिक संसाधन कहलाती है। इस प्रकार किसी अर्थव्यवस्था की भौगोलिक स्थिति उपलब्ध भूमि एवं मिट्टी, खनिज पदार्थ, जल एवं वनस्पतियाँ आदि प्राकृतिक संसाधन माने जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की विशेषज्ञ समिति के अनुसार ‘‘मनुष्य अपने लाभपूर्ण उपयोग के लिये प्राकृतिक संरचना अथवा वातावरण के रूप में जो भी संसाधन प्राप्त करता है, उसे प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है। मिट्टी व भूमि के रूप में प्राकृतिक, साधन वनस्पति तथा पेड़ पौधों को पोषण देते हैं। इसके अतिरिक्त सतही और भूमिगत जल संसाधन मानव, पशु व वनस्पति जीवन के लिये अत्यंत आवश्यक पदार्थ है। जल विद्युत ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। और जल मार्गों पर परिवहन के विभिन्न साधनों का विकास निर्भर है।’’

प्रस्तावना : कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियाँ

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

आर्थिक विकास का ऐतिहासिक अनुभव और आर्थिक विकास की सैद्धांतिक व्याख्या यह स्पष्ट करते हैं कि आर्थिक विकास की प्रारंभिक अवस्था में प्रत्येक अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विकास अनुभव की पुष्टि करते हैं। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के राष्ट्रीय उत्पाद, रोजगार और निर्यात की संरचना में कृषि क्षेत्र का योगदान उद्योग और सेवा क्षेत्र की तुलना में अधिक होता है। ऐसी स्थिति में कृषि का पिछड़ापन सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को पिछड़ेपन में बनाये रखता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कमजोर वर्ग के लोग जिनमें लघु एवं अति लघु कृषक और कृषि श्रमिक सम्मिलित हैं, अधिकांशत: गरीबी के दुश्चक्र में फँसे रहते हैं और वे निम्नस्तरीय संतुलन में बने रहते हैं। इनकी जोत का आकार तो छोटा होता है साथ ही इनके पास स्थायी उत्पादक परिसंपत्ति की कमी बनी रहती है। इनकी गरीबी अर्थव्यवस्था के पिछड़ेपन का मुख्य कारण होती है।

विभिन्न विकसित देशों का आर्थिक इतिहास यह स्पष्ट करता है कि कृषि विकास ने ही उनके औद्योगिक क्षेत्र के तीव्र विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। आज के विकसित पूँजीवादी और समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं के विकास के आरंभिक चरण में कृषि क्षेत्र ने वहाँ के गैर कृषि क्षेत्र के विकास हेतु श्रमशक्ति, कच्चा पदार्थ, भोज्य सामग्री और पूँजी की आपूर्ति की है। इंग्लैंड में सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में कृषकों ने तकनीकी परिवर्तन द्वारा कृषि विकास का मार्ग अपनाया और इसके आधिक्य को गैर कृषि क्षेत्र के विकास में प्रयोग किया गया।

सारांश एवं निष्कर्ष : ऊपरी महानदी बेसिन में जल संसाधन मूल्यांकन एवं विकास

Author: 
कुबेर सिंह गुरुपंच
Source: 
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (मध्य प्रदेश) 492010, शोध-प्रबंध 1999

स्थिति एवं विस्तार


ऊपरी महानदी बेसिन दण्डकारण्य पठार के उत्तर, बघेलखण्ड पठार के दक्षिण तथा मैकाल श्रेणियों के पूर्व में 19047’ उत्तरी अक्षांश से 23007’ उत्तरी अक्षांश तथा 80017’ पूर्वी देशांतर से 83052’ पूर्वी देशांतर तक 73,951 वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत है प्रशासनिक दृष्टि से इनके अंतर्गत मध्य प्रदेश के रायपुर, दुर्ग, राजनांदगाँव, बिलासपुर, रायगढ़ जिले के (जशपुर तहसील को छोड़कर) व कांकेर जिले के कांकेर तहसील का क्षेत्र आता है। इसके अंतर्गत 14,723 गाँव, 5239 पंचायतें, 90 विकासखंड, 61 तहसीलें एवं 68 नगर आते हैं। इस प्रदेश की जनसंख्या 1,33,26,396 व्यक्ति (1991) है।

ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि :


ऊपरी महानदी बेसिन ऐतिहासिक काल में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। धार्मिक दृष्टि से महानदी को चित्रोत्पल्ला कहते हैं। बेसिन प्रदेश में सन 1741 से 1854 तक भोंसला, अंग्रेजों एवं मराठों के आधिपत्य में था। यह प्रदेश सन 1947 मध्यप्रांत एवं बरार राज्य का हिस्सा बना और सन 1956 में मध्य प्रदेश राज्य का हिस्सा बन गया, तब से यह आर्थिक, राजनैतिक, व्यापारिक एवं धार्मिक रूप में विख्यात है।

वैज्ञानिक संरचना :


ऊपरी महानदी बेसिन कडप्पा शैल समूह, धारवाड़ एवं गोंड़वाना शैल समूह द्वारा निर्मित है। इन शैल समूहों की मोटाई 30-35 मीटर तक है। यहाँ प्राचीनतम एवं नवीनतम दोनों क्रम की चट्टानें हैं।

वावच :

जल संसाधन संरक्षण एवं विकास

Author: 
कुबेर सिंह गुरुपंच
Source: 
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (मध्य प्रदेश) 492010, शोध-प्रबंध 1999

जल एक बहुमूल्य संसाधन है। यह कहीं विकास का तो कहीं विनाश का कारक बनता है। जनसंख्या वृद्धि एवं भावी आवश्यकता को देखते हुए जल के एक-एक बूँद की उपयोगिता बढ़ गयी है। अत: जनसंख्या दबाव तथा आवश्यकतानुसार जल संसाधन का उचित उपयोग करने का योजनानुसार लक्ष्य रखा गया है। जल संरक्षण एवं विकास वर्षा की बूँद का पृथ्वी पर गिरने के साथ ही करना चाहिए। इस हेतु नदी मार्गों पर बांधों एवं जलाशयों का निर्माण करना होगा ताकि भविष्य में हमें पीने को शुद्ध पेयजल, सिंचाई, मत्स्यपालन एवं औद्योगिक कार्यों हेतु जल उपलब्ध हो सके। इसके साथ ही बाढ़ों से मुक्ति मिल सके एवं कम वर्षा, नीचे जल स्तर, सूखा ग्रस्त एवं अकालग्रस्त क्षेत्रों में नहरों आदि में जल की पूर्ति हो सके।

जल संसाधन की वर्तमान समस्याएँ :


जल का प्रधान एवं महत्त्वपूर्ण स्रोत मानसूनी वर्षा है। ऊपरी महानदी बेसिन में मानसूनी से वर्षा होती है। इस कारण वर्षा की अनियमितता, अनिश्चितता एवं असमान वितरण पाई जाती है। इस असमानता को दूर करने के लिये बेसिन में जल संसाधन संरक्षण की आवश्यकता है।

जल संरक्षण :


जल एक प्राकृतिक उपहार है, जिसका विवेकपूर्ण उपयोग किया जाना चाहिए। ऊपरी महानदी बेसिन में जल का मुख्य स्रोत सतही एवं भूमिगत जल है। सतही जल में नदियाँ, नहरें एवं जलाशय है जबकि भूमिगत जल में कुआँ एवं नलकूप प्रमुख है। इन जल संग्राहकों से जल संग्रह कर 96.99 प्रतिशत भाग में सिंचाई किया जाता है एवं शेष 3.01 प्रतिशत जल का उपयोग औद्योगिक एवं अन्य कार्यों हेतु होता है।