Latest

भूजल में बढ़ते नाइट्रेट एवं फ्लोराइड का कहर एवं उसका प्रबंधन

Author: 
डॉ. डी.डी. ओझा, एच.आर. भट्ट
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

सृष्टि की संरचना में जल का अपना अलग ही वैशिष्टय है। यह पंचमहाभूतों में एक महत्वपूर्ण घटक है। प्रत्येक जीव की सभी शारीरिक क्रियाएं जलाधारित होने के कारण जल को जीवन की दी गई है। जल के उभयचारी रूप हैं- रोगकारक एवं रोगशामक। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिवेदन के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत रोगों का कारण भी जल है। इसी प्रकार आयुर्वेदानुसार जल कई रोगों का शामक है। बढ़ती हुई जनसंख्या, शहरीकरण तथा औद्योगिकीकरण जैसे मानवीय कारणों ने हमारे पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है। आज बढ़ रहे रासायनिक उर्वरकों तथा किटनाशियों के प्रयोग ने हमारे जल के सभी स्रोतों, तथा तालाबों, कुओं, नदियों एवं सागर को भी प्रदूषित कर दिया है।

भू-जल, जो कि देश में जलापूर्ति का एक प्रमुख स्रोत है, में बढ़ते हुइ नाइट्रेट, फ्लोराइड तथा आर्सेनिक की मात्रा अमृत रूपी जल को विष बना रही है। हमारे देश के लगभग 20 राज्यों के 2.5 करोड़ लोग फ्लोरोसिस की बीमारी से ग्रसित हैं। पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में आर्सेनिक की आविषालुता तथा देश के अनेक राज्यों के भू-जल में नाइट्रेट का कहर जल को आविषालु (Toxic) बना रहा है। अतः इस दिशा में समुचित प्रयास एक इस चेतना की महती आवश्यकता है।

जल की गुणवत्ता निर्धारण में इसके भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वस्तुतः जल में कोई स्वाद एवं गंध नहीं होती है, परन्तु भूमि के अनुसार उसमें जो खनिज लवण एवं क्षार आदि मिल जाते हैं, वे ही जल का स्वाद प्रकट करते हैं। इसी प्रकार जल में गंध कुछ वनस्पतियों अथवा अन्य पदार्थ इन स्रोतों में मिल जाने के कारण ही होती है।

रासायनिक दृष्टि से पेयजल की उपयुक्तता निर्धारण में नाइट्रेट तथा फ्लोराइड की महती भूमिका होती है। हमारे देश के कई राज्यों के भू-जल में नाइट्रेट, फ्लोराइड एवं आर्सेनिक की सांद्रता अनुमेय परास से अधिक हो जाने के कारण लाखों लोगो इनके दुष्प्रभाव से प्रभावित हो चुके हैं क्योंकि देश के अधिकांश भागों में जलापूर्ति भू-जल पर ही आश्रित है।

जल संसाधन के प्रबंधनः वाघाड़ परियोजना (वाघाड़ महासंघ जिला-नासिक, महाराष्ट्र) का अध्ययन

Author: 
गोवर्धन. कुलकर्णी, ईश्वर.चौधरी, डॉ. संजय. वेलकरे, भरत. कावले
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

हिन्दुस्तान में सहभागी सिंचाई की परंपरा है। किसान भाई जल स्रोतों का रखरखाव और परिचालन अपनी भागीदारी से करते हैं। महाराष्ट्र के माल गुजारी तलाब फड़ पद्धति राजस्थान की वाराबंदी लोक सहभाग से सिंचाई के उत्तम उदाहरण है। मुगलों के जमाने में भी जल सिंचाई परियोजना बनाई जाती थी जिसे प्रबंधन हेतु किसानों के हाथों सौप दिया जाता था। उस वक्त किसानों में उन योजनाओं के प्रति अपनेपन की भावना थी। इसी भावना से किसान अपना समर्पित सहयोग परियोजना के रखरखाव में देता था। स्वतंत्रता पूर्व किसान के पानी पर हक जमाने के लिए कुछ अधिकारवादी नीतियों की वजह से किसानों का सहयोग जल वितरण क्षेत्र से हटता गया। किसान का अपना पानी पराया हो गया। जैसे-जैसे किसानों का सहयोग घटता गया सहभागी सिंचाई का सूरज ढलने लगा।

आजादी के बाद भी वही नीतियाँ बनी रही। इसका नतीजा देश में ढेर सारे डैम बनने के बावजूद भी सिंचाई के क्षेत्र में बढ़ोतरी के बजाय कटौती ही होने लगी। डैम में पानी बारिश का है तो वह मुफ्त में ही मिलना चाहिए आम किसानों की ये सोच बन गई। राजनीति ने इस मानसिकता को बढ़ावा दिया। दूसरी ओर चाहे 50 हे. की सिंचाई हो या 500 हे. मेरी तनख्वाह पर उसका कोई असर होने वाला नहीं। ये भी मानसिकता बनी इन्हीं के कारण डैम का पानी पूरे लाभ क्षेत्र को मिलने के बजाय मुट्ठी भर लोगों का वेतन बन बैठा। टेल के किसान को सिंचाई के लिए पानी नहीं और सरकार को सिंचाई करने का महसुल नहीं। महसुल ना मिलने से जल वितरण व्यवस्था का रखरखाव नहीं और वितरण व्यवस्था सही न होने से जल वितरण नहीं। इसी चक्र में नहर का पानी उलझ गया।

भारतवर्ष में जल क्षेत्र में संवैधानिक प्राविधान तथा अन्तर्राष्ट्रीय एवं अन्तर्राज्यीय जल मतभेद

Author: 
पुष्पेन्द्र कुमार अग्रवाल, डा. शरद कुमार जैन
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

भारतवर्ष में जल का उपयोग राज्यों के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आता है। यह सम्भव है, कि किसी राज्य में पूर्णतः प्रवाहित होने वाली नदी के पर्यावरणीय, एवं सामाजिक प्रभाव उदाहरणतः जल संभरण, जल ग्रसनता इत्यादि दूसरे राज्य पर पड़ें। इसके अतिरिक्त किसी राज्य में होने वाली भू-जल निकासी का प्रभाव निकटवर्ती राज्य पर पड़ सकता है। किसी राज्य में प्रवाहित होने वाली नदी पर बनने वाले बाँध के जल प्लावन क्षेत्र की सीमा किसी अन्य राज्य या देश में हो सकती है। जल के क्षेत्र में उपरोक्त समस्त पहलू देश में जल संसाधनों के प्रयोग के लिए परस्पर सहयोग को महत्व प्रदान करते हैं।

भारतीय संविधान के अनुसार राज्य के जल संसाधनों से संबंधित नियम/कानून निर्मित करने का कार्य राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में निहित है। संसद अन्तर्राज्यीय नदियों के नियमन एवं विकास से संबंधित नियमों/कानून निर्मित करने का कार्य करती है। अतः जल के क्षेत्र में संविधानिक प्राविधान राज्य सूची की प्रविष्टि 17, केन्द्र सूची की प्रविष्टि 56 एवं संविधान के अनुच्छेद 262 में निहित हैं। इन प्रावधानों के अनुसार वृहत्त एवं मध्यम सिंचाई, जलशक्ति, बाढ़ नियंत्रण एवं बहुउद्देशीय परियोजनाओं के लिए केन्द्र सरकार की अनुमति लेना अत्यन्तावश्यक है।

जल सम्बन्धी अधिकारों में जल के उपयोग का अधिकार निहित है। भारतीय उपयोगाधिकार अधिनियम (1882) के अनुसार प्राकृतिक वाहिकाओं में प्रवाहित होने वाली नदियों/सरिताओं के जल के एकत्रीकरण, नियमन एवं वितरण का पूर्णाधिकार सरकार के पास है।

सुदूर संवेदन एवं भौगोलिक सूचना तंत्र प्रणाली के प्रयोग द्वारा जल संसाधनों का अनुप्रयोग

Author: 
तनवीर अहमद, एस. के. जैन, पी.के. अग्रवाल, देवेंन्द्र सिंह राठौर
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

जल मानव जीवन के लिए प्रकृति द्वारा प्रदत्त एक अनमोल देन है। जल मनुष्य के जीवन, कृषि तथा जल विद्युत परियोजनाओं के लिए आवश्यक संसाधन है। वर्षा जल का सामयिक तथा स्थानिक रूप से असमान होना, बाढ़ एवं सूखा आदि समस्याओं का प्रमुख कारण है। बाढ़ एवं सूखा जैसी समस्याओं सहित अन्य विविध समस्याओं के समाधान तथा जल की निरंतर मांग में वृद्धि होने के कारण, जल संसाधनों का उचित उपयोग तथा प्रबंधन अति आवश्यक है। जल संसाधनों का सर्वेक्षण तथा मानचित्र प्रभावी जल प्रबंधन के लिए आवश्यक कार्य है। स्थलाकृति मानचित्रण, हवाई छायांकन जैसी परम्परागत विधियों का प्रयोग काफी समय लेता है और इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। सुदूर संवेदन एवं भौगोलिक सूचना तंत्र प्रणाली का उपयोग पिछले कुछ वर्षों में एक आधुनिक पद्धति के रूप में किया जा रहा है।

सुदूर संवेदन विधि द्वारा एक बड़े क्षेत्र का मापन अत्यधिक कम समय में किया जा सकता है। पिछले लगभग 20 वर्षों में विभिन्न क्षमताओं के सुदूर संवेदन उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किए गए हैं, जिससे निरंतर सुदूर संवेदन आँकड़े प्राप्त किए जा रहे हैं। इन आँकड़ों का साफ्टवेयर द्वारा विश्लेषण करके भूमि से संबंधित अनेकों मानचित्र बनाए जा सकते हैं। परन्तु जल संसाधन के उपयुक्त प्रबंधन के लिए उपयोग में लाए जा रहे निर्देशों तथा अन्य विधियों के लिए सुदूर संवेदन आँकड़े पर्याप्त नहीं है। इन आँकड़ों का उपयोग करने हेतु भौगोलीय सूचना तंत्र प्रणाली एक आधुनिक तकनीक है। सुदूर संवेदी और भौगोलीय सूचना तंत्र प्रणालियों का जल संसाधन एवं प्रबंधन के अनेक क्षेत्रों, जैसेः भू-उपयोग/भू-आच्छादन वर्गीकरण, बाढ़ मैदान प्रबंधन, जल विभाजकों का मानचित्रण एवं प्रबंधन, आवाह क्षेत्र अध्ययन, हिमाच्छादन मानचित्रण, जलाशय अवसादन, जलगुणवत्ता अध्ययन और भूजल अध्ययन इत्यादि में अत्यधिक उपयोग किया जा रहा है। इस प्रपत्र में सुदूर संवेदन एवं भौगोलिक सूचना तंत्र तकनीकी के उपयोग पर प्रकाश डाला गया है।

जल शुद्धिकरण हेतु उपलब्ध आधुनिक तकनीकें

Author: 
मुकेश कुमार शर्मा, बबीता शर्मा, राकेश गोयल, बीना प्रसाद
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

रिवर्स ऑसमोसिसरिवर्स ऑसमोसिसदिन-प्रतिदिन बढ़ते औद्योगीकरण तथा अधिक कृषि उत्पादन के लिए अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग से जल प्रदूषित होता जा रहा है। आज प्रत्येक व्यक्ति पेयजल की जलगुणवत्ता के प्रति सजग हो गया है। प्रस्तुत अध्ययन में जल शुद्धिकरण हेतु उपलब्ध विभिन्न तकनीकों एवं बाजार में उपलब्ध वाटर प्योरिफायर खरीदने से पहले विभिन्न जानकारियों पर भी प्रकाश डाला गया है तथा विभिन्न वाटर प्योरिफायर की क्षमता के बारे में भी जानकारी दी गई है।

साफ पेयजल की पर्याप्त जलापूर्ति मानव जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है। आज भी विश्व में लाखों लोग इससे वंचित है। नदियों, झीलों तथा तालाबों का जल प्राकृतिक, मानवीय तथा अन्य प्रकार के अपशिष्टों से प्रदूषित हो गया है। दिन-प्रतिदिन बढ़ते औद्योगीकरण तथा अधिक कृषि उत्पादन के लिए रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग से भी जल प्रदूषित होता जा रहा है।

जल शुद्धिकरण हेतु उपलब्ध आधुनिक तकनीकें (Advanced techniques available for water purification)


सारांश:


दिन-प्रतिदिन बढ़ते औद्योगीकरण तथा अधिक कृषि उत्पादन के लिये अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग से जल प्रदूषित होता जा रहा है। आज प्रत्येक व्यक्ति पेयजल की जल गुणवत्ता के प्रति सजग हो गया है। प्रस्तुत अध्ययन में जल शुद्धिकरण हेतु उपलब्ध विभिन्न तकनीकों एवं बाजार में उपलब्ध वाटर प्युरीफायर खरीदने से पहले विभिन्न जानकारियों पर भी प्रकाश डाला गया है तथा इनकी क्षमता के बारे में भी जानकारी दी गई है।

Abstract

अंकीय चित्र प्रणाली द्वारा पोंग (राणा प्रताप सागर) जलाशय का तलछट आंकलन

Author: 
संदीप शुक्ला, संजय कुमार जैन, जयवीर त्यागी
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

जलाशयों के साथ अवसाद या तलछट का होना एक मुख्य घटक है। जो कि जलाशयों की अवधि को हानी पहुँचाता है। अवसाद कण साधारणतः दूर तक फैले आवाह क्षेत्र में नदी बहाव से हुए मृदा अपरदन प्रक्रिया से उत्पन्न होते हैं। जब नदी का बहाव जलाशय में कम होता है तो उसके साथ-साथ अवसाद भी जलाशय में जमा हो जाता है और इसकी जलधारण क्षमता को कम कर देता है। जलाशय की जलधारण क्षमता में सीमा से परे हुई क्षति हमारे मूल उद्देश्य में बाधा उत्पन्न करती है जिसके लिए जलाशय का निर्माण किया गया होता है। इसीलिए जलाशयों की उपयोगी अवधि और तलछट जमा होने की दर को ज्ञात करने के लिए आवश्यक है कि उनका एक निश्चित अंतराल पर आंकलन किया जाए। इस आंकलन हेतु कुछ पारंपरिक विधियाँ जैसे कि जल सर्वेक्षण एवं अन्तर्वाह-बहिवाह प्रक्रम उपयोग में लाई जाती हैं जो कि मंहगी होने के साथ-साथ ज्यादा समय लेती है। इसीलिए समय और मंहगी होने के कारण पिछले कुछ वर्षों से सुदूर संवेदन विधि का इस क्षेत्र में सफलता पूर्वक प्रयोग हुआ है। जिसमें उपग्रह द्वारा जलाशय के फैलाव क्षेत्र का आसानी से अध्ययन किया जा सकता है।

यह विधि हिमालय की तराई में बने भारत गंगेय मैदान के ऊपरी किनारे पर स्थित ब्यास नदी पर बने पोंग जलाशय के तलछट जमा होने की दर की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रयोग में लाई गई है। यह जलाशय हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जनपद में स्थित है। इस विधि में जलाशय में एकत्रित अवसाद मात्रा को ज्ञात करने के लिए भारतीय उपग्रह (पी-6) के संवेदक लिस-तृतीय से प्राप्त आंकड़ों का वर्ण क्रमीय विश्लेषण किया गया है। यह प्रपत्र दर्शाता है कि जलाशय के सजीव संग्रहण क्षेत्र की क्षमता 7292 मिलियन घ.मी. तथा निर्जीव संग्रहण क्षेत्र की क्षमता 8570 मिलियन घ.मी. है। पूर्व रूपेण भरे जलाशय का फैलाव क्षेत्र लगभग 240 वर्ग कि.मी. तथा पोंग बांध तक इसकी नदी ब्यास का आवाह क्षेत्र लगभग 12377.496 वर्ग किमी. है।

दक्षिण भारत के अर्द्धशुष्क क्षेत्र में पारम्परिक तालाबों पर जल ग्रहण विकास कार्यक्रम का प्रभाव-एक समीक्षा

Author: 
अशोक कुमार सिंह, राम मोहन राव, रतिन्द्र नाथ अधिकारी
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

अनबूर तालाबअनबूर तालाबभारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी 75% से अधिक जनसंख्या गाँव में रहती है। उसकी जरुरी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये जल संसाधनों का सही तरीके से पूरा विकास किया जाना चाहिये। जल संसाधनों के विकास में उस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, मौसम तंत्र, मृदा, वनस्पति व अन्य जरुरतों को ध्यान में रखा गया था। यह विकास इस तरह से किया गया था, जिससे ग्रामीण क्षेत्र में रहने वालों की आवश्यक, जरुरत न केवल पूर्ण हो बल्कि पड़ोसी क्षेत्र के रहने वालों के साथ किसी भी तरह का संघर्ष न हो। साथ ही जल संसाधनों का दुरुपयोग भी न हो। इस तरह का जल प्रबंधन 80 के दशक तक अच्छी तरह से चला।

पिछले कुछ वर्षों में भारत व राज्य सरकारों द्वारा चलित जलग्रहण परियोजनाओं के कुछ कार्यक्रम से इस जल संरक्षण व प्रबंधन पर बुरा असर पड़ा है। जलागम कार्यक्रम (watershed programme) में जल संरक्षण (water harvesting) पर अत्यधिक जोर दिया गया है जिसमें जलग्रहण क्षेत्रों के नालों में जल संरक्षण के लिये छोटे-छोटे बाँध (एनीकट व चैक डैम) बनाये गये। इन छोटे-छोटे बाँधों को बनाने में दो बातों को ध्यान में नहीं रखा गया - एक तो जलग्रहण क्षेत्र में जल संरक्षण के लिये जल की उपलब्धता व बनाये गये बाँधों की जगह का उद्देश्य के अनुसार चुनाव। इन्हीं दो कारणों से पारम्परिक तालाबों (Tanks) पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है और गाँव की जीविका कहे जाने वाले ये तालाब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।

इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य तालाबों को इस प्रकार से पुनर्जीवित करना है कि तालाब व भूजल (ground water) उपयोग करने वाले किसानों की जीविका की हानि न हो एवं पर्यावरण में सुधार भी हो सके।

ट्रीटियम टैगिंग तकनीक द्वारा वर्षा से भूजल पुनः पूरण का आंकलन

Author: 
एस.के. वर्मा, भीष्म कुमार, मौहर सिंह
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

जल संसाधनों के उचित प्रबंधन में भू-जल में रिचार्ज का आकलन एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पहलू है। सामान्यतः पर्याप्त आंकड़ों की अनुपलब्धता के कारण व्यवहारिक विधियों द्वारा भू-जल में वर्षा जल अथवा/और सिंचाई जल की वजह से रिचार्ज का आंकलन करना कठिन कार्य है। वर्षा जल अथवा सिंचाई जल का भू-जल में रिचार्ज का आकलन करने के लिए समस्थानिक विधि विशेषतः ट्रीटियम टैगिंग तकनीक भारत के कई क्षेत्रों सहित विभिन्न देशों में सफलता पूर्वक प्रयोग में लाई जा चुकी है।

प्रस्तुत प्रपत्र में नर्मदा बेसिन के अन्तर्गत जिला नरसिंहपुर (म.प्र.) के कुछ भागों में वर्षाजल एवं सिंचाई जल के कारण भू-जल में रिचार्ज का आंकलन ट्रीटियम टैगिंग तकनीक द्वारा लगाया गया है। अध्ययन क्षेत्र में जोते हुए तथा बिना जोते हुए खेतों में परीक्षण किये गये हैं। अध्ययन क्षेत्र में मुख्यतः चार प्रकार की मृदायें जैसे मिट्टी, मिट्टी दुमट, दुमट तथा रेतीली दुमट मिट्टी पायी गई हैं। अध्ययन क्षेत्र की औसत वार्षिक वर्षा 1246 मिमी0 है। अध्ययन क्षेत्र में भू-जल में रिचार्ज का प्रतिशत मृदा के प्रकार तथा अन्य भू-जल विज्ञानीय दशाओं के कारण 7.76% से 22.44% तक पाया गया है। प्रस्तुत प्रपत्र में प्रयुक्त की गई समस्थानिक विधि विशेषतः ट्रीटियम टैगिंग तकनीक की कार्य प्रणाली तथा अध्ययन क्षेत्र की विस्तृत जानकारी दी गई है। अध्ययन क्षेत्र में भू-जल में रिचार्ज का आंकलन मुख्यतः वर्ष 1995 में मानसून की अवधि में किया गया।

ट्रीटियम टैगिंग तकनीक द्वारा वर्षा से भूजल पुनः पूरण का आकलन (Assessment of recharge to groundwater due to rain using Tritium tagging technique)


सारांश:

सॉफ्ट कम्प्यूटिंग तकनीकों द्वारा भू-जल स्तर का आंकलन

Author: 
रमा मेहता, विपिन कुमार, कुमार गर्वित, नरेश सैनी
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

देश के विभिन्न भागों में बढ़ती माँग की पूर्ति करने के लिए भूजल का दोहन किया जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप भौमजल स्तर में गिरावट आ रही है इस कारण भविष्य में जल उपलब्धता का गंभीर संकट पैदा हो सकता है। भूजल संसाधनों की प्रक्रिया को समझने एवं भविष्य की सम्भावित परिस्थितियों में क्या हो सकता है यह जानने के लिए भूजल प्रतिदर्शों का बड़े पैमाने पर प्रयोग हो रहा है। भूजल प्रवाह की जटिल समस्याओं पर काबू पाने के लिए ऐसी तकनीकें विकसित करने की आवश्यकता है जो इन समस्याओं का अर्थपूर्ण समाधान प्रदान कर सके। आसान संगणन तकनीकें (soft computing techniques) जल वैज्ञानिक एवं जल संसाधन तंत्र के प्रयोग में केवल जलविज्ञानीय चर राशियों के क्रम रहित होने के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि निर्णय लेने में अशुद्धता, वस्तुपरखता एवं अस्पष्टता तथा पर्याप्त आंकड़ों की कमी के कारण भी है।

फज्जी लॉजिक तकनीक में इस प्रकार की अनिश्चितता का अच्छे तरीके से ध्यान रखा गया है। इसीलिए उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले हेतु प्रतिदर्श विकसित करने के लिए नई बढ़ती हुई तकनीकों जैसे कि न्यूरो-फज्जी तकनीक एवं ए.एन.एन. का प्रयोग किया गया है। जलविज्ञानीय भविष्य वाणियों में न्यूरो फज्जी तकनीकों का बहुत अधिक प्रयोग किया जा रहा है। जादेह द्वारा विकसित फज्जी सेट की परिकल्पना समतुल्य संबंधों को भाषा की दृष्टि से निम्न, मध्यम एवं उच्च रूप में प्रयोग करने का अवसर प्रदान करती है।

सॉफ्ट कम्प्यूटिंग तकनीकों द्वारा भूजल स्तर का आंकलन (Hybrid subtractive clustering technique for estimation of ground water table)


रमा मेहता, विपिन कुमार, कुमार गर्वित एवं नरेश सैनी
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश