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पादप परजीवी सूत्रकृमि (निमेटोड्स) (Plant Parasitic Thread Worms : Nematodes)

Author: 
मोहित कुमार तिवारी, प्रतिभा गुप्ता
Source: 
अनुसंधान विज्ञान शोध पत्रिका, 2016

सारांश


सूत्रकृमि (निमेटोड्स) की लगभग 15 प्रतिशत प्रजातियाँ पादप परजीवी होती हैं, जो भारत सहित विश्व के अधिकांश देशों में विभिन्न फसलों को गम्भीर हानि पहुँचाती हैं और पूरे विश्व को पादप परजीवी सूत्र कृमियों के कारण लगभग 4500 करोड़ रुपयों की हानि होती है। ये चीड़, साइट्रस पेड़ों, नारियल, धान, मकई, मूंगफली, सोयाबीन, शकरकंद, चुकन्दर, आलू, केला इत्यादि को विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। सूत्रकृमि मृदा से पौधों की जड़ों में प्रवेश कर पौधों की जड़ तने, पत्ती, फूल व बीज को संक्रमित करते हैं। पौधों में इनका संक्रमण सूत्रकृमि की द्वितीय डिम्भक अवस्था द्वारा होता है। सूत्रकृमि एक स्थान से दूसरे स्थान तक संक्रमित मृदा लगे खेती के औजारों, हल, जूतों, पानी के प्रवाह, संक्रमित पौधों व कृषि उत्पादों के द्वारा फैलता है। इनका नियंत्रण मृदा के धूम्रिकरण, रसायनों व सूत्रकृमि परभक्षियों द्वारा किया जा सकता है।

Abstract: About 15% species of these parasites are plant parasitic causing severe threat to various crops all over the world including India. Plant parasitic nematodes are responsible for loss of about 45 billion rupees all over the world. Plant nematodes can infect Pine, Citrus plants, Coconut, Rice crop, Maize, Peanut, Soya bean, Banana, Potato, Sweet potato, Beat etc. causing infection of root, stem leaf, flower and seed etc. Source of infection is contaminated soil containing eggs or larvae of infective plant nematode which enter in host plant through root in 2nd juvenile larval stage. This infection spreads from one place to another with contaminated soil, farmers instruments, shoes, flow of water and with infected plants and plant product. Plant nematodes are controlled by fumigation, chemicals and plant nematode predators.

आणविक अंकित बहुलक एवं कृषि विज्ञान में इसके अनुप्रयोग - एक समीक्षा (Molecular imprinted polymer and its applications in Agriculture Science : a review)

Author: 
आर.के. प्रजापति, एम. ए. अन्सारी
Source: 
अनुसंधान विज्ञान शोध पत्रिका, 2016

सारांश


तृणनाशक के अत्यधिक उपयोग के कारण पर्यावरण के प्रदूषित होने की गम्भीर समस्या उत्पन्न हो रही है एवं इसका दुष्प्रभाव मिट्टी, पानी, हवा के साथ-साथ मानव के स्वास्थ्य के लिये गम्भीर समस्या बन चुका है। अतः इसकी जाँच के लिये आसान, शीघ्र एवं कम लागत की तकनीक का पता लगाने के लिये शोधकर्ताओं द्वारा कार्य प्रारम्भ किया जा चुका है। आणविक अंकित बहुलक, जो कि एक कृत्रिम सामग्री है, इन परिस्थितियों में तृणनाशक की जाँच के लिये बहुत उपयोगी है यह तकनीक पर्यावरण वैज्ञानिकों, रसायनविदों, भेषजवैज्ञानी व कृषि-खाद्य उद्योग से जुड़े कर्मियों के लिये विभाजकों के विश्लेषण, परिमार्जन, पूर्णसांद्रण हेतु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस समीक्षा पत्र में आणविक अंकित बहुलक को विशेष रूप से तृणनाशक की जाँच के लिये कैसे बनाया जा सके एवं कैसे उसका उपयोग किया जाये। के सन्दर्भ में उल्लेख किया गया है।

Abstract: Contamination of environment due to indiscriminate use of herbicides poses severe risks to soil, water and air as well as human health. Therefore, need of easy, rapid and of low cost detection methods triggered the researcher to find out new technology. Molecularly imprinted polymers (MIPs), the synthetic materials are very useful in these circumstances. It offers several advantages to the environmental scientist, chemist, pharmaceutical and agro food industry for analysis, censoring, extraction or preconcentration of analytes. The high toxicity of herbicides and their large use in modern agriculture practices has increased public concerns. In this review paper, imprinting and detection of herbicide, the recognition and transport properties of molecularly imprinted polymer (MIP) membranes prepared for herbicides such as Isoproturon and 2,4-D in particular have been discussed.

अंटार्कटिका की जैवविविधता : एक संक्षिप्त परिचय (Bio-diversity of Antarctica : a brief introduction)

Author: 
प्रतिभा गुप्ता
Source: 
अनुसंधान विज्ञान शोध पत्रिका, 2016

सारांश

भूमि उपयोग के संदर्भ में सोन घाटी के पूर्वी क्षेत्र का भू-आकृतिक अध्ययन (Geomorphologic study of the eastern part of Son-valley with reference to land use)

Author: 
संजय शुक्ल
Source: 
अनुसंधान विज्ञान शोध पत्रिका 2016

सारांश


प्रस्तुत शोध पत्र सोन घाटी, जिला सोनभद्र उ.प्र. के पूर्वी भाग में किये गये भू-वैज्ञानिक व भू-आकृतिक अध्ययन पर आधारित है। इस अध्ययन का मुख्य क्षेत्र महाकौशल ग्रुप (पूर्व में बीजावर ग्रुप) की चट्टानें हैं जो कि विंध्यन सुपर-ग्रुप के दक्षिण में स्थित हैं। इस क्षेत्र का भौगोलिक विस्तार अक्षांश 24015’-24031’ एवं देशान्तर 82015’-82030’ के मध्य स्थित है। यह क्षेत्र सर्वे ऑफ इण्डिया टोपोशीट सं. 63/पी/7 के अंतर्गत आता है। भू-वैज्ञानिक तथा भू-आकृतिक अध्ययन के आधार पर इरा क्षेत्र को विभिन्न वर्गों में विभक्त किया जा सकता है, जैसे- चरागाह, वानिकी, शुष्क व नम कृषि क्षेत्र। इनका अध्ययन इस क्षेत्र में कृषि व उद्योगों को विकसित एवं प्रोत्साहित करने में सहायक होगा। इस क्षेत्र में उपस्थित खनिजों व चट्टानों का उपयोग भी पर्यावरण को बिना हानि पहुँचाये किया जा सकता है। जिससे क्षेत्रवासी लाभान्वित हो पायेंगे। मौसम की दृष्टि से यह क्षेत्र दीर्घ तप्त ग्रीष्मकाल, कम वर्षा वाला तथा संक्षिप्त एवं साधारण शीतकाल दर्शाता है। इस क्षेत्र का तापमान शीत व ग्रीष्मकाल में क्रमशः 8.50 व 460 से.ग्रे. के मध्य रहता है। वर्षा जून से अक्टूबर तक होती है। वनक्षेत्र में महुआ, साल, तेंदूपत्ता तथा बांस आदि प्रमुख उत्पाद हैं।

Abstract - Geological and geomorphologic studies especially terrain evaluation of the eastern part of Son-valley, District Sombhadra, U.P., reveals the areas suitable for pastures, forestry, wet and dry cultivation. It can help in the development of sectors like agriculture and industry apart from mining. The utilization of natural resources of the area taking into account the potential and constraints specific to the environment can be properly managed by land use planning.

रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन : सारांश

Author: 
जितेन्द्र कुमार घृतलहरे
Source: 
रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन, (Geographical studies of ponds in the rural areas of Raipur district) शोध-प्रबंध (2006)

प्रस्तुत शोध-प्रबंध रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में निर्मित तालाबों से संबंधित हैं। इस अध्ययन का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब की उपलब्धता का आकलन, तालाबों का वितरण एवं प्रभावित करने वाले कारकों, तालाबों की आकारिकीय समीक्षा तथा तालाबों के मानव जीवन में पड़ने वाले प्रभावों की व्याख्या करना है। रायपुर जिले के पंद्रह विकासखंड, आरंग, अभनपुर, धरसीवां, सिमगा, भाटापारा, बलौदाबाजार, पलारी, तिल्दा, राजिम, गरियाबंद, मैनपुर, छुरा, कसडोल, बिलाईगढ़, देवभोग, शामिल हैं। यह अध्ययन प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित है। अध्ययन हेतु प्रत्येक विकासखंड के अंतर्गत तीन से पाँच गाँवों का चयन किया गया है। इस प्रकार यह अध्ययन जिले के इन ग्रामों में चयनित 285 तालाबों पर आधारित है। ग्रामों का चयन यादृच्छित प्रतिचयन के द्वारा किया गया है। प्रत्येक ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों की संख्या तीन से पाँच तक पायी गयी है। किसी-किसी ग्राम में इसकी संख्या अधिक पायी गयी है।

रायपुर जिला छत्तीसगढ़ राज्य के मध्य में स्थित है। जिले के भौगोलिक स्थिति 19045’16’’ उत्तरी अक्षांश से 21045’’ उत्तरी अक्षांश तथा 8103’ पूर्वी देशांश से 82058’48’’ पूर्वी देशांश के मध्य है। जिले का कुल क्षेत्रफल 15190.60 वर्ग कि.मी. है। इसके क्षेत्र में चार प्रमुख भू-गर्भिक संरचनाएँ मिलती हैं। सबसे प्रमुख शैल कुडप्पायुगीन शैल समूहों का घनत्व है। इसका क्षेत्र पूर्वी एवं उत्तरी भाग में है। आर्कियन की चट्टानें अध्ययन क्षेत्र के 8607 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर फैली है। रायपुर जिला भारतीय प्रायद्वीप का एक भाग है तथा इसकी धरातलीय आकृति महानदी द्वारा निर्मित छत्तीसगढ़ के मैदान का एक भाग है। इसकी ढाल अत्यंत मंद या साधारण है। समुद्र तल से औसत ऊँचाई 298 मीटर है। रायपुर जिले का अपवाह तंत्र महानदी प्रणाली के अंतर्गत आता है।

तालाब जल की गुणवत्ता एवं जल-जन्य बीमारियाँ (Pond water quality and water borne diseases)

Author: 
जितेन्द्र कुमार घृतलहरे
Source: 
रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन, (Geographical studies of ponds in the rural areas of Raipur district) शोध-प्रबंध (2006)

तालाब जल की गुणवत्ता


प्राचीन समय से लेकर आज तक शुद्ध जल की खोज मानव द्वारा किया जाता रहा है। मानव के स्वास्थ्य के लिये शुद्ध जल की अनिवार्यता के प्रभाव की आवश्यकता है। शुद्ध जल की गुणवत्ता के स्तर को प्रभावित करने के लिये वैज्ञानिकों एवं शासन-स्तर पर मानकों का निर्धारण किया गया है। इन मानकों में जल में बैक्टीरिया की सीमा, कीटाणुओं की मात्रा, तथा रासायनिक एवं भौतिक गुणों को शामिल किया जाता है। इन मानकों को निर्धारित करने के पीछे मनुष्य के स्वास्थ्य को अच्छा रखने तथा प्रदूषणों से बचाने के लिये प्रमुख है। यद्यपि तालाबों के पानी का पेयजल के लिये बहुत कम उपयोग होता है, फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में भोजन बनाने के लिये अथवा अन्य घरेलू उपयोग में कुछ न कुछ मात्रा में तालाब जल का उपयोग किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शुद्ध जल के लिये विशेष मानक निर्धारित किए हैं। यद्यपि ये मानक यूरोप के लिये है, फिर भी मानव स्वास्थ्य के लिये इन मानकों को भारतीय शासन ने भी स्वीकार किया है। भारत में मेडिकल काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने पेयजल एवं उपलब्ध जल की गुणवत्ता के लिये मानकों का निर्धारण किया है। इन मानकों को निम्नांकित सारणी 7.1 में स्पष्ट किया गया है।

 

तालाब जल में जैव विविधता (Biodiversity in pond water)

Author: 
जितेन्द्र कुमार घृतलहरे
Source: 
रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन, (Geographical studies of ponds in the rural areas of Raipur district) शोध-प्रबंध (2006)

तालाब जल में ‘जैव विविधता’ का शाब्दिक अर्थ पारिस्थतिक के अंतर्गत उपयोग किये जाने वाले शब्द बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी का नवीन संक्षिप्त रूप है। बायोडाइवर्सिटी शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम बाल्टर जी. रोसेन ने सन 1986 में जंतुओं, पौधों और सूक्ष्म जीवों के विविध प्रकारों और इनमें विविधताओं के लिये किया था।

जैव-विविधता से तात्पर्य समस्त जीवों जैसे-जंतुओं, पादपों और सूक्ष्म जीवों की जातियों की विपुलता है, जोकि किसी निश्चित आवास में पारस्परिक अंतःक्रियात्मक तंत्र की भांति उत्पन्न होती है, वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए विभिन्न अध्ययनों के आधार पर अनुमान लगाया गया कि सम्पूर्ण पृथ्वी पर जीव-जंतुओं एवं पेड़-पौधों की लगभग पाँच से दस लाख प्रजातियाँ व्यवस्थित हैं, परंतु इनमें से लगभग दो लाख प्रजातियों की ही पहचान की जा सकी है तथा इनका अध्ययन किया गया है।

तालाब जल में विभिन्न प्रकार के जीव-जंतुओं का निर्धारण विभिन्न जीवों के अभिलक्षणों का परीक्षण एवं उनका तालाब-जल पर प्रभाव की समीक्षा करना है। सर्वेक्षित जिले में विकासखंडानुसार चयनित ग्रामीण क्षेत्रों के चयनित तालाबों में जैव-विविधता पाया गया। पहले की अपेक्षा तालाब जल में जैव-विविधता में ह्रास होने लगा है, क्योंकि तालाब में जल स्तर निरन्तर गिरता जा रहा है। इसी वजह से कई प्रकार के जलीय जीव की संख्या घटती जा रही है।

जीव जन्तुओं का निवास: तालाब जल में अनेक प्रकार के जीव-जंतुओं का निवास होता है। इन जीव-जंतुओं की उपयोगिता सिर्फ मानव के लिये न होकर एक पारिस्थितिक तंत्र के संदर्भ में होती है। तालाब जल में निवास करने वाले जीव-मछली, मेंढक, जोंक, केकड़ा, सर्प, कछुआ, घोंघा प्रमुख हैं। इनके अलावा, अनेक प्रकार के कीड़े-मकोड़े भी होते हैं। ये सभी जीव जलीय जीव होने के कारण जल में ही निवास करते हैं।

असमय बूढ़ी होती नैनी झील

Author: 
प्रो. जीएल साह

नैनी झील पर मँडराता आसन्न संकट


पश्चिमी वायु विक्षोम की सुस्ती, शीतकालीन शुष्कता, अलनीनो एवं वैश्विक उष्मन के दुष्परिणाम तथा शीतकालीन वर्षण के विषय में मौसम विज्ञानियों की भविष्यवाणियों के चलते नैनीझील के घटते जलस्तर के पूर्व प्रवृत्तियों के विश्लेषणों के अनुमानों के अनुरुप नैनीझील इस नये वर्ष में भी पूर्ववर्ती वर्षों से काफी पूर्व जनवरी माह में हीे शून्य जलस्तर पर पहुँची है। यह घटना इस औपनिवेशिक शहर के 175 वर्षों के इतिहास की न केवल दुखद वरन 21वीं शदी के प्रारम्भिक काल में प्रकृति और विकास के द्वन्द के पीड़ादायक एवं दर्दनाक मोड़ को इंगित करती है। अतएव आवश्यक होगा कि झील की अस्मिता को चिरस्थायी बनानेे तथा पूर्व की भाँति आगामी ग्रीष्म में पर्यटन के कारण बढते जन-दबाव के चलते इस घटते जलस्तर को एक चेतावनी के रूप में आज से समग्र रूप से विचार किया जाना अपरिहार्य होगा। प्रशासन के लिये यह जरूरी होगा कि सम्बद्ध विभाग, पर्यावरण, भूगर्भ, भूगोल, जलविज्ञान, मौसम विज्ञानी, अभियांत्रिकी के विशेषज्ञों को एक मंच पर लाकर झील की प्रकृति को समझने और इसके असमय बूढ़े होने की प्रवृत्ति के लिये दीर्घकालिक और स्थायी तथा अस्थायी प्रतिकारी उपायों को लागू किये जाने सम्बन्धी निर्णय आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य होंगे।

क्या है जलस्तर के मानक?

तालाबों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक पक्ष (Social and cultural aspects of ponds)

Author: 
जितेन्द्र कुमार घृतलहरे
Source: 
रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन, (Geographical studies of ponds in the rural areas of Raipur district) शोध-प्रबंध (2006)

विश्व में मानव-संस्कृति का विकास भूतल के विभिन्न क्षेत्रों की पर्यावरणीय दशाओं एवं वहाँ के संसाधनों पर निर्भर करता है। मनुष्य एक क्रियाशील प्राणी है, जो अपने विवेक एवं कार्यकुशलता से अन्य साधन द्वारा प्राकृतिक परिवेश में निरंतर परिवर्तन करता रहता है। जिन स्थानों पर वह प्राकृतिक परिवेश में परिवर्तन करने में समर्थ नहीं होता है, वहाँ उसमें अनुकूलन करता है। इसी प्रकार के अनुकूलन से मनुष्य का सांस्कृतिक विकास भी होता है। अतः स्थान विशेष के भौतिक स्वरूप एवं संस्कृति को संसाधन के रूप में मान्यता प्राप्त है। संस्कृति मानव द्वारा प्रयुक्त वह प्रविधि एवं ढंग है, जिसके द्वारा संसाधनों का उपयोग मानवहित में किया जाता है।

अध्ययन क्षेत्र रायपुर जिला का भौतिक स्वरूप मैदानी, पर्यावरणीय स्वरूप मानसूनी तथा धान की कृषि संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। यहाँ के निवासियों ने इस पर्यावरण के साथ अनुकूलन स्थापित करते हुए अपने समस्त आर्थिक एवं सामाजिक क्रियाकलापों को निर्धारित किया है। तालाबों का अस्तित्व मध्य उपशब्द प्रविधि की एवं मानसून पर्यावरण के अनुकूलन का परिणाम है।

तालाब एवं ग्राम्य जीवन


छत्तीसगढ़ी लोक-जीवन, लोक साहित्य, लोक-संस्कृति एवं लोकगीतों के अध्ययन कर्ताओं में वेरियर एलविन की फोक सांग्स ऑफ छत्तीसगढ़ एवं फोक टेल्स आॅफ महाकौशल, श्यामाचरण दुबे की छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का परिचय, प्यारेलाल गुप्त की छत्तीसगढ़ का लोक साहित्य से लेकर वर्तमान उपलब्ध लोक साहित्यों में तालाबों का महत्त्व परिलक्षित होता है। ग्राम्य जीवन में तालाबों की अनिवार्यता प्रत्येक सामाजिक संस्कारों एवं दैनिक जीवन में अपरिहार्य है। शुकलाल पाण्डे द्वारा रचित ‘तालाब के पानी’ शीर्षक की यह कविता निम्नानुसार है- (दयाशंकर शुक्ल 1969, पृ. 60)

गनती गनही तब तो इ हां सा छय सात तरिया हे।
फेर ओ सब मा बंधवा तरिया पानी एक पुरैया हे।
न्हावन धावन भंइसा-मांजन धोये ओढन चेंदरा के।
ते मां धोबनिन मन के मारे गतनइये वो बपुरा के।।