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ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स का अस्तित्व मिटाने की तैयारी

Author: 
उमेश कुमार राय

. रोज करीब 250 मिलियन लीटर गंदे पानी का परिशोधन करने वाले व कार्बन को सोखने की अकूत क्षमता रखने वाले ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स पर अतिक्रमण का आक्रमण बढ़ रहा है। यह हमला अगर आने वाले समय में भी जारी रहा, तो एक दिन इसका अस्तित्व ही मिट जायेगा।

चार पर्यावरणविदों द्वारा किये गये एक शोध में खुलासा हुआ है कि वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) का तेजी से अतिक्रमण किया जा रहा है और उस पर मकान बनाये जा रहे हैं।

तालाब जल का उपयोग (Use of pond water)

Author: 
जितेन्द्र कुमार घृतलहरे
Source: 
रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन, (Geographical studies of ponds in the rural areas of Raipur district) शोध-प्रबंध (2006)

जल के उपयोग की विशेषताएँ विशिष्ट प्रकृति की होती हैं। जल की समस्याओं की स्थिति स्थानीय या प्रादेशिक होती है। प्रत्येक स्थान पर स्वच्छ जल की आपूर्ति स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जल के द्वारा करना पड़ता है तथा स्थान के अनुसार जल के उपयोग का स्तर निर्धारित होता है। किसी भी स्थान पर जल के उपयोग का एक या दो प्रकार ही प्रमुख होता है अन्य उपयोग कम महत्त्वपूर्ण होता है। जल की उपयोगिता घरेलू पेयजल एवं सिंचाई के लिये महत्त्वपूर्ण होता है।

मनुष्य के पीने के लिये, खाना बनाने के लिये, सिंचाई के लिये एवं उद्योगों के लिये एवं विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये जल की आवश्यकता होती है। ‘जल ही जीवन है’ पृथ्वी पर जीवन जल से ही सम्भव है। जल के बिना मानव के जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती।

तालाबों का आकारिकीय स्वरूप एवं जल-ग्रहण क्षमता (Morphology and Water-catchment capacity of the Ponds)

Author: 
जितेन्द्र कुमार घृतलहरे
Source: 
रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन, (Geographical studies of ponds in the rural areas of Raipur district) शोध-प्रबंध (2006)

आकारिकीय (Morphology) शब्द ग्रीक भाषा के दो मूल शब्दों से मिलकर बना है। जिनका शाब्दिक अर्थ है- आकारों या स्वरूपों के विषय में अध्ययन करना। आकारिकीय शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग जीव-विज्ञान में किया गया था। ‘हेण्डरसन’ ने इसकी परिभाषा देते हुए बताया था कि यह पौधों व जन्तुओं के रूप तथा संरचना का विज्ञान है। बाद में इस शब्द का प्रयोग अन्य विज्ञानों में किया गया। भूगोल विषय में आकारिकीय शब्द का अभिप्राय प्रारम्भ में पृथ्वी के धरातलीय संरचना से लगाया गया। प्रमुख भूगोलवेत्ता ‘डडले स्टाम्प’ ने इसकी व्याख्या करते हुए बताया है कि यह रूप व संरचना का विज्ञान है तथा उस विकास से सम्बन्धित है जो रूप पर प्रभाव डालता है।

रायपुर जिले में तालाब (Ponds in Raipur District)

Author: 
जितेन्द्र कुमार घृतलहरे
Source: 
रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन, (Geographical studies of ponds in the rural areas of Raipur district) शोध-प्रबंध (2006)

मानव आदिकाल से ही प्राकृतिक वातावरण से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता रहा है। वह अपने जीवन को सरल एवं सुखमय बनाने के लिये प्राकृतिक वातावरण में यथासंभव परिवर्तन भी करता है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत वह अनेक वस्तुओं की रचना करता है जो दृश्य होते हैं।

छत्तीसगढ़ में तालाबों का अस्तित्व मानव पर्यावरण अन्तर्सम्बंधों का परिणाम है। वर्ष में वर्षा के द्वारा जल की उपलब्धता 55 से 63 दिनों तक होती है। वर्षा के अतिरिक्त यहाँ जल की उपलब्धता के अन्य स्रोत नहीं हैं अतः शेष समय में जल की आपूर्ति हेतु तालाबों का निर्माण किया गया है।

तालाबों के निर्माण में उपलब्ध सहज तकनीक का उपयोग किया गया हैं। स्थानीय उपलब्ध मिट्टी का उपयोग मिट्टी की दीवार बनाकर जल-संग्रहण हेतु क्षेत्र तैयार किया गया है। सबसे सहज तकनीक एवं सस्ते मानवीय श्रम का उपयोग तालाबों के निर्माण में दृष्टिगत होता है। ग्रामों में जल संग्रहण एवं संवर्धन की यह तकनीक अधिवासों के विकास के समय से ही उपयोग किया जा रहा है। प्रत्येक ग्रामीण आदिवासी में घर के छतों तथा गलियों से निकलने वाले वर्षा-कालीन जल-अधिवासों के निकट की तालाबों में संग्रहित किया जाता रहा है।

कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में तालाबों के द्वारा सिंचित क्षेत्रफल भी पर्यावरणीय समायोजन का प्रतिफल है। धान के खेतों में फसलों को जल आपूर्ति हेतु एकल, युग्म व सामूहिक तालाबों का अस्तित्व मिलता है। तालाबों द्वारा सिंचाई छत्तीसगढ़ की कृषि का अभिन्न अंग रहा है। सिंचाई के अन्य तकनीक का विकास 1890 के पश्चात अंग्रेजी शासन व्यवस्था के अंतर्गत किया गया था। यह व्यवस्था अल्प वर्षा के परिणाम स्वरूप सिर्फ धान के फसल की रक्षा के उद्देश्य से शुरू की गई थी। सिंचाई तकनीक की तृतीय अवस्था 1965-66 के पश्चात कुँओं के निर्माण में प्रारम्भ हुई। उल्लेखनीय है कि यह वर्ष अकाल वर्ष के रूप में जाना जाता है। सिंचाई की नवीनतम तकनीक नलकूप से सिंचाई 1980 के दशक के बाद प्रारम्भ हुई।

तालाबों का वितरण

रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों की भौगोलिक पृष्ठभूमि (Geographical background of ponds in the rural areas of Raipur district)

Author: 
जितेन्द्र कुमार घृतलहरे
Source: 
रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन, (Geographical studies of ponds in the rural areas of Raipur district) शोध-प्रबंध (2006)

भौगोलिक पृष्ठभूमि भौगोलिक पृष्ठभूमि रायपुर जिला छत्तीसगढ़ राज्य के मध्यपूर्व में 19°45’16’’ उत्तरी अक्षांश से 21°45’ उत्तरी अक्षांश तथा 81°31’ पूर्वी देशांश से 82°58’38’’ पूर्वी देशांश के मध्य स्थित है। जिले का कुल क्षेत्रफल 15190.60 वर्ग कि.मी. है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह राज्य का दूसरा बड़ा जिला है। उत्तर-पूर्व में बिलाईगढ़ विकासखण्ड से लेकर दक्षिण पूर्व में देवभोग विकासखण्ड तक लगभग 485 कि.मी. की लंबाई में यह जिला अर्द्ध चंद्राकार स्वरूप लिये हुए है। यह दक्षिण में धमत्तरी, पश्चिम में दुर्ग, उत्तर में बिलासपुर, उत्तर-पूर्व में रायगढ़, पूर्व में महासमुन्द, दक्षिण-पूर्व में ओडिशा का कालाहांडी जिले से घिरा हुआ है। जिले की पश्चिमी सीमा का निर्धारण खारुन नदी एवं उत्तरी सीमा शिवनाथ एवं महानदी करती है, पूर्व में महानदी पुनः जिले को महासमुन्द से पृथक करती है।

रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन (A Geographical Study of Tank in Rural Raipur District)

Author: 
जितेन्द्र कुमार घृतलहरे
Source: 
रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन, शोध-प्रबंध (2006)

“We never know the worth of Water till the tank is dry’’- Thomas Fuller

‘‘वेद के अनुसार दस वृक्ष लगाने से इतना पुण्य मिलता है जितना एक कुआँ खुदवाने से एवं दस कुएँ खुदवाने से उतना ही पुण्य मिलता है जितना एक तालाब बनवाने से।’’

बुद्धा तालाब प्राचीन समय से लेकर आज तक तालाब निर्माण का कार्य निरंतर जारी है, क्योंकि तालाब ही जल-संचयन या संग्रहण करने का एक मात्र सस्ता एवं सर्वसुविधा युक्त साधन है। ग्रामीण क्षेत्रों में मानव जीवन पूर्णतः तालाब के जल पर ही निर्भर रहता है। लोगों के दैनिक कार्यों जैसे-नहाने-धोने की प्रक्रिया, गृह-निर्माण, सिंचाई आदि कार्यों में तालाब के जल का ही उपयोग होता है।

तालाब ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन का मुख्य आधार है। ‘‘जल ही जीवन है’’, जल के बिना जीवन संभव नहीं, जल मानव का मुख्य आधार है, यह प्रकृति की अमूल्य देन है। जल की महिमा का वर्णन करने से कवियों की कलम कभी नहीं अघाई। मानव को जीवित रखने के लिये वायु के बाद दूसरा स्थान जल का ही है। जल का उपयोग मानव आदिकाल से ही अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु करता आया है। यह आवश्यकता प्रगति के साथ-साथ तेजी से बढ़ रही है। आधुनिक समय में तकनीकी विकास के कारण जल का प्रचुर प्रयोग सिंचाई, जल-विद्युत उत्पादन, मत्स्य-पालन, जल-यातायात तथा उद्योग आदि के लिये किया जा रहा है। आज पानी का उपयोग मानव की प्रगतिशीलता का द्योतक बन गया है, फलतः जल की मांग में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है, लेकिन साथ ही जल की गुणवत्ता में भारी गिरावट भी आ रही है।

भारत के संदर्भ में ग्लोबल वार्मिंग : एक परिचयात्मक अवलोकन (Global Warming in the Indian context)

Author: 
नागराज आडवे

उन्होंने हमें गुजरात में जो कहा


. कुछ वर्ष पहले हमारा एक समूह गुजरात के कुछ हिस्सों में यह जानने के लिये गया था कि जलवायु परिवर्तन से वहाँ छोटे किसानों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। पूर्वी गुजरात के गाँवों में उन्होंने हमें बताया कि सर्दियों की मक्का की फसल प्रभावित हो रही है। क्योंकि सर्दी जरा गर्म हुई है, पिछले पाँच वर्षाें में ओस गिरना अत्यधिक कम या पूरा बन्द हो गया है। अधिकतर गरीब निवासी जिनके पास अपने कुएँ नहीं हैं, उनकी फसलों के लिये नमी का एक मात्र स्रोत ओस ही है। ओस के कम गिरने या नहीं गिरने से उनकी फसल या तो सूख गई या मजबूरन उन्हें उनके खेत खाली छोड़ने पड़े। इस क्षेत्र में एवं इसके आस-पास मक्का, गरीब निवासियों के लिये पोषण का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्रोत है। उत्तरी गुजरात के अन्य गाँवों में हमें अन्य प्रभावों के बारे में बताया गया- आजकल बरसात उस समय नहीं होती है जिस समय होनी चाहिए या जब बरसात होती है उस समय नहीं होनी चाहिए, अधिकतर बरसात थोड़े समय में होती है, लोगों को नई बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है, पशु और ज्यादा बीमार रहने लगे हैं, कीटाणुओं का प्रकोप बढ़ गया है, आदि।

इन सबके बारे में लोगों से बहुत ही रोचक जवाब प्राप्त हुए। जब हम उनसे पूछते कि इससे होने वाले बदलाव के बारे में उनके क्या विचार हैं, तो वे कहते कि ये तो अपने आप हो रहे प्राकृतिक बदलाव हैं। यह बहुत चौंकाने वाली बात है कि उन लोगों ने इसे कल्पना योग्य बात भी नहीं समझी कि मनुष्य में इस व्यापक स्तर पर प्रकृति में बदलाव करने की शक्ति है।

इन्फॉर्मेशन विजन-2020 एवं आईसीटीज (Information Vision-2020 and ICTs)

Author: 
वी.पी. सिंह
Source: 
अश्मिका, जून 2010

महाराष्ट्र में एग्रोनेट द्वारा 40,000 गाँवों को जोड़ने का स्टेट गवर्नमेंट का प्लान है जिससे कृषि संबंध जानकारी वितरित की जा सके। सामयकी एग्रीटेक प्राइवेट लिमिटेड जो हैदाराबाद, आंध्रप्रदेश में है 18 एग्रीटेक सेंटर संचालित करती है जो किसानों के लिये कृषि सहायता सेवा सर्विस चला रही है एवं इस सेवा के लिये कुछ चंदा वसूलती है। यह सेवा कृषि विशेषज्ञों द्वारा चलाई जा रही है ये सभी कम्प्यूटर से इंटरनेट द्वारा जुड़े हुए हैं।

आप एवं आपके वंश को भंवर-जाल में डालने वाले जलवायु-नीमहकीम (Weather experts lack informations on weather modulations and weather history)

Author: 
एम.आई. भट
Source: 
अश्मिका, जून 2010

यदि कम्प्यूटर द्वारा जलवायु की भविष्यवाणी विश्वसनीय होती जैसे हमसे आई.पी.सी.सी. उम्मीद करती है तो पिछले दशक में की गई भविष्यवाणी एवं वास्तविक जलवायु जो महसूस की गई उसमें दो फाड़ नहीं होते। भविष्यवाणी की विपरीतता बढ़ती गई, वातावरण में 4 प्रतिशत कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा बढ़ने के बावजूद 1998 के तुरंत बाद तापमान में गिरावट जारी रही।