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हिमालय की जीओडायनमिक्स : चाय की मेज पर एक चर्चा (Geodynamics of Himalaya : A Discussion on Tea table)

Author: 
कैलाश नाथ खत्री
Source: 
अश्मिका, जून 2005

हिमालय में भूचाल की एक पट्टी है जोकि मेन सेन्ट्रल थ्रस्ट के इर्द गिर्द फैली हुई है। दक्षिण में मेन बाउन्डरी थ्रस्ट और फूट हिल थ्रस्ट के आस-पास भूचाल की प्रक्रिया नहीं देखी गई है यद्यपि सूक्ष्म यंत्रों से भी प्रयत्न किए गए हैं। भूचाल की पट्टी में महाविनाशकारी महाभूकम्प आते हैं। हिमालय के महाभूकम्पों के लिये सीबर व आर्मब्रुस्टर ने 1986 में एक मॉडल प्रस्तुत किया था। यद्यपि यह एक सामान्य मॉडल है तथा हिमालय की जीओडाइनमिक्स को केवल मोटे तौर पर रेखांकित करता है तथापि इसे अनेक वैज्ञानिकों ने अपने शोधों में आधार के रूप में प्रयोग किया है। उधारणत: बिलहम (1995), बनर्जी व बर्गमैन (2004) ने जीपीएस डाटा के इनटरप्रेटेशन में, खत्री (1992) ने हैजार्ड के आंकलन में, ठाकुर (2004) ने भूगर्भ के आकलन में इसे आधार लिया है।

इस मॉडल के मूल गुण व सम्बन्धित प्रश्न नीचे चर्चित हैं


चित्र 1 में सीवर व आर्मब्रुस्टर का मॉडल प्रस्तुत है। इसमें प्रस्तावना है कि महा भूकम्प के समय एक लगभग होरीजोन्टल सतह पर फाल्ट बनता है। इसे डीटैचमेन्ट की संज्ञा दी गई है। इस डीटैचमेन्ट का विस्तार आउटर हिमालया से ले कर एमसीटी तक है। डिटैचमेन्ट के ऊपर सेडीमेन्ट हैं और नीचे बेसमेन्ट चट्टाने हैं। एमसीटी के उत्तरीय भाग में भारतीय प्लेट और टेथीयन स्लैब के मध्य बिना भूकम्प के आए क्रीप के माध्यम से स्लिप हो रही है। एमसीटी, एमबीटी तथा एचएफटी सब की उत्पत्ति डिटैचमेन्ट में प्रस्तावित है।

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इस मॉडल से कुछ प्रसंग उठते हैं।

उत्तर प्रदेश के चम्बल घाटी प्रक्षेत्र में प्रचलित देशज औषधियों का पुरावानस्पतिक सर्वेक्षण (Ethnobotanical survey of indigenous medicines practiced in Chambal valley of Uttar Pradesh)

Author: 
निखिल कुमार सचान, अनुपम कुमार सचान एवं सी वीराव
Source: 
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश:


तमाम आर्थिक सामाजिक क्रिया-कलापों के चलते दिनोदिन प्रकृति एवं जलवायु विषयक अनुकूलन के विक्षुब्ध होने के कारण किंचित वनौषधि प्रजातियाँ पहले ही विलुप्त हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त चम्बल, यमुना और उनकी सहायक नदियों की रेती के निरंतर खनन एवं मृदा अपरदन की वजह से सृजित कन्दराओं में हजारों हेक्टेयर उपजाऊ जमीन व जैवसम्पदा विध्वस्त हो रही है। इस आशय से अति महत्त्वपूर्ण लोकचिकित्सकीय ज्ञान के विलोपित होने से पूर्व विज्ञान और तकनीक की मदद से क्षेत्रीय लोगों के औषधीय पौधों द्वारा नैदानिक उपचार संबंधी ज्ञान को वैज्ञानिक रीति से सहेजकर शोध व समन्वय के माध्यम से हर्बल औषधीय विरचन तथा आधुनिक संष्लिष्ट औषधियों के विकास हेतु स्रोतमूलक स्वरूप प्रयोजनार्थ संचयित किया जाना आवश्यक है। वर्तमान शोध में औषधीय पौधों का सर्वेक्षण कर जानकारी एकत्र की गई जिससे कि अभीष्ट प्रयोजन की व्यवहार्यता का आकलन संभव हो सके। इस प्रकार चम्बल घाटी के पुराऔषधीय ज्ञान को संरक्षित व सवंर्धित कर कौशलपूर्वक शोध उन्नयन का रास्ता प्रबुद्ध किया गया है।

Abstract

चने की बढ़वार और उपज घटकों पर बुवाई की तिथियों, प्रजातियों और फास्फोरस स्तरों का प्रभाव (Growth and yield attributes of chickpea (Cicer arietinum) as Influenced by sowing dates, varieties and levels of phosphorus)

Author: 
वीरेन्द्र कुमार एवं बी गंगैया
Source: 
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश:


भारत विश्व में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक, आयातक और उपभोक्ता है। गत कई वर्षों से देश में चावल व गेहूँ का पर्याप्त भंडार है, परंतु दालों की कमी रही है। जिसके परिणामस्वरूप दालों की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन उपलब्धता वर्ष 1961 में 65 ग्राम से घटकर वर्ष 2011 में मात्रा 39.4 ग्राम रह गई। जबकि इसी अवधि में आनाजों की उपलब्धता 399.7 से बढ़कर 423.5 ग्राम हो गई। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक दालों की आवश्यकता 32 मिलियन टन होगी। भारत की आधे से अधिक आबादी के लिये दालें न केवल पौष्टिकता का आधार है, बल्कि प्रोटीन का सबसे सस्ता स्रोत भी है। साथ ही भोजन में दालों की पर्याप्त मात्रा होने से प्रोटीन की कमी से होने वाले कुपोषण को भी रोका जा सकता है। विश्व स्तर पर दालें स्वास्थ्य, पोषण, खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ पर्यावरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। रबी में उगायी जाने वाली दलहनी फसलों में चने का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

पर्णांग: एक उपेक्षित पादप समूह (Fern : A neglected plant group)

Author: 
प्रियंका शर्मा, अलका कुमारी एवं बृजलाल
Source: 
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश:


पर्णांग अर्थात टेरिडोफाइट्स प्रत्येक दृष्टिकोण से चाहे वो आर्थिक महत्व हो या पर्यावरण से संबंधित कोई पहलू, उच्च पादप समुदाय की तुलना में सदैव कम आंका गया है। यही कारण है कि यह विशिष्ट पादप समुदाय सर्वगुणों से भरपूर होते हुये भी आज एक उपेक्षित पादप समूह के रूप में जाना जाता है। परंतु यदि इसके गुणों पर प्रकाश डाला जाये तो यह समुदाय पुष्पीय समुदाय से कम उपयोगी नहीं है। कई शोध कार्यों में इसके चिकित्सीय एवं औषधीय गुण प्रमाणित हो चुके हैं। उदाहरण के तौर पर, एडियन्टम, एस्प्लेनियम, एजोला, ब्लेकनम, बोट्रिकियम, किलेन्थस, डाइप्लेजियम, इक्यूसिटम, हेल्मिन्थोस्टेकिस, हुपेरजिया, ओनिकियम, टेरीडियम, सिलेजिनेला आदि में औषधीय एवं भोज्य पदार्थों वाले उपयोगी रासायनिक तत्व जैसे एल्केलॉयड्स, फिनोल्स, ग्लाइकोसाइड्स, टर्पिनोइड्स इत्यादि पाये जाते हैं। पर्णांगों के इन गुणों से आम जनमानस को अवगत कराना तथा वैज्ञानिकों का इस बहुमूल्य पादप समुदाय की ओर ध्यान आकर्षित करना आवश्यक है, ताकि इस बहुमूल्य जैव-संपदा का अत्याधुनिक वैज्ञानिक ढंग से दोहन किया जा सके। प्रस्तुत लेख में इस पादप समुदाय में छिपी अपार आर्थिक संभावनाओं, पर्यावरणीय महत्व एवं औषधीय महत्व पर प्रकाश डाला गया है ताकि यह पादप समुदाय एक बहुमूल्य जैव-संपदा के रूप में उभर कर आ सके। इसके साथ-साथ उन पहलुओं पर भी चर्चा की गई है जिनकी वजह से यह पादप समूह पुष्पीय पादप समुदाय की तुलना में उपेक्षित रहा।

Abstract

पर्णांगों द्वारा धातु संदूषित उड़न राख का प्रबंधन: एक अवलोकन (Management of metal loaded fly ash by Pteridophytes : An overview)

Author: 
अलका कुमारी एवं बृजलाल
Source: 
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश:


हमारे देश में अधिकतम ताप विद्युत संयंत्र कोयले पर आधारित है, जिसमें कोयले को जलाकर विद्युत उत्पादन किया जाता है। इससे भारी मात्रा में उड़न राख उत्सर्जित होती है जो प्रदूषण का एक मुख्य स्रोत है। आज पूरे देश में करीब 85 ताप विद्युत केंद्रो द्वारा 300 मिलियन टन उड़न राख प्रति वर्ष उत्सर्जित होती है। इतनी बड़ी मात्रा में उत्सर्जित होने वाली उड़न राख का भण्डारण कहाँ और कैसे किया जाए, यह एक बड़ी चुनौती है। साथ ही उड़न राख की भौतिक तथा रासायनिक प्रकृति से यह स्पष्ट होता है कि भारी व विरल धातु की अधिकता के कारण यह पर्यावरण के लिये विषाक्त साबित होती है। प्रस्तुत लेख में इसी समस्या के निदान की चर्चा पर्णांग (फर्न) जैसे सजावटी पौधों की कृषि तकनीक के रूप में की गई है, जिनमें धातु अवशोषण की अद्भुत क्षमता है। अतः प्रस्तुत लेख में पर्णांगों के द्वारा इसके प्रबंधन के साथ-साथ इसकी विषाक्तता की समस्या को भी समायोजित करने का प्रयास किया गया है जो एक सस्ती, सरल तथा पर्यावरण-मित्र तकनीक है।

Abstract


In India majority of thermal power plants are coal based, in which electricity is generated by coal-combustion. It generates huge quantity of fly ash which becomes a major source of reside and pollution. Today, about 300 million tons fly ash is generated annually by 85 thermal power units in India. The storage and utilization of these huge quantities of fly ash becomes a major challenge. Besides, physico-chemical properties of fly ash have demonstrated to contain significant amount of toxic elements also, posing a threat to receiving environment. In the present article, management of such site with the development of a vegetation cover of metal hyperaccumulator ferms may prove to be promising eco friendly, cost effective and simple agro-technology to handle this menace.

प्रस्तावना

गेहूँ और राई में वृद्धि एवं फास्फोरस उपयोग क्षमता पर उच्च कार्बन डाइऑक्साइड एवं फास्फोरस-पोषण के परस्पर-क्रियात्मक प्रभाव (Interactive effects of elevated Carbon Dioxide & phosphorus nutrition on growth & phosphorus utilization efficiency in wheat & rye)

Author: 
रेणू पाण्डेय, कृष्ण कांत दूबे, रेणू सिंह, लक्ष्मी एस, अरूण कुमार एवं वनीता जैन
Source: 
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश:


इस अनुसंधान कार्य में गेहूँ और राई में वृद्धि एवं फास्फोरस उपयोग क्षमता पर उच्च कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) एवं फास्फोरस पोषण के परस्पर क्रियात्मक प्रभावों का अध्ययन किया गया। गेहूँ (पी.बी.डब्ल्यू- 396, पी.बी.डब्ल्यू- 233) एवं राई (डब्ल्यू.एस.पी- 540-2) को न्यून (2 माइक्रो मोलर) एवं पर्याप्त (500 माइक्रो मोलर) फास्फोरस के साथ परिवेशी (38±10 माइक्रोमोल प्रति मोल, aCO2) एवं उच्च CO2 (700 माइक्रोमोल प्रति मोल, aCO2) सान्द्रताओं के अंतर्गत उगाया गया। परिणामों से ज्ञात हुआ कि CO2 एवं फास्फोरस स्तरों द्वारा प्ररोह, जड़ एवं सकल पादप शुष्क पदार्थ संचयन तथा वितरण महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित हुए। पर्याप्त फास्फोरस के अंतर्गत उगाए गए aCO2 पौधों की तुलना में पी.डी.डब्ल्यू- 233 में aCO2 के कारण प्ररोह शुष्क पदार्थ में 27 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई। न्यून फास्फोरस के साथ eCO2 के अंतर्गत उगाए गए पौधों में शुष्क पदार्थ का जड़ की ओर वितरण अधिक था जिसके परिणामस्वरूप जड़ से प्ररोह का अनुपात अधिकतम था।

झरिया कोयला क्षेत्र के इर्द-गिर्द रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य की स्थिति (Health status of communities living around Jharia coalfield area)

Author: 
आर ई मैस्टो, टी के राउत, एन के श्रीवास्तव एवं एल सी राम
Source: 
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश:


कोयला विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण ऊर्जा संसाधनों में से एक है। यह देश की अर्थव्यवस्था में एक अनिवार्य भूमिका निभाता है। इसका योगदान कुल प्राथमिक ऊर्जा उत्पादन का 50 प्रतिशत से अधिक है। तथा भारत में भविष्य की ऊर्जा स्रोत के रूप में यह जारी रहेगी, ऐसी उम्मीद है। कोयला उपयोग के हर कदम जैसे खनन, परिवहन, कपड़े धोने, दहन और के बाद राख के निपटान, आदि का प्रभाव कोयला क्षेत्र के आस-पास रहने वाले मानव समुदायों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। कोयला खनन के फलस्वरूप कोलकर्मियों में विभिन्न प्रकार के रोग जैसे न्यूमोकोनिओसिस, उच्च रक्तचाप, हृदय/फेफड़ों के रोग, गुर्दे की बीमारी आदि की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं। न्यूमोकोनिओसिस मुख्यतया फेफड़ों की गैस विनिमय क्षेत्रों में कोल डस्ट के जमा होने के कारण होता है। मानव स्वास्थ्य एवं सम्भावित पर्यावरणीय समस्याओं के बीच संबंध एक नया क्षेत्र है जिसमें भूविज्ञान एवं चिकित्सा विज्ञान दोनों के सहयोग की आवश्यकता है। खनन क्षेत्रों के आस-पास के क्षेत्र में निवास करने वाले तथा खनिक वर्ग आम तौर पर लगातार कोल डस्ट के सम्पर्क में रहने से श्वसन सम्बन्धी बीमारियों के प्रति अतिसंवेदनशील होते हैं।

कार्बन/कार्बन सम्मिश्र पंखुड़ी (Carbon/carbon composite vane)

Author: 
ठाकुर सुदेश कुमार रौनीजा, मरिअम्मा मैथ्यू एवं शरद चन्द्र शर्मा
Source: 
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश:


गैस मोटर को प्रमोचन यान के नियंत्रण तंत्र एवं अंतरिक्ष यान के लिये पावर उत्पादन आदि में प्रयोग किया जाता है। प्रमोचन यान के नियंत्रण के लिये मुख्य रूप से दो प्रकार के तंत्रों का प्रयोग होता है। इनमें एक है सक्रिय और दूसरा है निष्क्रिय। निष्क्रिय की तुलना में सक्रिय तंत्र का ज्यादा प्रयोग किया जाता है। सक्रिय तंत्र में हॉट गैस मोटर का प्रयोग होता है। अन्तरिक्ष यान के लिये पावर उत्पादन के लिये तीन विकल्प हैं। पहला बैटरी, दूसरा है ईंधन सेल और तीसरा है जनरेटर। पहले दो की तुलना में जनरेटर ज्यादा अच्छा विकल्प है क्योंकि इसको चलाने के लिये प्रमोचन यान में प्रचुर मात्रा में गैस उपलब्ध होती है। इसमें भी पंखुड़ी आधारित गैस मोटर का प्रयोग ज्यादा सुगम है। पंखुड़ी गैस मोटर का मुख्य अंग होता है। इसके निर्माण के लिये सतत कार्बन तंतु प्रबलित कार्बन मैट्रिक्स सम्मिश्र का गहन अध्ययन और प्रयोग हुआ है। लेकिन डिस्क्रीट कार्बन तंतु प्रबलित कार्बन मैट्रिक्स सम्मिश्र जिनकी कीमत सतत कार्बन तन्तु प्रबलित कार्बन मैट्रिक्स सम्मिश्र से काफी कम होती है पर कम ध्यान दिया गया है। पिछले कुछ वर्षों में, डिस्क्रीट तंतु प्रबलित सम्मिश्रों की मांग कई क्षेत्रों में बढ़ी है। इसके मुख्य कारण हैं, इनको बनाने की सुगमता कॉम्पलेक्स आकार में ढालने की आजादी, आदि। एक ऐसा ही डिस्क्रीट कार्बन तंतु प्रबलित कार्बन मैट्रिक्स सम्मिश्र हमने विकसित किया। इस शोध पत्र में, हमारे द्वारा विकसित किये गए पेटेंटेड प्रक्रम से बने रैडंमली ओरिएंटेड कार्बन/कार्बन सम्मिश्र को प्रमोचन यान के उप-तंत्रों में प्रयोग होने वाली गैस मोटर के मुख्य अंग पंखुड़ी को बनाने के लिये प्रयोग किया गया है। परम्परागत पंखुड़ी की तुलना में डिस्क्रीट कार्बन तंतु प्रबलित कार्बन मैट्रिक्स सम्मिश्र पंखुड़ी ज्यादा प्रभावी पाई गई।

Abstract

पर्यावरण पर निर्माण सामग्रियों का प्रभाव (Impact of construction ingredients on environment)

Author: 
सिप्पी कालरा चौहान, विजय बहादुर यादव, अनुराधा शुक्ला एवं ओम प्रकाश
Source: 
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश:


आजकल निर्माण उद्योग बड़ी शीघ्रता से उन्नति कर रहा है। जिस प्रकार से इमारतों की रूपरेखा और उनका निर्माण किया जा रहा है उससे हानिकारक पर्यावरण संकट उत्पन्न होता है। एक शोध के अनुसार निर्माण उद्योग ऊर्जा की खपत करने वाला तीसरा बड़ा उद्योग है। इस उद्योग द्वारा बढ़ते हुये शहरीकरण से पृथ्वी के तापमान में भी वृद्धि हो रही है। इसके अतिरिक्त इस उद्योग में प्रयुक्त सामग्रियाँ पर्यावरण को प्रदूषित करने लिये भी उत्तरदायी हैं। निर्माण सामग्रियों से संबंधित मुख्य वातावरण समस्या वायु, जल एवं ध्वनि प्रदूषण की है। विभिन्न प्रकार की निर्माण प्रक्रियायें जैसे भू-उत्खनन, डीजल इंजन का चालन, इमारत विध्वंस तथा दहन आदि वायु प्रदूषण के कारक हैं। विभिन्न निर्माण सामग्रियों यथा कंक्रीट सीमेंट एवं सिलिका पत्थर आदि के प्रयोग से अत्यंत छोटे धूल कण PM-10 उत्पन्न होते हैं जो श्वास प्रकिया में फेफड़ों के भीतर तक प्रवेश करके कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं जैसे सांस रोग, दमा, ब्रोंकाइटिस, कैंसर आदि उत्पन्न करते हैं। निर्माण क्षेत्रों पर चलने वाले वाहनों, भारी यंत्रों और अन्य उपकरणों का चलना ध्वनि प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं। ध्वनि प्रदूषण से सुनने की क्षमता का क्षय, उच्च रक्त चाप, अनिद्रा और तनाव उत्पन्न होता है। ध्वनि प्रदूषण जानवरों की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करता है। इस प्रकार निर्माण सामग्रियाँ पर्यावरण के लिये अत्यन्त हानिकारक पाई गई हैं लेकिन देश को विकसित करने के लिये औद्योगिकीकरण भी अनिवार्य है इसलिये यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि इस सब के लिये प्राकृतिक संसाधनों के साथ इस हद तक छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिये जिससे कि मानव के स्वयं के अस्तित्व के लिये संकट उत्पन्न हो जाए।

Abstract