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उत्तराखण्ड के स्रोतों को रीचार्ज करेगा जीएसआई

Author: 
सुमन सेमवाल
Source: 
दैनिक जागरण, 26 दिसम्बर 2017

अल्मोड़ा का बड़ा भूभाग इन दोनों लाइनों के मध्य आता है और इनके दायरे में आने वाले जलस्रोतों को ही रीचार्ज करने का निर्णय लिया गया है। जीएसआई निदेशक भूपेंद्र सिंह के अनुसार देखा जाएगा कि कहीं फॉल्ट के सक्रिय स्थिति में होने के चलते तो स्रोत नहीं सूख रहे। स्थिति स्पष्ट होने के बाद उसके मुताबिक जलस्रोतों को रीचार्ज करने की कार्रवाई की जाएगी। एमओयू हस्ताक्षरित होने के बाद जीएसआई ने बोर्ड ने अल्मोड़ा के जल स्रोतों का पूरा ब्योरा माँगा है।

गंगा मैली करने वालों के खिलाफ कानून जल्द

Source: 
दैनिक जागरण, 20 दिसम्बर, 2017

केंद्रीय जल संसाधन और गंगा संरक्षण राज्यमंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह ने कहा कि नमामि गंगे परियोजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल है। नदियों को निर्मल रखने के लिये हर नागरिक को आगे आना होगा। कहा कि गंगा मैली करने वालों पर अंकुश लगाने के लिये जल्द ही कानून भी बनाया जाएगा।

ऋषिकेश में गंगा नदी मंगलवार को हरिद्वार के ऋषिकुल स्थित मालवीय ऑडिटोरियम में आयोजित समारोह में केंद्रीय राज्य मंत्री ने नमामि गंगे राष्ट्रीय गंगा स्वच्छता मिशन के तहत 918.93 करोड़ रुपये की लागत से 32 परियोजनाओं के शिलान्यास के अलावा गंगोत्री धाम में सीवेज व एसटीपी और बदरीनाथ में 0.26 एमएलडी क्षमता के एसटीपी का लोकार्पण भी किया। परियोजनाओं के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में गंगा और सहायक नदियों के किनारे बसे 15 शहरों को इन परियोजनाओं में शामिल किया गया है।

शादी के मौके पर नवदम्पति रोपते हैं पौधा

Author: 
सतेन्द्र डंडरियाल
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दैनिक जागरण, 19 दिसम्बर, 2017

पेशे से मोहन पाठक शिक्षक हैं। लेकिन उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को भी शिक्षा का हिस्सा बना लिया है। शादियों के सीजन में वह खुद लोगों के घरों में जाते हैं। उन्हें प्रेरित करते हैं और खुद भी आयोजन में शामिल होते हैं। मकसद यह है कि जिस पौधे को बेटी रोपकर पीहर के लिये प्रस्थान करे, उसे माता-पिता संतान की तरह प्यार करें और एक पौधा बड़ा होकर पेड़ बने तो यह बाकियों के लिये प्रेरणा बने।

जल पर जंग (War on water)

Source: 
प्रयुक्ति, 19 दिसम्बर, 2017

भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में ऐसे पल कम ही आते हैं जब हालात सामान्य से हों या सामान्यता की ओर हों, वर्ना हर समय तल्खी और तनाव बना ही रहता है। अब दोनों पड़ोसियों के बीच पानी को लेकर हालात गर्मा रहे हैं। आशंका तो जल युद्ध की भी जताई जा रही है। दरअसल, दोनों देश कश्मीर में अपने-अपने इलाके में कई हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजनाओं में लगे हुए हैं। खबर है कि किशनगंगा नदी पर बन रही भारतीय परियोजनाओं का पाकिस्तान विरोध कर रहा है। उसे लगता है कि भारत अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये पानी अपनी ओर मोड़ सकता है। वैसे कुछ समय पहले पाकिस्तान के केन्द्रीय बैंक ने एक रिपोर्ट में बताया था कि भविष्य में पानी की कमी से देश में खाद्य सुरक्षा और लम्बी अवधि, वृद्धि की राह में मुश्किलें आएँगी। इस लिहाज से देखें तो स्थितियाँ जटिल होती जा रही हैं।

पंजाब में बढ़ते प्रदूषण पर गम्भीर हुई कैप्टन सरकार

Author: 
कैलाश नाथ
Source: 
दैनिक जागरण, 19 दिसम्बर, 2017

दिल्ली में स्मॉग के कहर के बाद अब पंजाब प्रदूषण को लेकर गम्भीर नजर आ रहा है। पंजाब सरकार ने लम्बे समय बाद एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग सिस्टम के सेंटर में विस्तार करने का फैसला किया है। इसके लिये जालंधर, खन्ना व पटियाला को चुना गया है। पिछले दो माह में प्रदूषण को लेकर चल रहे हो-हल्ले और पंजाब में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण को देखते हुए पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) ने राज्य के एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग सिस्टम में विस्तार करने का फैसला किया है। अभी तक मंडी गोबिंदगढ़, अमृतसर और लुधियाना में ही एमबिनेट एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग स्टेशन स्थापित है। जिससे इन तीनों जगहों की सटीक जानकारी प्राप्त हो पाती है।

वायु प्रदूषण प्रदूषण को लेकर लगातार हो रहे हंगामे को देखते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग स्टेशन की संख्या 8 करने का फैसला किया है। बोर्ड दो चरणों में पाँच स्टेशन स्थापित करने जा रहा है। पहले चरण में जहाँ जालंधर, खन्ना और पटियाला में स्टेशन स्थापित किया जाएगा। वहीं, दूसरे चरण में बठिंडा और रोपड़ में स्टेशन स्थापित किया जाएगा।

क्या होंगे फायदे : पीपीसीबी के चेयरमैन काहन सिंह पन्नू का कहना है कि वायु प्रदूषण को लेकर लोगों में जागरुकता आई है। प्रदूषण में बढ़ोत्तरी भी हुई है। प्रदूषण नियंत्रण मॉनीटरिंग स्टेशन के स्थापित होने से तीन अन्य जिलों के वायु प्रदूषण की सटीक जानकारी तुरन्त मिल सकेगी, जबकि अभी तक यह रिपोर्ट आने में देर लगती है।

नदी बचाने का संकल्प लिया

Source: 
अमर उजाला, 11 दिसम्बर, 2017

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राष्ट्र सेविका समिति ने रविवार को आसन नदी के उद्गम स्थल को सुरक्षित रखने के लिये ‘नदी बचाओ’ का संकल्प लिया।

ऋषि गौतम की तपस्थली चंद्रबनी क्षेत्र में गौतम कुंड से आसन नदी निकलती है। राष्ट्र सेविका समिति की प्रान्त प्रचार प्रमुख शिवानी कक्कड़ का कहना है कि यह एक जीवित नदी है। इसकी पवित्रता और स्वच्छता गन्दे नाले और नालियों से प्रदूषित हो रही है।

राष्ट्र सेविका समिति और दीन दयाल सेवा प्रतिष्ठान के पदाधिकारियों ने चंद्रबनी मन्दिर के महन्त से भेंट की। आसन नदी के उद्गम स्थल और आस-पास क्षेत्र में गन्दगी फैली हुई है। नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। सेवा प्रतिष्ठान की शुभा वर्मा ने कहा कि मानव जीवन के लिये पर्यावरण और नदियों की सुरक्षा बहुत जरूरी है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की यह प्राथमिकता पर है।

समिति की प्रान्त कार्यवाहिका डॉ. अंजलि वर्मा ने कहा कि आसन नदी का उद्गम स्थल पौराणिकता और ऐतिहासिकता से जुड़ा हुआ है। इसका संरक्षण सबकी प्राथमिकता होना चाहिए। पूर्व पंचायत सदस्य राजेश ने कहा कि इस प्रकल्प में क्षेत्रीय लोग पूरे लगन के साथ जुटेंगे। इस मौके पर शपथ ग्रहण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। समिति ने मुख्यमंत्री को भी एक पत्र भेजा है। कार्यक्रम में नम्रता मुखर्जी, रीतिका गोयल, शिवरानी, रजनी नेगी, माधुरी, उपाध्याय, प्रगति शर्मा, सुधा शर्मा, प्रदीप वर्मा आदि रहे।

नदियाँ बचाने को सार्क देश करें सामूहिक पहल

Source: 
अमर उजाला, 02 दिसम्बर, 2017

दून विवि में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सेमिनार के समापन पर बोले प्रो. गोपाल, विकास के लिये हो प्राकृतिक सम्पदा का दोहन

पंचेश्वर बाँध देहरादून। हिमालय से निकलने वाली नदियों को बचाने के लिये चीन समेत सार्क देशों को सामूहिक प्रयास करना होगा। हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बाँध किसी भी सूरत में नहीं बनना चाहिए। ऐसा होने से हिमालय के पर्यावरण को नुकसान होगा। प्राकृतिक सम्पदा का दोहन विकास के लिये होना चाहिए। ये बातें नेपाल के प्रसिद्ध पर्यावरणविद और त्रिभुवन विश्वविद्यालय के प्रो. गोपाल शिवाकोटी चिन्तन ने कही। वह शुक्रवार को दून विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सेमिनार को सम्बोधित कर रहे थे।

आकाश में टंगी आँखें खोज सकती हैं समुद्र में छिपे सांस्कृतिक अवशेष (Geospatial techniques help in marine archaeology)

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इंडिया साइंस वायर, 30 नवम्बर, 2017

वास्को-द-गामा (गोवा) : कृत्रिम उपग्रहों और रिमोट सेंसिंग तकनीक वाली भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी का उपयोग प्राकृतिक व सांस्कृतिक संसाधनों को समझने के लिये बड़े पैमाने पर हो रहा है। अब भारतीय वैज्ञानिकों ने इस प्रौद्योगिकी का उपयोग तमिलनाडु के तट पर समुद्र में डूबे खण्डहरों को खोजने के लिए किया है।

समुद्र में छिपे सांस्कृतिक अवशेष गोवा स्थित राष्ट्रीय समुद्र-विज्ञान संस्थान (एनआईओ) के वैज्ञानिकों ने भू-स्थानिक तकनीक की मदद से महाबलीपुरम, पूमपूहार, त्रेंकबार और कोरकाई के समुद्र तटों और उन पर सदियों पूर्व बसे ऐतिहासिक स्थलों का विस्तृत अध्ययन किया है। इससे पता चला है कि महाबलीपुरम और उसके आस-पास तटीय क्षरण की दर 55 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि पिछले 1500 वर्षों से इसी दर से महाबलीपुरम की तटरेखा में क्षरण हुआ होगा, तो निश्चित रूप से उस समय यह तटरेखा लगभग 800 मीटर समुद्र की तरफ रही होगी। इसी आधार पर पुष्टि होती है कि समुद्र के अंदर पाए गए ये खण्डहर भूभाग पर मौजूद रहे होंगे।

महाबलीपुरम के बारे में माना जाता है कि इसके तट पर 17वीं शताब्दी में सात मंदिर स्थापित किए गए थे और एक तटीय मंदिर को छोड़कर शेष छह मंदिर समुद्र में डूब गए थे। यदि महाबलीपुरम की क्षरण दर को पूमपुहार पर लागू किया जाए तो वहाँ भी इसकी पुष्टि होती है कि पूमपुहार में 5-8 मीटर गहराई पर मिले इमारतों के अवशेष 1500 साल पहले भूमि पर रहे होंगे।

छोटे राज्य के बड़े सवाल

Author: 
हरीश रावत
Source: 
दैनिक जागरण, 28 नवम्बर, 2017

भारत सरकार के जल संसाधन मंत्री के तौर पर मैंने तालाब संवर्धन की एक बड़ी योजना बनायी, जिसका फायदा राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश (अविभाजित), महाराष्ट्र ने बड़े पैमाने पर उठाया। उत्तराखण्ड में भी भारत सरकार ने हरिद्वार के करीब सौ तालाबों व नैनीताल के कुछ तालों को सुधारने के लिये प्रोजेक्ट स्वीकृत किया। जिन राज्यों के पास एक निर्धारित मशीनरी थी, उन्होंने उपरोक्त योजना का भरपूर लाभ उठाया।