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14 साल में 10 बार शून्य के स्तर पर पहुँची नैनी झील

Author: 
सुमन सेमवाल
Source: 
दैनिक जागरण, 28 नवम्बर, 2017

जिस नैनी झील के कारण देश व दुनिया में नैनीताल को सरोवर नगरी के नाम से जाना जाता है, उसके इस ट्रेड मार्क पर समय के साथ संकट गहरा रहा है। पीने के पानी पर बढ़ती निर्भरता व झील के स्रोतों के संरक्षण के अभाव में पिछले 14 वर्षों में झील 10 बार शून्य के स्तर पर जा पहुँची। यह वह स्तर होता है, जब किसी स्रोत का पानी न्यूनतम कमी के स्तर को भी पार कर जाता है। नैनी झील में 90.99 फीट की सतह से जब पानी का स्तर 12 फीट से नीचे चला जाता है, तब उसे शून्य स्तर माना जाता है। नैनी झील पुनर्जीवीकरण पर आयोजित सेमीनार में ‘सेंटर फॉर इकोलॉजी डेवलपमेंट एंड रिसर्च (सीईडीएआर)’ उत्तराखण्ड ने इस हकीकत को साझा किया।

खत्म होने के कगार पर नैनी झील सोमवार को आयोजित सेमीनार के दौरान सीईडीएआर के उप कार्यकारी निदेशक विशाल सिंह ने बताया कि इससे पहले झील शून्य के स्तर पर सिर्फ वर्ष 1923 व 1980 में ही पहुँची थी। दूसरी हकीकत यह है कि वर्ष 2017 के ग्रीष्मकाल में झील का पानी सामान्य से 18 फीट नीचे जा पहुँचा। इसकी वजह यह है कि झील से रोजाना 16 मिलियन लीटर पानी खींचा जाता है, जबकि स्रोत के संरक्षण को प्रयास नहीं हो पाए। नैनीताल नगर की जनसंख्या भले ही 42 हजार के करीब हो, मगर ग्रीष्मकाल में वहाँ पर्यटकों को मिलाकर जनसंख्या का आँकड़ा सात लाख को पार कर जाता है।

सालाना जमा हो रही 24.3 सेमी गाद

नैनी झील के लिये एक्शन मोड की जरूरत

Source: 
दैनिक जागरण, 28 नवम्बर, 2017

नैनी झील पुनर्जीवीकरण को लेकर आयोजित सेमीनार में राज्यपाल डॉ. केके पाल ने कही दो टूक

जागरण संवाददाता, देहरादून : सरोवर नगरी नैनीताल की नैनी झील के पुनर्जीवीकरण (रिजुवेनेशन) पर आयोजित सेमीनार में राज्यपाल डॉ. केके पाल ने दो टूक कहा कि इस गम्भीर विषय पर डिस्कशन मोड की बजाय अब एक्शन मोड में आना होगा। नैनी झील को लेकर वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के जो भी सुझाव हैं, उन पर कार्य करने की जरूरत है। झील पर बढ़ते दोहन के दबाव को देखते हुए राज्यपाल ने कहा कि नैनीताल में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सुनिश्चित करते हुए पानी के दुरुपयोग पर पूरी तरह पाबन्दी लगाने की जरूरत है।

सोमवार को राजभवन में ‘नैनी झील पुनर्जीवीकरण के रोडमैप पर सम्बन्धित भागीदारी चर्चा’ विषय पर ‘दि युनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी)’ व ‘सेंटर फॉर इकोलॉजी डेवलपमेंट एंड रिसर्च’ की ओर से आयोजित सेमीनार में राज्यपाल डॉ. केके पाल ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि झील के संरक्षण को लेकर समय-समय पर अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए और इनमें विशेषज्ञों ने तमाम सुझाव भी दिए। लिहाजा, अब संरक्षण को लेकर ठोस काम किए जाने की जरूरत है। इस दिशा में नैनीताल के नागरिकों पर भी अहम जिम्मेदारी है। शहर में पीने के पानी की आपूर्ति इस झील पर टिकी है। प्रतिवर्ष यहाँ आबादी से कई गुना अधिक पर्यटक आते हैं, लिहाजा नैनीताल में जल प्रबन्धन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।

पानी में डिवाइस डालते ही आएगा एसएमएस

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अमर उजाला ब्यूरो, 28 नवम्बर, 2017

यूसर्क और बिड़ला संस्थान बना रहा नई डिवाइस

पानी की रियल टाइम मॉनीटरिंग होते रहने से पानी के रसायनों में बदलाव की जानकारी फौरन मिल जाएगी और समय रहते उपाय किए जा सकेंगे। पानी की जाँच के इस अभियान में छात्रों की इको टास्क फोर्स शामिल की जा सकती है।

बदलते भारत में गाँवों की तस्वीर अभी भी धुंधली

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प्रयुक्ति, 20 नवम्बर, 2017

देश बदल रहा है। देश में हाई स्पीड बुलेट ट्रेन लाने की तैयारी हो रही है। मगर इस बदलाव से गाँव आज भी अछूते हैं। यदि सिर्फ शहरों का ही विकास करना है तो भारत की तस्वीर कैसे बदलेगी। कैसे हम अन्य देशों के मुकाबले नम्बर वन बनेंगे। यह तभी सम्भव हो पाएगा जब देश के नेता शहरों में बदलाव की लहर को गाँवों की ओर भी ले जाएँ। जिससे कि गाँवों में अव्यवस्था की उल्टी लकीर सीधी हो सके और गाँवों में रहने वाले ग्रामीणों को भी दिक्कतों का सामना न करना पड़े। यह सवाल शायद दक्षिणी दिल्ली के सांसद व तुगलकाबाद से विधायक सही राम को समझना होगा।

अन्यथा देश तो बदलते वक्त के साथ बदल जाएगा, लेकिन तुगलकाबाद गाँव बीते वर्षों की तरह और भी पीछे होता चला जाएगा। यह बातें स्थानीय निवासियों के लिहाज से कहना और भी जरूरी है, क्योंकि हमारा आशियाना यह गाँव है। हम तो इसकी कदर करना जानते हैं, लेकिन नेताजी के पास पर्याप्त समय नहीं है कि वह इस गाँव के बारे में सोच सके। चलिए आपको थोड़ा ब्रीफ से समझाते हैं। तुगलकाबाद गाँव दक्षिणी दिल्ली में स्थित है। यहाँ से भाजपा के सांसद रमेश बिधूड़ी व विधायक सही राम हैं। गाँव की आबादी 50 हजार से ज्यादा है। गाँव में गुर्जर बाहुल्य इलाकों के अलावा एक दर्जन से ज्यादा जाति के लोग रहते हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि क्षेत्र के गुर्जर बाहुल्य क्षेत्र में तो गंगा जल की आपूर्ति होती है, मगर अन्य इलाके इससे वंचित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि हमने कई बार इसकी शिकायत विधायक को की, लेकिन विधायक ने भी इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल से भी पानी की समस्या को लेकर मुलाकात कर चुके हैं। उन्होंने मुलाकात के दौरान तो भरोसा दिलाया था कि पानी की व्यवस्था पहले की तरह हो जाएगी, लेकिन सीएम का भरोसा अभी तक फलीभूत नहीं हो पाया है।

खाटू-सिरोही लिनियामेंट के कारण जोधपुर में भूकम्प का खतरा

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राजस्थान पत्रिका, 20 नवम्बर, 2017

जोधपुर। जमीन के नीचे इंडियन प्लेट पर खाटू से लेकर सिरोही तक का लिनियामेंट एक्टिव हो गया है यानी यहाँ की जमीन कमजोर होने से भू-गर्भ की ऊर्जा निकलने का खतरा बढ़ गया है। इसके चलते मारवाड़ और मेवाड़ को पृथक करने वाले इलाकों में भूकम्प की आशंका बढ़ती जा रही है। विशेषकर पाली जिले में, जहाँ रह-रहकर कई बार हल्के भूकम्प आते रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जोधपुर में शनिवार को आया भूकम्प भी इसी लिनियामेंट के समानान्तर था। ऐसे में अब अरावली क्रेटोन का अध्ययन अनिवार्य हो गया है। पूरा विश्व भूगर्भ के नीचे कई प्लेटों के ऊपर तैर रहा है। भारत इंडियन प्लेट पर टिका हुआ है। भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, नेपाल, बर्मा और फिलिपींस इंडियन प्लेट पर टिके हुए हैं। इस प्लेट के किनारों पर नेपाल व अफगानिस्तान जैसे देश हैं, इसलिये ये दोनों भूकम्प के लिहाज से सर्वाधिक खतरे वाले जोन पाँच में आते हैं। इंडियन प्लेट के पीछे का हिस्सा शील्ड के रूप में है, जहाँ राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र का पश्चिमी हिस्सा आता है।

भुज में इंडियन प्लेट कटी हुई है जो सम धोरों तक फैली हुई है। इंडियन प्लेट, चाइना प्लेट से लगातार टकरा रही है। चाइना प्लेट मजबूत है जिसकी वजह से इंडियन प्लेट के टकराने पर इसके कमजोर हिस्सों से ऊर्जा निकलती है। इंडियन प्लेट पर कई लिनियिमेंट हैं, जिसमें खाटू से सिरोही तक लिनियामेंट महत्त्वपूर्ण है। इंडियन प्लेट जैसे ही चाइना प्लेट से टकराती है, सबसे कमजोर लिनियामेंट से सिस्मिक तरंगों के माध्यम से ऊर्जा बाहर निकल आती है।

कमजोर हो गई अरावली की परिधि


खाटू-सिरोही लिनियामेंट अरावली की परिधि के पास स्थित है। अरावली विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं यानी गोंडवाना लैण्ड का हिस्सा है। अरावली की परिधि कमजोर होने से उसके किनारे बसे भू-स्थलों पर धरती डोलने का खतरा कुछ बढ़ जाता है।

अब अध्ययन जरूरी हो गया

ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के रोडमैप का होगा पुनर्गठन

Author: 
संजय टुटेजा
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 12 नवम्बर 2017

आज भी हजारों गाँवों के लोग शुद्ध पेयजल के लिये तरस रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश में लगभग 2000 ब्लॉक ऐसे हैं जहाँ भूजल स्रोतों की कमी है। ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिये जहाँ राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम चलाया जा रहा है वहीं सरकार ने इसी वर्ष मार्च माह में ‘हर घर जल’ योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत 2030 तक प्रत्येक घर तक नल से पेयजल पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस योजना पर लगभग 23000 करोड़ रुपए खर्च किये जाने हैं।

एक एकड़ में उगाई धान की 140 प्रजातियाँ

Author: 
गोविंद दुबे
Source: 
दैनिक जागरण, 30 सितम्बर 2017

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के खागा तहसील का हसनपुर अकोढिया गाँव इन दिनों चर्चा में है। यहाँ के एक किसान के खेत में देश और दुनिया की 140 प्रजातियों की धान की फसल लहलहा रही है। जिसे देखने के लिये कृषि वैज्ञानिकों की टीम के अलावा आस-पास के किसानों की भी भीड़ जुटती है। किसान ने स्थानीय जलवायु के अनुकूल धान की बेहतर प्रजाति का पता लगाने के लिये यह प्रयोग किया है। अब कृषि वैज्ञानिकों के लिये भी यह शोध का विषय बन गया है।

लहलहा रही धान


यह पूरी कवायद किसान ने यह जानने के लिये की है कि उसके खेत की मिट्टी और जलवायु के अनुरूप सबसे उत्पादक धान कौन सा हो सकता है, जिसका वह सफल उत्पादन कर सके। रमेश सिंह के इस प्रयोग ने कृषि वैज्ञानिकों को भी हैरत में डाल दिया। एक समान परिस्थिति और जलवायु में देश-विदेश की 140 धान प्रजातियोंं को किसान ने एक एकड़ में सफलतापूर्वक तैयार किया। रमेश ने पाकिस्तान, चीन, अमेरिका सहित 20 देशों की प्रजातियों का धान उगाया है। तकरीबन सौ प्रजातियाँ पककर तैयार हो गईं तो चालीस प्रजातियों की बाली हरी है। उन्होंने बताया कि सभी प्रजातियों की पौध एक ही दिन लगाई गई थी और पानी व उर्वरक की बराबर मात्रा में दी गई है।

यह मिलेगा लाभ


रमेश ने बताया कि एक एकड़ में धान की हर प्रजाति की रोपाई की गई है। वैज्ञानिक अब इस बात पर शोध कर रहे हैं कि यहाँ की जलवायु के लिये कौन-कौन सी प्रजातियाँ उपयुक्त होंगी। एक बाली में पड़े दानों की संख्या से उत्पादन का पता चलेगा। रोग प्रतिरोधक क्षमता, फसल पकने की अवधि एवं धान से चावल की रिकवरी के मानकों पर बेहतर प्रजाति का चयन होगा। अच्छी प्रजाति मिलने से उत्पादन का अच्छा मूल्य मिलेगा। इस समय हाइब्रिड की 80 फीसद प्रजाति में चावल की रिकवरी की समस्या आ रही है। इस शोध से 67 प्रतिशत से अधिक रिकवरी वाली प्रजातियों की चिन्हित किया जा सकेगा। किसान ने बताया कि जो फसल पकती जा रही है, उसका अलग रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है।

कृषि वैज्ञानिकों ने सराहा

अब बगैर पानी के बना सकेंगे स्टील

Author: 
राजेश राय पप्पू
Source: 
दैनिक जागरण, 13 अक्टूबर 2017

भारतीय युवा वैज्ञानिक ने ईजाद की लौह पृथक्करण की नई तकनीक

सहरसा/पानी के बिना लोहे का उत्पादन सम्भव नहीं है। इस्पात उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती पानी की है। बड़ी उत्पादन इकाइयों में रोजाना करोड़ों गैलन पानी का इस्तेमाल किया जाता है। भारतीय युवा वैज्ञानिक ने इस समस्या से निपटने का उपाय ढूँढ निकाला है। इंजीनियर दीपक कुमार ने खनिज पदार्थ से लौह अयस्क को पृथक करने का जो फार्मूला दिया है, उसमें बिना पानी के ही यह काम सम्भव हो सकता है।

सिंक होल फ्लुइडाइजर तकनीक


दीपक द्वारा विकसित लौह अयस्क पृथक्करण की इस तकनीक में पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसमें लौह खनिज को उचित ताप-दबाव में तरल अवस्था में लाकर उसमें हवा का बहाव कराया जाता है, जिससे पृथक्करण आसानी से हो जाता है।

बिजली-पानी दोनों की बचत


खनिज पदार्थ से लौह पृथक्करण की सामान्य इकाई, जिसमें प्रति घंटे 20 किलोवाट ऊर्जा की खपत होती है, उसमें प्रतिवर्ष 137 गीगा लीटर पानी खर्च होता है। सिंक होल फ्लुइडाइजर तकनीक से पानी के साथ-साथ बिजली भी बचाई जा सकेगी। मतलब प्रतिघंटे 20 किलोवाट ऊर्जा के साथ-साथ 137 गीगा लीटर पानी की भी बचत होगी।

शोध को मिली सराहना


पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में आयोजित लौह अयस्क सम्मेलन-2017 में दीपक को सिंक होल फ्लुइडाइजर तकनीक के लिये सर्वश्रेष्ठ युवा इंजीनियर के रूप में सम्मानित किया गया। बिहार के पूर्णिया जिले के रहने वाले दीपक आइएसएम धनबाद से खनिज अभियंत्रण में बीटेक करने के बाद ऑस्ट्रेलिया स्थित न्यूकैसल विश्वविद्यालय में रसायन के प्रख्यात प्रोफेसर केविन गेल्विन के पर्यवेक्षण में पीएचडी कर रहे हैं।

बिन पानी सब सून


1. 01 टन इस्पात उत्पादन में तीन लाख लीटर पानी होती है खपत
2. 30 करोड़ गैलन पानी का उपयोग प्रतिदिन होता है इंग्लैंड के शौटन इस्पात केन्द्र में
3. 03 लाख गैलन पानी का उपयोग रोजाना भारत के भिलाई स्टील प्लांट में किया जाता है

अपने गाँव से करेंगे चकबन्दी की शुरुआत - मुख्यमंत्री


राज्य स्तरीय कृषक महोत्सव कार्यक्रम को सम्बोधित करते मुख्यमंत्री रावतराज्य स्तरीय कृषक महोत्सव कार्यक्रम को सम्बोधित करते मुख्यमंत्री रावत‘आप भला तो जग भला’ जैसी कहावत को कृतार्थ करने की राह पकड़े उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत इन दिनों अपने वक्तव्य में कहीं भी चूक नहीं करते कि वे चकबन्दी अपने गाँव खैरासैण से आरम्भ करेंगे। जबकि 80 के दशक में उत्तरकाशी जनपद के बीफ गाँव में स्व. राजेन्द्र सिंह रावत ने चकबन्दी करवाई।

यह पहला गाँव है जहाँ लोगों ने स्वैच्छिक चकबन्दी को तबज्जो दी थी। उसके बाद कई सरकारें आईं और गईं पर किसी में भी इतना दम नहीं दिखा कि वे चकबन्दी के लिये खास नीतिगत पहल करे। अब लगभग चार दशक बाद राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री ने इस ओर कदम बढ़ाया है। अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो मुख्यमंत्री रावत की यह पहल रंग ला सकती है।

ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड राज्य में कृषि की जोत एकदम छोटी है और बिखरी भी हुई है। कृषि विकास के लिये राज्य में चकबन्दी करना नितान्त आवश्यक है। यह बात सभी राजनीतिक व सामाजिक संगठनों के मंचों पर लगातार उठती रही। पिछली कांग्रेस सरकार ने बाकायदा एक चकबन्दी विकास बोर्ड का गठन भी किया था। इस बोर्ड के अध्यक्ष भी चकबन्दी के प्रणेता स्व. राजेन्द्र सिंह रावत के छोटे भाई केदार सिंह रावत को मनोनित किया गया। इस बोर्ड ने चकबन्दी पर कितना काम किया यह सामने नहीं आ पाया। इधर वर्तमान में भाजपानीत सरकार ने बोर्ड को तो ठंडे बस्ते में डाल दिया, उधर मुख्यमंत्री बार-बार अपने भाषणों में जरूर कहते हैं कि वे पहले अपने गाँव से चकबन्दी की शुरुआत करेंगे।