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गाँवों में खुलेंगे साइंस सेंटर तो मिलेगी विकास को गति

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 19 मार्च, 2018

105वीं राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस सम्मेलन 2018105वीं राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस सम्मेलन 2018 इम्फाल : वैज्ञानिक खोजों एवं प्रौद्योगिकी से लोगों की दूरी कम हो तो लोगों की जिन्दगी बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। पर, ग्रामीण एवं दूर-दराज के इलाकों के लोगों की दूरी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से सबसे अधिक है। शहरों के साथ-साथ गाँवों में भी बड़ी संख्या में साइंस सेंटर खुलने चाहिए, जो गाँवों के विकास में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इस तरह के सेंटर गाँवों से अन्धविश्वास दूर करने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के साथ-साथ भावी पीढ़ियों को विज्ञान से जोड़ने में कारगर हो सकते हैं। मणिपुर के उप-मुख्यमंत्री वाई. जॉयकुमार सिंह ने ये बाते कही हैं। वह मणिपुर विश्वविद्यालय में 11वें राष्ट्रीय विज्ञान संचारक सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर बोल रहे थे।

राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद द्वारा आयोजित किया जाने वाला राष्ट्रीय विज्ञान संचारक सम्मेलन भारतीय विज्ञान कांग्रेस का एक अहम हिस्सा है, जिसमें देशभर के विज्ञान संचारक जुटते हैं और विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए प्रभावी रणनीति पर विचार करते हैं। इस बार 105वीं राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस मणिपुर की राजधानी इम्फाल में चल रही है, जिसका आयोजन मणिपुर विश्वविद्यालय ने किया है। विज्ञान कांग्रेस 16 मार्च से शुरू होकर 20 मार्च तक चलेगी।

कैसी होगी भविष्य की दुनिया, भावी वैज्ञानिकों पर निर्भर

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 17 मार्च, 2018

मणिपुर विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय किशोर विज्ञान कांग्रेस में पुरस्कार प्राप्त करते हुए यशी गुप्तामणिपुर विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय किशोर विज्ञान कांग्रेस में पुरस्कार प्राप्त करते हुए यशी गुप्ता नई दिल्ली : ज्ञान सिर्फ अपने लिये है तो इसका कोई उपयोग नहीं है, बल्कि इसका उपयोग समाज के विकास के लिये होना चाहिए। यदि आप शिक्षित हैं तो आपकी शिक्षा का लाभ समाज के उन लोगों को भी जरूर मिलना चाहिए जिन लोगों को अभी तक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का भरपूर लाभ नहीं मिल सका है।

यह बात नागालैंड के राज्यपाल पी.बी. आचार्य ने कही है। वह मणिपुर विश्वविद्यालय में 16-20 मार्च तक चलने वाले भारतीय विज्ञान कांग्रेस के दूसरे दिन राष्ट्रीय किशोर विज्ञान कांग्रेस को सम्बोधित कर रहे थे।

इस अवसर पर देश भर से एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता के तहत चुनकर आए दस प्रतिभाशाली किशोर वैज्ञानिकों को उनके उत्कृष्ट वैज्ञानिक कार्यों एवं विज्ञान आधारित मॉडल्स के लिये वर्ष 2017-18 के इन्फोसिस फाउंडेशन-इस्का ट्रैवल अवार्ड से सम्मानित किया गया है।

प्रयोगशाला से जमीनी स्तर तक पहुँचे शोध कार्यों का दायरा - प्रधानमंत्री

Author: 
नवनीत कुमार गुप्ता
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 15 मार्च, 2018

इम्फाल : भारतीय विज्ञान कांग्रेस का 105वां सत्र मणिपुर की राजधानी में शुरू हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैज्ञानिकों को सामाजिक समस्याओं को हल करने के लिये काम करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, 'विकास के लिये शोध' के रूप में अनुसंधान और विकास को फिर से परिभाषित करने के लिये समय आ गया है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से अनेक जटिल समस्याओं को हल करने में विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों का समन्वय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस बात को उन्होंने कृषि मौसम पूर्वानुमान सेवाओं का उदाहरण देकर समझाया। मौसम की सटीक जानकारी कृषि सहित अनेक क्षेत्रों में लाभदायक साबित हो रही है।

उन्होंने वैज्ञानिकों से सामाजिक आर्थिक समस्याओं का समाधान करने की अपील करते हुए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के द्वारा समाज के समक्ष उत्पन्न होने वाली नई चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करने को कहा जिससे समाज के गरीब और वंचित वर्ग को भी विकास का लाभ मिल सके।

उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वैज्ञानिकों को एक वर्ष में सौ घंटे विद्यार्थियों के साथ बिताना चाहिए और उन्हें विज्ञान और प्रौद्योगिकी के महत्व से अवगत कराते हुए समग्र विकास में विज्ञान की भूमिका से अवगत कराना चाहिए। इससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी समाज में प्रसार होगा जिससे जन-मानस में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का समग्र उपयोग जीवन-स्तर में सुधार का माध्यम बनेगा।

विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिये संचारकों को राष्ट्रीय पुरस्कार

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 28 फरवरी, 2018

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद (एनसीएसटीसी) की ओर से बुधवार को वर्ष 2017 के लिये विज्ञान संचारकों को राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार प्रदान किए गए हैं। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, भू-विज्ञान, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने ये पुरस्कार प्रदान किए हैं।

विज्ञान को लोकप्रिय बनाने और संचार के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रयासों को प्रोत्साहित एवं मान्यता दिलाने और वैज्ञानिक अभिरुचि को बढ़ाने में अपना योगदान देने वाले लोगों एवं संस्थाओं को छह श्रेणियों में यह पुरस्कार हर साल दिया जाता है। इस अवसर पर बोलते हुए डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि "लोगों के बीच विज्ञान की पहुँच सुनिश्चित करने के लिये गतिशील दृष्टिकोण अपनाने और वैज्ञानिक सामाजिक जिम्मेदारी को अनुकूलित करने की जरूरत है।"

विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिये संचारकों को राष्ट्रीय पुरस्कार डॉ. हर्षवर्धन ने यह भी कहा कि “देश विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है, लेकिन हमें सर सी.वी. रामन जैसे वैज्ञानिकों की जरूरत है।” राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 'रामन प्रभाव' की खोज की याद में हर वर्ष 28 फरवरी को मनाया जाता है। इसी खोज के कारण रामन को नोबेल पुरस्कार मिला था।

हाथी की लीद से कागज निर्माण

Author: 
आभास मुखर्जी
Source: 
विज्ञान प्रगति, जनवरी 2018

इस कागज को बनाने के लिये चाय बागानों की देखभाल एवं रख-रखाव से जुड़े टी एस्टेटों तथा एलीफेंट पार्कों से हाथी की लीद इकट्ठा की जाती है। दिनभर में एक हाथी औसतन करीब 200 किलोग्राम तक लीद उत्पन्न करता है। इस लीद को पुनःचक्रण कर इसे विसंक्रमित यानी रोगाणुमुक्त किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त लुगदी से बिना रेसे वाले हिस्से को अलग कर उसे नरम करने के लिये उसमें रुई के फाहे और टुकड़े, कास्टिक सोडा तथा स्टार्च आदि मिलाया जाता है।

इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल 2017

Source: 
विज्ञान प्रगति, जनवरी 2018

हाल ही में चार दिवसीय तीसरे इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल का शुभारम्भ 13 अक्टूबर, 2017 को अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई में किया गया जिसका संचालन राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान द्वारा किया गया। इस विज्ञान महोत्सव का विषय था ‘नये भारत के लिये विज्ञान’ इस चार दिवसीय लम्बे कार्यक्रम का आयोजन पाँच अलग-अलग स्थानों, अन्ना विश्वविद्यालय (मुख्य स्थल), राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान, सीएसआईआर-केन्द्रीय चमड़ा अनुसन्धान संस्थान, सीएसआईआर-संरचनात्मक अभियांत्रिकी अनुसन्धान केन्द्र और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास में किया गया। छात्र, शिक्षक, शोधकर्ता, विद्वान, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, सामाजिक संगठन आदि विभिन्न क्षेत्रों से लोग इस आयोजन में शामिल हुए।

चार दिवसीय तीसरे इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल का शुभारम्भ करते हुए विज्ञान और प्रौद्योगिकी एवं पृथ्वी विज्ञान तथा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के केन्द्रीय मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन ने कहा कि हमारा देश लाखों अन्वेषकों को जमीनी स्तर से ही बढ़ावा देता है और यह आधुनिक उद्यमी कौशल के साथ उन्हें सशक्त बनाता है तथा उन्हें उन्नत औद्योगिकियों से परिचित कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि इनोवेटर्स समिट (Innovator’s summit) का उद्देश्य जमीनी स्तर पर तकनीकी नवाचारों को मजबूत और हमारे उत्कृष्ट परम्परागत ज्ञान को समृद्ध करना है। इससे छात्रों और शोधकर्ताओं से लेकर आविष्कारों और नीति निर्माताओं तक हितधारकों को एक आम मंच मिलेगा।

ड्रिप सिंचाई तकनीक से तैयार हो रहा दिल्ली का पहला वर्टिकल गार्डेन

Source: 
नवोदय टाइम्स, 12 जनवरी, 2018

दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस वे पर जहाँ तेज रफ्तार में गाड़ियों के दौड़ने के लिये सड़क तैयार की जा रही है। वहीं पर्यावरण पर भी ध्यान दिया जा रहा है। पहले फेज में वर्टिकल गार्डन बनाने का काम आरम्भ करने के अलावा चौथे चरण में हरित कॉरिडोर भी विकसित करने की योजना है। डासना से मेरठ के बीच यह कॉरिडोर बनाने की योजना है। जिसमें सड़क के दोनों तरफ हरे-भरे पेड़ और हरियाली होगी।

समय से पहले ही आने लगे काफल और बुरांश के फूल

Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 11 जनवरी 2018

बुरांसबुरांसपहाड़ों में बदलते जलवायु परिवर्तन ने वैज्ञानिकों की चिन्ता बढ़ा दी है। समुद्रतल से आठ से नौ हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाने वाला काफल फल तय समय से पहले ही पेड़ों पर लकदक कर पकने को तैयार हो गया है। साथ ही दिसम्बर के महीने में बुरांश के फूल भी जंगल में खिले हुए दिख रहे हैं, जो एक चिन्ता का विषय बना हुआ है।

रुद्रप्रयाग जिले के विकासखण्ड अगस्त्यमुनि के बच्छणस्यूं के बंगोली गाँव के जंगलों में इन दिनों काफल और बुरांश के पेड़ों पर फूल खिले नजर आ रहे हैं। ग्रामीणों की माने तो पेड़ों पर तीन महीने पहले ही काफल लग चुके हैं। जबकि पिछले वषों में काफल का फल मार्च के आखिरी सप्ताह में गिने चुने पेड़ों पर ही दिखाई देता था और आबादी वाले क्षेत्रों में अप्रैल और मई माह में काफल पकते थे।

ठंडे क्षेत्र में तो मई से जून के आखिरी सप्ताह तक काफल पकते रहते थे, लेकिन इस समय तीन महीने पहले ही इस तरह की स्थिति पैदा हो गई है, जो कि चिन्ता का विषय बनी हुई है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद जगत सिंह चौधरी जंगली का कहना है कि विकास की दौड़ में लोगों ने जलवायु की ओर ध्यान देना ही छोड़ दिया है, जिसका परिणाम दिसम्बर के महीने में देखने को मिल रहा है। हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी नहीं हो रही तो काफल और बुरांश समय से पहले ही पेड़ों पर आ रहे हैं जोकि हमारे पर्यावरण के लिये बहुत बुरा है। जलवायु परिवर्तन से यह स्थिति पैदा हो रही है। केदारनाथ से लेकर हिमालय रेंज में जहाँ भी बर्फ गिर रही हैं वहाँ बर्फ टिक नहीं पा रही है। विकास के युग में थोड़ा बदलाव लाना होगा और गाँवों के जीवन की तकनीकी को अपनाना होगा।

1- बंगोली गाँव में बुरांश के फूलों से पेड़ लकदक
2- जलवायु में आ रहे परिवर्तन से जनता चिन्तित

उत्तराखण्ड की कोशी को जीआईएस से मिलेगा पुनर्जन्म

Author: 
दीप सिंह बोरा
Source: 
दैनिक जागरण, 09 जनवरी 2018

खोजे गए 14 रीचार्ज जोन और 1820 सहायक नाले, 25 साल के शोध के बाद आखिरकार मिल पाई सफलता

कोशी नदी उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र की एक प्रमुख नदी है। कौसानी के निकट धारपानी धार से निकलने के बाद उत्तराखण्ड में इसकी 21 सहायक नदियाँ और 97 अन्य जलधार हैं। सहायक नालों के रूप में 1820 विलुप्त जल धाराएँ भी खोज ली गई हैं। इन्हीं के बूते करीब 40 वर्ष पूर्व यह 225.6 किमी लम्बी यात्रा करती थी। मगर स्रोतों व सरिताओं को दम तोड़ते जाने से अब उत्तराखण्ड में मात्र 41.5 किमी क्षेत्रफल में सिमट कर रह गई है। कोशी जलागम की ऐसी ही 49 सहायक नदियाँ भी हैं, जो लगभग सूख चुकी हैं।