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सरदार सरोवर की नहरों के लिये केंद्र ने दिए 1500 करोड़

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 22 सितम्बर 2017

पाँच दिन पहले अपने जन्मदिन पर देश को सरदार सरोवर बाँध समर्पित करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कच्छ जिले के रण क्षेत्र को सूखाग्रस्त इलाके के समान मानने का निर्णय किया है।

सरदार सरोवर बांध ऐसे में इस इलाके तक पर्याप्त पेयजल व सिंचाई का जल पहुँचाने को सरदार सरोवर योजना की नहर के लिये 15 सौ करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ने कहा कि केंद्र सरकार की एक्सेलेरेटेड इरीगेशन बेनिफिट प्रोग्राम (एआईबीपी) केंद्रीय सहायता योजना है। इसके तहत केंद्र सरकार केनालों (नहरों) के काम के लिये सूखाग्रस्त इलाकों के लिये केंद्रीय सहायता 75 प्रतिशत तक देती है। जबकि राज्य सरकार का योगदान कुल लागत का 25 प्रतिशत रहता है। जबकि रण इलाकों में केंद्र की ओर से 25 प्रतिशत ही आर्थिक मदद दी जाती है। इस शर्त को सुधारने के लिये नरेंद्र मोदी ने अपने मुख्यमंत्री काल के दौरान केंद्र सरकार को पत्र लिखा था। लेकिन इस पर सुनवाई नहीं हुई। केंद्र में अब जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार है तो उन्होंने गुजरात के हित में इस शर्त को बदलते हुए रण इलाकों में नहर बनाने के लिये आर्थिक सहायता 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 प्रतिशत देने की मंजूरी दी है। इससे योजना के तहत अब केंद्र सरकार के हिस्से में जहाँ 38 प्रतिशत होती थी। वह अब 57 प्रतिशत हो जाएगी। इससे राज्य को 15 सौ करोड़ का फायदा नर्मदा योजना के लिये होगा।

ओएनजीसी की ओर से 73 सौ करोड़ की रॉयल्टी भी

तालाब सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, संस्कृति का भी केन्द्र

Author: 
कुमार कृष्णन

. मौजूदा समय में तालाब का संरक्षण एवं विकास एक बड़ा सवाल बन गया है। तालाब का मानव से जीवंत रिश्ता रहा है। यह एक सामूहिक और साझा संस्कृति का एक स्थल रहा है। आज तालाब सिकुड़ते जा रहे हैं। इसकी संख्या निरंतर घटती जा रही है। तालाबों के अतिक्रमण और भरे जाने की प्रक्रिया के कारण आज भूजल का संकट ज्यादा गहरा हो गया है। पानी, नदी और तालाब तीनों का पारिस्थितिकी के साथ गहरा रिश्ता रहा है। इन्हीं सवालों पर भागलपुर के कलाकेन्द्र में 'परिधि' की ओर से 'तालाब, नदी, पानी ' विषय पर संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। संवाद कार्यक्रम में पर्यावरण से जुड़े समाजकर्मियों ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में भागलपुर तथा उसके आस-पास के तालाबों को अति​क्रमण से मुुक्त कराने और उसे जीवंत स्वरूप प्रदान करने का संकल्प लिया। एक समय था जब सिर्फ भागलपुर के शहरी क्षेत्र में सौ के करीब तालाब होते थे। विकास के मौजूदा ढाँचे इस व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है।

मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता से ‘नमामि गंगे’ नदारद

Author: 
नमिता

प्रेस वार्ता करते हुए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावतप्रेस वार्ता करते हुए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावतउत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत अपने छः माह के कार्यकाल की उपलब्धियों को लेकर पत्रकारों से मुखातिब हुए। हालांकि वे बहुत खुश दिख रहे थे, मगर कुछ पर्यावरणीय सवाल उनके कार्यक्रमों को लेकर खड़े हो गए हैं। उन्होंने हर एक विकासीय योजना को रोजगार से जोड़ा है। रोजगार का सपना दिखाया गया, प्राकृतिक संसाधनों के बेहद दोहन करके उसे रोजगार का खास हथियार बताया है।

एक तरफ उन्होंने यह बताया कि नदी संरक्षण के लिये जरूरी इन्तजाम करने होंगे तो वहीं वे बता रहे थे कि पंचेश्वर बाँध जैसी जल ऊर्जा की योजना राज्य के विकास में मील का पत्थर साबित होगी। अतएव नदी का संरक्षण बाँध बनाने से होगा? या नदी की धारा बाँध बनने के बाद अविरल बहेगी? ऐसे कुछ पर्यावरणीय सवाल मुख्यमंत्री श्री रावत की प्रेसवार्ता के बाद कौतुहल का विषय बन गया। यही नहीं उन्होंने वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री की हर तरफ खूब तारीफ की परन्तु प्रधानमंत्री के ड्रिम प्रोजेक्ट ‘नमामि गंगे’ पर एक शब्द भी नहीं कहा, जो उनके प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है। इधर मुख्यमंत्री श्री रावत ने छः माह का कार्यकाल पूरा करने पर आम जनता, गरीब, पिछड़े और दलित समाज के सर्वांगीण विकास के लिये हो रहे सफल प्रयासों की जमकर प्रशंसा की है तो वहीं उन्होंने राज्य की छोटी जोत की कृषि को कैसे पानी मिले, पहाड़ के गाँव पेयजल संकट से जूझ रहे हैं उनकी यह समस्या कैसे दूर हो इस पर उनकी एक भी योजना प्रेसवार्ता के दौरान सामने नहीं आ पाई।

बाबूलाल दाहिया ने किया किसान-अवार्ड लेने से इंकार


"मध्यप्रदेश में खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है। इसकी वजह से यहाँ के किसानों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। बीते दिनों मंदसौर में किसानों के प्रदर्शन में हुए गोलीकांड के दौरान प्रदेश की सरकार तथा किसानों के बीच दूरी यकायक खासी बढ़ गई है। किसानों के हक़ में फैसले लेने में प्रदेश सरकार नाकाम रही है। प्रदेश की सरकार से किसी भी तरह का सम्मान लेना किसानों के हित में आन्दोलन कर रहे किसानों तथा गोलीकांड में शहीद हुए किसानों के साथ एक प्रकार से धोखा होगा।"

किसान बाबूलाल दाहिया यह कहना है सतना जिले में पिथोराबाद गाँव के एक किसान बाबूलाल दाहिया का। उन्हें 10 सितंबर 2017 को चित्रकूट में आयोजित प्रदेश किसान कार्यसमिति के समापन पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथों कृषि अवार्ड लेने के लिये सतना जिले के कृषि विभाग ने चयनित किया था। लेकिन उन्होंने यह कहकर सबको चौंका दिया कि किसानों के हितों की अनदेखी करने वाली सरकार से मिलने वाले सम्मान को वे ग्रहण नहीं करेंगे। उन्होंने पुरस्कार ठुकरा दिया है।

बिजली की तर्ज पर हो पानी का बँटवारा

Source: 
दैनिक जागरण, नई दिल्ली, 11 सितम्बर 2017

नदियों को आपस में जोड़ने के लिये जितनी ज़मीन की जरूरत होती है इस योजना में उसकी एक तिहाई ही काफी है। यह छह करोड़ हेक्टेयर ज़मीन की सिंचाई में सहायक हो सकती है, जबकि इससे 60 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन भी किया जा सकता है। इसके जरिए 70 करोड़ लोगों को निर्बाध पानी की आपूर्ति की जा सकती है।

पैरों से नियंत्रित होने वाला नल बचाएगा पानी

Author: 
रणवीर ठाकुर
Source: 
दैनिक जागरण, 10 सितम्बर 2017

बाथरूम और किचन में इस्तेमाल होने वाले साधारण नलों से पानी की बहुत बर्बादी होती है। इस समस्या का समाधान निकालने के लिये सेंसर और लेजर तकनीक से नियंत्रित होने वाले नल (टैब) बनाए जा चुके हैं, लेकिन इनकी कीमत अधिक है। हिमाचल प्रदेश स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) हमीरपुर के एक छात्र ने इसका सस्ता और सरल समाधान निकाला है। पैरों से नियंत्रित किया जा सकने वाला यह नल (फुट टैब) न सिर्फ पानी बचाएगा बल्कि संक्रमण से भी बचाव करेगा।

अभियांत्रिकी विभाग के तृतीय वर्ष के छात्र प्रशांत वर्मा ने 2016 में इस नल पर शोध शुरू किया था। उनका कहना है कि बाथरूम में हाथ-मुँह धोने, शेव या ब्रश करते वक्त नल को बार-बार खोलना-बंद करना मुश्किल होता है। कई बार बाल्टी में पानी भरते वक्त भी नल खुला ही रह जाता है। इससे बहुत पानी बर्बाद होता है। यही नहीं, एक ही टोंटी को अलग-अलग लोगों के द्वारा छूने से संक्रमण का भी खतरा बना रहता है। यह नल जितनी जरूरत बस उतना ही पानी देगा।

ऐसे करता है काम


टोंटी की जगह इसे पंप से नियंत्रित किया जाएगा। दरअसल, टँकी से आने वाले पाइप और नल के बीच पैरों से नियंत्रित होने वाला इलैक्ट्रिक पंप जोड़ा गया है। पैडल दबाने पर पंप पानी को खींचता है। इस तरह जितने पानी की जरूरत होगी, उतनी देर पैडल दबाए रखने पर ही पानी निकलेगा। पैर हटाते ही पानी की सप्लाई बंद हो जाएगी। गंदे पानी को बाहर निकालने के लिये भी पाइप लगाया गया है, ताकि इस्तेमाल किये जा चुके पानी को गमलों या क्यारियों में पहुँचाया जा सके।

सस्ता और टिकाऊ


प्रशांत बताते हैं कि उन्होंने इस प्रोजेक्ट पर बुनियादी काम कर लिया है, लेकिन इसमें कुछ और बदलाव किये जाने हैं। लोग इस नल को बाथरूम, हॉस्टलों या होटलों में स्थापित कर सकते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि पैर से चलने वाले इस नल की कीमत मात्र 300 रुपये है। इसे शीघ्र ही बाजार में उतारा जाएगा।

प्रधान व ग्रामीणों ने समझी जल संरक्षण व तालाबों की महत्ता

Author: 
जीतेन्द्र कुमार गुप्ता

. जिलाधिकारी उरई (जालौन) ने कदौरा ब्लॉक के ग्राम अकबरपुर इटौरा में जल संरक्षण पर कराए गए कार्यों का लोकार्पण और विकास कार्यों का निरीक्षण किया। उन्होंने अच्छा काम करने वालों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। गाँव के ऐतिहासिक तालाब (गुरु रोपण का तालाब) जो मुगल बादशाह अकबर द्वारा बनवाया गया था व अन्य तालाबों की महत्ता समझते हुए उनके पुनरुद्धार के लिये अागे आये, वहाँ के वर्तमान प्रधान अमित द्विवेदी इतिहास। जिनके द्वारा तालाबों की सफाई, मरम्मत एवं स्वच्छता की एक मुहिम चलाई गई जिसे कुछ दिक्कतों के बाद खूब जनसमर्थन मिला।

ग्रामीणों को जागरूक कर कराया मुगलकालीन ऐतिहासिक गुरू रोपण तालाब का पुनरुद्धार, कायम की स्वच्छता की मिसाल


वर्तमान प्रधान अमित द्विवेदी जल संरक्षण के महत्त्व को समझते हुए आगे आये तथा प्रधान होने के नाते कुछ सरकारी योजनाओं की मदद लेकर व कुछ लोगों को जागरुक कर जनसमर्थन के साथ तालाबों के कायाकल्प में जुट गये। सबसे पहले उन्होंने मुगलकालीन ऐतिहासिक गुरु रोपण का तालाब की सफाई कराई व उसकी मरम्मत कराई, जिसमें नहर के माध्यम से पानी भरा गया। उनके इस काम को कुछ दिक्कतों के बाद अपार जनसमर्थन मिला। इसके बाद उन्होंने कुछ कुओं की हालत सुधरवाकर उन्हें मॉडल कुओं के रूप में बनाया है। उनके इस काम को जिले के डीएम ने भी सराहा व सम्मानित भी किया गया।

विकास कार्यों में सहयोग करने वालों को सम्मानित किया गया

पर्यावरण के मोर्चों पर गांधी जन

Author: 
कुमार कृष्णन

. भागलपुर स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र ने छात्र-छात्राओं को महात्मा गांधी के नजरिये से पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण मुक्ति का पाठ पढ़ाया। दस दिनों की कार्यशाला में दर्जनों गांधीजनों और विशेषज्ञों ने पर्यावरण की समस्याओं के विभिन्न पहलूओं की गहरी जानकारी दी और यह यकीन दिलाया कि मौजूदा प्रदूषण से मुक्ति के उपाय गांधी जी के दर्शन और विचारों में निहित है।

दस दिनों की कार्यशाला के समापन समारोह को संबोधित करते हुए बी.एन.मंडल विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति डाॅ. फारूक अली ने कहा कि दुनिया भर में बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग को मानव सहित संसार की सभी प्रजातियों के लिये भयावह बताते हुए कहा कि हम अभी भी चेत नहीं रहे हैं और विनाश को करीब लाने वाले तथाकथित विकास के भ्रम में डूबे हुए हैं। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिये जनाआंदोलन की आवश्यकता बतायी। उन्होंने गांधी के सिद्धांतों को ही मौजूदा पर्यावरण समस्याओं से मुक्ति का उपाय बताया।

समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र भागलपुर के अध्यक्ष रामशरण ने कहा कि इस केन्द्र से इस तरह की कार्यशाला का आयोजन पहली बार किया गया। इसमें भाग लेने वाले छात्र, युवा और शोधार्थी निश्चित रूप से लाभान्वित हुए होंगे। उन्होंने कार्यशाला के आयोजक टीम को सलाह दी कि आने वाले समय में किसान, दलित और महिला सहित विभिन्न जनसरोकार के मुद्दे पर अधिक से अधिक युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करें। उन्होंने युवाओं से कहा कि इस कार्यशाला के माध्यम से उनके शिक्षण का काम किया गया है। अब अपने कार्यकलापों के जरिए रचना और संघर्ष का काम करें। प्रयास भले ही छोटा हो, लेकिन ठोस हो।

नर्मदा से सरदार सरोवर तक विस्थापन का बढ़ता दर्द

Author: 
देवदत्त दुबे
Source: 
नया इंडिया, 07 अगस्त, 2017

जाहिर है कि एक तरफ से सरकार की हीलाहवाली और अब गुजरात का दबाव न केवल बाँध को खतरे के निशान पर ले जा रहा है तो दूसरी ओर विस्थापितों को पुनर्वास स्थल पर पर्याप्त सुविधाएँ न मिलने एवं अधिकतम मुआवजे का मोह पर मेधा पाटकर का साथ सरकार की मुश्किलें तो बढ़ा ही रहा है। ऐसे में एक बार विकास की परिभाषा पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं तो विस्थापितों का मौन उपवास अब चिखल्दा गाँव में चीखें मारने लगा है।