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मानव के जीवन मरण का सवाल है पर्यावरण संरक्षण

Author: 
कुमार कृष्णन

पर्यावरण वैज्ञानिक प्रो. एस.पी.राय ने कहा कि इस जीवमंडल में मनुष्य के साथ—साथ अन्य जीव, पौधे और जंतुओं को जीने का उतना ही अधिकार है जितना मनुष्य को है। यदि अब भी प्रकृति के साथ तालमेल नहीं बिठाते हैं या प्राकृतिक संसाधनों का अतिदोहन बंद नहीं करते हैं तो मानव जाति का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

बिहार राज्य आपदा जोखिम न्यूनीकरण मंच 2017 का उद्घाटन

Author: 
कुमार कृष्णन

वज्रपात की पूर्व जानकारी की तकनीक जल्द लाएँ, खर्च मुख्यमंत्री राहत कोष उठाएगा:- मुख्यमंत्री

बिहार बाढ़ और सुखाड़ दोनों से प्रभावित होता है। यहाँ वर्षा कम हो फिर भी राज्य से जुड़े अन्य क्षेत्रों में हो रही वर्षा से बिहार प्रभावित होता है। अगर नेपाल में भारी वर्षा हुई तो नेपाल से निकलने वाली नदियों के पानी में उफान आएगा। अगर मध्य प्रदेश एवं झारखण्ड में अधिक वर्षा हुई तो दक्षिण बिहार में बाढ़ की स्थिति बन जाएगी। अगर उत्तराखण्ड में अधिक वर्षा हुई तो गंगा के पानी में उफान आ सकता है। उन्होंने कहा कि हमें बाढ़ और सुखाड़ दोनोें से लड़ने के लिये हर वर्ष तैयार रहना पड़ता है।

छात्रों को विज्ञान से जोड़ने के लिये सीएसआईआर की नई पहल

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 6 जुलाई, 2017

नई दिल्ली, 6 जुलाई (इंडिया साइंस वायर) : वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने स्‍कूली छात्रों को विज्ञान और वैज्ञानिकों के करीब लाने के लिये केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस) के साथ मिलकर ‘जिज्ञासा’ नामक एक नया कार्यक्रम शुरू किया है।

इस कार्यक्रम का मकसद छात्रों एवं उनके अध्‍यापकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना और उनमें जिज्ञासु प्रवृत्ति को प्रोत्‍साहित करना है। इस कार्यक्रम की मदद से देश भर के 1,151 केंद्रीय विद्यालयों के 1,00,000 छात्र और लगभग 1000 शिक्षकों को सीएसआईआर की 38 प्रयोगशालाओं से प्रतिवर्ष सीधे जोड़ा जा सकेगा।

उम्‍मीद की जा रही है कि इस कार्यक्रम के अन्तर्गत राष्‍ट्रीय प्रयोगशालाओं से सीधा जुड़ाव होने से कक्षा में छात्रों की सीखने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिल सकेगा।

‘जिज्ञासा’ को खास तरीके से डिजाइन किया गया है, ताकि छात्र एवं उनके शिक्षकों का परिचय सैद्धान्तिक अवधारणाओं से जीवन्त रूप से कराया जा सके। इस कार्यक्रम के तहत सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं में जाकर उन्‍हें विज्ञान की छोटी-छोटी परियोजनाओं में शामिल होने का मौका मिल सकेगा।

पिछले कई दशक से सीएसआईआर तकनीक एवं अन्‍वेषण के क्षेत्र में महत्त्‍वपूर्ण कार्य कर रहा है। अपनी प्‍लैटिनम जुबली वर्ष के अवसर पर सीएसआईआर ने अपनी वैज्ञानिक एवं सामाजिक जिम्‍मेदारी को बढ़ावा देने के लिये यह कार्यक्रम शुरू किया है।

CSIR labs to connect with school kids


By Sunderarajan Padmanabhan

India Science Wire, July 6, 2017

New Delhi, July 6 (India Science Wire): The Council of Scientific and Industrial Research (CSIR) has joined hands with Kendriya Vidyalaya Sangathan (KVS) to implement a student-scientist connect programme that will extend classroom learning with a well planned research laboratory-based learning.

भारतीय वैज्ञानिक को यूनेस्‍को पुरस्‍कार

Author: 
नवनीत कुमार गुप्ता
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 27 जून, 2017

. नई दिल्‍ली, 27 जून (इंडिया साइंस वायर) : नैनो-विज्ञान एवं नैनो- प्रौद्योगिकी के विकास में उल्लेखनीय योगदान के लिए यूनेस्‍को ने भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा समेत विश्‍व के सात वैज्ञानिकों एवं संस्‍थानों को वर्ष 2017 के यूनेस्‍को मेडल से नवाजा है। यह पुरस्‍कार सोमवार को पेरिस स्थित यूनेस्‍को मुख्‍यालय में प्रदान किए गए।

प्रोफेसर आशुतोष शर्मा के शोधकार्य में ऊर्जा क्षेत्र में कार्बन आधारित नैनो-कम्पोजिट्स एवं माइक्रो नैनो-इलेक्ट्रोमैकेनिकल, पर्यावरण एवं स्वास्थ्य, क्रियात्मक इंटरफेस, सॉफ्ट मैटर की माइक्रो एवं नैनो क्रियाविधि, नैनो-पैटर्निंग और नैनो-फैब्रीकेशन जैसे विषय शामिल रहे हैं।

प्रोफेसर आशुतोष शर्मा के अलावा इस वर्ष यह पुरस्‍कार नीदरलैंड्स के वैज्ञानिक प्रोफेसर थियो रेजिंग, अमेरिकी संस्‍थान कीसाइट टेक्‍नोलॉजी, जापानी कम्पनी टोयोडा गोसेई, कम्बोडिया के डॉ. हन मेनी, रूस के डॉ. व्लादिमीर बोल्शकोव और मास्को टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी को दिया गया है।

पिछले सात वर्षों से यह पुरस्‍कार ऐसे वैज्ञानिकों, प्रख्यात हस्तियों और संस्थानों को प्रदान किया जाता है, जिन्होंने नैनो-प्रौद्यागिकी एवं नैनो-विज्ञान के विकास में महत्‍वपूर्ण कार्य किया है। वर्ष 2010 में शुरू किए इस पुरस्‍कार से अब तक 37 व्यक्तियों एवं संस्थानों को नवाजा जा चुका है। यूनेस्‍को मेडल से सम्‍मानित कई वैज्ञानिकों को तो नोबेल पुरस्‍कार भी मिल चुका है।

जल संवर्द्धन की बात ना 100 दिनों और ना आने वाले दिनों में


उत्तराखण्ड सरकार के 100 दिन पूर्ण होने पर पुस्तिका का विमोचन करते मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावतउत्तराखण्ड सरकार के 100 दिन पूर्ण होने पर पुस्तिका का विमोचन करते मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावतसूचना एवं लोक सर्म्पक विभाग द्वारा आयोजित सरकार के सौ दिन पर एक विशाल सम्मेलन का आयोजन बीते 25 जून को राजधानी के विशाल मैदान परेड ग्राउंड में किया गया। इस सम्मेलन के पश्चात और पहले मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने क्रमशः देहरादून के टपकेश्वर, मुख्यमंत्री आवास कैंट रोड देहरादून और उधम सिंह नगर में सरकार के 100 दिन की सफलता का बखान किया है।

इस वक्तव्य में जिस तरह से मुख्यमंत्री श्री रावत ने सरकार की प्रशंसा विकास के कार्यों बावत की है वह तरीफे काबिल था। पर श्री रावत के वक्तव्य को सुनने पहुँचे किसान और पर्यावरण कार्यकर्ता इस बात से आश्चर्यचकित हो रहे थे कि जो राज्य प्राकृतिक संसाधनों के बलबूते विकास की कहानी बनाता है उस राज्य का जो विकास का मॉडल मुख्यमंत्री प्रस्तुत कर रहे हैं वह तो सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिये साबित हो रहा है। और-तो-और जिस प्रकृति प्रदत्त जल से लोग जीवित हैं उसके संरक्षण बावत सरकार के 100 दिन और भविष्य के दिनो में कुछ भी नजर नहीं आ रहा है।

गंगा-यमुना को इंसानी दर्जे का मामला पहुँचा सुप्रीम कोर्ट

Author: 
माला दीक्षित
Source: 
दैनिक जागरण, नई दिल्ली, 23 जून 2017

. एक तरफ तो मध्य प्रदेश की भाजपा शासित शिवराज सरकार नर्मदा नदी को जीवित व्यक्ति का दर्जा देने और नदी के कानूनी अधिकार के पक्ष में है तो दूसरी ओर उत्तराखंड की भाजपा सरकार गंगा-यमुना को जीवित व्यक्ति का दर्जा देने के खिलाफ है। उत्तराखंड सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर गंगा-यमुना को जीवित व्यक्ति का दर्जा और कानूनी हक देने के हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने की माँग की है। व्यावहारिक दिक्कतें गिनाते हुए उसने सुप्रीम कोर्ट से हाई कोर्ट के आदेश पर एकतरफा अंतरिम रोक की भी माँग की है।

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने गत 20 मार्च को गंगा, यमुना और उसकी सहयोगी नदियों को संरक्षित करने के लिये जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया था। इन नदियों को जीवित व्यक्ति के समान सभी कानूनी अधिकार दिये थे। हाई कोर्ट ने नमामि गंगे के निदेशक, उत्तराखंड के मुख्य सचिव और एडवोकेट जनरल को इन नदियों के संरक्षण की जिम्मेदारी डाली थी। उत्तराखंड सरकार ने वकील फारुख रशीद के जरिये विशेष अनुमति याचिका दाखिल कर हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि हाई कोर्ट का आदेश कायम रहने लायक नहीं है। हाई कोर्ट ने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर यह आदेश पारित किया है। हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में सिर्फ अवैध निर्माण हटवाने की माँग थी। राज्य सरकार ने कहा है कि इस बात में संदेह नहीं है कि भारत में गंगा, यमुना और सहयोगी नदियों का सामाजिक प्रभाव और महत्त्व है और ये लोगों और प्रकृति को जीवन और सेहत देती है लेकिन सिर्फ समाज के विश्वास और आस्था को बनाए रखने के लिये गंगा-यमुना को जीवित कानूनी व्यक्ति घोषित नहीं किया जा सकता।

कुओं में पानी आया, तो गाँव में गूँज उठी शहनाई

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 18 जून 2017

. अलवर। शहर से करीब 21 किमी दूर पहाड़ी की तलहटी में बसा गाँव ढहलावास। ढाई हजार आबादी वाले इस गाँव में कुछ दिन पहले तक लोग अपने बेटे-बेटियों की शादी करने से भी कतराते थे। वहीं दूसरे गाँव के लोगों ने इनसे नाता तोड़ बेटियाँ देना बंद कर दिया था। इन हालात में गाँव में कुँवारों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। इसकी वजह रहा गाँव में पानी की किल्लत और कुएँ-तालाबों का सूखना। ऐसे में जल संरक्षण के ग्रामीणों के प्रयास व मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन योजना रंग लाई और गाँव के कुओं का जलस्तर बढ़ गया। पिछले साल जोहड़ खुदाई हुई, जो बारिश के बाद लबालव हो गया और आस-पास के कुओं में भी पानी आ गया। पानी आने से गाँव के बेटे-बेटियों की शादी से गाँव में फिर शहनाई गूँज उठी।

12-15 फीट पर पानी


ग्रामीणों के अनुसार पिछले साल जोहड़ खुदाई से पूर्व जो कुएँ सूखे थे, उनमें भी 12-15 फीट पर पानी आ गया। बताते हैं पहले 400-450 फीट पर भी पानी नहीं था।

40 फीसदी युवा थे कुँवारे


पानी की कमी से गाँव के लगभग 40 फीसदी युवा कुँवारे थे। साल में गाँव के एकाध युवा की बामुश्किल शादी होती थी। दूसरे गाँव के लोग इनसे रिश्ता जोड़ने से घबराते थे। खेती व पशुओं के लिये भी पानी का संकट बना हुआ था। इस साल गाँव के कुएँ-तालाबों में पानी आने से गाँव में रिकार्ड 10-15 युवाओं की शादी हुई है।

चार एनीकट और बनें


ग्रामीणों के अनुसार गाँव में जोहड़ से ही आधा दर्जन से अधिक कुओं में पानी आ गया। यदि गाँव में चार और एनीकट सीरावास, बागराज, नाकवा के पास, पहाड़ी पार व बैढाढ़ा के पास बन जाएँ तो पूरे गाँव की पेयजल समस्या समाप्त हो जाए।

अल्लाबक्शपुर में जारी कैंसर का कहर

Source: 
दैनिक भास्कर, 17 जून, 2017

कैंसर की गिरफ्त में फँसे एक और मरीज ने दम तोड़ा, 18 दिन बीतने के बाद भी विभाग ने नहीं ली सुध

ब्रजघाट गंगानगरी से जुड़े हाइवे किनारे वाले गाँव अल्लाबक्शपुर में कैंसर के कहर ने 9 हजार की आबादी को बुरी तरह खौफजदा किया है। क्योंकि महज 21 दिनों के भीतर 27 मई तक गाँव में महिलाओं समेत 99 मरीजों की मौत हो गई थी, जिनमें अधिकांश लिवर और आंतों के कैंसर से पीड़ित थे। गढ़मुक्तेश्वर। महज 12 दिनों में महिलाओं समेत 99 लोगों को मौत की नींद सुलाने के बाद भी गढ़ क्षेत्र के गाँव अल्लाबक्शपुर में कैंसर का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है, जिसने चार दिन पहले महिला की जान लेने के बाद एक और मरीज की जिंदगी छीन ली है। गाँव में अब भी कई ग्रामीण बीमारी की गिरफ्त में फँसे हुए हैं।

श्रमदान कर तालाब को जिंदा किया

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 11 जून 2017

गुरूर, छत्तीसगढ़। जहाँ चाह होती है, वहाँ राह होती है फिर अड़चनें भी दूर हो जाती हैं। ऐसा ही एक माजरा देखने को मिला है, ग्राम सोरर में। इस गाँव में एक पुराना माता तालाब है जिसकी साफ-सफाई और गहरीकरण को लेकर गाँव वाले काफी चिन्तित थे और प्रशासन से भी मदद माँग रहे थे। तालाब में चट्टान व मुरुम होने के कारण इसके गहरीकरण में दिक्कत आ रही थी। प्रशासन से मदद न मिलते देश ग्रामीणों ने खुद श्रमदान का फैसला लिया। दो दिन में लगभग 700 ग्रामीणों द्वारा कड़ा श्रमदान करके तालाब का कायाकल्प किया गया। ग्रामीणों के अनुसार माता तालाब गाँव का एकमात्र निस्तारी तालाब है।

ग्राम सोरर में प्रशासन में माता तालाब गहरीकरण का काम रोका, तो ग्रमीणों ने श्रामदान कर तालाब गहरीकरण के लिये दो दिनों तक श्रमदान किया। जानकारी दी कि तालाब में कड़ा चट्टान मुरुम है। लगातार प्रयास के बाद भी तालाब का गहरीकरण चट्टानों के कारण नहीं हो रहा था। तब ग्रामीणों ने निर्णय लेकर नेशनल हाइवे निर्माण एजेंसी को तालाब का मुरुम निकालने की अनुमति दी। अनुमति इस शर्त पर दी गई कि एजेंसी तालाब को बनाकर देगा लेकिन इसे अवैध बताकर प्रशासन ने काम को रोक दिया। जनपद प्रशासन ने मनरेगा के तहत 8 लाख रुपये माता तालाब गहरीकरण के लिये स्वीकृत किया गया था, किंतु नेशनल हाइवे निर्माण एजेंसी को तालाब से मुरुम निकालने की अनुमति देने के कारण पंचायत की जाँच चल रही है, चूँकि इसी तालाब के मामले में जाँच चल रही है इसलिए विवादों से बचने जनपद प्रशासन ने मामले के निराकरण तक काम रोक दिया। मनरेगा के तहत काम नहीं होने की जानकारी जब ग्रामीणों को हुई तब बैठक कर निर्णय लिया गया कि तालाब का गहरीकरण श्रमदान कर किया जाएगा। चूँकि सड़क निर्माण एजेंसी द्वारा मुरुम निकालने के दौरान तालाब के कड़े चट्टान को मशीन से नरम कर दिया था इसलिए ग्रामीणों की राह आसान हो गई।