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नदी बचाने का संकल्प लिया

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अमर उजाला, 11 दिसम्बर, 2017

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राष्ट्र सेविका समिति ने रविवार को आसन नदी के उद्गम स्थल को सुरक्षित रखने के लिये ‘नदी बचाओ’ का संकल्प लिया।

ऋषि गौतम की तपस्थली चंद्रबनी क्षेत्र में गौतम कुंड से आसन नदी निकलती है। राष्ट्र सेविका समिति की प्रान्त प्रचार प्रमुख शिवानी कक्कड़ का कहना है कि यह एक जीवित नदी है। इसकी पवित्रता और स्वच्छता गन्दे नाले और नालियों से प्रदूषित हो रही है।

राष्ट्र सेविका समिति और दीन दयाल सेवा प्रतिष्ठान के पदाधिकारियों ने चंद्रबनी मन्दिर के महन्त से भेंट की। आसन नदी के उद्गम स्थल और आस-पास क्षेत्र में गन्दगी फैली हुई है। नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। सेवा प्रतिष्ठान की शुभा वर्मा ने कहा कि मानव जीवन के लिये पर्यावरण और नदियों की सुरक्षा बहुत जरूरी है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की यह प्राथमिकता पर है।

समिति की प्रान्त कार्यवाहिका डॉ. अंजलि वर्मा ने कहा कि आसन नदी का उद्गम स्थल पौराणिकता और ऐतिहासिकता से जुड़ा हुआ है। इसका संरक्षण सबकी प्राथमिकता होना चाहिए। पूर्व पंचायत सदस्य राजेश ने कहा कि इस प्रकल्प में क्षेत्रीय लोग पूरे लगन के साथ जुटेंगे। इस मौके पर शपथ ग्रहण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। समिति ने मुख्यमंत्री को भी एक पत्र भेजा है। कार्यक्रम में नम्रता मुखर्जी, रीतिका गोयल, शिवरानी, रजनी नेगी, माधुरी, उपाध्याय, प्रगति शर्मा, सुधा शर्मा, प्रदीप वर्मा आदि रहे।

नदियाँ बचाने को सार्क देश करें सामूहिक पहल

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अमर उजाला, 02 दिसम्बर, 2017

दून विवि में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सेमिनार के समापन पर बोले प्रो. गोपाल, विकास के लिये हो प्राकृतिक सम्पदा का दोहन

पंचेश्वर बाँध देहरादून। हिमालय से निकलने वाली नदियों को बचाने के लिये चीन समेत सार्क देशों को सामूहिक प्रयास करना होगा। हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बाँध किसी भी सूरत में नहीं बनना चाहिए। ऐसा होने से हिमालय के पर्यावरण को नुकसान होगा। प्राकृतिक सम्पदा का दोहन विकास के लिये होना चाहिए। ये बातें नेपाल के प्रसिद्ध पर्यावरणविद और त्रिभुवन विश्वविद्यालय के प्रो. गोपाल शिवाकोटी चिन्तन ने कही। वह शुक्रवार को दून विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सेमिनार को सम्बोधित कर रहे थे।

आकाश में टंगी आँखें खोज सकती हैं समुद्र में छिपे सांस्कृतिक अवशेष (Geospatial techniques help in marine archaeology)

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इंडिया साइंस वायर, 30 नवम्बर, 2017

वास्को-द-गामा (गोवा) : कृत्रिम उपग्रहों और रिमोट सेंसिंग तकनीक वाली भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी का उपयोग प्राकृतिक व सांस्कृतिक संसाधनों को समझने के लिये बड़े पैमाने पर हो रहा है। अब भारतीय वैज्ञानिकों ने इस प्रौद्योगिकी का उपयोग तमिलनाडु के तट पर समुद्र में डूबे खण्डहरों को खोजने के लिए किया है।

समुद्र में छिपे सांस्कृतिक अवशेष गोवा स्थित राष्ट्रीय समुद्र-विज्ञान संस्थान (एनआईओ) के वैज्ञानिकों ने भू-स्थानिक तकनीक की मदद से महाबलीपुरम, पूमपूहार, त्रेंकबार और कोरकाई के समुद्र तटों और उन पर सदियों पूर्व बसे ऐतिहासिक स्थलों का विस्तृत अध्ययन किया है। इससे पता चला है कि महाबलीपुरम और उसके आस-पास तटीय क्षरण की दर 55 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि पिछले 1500 वर्षों से इसी दर से महाबलीपुरम की तटरेखा में क्षरण हुआ होगा, तो निश्चित रूप से उस समय यह तटरेखा लगभग 800 मीटर समुद्र की तरफ रही होगी। इसी आधार पर पुष्टि होती है कि समुद्र के अंदर पाए गए ये खण्डहर भूभाग पर मौजूद रहे होंगे।

महाबलीपुरम के बारे में माना जाता है कि इसके तट पर 17वीं शताब्दी में सात मंदिर स्थापित किए गए थे और एक तटीय मंदिर को छोड़कर शेष छह मंदिर समुद्र में डूब गए थे। यदि महाबलीपुरम की क्षरण दर को पूमपुहार पर लागू किया जाए तो वहाँ भी इसकी पुष्टि होती है कि पूमपुहार में 5-8 मीटर गहराई पर मिले इमारतों के अवशेष 1500 साल पहले भूमि पर रहे होंगे।

छोटे राज्य के बड़े सवाल

Author: 
हरीश रावत
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दैनिक जागरण, 28 नवम्बर, 2017

भारत सरकार के जल संसाधन मंत्री के तौर पर मैंने तालाब संवर्धन की एक बड़ी योजना बनायी, जिसका फायदा राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश (अविभाजित), महाराष्ट्र ने बड़े पैमाने पर उठाया। उत्तराखण्ड में भी भारत सरकार ने हरिद्वार के करीब सौ तालाबों व नैनीताल के कुछ तालों को सुधारने के लिये प्रोजेक्ट स्वीकृत किया। जिन राज्यों के पास एक निर्धारित मशीनरी थी, उन्होंने उपरोक्त योजना का भरपूर लाभ उठाया।

14 साल में 10 बार शून्य के स्तर पर पहुँची नैनी झील

Author: 
सुमन सेमवाल
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दैनिक जागरण, 28 नवम्बर, 2017

जिस नैनी झील के कारण देश व दुनिया में नैनीताल को सरोवर नगरी के नाम से जाना जाता है, उसके इस ट्रेड मार्क पर समय के साथ संकट गहरा रहा है। पीने के पानी पर बढ़ती निर्भरता व झील के स्रोतों के संरक्षण के अभाव में पिछले 14 वर्षों में झील 10 बार शून्य के स्तर पर जा पहुँची। यह वह स्तर होता है, जब किसी स्रोत का पानी न्यूनतम कमी के स्तर को भी पार कर जाता है। नैनी झील में 90.99 फीट की सतह से जब पानी का स्तर 12 फीट से नीचे चला जाता है, तब उसे शून्य स्तर माना जाता है। नैनी झील पुनर्जीवीकरण पर आयोजित सेमीनार में ‘सेंटर फॉर इकोलॉजी डेवलपमेंट एंड रिसर्च (सीईडीएआर)’ उत्तराखण्ड ने इस हकीकत को साझा किया।

खत्म होने के कगार पर नैनी झील सोमवार को आयोजित सेमीनार के दौरान सीईडीएआर के उप कार्यकारी निदेशक विशाल सिंह ने बताया कि इससे पहले झील शून्य के स्तर पर सिर्फ वर्ष 1923 व 1980 में ही पहुँची थी। दूसरी हकीकत यह है कि वर्ष 2017 के ग्रीष्मकाल में झील का पानी सामान्य से 18 फीट नीचे जा पहुँचा। इसकी वजह यह है कि झील से रोजाना 16 मिलियन लीटर पानी खींचा जाता है, जबकि स्रोत के संरक्षण को प्रयास नहीं हो पाए। नैनीताल नगर की जनसंख्या भले ही 42 हजार के करीब हो, मगर ग्रीष्मकाल में वहाँ पर्यटकों को मिलाकर जनसंख्या का आँकड़ा सात लाख को पार कर जाता है।

सालाना जमा हो रही 24.3 सेमी गाद

नैनी झील के लिये एक्शन मोड की जरूरत

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दैनिक जागरण, 28 नवम्बर, 2017

नैनी झील पुनर्जीवीकरण को लेकर आयोजित सेमीनार में राज्यपाल डॉ. केके पाल ने कही दो टूक

जागरण संवाददाता, देहरादून : सरोवर नगरी नैनीताल की नैनी झील के पुनर्जीवीकरण (रिजुवेनेशन) पर आयोजित सेमीनार में राज्यपाल डॉ. केके पाल ने दो टूक कहा कि इस गम्भीर विषय पर डिस्कशन मोड की बजाय अब एक्शन मोड में आना होगा। नैनी झील को लेकर वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के जो भी सुझाव हैं, उन पर कार्य करने की जरूरत है। झील पर बढ़ते दोहन के दबाव को देखते हुए राज्यपाल ने कहा कि नैनीताल में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सुनिश्चित करते हुए पानी के दुरुपयोग पर पूरी तरह पाबन्दी लगाने की जरूरत है।

सोमवार को राजभवन में ‘नैनी झील पुनर्जीवीकरण के रोडमैप पर सम्बन्धित भागीदारी चर्चा’ विषय पर ‘दि युनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी)’ व ‘सेंटर फॉर इकोलॉजी डेवलपमेंट एंड रिसर्च’ की ओर से आयोजित सेमीनार में राज्यपाल डॉ. केके पाल ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि झील के संरक्षण को लेकर समय-समय पर अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए और इनमें विशेषज्ञों ने तमाम सुझाव भी दिए। लिहाजा, अब संरक्षण को लेकर ठोस काम किए जाने की जरूरत है। इस दिशा में नैनीताल के नागरिकों पर भी अहम जिम्मेदारी है। शहर में पीने के पानी की आपूर्ति इस झील पर टिकी है। प्रतिवर्ष यहाँ आबादी से कई गुना अधिक पर्यटक आते हैं, लिहाजा नैनीताल में जल प्रबन्धन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।

पानी में डिवाइस डालते ही आएगा एसएमएस

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अमर उजाला ब्यूरो, 28 नवम्बर, 2017

यूसर्क और बिड़ला संस्थान बना रहा नई डिवाइस

पानी की रियल टाइम मॉनीटरिंग होते रहने से पानी के रसायनों में बदलाव की जानकारी फौरन मिल जाएगी और समय रहते उपाय किए जा सकेंगे। पानी की जाँच के इस अभियान में छात्रों की इको टास्क फोर्स शामिल की जा सकती है।

बदलते भारत में गाँवों की तस्वीर अभी भी धुंधली

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प्रयुक्ति, 20 नवम्बर, 2017

देश बदल रहा है। देश में हाई स्पीड बुलेट ट्रेन लाने की तैयारी हो रही है। मगर इस बदलाव से गाँव आज भी अछूते हैं। यदि सिर्फ शहरों का ही विकास करना है तो भारत की तस्वीर कैसे बदलेगी। कैसे हम अन्य देशों के मुकाबले नम्बर वन बनेंगे। यह तभी सम्भव हो पाएगा जब देश के नेता शहरों में बदलाव की लहर को गाँवों की ओर भी ले जाएँ। जिससे कि गाँवों में अव्यवस्था की उल्टी लकीर सीधी हो सके और गाँवों में रहने वाले ग्रामीणों को भी दिक्कतों का सामना न करना पड़े। यह सवाल शायद दक्षिणी दिल्ली के सांसद व तुगलकाबाद से विधायक सही राम को समझना होगा।

अन्यथा देश तो बदलते वक्त के साथ बदल जाएगा, लेकिन तुगलकाबाद गाँव बीते वर्षों की तरह और भी पीछे होता चला जाएगा। यह बातें स्थानीय निवासियों के लिहाज से कहना और भी जरूरी है, क्योंकि हमारा आशियाना यह गाँव है। हम तो इसकी कदर करना जानते हैं, लेकिन नेताजी के पास पर्याप्त समय नहीं है कि वह इस गाँव के बारे में सोच सके। चलिए आपको थोड़ा ब्रीफ से समझाते हैं। तुगलकाबाद गाँव दक्षिणी दिल्ली में स्थित है। यहाँ से भाजपा के सांसद रमेश बिधूड़ी व विधायक सही राम हैं। गाँव की आबादी 50 हजार से ज्यादा है। गाँव में गुर्जर बाहुल्य इलाकों के अलावा एक दर्जन से ज्यादा जाति के लोग रहते हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि क्षेत्र के गुर्जर बाहुल्य क्षेत्र में तो गंगा जल की आपूर्ति होती है, मगर अन्य इलाके इससे वंचित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि हमने कई बार इसकी शिकायत विधायक को की, लेकिन विधायक ने भी इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल से भी पानी की समस्या को लेकर मुलाकात कर चुके हैं। उन्होंने मुलाकात के दौरान तो भरोसा दिलाया था कि पानी की व्यवस्था पहले की तरह हो जाएगी, लेकिन सीएम का भरोसा अभी तक फलीभूत नहीं हो पाया है।

खाटू-सिरोही लिनियामेंट के कारण जोधपुर में भूकम्प का खतरा

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राजस्थान पत्रिका, 20 नवम्बर, 2017

जोधपुर। जमीन के नीचे इंडियन प्लेट पर खाटू से लेकर सिरोही तक का लिनियामेंट एक्टिव हो गया है यानी यहाँ की जमीन कमजोर होने से भू-गर्भ की ऊर्जा निकलने का खतरा बढ़ गया है। इसके चलते मारवाड़ और मेवाड़ को पृथक करने वाले इलाकों में भूकम्प की आशंका बढ़ती जा रही है। विशेषकर पाली जिले में, जहाँ रह-रहकर कई बार हल्के भूकम्प आते रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जोधपुर में शनिवार को आया भूकम्प भी इसी लिनियामेंट के समानान्तर था। ऐसे में अब अरावली क्रेटोन का अध्ययन अनिवार्य हो गया है। पूरा विश्व भूगर्भ के नीचे कई प्लेटों के ऊपर तैर रहा है। भारत इंडियन प्लेट पर टिका हुआ है। भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, नेपाल, बर्मा और फिलिपींस इंडियन प्लेट पर टिके हुए हैं। इस प्लेट के किनारों पर नेपाल व अफगानिस्तान जैसे देश हैं, इसलिये ये दोनों भूकम्प के लिहाज से सर्वाधिक खतरे वाले जोन पाँच में आते हैं। इंडियन प्लेट के पीछे का हिस्सा शील्ड के रूप में है, जहाँ राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र का पश्चिमी हिस्सा आता है।

भुज में इंडियन प्लेट कटी हुई है जो सम धोरों तक फैली हुई है। इंडियन प्लेट, चाइना प्लेट से लगातार टकरा रही है। चाइना प्लेट मजबूत है जिसकी वजह से इंडियन प्लेट के टकराने पर इसके कमजोर हिस्सों से ऊर्जा निकलती है। इंडियन प्लेट पर कई लिनियिमेंट हैं, जिसमें खाटू से सिरोही तक लिनियामेंट महत्त्वपूर्ण है। इंडियन प्लेट जैसे ही चाइना प्लेट से टकराती है, सबसे कमजोर लिनियामेंट से सिस्मिक तरंगों के माध्यम से ऊर्जा बाहर निकल आती है।

कमजोर हो गई अरावली की परिधि


खाटू-सिरोही लिनियामेंट अरावली की परिधि के पास स्थित है। अरावली विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं यानी गोंडवाना लैण्ड का हिस्सा है। अरावली की परिधि कमजोर होने से उसके किनारे बसे भू-स्थलों पर धरती डोलने का खतरा कुछ बढ़ जाता है।

अब अध्ययन जरूरी हो गया