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ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के रोडमैप का होगा पुनर्गठन

Author: 
संजय टुटेजा
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 12 नवम्बर 2017

आज भी हजारों गाँवों के लोग शुद्ध पेयजल के लिये तरस रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश में लगभग 2000 ब्लॉक ऐसे हैं जहाँ भूजल स्रोतों की कमी है। ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिये जहाँ राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम चलाया जा रहा है वहीं सरकार ने इसी वर्ष मार्च माह में ‘हर घर जल’ योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत 2030 तक प्रत्येक घर तक नल से पेयजल पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस योजना पर लगभग 23000 करोड़ रुपए खर्च किये जाने हैं।

एक एकड़ में उगाई धान की 140 प्रजातियाँ

Author: 
गोविंद दुबे
Source: 
दैनिक जागरण, 30 सितम्बर 2017

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के खागा तहसील का हसनपुर अकोढिया गाँव इन दिनों चर्चा में है। यहाँ के एक किसान के खेत में देश और दुनिया की 140 प्रजातियों की धान की फसल लहलहा रही है। जिसे देखने के लिये कृषि वैज्ञानिकों की टीम के अलावा आस-पास के किसानों की भी भीड़ जुटती है। किसान ने स्थानीय जलवायु के अनुकूल धान की बेहतर प्रजाति का पता लगाने के लिये यह प्रयोग किया है। अब कृषि वैज्ञानिकों के लिये भी यह शोध का विषय बन गया है।

लहलहा रही धान


यह पूरी कवायद किसान ने यह जानने के लिये की है कि उसके खेत की मिट्टी और जलवायु के अनुरूप सबसे उत्पादक धान कौन सा हो सकता है, जिसका वह सफल उत्पादन कर सके। रमेश सिंह के इस प्रयोग ने कृषि वैज्ञानिकों को भी हैरत में डाल दिया। एक समान परिस्थिति और जलवायु में देश-विदेश की 140 धान प्रजातियोंं को किसान ने एक एकड़ में सफलतापूर्वक तैयार किया। रमेश ने पाकिस्तान, चीन, अमेरिका सहित 20 देशों की प्रजातियों का धान उगाया है। तकरीबन सौ प्रजातियाँ पककर तैयार हो गईं तो चालीस प्रजातियों की बाली हरी है। उन्होंने बताया कि सभी प्रजातियों की पौध एक ही दिन लगाई गई थी और पानी व उर्वरक की बराबर मात्रा में दी गई है।

यह मिलेगा लाभ


रमेश ने बताया कि एक एकड़ में धान की हर प्रजाति की रोपाई की गई है। वैज्ञानिक अब इस बात पर शोध कर रहे हैं कि यहाँ की जलवायु के लिये कौन-कौन सी प्रजातियाँ उपयुक्त होंगी। एक बाली में पड़े दानों की संख्या से उत्पादन का पता चलेगा। रोग प्रतिरोधक क्षमता, फसल पकने की अवधि एवं धान से चावल की रिकवरी के मानकों पर बेहतर प्रजाति का चयन होगा। अच्छी प्रजाति मिलने से उत्पादन का अच्छा मूल्य मिलेगा। इस समय हाइब्रिड की 80 फीसद प्रजाति में चावल की रिकवरी की समस्या आ रही है। इस शोध से 67 प्रतिशत से अधिक रिकवरी वाली प्रजातियों की चिन्हित किया जा सकेगा। किसान ने बताया कि जो फसल पकती जा रही है, उसका अलग रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है।

कृषि वैज्ञानिकों ने सराहा

अब बगैर पानी के बना सकेंगे स्टील

Author: 
राजेश राय पप्पू
Source: 
दैनिक जागरण, 13 अक्टूबर 2017

भारतीय युवा वैज्ञानिक ने ईजाद की लौह पृथक्करण की नई तकनीक

सहरसा/पानी के बिना लोहे का उत्पादन सम्भव नहीं है। इस्पात उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती पानी की है। बड़ी उत्पादन इकाइयों में रोजाना करोड़ों गैलन पानी का इस्तेमाल किया जाता है। भारतीय युवा वैज्ञानिक ने इस समस्या से निपटने का उपाय ढूँढ निकाला है। इंजीनियर दीपक कुमार ने खनिज पदार्थ से लौह अयस्क को पृथक करने का जो फार्मूला दिया है, उसमें बिना पानी के ही यह काम सम्भव हो सकता है।

सिंक होल फ्लुइडाइजर तकनीक


दीपक द्वारा विकसित लौह अयस्क पृथक्करण की इस तकनीक में पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसमें लौह खनिज को उचित ताप-दबाव में तरल अवस्था में लाकर उसमें हवा का बहाव कराया जाता है, जिससे पृथक्करण आसानी से हो जाता है।

बिजली-पानी दोनों की बचत


खनिज पदार्थ से लौह पृथक्करण की सामान्य इकाई, जिसमें प्रति घंटे 20 किलोवाट ऊर्जा की खपत होती है, उसमें प्रतिवर्ष 137 गीगा लीटर पानी खर्च होता है। सिंक होल फ्लुइडाइजर तकनीक से पानी के साथ-साथ बिजली भी बचाई जा सकेगी। मतलब प्रतिघंटे 20 किलोवाट ऊर्जा के साथ-साथ 137 गीगा लीटर पानी की भी बचत होगी।

शोध को मिली सराहना


पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में आयोजित लौह अयस्क सम्मेलन-2017 में दीपक को सिंक होल फ्लुइडाइजर तकनीक के लिये सर्वश्रेष्ठ युवा इंजीनियर के रूप में सम्मानित किया गया। बिहार के पूर्णिया जिले के रहने वाले दीपक आइएसएम धनबाद से खनिज अभियंत्रण में बीटेक करने के बाद ऑस्ट्रेलिया स्थित न्यूकैसल विश्वविद्यालय में रसायन के प्रख्यात प्रोफेसर केविन गेल्विन के पर्यवेक्षण में पीएचडी कर रहे हैं।

बिन पानी सब सून


1. 01 टन इस्पात उत्पादन में तीन लाख लीटर पानी होती है खपत
2. 30 करोड़ गैलन पानी का उपयोग प्रतिदिन होता है इंग्लैंड के शौटन इस्पात केन्द्र में
3. 03 लाख गैलन पानी का उपयोग रोजाना भारत के भिलाई स्टील प्लांट में किया जाता है

अपने गाँव से करेंगे चकबन्दी की शुरुआत - मुख्यमंत्री


राज्य स्तरीय कृषक महोत्सव कार्यक्रम को सम्बोधित करते मुख्यमंत्री रावतराज्य स्तरीय कृषक महोत्सव कार्यक्रम को सम्बोधित करते मुख्यमंत्री रावत‘आप भला तो जग भला’ जैसी कहावत को कृतार्थ करने की राह पकड़े उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत इन दिनों अपने वक्तव्य में कहीं भी चूक नहीं करते कि वे चकबन्दी अपने गाँव खैरासैण से आरम्भ करेंगे। जबकि 80 के दशक में उत्तरकाशी जनपद के बीफ गाँव में स्व. राजेन्द्र सिंह रावत ने चकबन्दी करवाई।

यह पहला गाँव है जहाँ लोगों ने स्वैच्छिक चकबन्दी को तबज्जो दी थी। उसके बाद कई सरकारें आईं और गईं पर किसी में भी इतना दम नहीं दिखा कि वे चकबन्दी के लिये खास नीतिगत पहल करे। अब लगभग चार दशक बाद राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री ने इस ओर कदम बढ़ाया है। अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो मुख्यमंत्री रावत की यह पहल रंग ला सकती है।

ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड राज्य में कृषि की जोत एकदम छोटी है और बिखरी भी हुई है। कृषि विकास के लिये राज्य में चकबन्दी करना नितान्त आवश्यक है। यह बात सभी राजनीतिक व सामाजिक संगठनों के मंचों पर लगातार उठती रही। पिछली कांग्रेस सरकार ने बाकायदा एक चकबन्दी विकास बोर्ड का गठन भी किया था। इस बोर्ड के अध्यक्ष भी चकबन्दी के प्रणेता स्व. राजेन्द्र सिंह रावत के छोटे भाई केदार सिंह रावत को मनोनित किया गया। इस बोर्ड ने चकबन्दी पर कितना काम किया यह सामने नहीं आ पाया। इधर वर्तमान में भाजपानीत सरकार ने बोर्ड को तो ठंडे बस्ते में डाल दिया, उधर मुख्यमंत्री बार-बार अपने भाषणों में जरूर कहते हैं कि वे पहले अपने गाँव से चकबन्दी की शुरुआत करेंगे।

सरदार सरोवर की नहरों के लिये केंद्र ने दिए 1500 करोड़

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 22 सितम्बर 2017

पाँच दिन पहले अपने जन्मदिन पर देश को सरदार सरोवर बाँध समर्पित करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कच्छ जिले के रण क्षेत्र को सूखाग्रस्त इलाके के समान मानने का निर्णय किया है।

सरदार सरोवर बांध ऐसे में इस इलाके तक पर्याप्त पेयजल व सिंचाई का जल पहुँचाने को सरदार सरोवर योजना की नहर के लिये 15 सौ करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ने कहा कि केंद्र सरकार की एक्सेलेरेटेड इरीगेशन बेनिफिट प्रोग्राम (एआईबीपी) केंद्रीय सहायता योजना है। इसके तहत केंद्र सरकार केनालों (नहरों) के काम के लिये सूखाग्रस्त इलाकों के लिये केंद्रीय सहायता 75 प्रतिशत तक देती है। जबकि राज्य सरकार का योगदान कुल लागत का 25 प्रतिशत रहता है। जबकि रण इलाकों में केंद्र की ओर से 25 प्रतिशत ही आर्थिक मदद दी जाती है। इस शर्त को सुधारने के लिये नरेंद्र मोदी ने अपने मुख्यमंत्री काल के दौरान केंद्र सरकार को पत्र लिखा था। लेकिन इस पर सुनवाई नहीं हुई। केंद्र में अब जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार है तो उन्होंने गुजरात के हित में इस शर्त को बदलते हुए रण इलाकों में नहर बनाने के लिये आर्थिक सहायता 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 प्रतिशत देने की मंजूरी दी है। इससे योजना के तहत अब केंद्र सरकार के हिस्से में जहाँ 38 प्रतिशत होती थी। वह अब 57 प्रतिशत हो जाएगी। इससे राज्य को 15 सौ करोड़ का फायदा नर्मदा योजना के लिये होगा।

ओएनजीसी की ओर से 73 सौ करोड़ की रॉयल्टी भी

तालाब सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, संस्कृति का भी केन्द्र

Author: 
कुमार कृष्णन

. मौजूदा समय में तालाब का संरक्षण एवं विकास एक बड़ा सवाल बन गया है। तालाब का मानव से जीवंत रिश्ता रहा है। यह एक सामूहिक और साझा संस्कृति का एक स्थल रहा है। आज तालाब सिकुड़ते जा रहे हैं। इसकी संख्या निरंतर घटती जा रही है। तालाबों के अतिक्रमण और भरे जाने की प्रक्रिया के कारण आज भूजल का संकट ज्यादा गहरा हो गया है। पानी, नदी और तालाब तीनों का पारिस्थितिकी के साथ गहरा रिश्ता रहा है। इन्हीं सवालों पर भागलपुर के कलाकेन्द्र में 'परिधि' की ओर से 'तालाब, नदी, पानी ' विषय पर संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। संवाद कार्यक्रम में पर्यावरण से जुड़े समाजकर्मियों ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में भागलपुर तथा उसके आस-पास के तालाबों को अति​क्रमण से मुुक्त कराने और उसे जीवंत स्वरूप प्रदान करने का संकल्प लिया। एक समय था जब सिर्फ भागलपुर के शहरी क्षेत्र में सौ के करीब तालाब होते थे। विकास के मौजूदा ढाँचे इस व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है।

मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता से ‘नमामि गंगे’ नदारद

Author: 
नमिता

प्रेस वार्ता करते हुए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावतप्रेस वार्ता करते हुए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावतउत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत अपने छः माह के कार्यकाल की उपलब्धियों को लेकर पत्रकारों से मुखातिब हुए। हालांकि वे बहुत खुश दिख रहे थे, मगर कुछ पर्यावरणीय सवाल उनके कार्यक्रमों को लेकर खड़े हो गए हैं। उन्होंने हर एक विकासीय योजना को रोजगार से जोड़ा है। रोजगार का सपना दिखाया गया, प्राकृतिक संसाधनों के बेहद दोहन करके उसे रोजगार का खास हथियार बताया है।

एक तरफ उन्होंने यह बताया कि नदी संरक्षण के लिये जरूरी इन्तजाम करने होंगे तो वहीं वे बता रहे थे कि पंचेश्वर बाँध जैसी जल ऊर्जा की योजना राज्य के विकास में मील का पत्थर साबित होगी। अतएव नदी का संरक्षण बाँध बनाने से होगा? या नदी की धारा बाँध बनने के बाद अविरल बहेगी? ऐसे कुछ पर्यावरणीय सवाल मुख्यमंत्री श्री रावत की प्रेसवार्ता के बाद कौतुहल का विषय बन गया। यही नहीं उन्होंने वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री की हर तरफ खूब तारीफ की परन्तु प्रधानमंत्री के ड्रिम प्रोजेक्ट ‘नमामि गंगे’ पर एक शब्द भी नहीं कहा, जो उनके प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है। इधर मुख्यमंत्री श्री रावत ने छः माह का कार्यकाल पूरा करने पर आम जनता, गरीब, पिछड़े और दलित समाज के सर्वांगीण विकास के लिये हो रहे सफल प्रयासों की जमकर प्रशंसा की है तो वहीं उन्होंने राज्य की छोटी जोत की कृषि को कैसे पानी मिले, पहाड़ के गाँव पेयजल संकट से जूझ रहे हैं उनकी यह समस्या कैसे दूर हो इस पर उनकी एक भी योजना प्रेसवार्ता के दौरान सामने नहीं आ पाई।

बाबूलाल दाहिया ने किया किसान-अवार्ड लेने से इंकार


"मध्यप्रदेश में खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है। इसकी वजह से यहाँ के किसानों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। बीते दिनों मंदसौर में किसानों के प्रदर्शन में हुए गोलीकांड के दौरान प्रदेश की सरकार तथा किसानों के बीच दूरी यकायक खासी बढ़ गई है। किसानों के हक़ में फैसले लेने में प्रदेश सरकार नाकाम रही है। प्रदेश की सरकार से किसी भी तरह का सम्मान लेना किसानों के हित में आन्दोलन कर रहे किसानों तथा गोलीकांड में शहीद हुए किसानों के साथ एक प्रकार से धोखा होगा।"

किसान बाबूलाल दाहिया यह कहना है सतना जिले में पिथोराबाद गाँव के एक किसान बाबूलाल दाहिया का। उन्हें 10 सितंबर 2017 को चित्रकूट में आयोजित प्रदेश किसान कार्यसमिति के समापन पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथों कृषि अवार्ड लेने के लिये सतना जिले के कृषि विभाग ने चयनित किया था। लेकिन उन्होंने यह कहकर सबको चौंका दिया कि किसानों के हितों की अनदेखी करने वाली सरकार से मिलने वाले सम्मान को वे ग्रहण नहीं करेंगे। उन्होंने पुरस्कार ठुकरा दिया है।

बिजली की तर्ज पर हो पानी का बँटवारा

Source: 
दैनिक जागरण, नई दिल्ली, 11 सितम्बर 2017

नदियों को आपस में जोड़ने के लिये जितनी ज़मीन की जरूरत होती है इस योजना में उसकी एक तिहाई ही काफी है। यह छह करोड़ हेक्टेयर ज़मीन की सिंचाई में सहायक हो सकती है, जबकि इससे 60 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन भी किया जा सकता है। इसके जरिए 70 करोड़ लोगों को निर्बाध पानी की आपूर्ति की जा सकती है।