Latest

उत्तराखण्ड वनाग्नि संकट से जूझता हिमालय

Author: 
सुशील कुमार

हिमालय सेवा संघ और एक्शन एड द्वारा नागरिक रिपोर्ट का विमोचनहिमालय सेवा संघ और एक्शन एड द्वारा नागरिक रिपोर्ट का विमोचननई दिल्ली स्थित इण्डियन वुमन प्रेस कार्प में उत्तराखण्ड वनाग्नि वर्ष 2016 एक नागरिक रिपोर्ट का विमोचन किया गया। हिमालय सेवा संघ तथा एक्शन एड इण्डिया संस्था द्वारा आयोजित इस वार्ता में उत्तराखण्ड के जंगलों में लगने वाली आग के कारण तथा निदान पर चर्चा की गई।

हिमालय सेवा संघ से जुड़े मनोज पांडे ने इस रिपोर्ट पर चर्चा करते हुए उत्तराखण्ड के जंगलों में लगने वाली आग को एक सोची समझी साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि सरकार को इस बारे में गहन पड़ताल करवानी चाहिए कि उत्तराखण्ड के जंगलों में पिछले कुछ वर्षों से एक खास मौसम में कैसे आग लगती है। यह आग सिर्फ हिमालय के लोगों की चिन्ता का विषय नहीं है बल्कि इस बारे में देश के हर नागरिक को सोचना चाहिए।

यह नागरिक रिपोर्ट उत्तराखण्ड के निवासियों के साथ बातचीत पर आधारित है। इसमें आग को रोकने के लिये उनके सुझावों को भी शामिल किया गया है। नागरिक रिपोर्ट में उन कारणों की भी पड़ताल की गई है, जिन नीतियों तथा कार्यक्रमों के कारण वनवासी को अपने जल, जंगल और जमीन के सन्दर्भों से अलग किया गया है। मालूम हो कि पिछले वर्ष उत्तराखण्ड के जंगलों की आग की वजह से कई स्थानीय निवासियों के आग में झुलस जाने की वजह से मौत हो गई थी। साथ ही कई महत्त्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ तथा जंगली जीव जल कर स्वाहा हो गई थीं।

जल क्रान्ति के लिये जन भागीदारी जरूरी - उमा भारती

Author: 
सुशील कुमार

केन्द्रीय जल संसाधन एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्री उमा भारतीकेन्द्रीय जल संसाधन एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्री उमा भारतीकेन्द्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने जल क्रान्ति योजना के तहत जल की कमी की समस्या से जूझ रहे हर जिले के दो गाँवों में जल संरक्षण का मॉडल विकसित करने के लिये जन भागीदारी पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण की दिशा में जल क्रान्ति एक महत्त्वपूर्ण अभियान है, लेकिन यह अभियान आम लोगों की भागीदारी के बिना सम्भव नहीं है।

सुश्री भारती ने जल क्रान्ति अभियान से सम्बन्धित एक संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा कि जल संरक्षण के महत्त्व को लोगों को समझना होगा और यह कार्य मॉडल गाँव के माध्यम से आसानी से किया जा सकता है। लोग जब मॉडल गाँवों को देखेंगे तो उन्हें सीख मिल सकेगी। उन्होंने कहा कि इस सम्बन्ध में केन्द्र, राज्यों और गैर सरकारी संगठनों को मिलकर प्रयास करना होगा।

इस संगोष्ठी में देश के दूर-दराज के गाँवों से आये किसानों तथा जल संरक्षण पर कार्य कर रहे स्यंवसेवी संगठनों ने भी अपने विचार रखे। जल संरक्षण की दिशा में बेहतरीन कार्य के लिये अपनी एक अलग पहचान बनाने वाले लापोड़िया गाँव के किसान लक्ष्मण सिंह ने दूसरे गाँवों के किसानों को लापोड़िया के अपने अनुभव साझा किये। उन्होंने बताया कि उनके गाँव के किसानों ने आपसी सहयोग के माध्यम से गाँव में 1000 से अधिक पीपल के पेड़ लगाए हैं। जिससे उनके यहाँ बारहों महीने छाया रहती है तथा गोचर हरे-भरे रहते हैं। इसी तरह दूसरे गाँवों के किसानों तथा विभिन्न कॉलेजों के छात्र-छात्राओं ने भी जल संरक्षण और पर्यावरण की देखरेख में अपने पूरे सहयोग का भरोसा जताया।

भाजपा विधायक पटेल ने अपनी ही सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 20 फरवरी, 2017

विधायक पटेल ने बताया कि यह आंदोलन किसानों का है। सत्ता पक्ष का विधायक होने के बाद भी अपने क्षेत्र के किसानों के हित में लड़ाई लड़ रहा हूँ। आन्दोलन के दूसरे चरण सभी प्रभावित 12 गाँवों के किसान पोस्ट कार्ड के जरिये प्रधानमंत्री को पत्र लिखेंगे।

भूजल आधारित पावर प्लांट का जोरदार विरोध - जान देंगे पर जमीन नहीं

Author: 
अमरनाथ

परियोजना में 800 मेगावाट के दो संयंत्र लगाए जाएँगे। जिसमें प्रतिदिन 20 हजार टन कोयला और 16 करोड़ लीटर पानी की खपत होगी। अभी इलाके से प्रवाहित चीर नदी से 10 करोड़ लीटर पानी लेने की बात है, बाकी पानी भूगर्भ से निकाला जाएगा। पर चीर नदी बरसात को छोड़कर सूखी रहती है। अर्थात बाकी दिनों में पावर प्लांट की जरूरत का पूरा पानी भूगर्भ से निकाला जाएगा। इसका असर आसपास के भूजल भण्डार पर होगा। पहले से जलाभाव का शिकार बना इलाका जलसंकट में घिर जाएगा।

स्वच्छता पखवाड़ा लेखा-जोखा

Source: 
कुरुक्षेत्र, दिसंबर 2016

कृषि और कृषक कल्याण मंत्रालय में लगेंगे कचरा प्रबंधन संयंत्र

स्वच्छता पखवाड़ा लेखा-जोखा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के निर्देशों के अनुरूप कृषि और कृषक कल्याण मंत्रालय के सभी तीन विभागों ने इस साल 16 से 31 अक्टूबर तक स्वच्छता पखवाड़ा मनाया। कृषि, सहकारिता और कृषक कल्याण विभाग, पशुपालन, डेयरी और मत्स्य क्षेत्र विभाग (डीएडीएफ) तथा कृषि अनुसंधान और शिक्षण विभाग ने कार्यालय परिसरों से बाहर निकल कर कृषि मंडियों, मछली बाजारों तथा कृषि विज्ञान केन्द्रों के नजदीक के गाँवों में स्वच्छता अभियान चलाया। पखवाड़े के दौरान ऐसे कदमों पर ध्यान केन्द्रित किया गया जो इसके खत्म होने के बाद भी जारी रखे जाएँगे। केंद्रीय कृषि और कृषक कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने हाल ही में मीडिया को स्वच्छता पखवाड़ा के दौरान अपने मंत्रालय की पहलकदमियों और उनके नतीजों के बारे में जानकारी दी।

जल संरक्षण के लिये एक अभियान, हेंवल जागर


हेंवल जागरहेंवल जागरसाल 2016 के अन्तिम माह के उत्तरार्द्ध में गाँधी चिन्तक, साहित्यकार और ‘आज भी खरे हैं तालाब’ जैसी कालजयी रचना के लेखक अनुपम मिश्र का इस दुनिया से विदा होना इस सदी की सबसे बड़ी दुर्घटनाओं में से एक है। लोग उन्हें स्मरण करते हुए जल संरक्षण के नाम पर एक अभियान के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। इसलिये टिहरी जनपद के हेंवल घाटी में जल संरक्षण के लिये ‘हेंवल जागर-स्मृतियों में अनुपम भाई’ नाम से स्कूलों, समूहों, संगठनों के मध्य जाकर ‘जल संरक्षण अभियान’ के नाम से जन जागृति संस्था खाड़ी, हिमालय सेवा संघ दिल्ली, हिमकॉन संस्था साबली संयुक्त रूप से लोगों को प्रेरित कर रहे हैं कि जलस्रोतों का संरक्षण होगा तो नदियों का अस्तित्व भी बचा रहेगा। विशेषकर ये संगठन स्कूली बच्चों के साथ मिलकर इस अनुभव को साझा कर रहे हैं।

इस अभियान में सम्मिलित वरिष्ठ सर्वोदयी नेता व बीज बचाओ आन्दोलन के सूत्रधार धूम सिंह नेगी ने युवाओं को आह्वान करते हुए कहा कि शिक्षा के साथ-साथ जल, जंगल जमीन की महत्ता का ज्ञान भी बच्चों का पसन्दीदा विषय बनना चाहिए। शिक्षक और कवि सोमवारी लाल सकलानी ‘निशान्त’ ने ‘हेंवल जागर’ साथ चलो कविता के माध्यम से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। कविता में हेंवल जागर, चम्पारण यात्रा एवं अनुपम मिश्र के कार्यों को सरल भाषा में बताते हुए हेंवल जागर को समय की माँग बताई।

धरती के भीतर नहर, ऊपर होगी खेती


यह एशिया का सबसे बड़ा मानव निर्मित बाँध है और इसमें मानवीय श्रम के अलावा किसी तरह की मशीनों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। यह भारत की आजादी के बाद के शुरुआती चार बड़े बाँधों में शामिल है। मार्च 1954 में इसकी आधारशिला हमारे पहले प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी और महज छह सालों में इसे बनाकर 1960 में पूरा कर लिया गया। मुख्य बाँध के निर्माण के बाद इसकी अन्य संरचनाएँ भी 1970 तक बनकर पूरी हुई। सुनने में आपको अजीब लग सकता है और शायद पहली बार आप सुन रहे हों, लेकिन यह सच है और इस परियोजना पर काम भी शुरू हो चुका है। जी हाँ, अब धरती के नीचे से सुरंगनुमा नहरें निकाली जाएँगी और इनके ऊपर मिट्टी डालकर किसान अपनी जमीन में खेती भी कर सकेंगे। अब तक नहरें खुली होती हैं और किसानों से इसके लिये जमीन का अधिग्रहण करना पड़ता है।

मध्य प्रदेश के इन्दौर से करीब 250 किमी दूर मन्दसौर जिले के भानपुरा के पास ऐसी एक नहर ने आकार लेना भी शुरू कर दिया है। भारत की आजादी के बाद शुरुआती चार बड़े बाँधों में शुमार और चम्बल नदी पर बना एशिया का सबसे बड़ा मानव निर्मित (जिसमें किसी मशीन का इस्तेमाल नहीं किया) गाँधीसागर बाँध के पानी को इसके जरिए रेवा नदी तक ले जाया जाएगा।

रेवा नदी से निकली नहरों के जरिए इलाके की करीब 80 हजार एकड़ खेती सिंचित हो सकेगी वहीं रास्ते में पड़ने वाले 36 गाँवों को इससे पीने का पानी भी मिल सकेगा। इसके लिये किसानों से उनकी जमीन का कुछ हिस्सा दो सालों के लिये लीज पर लेकर निर्माण किया जा रहा है। दो साल बाद मिट्टी भरकर उनकी जमीन फिर उन्हें लौटा दी जाएगी।

ग्रामीण भूजल कार्यशाला एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम

Author: 
डा. मधुज्योत्सना
Source: 
विज्ञान गंगा, जनवरी-फरवरी, 2014

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय के व्याख्यान संकुल सभागार में केंद्रीय भूजल बोर्ड की तरफ से गत 21-12 नवंबर को ग्रामीण भूजल संभरण विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लगभग दो सौ छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। 22 नवम्बर को दीप प्रज्वलन के बाद, उद्घाटन भाषण में मुख्य अतिथि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलसचिव और भूगर्भ जल वैज्ञानिक प्रो. गिरिजा शंकर यादव ने ग्रामीण क्षेत्रों में जल से संबंधित विभिन्न पक्षों और भूजल के प्रदूषणकारी परिस्थितियों को रेखांकित किया। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल के प्रदूषणकारी तत्वों के अनिष्टकारी प्रभाव से बचाव के उपायों पर भी चर्चा की।

उद्घाटन सत्र में केंद्रीय भूजल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक डा. के.बी. विश्वास ने कहा कि उत्तर प्रदेश के सतहत्तर ब्लॉकों में भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण स्थिति भयावह हो चली है। इन क्षेत्रों में फसलों की सिंचाई और उद्योगों में भूजल की खपत में हो रही निरंतर वृद्धि के अनुपात में भूजल संभरण का न होना सबसे बड़ी समस्या है। उन्होंने वाराणसी में 50 मीटर की गहराई तक के पानी में खतरनाक संखिया (आर्सेनिक) की उपस्थिति पर चर्चा किया और कहा कि यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो हालात खतरनाक हो जायेंगे। उन्होंने बताया कि वाराणसी में भूजल में संखिया के बढ़ते प्रभाव के संबंध में केंद्रीय भूजल बोर्ड की ओर से प्रदेश सरकार को आगाह किया जा चुका है।

इन क्षेत्रों में फसलों की सिंचाई और उद्योगों में भूजल की खपत में हो रही निरंतर वृद्धि के अनुपात में भूजल संभरण का न होना सबसे बड़ी समस्या है। उन्होंने वाराणसी में 50 मीटर की गहराई तक के पानी में खतरनाक संखिया (आर्सेनिक) की उपस्थिति पर चर्चा किया और कहा कि यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो हालात खतरनाक हो जायेंगे। उन्होंने बताया कि वाराणसी में भूजल में संखिया के बढ़ते प्रभाव के संबंध में केंद्रीय भूजल बोर्ड की ओर से प्रदेश सरकार को आगाह किया जा चुका है।

हिमालयी प्राकृतिक संपदा एवं जैवविविधता संरक्षण में सहायक हैं स्थानीय पारंपरिक ज्ञान

Author: 
प्रो. कविता शाह, प्रशांत शर्मा एवं मुनीश कुमार
Source: 
विज्ञान गंगा, जनवरी-फरवरी, 2014

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ‘पर्यावरण एवं धारणीय विकास संस्थान’ द्वारा राजीव गांधी दक्षिणी परिसर, मिर्जापुर में ‘‘जलवायु परिवर्तन के युग में धारणीय जल संसांधन प्रबंधन’’ विषयक दो दिवसीय (10-11 जनवरी, 2014) राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया।

इस परिसंवाद के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद तथा चिपको आंदोलन के सक्रिय सदस्य पद्मभूषण श्री चंडी प्रसाद भट्ट थे। उन्होंने हिमालय में स्थित प्रचुर जैव विविधता तथा प्राकृतिक संपदा की ओर ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहा की स्थानीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान हिमालय की प्राकृतिक संपदा एवं जैवविविधता को संरक्षित रखने में सहायक सिद्ध हो सकती है। संस्थान के निदेशक प्रो. ए.एस. रघुवंशी ने वर्तमान संदर्भ में जल उपलब्धता व प्रबंधन की धारणीय विधियों पर चर्चा की। राजीव गांधी दक्षिणी परिसर के विशेष कार्याधिकारी प्रो. आर.पी. सिंह ने इस प्रकार की संगोष्ठियों के अधिक से अधिक आयोजन पर बल दिया। कार्यक्रम के सम्मानित अतिथि मोती लाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, इलाहाबाद के डॉ. एच.के. पाण्डेय ने भूजल संसाधन : वर्तमान परिदृश्य एवं भावी चुनौतियों पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। प्रारंभ में संगोष्ठी की आयोजन सचिव प्रो. कविता शाह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी के उद्देश्यों से अवगत कराया।

इस अवसर पर संगोष्ठी की शोध सारांशिका का लोकार्पण भी किया गया। कृषि विज्ञान संस्थान, का.हि.वि.वि. के उद्यान विभाग के प्रो. अनिल कुमार सिंह ने कृषि क्षेत्र में जल के धारणीय उपयोग एवं सिंचाई की नवीन विधियों को जनसामान्य तक सुलभ कराने पर बल दिया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बीएचयू के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष प्रो. देवेन्द्र मोहन ने भारी धातुओं का जीव-जंतुओं पर विषैले प्रभावों का वर्णन किया। भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी के वैज्ञानिकों डॉ. एस.एन.एस. चौरसिया तथा डॉ. ए.बी. सिंह ने सब्जी उत्पादन संबंधी व्याख्यान प्रस्तुत किये।