Latest

गंगा-यमुना को इंसानी दर्जे का मामला पहुँचा सुप्रीम कोर्ट

Author: 
माला दीक्षित
Source: 
दैनिक जागरण, नई दिल्ली, 23 जून 2017

. एक तरफ तो मध्य प्रदेश की भाजपा शासित शिवराज सरकार नर्मदा नदी को जीवित व्यक्ति का दर्जा देने और नदी के कानूनी अधिकार के पक्ष में है तो दूसरी ओर उत्तराखंड की भाजपा सरकार गंगा-यमुना को जीवित व्यक्ति का दर्जा देने के खिलाफ है। उत्तराखंड सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर गंगा-यमुना को जीवित व्यक्ति का दर्जा और कानूनी हक देने के हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने की माँग की है। व्यावहारिक दिक्कतें गिनाते हुए उसने सुप्रीम कोर्ट से हाई कोर्ट के आदेश पर एकतरफा अंतरिम रोक की भी माँग की है।

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने गत 20 मार्च को गंगा, यमुना और उसकी सहयोगी नदियों को संरक्षित करने के लिये जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया था। इन नदियों को जीवित व्यक्ति के समान सभी कानूनी अधिकार दिये थे। हाई कोर्ट ने नमामि गंगे के निदेशक, उत्तराखंड के मुख्य सचिव और एडवोकेट जनरल को इन नदियों के संरक्षण की जिम्मेदारी डाली थी। उत्तराखंड सरकार ने वकील फारुख रशीद के जरिये विशेष अनुमति याचिका दाखिल कर हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि हाई कोर्ट का आदेश कायम रहने लायक नहीं है। हाई कोर्ट ने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर यह आदेश पारित किया है। हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में सिर्फ अवैध निर्माण हटवाने की माँग थी। राज्य सरकार ने कहा है कि इस बात में संदेह नहीं है कि भारत में गंगा, यमुना और सहयोगी नदियों का सामाजिक प्रभाव और महत्त्व है और ये लोगों और प्रकृति को जीवन और सेहत देती है लेकिन सिर्फ समाज के विश्वास और आस्था को बनाए रखने के लिये गंगा-यमुना को जीवित कानूनी व्यक्ति घोषित नहीं किया जा सकता।

कुओं में पानी आया, तो गाँव में गूँज उठी शहनाई

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 18 जून 2017

. अलवर। शहर से करीब 21 किमी दूर पहाड़ी की तलहटी में बसा गाँव ढहलावास। ढाई हजार आबादी वाले इस गाँव में कुछ दिन पहले तक लोग अपने बेटे-बेटियों की शादी करने से भी कतराते थे। वहीं दूसरे गाँव के लोगों ने इनसे नाता तोड़ बेटियाँ देना बंद कर दिया था। इन हालात में गाँव में कुँवारों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। इसकी वजह रहा गाँव में पानी की किल्लत और कुएँ-तालाबों का सूखना। ऐसे में जल संरक्षण के ग्रामीणों के प्रयास व मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन योजना रंग लाई और गाँव के कुओं का जलस्तर बढ़ गया। पिछले साल जोहड़ खुदाई हुई, जो बारिश के बाद लबालव हो गया और आस-पास के कुओं में भी पानी आ गया। पानी आने से गाँव के बेटे-बेटियों की शादी से गाँव में फिर शहनाई गूँज उठी।

12-15 फीट पर पानी


ग्रामीणों के अनुसार पिछले साल जोहड़ खुदाई से पूर्व जो कुएँ सूखे थे, उनमें भी 12-15 फीट पर पानी आ गया। बताते हैं पहले 400-450 फीट पर भी पानी नहीं था।

40 फीसदी युवा थे कुँवारे


पानी की कमी से गाँव के लगभग 40 फीसदी युवा कुँवारे थे। साल में गाँव के एकाध युवा की बामुश्किल शादी होती थी। दूसरे गाँव के लोग इनसे रिश्ता जोड़ने से घबराते थे। खेती व पशुओं के लिये भी पानी का संकट बना हुआ था। इस साल गाँव के कुएँ-तालाबों में पानी आने से गाँव में रिकार्ड 10-15 युवाओं की शादी हुई है।

चार एनीकट और बनें


ग्रामीणों के अनुसार गाँव में जोहड़ से ही आधा दर्जन से अधिक कुओं में पानी आ गया। यदि गाँव में चार और एनीकट सीरावास, बागराज, नाकवा के पास, पहाड़ी पार व बैढाढ़ा के पास बन जाएँ तो पूरे गाँव की पेयजल समस्या समाप्त हो जाए।

अल्लाबक्शपुर में जारी कैंसर का कहर

Source: 
दैनिक भास्कर, 17 जून, 2017

कैंसर की गिरफ्त में फँसे एक और मरीज ने दम तोड़ा, 18 दिन बीतने के बाद भी विभाग ने नहीं ली सुध

ब्रजघाट गंगानगरी से जुड़े हाइवे किनारे वाले गाँव अल्लाबक्शपुर में कैंसर के कहर ने 9 हजार की आबादी को बुरी तरह खौफजदा किया है। क्योंकि महज 21 दिनों के भीतर 27 मई तक गाँव में महिलाओं समेत 99 मरीजों की मौत हो गई थी, जिनमें अधिकांश लिवर और आंतों के कैंसर से पीड़ित थे। गढ़मुक्तेश्वर। महज 12 दिनों में महिलाओं समेत 99 लोगों को मौत की नींद सुलाने के बाद भी गढ़ क्षेत्र के गाँव अल्लाबक्शपुर में कैंसर का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है, जिसने चार दिन पहले महिला की जान लेने के बाद एक और मरीज की जिंदगी छीन ली है। गाँव में अब भी कई ग्रामीण बीमारी की गिरफ्त में फँसे हुए हैं।

श्रमदान कर तालाब को जिंदा किया

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 11 जून 2017

गुरूर, छत्तीसगढ़। जहाँ चाह होती है, वहाँ राह होती है फिर अड़चनें भी दूर हो जाती हैं। ऐसा ही एक माजरा देखने को मिला है, ग्राम सोरर में। इस गाँव में एक पुराना माता तालाब है जिसकी साफ-सफाई और गहरीकरण को लेकर गाँव वाले काफी चिन्तित थे और प्रशासन से भी मदद माँग रहे थे। तालाब में चट्टान व मुरुम होने के कारण इसके गहरीकरण में दिक्कत आ रही थी। प्रशासन से मदद न मिलते देश ग्रामीणों ने खुद श्रमदान का फैसला लिया। दो दिन में लगभग 700 ग्रामीणों द्वारा कड़ा श्रमदान करके तालाब का कायाकल्प किया गया। ग्रामीणों के अनुसार माता तालाब गाँव का एकमात्र निस्तारी तालाब है।

ग्राम सोरर में प्रशासन में माता तालाब गहरीकरण का काम रोका, तो ग्रमीणों ने श्रामदान कर तालाब गहरीकरण के लिये दो दिनों तक श्रमदान किया। जानकारी दी कि तालाब में कड़ा चट्टान मुरुम है। लगातार प्रयास के बाद भी तालाब का गहरीकरण चट्टानों के कारण नहीं हो रहा था। तब ग्रामीणों ने निर्णय लेकर नेशनल हाइवे निर्माण एजेंसी को तालाब का मुरुम निकालने की अनुमति दी। अनुमति इस शर्त पर दी गई कि एजेंसी तालाब को बनाकर देगा लेकिन इसे अवैध बताकर प्रशासन ने काम को रोक दिया। जनपद प्रशासन ने मनरेगा के तहत 8 लाख रुपये माता तालाब गहरीकरण के लिये स्वीकृत किया गया था, किंतु नेशनल हाइवे निर्माण एजेंसी को तालाब से मुरुम निकालने की अनुमति देने के कारण पंचायत की जाँच चल रही है, चूँकि इसी तालाब के मामले में जाँच चल रही है इसलिए विवादों से बचने जनपद प्रशासन ने मामले के निराकरण तक काम रोक दिया। मनरेगा के तहत काम नहीं होने की जानकारी जब ग्रामीणों को हुई तब बैठक कर निर्णय लिया गया कि तालाब का गहरीकरण श्रमदान कर किया जाएगा। चूँकि सड़क निर्माण एजेंसी द्वारा मुरुम निकालने के दौरान तालाब के कड़े चट्टान को मशीन से नरम कर दिया था इसलिए ग्रामीणों की राह आसान हो गई।

दूषित पानी देने वाले हैंडपम्पों को सीज करने का आदेश

Source: 
अमर उजाला, 25 मई, 2017

नई दिल्ली (ब्यूरो)। एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) व उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) को सूबे के आठ जिलों में प्रदूषित पानी देने वाले हैंडपम्पों की जाँच कर उन्हें सील का आदेश दिया है। इनमें मुजफ्फरनगर, मेरठ, हापुड़, बुलन्दशहर, अलीगढ़, कासगंज, फर्रुखाबाद और कन्नौज शामिल हैं।

याची का आरोप है कि ईस्ट काली नदी के बहाव क्षेत्र वाले इन जिलों में प्रदूषित भूजल की वजह से हैंडपम्पों से दूषित पानी आता है। इससे लोगों को कई तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी दिक्कतें हो रही हैं। जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने मेरठ निवासी याची रमनकांत की याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश दिया।

पीठ ने कहा कि सीपीसीबी, यूपीपीसीबी और सम्बन्धित प्राधिकरण इन जिलों में भूजल का नमूना लेकर जाँच करें और प्रदूषित पानी देने वाले हैंडपम्पों को सील करें। याची की ओर से पेश एडवोकेट राहुल खुराना ने ईस्ट काली में होने वाले औद्योगिक व घरेलू प्रदूषण को रोकने की भी माँग की थी।

मध्य प्रदेश में रेत खनन पर अभूतपूर्व फैसला


. मध्य प्रदेश सरकार ने 22 मई 2017 को अभूतपूर्व फैसला लेते हुए नर्मदा नदी से रेत खनन पर पूरी तरह रोक लगा दी है। इस तरह का कठिन किन्तु नदी हित में सही फैसला लेने वाली यह संभवतः देश की पहली सरकार है। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश सरकार ने यह कदम नर्मदा सेवा यात्रा के समापन के मात्र सात दिन के भीतर उठाया है। मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि नर्मदा से रेत की निकासी में मजदूरों अथवा मशीनों का उपयोग वर्जित होगा। फैसले के दूसरे भाग में कहा है कि प्रदेश की अन्य नदियों यथा चम्बल, सिन्ध, ताप्ती इत्यादि से भी रेत खनन में मशीनों का उपयोग वर्जित होगा। फैसले के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाते हुए सरकार ने 22 मई 2017 को ही प्रदेश के सभी कलेक्टरों को खनन प्रतिबन्धों के बारे में आवश्यक निर्देश भेज दिए हैं। उल्लेखनीय है कि मानसून के सीजन को ध्यान में रख भोपाल के रेत के कारोबारियों ने पर्याप्त स्टॉक जमा कर लिया है। इस कारण भोपाल के निर्माण कार्य बन्द नहीं होंगे।

महानदी के तट पर बनी झील, किसानों के लिये वरदान

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 16 मई, 2017

बिरकोनी के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी, एसएस गौतम के अनुसार खदान में इतने जलस्रोत हैं कि एक हजार एचपी का मोटर चलाने पर भी पानी कम नहीं होगा। खदान में उच्च क्षमता का मोटरपम्प लगाकर बिरकोनी से बड़गाँव की ओर जाने वाली नहर में पानी गिराया जाए तो करीब तीन हजार एकड़ खेतों को दोनों फसलों के लिये भरपूर पानी मिल सकता है। महासमुंद। जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी दूर महानदी के तट पर बरबसपुर और घोड़ारी गाँव के बीच एक झील बन गई है। यह बनी नहीं, बनाई गई है। फोरलेन सड़क निर्माण में कंक्रीट की पूर्ति के लिये फोरलेन कम्पनी ने इतने बड़े पैमाने पर पत्थर उत्खनन किया है कि यहाँ करीब 1300 फीट लम्बी, 200 फीट चौड़ी और करीब 150 फीट गहरी झीलनुमा विशाल खदान बन गई है। इस खदान में सैकड़ों भूगर्भीय जलस्रोतों का संगम हो रहा है। पानी का भंडार समेटे यह खदान क्षेत्र की प्यासी धरती के लिये वरदान साबित हो सकती है। कोडार सिंचाई कमांड के अन्तिम छोर में पड़ने के कारण ग्राम घोड़ारी, बरबसपुर, बड़गाँव, अछरीडीह, नयापारा तक कोडार बाँध का पानी पर्याप्त रूप से नहीं पहुँच पाता। इन गाँवों के सैकड़ों किसान खरीफ की एक मात्र फसल भी बमुश्किल ले पाते हैं। महानदी के इन तटीय गाँवों की धरती पानी के लिये हमेशा तरसती रही है। अब इन गाँवों के किसानों को एक नई उम्मीद नजर आ रही है। झीलनुमा फोरलेन कम्पनी की खदान भीषण गर्मी में भी साफ पानी से लबालब है। भीषण गर्मी में भी पानी कम नहीं हुआ है।

नदी का घर छोड़ गया उसका प्रहरी


पर्यावरण मंत्री तथा नर्मदा को अगाध प्रेम करने वाले अनिल माधव दवे के निधन पर श्रद्धांजलि

. 'नदी का घर' हाँ, यही नाम था भोपाल में उनके घर का भी। नदी और उनके घर ही एक नहीं थे। वे नदी की चिंता करने वाले सजग प्रहरी थे और नदी पर मँडराते संकटों के इस दौर में उनकी चिंता हमेशा बनी रही कि कैसे नदियों और जलाशयों को समाज की निगहबानी में पुनर्जीवित और पुनर्प्रतिष्ठित किया जाए। पानी के संकट और नदियों की स्थिति की आहट को उन्होंने अब से करीब बीस साल पहले ही पहचान लिया था और उस पर काम करना भी। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी चार बिंदु की छोटी-सी वसीयत में भी अपना अंतिम संस्कार नर्मदा और तवा के संगम बांद्राभान में करने और स्मृति में महज पेड़ लगाने और नदी-जलाशयों को बचाने के काम करने की इच्छा जताई। उसमें भी कोई उनका नाम न ले, बस समाज अपना दायित्व समझकर इसे करता रहे।

प्रकृति के ये सजग प्रहरी थे अनिल माधव दवे। निधन के बाद भी नदियों और खासकर नर्मदा संरक्षण के लिये उनके काम हमें सहज ही उनकी याद दिलाते रहेंगे। सरकारों में किंग मेकर और केंद्र में पर्यावरण मंत्री होने के बावजूद उनका मन सत्ता के गलियारों में कम ही रमता था। उनका ज्यादातर वक्त नर्मदा के किनारों पर उसकी चिंता और उसके लिये हरसंभव कोशिश में बीतता था। मध्य प्रदेश के लोग और नदी किनारे का समाज जानता है कि नदियाँ कैसे उनके प्राणों में बसती थी। उन्होंने भोपाल में अपने घर का नाम ही नदी का घर रख लिया था। उनके घर की दीवारों पर भी नदी के पानी की नक्काशी है। नर्मदा समग्र, नदी महोत्सव, सिंहस्थ में वैचारिकी कुंभ और बीते दिनों नर्मदा पर राष्ट्रीय मंथन जैसे महत्त्वपूर्ण आयोजनों में उनकी भूमिका सबके सामने है।

बागमती पर तटबंध को लेकर सरकार ने बनायी कमेटी


पत्र बागमती नदी पर तटबंध बनाये जाने के खिलाफ लगातार चले आंदोलन व मीडिया में छपी खबरों को गंभीरता से लेते हुए बिहार सरकार ने आखिरकार रिव्यू कमेटी (समीक्षा समिति) बनाने की घोषणा कर दी। 27 अप्रैल को बिहार के जल संसाधन विभाग के संयुक्त सचिव ने अधिसूचना जारी कर कमेटी बनाने की घोषणा की।