सरस्वती: द लॉस्ट रिवर ऑफ थार डेजर्ट

Author: 
बंशीलाल चौधरी
Source: 
विस्फोट डॉट कॉम, 05 जुलाई 2011

अब सेटेलाईट चित्रों द्वारा इसकी पुष्टि होती है कि लूनी नदी के पश्चिम की ओर चलने वाली जोजरी नदी प्राचीन सरस्वती नदी की एक धारा है जो खेड़ तिलवाड़ा के निकट लूनी नदी में मिल जाती है। अब जोजरी नदी का प्रवाह पथ नाममात्र का शेष रह गया है। उपखण्ड के सिवाना, सिलोर, समदडी आदि क्षेत्रों मे लूनी नदी के किनारे पुराने चीजों के अवशेष मिलना साबित करता है कि इस क्षेत्र में सरस्वती नदी की धारा के किनारे प्राचीन सभ्यताएं पनपी होगी।

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तलाश सरस्वती धारा की

Author: 
अमरजीत सिंह
Source: 
जनादेश

कालांतर में आए भूकंपों के चलते यमुना नदी गंगा की ओर खिसक गई, सतलुज सिंधु की तरफ। सरस्वती को हिमनदों का पानी मिलना बंद हुआ तो ये राजस्थान में आकर सूख गई। भारत के भूमिगत जल प्राधिकरण अध्यक्ष डॉ. डी.के. चड्ढा ने राजस्थान के जैसलमेर के पास 1999 में आठ स्थानों पर संपन्न हुए विस्तृत उपग्रहीय और भौतिकीय सर्वेक्षणों से निष्कर्ष निकाला कि भूमि में 30 से 60 मीटर नीचे सरस्वती की पुरातन जलधाराएं विद्यमान हैं।

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सरस्वती नदी

वैदिक सरस्वती नदी(हरे रंग मे)वैदिक सरस्वती नदी(हरे रंग मे)सरस्वती नदी पौराणिक हिन्दू ग्रन्थों तथा ऋग्वेद में वर्णित मुख्य नदियों में से एक है। ऋग्वेद के नदी सूक्त के एक मंत्र (10.75) में सरस्वती नदी को 'यमुना के पूर्व' और 'सतलुज के पश्चिम' में बहती हुई बताया गया है। उत्तर वैदिक ग्रंथों, जैसे ताण्डय और जैमिनीय ब्राह्मण में सरस्वती नदी को मरुस्थल में सूखा हुआ बताया गया है, महाभारत में भी सरस्वती नदी के मरुस्थल में 'विनाशन' नामक जगह पर विलुप्त होने का वर्णन आता है। महाभारत में सरस्वती नदी के प्लक्षवती नदी, वेदस्मृति, वेदवती आदि कई नाम हैं।महाभारत, वायुपुर
संदर्भ: 
बाहरी कड़ियाँ: 

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खो गई थी जो नदी

Author: 
बिशन टंडन
Source: 
जनसत्ता रविवारी, 18 सितंबर 2011
सरस्वती नदी के अस्तित्व और उसकी जलधारा को लेकर भूगर्भ वैज्ञानिकों, पुरातत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों में लंबे अरसे से मतभेद बना हुआ है। केंद्र में आने वाली सरकारों का नजरिया भी इस मुद्दे पर स्थिर और बेबाक नहीं रहा है। ऐसे में कुछ नई खोजों, प्रमाणों और विश्लेषणों पर आधारित एक पक्ष सामने रख रहे हैं बिशन टंडन

अमलानंद घोष ने उत्तरी बीकानेर में सरस्वती और दृशाद्वती घाटियों का गहन अध्ययन किया (1952-53)। इन खोजों ने इस परंपरागत विश्वास की पुष्टि की कि हाकड़ा/घग्गर के सूखे नदीतल पर ही सरस्वती बहती थी। इनमें ओल्ढम के इस निष्कर्ष से भी सहमति प्रकट की गई कि सरस्वती के ह्रास का मुख्य कारण सतलुज की धार बदलना था।

क्या लोक-स्मृति में सदा जीवित सरस्वती नदी अब ओछी राजनीति से बाहर निकल रही है? पिछले सौ साल से अधिक के भूगर्भ विज्ञान और पुरातत्व के शोध और गंभीर अध्ययन को नकारते हुए भारत सरकार के संस्कृति विभाग के मंत्री ने 6 दिसंबर 2004 को संसद में बड़े विश्वास के साथ कहा था कि ‘इसका कोई मूर्त प्रमाण नहीं है कि सरस्वती नदी का कभी अस्तित्व था...।’ वास्तव में यह वक्तव्य मंत्री की गैर-जानकारी का उदाहरण नहीं हो सकता। यह तब के सरकार की राजनीतिक बेबसी से ग्रस्त था। वामपंथी दल गठबंधन में अहम थे और स्वभावतः वे हर मसले को अपने राजनीतिक दृष्टि से ही देखते हैं। इन दलों से किसी न किसी प्रकार संबंधित इतिहासकार भी इसी नजरिए से त्रस्त हैं।

समन्वय-साधिका सरस्वती

Author: 
काका कालेलकर
Source: 
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
सरस्वती का नाम याद करते ही मन कुछ ऐसा विषष्ण होता है। भारत की केवल तीन ही नदियों का नाम लेना हो तो गंगा, यमुना के साथ सरस्वती आयेगी ही। अगर सात नदियों को पूजा में मदद के लिए बुलाना है तो उनके बीच बराबर मध्य में सरस्वती को याद करना ही पड़ता हैः

गंगे! च यमुने! चैव गोदावरी! सरस्वति!
नर्मदे! सिन्धु! कावेरि! जलेSस्मिन् सन्निधिं कुरु।।

सरस्वती कहाँ है

वेब/संगठन: 
bhartiyapaksha.com
Source: 
सूर्यकांत बाली
वैदिक कवि इतना अभिभूत है कि वह उसे नदीतमा कहकर ही नहीं रूक जाता, उसे माताओं में सबसे श्रेष्ठ और देवियों में सबसे बड़ी देवी कह उठता है-अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति हमारे देश में इतिहास का जितना संबंध उपलब्ध तथ्यों से है, उसका उतना ही गहरा संबंध उपलब्ध स्मृतियों से भी है। और अगर हमारी कोई स्मृति हमारे अवचेतन में, हमारे जेहन में कहीं अविभाज्य रूप से बसी है, गहरे दर्ज है तो हम उसे इसलिए हंसी या उपेक्षा के लायक नहीं मान सकते क्योंकि उसका कोई भौतिक यानी पुरातात्विक प्रमाण हमें नहीं मिला है। साहित्य को भी हम इसीलिए कई मायनों में इतिहास मान लेते हैं क्योंकि उसमें भी कहीं सीधे तो कही

सरस्वती का उद्गम

वेब/संगठन: 
amarujala.com
Author: 
अजय पाराशर
सरस्वती का रास्तासरस्वती का रास्ताभारत सरकार के रक्षा मंत्रालय द्वारा नौ दिसंबर, 1966 को स्वीकृत एवं मुद्रित मानचित्र पत्र संख्या 5320/एसओआई/डी जीए 111 के अनुसार, सिरमौर जिला मुख्यालय की नाहन तहसील से 17 किलोमीटर दूर नाहन-देहरादून राष्ट्रीय उच्च मार्ग-72 पर बोहलियों के समीप स्थित मार्कंडेय आश्रम को भारतीय वैदिक सभ्यता की जननी सरस्वती नदी की उद्गम स्थली होने का गौरव प्राप्त है। हालांकि हरियाणा ऐसा नहीं मानता। तमाम तथ्यों और प्रमाणों के बावजूद वह सरस्वती नदी का उद्गम यमुनानगर जिले की काठगढ़ ग्राम पंचायत में आदिबद्री में होने का दावा करता है। इसरो, नासा

हो सकती है सरस्वती पुनर्प्रवाहित

वेब/संगठन: 
bhartiyapaksha.com
Source: 
कृष्ण कुमार भारतीय
सरस्वती नदी पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय अधिवेशनसरस्वती नदी पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय अधिवेशनभारतीय संस्कृति शोध पर आधारित है। भारतीय संस्कार, रीति-रिवाज तथा परंपराएं वैज्ञानिक कसौटी पर खरी उतरती हैं, ये शब्द भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के महानिदेशक डा. के. एन. श्रीवास्तव ने सरस्वती नदी शोध संस्थान द्वारा कुरुक्षेत्र में आयोजित अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन को संबोधित करते हुए कहा।

सरस्वती को धरती पर लाने की कवायद

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firdaus-firdaus blogspot
Source: 
- फ़िरदौस ख़ान
हरियाणा में आदि अदृश्य नदी सरस्वती को फिर से धरती पर लाने की कवायद शुरू कर दी गई है। इसके लिए राज्य के सिंचाई विभाग ने सरस्वती की धारा को दादूपुर नलवी नहर का पानी छोड़ने की योजना बनाई है। देश के अन्य राज्य में भी इस पर काम चल रहा है। अगर यह महती योजना सिरे चढ़ जाती है तो इससे हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के तकरीबन 20 करोड़ लोगों की काया पलट जाएगी। इस नदी से जहां राज्यों के लोगों को पीने का पानी उपलब्ध हो सकेगा, वहीं सिंचाई जल को तरस रहे खेत भी लहलहा उठेंगे।काबिले-गौर है कि सरस्वती नदी पर चल रहे शोध में सैटेलाइट से मिले चित्रों से पता चला है कि अब भी सरस्वती नदी सुरंग के रूप में मौजूद है। बताया जाता है कि हिमाचल श्रृंगों से बहने वाली यह नदी करीब 1600 किलोमीटर हरी-की दून से होती हुई जगाधरी, कालिबंगा