जिंदगी अब भी है बेपटरी

कटाव रोकने के लिए लोगों ने अपने घरों में बालू की बोरियां लगा रखी हैं. साभार - बिहार कोसी बाढ़साभार - बिहार कोसी बाढ़

दामोदर नदी ने रास्ता दिखाया

विल्काक्स (1930) ने पिछले समय में बंगाल के वर्ध्दमान जिले में दामोदर नदी द्वारा घाटी में सिंचाई पद्धति के बारे में बड़ा ही दिलचस्प विवरण दिया।

ईस्ट इंडिया कम्पनी के अंग्रेज अफसर और मुलाजिम मूलत: व्यापारी और नाविक थे। उनको भारत में सिंचाई, बाढ़ और उसके नियंत्रण के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। बाढ़ नियंत्रण के नाम पर नदियों के किनारे कुछ जमीन्दारी तटबंध थे जो कि बहुत कम ऊंचाई के हुआ करते थे। इनसे केवल हल्की-फुल्की बाढ़ों का ही सामना किया जा सकता था। इनका मकसद था कि निचले इलाकों में पानी जल्दी न भरने पाए। जैसे ही बाढ़ का पानी इतनी ऊंचाई अख्तियार कर ले कि तटबंध के ऊपर से पानी बहने का अंदेशा होने लगे तो गांव वाले बरसात में इन तटबंधों को खुद ही काट दिया करते थे जिससे कि गाद युक्त गंदला पानी खेतों में चला जाए और सिंचाई तथा खाद की जरूरतें अपने आप पूरी हो जाएं।

बाढ़ की प्रलय और फल्गु नदी प्यासी

फल्गु नदी में आज भी नहींसूखी फल्गु नदी पटना, 17 सितंबर । एक तरफ उत्तर बिहार की नदियां उफान पर हैं तो दूसरी तरफ दक्षिण बिहार के गया की फल्गु नदी में आज भी नहीं के बराबर पानी है।

एक तरफ बाढ़ के पानी से लोगों को बाहर निकालने के लिए सेना के जवानों को लगाया गया है तो दूसरी तरफ फल्गु नदी में अपने पितरों की आत्मा को मुक्ति देने के लिए तर्पण करने वालों के लिए पानी नदी खोद कर निकालना पड़ रहा है।

मुसीबत नहीं, मुनाफे की बाढ़

बाढ़ की वाटर हार्वेस्टिंगबाढ़ की वाटर हार्वेस्टिंगवीरेंद्र वर्मा / नई दिल्ली : यमुना की बाढ़ दिल्ली के लिए मुसीबत बनने की बजाय मुनाफे का सौदा साबित हो सकती है। गुजरात और कुछ लैटिन अमेरिकी देशों का सबक दिल्ली के लिए फायदेमंद हो सकता है। दिल्ली के चारों ओर एक नहर बनाकर बाढ़ के पानी को रीचार्ज किया जाए तो राजधानी की धरती पानी से मालामाल हो जाएगी। दो-तीन साल में ही दिल्ली का गिरता भूजल स्तर सामान्य स्थिति पर पहुंच जाएगा, इससे जमीन के पानी का खारापन भी दूर हो जाएगा।

हवा-पानी की आजादी

हवा-पानी की आजादीहवा-पानी की आजादीआजादी की 62वीं वर्षगांठ, हर्षोल्लास के माहौल में भी मन पूरी तरह खुशी का आनन्द क्यों महसूस नहीं कर रहा है, एक खिन्नता है, लगता है जैसे कुछ अधूरा है। कहने को हम आजाद हो गए हैं, जरा खुद से पूछिए क्या आपका मन इस बात की गवाही देता है नहीं, क्यों? आजाद देश उसे कहते हैं जहां आप खुली साफ हवा में अपनी मर्जी से सांस ले सकते हैं, कुदरत के दिए हुए हर तोहफे का अपनी हद में रहकर इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन यहां तो कहानी ही उलट है। आम आदमी के लिए न पीने का पानी है न खुली साफ हवा, फिर भी हम आजाद हैं?

आज हर ओर पानी का संकट गहराया है, कहीं बाढ़ की समस्या है तो कहीं सुखाड़ की, कहीं पानी में आर्सेनिक है तो कहीं पानी खारा हो रहा है, बड़े-बांध बन रहे हैं तो कहीं नदियां मर रही हैं। ऐसे माहौल में आजादी का जश्न कोई मायने नहीं रखता। जल ही जीवन है, पूरा पारिस्थिकी तंत्र इसी पर टिका है। जल संसाधनों की कमी को लेकर न केवल आम आदमी बल्कि राज्यों और देशों में भी तनाव बढ़ रहा है। पानी की कमी से विश्व की कुल जनसंख्या की एक-तिहाई प्रभावित है। पृथ्वी के सभी जीवों में पानी अनिवार्य रूप से विद्यमान है। आदमी में 60 फीसदी, मछली में लगभग 80 फीसदी, पौधों में 80-90 फीसदी पानी ही है। जीवित सेल्स में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के लिए पानी ही जरूरी तत्व हैं।

पानी के मसले एक ही मंत्रालय के पास हो

केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोजकेंद्रीय जल संसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोजहर आम और खास की सबसे बड़ी जरूरत है पानी। बढ़ती आबादी व सीमित पानी को देखते हुए झगड़े भी बढ़ रहे हैं। देश में पानी राज्यों का विषय है और केंद्रीय स्तर पर भी पानी कई मंत्रालयों में बंटा है। इन हालात में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोज का आए दिन किसी न किसी नए विवाद से सामना होता रहता है। उनका स्पष्ट मानना है कि पानी के लिए तो एक ही मंत्रालय होना चाहिए। 'दैनिक जागरण' के विशेष संवाददाता रामनारायण श्रीवास्तव के साथ खास बातचीत में सोज ने पूरी साफगोई के साथ यह भी स्वीकार किया कि पानी के लिए जो भी मंत्रालय काम कर रहे हैं उनमें भी स

कोसी के गुस्से का राज़ क्या है

नदी के मिज़ाज का खयाल रखना चाहिएनदी के मिज़ाज का खयाल रखना चाहिएअवधेश कुमार/ बिहार में कोसी नदी की धारा बदल जाने के कारण आए प्रलय के साथ ही जानकारों ने तटबंध और बैराजों को असली खलनायक साबित करना शुरू कर दिया है। सतही तौर पर विचार करने से ऐसा लगता है कि अगर हिमालय से निकलने वाली कोसी (जिसे नेपाल में सप्तकोसी कहा जाता है) के दोनों किनारों पर तटबंध नहीं बनाए जाते तो यह नौबत नहीं आती। पहले पानी इकट्ठा हुआ और फिर बाढ़ में बदल गया। कोसी ने अचानक धारा बदल ली और 120 किलोमीटर पूरब में फैल गई। नेपाल से निकलने वाली दूसरी नदियों- बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला, भुतही बलान आदि पर बनाए गए तटबंधों और बैराजों से भी समय-समय पर पानी बाढ़ की नौबत लाता ह

जलप्रलय ने सुखा दिया मां का आंचल

एक मां रेलवे स्टेशन परएक मां रेलवे स्टेशन परजागरण/पूर्णिया/मधेपुरा। भारतीय परंपरा में नदियां जीवन दायिनी मानी जाती हैं। मां भी जीवन देती है। लेकिन बिहार के लिए शाप बन चुकी कोसी में आई प्रलयकारी बाढ़ में सब कुछ गंवाने वाली बिलख रही है, क्योंकि अपने दुधमुंहे को पिलाने के लिए उसके आंचल में दूध नहीं उतर रहा है। प्राकृतिक आपदा में लोगों के सिर ढांपने की जगह बने पूर्णिया रेलवे स्टेशन पर शरण लिए झुनकी अपने चार महीने के दुधमुंहे बच्चे को गोद में लिए एक मां रेलवे स्टेशन पर बिलख रही है। पिछले कई दिनों से बाढ़ में फंसे रहने और भूखे रहने के कारण उसमें इतनी क्षमता

नन्हीं आंखों से गायब हुआ बचपन

आंखों से बचपन गायबआंखों से बचपन गायबराष्ट्रीय सहारा/ निवेदिता/एसएनबी/नई दिल्ली : वे सारे बच्चे कतारबद्ध खड़े थे। उनके नन्हें हाथ प्रार्थना की मुद्रा में जुड़े हुए थे। उनकी आंखों से बचपन गायब था। एक दिन में ही कोसी ने उन्हें बड़ों की दुनिया में लाकर खड़ा कर दिया। बच्चे पटना के रेलवे स्टेशन पर अपनी पारी का इन्तजार कर रहे थे कि कब उन्हें दिन का खाना मिलेगा। ये वही बच्चे हैं जिसे कोशी ने बेघर कर दिया। बच्चे मानते हैं कि इस प्रलय ने उनका सब कुछ उजाड़ दिया। कोशी ने न उन्हें सिर्फ बेघर किया, बल्कि उस गांव, शहर, कस्बों की संस्कृति और सभ्यता भी मिटा दी। इन क्षेत्रों की मां