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साफ पानी का सपना, सपना ही रहेगा

Author: 
कुलदीप शर्मा
Source: 
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, सितम्बर 2011

पानी : सुखद खबरें


साफ पानी का सपना 1. अगस्त माह 2010 का आखिरी सप्ताह, पूरे उत्तर भारत में भारी वर्षा के कारण नदियाँ मुहाने तोड़ बाहर आईं बाढ़ की स्थिति।
2. दिल्ली में 26 अगस्त तक 448 मिलीमीटर वर्षा रिकार्ड हुई। प्रशांत महासागर में अलनीनो विकसित होने के कारण इस वर्ष देश में अच्छी बारिश हुई।
3. भरपूर बारिश का जायजा यों है पश्चिमी राजस्थान- 65%, जम्मू कश्मीर- 35%, सौराष्ट्र कच्छ 85%, रायलसीमा-73%

पानी-पानी करती ख़बरें


1. दिल्ली के उप नगर द्वारका में पानी की भारी किल्लत।
2. पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के लोग गम्भीर पानी संकट में भूजल नीचे खिसका।
3. दिल्ली में ही उस्मानपुर के बच्चे मास्टर जी के लिये पीने का पानी लेकर आते हैं।
4. सरकारी कार्यालयों में कर्मचारियों के बैैग में बस पानी ही पानी।

ऐसा नहीं है कि इस धरती पर पानी नहीं है। धरती का दो तिहाई भाग पानी से घिरा हुआ है। इसमें से 97.4% पानी समुद्र में हिलोरे ले रहा है जो खारा है और कतई पीने के लायक नहीं है। बाकी 1.8% पानी साफ है जिसका 77% पानी हिमखंडों और ग्लेशियरों में जमा पड़ा है। 22 प्रतिशत पानी धरती की गोद में है। अब बचा मात्र एक प्रतिशत पानी जो धरती की सतह पर झीलों, झरनों और वातावरण में है। अब भला इसमें से कितने प्यासों की प्यास बुझाई जाये और कितनों को ओस चटाई जाये?

यूपी के महाराजगंज के भूजल में आर्सेनिक की स्थिति


जल पर्यावरण का जीवनदायी तत्व है. परिस्थितिकी के निर्माण में जल आधारभूत कारक है. वनस्पतियों से लेकर जीव-जंतु अपने पोषक तत्वों की प्राप्ति जल से करते हैं. मनुष्य के भौतिकवादी दृष्टिकोण, विज्ञान और तकनीक की निरंतर प्रगति, बढता औद्योगीकरण और शहरीकरण, खेतों में पैदावार बढाने के लिए रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग, कीटनाशकों का अनियंत्रित प्रयोग व जनसंख्या में हो रही वृद्धि तथा जनमानस की प्रदूषण के प्रति उदासीनता के कारण जल प्रदूषण की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है.

पंजाब के जल में आर्सेनिक का ज़हर

पंज़ाब राज्य का लगभग 80% भूजल मनुष्यों के पीने लायक नहीं बचा है और इस जल में आर्सेनिक की मात्रा अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच चुकी है… यह चौंकाने वाला खुलासा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किये गये एक अध्ययन में सामने आई है। पानी में आर्सेनिक की मात्रा का सुरक्षित मानक स्तर 10 ppb होना चाहिये, जबकि अध्ययन के मुताबिक पंजाब के विभिन्न जिलों से लिये पानी के नमूने में आर्सेनिक की मात्रा 3.5 से 688 ppb तक पाई गई है। यह खतरा दक्षिण-पश्चिम पंजाब पर अधिक है, जहाँ कैंसर के मरीजों की संख्या में भी बढ़ोतरी देखी गई है। जज्जल, मखना, गियाना आदि गाँव आर्सेनिक युक्त पानी से सर्वाधिक प्रभावित हैं और यहाँ इसका स्तर बेहद खतरनाक हो चुका है।

हिमाचल प्रदेश में 36,615.92 हैक्टेयर मीटर (है.मी.) भूजल

हेमंत शर्मा

शिमला: हिमाचल प्रदेश में 36,615.92 हैक्टेयर मीटर (है.मी.) भूजल की उलब्धता है। यह खुलासा केंद्रीय भूजल बोर्ड ने किया है। इसमें कांगड़ा जिला की इंदौरा-नूरपुर वेली में 9,214.96 है.मी., मंडी जिला की बल्ह वैली में 3,483.00 है.मी., सिरमौर जिला की पांवटा वैली में 6,924.14 है.मी., सोलन की नालागढ़ वैली में 6,936.12 है.मी. तथा ऊना जिला की ऊना वैली में 10,057.77 है.मी. भूमि जल उपलब्ध है। जानकारी के अनुसार प्रदेश में भूजल की विकास प्रतिशतता 31.71 प्रतिशत है जिसमें कांगड़ा में 26.42, मंडी में 22.44, सिरमौर 17.62, सोलन 14.77 तथा ऊना में 51.15 प्रतिशत है।

पानी की फिक्र : दस मई से पहले धान की नर्सरी नहीं

पानी की बरबादीपानी की बरबादीजैसे-जैसे औद्योगिक इकाइयों की तादाद, किसानों में नकदी फसल उगाने आदि से भूजल का दोहन तेज हुआ है। इसके चलते बहुत से इलाके बिल्कुल सूख गए हैं। वहां जमीन से पानी खींचना नामुमकिन हो गया है। अनेक क्षेत्रों में जल्दी ही ऐसी स्थिति पैदा होने की आशंका जताई जाने लगी है। भूजल संरक्षण के लिए कुछ राज्य सरकारें छिटपुट उपाय तो करती नजर आती हैं, मगर संकट के मुकाबले यह बहुत कम है। दिल्ली सरकार ने कुछ साल पहले नए नलकूप लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया और पहले से मौजूद नलकूपों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के मकसद से शुल्क की दर बढ़ा दी। अब पंजाब सरकार ने सिंचाई के नलकूपों के मनमाने इस्तेमाल करने पर लगाम लगाने की पहल की है। उसने एक अध

रुफटोप वर्षा जल संचयन : कैसे करें

गुरुत्वीय शीर्ष  पुनर्भरणगुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुँआछत पर प्राप्त वर्षा जल का भूमि जलाशयों में पुनर्भरण निम्नलिखित संरचनाओं द्वारा किया जा सकता है।

1. बंद / बेकार पड़े कुंए द्वारा
2. बंद पड़े/चालू नलकूप (हैंड पम्प) द्वारा
3. पुनर्भरण पिट (गङ्ढा) द्वारा
4. पुनर्भरण खाई द्वारा
5. गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुँए द्वारा
6. पुनर्भरण शिफ्ट द्वारा

गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुँए द्वारा

बोरवेल / नल कूपों का इस्तेमाल पुनर्भरण संरचना के रूप में किया जा सकता है।

यह विधि वहाँ उपयोगी है जहाँ जमीन की उपलब्धता सीमित है।
जब जलाभृत गहरा हो तथा चिकनी मिट्टी से ढका हो।

पानी उठाने के उपकरण

जब पानी खेत से निचली जगह पर उपलब्ध होता है, तो उसे खेत के तल तक उठाने के लिए विभिन्न प्रकार के उपकरण प्रयुक्त किये जाते हैं। शक्ति स्रोत के आधार पर पानी उठाने वाले उपकरणों को मानव शक्ति चालित, पशु शक्ति चालित और यांत्रिक शक्ति चालित में विभाजित किया जा सकता है। नदी, भूजल और कुओं से पानी उठाने के लिये प्रयोग किये जाने वाले उपकरणो को विस्तार मे नीचे दिया गया है।
मानव शक्ति- चालित उपकरणः मानव शक्ति चालित पानी उठाने के प्रमुख उपकरण निम्नलिखित हैं:

क्या आप जानते हैं


• देश के कुछ भागों में भूजल स्तर एक मीटर प्रति वर्ष की दर से गिर रहा है।

• वार्षिक पुनर्भरणीय संसाधन 432 अरब घन मीटर (बी.सी.एम.) आंका गया है।

• जल संचय करने से 160 अरब घन मीटर (बी.सी.एम.) अतिरिक्त जल उपयोग के लिए उपलब्ध होगा।

• आप दिल्ली में 100 वर्ग मीटर आकार के छत पर 65000 लीटर वर्षा जल प्राप्त कर उसका पुनर्भरण कर सकते है और इससे चार सदस्यों वाले एक परिवार की पेय और घरेलू जल आवश्यकताएं 160 दिनों तक पूरी कर सकते हैं।

• केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड ने जल का संचयन करने और पुनर्भरण के लिए पहली परियोजना हरियाणा में 1976 में व इसके पश्चात गुजरात में 1980 में तथा केरल में 19888 में कार्यान्वित की।

• भारत में गत पचास वर्षों में सिंचाई कुओं एवं बोरवेल/टयूबवेल मे पांच गुणा वृद्धि हो गई है। इसकी संख्या 195 लाख तक पहुंच चुकी है।

• इस समय भारत मे पेय, घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग के लिए 25 से 30 लाख कुएं एवं बोरवेल/टयूबवेल है।

• देश में 80 प्रतिशत ग्रामीण तथा 50 प्रतिशत शहरी आवश्यकता की पूर्ति, औद्योगिक एवं सिंचाई के लिए जल की पूर्ति भूजल से की जा सकती है।

जल में बसा देवता

बाढ़अनुपम मिश्रवे पुरोगामी पुरुष हैं। कार्यकर्ता तो आपको बहुत मिलेंगे, परंतु कर्म व ज्ञान का सम्मिश्रण आपको अनुपम मिश्र में ही मिलेगा। ज्ञान, कोरी सूचना भर नहीं, अनुभव की आंच में तपा हुआ अर्जित ज्ञान। उनका समूचा जीवन जल के प्रति एक सच्ची प्रार्थना रहा है। तीन दशकों से भी अधिक समय से वे भारत के लुप्त होते जल संसाधनों को बचा रहे हैं। इसलिये उनका प्रत्येक शब्द एक दस्तावेज बनता है, जहाँ वे जल संकट के विभिन्न पहलुओं को अपनी पैनी दृष्टि से उघाड़ते हैं। नगर जल प्रबंधन, शुद्ध पेयजल, भूजल व सार्वजनिक जल, हरेक मसले पर उनके तर्क बड़े पुष्ट हैं। उनकी दोनों किताबें – ‘आज भी खरे हैं त