जल नीति राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में बननी चाहिये

अजमेरअजमेरप्रोफेसर रासा सिंह रावत अजमेर के सांसद हैं। कहते हैं कि जब मैं छोटा था तो अजमेर में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनो ही ओर का मानसून आता था। लेकिन वनों के कटने और रेगिस्तान के विस्तार के कारण वनस्पति का अभाव हो गया। परिणामस्वरुप अजमेर भी मारवाड़ व मेवाड़ की तरह अकाल की चपेट में आ गया। वर्षाभाव की वजह से तालाब सूख गये। राजस्थान सरकार ने अब तय किया है कि अजमेर जिले के गाँवों को भी बीसलपुर का पानी दिया जा जाये। 300 किमी दूर से लाया गया पानी अजमेर के सूखे ओठों की प्यास बुझा पाएगा? प्रस्तुत है उनसे बातचीत . . .

अजमेर की जल समस्या के बारे में कुछ बतायें।

हम नदी के रास्ते को साफ रखें

मुंशी राम बिजनौर के जुझारू सांसद हैं। वे अपने जिले की जल समस्याओं से न केवल परिचित हैं, बल्कि उसका समाधान भी सुझाते हैं कि अगर नदी के रास्ते को साफ रखा जाये तो बाढ़ की समस्या सुलझ सकती है। वे नदी के अधिशेष जल को सूखा ग्रस्त इलाकों में ले जाने की भी वकालत करते हैं। लेकिन वे इंगित करते हैं कि लिफ्ट करके पानी को दूसरी जगह पहुँचाना उचित नहीं है, हमें नदी के सहज गुरुत्वाकर्षण को प्रयोग में लाना चाहिये। हरित प्रदेश की माँग का पुरजोर समर्थन करते मुंशी राम लंबे समय से सामाजिक कार्यकर्ता बतौर अपने जिले में सक्रिय रहे हैं।

आपके जिले से कई पहाड़ी नदियाँ होकर गुजरती हैं। इससे कौन सी जल संबंधी समस्यायें आती हैं?

पर्यावरण सुरक्षा

सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों में संभवत: यह सबसे मुश्किल लक्ष्य है क्योंकि यह मुद्दा इतना सरल नहीं है, जितना दिखता है। टिकाऊ पर्यावरण के बारे में जिस अवधारणा के साथ लक्ष्य सुनिश्चित किया गया है, सिर्फ उस अवधारणा के अनुकूल परिस्थितियां ही तय सीमा में तैयार हो जाए, तो उपलब्धि ही मानी जाएगी।

यद्यपि यह माना जाए कि विकास की राष्ट्रीय नीतियों एवं कार्यक्रमों के बीच समन्वय एवं उनमें व्यवस्थित रूप से एकीकरण किया जाए, पर यह संभव नहीं दिखता।

यादगार बने द्वीप

बाढ़ में उजडे़ अपने घर को देखते हुए मुस्तफा अली खानबाढ़ में उजडे़ अपने घर को देखते हुए मुस्तफा अली खानसुन्दरवन डेल्टा जो अपने शीतल जल और मनोरम वातावरण के लिए याद किया जाता था, आज वहां की धरती और पानी दोनों ही इतने अधिक गर्म हो गए हैं जितना पहले कभी नहीं हुए। द्वीपों से घिरे एक ऐसे ही अशान्त समुद्र का दर्द बयां कर रहे है मिहिर श्रीवास्तव/ सुन्दरवन डेल्टा के दक्षिण-पश्चिम में एक द्वीप है मौसिमी। इसी द्वीप की गोद में बसा है बालिहार गांव। इस गांव में रहने वाले किसान, मुस्तफा अली खान की 12 बीघा जमीन पिछले साल समुद्र में चली गई। पिछले दस सालों में ऐसा तीसरी बार हुआ है कि मुस्तफा का घर पानी की भेंट चढ़ गया। अ

उत्तराखंड की प्रमुख झीलें

झीलझीलपृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला पदार्थ जल है, जिससे पृथ्वी का 70 प्रतिशत् भाग ढका है। कुल जल की मात्रा का 97.3 प्रतिशत (135 करोड़ घन किमी0) सागर और महासागर के रूप में तथा 2.7 प्रतिशत (2.8 करोड़ घन किमी0) बर्फ से ढका है। इसके अतिरिक्त 7.7 घन किमी0 जल भूमिगत है।

पर्वतीय क्षेत्रों में भूगर्भ स्थिति के अनुसार, पर्वतों से भू-जल स्रोत बहते हैं। ऐसे स्रोत मौसमी या लगातार बहने वाले होते हैं। ऐसे ही स्रोतों में से एक झील है।

झील- एक जलाशय है जो भूमि से घिरा तथा विशालाकार होता है ।

बदानी ताल झील- यह झील पृथ्वी की सतह में श्रेणी-बद्ध दोष के कारण बनी है। यह गढ़वाल में मयाली के पास ऊपरी लक्ष्तर गाड नदी की घाटी के ढालों के बीच स्थित है।

जल संसाधन परिचय

विश्व जलविश्व जलसामान्य तथ्य: पृथ्वी के लगभग तीन चौथाई हिस्से पर विश्र्व के महासागरों का अधिकार है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार पृथ्वी पर जल की कुल मात्रा लगミग 1400 मिलियन घन किलोमीटर है जो कि पृथ्वी पर 3000 मीटर गहरी परत बिछा देने के लिए काफी है। तथापि जल की इस विशाल मात्रा में स्वच्छ जल का अनुपात बहुत कम है। पृथ्वी पर उपलब्ध समग्र जल में से लगभग 2.7 प्रतिशत जल स्वच्छ है जिसमें से लगभग 75.2 प्रतिशत जल ध्रुवीय क्षेत्रों में जमा रहता है और 22.6 प्रतिशत भूजल के रूप में विद्यमान है। शेष जल झीलों, नदियों, वायुमण्डल, नमी, मृदा और वनस्पति में मौजूद है। जल की जो मात्रा उपभोग और अन्य प्रयोगों के लिए वस्तुतः उपलब्ध है, वह नदियों, झीलों और भूजल में उपलब्ध म

मुद्दा : वर्षा-बूंदों को सहेजना जरूरी

वर्षाजल संरक्षणवर्षाजल संरक्षणरेशमा भारती/ राष्ट्रीय सहारा/ देश के अधिकांश शहरों में अत्यधिक दोहन के कारण भूमिगत जलस्तर तो तेजी से घट ही रहा है, नदी, तालाब, झीलें आदि भी प्रदूषण, लापरवाही व उपेक्षा के शिकार रहे हैं। नदी जल बंटवारे या बांध व नहर से पानी छोड़े जाने को लेकर प्राय: शहरों का अन्य पड़ोसी क्षेत्रों से तनाव बना रहता है। शहरों के भीतर भी जल का असमान वितरण सामान्य है। जहां कुछ इलाकों में बूंद–बूंद पानी के लिए हाहाकार रहता है, वहीं बढ़ती विलासिता और बढ़ते औघोगीकरण में पानी की बेइंतहा बर्बादी भी होती है।

बूंद बूंद से घट भरे

बूंदबूंदराजीव रंजन प्रसाद/ अभिव्यक्ति हिन्दी

कहाँ है पानी? सावन के लिये तरसती आँखे आज फ़सलों को जलते देखने के लिये बाध्य हैं, रेगिस्तान फैलते जा रहे हैं, ग्लेशियर पिघल रहे हैं और नदियाँ, नालों में तब्दील होती जा रही हैं। कमोबेश समूचे विश्व की यही स्थिति है।

सतह के जलस्रोतों के हालात हम अपनी आँखों से देख कर महसूस कर सकते हैं, क्षुब्ध हो सकते हैं, विचलित हो सकते हैं, किंतु ग्लेशियरों से पिघल कर सागर में मिल जाने वाली सरिताओं, तालाबों, झीलों के परे भी पीने-योग्य जल की एक दुनिया है जिनकी उपादेयता से तो हम परिचित हैं, किंतु स्थिति से नहीं।

जल प्रदूषण (Water Pollution in Hindi)

जल प्रदूषण : कारण, प्रभाव एवं निदान (Water Pollution: Causes, Effects and Solution)


‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011
वर्तमान में वर्षा की अनियमित स्थिति, कम वर्षा आदि को देखते हुए उद्योगों को अपनी जल खपत पर नियंत्रण कर उत्पन्न दूषित जल का समुचित उपचार कर इसके सम्पूर्ण पुनर्चक्रण हेतु प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए। ताकि जलस्रोतों के अत्यधिक दोहन की स्थिति से बचा जा सके। हम पिछले अध्याय में पढ़ आये हैं कि पानी में हानिकारक पदार्थों जैसे सूक्ष्म जीव, रसायन, औद्योगिक, घरेलू या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से उत्पन्न दूषित जल आदि के मिलने से जल प्रदूषित हो जाता है। वास्तव में इसे ही जल प्रदूषण कहते हैं। इस प्रकार के हानिकारक पदार्थों के मिलने से जल के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणधर्म प्रभावित होते हैं। जल की गुणवत्ता पर प्रदूषकों के हानिकारक दुष्प्रभावों के कारण प्रदूषित जल घरेलू, व्यावसायिक, औद्योगिक कृषि अथवा अन्य किसी भी सामान्य उपयोग के योग्य नहीं रह जाता।