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वर्षाजल संचयन पर एक ऑडियो

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एक दुनिया एक आवाज
पूरी दुनिया आज जल संकट से जूझ रही है। विशेषज्ञों का मानना है वर्षाजल संरक्षण ही जल संकट से उबरने का महत्वपूर्ण स्रोत है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जब वन वर्ल्ड साउथ एशिया की टीम ने सर्वे के दौरान कुछ लोगों से पूछताछ की तो नतीजे बेहद चौकाने वाले थे। क्योंकि अधिकांश ने कहा कि उंहे वर्षाजल संरक्षण के बारे में पता ही नहीं।

आईये जानते हैं हमारे विशेषज्ञ से कि क्या है वर्षाजल संरक्षण और इससे हमें क्या लाभ हो सकता है?




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वर्षाजल संचयन का अनूठा उदाहरण

कासरगौड़ का जिला पंचायत कार्यालयकासरगौड़ का जिला पंचायत कार्यालयरेनवाटर हारवेस्टिंग तकनीक सप्लाई वाटर की कमी से निपटने का तरीका भर नहीं है, कई बार इसकी मदद से इतना पानी जमा हो जाता है कि दूसरे स्रोत की जरूरत नहीं पडती और कुछ नियमित रेनवाटर स्रोत तो दूसरों को उधार तक देने की स्थिति में भी आ जाते हैं. केरल के एक जिला पंचायत कार्यालय की यात्रा कर श्री पद्रे ने ऐसा ही एक उदाहरण खोज निकाला है.

लापोड़िया : बदहाल गांव से हुआ खुशहाल गांव

लापोड़ियालापोड़िया-देवकरण सैनी
जयपुर-अजमेर राजमार्ग पर दूदू से 25 किलोमीटर की दूरी पर राजस्थान के सूखाग्रस्त इलाके का एक गांव है - लापोड़िया। यह गांव ग्रामवासियों के सामुहिक प्रयास की बदौलत आशा की किरणें बिखेर रहा है। इसने अपने वर्षों से बंजर पड़े भू-भाग को तीन तालाबों (देव सागर, फूल सागर और अन्न सागर) के निर्माण से जल-संरक्षण, भूमि-संरक्षण और गौ-संरक्षण का अनूठा प्रयोग किया है।

इतना ही नहीं, ग्रामवासियों ने अपनी सामूहिक बौद्धिक और शारीरिक शक्ति को पहचाना और उसका उपयोग गांव की समस्याओं का समाधान निकालने में किया। आज गोचर का प्रसाद बांटता यह गांव दूसरे गांवों को प्रेरणा देने एवं आदर्श प्रस्तुत करने की स्थिति में आ गया है। 1977 में अपनी स्कूली पढ़ाई के दौरान गांव का एक नवयुवक लक्ष्मण सिंह गर्मियों की छुट्टियां बिताने जयपुर शहर से जब गांव आया तो वहां अकाल पड़ा हुआ था। उसने ग्रामवासियों को पीने के पानी के लिए दूर-दूर तक भटकते व तरसते देखा। तब उसने गांव के युवाओं की एक टीम तैयार की, नाम रखा, ग्राम विकास नवयुवक मंडल, लापोड़िया। शुरूआत में जब वह अपने एक-दो मित्रों के साथ गांव के पुराने तालाब की मरम्मत करने में जुटा तो बुजुर्ग लोग साथ नहीं आए। बुजुर्गों के इस असहयोग के कारण उसे गांव छोड़कर जाना पड़ा। कुछ वर्षों बाद जब वह वापस गांव लौटा तो इस बार उसने अपने पुराने अधूरे काम को फिर से शुरू करने के लिए अपनी टीम के साथ दृढ़ निश्चय किया कि अब कुछ भी करना पडे पर पीछे नहीं हटेंगे। कुछ दिनों तक उसने अकेले काम किया।

साड़ी से रेन वाटर हार्वेस्टिंग

वर्षाजल एकत्रित करने का देशज तरीका


कर्नाटक और केरल के भारी वर्षा वाले इलाके के गाँवों में ग्रामीण जनता पेयजल प्राप्त करने के लिये अपना खुद का “डिजाइन” किया हुआ “रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम” अपनाती है। इस खालिस देशी विधि के मुताबिक एक साड़ी के चारों कोनों को बारिश के दौरान खुले में बाँध दिया जाता है और उसके ढलुवाँ हिस्से के बीचोंबीच नीचे पानी एकत्रित करने के लिये एक बर्तन लगा दिया जाता है, जिससे कि एक ही विधि में पानी का इकठ्ठा होना और पानी का छनकर साफ़ होना हासिल कर लिया जाता है।

जी उठा गांव

पानी प्रबंधनपानी प्रबंधनअपर्णा पल्लवी

ढांघरवाड़ी में कुछ समय में ही जमीन की कीमतें 6 हजार रु. प्रति एकड़ (0.4 हेक्टेयर) से 1 लाख रू प्रति एकड़ पर पहुंच गई। लेकिन महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के छोटे से गांव के लोग फिर भी अपनी जमीनें बेचने को तैयार नहीं हैं। वजह, बिल्कुल साफ है- इसका 70 हेक्टेयर कृषि भूमि, जिस पर मुश्किल से ही तीन महीने के लिए अनाज पैदा होता था, उसी पर इस बार 21 लाख का मुनाफा हुआ- ढांघरवाड़ी की जमीन पर अनाज, दालें और प्याज आदि उगाकर।

कोशिश रंग लाई, मिला पानी

..आईबीएन-7/सिटिज़न जर्नलिस्ट सेक्शन

नरेन्द्र नीरव, सोनभद्र जिले के ओबरा का रहने वाला हैं। सूखा ग्रस्त टोले का परासपानी गांव आज 5 सालों के मेहनत, परिश्रम और लोगों के लगन का नतीजा है यह कि जहां सूखा था वहां पानी दिख रहा है।

इस इलाके में नरेन्द्र नीरव ने अध्ययन और गांव में जन स्वास्थ के कुछ कार्यक्रम शुरू किए। तो इन लोगों ने ये निष्कर्ष निकाला कि ज्यादातर बीमारियां पानी की कमी के कारण, इस इलाके के लोगों को हैं।

रुफटोप वर्षा जल संचयन : कैसे करें

गुरुत्वीय शीर्ष  पुनर्भरणगुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुँआछत पर प्राप्त वर्षा जल का भूमि जलाशयों में पुनर्भरण निम्नलिखित संरचनाओं द्वारा किया जा सकता है।

1. बंद / बेकार पड़े कुंए द्वारा
2. बंद पड़े/चालू नलकूप (हैंड पम्प) द्वारा
3. पुनर्भरण पिट (गङ्ढा) द्वारा
4. पुनर्भरण खाई द्वारा
5. गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुँए द्वारा
6. पुनर्भरण शिफ्ट द्वारा

गुरुत्वीय शीर्ष पुनर्भरण कुँए द्वारा

बोरवेल / नल कूपों का इस्तेमाल पुनर्भरण संरचना के रूप में किया जा सकता है।

यह विधि वहाँ उपयोगी है जहाँ जमीन की उपलब्धता सीमित है।
जब जलाभृत गहरा हो तथा चिकनी मिट्टी से ढका हो।

पानी संग्रहण की परंपरागत पहाड़ी विधियां

नौलेनौलेपरम्परागत विधिया टिकाऊ और कम खर्चीली तो हैं ही साथ ही साथ हमारे वातावरण के लिये भी अनुकूल हैं। इनको संचालित करने के लिये किसी भी तरह की ऊर्जा की जरूरत नहीं पड़ती है और यह हमेशा हर परिस्थिति में काम करती हैं बस जरूरत है तो इन्हें बचाने की।पहाडों में पानी संग्रहण करने की कुछ पारम्परिक पर वैज्ञानिक विधियां रहीं हैं जो आज लुप्त हो रही हैं। यदि उनके बारे में अच्छे से समझा जाये और उन्हें आज फिर अपनाया जाये तो पानी की समस्याआ से छुटकारा मिल सकता है।

बड़े बांधों में नहीं छोटे-छोटे चेकडैम में छिपा है उपाय

एक सुव्यवस्थित नाला बंधएक सुव्यवस्थित नाला बंधमनसुख भाई (जलक्रांति ट्रस्ट)/गुजरात सरकार 1.5 लाख से लेकर 15 लाख रुपए में सिर्फ एक चेक डैम बनाती थी। तब हमने कहा कि 15 चेकडैम का खर्चा सिर्फ एक लाख आएगा। लोग मानने को तैयार नहीं थे कि इतने कम खर्च में भी चेकडैम तैयार हो सकता है। मैंने कहा कि यह मेरी जिम्मेदारी है।