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पर्यावरण परिवर्तन से पैदा होते नए कीटाणु


सूखे में बढ़ोत्तरी का परिणाम जल निकायों में कमी के रूप में सामने आ सकता है जो इसके बदले पालतू पशुधन एवं वन्य जीव के बीच अधिक परस्पर सम्पर्कों को सुगम बनाएगा और इसका परिणाम असाध्य 'केटाहैरल बुखार' के प्रकोप के रूप में हो सकता है जो पशुओं की एक घातक बीमारी है क्योंकि सभी जंगली पशु बुखार के विषाणु के वाहक होते हैं। कम पानी होने के कारण विभिन्न पशुओं, पक्षियों और जीवों का आपसी सम्पर्क बढ़ने की सम्भावना अधिक होती है। ऐसे समय में मछलियँ विशेष रूप से उभरती जलवायु-परिवर्तन के प्रति संवेदनशील होती हैं क्योंकि उनकी पारिस्थितिक प्रणाली बहुत निर्बल होती है और जल एक प्रभावी रोग वाहक है। पर्यावरण परिवर्तन ने कई तरह की समस्याओं को उत्पन्न किया है। पर्यावरण परिवर्तन का असर वैश्विक है। इसके कारणों में वायु प्रदूषण,वनों की कटाई, पहाड़ों-चट्टानों को तोड़ना और कीटनाशकों का प्रयोग है।

आधुनिक जीवनशैली में प्रयोग आने वाले एयर कंडीशनर आदि भी पर्यावरण को प्रदूषित करने में काफी भूमिका निभा रहे हैं। फिलहाल पर्यावरण प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि इसका असर जलवायु पर काफी गहरे पड़ा है। इसके कारण कृषि, मानव स्वास्थ और जलवायु पर विषम असर देखने को मिल रहा है।

मानसून अनियंत्रित हो गया है। कभी अधिक वर्षा तो कभी सूखा सामने आ रहा है। परिवर्तनशील मानसून के कारण कई ऐसे कीट पैदा हुए हैं जो कृषि, मनुष्य और अन्य जीव-जन्तुओं को काफी हानि पहुँचा रहे हैं। वैज्ञानिकों की राय में परिवर्तनशील जलवायु से जैविक दबाव बढ़ा है। जैविक दबाव का अर्थ है ऐसे रोग, कीटनाशी जीव और खरपतवार जो कि मनुष्य, पशु और पौधों के सामान्य विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं।

नए तरह के कीटाणु फसलों को पूरी तरह बर्बाद कर देते हैं। ऐसे कीटाणुओं पर कीटनाशकों का कोई असर नहीं पड़ता है। लाखों वर्षों से हमारे मानसून का समय निश्चित था। उसी के अनुसार खेती होती थी और मनुष्य भी अपने रीति रिवाज आदि वर्षा और ठंडी के अनुसार तय करते थे। किस मौसम में कौन फसल उगानी है और उस समय कौन से कीट या रोग उत्पन्न हो सकते हैं ,किसानों को इसकी जानकारी थी। तब पर्यावरण, कृषि और मनुष्य के बीच एक सहअस्तित्व था।

लेकिन जलवायु परिवर्तन ने पारिस्थितिकी को बदल दिया है। जिससे जैव विविधता कम हुई है और नए-नए कीटाणु पैदा हो रहे हैं। जैविक दबाव के लिये परपोषी, नाशीजीव और पर्यावरण के बीच हितकारी पारस्परिक सम्पर्क की आवश्यकता होती है। लेकिन यह पारस्परिक सम्बन्ध अब बिगड़ गया है।

सबसे बड़ी बात यह है कि इस प्रकार के कीटाणुओं से होने वाली महामारी से सौ प्रतिशत तक हानि होती है। इसका उदाहरण 1943 में चावल में भूरा धब्बा (हैलमिनथोस्पोरियम ओरिजिए) की महामारी थी, जिसके कारण पश्चिम बंगाल, बिहार और ओड़ीसा में भीषण अकाल पड़ा। इस ऐतिहासिक नुकसान से लगभग 40 लाख लोगों की भूख के कारण मृत्यु हुई।

पर्यावरण में असामयिक परिवर्तन रोगजनक कीटाणुओं के उद्भव के लिये अनुकूल होता है। यह पर्यावरण अनुकूलन कीटाणुओं के उद्भव की दर में तेजी लाता है। इस प्रकार पर्यावरण में परिवर्तन, रोगजनकों की नई प्रजातियों के उद्भव का मुख्य कारण है। फसलों में होने वाले कुछ गौण रोग या कीटनाशीजीव मुख्य जैविक प्रतिबल बन जाते हैं।

जलवायु परिवर्तन के लिये ग्रीनहाउस गैस तथा कार्बन डाइऑक्साइड मुख्य रूप से उत्तरदायी है। जो फसलों की पत्तियों में सरल शर्करा के स्तरों को बढ़ा देती हैं और नाइट्रोजन की मात्रा कम कर देती है। जिसके कारण फसलों पर अनेक कीटों द्वारा होने वाले नुकसान बढ़ जाते हैं। कीटाणु नाइट्रोजन की अपनी मेटाबोलिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये अधिक पत्तियों को खाएँगे।

इस प्रकार कोई भी आक्रमण अधिक संक्रामक होगा। मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड के कारण होने वाले ग्लोबल वार्मिंग से उच्चतर तापमान का अर्थ है कि सर्दी के मौसम में अधिक संख्या में नाशीजीव जीवित रहेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पशु और पौधों, नाशीजीव और रोगों के वितरण में परिवर्तन हो रहा है और इसके पूरे प्रभावों का अनुमान लगाना कठिन है।

तापमान, नमी और वायुमण्डलीय गैसों में परिवर्तन से पौधों, फफूंद और कीटों की वृद्धि और प्रजनन दर बढ़ने की सम्भावना बढ़ रही है। जिससे नाशजीवों उनके प्राकृतिक शत्रुओं और परपोषी के बीच पारस्परिक सम्पर्क में परिवर्तन होता है। भूमि कवर में परिवर्तन जैसे कि वनकटाई या मरुस्थल से बाकी बचे पौधे और पशु नाशीजीवों और रोगों के प्रति और अधिक संवेदनशील होने की सम्भावना बढ़ गई है। यद्यपि नए नाशीजीव और रोग बड़े ऐतिहासिक कालखण्ड में उभरते रहे हैं। फिर भी जलवायु परिवर्तन से इस समीकरण में अज्ञात नाशीजीवों की संख्या बढ़ गई है।

तापमान और आर्द्रता स्तरों में परिवर्तन के साथ इन कीटों की संख्या और उनके भौगोलिक क्षेत्र में वृद्धि हो रही है। पशुओं और मनुष्य को ऐसे रोगों का इस प्रकार से सामना करना पड़ सकता है जिनके लिये उनके पास कोई प्राकृतिक प्रतिरक्षा नहीं है।

सूखे में बढ़ोत्तरी का परिणाम जल निकायों में कमी के रूप में सामने आ सकता है जो इसके बदले पालतू पशुधन एवं वन्य जीव के बीच अधिक परस्पर सम्पर्कों को सुगम बनाएगा और इसका परिणाम असाध्य 'केटाहैरल बुखार' के प्रकोप के रूप में हो सकता है जो पशुओं की एक घातक बीमारी है क्योंकि सभी जंगली पशु बुखार के विषाणु के वाहक होते हैं।

कम पानी होने के कारण विभिन्न पशुओं, पक्षियों और जीवों का आपसी सम्पर्क बढ़ने की सम्भावना अधिक होती है। ऐसे समय में मछलियँ विशेष रूप से उभरती जलवायु-परिवर्तन के प्रति संवेदनशील होती हैं क्योंकि उनकी पारिस्थितिक प्रणाली बहुत निर्बल होती है और जल एक प्रभावी रोग वाहक है।

उचित जैव सुरक्षा और जैव प्रदूषक उपायों को अपनाने से देश में एवियन इन्फ्लुएंजा के आक्रामक एच5एन8 विभेद के हाल ही में हुए प्रकोप का प्रभावकारी रूप से प्रबन्धन किया जा रहा है। परिवर्तनशील जैविक प्रतिबल परिदृश्य ने ऐसे मॉडलों पर भविष्य में अध्ययन करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। जो कि खेत की वास्तविक परिस्थितियों में मुख्य फसलों, पशुओं और मछलियों के रोगजनकों की गम्भीरता का अनुमान लगा सकें इसके साथ-ही-साथ बदल रही परिस्थितियों में टिकाऊ खाद्य उत्पादन के लिये नई कार्यनीतियों को मिलते हुए रोग प्रबन्धन कार्यनीतियों का पुन: अभिविन्यास किया जा सके।

पिछले कुछ वर्षों में भारत में पादप सुरक्षा और जैव-सुरक्षा जागरूकता में उल्लेखनीय रूप से प्रगति हुई है। फिर भी पर्यावरण परिवर्तन से उत्पन्न हो रहे नए कीटाणुओं ने विश्व के कृषि वैज्ञानिकों एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिन्ता बढ़ा दी है।

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