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आसान नहीं है कावेरी जल विवाद का समाधान


बंगलुरु में विरोध प्रदर्शनबंगलुरु में विरोध प्रदर्शनबीती 5 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा कर्नाटक को कावेरी नदी का 15 हजार क्यूसेक पानी तमिलनाडु के लिये रोजाना छोड़ने के आदेश के बाद से कर्नाटक जल रहा है। वहाँ किसानों और कन्नड़ समर्थक संगठनों के प्रदर्शन, रास्ता रोको आन्दोलन, तोड़फोड़, लूटपाट और आगजनी, ट्रकों को फूँके जाने के सिलसिले के चलते बंगलुरु के 16 थाना क्षेत्र में कर्फ्यू है। हाईवे बन्द हैं।

तमिलनाडु की नम्बर प्लेट वाली गाड़ियाँ आग के हवाले की जा रही हैं। तमिलनाडु जाने वाली बस सेवा फिलहाल स्थगित कर दी गई है। राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया तक के मैसूर स्थित आवास पर पथराव की खबरें हैं। हालात पर काबू पाने के लिये सीआरपीएफ, आरपीएफ, सीआईएसएफ की टुकड़ियों के लगभग 15 हजार जवान तैनात किये गए हैं। वहीं इसके विरोध में तमिलनाडु में कर्नाटक के लोगों पर हमले हो रहे हैं और कर्नाटक की नम्बर प्लेट वाली गाड़ियों को निशाना बनाया जा रहा है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री एस सिद्धारमैया ने तमिलनाडु सरकार से तमिलनाडु में कन्नड़ लोगों और उनकी सम्पत्ति की सुरक्षा की माँग की है। इस मामले में सिद्धारमैया ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हस्तक्षेप की माँग की है, वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दोनों राज्यों की जनता से शान्ति बनाए रखने की अपील की है।

इस बीच कर्नाटक सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप तमिलनाडु को पानी तो छोड़ा जा रहा है लेकिन उसने शीर्ष अदालत के निर्णय पर पुर्नविचार की अपील भी सुप्रीम कोर्ट में की। सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और यू यू ललित की पीठ ने कर्नाटक सरकार की सुप्रीम कोर्ट के 5 सितम्बर के आदेश पर रोक लगाने की अपील खारिज करते हुए कहा कि कोर्ट के आदेश के अनुपालन नहीं करने के पीछे कानून और व्यवस्था की समस्या को आधार नहीं बनाया जा सकता।

कर्नाटक सरकार और लोगों का कर्तव्य है कि आदेश का अनुपालन सुनिश्चित किया जाये। हाँ कोर्ट ने अपने आदेश में बदलाव करते हुए पानी की मात्रा 15 हजार क्यूसेक के स्थान पर 12 हजार क्यूसेक करते हुए इसको 20 सितम्बर तक रोजाना तमिलनाडु को छोड़े जाने का आदेश दिया है। अब कर्नाटक के लिये शीर्ष अदालत के आदेश की अनुपालना जरूरी है।

इस विवाद की जड़ समझने के लिये कावेरी के मामले और उसके जलग्रहण क्षेत्र पर नजर डालना उपयुक्त होगा। दरअसल यह पूरा क्षेत्र 81,155 वर्ग किलामीटर विस्तीर्ण है। इसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी ये चार राज्य आते हैं।

800 किलोमीटर लम्बी कावेरी नदी कर्नाटक के पश्चिमी घाट के कुर्ग यानी कोडगु स्थित ब्रह्मगिरी पर्वत से निकलती है। उसका ऊपरी बहाव क्षेत्र कर्नाटक में तथा निचला बहाव क्षेत्र तमिलनाडु तथा पुदुचेरी में है। स्वयं तो कावेरी केरल को स्पर्श नहीं करती, किन्तु उसकी कुछ सहायक नदियाँ केरल का जल प्राप्त करती हैं।

कर्नाटक में कावेरी की महत्त्वपूर्ण सहायक नदियाँ लक्ष्मणतीर्थ, हरंगी, हेमवती, शिंशा, अर्कावती, कबिनी और सुवर्णवती हैं तथा तमिलनाडु में भवानी, नोयल और अमरावती हैं। इनमें से कुछ का जलग्रहण क्षेत्र केरल में भी पड़ता है। कावेरी विवाद में 1882 और 1924 में हुए दो समझौतों का हवाला दिया जाता है। ये तत्कालीन मद्रास राज्य और देशी राज्य मैसूर के बीच हुए थे।

दरअसल ये ही कावेरी के पानी के बँटवारे के आधार थे। कुछ जानकार केवल 1924 के समझौते की ही पुष्टि करते हैं। उस समय कर्नाटक राज्य नहीं बना था और मद्रास को ब्रिटिश शासित प्रान्त कहें या मद्रास प्रेसिडेंसी कहा जाता था। कुर्ग यानी कोडगु जहाँ कावेरी का उद्गम है, ब्रिटिश चीफ कमिश्नर के अधीन था।

केरल का मालाबार का क्षेत्र मद्रास प्रान्त का हिस्सा था और पुदुचेरी फ्रांसीसियों का उपनिवेश था। 1924 के समझौते के कुछ प्रावधान 50 वर्षों की समाप्ति पर 18 फरवरी 1974 को समाप्त हो जाने थे, जिसके बाद नए सिरे से बातचीत होनी थी।

1956 में राज्यों का पुनर्गठन हुआ और कर्नाटक राज्य बना, तब कुर्ग और मैसूर कर्नाटक के अंग बन गए। मालाबार के कुछ क्षेत्र मद्रास राज्य में और शेष केरल में मिला दिये गए। पुदुचेरी केन्द्र शासित क्षेत्र बन गया। दरअसल केरल सहित यही क्षेत्र कावेरी जल विवाद के मूल में है।

दरअसल 1924 के समझौते में इस बात का उल्लेख था कि मद्रास यानी तमिलनाडु कावेरी के जल से 3 लाख 2 हजार एकड़ अतिरिक्त भूमि की सिंचाई कर सकता है और मैसूर 2 लाख 84 हजार एकड़ अतिरिक्त भूमि सींचने के साथ-साथ कृष्णराज सागर बाँध में जल भण्डार संचित कर सकता था। 1928 से लेकर 1971 तक की अवधि में वास्तव में तमिलनाडु ने 11 लाख 56 एकड़ अतिरिक्त भूमि में सिंचाई की और कर्नाटक ने 3 लाख 68 हजार एकड़ अतिरिक्त भूमि को सिंचाई सुविधाएँ दीं।

इस तरह तमिलनाडु ने समझौते में जितने का प्रावधान था, उससे बहुत अधिक भूमि में सिंचाई की और अधिक जल लिया। जल के उपयोग को लेकर सम्बद्ध पक्षों में इसी बिन्दु से मतभेद शुरू हो गए। निर्दिष्ट राशि से अधिक जल का उपयोग ही वर्तमान विवाद का मुख्य कारण है। उसके बाद से सम्बद्ध पक्षों में समझौते कराने के अनेकों प्रयास किये गए। 1970-75 के बीच कर्नाटक, तमिलनाडु और पुदुचेरी के मुख्यमंत्रियों, सिंचाई मंत्रियों की ग्यारह बैठकें हुईं, 1972 में एक तथ्यान्वेषण समिति का गठन किया गया।

25-26 अगस्त 1976 को तमिलनाडु के राज्यपाल और कर्नाटक सरकार के बीच इस बात पर सहमति हुई कि दोनों राज्य अपनी नहर व्यवस्था का आधुनिकीकरण करके क्रमश: 100 और 25 टीएमसी जल बचाएँ जिससे नई परियोजनाएँ लागू की जा सकें। बाद में दो अन्य राज्यों ने भी इसमें अपनी सहमति दर्ज की। लेकिन तमिलनाडु में नई निर्वाचित सरकार ने आते ही उस सहमति को मानने से इनकार कर दिया। नतीजन किसी पक्ष ने उस पर अमल नहीं किया। उसके बाद भी दोनों राज्यों के बीच उभयपक्षी वार्ताओं का दौर जारी रहा।

1924 के समझौते में इस बात का उल्लेख था कि मद्रास यानी तमिलनाडु कावेरी के जल से 3 लाख 2 हजार एकड़ अतिरिक्त भूमि की सिंचाई कर सकता है और मैसूर 2 लाख 84 हजार एकड़ अतिरिक्त भूमि सींचने के साथ-साथ कृष्णराज सागर बाँध में जल भण्डार संचित कर सकता था। 1928 से लेकर 1971 तक की अवधि में वास्तव में तमिलनाडु ने 11 लाख 56 एकड़ अतिरिक्त भूमि में सिंचाई की और कर्नाटक ने 3 लाख 68 हजार एकड़ अतिरिक्त भूमि को सिंचाई सुविधाएँ दीं।

8 जनवरी 1990 को सम्बद्ध पक्षों की बैठक में तमिलनाडु के कड़े रवैए के कारण फैसला न हो सका। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिकाएँ भी दायर की गईं। फिर भी बैठकों के आयोजन किये जाते रहे लेकिन 10 मई 1990 को एक समय ऐसा भी आया जबकि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने केन्द्र को यह सूचित कर हैरत में डाल दिया कि अब भविष्य में वह किसी भी बैठक में हिस्सा नहीं लेंगे।

उसके बाद केन्द्र सरकार ने विवाद को हल करने हेतु तमिलनाडु की याचिका पर 1990 में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य न्यायाधीश चित्तोष मुखर्जी की अध्यक्षता में एक ट्रिब्युनल का गठन कर दिया। 25 जून 1991 को ट्रिब्युनल ने एक अन्तरिम आदेश दिया कि कर्नाटक तमिलनाडु को 205 टीएमसी पानी दे।

उसने कर्नाटक को तमिलनाडु को कितना पानी प्रति सप्ताह देना है यह भी निर्धारित कर दिया। लेकिन कर्नाटक ने अपने राज्यपाल से इस आशय का आदेश जारी करवा दिया कि नदी जल का मामला राज्य का विषय है, तमिलनाडु को अन्तरिम राहत देने के लिये ट्रिब्युनल के आदेश पर अमल न किया जाये। उसके बाद केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने राष्ट्रपति को सलाह दी कि मामला कानूनी राय के लिये उच्चतम न्यायालय को सौंप दिया जाये ताकि आगे की कार्यवाही पर विचार हो सके।

1990 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कावेरी नदी जल प्राधिकरण का गठन हुआ जिसमें चारों राज्यों के मुख्यमंत्री सदस्य थे। 2007 में ट्रिब्युनल ने दी अपनी रिपोर्ट में पहले के सभी आदेशों को सही माना और कहा कि कावेरी के पानी में तमिलनाडु को 419, कर्नाटक को 270, केरल को 30 और पुदुचेरी को 7 मिलियन क्यूबिक फीट पानी दिया जाना न्यायोचित है।

2013 में केन्द्र सरकार ने ट्रिब्युनल की रिपोर्ट पर अपनी मुहर लगा दी। अब कर्नाटक का कहना है कि 1924 के समझौते में उसके साथ न्याय नहीं हुआ है। क्योंकि नदी के बहाव के रास्ते में वह पहले पड़ता है, इसलिये कावेरी के पानी पर उसका पूरा अधिकार है। जबकि तमिलनाडु का मानना है कि 1924 के समझौते में कावेरी के पानी में जो उसका हिस्सा तय हुआ था, वह उसे अब भी मिलना चाहिए और सभी पुराने समझौतों का सम्मान किया जाना चाहिए।

उसके अनुसार राज्य में कम बारिश के चलते 40 हजार एकड़ फसल बर्बादी के कगार पर है, इसलिये उसे तुरन्त पानी की जरूरत है। जबकि कर्नाटक की दलील है कि कम बारिश से पहले ही बाँधों में पानी कम है। यदि तमिलनाडु को पानी दे दिया तो राज्य में पीने और सिंचाई के लिये पानी का संकट खड़ा हो जाएगा।

इन हालात में फिलहाल इस संकट का कोई हल निकलने की उम्मीद कम ही है। क्योंकि हर राज्य अपने लिये ज्यादा-से-ज्यादा पानी चाहता है ताकि वह अपने राज्य की जनता के कोप का भाजन न बने। फिर केन्द्र सरकार ने अब नदी जोड़, जल संसाधन, सड़क, उद्योग, ग्रामीण विकास और पर्यटन क्षेत्र की समस्याओं के निपटारे की जिम्मेदारी नीति आयोग को सौंप दी है। ताकि विकास और लम्बे समय से लटकी योजनाओं से जुड़ा कोई पहलू छूट ना पाये।

जाहिर है यह काम इतना आसान नहीं है। इसमें लम्बा समय लगेगा। कारण इन मसलों से जुड़े तकनीकी पहलुओं और पहले की खामियों पर भी सिलसिलेवार विस्तार से चर्चा होगी। फिर इस बात की क्या गारंटी कि सम्बन्धित पक्ष उस पर सहमत ही हों। बीते सौ सालों का इतिहास इसका प्रमाण है।


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