चन्द्रयान-1 मिशन से महत्त्वपूर्ण भू-वैज्ञानिक जानकारियाँ

Submitted by editorial on Sun, 08/05/2018 - 15:30
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Source
विज्ञान, अप्रैल 2009

चन्द्रयान-1चन्द्रयान-1 मानव सभ्यता के विकास के प्रारम्भ से ही आकाश में रात्रि के समय दिखने वाले चाँद, तारे तथा उल्कापिण्ड मानव के लिये कौतूहल तथा जिज्ञासा का विषय रहे हैं। रात में सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर पृथ्वी पर चाँदनी बिखेरते तथा समुद्र में ज्वार का कारण बनने वाले चन्द्रमा को पास से देखने तथा छू लेने भर की लालसा सदैव से मनुष्य के मन में रही है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त रॉकेट तकनीकी के क्रान्तिकारी विकास के साथ ही अंतरिक्ष में मनुष्य के पदार्पण का मार्ग प्रशस्त हुआ। धीरे-धीरे मानवरहित तथा मानवयुक्त मिशनों द्वारा चन्द्रमा के रहस्यों को जानने से सपने भी साकार होने लगे। सत्तर के दशक में अपोलो अभियानों द्वारा चंद्रमा से लायी गई चट्टानों के विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि चंद्रमा की आयु भी पृथ्वी की तरह लगभग 4.5 अरब वर्ष है। चंद्रमा के अधिकांश हिस्से की संरचना हमारी पृथ्वी की बाह्य मेंटल की तरह है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा विकसित चन्द्रयान-1 को चन्द्रमा की 100 कि.मी. की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर भारत भी चन्द्रमा सम्बन्धी अनुसंधान करने वाले अग्रणी राष्ट्रों में शामिल हो गया है। चन्द्रयान-1 के उच्च तकनीकी उपकरण मून इम्पैक्ट प्रोब ने चन्द्रमा की सतह पर भारतीय तिरंगे को भी पहुँचा दिया है।

चन्द्रयान-1 में अनेक प्रकार के कैमरे (सेंसर) विभिन्न महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोगों के लिये लगाये गये हैं जिनकी सहायता से पृथ्वी के एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा की 100 किलोमीटर की कक्षा से चन्द्र सतह की विभिन्न प्रकार की तस्वीरें तथा आंकड़े एकत्रित किये जा सकें। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान सगंठन (इसरो) के चन्द्रयान-1 मिशन केटरेन मैपिंग कैमरा, हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग कैमरा एक्स रे स्पेक्ट्रोमीटर, सिंथेटिक एपर्चर राडार तथा मून आंकड़ों के विश्लेषण से चन्द्रमा का भूरासायनिक, खनिजीय तथा स्थालाकृतिक (टोपोग्राफिकल) मानचित्रण किया जायेगा। चन्द्रयान-1 के कुल 11 पेलोड में 5 एवं भारत तथा 6 अन्य देशों द्वारा विकसित किए गए हैं।

बीसवीं सदी के ऐतिहासिक अपोलो अभियानों के कई दशक बाद 21वीं सदी के पहले दशक में अमेरिका के क्लेमेंटाइन मिशन ने पूरे चन्द्रमा का जो मानचित्रण किया उसमें 100 मीटर गुणा 100 मीटर से बड़े आकार की स्थलाकृतियाँ (टोपोग्राफिकल फीचर्स) ही देखी जा सकी है, इसके अतिरिक्त क्लेमन्टाइन मिशन से चन्द्रमा के केवल आठ प्रतिशत हिस्से का ऐेसा मानचित्रण हुआ जिसमें 30 मीटर आकार की स्थलाकृतियाँ देखी जा सकें। अमेरिकी क्लेमेंटाइन मिशन की तुलना में भारत के चन्द्रयान-1 मिशन के थिमेटिक मैपिंग कैमरे से 5 मीटर गुणा 5 मीटर आकार की स्थलाकृतियाँ (टोपोग्राफिकल फिचर्स) को देखना संभव होगा। इसके अतिरिक्त पूर्व के भू-वैज्ञानिक युगों (जियोलॉजिकल पास्ट) में हुई हलचलों के कारण चन्द्र सतह पर बनी लगभग 5 मीटर से लम्बी संरचनाओं जैसे स्थलानुरेखों तथा भ्रशों (लिनीमेन्ट एण्ड फाल्ट) की मैपिंग भी हो सकेगी। क्लेमेंटाइन मिशन के चित्रों से मानचित्रित सबसे छोटे क्रेटर के लगभग पाँचवें हिस्से के बराबर छोटे क्रेटर्स की मैपिंग भी चन्द्रयान-1 से सम्भव होगी।

अब तक के विभिन्न चन्द्र अभियानों से ज्ञात हुआ है कि चन्द्रमा की सतह की भू-आकृतियों की रचना नदियों, हिमनदों, वायु तथा समुद्र जैसे बाह्यजात भूवैज्ञानिक कारकों से न होकर विगत भूवैज्ञानिक युगों की विवर्तनिकी घटनाओं तथा ज्वालामुखी विस्फोटों से हुई है। विभिन्न आकार के उल्का पिण्डों के समय-समय पर चन्द्र सतह पर गिरने से बहुत छोटे-छोटे से लेकर विशाल क्रेटरों का निर्माण हुआ है। चन्द्रमा पर पृथ्वी के समान वायुमण्डलीय कवच न होने के कारण विभिन्न आकार के उल्कापिण्डो के चन्द्र सतह पर टकराने से निर्मित विभिन्न स्थलाकृतियों (टोपोग्राफी) तथा भूआकृतियों (लैंडफ़ॉर्म्स) के विकास को अंतरिक्षीय अपक्षय (स्पेस वेदरिंग) का एक अद्भुत उदाहरण माना जाता है।

चन्द्रयान-1 के थीमेटिक मैपिंग कैमरे से प्राप्त त्रिमितीय चित्रों (स्टिरियो इमेजेज) का कम्प्यूटर आधारित डिजिटल फोटोग्रामेट्री तकनीक से विश्लेषण कर वैज्ञानिक चन्द्रमा के पहाड़ों, घाटियों, क्रेटरों तथा सतहीय चट्टानों की संरचनाओं का त्रिआयामी (लम्बाई, चौड़ाई तथा ऊँचाई) स्वरूप देख सकेंगे तथा चन्द्रमा के भूवैज्ञानिक एवं भूआकृतिकीय विकास तथा स्थलाकृतियों के निर्माण की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। इसके अतिरिक्त इन आंकड़ों से सौरमण्डल के विकास के बारे में भी कुछ और जानकारी जुटाना सम्भव होगा। चन्द्रयान-1 के थिमेटिक मैपिंग कैमरे से लिये गए चन्द्रमा की सतह के विभिन्न हिस्सों के चित्रों का कम्प्यूटर आधारित इमेज प्रोसेसिंग तकनीकों द्वारा सूक्ष्म विश्लेषण किया जा सकेगा जिससे चन्द्र सतह की विभिन्न सूक्ष्म तथा वृहद भूआकृतियों तथा कुछ मीटर लम्बे भ्रंशों एवं स्थलानुरेखों का मानचित्रण सम्भव होगा।

इन भूआकृतियों भ्रंशों तथा स्थलानुरेखों को कम्प्यूटर आधारित भौगोलिक सूचना प्रणाली या (जी.आई.एस) तकनीक के द्वारा जब चन्द्र सतह के सम्बन्धित क्षेत्रों के त्रिमितीय मॉडलों पर दर्शाया जायेगा तो इस प्रकार के संवर्धित त्रिमितीय मॉडलों से वैज्ञानिकों को चन्द्र सतह की भूआकृतिक विसंगतियों (जियोमारफिक एनोमलीज) तथा बड़े आकार की संरचनात्मक विसंगतियों (स्ट्रक्चरल एनोमलीज) को चिन्हित करने में सहायता मिलेगी। स्थलाकृतियों के विन्यास या आकार में असामान्य परिवर्तन भूआकृतिक विसंगतियों अथवा संरचनात्मक विसंगतियों को इंगित करते हैं तथा इन विसंगतियों में खनिजों के मिलने की अधिक संभावनाएँ होती हैं।

चन्द्रयान-1 का दूसरा महत्त्वपूर्ण संवेदक हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग कैमरा है जिसकी विभेदन क्षमता 80 मीटर है। उच्च स्पेक्ट्रमी सुदूर संवेदन (हाइपर स्पेक्ट्रल रिमोट सेंसिंग) तकनीक के माध्यम से किसी वस्तु या पदार्थ के विशिष्ट स्पेक्ट्रा का उपयोग उस वस्तु का निर्माण करने वाले पदार्थों की पहचान तथा उनकी मात्रा के आंकलन में किया जाता है। इसी अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित चंद्रयान-1 के हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग कैमरे से चन्द्र सतह का प्रारम्भिक खनिज मानचित्रण किया जायेगा।

चन्द्रमा की सतह के खनिज मानचित्रण के लिये चन्द्रयान-1 में एक विशेष सेंसर मून मिनरैलाजी मैपर लगाया गया है। चन्द्रयान-1 के एक अन्य पेलोड ल्यूनर लेजर रेंजिंग इंस्ट्रूमेंट से प्राप्त आंकड़ों से चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के बेहतर मॉडल बनाये जा सकेंगे तथा सतह के विभिन्न क्रेटरों के आकार तथा आयामों का मापन सम्भव होगा। इसके अतिरिक्त घनत्वीय विसंगतियाँ भी मापी जा सकेंगी।

चन्द्रयान-1 का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पेलोड मिनिएटर सिंथेटिक एपर्चर रडार है। रडार संवेदकों (कैमरों से पृथ्वी या चन्द्र सतह को अंधेरे में भी प्रदीप्त किया जा सकता है। रडार तरंगों की इसी विशेषता के कारण चन्द्रमा के स्थायी रूप से अंधकारमय रहने वाले उस हिस्से के बारे में भी जानकारियाँ एकत्रित की जा सकेंगी जो चन्द्रमा की विशिष्ट घूर्णन एवं परिक्रमण अवधि के अजूबे संयोग के कारण कभी सूर्य के सामने नहीं आता है तथा सदैव अंधकारमय रहता है। चन्द्रयान-1 के मिनिएचर सिंथेटिक एपरचर रडार के द्वारा चन्द्रमा की सतह विशेषकर उसके ध्रुवों के स्थायी रूप से छायातित क्षेत्रों में जल की खोज में सहायता मिलेगी।

चन्द्रयान-1 के एक अन्य पेलोड नियर इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर, की सहायता से चन्द्रमा का प्रारम्भिक भूरासायनिक मानचित्रण सम्भव हो सकेगा, जिसके आधार पर चन्द्र सतह पर विभिन्न तत्वों की उपस्थिति एवं सम्भावित वितरण का प्रारम्भिक आकलन सम्भव होगा। इसके अतिरिक्त चन्द्रमा के बड़े इम्पैक्ट क्रेटरों के विभिन्न हिस्सों जैसे केन्द्रीय श्रृंग (सेन्ट्रल पीक), दीवारों, छल्लों, बहिक्षेप या इजेक्टा का मानचित्रण भी सम्भव होगा। जिसके आधार पर चन्द्र सतह की स्ट्रेटोग्राफी का अध्ययन हो सकेगा। नेहरू तारामण्डल की निदेशक एन, रत्नाश्री के अनुसार चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लगभग 2500 मीटर व्यास के वृहदाकार पोल-एटकिन बेसिन का निर्माण एक बड़े उल्कापिण्ड के चन्द्रमा से टकराने से हुआ माना जाता है जिसके कारण चन्द्रमा की पर्पटी के नीचे अवस्थित मेंटल भी बाहर निकली हुई है।

यूरोपियन स्पेस एजेंसी विशेषज्ञ बनार्ड एच, फोइंग के अनुसार चन्द्रयान-1 के नियर इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर से पोल एटकिन बेसिन में यदि पाइरोक्सीन तथा ओलीवाइन जैसे खनिजों के सम्भावित वितरण की अधिक जानकारी प्राप्त होती है तो इसके आधार पर चन्द्रमा की मेंटल की रचना तथा विकास की गुत्थियाँ भी सुलझेंगी। ओलीवाइन को चन्द्रमा की मेंटल में मुख्यता से पाया जाने वाला मिनरल माना जाता है तथा चन्द्र सतह पर इसके वितरण सम्बन्धी जानकारी चन्द्रमा की पर्पटी के विभेदन तथा विकास सम्बन्धी परिकल्पनाओं की सत्यता के लिये आवश्यक होगी।

चन्द्रयान-1 के एक अन्य उपकरण एक्सरे स्पेक्ट्रोमीटर से चन्द्रमा पर मिलने वाले खनिजों की जानकारी हासिल हो सकेगी तथा चन्द्रमा के पर्वतों पर अल्युमिनियम की अधिकता तथा मैग्नीशियम की न्यूनता और घाटियों में मैग्निशियम की अधिकता एवं अल्युमिनियम की न्यूनता सम्बन्धी वैज्ञानिक धारणाओं को पुष्ट करने में सहायता मिलेगी। चन्द्रयान-1 के एक अन्य उपकरण हाई एनर्जी एक्सरे स्पेक्ट्रोमीटर से चन्द्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों में वाष्पशील पदार्थों के पहुँचने की वैज्ञानिक परिकल्पना का परिक्षण भी हो सकेगा। चन्द्रयान-1 के एक अन्य पेलोड सब केव एटम रिफ्लेक्टिंग एनालाइजर (सारा) से सौर विकिरणों के चन्द्र सतह पर टकराने से बने न्यूट्रॉन कणों का अध्ययन किया जायेगा। रेडियेशन डोज मॉनिटर एक्सपेरीमेन्ट चन्द्रयान-1 का एक अन्य पेलोड है। जिसकी सहायता से चन्द्रमा के समीपस्थ अंतरिक्ष में विकिरणों के प्रभाव का अध्ययन किया जायेगा। इसके अतिरिक्त भविष्य में मानवयुक्त चन्द्र मिशनों पर विकिरणों के सम्भावित कुप्रभावों का आंकलन भी किया जा सकेगा।

चन्द्रयान-1 के विभिन्न संवेदकों (कैमरों) द्वारा लिये गए चन्द्र सतह की अब तक की सबसे सूक्ष्म जानकारी देने वाले साबित होंगे। इन उपग्रहीय चित्रों तथा चन्द्रयान-1 के अन्य उपकरणों द्वारा एकत्रित आंकड़ों पर आधारित चन्द्रमा के त्रिमितीय स्थलाकृतिक, भूरासायनिक तथा खनिज मानचित्रों के विश्लेषण से चन्द्रमा की सतह की धूल के गुणों विशेषकर इसकी विकिरण प्रतिरोधक क्षमता, खनिजों की उपलब्धता तथा मृदा के गुणों सम्बन्धी अध्ययन संभव होंगे तथा भविष्य के रोबोटिक तथा मानव मिशनों के उतरने के स्थानों तथा मानव बस्तियों के स्थल चयन में भी सहायता मिलेगी।

इस सदी के दूसरे दशक के अन्त में तथा तीसरे दशक के प्रारम्भ में चन्द्रमा पर प्रस्तावित मानव बस्तियों के लिये खतरनाक सौर विकिरणों से बचाव तथा अपनी आवश्यकता की पूर्ति हेतु आधारभूत ढाँचा तैयार करना सबसे बड़ी चुनौती होगी। यदि विकिरणों से बचाव हेतु मानव बस्तियों को चन्द्रमा की सतह से कुछ फीट नीचे स्थापित करने की योजना पर अमल होता है तो चन्द्र धूल (ल्यूनर डस्ट) की विकिरण प्रतिरोधक क्षमता के मद्देनजर इस ल्यूनर डस्ट को बैगों में भरकर चन्द्र सतह के नीचे बने मानव आवासों को सौर विकिरणों से बचाने हेतु ढकने में किया जा सकता है। चन्द्रयान-1 से प्राप्त चन्द्र धूल सम्बन्धी आंकड़े इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रारंभिक कड़ी होगी।

चन्द्रयान-1 मिशन जहाँ एक ओर चन्द्रमा पर भविष्य में भारत के रोबोटिक तथा मानव मिशनों को उतारने के पहली महत्त्वपूर्ण कड़ी है वहीं दूसरी ओर चन्द्रमा पर भविष्य की मानव बस्तियों तथा प्रयोगशालाओं की स्थापना हेतु महत्त्वपूर्ण आंकड़े जुटाने का सशक्त माध्यम भी साबित होगा।

वैज्ञानिक, रिमोट सेन्सिगं एप्लीकेशन्स सेन्टर, उत्तर प्रदेश, सेक्टर- जी, जानकीपुरम, लखनऊ

(chandrayaan-1 - Important geoscientific information from mission)

 

 

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