चारधाम रोड विकास या विनाश

Submitted by editorial on Thu, 06/14/2018 - 15:18
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केदारनाथ हाइवे के पास कटे पेड़केदारनाथ हाइवे के पास कटे पेड़ आने वाले दो सालों में उत्तराखण्ड को चारधाम को जोड़ने वाली ऑलवेदर रोड की सौगात मिलेगी। ऐसा माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपनों की यह सड़क प्रदेश में आय के सबसे बड़े स्रोत, पर्यटन को बढ़ावा देने, रोजगार सृजन करने, देश में पर्यटन व्यापार से जुड़े बड़े घरानों को आकर्षित करने में मील का पत्थर साबित होगी। इसके पीछे तर्क यह है कि तीर्थ यात्रियों के लिये यात्रा आज की तुलना में सुगम हो जाएगी।

प्रदेश के सुदूर क्षेत्रों में स्थित रमणीक स्थलों में लोगों की पहुँच बढ़ जाएगी और विदेशी सैलानियों की संख्या में भी इजाफा होगा। ये बातें सुनने में बड़ी आकर्षक हैं जिसकी मुखालफत विकास के पैरोकार कर रहे हैं। लेकिन, इस विकास की कीमत क्या होगी यह एक बड़ा सवाल है। क्या विकास का यह मॉडल समावेशी है? हिमालय की पारिस्थितिकी पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या यह गरीबों का आर्थिक विकास है? पर्यावरण हितैषी अथवा विशेषज्ञों के लिये इन सभी सवालों के जवाब नकारात्मक ही हैं।

विकास के इस मॉडल के आर्थिक प्रभाव तो भविष्य की गर्त में हैं लेकिन इसके पारिस्थितिकीय प्रभाव किसी भी तरह से पर्यावरण हितैषी नहीं होंगे यह कहना है प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुरेश भाई का। वे कहते हैं, बड़ी मात्रा में पेड़ों का कटान, रोड निर्माण से निकलने वाले मलबे के प्रबन्धन की खराब व्यवस्था, रोड चौड़ीकरण से खेतीबाड़ी को होने वाला नुकसान, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और घरों को चौड़ीकरण की जद में आने से होने वाला नुकसान आदि इसके प्रत्यक्ष दुष्परिणाम हैं।

सरकारी आँकड़े के अनुसार ऑलवेदर रोड के निर्माण में कुल 47,000 पेड़ काटे जाने हैं। अब तक 25,000 पेड़ काटे जा चुके हैं और यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में लम्बित है।

इन पेड़ों में देवदार, चीड़, स्प्रूस आदि बेशकीमती पेड़ हैं। इस नुकसान की भरपाई आसानी से सम्भव नहीं है क्योंकि इनका विकास प्राकृतिक रूप से होता है जिसमें सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं।

इतना ही नहीं पर्यावरणविद बताते हैं कि पहाड़ों में प्राकृतिक रूप से पनपे पेड़ तीखे ढलानों पर होते हैं इसलिये एक पेड़ को काटने का मतलब है 10 अतिरिक्त पेड़ों का नुकसान।

पेड़ों के कटने से झाड़ियों का सूर्य की रोशनी से सीधा सम्पर्क होता है और वो सूखने लगती हैं। झाड़ियों के सूखने से मिट्टी की नमी कम हो जाती है जिससे वर्षाकाल में मिट्टी का अपरदन तेजी से होने लगता है और पेड़ों की जड़ें उथली हो जाती हैं और उनका विनाश होने लगता है।

पेड़ों के इस विनाश की प्रक्रिया का सीधा सम्बन्ध क्षेत्र की पारिस्थितिकी से है। वन में रहने वाले जीव जन्तुओं के अस्तित्व खतरे में पड़ जाएँगे, बेशकीमती जड़ी-बूटियों का नुकसान होगा, गर्मी में इजाफा होगा जिसका प्रभाव इलाके के ग्लेशियर समूहों पर पड़ेगा, नदी जलप्रवाह क्षेत्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और लोगों का विस्थापन भी होगा जिससे इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी को गम्भीर नुकसान होगा।

रोड के निर्माण से सम्पूर्ण इलाके में वाहनों की आवाजाही में इजाफा होगा जिससे वायु प्रदूषण बढ़ेगा। वहीं, पेड़ों की संख्या में आई कमी क्षेत्र में ग्रीनहाउस गैसों के अवशोषण (वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी आँकड़े के अनुसार भारतीय वन कुल उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा का दस प्रतिशत अवशोषित कर लेते हैं) की प्राकृतिक व्यवस्था को भी प्रभावित करेगी। इतना ही नहीं पेड़ों के कटान और सड़क निर्माण का असर जल के प्राकृतिक स्रोतों जैसे एक्वीफर आदि पर भी पड़ेगा।

गंगोत्री हाइवे पर चिन्हित देवदार के पेड़ पेड़ और झाड़ियों के जड़ मिट्टी के जल अवशोषण क्षमता का विकास करते हैं और इन्हीं के माध्यम से प्राकृतिक जलस्रोत रिचार्ज होते हैं। सुरेश भाई कहते हैं, “हिमालय का क्षेत्र बहुत नाजुक है और इससे छेड़छाड़ के गम्भीर परिणाम होंगे”।

उत्तराखण्ड स्थित हिमालय के अधिकांश भाग की भौगोलिक संरचना हिमालय के अन्य हिस्सों की तुलना में अलग है। भागीरथी, अलकनंदा, मन्दाकिनी और काली नदियों का क्षेत्र मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MTC) में पड़ता है जो विवर्तनिक या टेक्टोनिक रूप से काफी अशान्त है। इस क्षेत्र में अमूमन भूस्खलन की घटनाएँ और भूकम्प के झटके महसूस किये जाते हैं।

उत्तराखण्ड डिजास्टर मैनेजमेंट एंड मिटिगेशन सेंटर के पास उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार पिछले दो वर्षों में प्रदेश के विभिन्न इलाकों में भूकम्प के 50 से ज्यादा झटके महसूस किये जा चुके हैं। हालांकि, इन भूकम्पीय झटकों की रिक्टर स्केल पर तीव्रता अधिक नहीं थी लेकिन सिस्मिक जोन चार और पाँच में पड़ने वाले ये क्षेत्र सक्रिय भूकम्पीय प्रभाव में है।

हिमालय अभी निर्माण की प्रक्रिया में ही है और भूकम्पीय झटकों से पहाड़ों की चट्टानें काफी कमजोर हो गई हैं। देश के जाने-माने जिओलॉजिस्ट के एस वाल्दिया भी हिमालय के इस क्षेत्र के चट्टानों की क्षणभंगुरता को भूस्खलन का एक बड़ा कारण मानते हैं।

विवर्तनिक रूप से अति सक्रिय होने और मानसून के समय वर्षा की अत्यधिक मात्रा के कारण इस क्षेत्र में भूस्खलन की घटनाएँ आम हैं। पहाड़ों में इतने बड़े पैमाने पर रोड निर्माण के लिये किये जा रहे विस्फोट भी भूस्खलन की समस्या को बढ़ा सकते हैं।

पहाड़ी क्षेत्रों में रोड निर्माण करने से होने वाले प्रभावों को रेखांकित करने सम्बन्धित वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी किये गए एक मैन्युअल में भी इस बात की चर्चा की गई है। मैन्युअल के अनुसार ब्लास्ट भूस्खलन के साथ ही भूकम्प के समय गम्भीर नुकसान पहुँचा सकते हैं। 2013 में आई प्राकृतिक आपदा की विभीषिका का कारण भी एक ही दिन में 400 मिलीमीटर बारिश के कारण ग्लेशियल लेक का फटना इसका एक ज्वलन्त उदहारण है। इस घटना में 5000 से ज्यादा लोगों की जाने गईं थीं।

सड़क निर्माण से निकलने वाले मलबे का प्रबन्धन भी एक बड़ी समस्या है। सुरेश भाई ने बताया कि वे और उनके कई साथियों जिनमें जानी-मानी पर्यावरणविद राधा बहन भी शामिल थीं ने ऑलवेदर रोड के निर्माण से सम्बन्धित इलाकों का भ्रमण किया था। इस दौरान उन्होंने पाया कि भागीरथी में बड़े पैमाने पर मलबा डाला जा रहा था। उन्होंने कहा कि यह काफी गम्भीर मसला है। मलबा प्रबन्धन के लिये सड़क के किनारे रिटेनिंग वाल बनाकर उसमें इसे भरने के अतिरिक्त उसके ऊपर पेड़ लगाए जाने चाहिए। मलबा को नदी में यूँ ही डाल देने से बाढ़ के समय वे काफी तबाही पैदा करेंगे जो 2013 में आई प्राकृतिक आपदा से साबित ही हो चुका है।

ऊपर वर्णित सभी समस्याओं के अतिरिक्त एक बड़ा मसला सड़क निर्माण की जद में छोटे किसानों की जमीन, घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का आना है। सड़क निर्माण के लिये वर्तमान सड़क सहित कुल 24 मीटर जमीन का अधिग्रहण किया जाना है।

चूँकि पहाड़ों में उपलब्ध जमीन की चौड़ाई काफी कम होती है इसीलिये काफी जमीनें, घर दुकान आदि सड़क निर्माण की भेंट चढ़ जाएँगे। इससे प्रभावित लोगों का कहना है कि पहाड़ों में इतनी चौड़ी सड़क के निर्माण की कोई जरूरत नहीं।

व्यवसाय से जुड़े संदीप नेगी ने बताया कि सड़क चौड़ीकरण से लोगों के रोजगार का बहुत नुकसान होगा और खेती-बाड़ी भी चौपट होगी इसीलिये सरकार को चाहिए कि प्रभावित होने वाले लोगों के लिये कोई वैकल्पिक व्यवस्था करे। सुरेश भाई ने भी बताया कि लोगों से बातचीत करने के क्रम में यह सामने आया है कि वे पूरी सड़क को चौड़ा करने के बजाय पुरानी सड़क के ही संकरे भागों का ही चौड़ीकरण चाहते हैं जिससे उनके काम धंधे प्रभावित न हों।

अब सवाल यह है कि क्या विकास का यह मॉडल समावेशी है और इलाके के लोगों के सामाजिक आर्थिक विकास में मददगार साबित होगा? इन सवालों के जवाब भी नकारात्मक हैं। लोगों का मानना है कि बेघर हुए लोग के पास पलायन के अलावा शायद ही कोई दूसरा विकल्प हो। उनके काम धंधे भी प्रभावित होंगे।

बद्रीनाथ हाइवे पर पीपलकोटि के निकट चिन्हित पेड़ जमीन की कमी के कारण उसकी कीमत में बेतहाशा वृद्धि होगी जिसका असर भूमिहीन मूल निवासियों पर पड़ेगा। आगन्तुकों की संख्या में वृद्धि से व्यापारिक गतिविधियों में इजाफा होगा जिसका लाभ या तो बाहर से आये लोग उठा पाएँगे या फिर पहले से आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग। जहाँ तक समावेशी विकास का प्रश्न है उसे भी हासिल करना टेढ़ी खीर साबित होगा।

आवागमन बढ़ने से प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास रोकना तब-तक सम्भव नहीं हो पाएगा जब तक सरकार कोई मानदण्ड न निर्धारित करे और उसका कड़ाई से पालन न हो। हालांकि, सिटीजन फॉर ग्रीन दून नामक एनजीओ ने चारधाम रोड निर्माण में होने वाले पेड़ों के कटान और उससे होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की सम्भावना को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में एनवायरनमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट के लिये याचिका दायर किया है। एनजीओ का दावा है कि केन्द्र सरकार ने रोड निर्माण के पहले एनवायरनमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट नहीं करवाया है। यह मामला अभी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में लम्बित है।

आर्थिक विकास के मामले में हम भले ही नई ऊचाइयों को छू रहे हैं लेकिन यह विकास पर्यावरण के नुकसान की कीमत पर नहीं होनी चाहिए जो एक बड़ी सम्पदा है। ताजा रिपोर्ट बताते हैं कि भारत के विभिन्न हिस्सों में बढ़ते विभिन्न तरह के प्रदूषण से लोग स्वास्थ्यगत समस्याओं की चपेट में आ रहे हैं। पर्यावरण के ह्रास से ही नदियाँ नालों में बदलती जा रही हैं, उत्तराखण्ड से निकलने वाली गंगा, यमुना आदि नदियाँ भी इससे अछूती नहीं हैं। अतः किसी भी योजना के संचालन में पर्यावरणीय नियंत्रण को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

ऑलवेदर रोड से सम्बन्धित फैक्ट:-

 

रोड की कुल लम्बाई

889 किलोमीटर

कुल खर्च

11,700 करोड़  

डेड लाइन

मार्च 2020

निर्माण के चरण

सात

कुल कल्वर्ट

3721

कुल बाइपास

12

भूस्खलन क्षेत्र

29

टनल (4.5 किलोमीटर)

1400 करोड़

 

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