लेखक की और रचनाएं

SIMILAR TOPIC WISE

Latest

गांधी शांति प्रतिष्ठान का वार्षिक व्याख्यान


डॉ. रामांजनेयुलू जी.वी. गांधी शांति प्रतिष्ठान का वार्षिक व्याख्यान देंगे

विषय :- प्रकृति, किसान और हम - एक स्वस्थ त्रिकोण के लिये कुछ सामाजिक विचार

स्थान :- गांधी शांति प्रतिष्ठान
तारीख :- 30 जनवरी 2017
समय :- 3 बजे

लगभग 30 साल से गांधी शांति प्रतिष्ठान की वार्षिक व्याख्यानमाला में महत्त्वपूर्ण लोगों ने अपनी बात रखी है। कई सामाजिक कार्यकर्ता, विचारक, लेखक, कलाकार, वैज्ञानिक और दार्शनिक इस मंच की शोभा बढ़ा चुके हैं।

इस माला की 42वीं कड़ी का व्याख्यान देंगे प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामांजनेयुलू जी.वी.। उनके अनेक मित्र उन्हें रामू के नाम से पुकारते हैं। उनके काम की विशेषता है संकट में घिरे किसानों के लिये व्यावहारिक समाधान खोजना। हमारे किसान और हमारी खेती जिस गहन संकट से घिरे हुये हैं, उससे रामूजी का सीधा परिचय है, क्योंकि वे कई वर्षों से किसानों के साथ देश के कई हिस्सों में सीधे काम कर रहे हैं।

रामूजी अपने भाषण में हमें उन दो तरह के सम्बंधों के बारे में बताएँगे जो खेती के लिये किसी भी तकनीक, किसी भी बाजार से ज्यादा महत्त्व रखते हैं।

1. वे याद दिलाएँगे कि खेती प्रकृति पर ही निर्भर होती है, चाहे हम कितने भी बनावटी रसायन और मशीनें बना लें। अगर हमारी खेती प्रकृति की अवमानना करती रही तो हमारे संकट और गहरे ही होंगे। देश के कई हिस्सों से उदाहरणों के साथ रामूजी कुछ ऐसे विचार रखेंगे जिनसे हमारी मिट्टी अपने सहज, उपजाऊ रूप में ही रहे।

2. किसानों के आपसी सम्बंध और उपभोक्ताओं से रिश्तों में सामाजिकता जरूरी है। यह भाव भी, कि हम एक ही समाज का हिस्सा हैं। हमारे यहाँ खेती एक सामाजिक कर्म रही है। इस सामाजिकता में तकनीक, साधन, शोध और जानकारी के संस्कार सहज सम्बंधों में दिये गये हैं। आज किसान को बाजारों और कम्पनियों को सौंप देने की बात चल रही है। लेकिन बाजार केवल उन्हीं किसानों और ग्राहकों की सेवा करेगा जिनकी जेब भारी है। रामूजी का दायरा उन किसानों का है जो बाजार और सरकार के घेरे से बाहर हैं।

रामूजी कार्यकारी निदेशक हैं तेलंगाना के सिकंदराबाद में स्थित एक सामाजिक संस्था के जो किसानों के साथ काम करती है। नाम है ‘सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर।’ भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान से डॉक्टरेट हासिल कर वे सात साल हैदराबाद में कृषि वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत रहे। फिर वर्ष 2004 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी, किसानों के साथ सीधे जुड़ कर कुछ सार्थक और उपयोगी काम करने के लिये। सबसे पहले उन्होंने एक गाँव के सभी किसानों को यह दिखलाया कि बिना महँगे और जहरीले बाजारू कीटनाशकों के भी फायदेमंद खेती की जा सकती है। वह भी कपास जैसी मुश्किल फसल में। फिर तो इस काम में राज्य सरकार भी लग गई। वर्ष 2005-10 के बीच राज्य में बाजारू कीटनाशकों की बिक्री आधी रह गई।

महात्मा गांधी उत्पादकों और ग्राहकों के बीच जैसे सामाजिक सम्बंधों की बात की थी, उन्हीं के आधार पर रामू किसानों और उपभोक्ताओं के बीच आपसदारी बढ़ाने में जुटे हुये हैं। उनके प्रयोजन का नाम है ‘सहज आहारम’ जो किसान सहकारी दलों को ग्राहकों से सहज रूप में जोड़ने का काम करती है।

Reply

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
4 + 1 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.