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कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा : भरी बारिश में जल संकट


. तेजी से बिगड़ते पर्यावरण के नुकसान अब हमें साफ़–साफ़ दिखने लगे हैं। इस मानसून में देश के अलग–अलग हिस्सों में कहीं भयावह बाढ़ के हालातों का सामना करना पड़ रहा है तो कहीं लोग पीने के पानी तक को मोहताज हुए जा रहे हैं। मानसून का आधे से ज़्यादा मौसम बीत गया है लेकिन इतनी भी बारिश नहीं हुई है कि नदी–नाले, कुएँ–बावड़ी और तालाब भर सकें। अकेले मध्यप्रदेश के आधे से ज़्यादा जिलों में पर्याप्त बारिश नहीं हो सकी है। कुछ दिनों में हालात नहीं सुधरे तो स्थिति बिगड़ सकती है। अभी यह दृश्य है तो इस पूरे साल पानी के भयावह संकट की कल्पना से ही सिहरन होने लगती है।

मध्यप्रदेश के मालवा–निमाड़ इलाके में जहाँ कुछ सालों पहले तक 'पग–पग रोटी, डग–डग नीर' से पहचाना जाता था, आज हालत यह हो चुकी है कि इस इलाके और आस-पास के करीब 20 जिलों में अभी से पानी को लेकर कोहराम शुरू हो गया है। यहाँ एक जून से लेकर 15 अगस्त तक महज सामान्य से 20 फीसदी बारिश ही हुई है। यहाँ के तमाम जलस्रोत सूखे पड़े हैं। नदियों में अब तक एक बार भी जोरदार बाढ़ तो दूर गंदगी भी नहीं बह सकी है। तालाबों के तल नजर आ रहे हैं। प्रदेश के पूर्वी इलाके में 15 तथा पश्चिमी इलाके में 17 फीसदी तक सामान्य से कम बारिश हुई है। जो बारिश हुई भी है, वह तेज नहीं होने से जलस्रोत नहीं भरे जा सके हैं। हालाँकि अभी बारिश का डेढ़ महीना बाकी है लेकिन मौसम विभाग के मुताबिक फिलहाल भारी बारिश की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। उधर बुन्देलखण्ड के ग्वालियर, शिवपुरी और श्योपुर में तो स्थिति और भी बदतर है, यहाँ अब तक सामान्य से 35-40 फीसदी तक कम बारिश हुई है। नर्मदा, क्षिप्रा, कालीसिंध, चंबल, बेतवा आदि बड़ी नदियों सहित इनकी सहायक दर्जनों नदियाँ सूखकर कंकाल रूप में है।

मालवा के धार, देवास, इंदौर, उज्जैन, शाजापुर में मानसून के दौरान इस दफा पहली बार है कि आधा अगस्त बीत जाने के बाद भी जलस्रोत सूखे पड़े हैं। कम बारिश से यहाँ के लोगों के चेहरे पर अभी से चिंता की लकीरें खींच गई है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग इंदौर के अधीक्षण यंत्री राजेन्द्र कुमार जैन बताते हैं कि मालवा–निमाड़ के अधिकांश जिलों में हालत ठीक नहीं है। यहाँ औसतन 40 से 45 इंच बारिश होती है लेकिन इस बार अब तक इससे आधी भी नहीं हो सकी है। यदि अगले 15 दिनों में जोरदार बारिश नहीं हुई तो पीने के पानी की स्थिति बिगड़ सकती है। जोरदार बारिश नहीं होने से जलस्रोत रीते हैं और भूजल भंडारण में भी बढ़ोतरी नहीं हुई है। ऐसे जिलों में नवंबर–दिसम्बर से ही पीने के पानी की समस्या बढ़ सकती है। फिलहाल तीन–चार महीने का ही पानी संग्रहित है।

इंदौर, देवास, खंडवा में मात्र तीन से चार महीने का ही पानी बचा है जबकि औसत से कम बारिश के बाद भी अलीराजपुर, झाबुआ, खरगोन, बुरहानपुर, मंदसौर और रतलाम के जलाशयों में छह महीने तक का पानी है। अनूपपुर, बालाघाट, छिंदवाड़ा, डिंडौरी, मंडला, नरसिंहपुर, सिवनी, टीकमगढ़, मुरैना, उमरिया, अशोकनगर, बैतूल, भोपाल, देवास, शाजापुर और धार जिलों में अभी सामान्य से 20 फीसदी तक कम बारिश दर्ज हुई है।

अब बड़ा सवाल यह है कि सरकारों के लिये गर्मियों के तीन–चार महीने में ही लोगों को पीने का पानी मुहैया करा पाना मुश्किल होता है तो ऐसे में सात–आठ महीनों तक पानी का प्रबंध कैसे हो सकेगा। धार और देवास जिले फिलहाल डार्क ज़ोन में आ गए हैं। सरकार ने इसके लिये एहतियाती कदम उठाना भी शुरू कर दिया है। इंदौर महानगर की 70 फीसदी आबादी पीने के पानी के लिये नर्मदा पर निर्भर है। ऐसे में नदी में पानी कम होने से चिंता बढ़ रही है। नर्मदा से 360 एमएलडी पानी हर दिन यहाँ आता है, इसे गर्मियों में 540 एमएलडी तक करने का विचार था लेकिन अब हर दिन 360 एमएलडी पानी ले पाना भी चिंता का सबब है। एक अन्य स्रोत यशवंत सागर में भी लगातार पानी कम हो रहा है। 29 गाँवों में अभी से पेयजल संकट गहराने लगा है।

उज्जैन में पेयजल के मुख्य स्रोत गंभीर बाँध की क्षमता 2250 मिलियन क्यूबिक फीट है। लेकिन अभी मात्र दसवां हिस्सा 225 मिलियन क्यूबिक फीट पानी ही बचा है। इसमें भी सौ मिलियन क्यूबिक फीट डेड स्टोरेज घटा दें तो महज 125 मिलियन क्यूबिक फीट पानी शहर के लिये मात्र 30 दिन ही बाँटा जा सकता है।

शाजापुर जिले को जल अभावग्रस्त घोषित कर विभिन्न जलस्रोतों के पानी को सिर्फ़ पेयजल के लिये सुरक्षित करने के आदेश दिए गए हैं। अब तक ऐसा गर्मियों में किया जाता रहा है। यह पहली बार है कि भरी बारिश में ऐसा सरकारी फरमान सुनाना पड़ा है। अब तक केवल 15 इंच बारिश हुई है। शाजापुर में पानी संकट की भयावहता इसी से आंकी जा सकती है कि यहाँ का सबसे बड़ा पेयजल स्रोत चीलर बाँध की कुल क्षमता 23 फीट है। हर साल बारिश में इसके पूरा भर जाने से शाजापुर शहर की करीब 80 हजार आबादी को पानी प्रदाय किया जाता रहा है। अभी इसमें बहुत कम पानी बचा है। बीते साल के संग्रहित पानी के सामान्य स्तर से भी चार फीट नीचे पहुँच गया है। वैसे डेड स्टोरेज के बाद का पानी उपयोग नहीं किया जाता है लेकिन इस बार हालत दूसरी है। अब शहर में चार दिन छोड़कर पानी वितरण किया जाएगा। पानी को लेकर अभी से झगड़ों की शिकायतें पुलिस के पास पहुँचने लगी है।

इसी तरह यहाँ के लखुन्दर बाँध का पानी भी बहुत कम हो जाने से देवास में नोट छापने के कारखाने बैंक नोट प्रेस के लिये पानी पर भी खतरा मँडराने लगा है। अब तक बाँध से पाइपलाइन के जरिए बीते 15 सालों से लगातार पानी मिलता रहा है लेकिन इस बार शाजापुर प्रशासन ने अभी से नोट प्रेस को पानी उपलब्ध करा पाने में असमर्थता बता दी है। बाँध से हर साल नोट प्रेस को 1, 314 एमक्यूएम पानी दिया जाता है। अभी बाँध के डेड स्टोरेज में 0.9 एमक्यूएम पानी ही बचा है। ऐसे में इससे नोटों की छपाई का काम भी बाधित हो सकता है। शाजापुर जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री राजेश पटवा के मुताबिक बाँध की कुल क्षमता 30. 65 एमक्यूएम की है लेकिन पहली बार अल्प वर्षा से ऐसे हालात बने हैं। बीएनपी प्रशासन को इस सम्बंध में अवगत कराया है। 30 अगस्त के बाद हम पानी देने की स्थिति में नहीं होंगे।


बागली के किसान तथा मालवा को बचाने के लिये नर्मदा को कालीसिंध से जोड़ने के लिये आन्दोलन करते रहे कुरिसिंगल जोशी मानते हैं कि यह पूरे इलाके के लिये खतरे की घंटी है। अब मालवा–निमाड़ अपनी हरियाली तासीर छोड़कर मरुस्थल में तब्दील हो रहा है। हमें प्रकृति की चेतावनी को समझना होगा। पर्यावरण और पानी बचाने के कामों को अपनाना होगा तभी हम पानी सहेज सकेंगे।

एक तरफ पानी का इतना बड़ा संकट झेलने के बाद भी शाजापुर में अब तक रूफ वाटर हार्वेस्टिंग को लेकर कहीं कोई गंभीरता दिखाई नहीं देती। 12-14 हजार मकानों वाले इस नगर में बारिश के पानी को सहेजने का कोई जतन नहीं है। बीते चार सालों में यहाँ केवल 52 हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाए गए, उनमें भी आधे से ज़्यादा खराब हो चुके हैं। इस दौरान शहर में करीब एक हजार से ज़्यादा नए निर्माण भी हुए हैं। नगर पालिका सिस्टम लगाने की सहमति पर ही मकान निर्माण की अनुमति देती है लेकिन कोई इसके प्रति गंभीर नहीं है। अब जिला कलेक्टर सिस्टम नहीं लगाने वालों पर जुर्माने की तैयारी कर रही है। इस सिस्टम से एक हजार स्क्वेयर फीट की छत से हर साल 70 से 80 हजार लिटर पानी जमीन की रगों में भेजा जा सकता है, जो जमीनी पानी के भंडार को बढ़ाता है।

देवास में हर साल पानी की चिंताजनक स्थिति रहती है। इस बार भी निगाहें नर्मदा–क्षिप्रा लिंक पर ही लगी हैं। शहर के एक बड़े हिस्से की प्यास बुझाने वाला राजानल तालाब सूखा पड़ा है। लिंक योजना से सरकार ने देवास के औद्योगिक इलाके को भी 23 एमएलडी पानी देने का निर्णय किया है, ऐसे में शहर के लोगों को पानी कैसे मिल सकेगा। यह सवाल अभी से उठने लगा है। करोड़ों की लागत से तैयार क्षिप्रा जलावर्धन योजना भी पानी नहीं होने से फायदा नहीं दे पा रही है। यह सिर्फ़ लिंक योजना का पानी रोकने के काम आ रहा है।

कई जगह तो खेत में खड़ी फसलों पर भी संकट है। देवास जिले के हरणगाँव में पानी की खेंच से कीड़ों का प्रकोप बढने पर किसान खुद अपनी फसल मवेशियों से चरवा रहे हैं या कल्टीवेटर चलाने को मजबूर हैं। सोयाबीन की फसल में पीला मोजेक लगने से यहाँ कई किसानों की फसल चौपट हो गई है।

जिले के बागली अनुभाग में 1 जून से अब तक लगभग 24-25 इंच बारिश रिकार्ड हो चुकी है लेकिन नदी-तालाबों के खाली रह जाने से लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। पुराने लोगों की मानें तो अगस्त माह में सूखे कुएँ नदी तालाब उनके जीवन काल की पहली घटना है और मालवा–निमाड़ के लिये खतरे की निशानी। सरदार सिंह काग मानते हैं कि प्राकृतिक रूप से समृद्ध मालवा में औसत बारिश से कम बारिश पहले भी हुई है लेकिन कभी इतनी कम नहीं रही कि जलाशय सूखे ही रह जाएँ। पिछले वर्ष की तुलना में 2-4 इंच कम बारिश है पर जलस्रोतों में बहुत कम पानी पहुँचना चिंताजनक है।

बागली अनुभाग में तालाबों से सैकड़ों गाँवों में पेयजल आपूर्ति तथा दस हजार हेक्टेयर में नहरों से सिंचाई होती है यहाँ के 9 बड़े सरकारी तालाबों में से दो पनकुआँ व भीकुपुरा पूरे सूखे पड़े हैं, जबकि पिछली बारिश में इनमें क्रमशः 49 व 57 फीसदी पानी भरा था। अन्य 6 तालाब अब तक दस फीसदी भी नहीं भर पाए हैं। पारस तालाब अब तक 5.8 प्रतिशत ही भरा है, जबकि बीते साल 52 प्रतिशत भरा था। इस पर 24 गाँवों में पेयजल और हजारों हेक्टेयर रकबे में सिंचाई निर्भर है। सबसे बड़ा चन्द्रकेश्वर तालाब की कुल क्षमता 1205 फीट है। पिछली बारिश में 10 अगस्त तक 80 फीसदी जल भराव था जबकि अभी मात्र 5 फीसदी पानी है। यहाँ सिंचाई के साथ मछली पालन भी होता है। कूप तालाब में 10 फीसदी ही पानी भरा है जबकि पिछले साल 77 फीसदी भरा था।

इसके पानी का उपयोग भी पीने तथा सिंचाई के लिये होती है। पनकुआँ तालाब बीते साल लबालब सौ फीसदी भरा था लेकिन अब तक दस फीसदी ही भर पाया है। ढिगरखेड़ा तालाब बीते साल 77 फीसदी तो इस बार 2.4 फीसदी और महिगाव तालाब मात्र 36% भरा है। बागली के पास कालीसिंध नदी का उद्गमस्थल बरझाई में भी सूखे जैसे हालात हैं। यहाँ बारिश की बेरुखी से कालीसिंध नदी सहित छोटी नदियाँ और नाले भी सूखे पड़े हैं। यह क्षेत्र परम्परागत रूप से खेती आधारित है। यहाँ पानी की कमी का असर समूचे जन-जीवन पर पड़ना तय है। पीने के पानी के साथ खेती के लिये पानी नहीं होने से लोगों को अकाल-सी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। पारस तालाब पर तैनात अधिकारी कपिल काग बताते हैं कि इस बार पारस से सिंचाई तो दूर 24 गाँवों को पीने का पानी पहुँचाने में भी परेशानी होगी। अभी से पानी की मात्रा कम कर दी गई है। 2 की जगह 1.6 एमएलडी पानी ही दे पा रहे हैं। सिंचाई विभाग के यंत्री श्रीमाली बताते हैं कि नहरों से सिंचाई के लिये पानी छोड़ा जाना संभव नहीं हो सकेगा। गौरतलब है कि क्षेत्र के ज्यादातर किसान गेहूँ, चने और कपास की फसलों के लिये नहरों के पानी पर ही निर्भर रहते हैं।

बागली के किसान तथा मालवा को बचाने के लिये नर्मदा को कालीसिंध से जोड़ने के लिये आन्दोलन करते रहे कुरिसिंगल जोशी मानते हैं कि यह पूरे इलाके के लिये खतरे की घंटी है। अब मालवा–निमाड़ अपनी हरियाली तासीर छोड़कर मरुस्थल में तब्दील हो रहा है। हमें प्रकृति की चेतावनी को समझना होगा। पर्यावरण और पानी बचाने के कामों को अपनाना होगा तभी हम पानी सहेज सकेंगे।

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