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हाड़ौती क्षेत्र में जल के ऐतिहासिक स्रोत (Traditional sources of water in the Hadoti region)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

प्राचीनकाल से आधुनिक समय तक मानव अभिव्यक्ति के साधनों में मिट्टीपट, मुद्रा, ताम्र पत्र, पट्टिकाएँ और स्तम्भ आदि इतिहास का बोध कराते रहे हैं। प्रारम्भ में अक्षर ज्ञान के अभाव में मनुष्य ने अपनी अभिव्यक्ति शैलचित्रों में व्यक्त की थी परन्तु जैसे-जैसे अक्षर ज्ञान का विकास प्रारम्भ हुआ वैसे ही मनुष्य ने अभिव्यक्ति के साधनों में शैलचित्रों के स्थान पर शब्दों को पत्थर पर लिखना शुरू किया। शब्दोत्कीर्ण पत्थर ही शिलालेख के नाम से प्रतिष्ठित हैं।1 ये शिलालेख शिलाओं, प्रस्तर पट्टों, भवनों या गुफाओं की दीवारों, मन्दिरों के भागों, स्तूपों, स्तम्भों, मठों, तालाबों, बावड़ियों तथा खेतों के बीच गढ़ी हुई शिलाओं पर बहुधा मिलते हैं। इनकी भाषा संस्कृत, हिन्दी, राजस्थानी और फारसी तथा उर्दू में समय के अनुकूल प्रयुक्त हुई है। इनमें गद्य और पद्य दोनों का समावेश दिखाई देता है।

अभिलेख मानव जीवन के साक्षात दर्पण हैं। यह सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश ही नहीं डालते अपितु आने वाले भविष्य के निर्माण हेतु प्रेरणा भी प्रदान करते हैं। मनुष्य अपनी गतिविधियों को प्राचीन काल से ही कहीं न कहीं अंकित करता रहा है। कहीं शिलालेख के रूप में, कहीं ताड़ पत्रों पर तो कहीं चर्म पर्णों पर। अन्ततः कागज के आविष्कार के पश्चात मानव ने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम कागज को बनाया। आधुनिक पुरालेख राजकीय अथवा निजी संग्रहों में सुरक्षित ऐसे ही साधन हैं जो इतिहास हेतु अत्यन्त उपयोगी हैं।2

पुरातात्विक सामग्री को अभिलेख, दान पत्र, मूर्तिलेख, मुद्राएँ आदि में विभाजित किया गया है। ऐतिहासिक साहित्य में कई भाषाओं में काव्य साहित्य, ऐतिहासिक ग्रंथ, तवारीखो तथा यात्रा-वृतान्त सम्मलित है। कला में भित्ति चित्रपट, तस्वीर तथा चित्रित ग्रन्थों को समावेशित करते हैं। पुरालेख के अन्तर्गत हिन्दी, राजस्थानी व अंग्रेजी में लिखित वह सामग्री मिलती है जो पत्रों, बहियों, पट्टों, फाइलों, फरमानों आदि के रूप में उपलब्ध है एवं वर्तमान कालीन ग्रन्थ सभी भाषाओं में पत्र पत्रिकाओं, गजेटियर्स, रिपोर्ट आदि में मिलते हैं। हाड़ौती क्षेत्र में जल के स्रोतों पर शिलालेख अंकित किये गये हैं जो उनके निर्माता एवं निर्माण के सम्बन्ध में जानकारी देते हैं ये शिलालेख निम्नांकित हैः-

(क) हाड़ौती के जल स्रोतों पर उपलब्ध शिलालेख
(अ) बून्दी के शिलालेख
कवाल जी का शिलालेख (1288 ई.)


हाड़ौती के बून्दी जिले के इन्द्रगढ़ से पूर्व दिशा में 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित प्राचीन कपिलेश्वर मन्दिर के सामने स्थित कुण्ड की ताक में एक शिलालेख 1288 ई. का अंकित है। इस लेख में 39 श्लोक हैं, जिनको 29 पंक्तियों में उत्कीर्ण किया गया है। इस लेख की भाषा संस्कृत व लिपि देवनागरी है। इस प्रशस्ति का रचनाकार राजा हम्मीर के दरबार में पुराणवाचक के पद पर आसीन वेजादित्य था। इस शिलालेख में चौहान वंश का गुणगान किया गया है। जिसमें कवाल जी के निकट बहने वाली नदियों के पौराणिक नाम चक्रवातिनी और मन्दाकिनी का वर्णन है। मन्दिर के सामने स्थित कुण्ड का प्राचीन नाम ज्ञानवापी कुण्ड है।3 लाखेरी रेलवे स्टेशन से लगभग 15 किलो मीटर की दूरी पर दक्षिण दिशा में चम्बल नदी के किनारे स्थित घाट का प्राचीन नाम झम्पायथा घाट है। कवाल जी के निकट बहने वाले नाले का नाम केनुमुख है। इन सबका उल्लेख शिलालेख में है।

व्यासों की बावड़ी का लेख (1600 ई.)

व्यासों की बावड़ी का लेख (1600 ई.)


कोटा से सवाईमाधोपुर की ओर जाने वाले रेलमार्ग पर बून्दी से 1 मील की दूरी पर लाखेरी नामक ग्राम में यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी की ताख में एक प्रस्तर शिलालेख लगा हुआ है, जिसमें वर्णित है कि बून्दी के राजा भोज के शासनकाल में व्यास सन्तदास द्वारा इस बावड़ी का निर्माण वैशाख सुदी 12 सोमवार, 1600 ई. में करवाया गया था। इस शिलालेख का लिपिकार सन्तदास का सेवक गंगाधर दास था। इस लेख का आकार 13 x 12 वर्ग इंच तथा अक्षराकार 0.6 X 0.1 वर्ग इंच है। इसमें 29 पंक्तियाँ हैं।4 इस लेख की खोज राय रामचन्द्र ने अक्टूबर 1970 में की थी। कुण्डी के राजा राव सुर्जन व राव भोज की सेवा में कार्यरत व्यास वंश के विद्वान गोपालदास तथा व्यास सन्तदास थे। लेख में व्यास धनेश्वर की वंशावली अंकित है एवं बावड़ी के निर्माण में खर्च हुई धनराशि का विवरण भी लेख में अंकित है। लेख का निचला भाग नष्ट हो चुका है इसलिये व्यय का विवरण प्राप्त नहीं हो सका है। इस लेख में संस्कृत तथा ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है।5 जो निम्नानुसार है -

1. सिद्धि श्री गणपते नमः संवत 1657 वर्षे वैशाख बदि 12 सोमवार
2. वासरे पुण्य नक्षत्रे शुदिने मेष लग्न श्री रघुनात प्रताप वा-
3. न (वापिका) व्यास संतदा सेन कृता महाराजाधिराज राव श्री
4. सुरजन परमधर्मातभा तद गृहे व्यास श्री गोपालदास पूज्यो जातः - 5. उपकारी राय श्री सुरजन गृहे महाराज श्री रावभोज भानू प्र-

6. तापवान दिग्विजई (य) तदगृहे पूज्य व्यास श्री महेसदास ....................
7. स श्री च्रकधर विधवान प्रतापवान परोपकारी जातः राव ................
8. भोज तद गृहे महाराज कुमार श्री केसवदासो जात केसव तुल्य
9. जातः तद गृहे व्यास श्री सन्तदास पुज्योजातः तनय पुज्य जला-
10. वापिका कारिता परोपकारी गंगा जलवत निर्मल पर फल-
11. दापक अत्यन्त सुद्द पर पुणित व्यास संतदास तिनि इह
12. बावरी कराई भारद्वाज गोत्र विप्रवश यजुर्वेद मा-
13. दिति शाखा व्यास श्री धनैश्वर तीके पुत्र र उपज्या व्यास गो-
14. पाल गोपाल के पुत्र पाँच प्रतापवान पंडित हुआ तिनके -
15. नाव ....... जे व्यो व्यास मुगरितिनकै पुत्र तीन हुवा............
16. रो व्यास पीताम्बर तिनके पुत्र .....भूय तिनि थलो रो व्या-
17. स महेसदास तिनकै.....भयै तिनके नाव जेठा था ............
18. स दामोदर परम ज्योतिविद तिनि लघु व्यास हरिदास तिनि ल-
19. दयु व्यास संतदास तिनि या बावरी कराई तिनि लघु व्यासे वा
20. सुदेव तिनि लघु व्यास ब्रह्मदास ऐ पाँच पुत्र व्यास महेस-
21. का महेस लघु व्यास जनार्दन निकै पुत्र तिनि लघुव्या-
22. स च्रकधर तिनके पुत्र दो वासी सीलोर का संवत 165..............
23. वर्षे माह सुदि 13 के दिन बावरी को ब्याहु कियौ सु इस्यौ
24. ब्याहू कोई की यौ न करतसी विधि वाराणसी की यौ
25. लिषत मिश्र गंगादास व्यास संतदास कौ सेवग...........
26. .............. सै मोसिल उपध्या (य) नारायण थानक लाषेरी............
27. ............... व्यास सो परम संतोषमध्ये बाव-
28. री की लागत रुपया हजार .................. ग- 29. णेस दास लषा षेमा जल...................।।

देव कुण्ड की माताजी के दर्रे का शिलालेख (1601 ई.)


इन्द्रगढ से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी में मन्दिर मार्ग पर माताजी के दर्रे में भग्नावस्था में एक शिवमन्दिर और इसके सामने कुण्ड तथा तीन छतरियाँ विद्यमान हैं। इस कुण्ड की दीवार में एक प्रस्तर लेख लगा हुआ है। यह लेख 1701 ई. वैशाख कृष्ण पक्ष की पंचमी, बुधवार को लगाया गया है लेख का आकार 19 x 17 वर्ग इंच का है। तथा अक्षरों का आकार भी 0.5 x 0.1 वर्ग इंच है। पंक्तियों की संख्या 19 है। इस प्रस्तर शिलालेख में उल्लेख है कि इन्द्रगढ के राजा सरदारसिंह के राज्यकाल में उनके गृह प्रधानमंत्री राय रामचन्द्र के पुत्र शुकराम, उनके पुत्र केशवराम और उनके पुत्र अखेराम ने इस कुण्ड का निर्माण करवाया था।6 यह व्यक्ति जाति से गौड़ ब्राह्मण था। लेख में इन्द्रगढ़ के राजा सरदार सिंह के पिता इन्द्रसिंह का नाम भी अंकित है। उस समय देश में मुगल बादशाह औरंगजेब का शासन था। इस लेख में निर्माण तिथि बादशाह औरंगजेब का चवालीसवाँ जलूसी सन भी अंकित है। लेख का वर्णन निम्नानुसार है -

1. श्री राम धरमो जयति
2. सिधि श्री गणपते नमः।। तौ राश्रंव केतक प्रज्ञा ............हरते तटूह-
3. ग्रे ।। विघ्न कर्ता ........... हरत द्धिपास्य स्वस्ति श्रीमन-
4. नृपति विक्रमा वर्क राज्ये साके श्री सालिवाहन षण्ठया अवधयो मध्ये षर-
5. नाम संवत्सरे पातिसाह श्री औरंगस्याह आलमगीर सन 44 संवत-
6. 1658 साके 1623 ।। परवतमाने। उत्तरायने श्री सुरिम्य ग्रीण्मरितौ-
महामांगल्य प्रद मासोत्मासे वैशाख मासे शुभे कृष्ण पक्षेति-
7. यौ पंचम्या बुधवासरे मूल नक्षत्रे सिधिनाम जोगे शुभ दिने चह-
8. वानक श्री महाराज जी ।। इन्द्रसिंह जी इन्द्रगढ वास्तव्य ।। तत्पुत्र म्हारा-
9. जी श्री राजसिंह जी तस्य आतम पुत्र
महाराजा श्री सिरदार सिंह जी ............
10. ......... मल परगने 4 ..... दीपरी बालू
।। नेवा जसौ पातिसाह-
11. मनसब तस्य गृहे प्रधान रामचन्द्र तत
धीरय पुत्र राय सुभराम मध्ये-
12. पुत्र केसो राम तत्पुत्र अषैराम पुत्र भयै
जाति बाहमणा गोडसा सन -
13. केसोराम कृतु राम-रघुनाथ देवस्थले
सदाशिव देव स्थल 2 सतना-
14. थ 3 जेन देव स्थले आपम ........... चतुराश्रमे
4................. वाल्हेश्वर। विस्वकाश्रमे-
15. षेम पराड़िया । पुत्र वगसुत त्तपुत्र किसमु ।
दातोई को पुत्र-
16. लिष्यते ब्राह्मण गोड़ वाडाल्या......... राम जार सु-
17. लिषत मयो सुख सुध ......... न दीयते ।। नीहराम राम- 18. ...............।। श्री श्री
19. महादेव .............. पुज्यो समाधी ठाकुर को ।।7

धाय भाई जी के कुण्ड का शिलालेख (1654 ई.)


धाय भाई जी का बड़ा कुण्ड बून्दी कस्बे में जिला कारागृह के पास लंका गेट रोड पर स्थित है। यह कुण्ड चौकोर है। इस बड़े कुण्ड के चारों ओर अनेक सीढ़ियाँ हैं और इसमें सभी सीढ़ियाँ बराबर आकार की हैं। यह कुण्ड बून्दी के महाराव भाव सिंह की धाय माता सवीरा धाभाई के पुत्र कान्हीराम के द्वारा बनवाया गया था। यहाँ पर एक प्रशस्ति कुण्ड के ताखे में बनी है। पुरोहित पुरुषोत्तम ने इस प्रशस्ति को लिखा था। प्रशस्ति में कान्हीराम के वंश का उल्लेख है। इस बावड़ी का कार्य 1640 ई. में शुरू हुआ और 1654 ई. में पूर्ण हुआ। प्रशस्ति निम्नानुसार है -

“राव श्री भावसिंह जी धाय सवीरा धाबड़ गोपी ल्होड़ी सुहादव वारिती।। तीरो बेटो धाय भाई कान्हाजी त्यांको कुड़ छत्री, कान्हजी की बहू भानवा हाड़ी बेट्या धायजी की श्यामा सुहादन सुमिर गोल्हा की केसरी रावजी का कोटवाल, रामचन्द्र उस्ता ढोलो सिलावट भोपती, सिलावट मेघो कायथ सीहमल, भटनागर, मोसिल देवो, पंवार भोपति भाटी कल्याण को बारहट उदो मोहिला को गोत सीगी गोपीजी को भाई आसोजी ती का बेटा हरिराम जगरूप प्रोहित मोहन रामचन्द्र उस्ता दहिवो पल्हेडवाला हीवो। संवत 1702 अगहण सुदी 5 सवंत 1711 माह सुदी 5 गुरूवार पुण्य नक्षत्र में रूपवालो गुजर फकीरो वासल्यो त्योदा का थे मंगल लेष का वांच मंगल सर्व लोकानां भुवैन मंगल।। लिषिंत तिवाड़ी पुरूषोतम तत्पुत्र कचरा गुर्जर गौड़ भवानी तत्पुत्र सावरामजी श्री रस्तु ज्योस्तु तुहाता भो पतेनं सवंत कोर जा वगे.....श्री गोपालदास जी की मूर्ति।। बेटा कनीराम बगसु सुद रामचन्द्रजी शवासि शीतलार हुई ताको विहीरा द्धय कुण्ड उपर है महंत सामी गोपालदास जी”

इस कुण्ड के पास दो बड़ी छतरियाँ हैं जिसमें एक पर एक लघु लेख पत्थर की शिला पर खुदा है। कुण्ड के शिलालेख के चारों ओर अनेक मानव व देव आकृतियाँ उत्कीर्ण की गई हैं जो बून्दी राज्य की सामाजिक व धार्मिक दशा को बयां करती हैं। लेख का वर्णन निम्न प्रकार से है8 -
स्वस्ति श्री गणपति कुलदेव्या प्रसादात्रात यं बह्य वेदान्त विदो वदन्ति परंप्रमाण पुरूषोतथान्येः।
विश्वोद्गतेः कारणमींशवरं वा तस्मै नमो विघ्न विनाशनाय ।।
चौहान कुले हाड़ावंशे सुरजनो भूत महीपति एतस्या भूत्तनयो भोजो भुज निर्जित भूमिपाः।।
भोजस्यं तनयो वभूव रत्नः तस्य सुतोऽरत्नः भवद गोपीनाथः ।।
गोपीनाथ कुमारस्य शत्रुशल्यः सुतोभवत ।
शत्रुशल्यस्य तनयो भाव सिंहस्ति भूमिपः।।
अस्तेको प्रवरो रणांगण तले यस्य प्रतापानलः।
संपूर्णारि द्युति वा भूरस्तिरानन्वती श्री भवसिंहो लघुभ्राता
भीमसिंहो महाबलः तस्यात्मजो करण सिंहो तस्यात्मजो
अस्ति धर्म महाबाहो कीर्ति विख्यात निश्चल।।
तत्पुत्र भाणोजी तत्पुत्रो गोपी धावड़ तत्पुत्र कन्हीराम।।
शालीवाहन शाकस्य इह पंच मुनि रसा सागर संप्रतिधियो कुंड भावेन सागरं।
मासस्य माधवं श्चैव शुक्ल पक्षस्य पंचमी गुरोवारे च नक्षत्रे पौस्स्नं चैव मीरितं
श्रीमद राजाधिराजस्य भाव सिंहस्य भूपतिः
तस्य धाय सवीराख्य कीर्ति विख्यात भूतले ।।10।।
तस्या पुत्र कन्हीराम शीलवंत विचक्षणः
गोदानंच शतंवापि सहिरण्यं सवस्त्रकं ।।11।।
पट्ठकूलं च वंस्त्र च भूमिदान विशेषतः ।।12।।
कन्यादाननेवाचं वस्त्रालंकार भूषणं।
महादानं च कर्तव्यं दापयेद्विज सत्तम।।13।।
गुर्जर गौड़ देशेतु मालव धाम चरूस्थली ।
मेवाड़ चैव बंगाले कीर्ति विख्यात निश्चला।।14।।
देव द्विजार्च्चारिंजस्य माने ददाति कृतभाव भक्ति
प्रनमता सांकर संपुटानि उमेश्वर पूजन तत्परंच।।15।।
पुनरप्य हुते जने चतुरस्त्रद्वयं तथा
त्रिमति शोमाह्यं छत्र चामर संयुतं ।।16।।
विवाहं चैव कर्तव्य माघ मासे शुभे दिने।
पंचमी भोम संयुक्त दान धर्म विशेषतः।।17।।
रजपुत्रं जगति मोहिल्येजी ए प्रमातु
प्रपूजकः वाघोजी तस्य जातस्य भाणोयं उदयंकरूः।।19।।
तस्यपुत्रस्य सगीषीजी तस्य पत्न्या द्वंय तथा लघुपत्नी पुत्र जातः कन्ही रीमाविचक्षण ।।20।।
कुरू प्रारम्भमाख्यातं आयुं प्राप्त सवेदकं ।
विवाहं तत्र कर्तव्य माघ सु पंचमी तिथ्यां।।21।।
भावसिंह महाराज कर्णवद्दान तत्परः
निर्जितं भूमिपालानां देश देशान्तरे मतं।।22।।


माटून्दा की बावड़ी का शिलालेख (1659 ई.)


बून्दी से आठ कि.मी. दूरी पर माटून्दा गाँव में एक कलात्मक बावड़ी बनी हुई है। जिसमें प्रवेश करते ही दायीं तरफ की ताक में एक पाषाण लेख 1 × 1.25 वर्ग फीट का लगा हुआ है। जिसकी भाषा हाड़ौती है। लेख के कुछ अक्षरों को नष्ट कर दिया गया है।

लेख में अंकित है कि श्री रूपसिंह नाथावत सोलंकी की जागीरी के गाँव के मध्य उनकी रानी सोनगरी सारहाइन ने इस बावड़ी का निर्माण 1659 ई. में करवाया था। रानी सोनगरी सारहाइनफ फतेहखाँ सोनगरा की बेटी थीं। इस बावड़ी की लागत 4001 कटार साही रुपये आयी। इस कार्य के पुरोहित पंचोली फतेह माथुर व पंचोली मुदर जी तथा लेख के संगतरास बरजी हैं।9

श्रीराम जी। सीधी श्री महासाईन माजी श्री सारहाइन जी बावड़ी कराई बहु जी श्री सोनगरी जी राजी श्री फतेह खाँ जी सोनगरा की बेटी बहुरानी श्री श्री रूपसिंध जी नाथावत सोलंकी श्री बहु महाराजी श्री श्रीरूपसिंघ जी श्री मा मौजा माटुंदौ श्री श्रीरूपसिंघ जी श्री ग्राम मध्य सोही बावड़ी लागत ..... 4001 कटार शाही ...... सिद्धिअ गुणकारी संवत 1716 शाके 1561 पुरोहित पंचोल फतेहमाथुर जी संतरास बरजी, पुरोहित मुदर जी श्री राम।

नाहरदुस की बावड़ी का शिलालेख (1664 ई.)


नाहरदुस की बावड़ी बून्दी में लंका गेट रोड पर स्थित है। इसके प्रवेश द्वार के दायीं तरफ एक शिलालेख दीवार में ही जड़ा हुआ है। जिसका आकार 2 × 1 वर्ग फीट व अक्षरों का आकार 0.5 × 0.5 वर्ग इंच है। जिसमें शत्रुशाल्य जी की रानी राजकुॅवरी द्वारा अपनी पुत्री के विवाह के उपलक्ष्य में 1664 ई. वैशाख बदि 1 को इस बावड़ी का निर्माण करवाये जाने का उल्लेख है।10 बावड़ी में पानी उपलब्ध है। बावड़ी औसत अवस्था में है। इस लेख से स्पष्ट होता है कि शुभ कार्यों के उपलक्ष्य में जलस्रोतों का निर्माण करवाया जाता था।

श्री राम जी। सिधि श्री गणपति आशापुराभ्यांनमः संवत 1721 वैशाख वदि 1 महाराजाधिराज हाडा दिवाण राव श्री शत्रुशाल जी की राणी जी सिसोदणी जी राजकुवंरी जी रावत जी श्री सिधो जी गढ देहाल्या को धणी तीकि बेटी ने बाग बावड़ी कर परणाया ई राणी जी की बेटी बाई करमेती जी त्या परणाई छ गढ जोधपुर का धणी महाराज जी श्री जशवन्त सिंह राठौड न, ई काम को ज्योतिषी पुरोहित पीताम्बर को बेटो सुखदेव सुत्रधार मियां पटेलदाहु मोसिल राठोड भीखाराम को परगना सासरा बून्दी, धरमदास को कायस्थ भटनागर पंचोली सिंहमल बैलदार माली भीखाकुम्भा। हरालीपदोमाला कोकिला बंद जोति लक्ष्मी और अनेक हैं।

नाहरदुस की बावड़ी का शिलालेख (1664 ई.)

भाटों की बावड़ी का शिलालेख (1667 ई.)


लाखेरी ग्राम के बाहर पश्चिम दिशा में भाटों की बावड़ी है। इस बावड़ी का निर्माण बून्दी के राजा भावसिंह के राज्य काल में भाट नरहरिदास ने 1667 ई. में कराया। इस लेख में नरहदास की वंशावली भी अंकित है। आठ पंक्तियों के लेख का मूल पाठ निम्नानुसार है।11

1. महाराजा रावश्री भाव सीध जी
2. प्रोहित श्री लीलापति जी भाट नरहर दा-
3. सन बाव.................... संवत 1724 भाट -
4. नरहरदास जी भाट षेमा पुत्र भाट हरि -
5. दास ............ हरदास ईसर ......... नरहरदासजी -
6. फेरी माहास ........... दीप.............
7. भाट की जाति राजे रावा सींह तौ स लाषौरी
8. सहा गौपा जागार ................. लीषत सारवारो।।

दधिमति माता मन्दिर की बावड़ी का शिलालेख (1668 ई.)


बूंदी से 3 किलोमीटर पश्चिमी दिशा में दधिमति माता मन्दिर की बावड़ी कोटा जयपुर रोड़ पर राष्ट्रीय राजमार्ग-12 पर बाईपास चुंगी नाका पर स्थित है। इस बावड़ी के दायीं तरफ की ताक में 2×3 वर्गफीट आकार का एक पाषाण लेख उकेरित है। लेख की भाषा संस्कृत तथा हाड़ौती है। इस लेख में मण्डुकेश्वर महादेव मन्दिर, मण्डूक ऋषि के आश्रम एवं बावड़ी के निर्माता के बारे में जानकारी मिलती है। इस बावड़ी को राजा भावसिंह के शासनकाल में सुखदेव के पुत्र भवानीदास ने पूर्ण करवाया।12

श्रीरामोजयति। श्रीभवानशंकरोजयतः सदा। श्री गणेशंविकाम्यां नमः।। स्वस्ति श्रीर्जयोमंगलभ्युदय श्री शंभोप्रसादाता।। श्री सकल सामत शीरोमणी मरीविरजीत वरण श्री मन्चोहाण हाड़ा वंशे विभुषणम सुर्जनराव कुल दीपक शत्रुशल्य संभव भीमसिंह सुत कृष्णसिंह सुत श्री मदनिरुद्ध भव श्री दीवाण बूँदीपति महानुभान राजाधिराज बुधसिंह राव वर्तमान सुराज्यसमे।। शरणागत शरणोपार दाधीच कुल जनित पुरोहित श्री केदार सुत परमपुरुष प्रजनपर पुरोहित श्री पिताम्बर सत्पुत्र पवित्रता प्राप्रकाशीवास सुंदरव्यक जठर निवास नृदेवमान्य श्री शुक्रदेव सुता राधित, महादेव। बूँदीपति हृदय सुहित कृतवास पुरोहित भवानीदास।। मुनिवरमंडूक तपः प्रकटित मटुकेश्वर सनिधिरथानिधान रमणीयां सुरवावरोह रूचिरांपुण्यपाणिय पूजां सुरवादुरसांवापीन्य चवकार परमेश्वर प्रतीये सर्वभुतस्नानपानादि कृतये सुविरश्रयेसेमुदेसवै।। यस्यप्रशंसा पत्नी प्राजानान्नी प्रिय पायानंददेदेवानंद पुत्रीसोठवाल गोत्रं गोपाल पॉत्रीव।। यस्य भ्राता देवीदास दुहादशितिनाम समानवासमस्य पुत्रो गणपपति गजमुखो नृप पुज्यौ वंशस्ये हरी करौव।। श्री मस्तु अद्य श्लोकाः।।श्री शशत्रुहति देवनोदितोयवणांनिधिरिहाश्रुतुहावाहत्य भुज्युतततोतिमोभवधोअ्- रूपमनुज चतुर्भुजः।।1।। दिक्र तुध्यजयजयीत पालकः भुवतुध्यस्ययत दूत्पतसंवद आपासतको भव लोक भव भारती मरै।।2।। ददी राधिवान्निर्मल दुर्दिगात्धौगंभीरतापायपिता गेव।। अतरियत श्री शगुणगरिष्ट किमस्यंवंशे महिमाभिवाहत्यं।।3।। एकत्सुवणगिगताति- वीघ्नोचोहाण संताबह वोमवन्तया।। ।। श्री सुर्जनाहाज जरल मान्य पीतावरारव्यः शुभस्त्पुरोधा।।4।। गुणगणित कीर्तिभाग्य वृद्धि महोगांगृह जानितं सुध मतस्यस्तचु विद्याय।। बहु जननृपमान्यो वंदनीय पुरोधाः त्रूकदूव सुकदेवोमुक्ति माणासुकाश्या।।5।। तत्यातु श्री श्रुकतीभवं महिभवानीदास नामा सुतो विद्याह कृति वर्जिता जगतिनोसतर्जित शत्रुनि।। धीरोधर्मपुर सुरवा श्रम विद्यो सस्तयमानों वरे वीरोन्दुख विदारणा सुमसामाधः समाधतुध।।6।। पीधोदेवविदु प्रर्विदवनावुदी तिया रव्यतिता तस्यसामीप्य नगाटवी पोपरिमरे मंडूक मान्नेमुने।।7।। वापि बून्दी पतो सुराज्येण श्री बुधसिंह वाहत्रमाजंदय पद्यंतयाजनामु जनपदान्सरं कृतिप्रितितः।। सोयधर्मपरो गुणयेनिपुणः पित्रोः सुमक्त परं त्रुत्यिधक्त पर श्रुत्या चज्ञिवाशंन्वोः सुदसेमिराम।।8।। श्री विक्रमाक्रसमयात समृदे कपितवं सेरनंदेयम्पवनम...... श्री वापात्यमिपत्रु वूधसंघ ...... ।।9।। बूधसिंह जी का राज म सुकदेव को बेटो पीताम्बर को पोतो बावडी जीण सम्वत 1754 का बुधवार न पुरी कराई मोसिल व्यास रघुनाथ, सिलावट उस्ताकार मादौराम जी।। यमीयदुर है वाजु श्री पीताम्बर जी को बडद्यो बेटो दरमो जी ............. सुखदेव जी को बेटो देवीदास तीका बेटा गणपति गजमुख भादूरामू जी ...................... ......... नंदा की बेटी प्रो. सुखेदव जी का विद्यार्थी केसोराम जी को श्री ब्रह्मानंद ...............

भावल्दी की बावड़ी का शिलालेख (1671 ई.)


बून्दी नगर में सेठजी के चौक में यह बड़ी बावड़ी स्थित है। इस भावल्दी बावड़ी का निर्माण महाराव भावसिंह की ज्येष्ठ पत्नी भावलदेवी द्वारा सारी प्रजा के सुख वास्ते करवाया गया था। बावड़ी पर अंकित शिलालेख से ज्ञात होता है कि बावड़ी का निर्माण प्रारम्भ करने से पूर्व शुभ मुहर्त देखा जाता था। साथ ही विधिपूर्वक गणपति की आराधना व पूजा की जाती थी। जिसका उद्देश्य यह होता था कि निर्माण कार्य में किसी प्रकार की कोई बाधा ना आवें।

भावल्दी की बावड़ी का शिलालेख (1671 ई.) बावड़ी के प्रवेश द्वार के ऊपरी हिस्से पर दो बड़े स्मारक बने हैं। बावड़ी के पास ही राजस्थान के प्रसिद्ध कवि सूर्यमल्ल मिश्रण का भवन है जहाँ पर बैठकर उनके द्वारा ‘वंशभास्कर’ का लेखन किया गया । शिलालेख का वर्णन निम्नानुसार है13 :-

स्वस्ति श्री जयो मंगलमभ्युदयश्व ।।
यं ब्रह्य वेदान्त विदो बदन्ति परंप्रमाण पुरूष तथान्यः
विश्वोद्गतेः कारणमीश्वरंवा तस्मै नमो विघ्नविनाशनाय।।
कृपालव सुधा परिशीलनेन विभात्यऽते पाम गणो पिः पुमान पुराणः
मुन्मतगम सार गिरामुपास्यमास उरां पुरुष कारवति मुरारेः ।।2।।
चहुमाण कुले हाड़ा श्री सुरतनजी अभूत महीपतिः
तस्या भूत्तनयो भोजो भुज निर्ज्जित भूमिपः ।।3।।
कृपालव सुधा परिशीलनेन विभात्यऽते पाम गणो पिः पुमान पुराणः
मन्मतगम सार गिरामुपास्यमास ।। उरां पुरुष कारवति मुरारेः।।2।।
चहुमाण कुले हाड़ा श्री सुरजनजी अभूत महीपतिः
तस्या भूत्तनयो भोजो भुज निर्ज्जत भूमिपः ।।3।।
भोजस्य सुतो रत्नः नृप शत्रु शल्यः सुतोभवत ।।4।।
शत्रुशल्यस्य तनयो भावसिंहोऽस्ति भूमिपः ।।5।।
आस्तेऽर्क प्रखरो रणप्रांगण यस्य प्रतापनलः
सं मूर्ध्वन्तरिदंतिदंतदलनादयाति संघट्ठनात।। कीर्ति कुंदति।।
मात्रु गर्व नायिनी मूर्तिश्च कामाकीधिकतिनेय वृशभात सिंह पतिना भूवास्ते वाजन्वती
अथ संवत्सरे श्री नृपति विक्रमार्क समयातीत ।।
संवत 1734 वर्षे शाके 1599 प्रवर्तमाने प्रभवनाम उत्तरायणे भानौ।।
वसंत ऋतौ मंगल प्रदे वैशाख मासे शुभ शुक्ल पक्षे
अक्षयतृतीयायां पुण्य तिथौ मंगलवासरे घटी 58
रोहणी नक्षत्र घटी 13 उपरान्त मार्गशीर्ष अति गंड योग
घटी 19 तैतल करणे।। एवं पंचांग श्रुद्धि दिने।।
महाराजाधिराज महाराव श्री भावसिंहजी वर्मणां ज्येष्ठ
पत्नी राणीजी श्री भावलदेजी सीसोद्दी महारावत
श्री जसवन्तसिंहजी ग्रहे वधु चहुवाणी राजि श्री बाई
चंपा देजी की बेटी रावत सींधजी की पौत्री महारावत
श्री हरिसिंहजी की बहणि ।। त्यान्है बावड़ी कराई सगली प्रजा का सुष के वास्ते श्री
सिंह लग्न
अभिजित मुहूर्त में डोरो फेरो प्रोहित कीकोजी
पालि के वैसाण्यो दान धर्ग उछव हुवा ।। ताहा जोतिसी
भट कीसनजी ती समय बूंदी गढ़ मध्ये व्यास
कमलनयनजी प्रधान सीह सेषाजी कोटवाल रामचन्द्रजी
कारकून शंकर वैकूण्ठरायजी अनोपचन्द्रजी शुभ
करण्जी एजो राज टहलवा तथा श्री राणीजी के हजूरी
षवांसी आसाधरी कनकवेली वनराव दासी मनु
रूपा राजू .......... बड़ी कामा मध्य बडारणी कसुंभी सवालेषा
कमता कमली मासील बाई कान्हू रसोईदार बाई
जगारू ।। मीर ...... राऊजी उस्ता ..........आलम पंचौली
जोधराज पंचौली हरदेवा रामजी को बेटो रामदत जी


रामसा बावड़ी का शिलालेख (1670 ई.)


बून्दी से 8 किमी. पश्चिम के प्राचीन बडादिया ग्राम की उत्तर दिशा में रामसा की बावड़ी स्थित है जिसमें एक सीढ़ी उतरते ही दायीं तरफ दीवार में 2 × 1 वर्ग फीट का लेख लिखा है। लेख की भाषा हाड़ौती है। इस बावड़ी का निर्माण 1670 ई. को बडोदिया के वणिकसाह केसो के पुत्रों भाई जगन्नाथ, भाई राम, भाई देवरा ने कराया। इन दिनों बून्दी पर राज राव भाव सिंह का राज था जिन्होंने 10 बीघा जमीन बावड़ी के लिये दी।14

पातसाह नारंग साह महाराव राजा भाव सिंह जी संवत 1727 बरसे चेत सुदि 10 दीतवार अति गंज नाम जोगे पुष्य नक्षत्र बावड़ी बाग कराई साह जी भाई जगन्नाथ भाई राम भाई देवरा जाति लठा साह केसो सुत वासी बड़ोदिया, दिली शाह पीथा को पोतो राज कर नारंग साह रानो राजसिंध उदयपुर राजकरे बून्दी राजा राव भाव सिंह राज करे जीने धरती बीघा 10 बगसी बगे बावड़ी परनाय संवत 1728 का जेठ सुदि 13 ब्रहस्पतवार लिखितं च रामराम बचत राम राम छ जदि उस्ताकार सलावट मनोहर श्री श्रीधेजी मेहरवानी हुआ रोज महीना बांध्या तीका रूप्या चार हजार 4000/- बधामांहमदीखन की छः घर का धनी छा कीसान छः गाँव गहना राखी छ घना की मय ब्याज।।

अचलेश्वर महादेव मंदिर की बावड़ी का शिलालेख (1676 ई.)


बून्दी से नैनवाँ वाया दबलाना मार्ग में 55 कि.मी. दूरी पर बाँसी ग्राम के बाहर तालाब की पाल पर एक शिखरबद्ध महादेव का मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर के बाहर एक पाषाण लेख 1 × 1.25 वर्ग फीट का लगा हुआ है इसकी भाषा हाड़ौती तथा अक्षरों का आकार 0.25 × 0.25 वर्ग इंच है। श्री अचलेश्वर महादेव का मंदिर, बावड़ी एवं धर्मशाला का निर्माण न्याती बोराशवा के पुत्र रणछोड़ इडरिया के द्वारा करवाया गया था। इस समय हवालगीर साहानानू, कारीगर सुंदर तथा सिलावट बून्दी के भैरों, इन सभी ने प्रतिष्ठा की।15

श्री अचलेश्वर प्रसादोस्तु संवत 1733 वर्षे माघ शुक्ल 13 सोमे महाराज श्री भावसिंघे जी विजेराज्ये आभ्यंतरं न्यागरी न्याती बोराशवासुत रणछोड़ इडरिया केन्य प्रसादा वापि आरामशाला तत हवालगीर साहानानु, सुंदर कारीगर शिलावट भेरो बून्दी नो प्रतिष्ठा कीधि श्री कल्याणमस्तु।।

इस मंदिर के निर्माण के साथ ही मंदिर के पृष्ठ भाग पर एक बावड़ी का निर्माण भी करवाया गया। इससे स्पष्ट होता है कि मंदिर की पूजा आराधना से पूर्व बावड़ी के जल में स्नान करके शुद्ध होना आवश्यक था।

गेण्डोली के तालाब का शिलालेख (1676 ई.)


गेण्डोली गाँव बून्दी जिले में स्थित है। यह हाड़ा चौहानों का जागीरी गाँव है। यहाँ पर बड़ा तालाब के निकट एक स्मारक बना है जिस पर एक लेख छः लाइनों में अंकित है। जोकि मंगसीर बुद्धी पंचमी बुधवार वि.सं. 1733 का है।16

1. सीद्यी श्री गनेस नमः संमत 1733
2. वरषे आघन बुद्ध पंचमी 5 बुधवारे
3. बाबा संभवनाथ ...........
4. श्री चव्हान भाव सींध म्हारा
5. ....................गनवाड़ थल
6. ........................................

द्वितीय शिलालेख वि. स. 1661
1. सीद्यी श्री संवत 169 (1) वर्षे
2. पतीवर (लार) महरानी हुई श्री सीसपाल
3. ..........................................

इन्द्रगढ़ की काकीजी की बावड़ी का शिलालेख (1683 ई.)


इन्द्रगढ़ रेलवे स्टेशन के समीप लाखेरी सड़क मार्ग पर काकीजी की बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी में एक शिलालेख 1683 ई. माघ सुदी पंचमी बुधवार का विद्यमान है। इस लेख में वर्णित है कि इन्द्रगढ के राजा सरदारसिंह के राज्य काल में उनकी महारानी आली द्वारा वाघाराम खण्डेलवाल के विवाह के अवसर पर इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया। इस प्रस्तर शिलालेख में इन्द्रगढ के राजाओं की वंशावली भी अंकित है। यह लेख 2 × 1 वर्ग फीट में है। इस बावड़ी के शिलालेख की प्रशस्ति गुजराती नताना नमाना द्वारा लिखी गई है। इस शिलालेख की खोज डॉ. रामचन्द्र राय ने अक्टूबर 1970 ई. में की थी। यह लेख बावड़ी की एक ताक में लगा हुआ है। इस लेख में अक्षरित अक्षरों का आकार 22 x 12 वर्ग इंच है। यह लेख कुल 22 पंक्तियों में समाहित है। लेख की भाषा संस्कृत है।17 बावड़ी शिलालेख का मूल पाठ निम्नानुसार है-

1. श्री रह गणपते नमः।। तौ संश्रव केतक प्रज्ञा
2. ............हरतेत द्धहन ।। विघ्न कर्ता.......................
3. दंत वगे ................ हरत द्धिपास्य ।। स्वस्ति श्री मन्नपति-
4. विक्रमार्क राज्ये समयातीत संवत 1740 शाके
5. 1614 प्रर्वतमान उतरायण गते श्री सर्वे सिरि
6. स्या ।। महा मांगल्य मासोत्मा माघ मासिशु
7. मे कृष्ण पक्षै पचम्य 5 तिथि बुध्वासरे दत्रदान................
8. तत्र सुकमानाम योगस्य पंचाम श्री.....................ई..........
9. द्रगढाधिपति महाराजाधिराज महाराजा हाड़ा
10. श्री इन्द्रसिंह जी तत्सुत महाराज श्री रा..............
11. जयसिंह जी तत्सुत महाराजिराज महाराव-
12. श्री सिरदार सिंह जी तस्य महाराज्ञी मायावती -
13. महाराणी श्री श्री आली जी तस्कृत बाधाराम-
14. तदेस्य शुभदिने .................... पत्नीभ्या मिलित्वा-
15. विवाहोत्सर्गः (तः) शुभ कृत ।। लिषितं गुजरा-
16. ती नटल रमणल ।। दसकत .............. राम
17. नाथ........... सुषराम ............ राम सु -
18. भ रामजी सा रामजी खण्डेलवाल।।
19. राम ................ डारण रायवेल ।। शिला घंटई से-
20. साक्ष ।। चिंरजीवतु राजा या स्त्रीक श्री
21. चक्र ।। सर्वेषभुप कारार्थ यस्यैव वापका-
22. या ।। शुभ भवतु सर्व जगतो लेखक पाठक18

देवपुरा गणेश बाग के सामने की बावड़ी का शिलालेख (1690 ई.)


बून्दी के देवपुरा वार्ड में गणेश बाग के सामने एक बावड़ी स्थित है जिसके 15 सीढियाँ उतरते ही बायीं तरफ ताक में 1.50 × 2.50 वर्ग फीट एक शिलालेख लगा हुआ है। जिसकी भाषा हाड़ौती तथा अक्षरों का आकार 1.75 × 1.75 वर्ग इंच है। इस शिलालेख में बावड़ी के निर्माता एवं बूंदी पर अनिरुद्ध सिंह जी के शासन का उल्लेख है। इस बावड़ी को बुद्धसिंह के बालपन में वणिक परिवार द्वारा बनवाया गया था।19

सिद्ध श्री गणेश प्रसादातः गुरू श्लोकः गुरूवो नमः प्रथमगुरूनामः


मनुपतिविक्रमातीत राज समयसतातः संवत 1747 साके 1612 विकृत माने उत्तरायणः श्री शुभह ग्रषम रितो महामंगलफलप्रदः मासोत्तम मास घडी तीन ज्येष्ठ मास शुभ पूण्य प्रवतनामवदीश्री बुधानीपन्ने ब्रहमनामजी के बाल पना म करंन श्री सूर्यपदरी घटीका 7 तत समय सोभागवती बेलाय तग्रह सावनयः बाग बावड़ी बनाया बोरोपातीसा श्री नारंगसाह जी राज श्री राव अनुरुध सिंह जी बून्दी में राजकरे घना बरस, बून्दी को पुरो देवपुरो धाभाई देवा की बसाई छ यहाँ बाग बावड़ी नाफा श्री बैजनाथी जी की श्री गणेशः गणपति गालदे बावड़ी सनमात संतु श्रीमान धर्ममूर्ति साह जी श्री शुवंभूदास जी लाठी साह जी श्री रघुनाथ जी कंवर साही गीरधरदास जी लाठी को पोतो वरश्री साहा जी सरवासलागना बाग बावड़ी बणार कतीत फलत श्री बीसकरण बाय श्री गणेश्अत्यांकः बसाया। संतराज गोरधन।

कालाजी देवपुरा की बावड़ी का शिलालेख (1695 ई.)


बून्दी के ग्राम देवपुरा की सड़क के सहारे कालाजी की बावड़ी स्थित है। इसे राव अनिरुद्ध सिंह के धाभाई देवा पुत्र विजयराम गुर्जर ने राजधाय माँ श्रीमती जैसाबाई की स्मृति में बनवाया। इस बावड़ी का व्यय भी धाय माँ की जेब खर्च राशि से हुआ जिसे वि. सं. 1740 में नरेश अनिरुद्ध सिंह के शासन काल में प्रारम्भ किया तथा यह बावड़ी संवत 1752 में राव राजा बुद्धसिंह के शासन काल में पूर्ण हुई।20 इस बावड़ी की गहराई 94 फुट, लम्बाई 120 फुट व चौडाई 26 फुट है। यह बावड़ी सार्वजनिक है और जीर्ण शीर्ण अवस्था में है।21 बावड़ी द्विस्तरीय है। बावड़ी में नीचे उतरने के लिये 90 सीढ़ियाँ हैं एवं बावड़ी के ऊपर बने बरामदे में जाने के लिये दोनों ओर समान्तर पाटिये लगे हैं और दोनों ओर ताखे बने हैं जिसकी सीढ़ियों के बीच बाँयी ओर ताखे में शिलालेख अंकित है। बावड़ी का ऊपरी भाग कटे हुए बेलबूटों से अलंकृत है। पानी गन्दा एवं पीने योग्य नहीं है। बावड़ी का शिलालेख 13 लाइनों का है जो अस्पष्ट एवं अपठनीय है।22

रानीजी की बावड़ी का शिलालेख (1700 ई.)


हाड़ौती की प्राचीन राजधानी बून्दी में स्थित रानीजी की बावड़ी में सबसे ऊपर की प्रथम सीढ़ी के पास ही दक्षिणी दीवार में बनी एक ताक में 70 x 83 से.मी माप वाले श्वेत मकराना के प्रस्तर खण्ड पर 31 पंक्तियों का शिलालेख उत्कीर्ण है जिसमें बावड़ी के निर्माण की सूचना मिलती है। इसके अलावा बूँदी के हाड़ा (चौहान) शासकों की वंशावली भी उपलब्ध है। इस शिलालेख में महारानी श्री लाडकुवरी जी के द्वारा 1700 ई. में बावड़ी बनवाने का उल्लेख है।23

पंक्ति 1 ।। श्री रस्तु ।।
2.।। स्वस्ति श्रीः र्ज्जयोमंगलमभ्युदयश्च ।।(श्रं।।)
3.।। सिधि श्री ।। गणपति कुलदेव्यो प्रसादात।। स्वस्तिश्री ।। वक्रतुण्ड महाकायः सूर्य्य
कोटि सम प्रभ अविघ्न कुर में।।
4. ।। देव सर्व कार्येषु सर्वदा ।। 1।। यो देवः सिद्धि दाता त्रिभुवन सकले सर्व माँगल्य
हेतुः यो देवो हस्तिरूपः कर फरश।।
5. ।। घर मूषको वाहनस्यात् ।। यो देवो एकदंतो सकल गुणनिधिः विघ्न हर्ता समस्ताँ यो देवो नित्य नित्य अंयह।।
6. ।। रतुभयं पातु वो गौरिपुत्रः।। 2।। कस्तुरी तिलंक ललाट पटेल वक्षास्थले कोस्तुभां
नामाग्रे नवमौक्तिकं क।।
7. ।। रतल वेणुः करे कंकण।। सर्वागे हरिचंदन मल जय कंठे च मुक्तावलिर्गोप स्त्रीय
रि वेष्टितो विजयते गे।।
8. ।। पाल चूड़ामणिः ।।3।। आदौ ब्रह्मान् विष्णुः क्षिति तल गमन नैव बह्मांड़ षंड़ शक्रा माने व नागा गृह।।
9. ।। रा ऋष यौने व नक्षत्र माला चंद्रादित्यौन वह्मि न बहति पवनो नैव कालीन जीवः तत्रै कोपि स्वंयभूस्त्रि
10.।। भुवन नृपते पातु व श्रेष्टिकर्ता।। 4।। ये कुरति शुभाशुभ निगदिता इछेति वे संपदा ये पूजा बलि होम दा।
11.।। म विधि भिनिध्नंति विघ्नानि च ।। योग वियोग दुख जानता सर्वे सुराः स्व ब
रास्तेतिऽमा श पुरो गभाग्र।।
12. ।। ह गणः शाँति प्रयछंति च ।।5।। अथ संवत्सरे ।। स्वस्ति श्री मन्नृपति विक्रमार्क
राज्य समयातीत।। संवत्।
13. ।। 1757 वर्षे शाक 1622 प्रवर्तमाने ।। षण्टाब्दयां र मध्ये।। विकृत नाम संवत्सरे।। उत्तरायने दक्षिण गोले श्री।
14. ।। सूर्य शिशिरूत्यौ।। माहामांगलिक शुभ ।। तथा फाल्गुन मासे शुभे कृस्न पक्षे पंचम्यां तिथौ 5 दीतवार घटी 1
15. ।। 28 स्वाति नक्षत्र घटी 29 ध्रुव नाम योगे घटी 21 तैतल नाम कर्ण घटी 28 एवं पंचाग श्रुद्ध दिने।। बावड़ी को ड
16. ।। छापन उछव कीयो।। श्री देवी आसापुरा प्रसादात् ।। बसंत द्धि कुई।। गढ बून्दी का राजा हाड़ा चहुवाण हु
17. ।। वा ।। अति पराक्रमी हुवा।। अबि सात री पीढीया राजा पाट पतिलव्या छै।। प्रथम माहाराजाधिराज महाराव श्री
18. ।। भोज जी हुवा।। तत पुत्र माहाराजाधिराज महाराज श्री राव रतन हुवा।। तत पुत्र
महाराजकुमारश्री
19. ।। गोपीनाथजी हुवा।। तत पुत्र माहाराजाधिराज महाराव श्री सत्रुशाल हुवा।। तत् पुत्र माहाराजाधिरा।
20. ।। ज माहाराव श्री भावसिध जी हुवा पाट पति ।। अर सत्रशालजी कौ दुसिरौ पुत्र महाराजकुमार श्री श्री भीम सी
21. ।। ध जी हुवा।। तत पुत्र माहाराजकुमार श्री कीसन सीध जी हुवा। तत पुत्र माहाराजधिराज महाराव श्री अ।
22.।। नरध सीध जी हुवा।। तस्य गृहे भार्या उभय वंस विसूथ दान सील तप भावनादि सहित राणीजी श्री नाथावतरा जी हू
23.।। वा तस्य कुंक्षे पुत्र रत्नमजी जनत प्रथम पाटपति महाराजाधिराज महाराव श्री बुध सीधै जी विजय राज्ये।। तथा माहाराजा।
24.।। धिराज माहाराजाजी श्री जोधसिंह जी हुवा ।। याकी माता माहाराजा श्री नाथावात
फतेसीधे जी की पोति माहाराजि श्री जसवंत
25.।। सिध जी की बेटी महारानि श्री बाई लड़ (लाड़) कुंवरि जी त्यानहै बावड़ी कराई गढ बून्दी मध्ये संसार का सुप कैव । सतै धर्म हेतिनि
26.।। बा- करायो ।। तिहाँ अगवाली प्रेहित भवानीदास जी तथा प्रोहीत सिवदूत जी तथा व्यास विरेसुरजी तथा व्यास मा
27.।। न जी तथा व्यास हरि वल्लभ जी जोतिशीभट् गोब्यद जी ।। उपाध्या विश्वेसुर जी पीतांबर जी ।। तथा कोटवाल रामचन्द्र जी।।
28.।। धावड़ जी गंगाराम जी परधान साह जोधराज जी कारकुन पंचोली भइीया वदै चदैनी तथा पंचोली कान्है जी।
29.।। बावड़ी का कामदार दरोगो पुहाल कान्ह जी ।। मुसरफ पचो रूघनाथ।। बावड़ी का उसतागार पटल सदाराम।
30.।। पटैल मीरू। लष्यंत जोसि श्री पति। ततपुत्र जोसि बगसु। बेटा भोपति । पीताम्बर।
गढ़ बुंदी मध्ये बास तथ ।। आयुष्ट द्धिय।
31.।। शा तृ थि तृधि प्राज्ञा सुख श्री या ।। धर्म स तान वृद्धि श्र संधैत सुख वृधय इती।। 1 ।। बड़ारणी ला छ बडारणी सुषा :।। श्री ।।

-इति-

रानीजी की बावड़ी का शिलालेख (1700 ई.)

बोरखण्डी की बावड़ी का शिलालेख (1712 ई.)


बून्दी से 9 किमी. दूरी पर स्थित ऐतिहासिक फूलसागर के पास बोरखण्डी ग्राम में प्रवेश करते ही दाहिनी तरफ एक बावड़ी व शिव छत्री स्थित है। बावड़ी में प्रवेश करते ही बाँयी तरफ दीवार में 1 × 1.5 वर्ग फीट आकार का पाषाण लेख उकेरित है। लेख की भाषा हाड़ौती व अक्षरों का आकार 0.5 × 0.5 वर्ग इंच है। जिस समय बोरखण्डी नाथावत रूपसिंह के पुत्र कनक सिंह की जागीरी का ग्राम था। उस समय गुर्जर पीथा के पुत्र मोहन ने 1712 ई. को इस बावड़ी को बनवाया। इस लेख में एक विशेष बात यह भी है कि प्रथम पूज्य गणपति जी के साथ सगस जी का नाम भी उकेरा गया है अर्थात सगस जी को भी प्रथम पूज्य माना है।24

श्रीराम जी, श्री सगसजी, श्रीगणेशजी, संवत् 1769 वरषे मिति आसाढ़ वुदी बावड़ी को डोरो फेर्यो दिलीपति साह साही फरूखहुसेनी जी, बून्दी राजे श्री बुधसंघ जी, उदयपुरी रानौ सगीरामसंघ जी, राज आमेरी राजा केश्ररी जैसंघ जी, जोधपुरी राजा श्री अजीत संघ जी, राज सोपो मो. बोरखंडी जागीरी नाथावते जी कनकसंघ जी रूपसंघ को बेटो, गुजर पीथा को बेटो मोहना को करायो नजर भागोता जीमाधोचन्द जी बोरासुखा सहाराम जी ठनहगा न वा शिवजी की थरपणाया जदी मीतिमाहसुदी 4 संवत् 1768 सुधार पंचोली गंगाराम ....................... गोद्यो राधेश्याम न। बांचे जो ही राम राम छः।

अभय नाथ की बावड़ी का शिलालेख (1703 ई.)


कोटा- बून्दी राष्ट्रीय राजमार्ग पर बोहरा जी के कुण्ड के सामने अभयनाथ महादेव जी के मन्दिर के पास अभयनाथ बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी के ताखे में एक शिलालेख अंकित है जो संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि में लिखा हुआ है। लेख में अंकित है कि इस बावड़ी का निर्माण रामचन्द्र गौड़ के द्वारा करवाया गया था। उनके द्वारा वहाँ पर छतरी का निर्माण भी करवाया गया और भगवान राम की प्रतिमा भी बनवायी गयी। शिलालेख का वर्णन निम्नानुसार है।

श्री रामचंद्राय नमः
महाराजा श्री भावसिंह जी सहाय
सिधि श्री गणपति कुलाम्बिकायै नमः
चर्तुभुजो गौड़कुले महायोग भावंतारः शुभकर्म कर्ता
तस्यात्मजो भूद्भवि पेमसिंहः सत्यव्रतः सत्य धृति क्षितीशः ।।1।।
सम्मानितः श्री बुधसिंह नाम्ना बूंदीशभूमृन्मणि मणिना महात्मा ।।
श्री रामचन्द्रस्तनय स्तदीयः सत् स्वामिधर्मो भवता च्चिरायु।।2।।
आगम धर्म बुद्धया विविध विटपिभि
नंदनानंदकंवा वापी तृष्णार्तिहंत्री जगति जनि भृता मुत्तमगाध नीरा।।
कृत्वा सत्छत्रिका योऽधि धरणि विदधे राममूर्तेः
प्रतिष्ठां जीयादावेदतारं हरिचरणरतौ सो चिरं रामचन्द्रः।।3।।
शाकेऽब्दादि रसावनि पर परिमाते 1625 आषाढ मासे
सिते पक्षे भानू तिथौ बुधाभि दिने नेवासणाभे श्रुमे।


विकुभे ववरातरेव करणे सिंह बिलग्ने पेधा द्वाप्पुसर्ग मुदग्र विधिना श्री रामचन्द्रः-

सुधीः। संवतु 1760 आषाढ़ बदि 7 बुधवार नै महाराव श्री बुधसिंहजी का राज मैं राज्यश्री रामचन्द्र जी गोड़ पेमाजी को बेटो, चतुर्भुज जी को पोतो माता आसा दादी, केसरी नानी, राजा रामचन्द्र जी इकी बेटी बाई चंदेल रामवादू रामदास की बेटी, कवराम की पोती, पवरि मना की बेटी, इकी बाई अनोपा, तुलछी बेटो धनराज,ल्होड़ी बहू मनासीसोदणी, रामसिंह की बेटी, कवराम की पोती चंदा की बेटी, इकी बेटी अजयकुवारि बेटो उदयसिंह त्याने बावड़ी न डोरो फेरो मोसी गंगाराम पाती रूपा को संगतराम, सुपा भालो नाथुलोहट, सोमो सिलावट आलम लाड़ से मसरफ हरदेव - बाध्यो विश्वेश्वर जोगी को लिषत प्रोहित भवानीदास सुषदेवशे प्रो. हाड़ा रो श्री रस्तु शुभं भवतु।25

अभय नाथ की बावड़ी का शिलालेख (1703 ई.)

बोहरा जी के कुण्ड का शिलालेख (1732 ई.)


बोहरा जी का कुण्ड बून्दी में अभयनाथ महादेव मन्दिर के सामने स्थित बहु सीढ़ियों वाला है। उन्हीं के पास ही एक प्रस्तर शिला पर एक 1732 ई. का लेख अंकित है जिसमें इस कुण्ड के निर्माण का उल्लेख है। शिलालेख 18 पक्तियों में संस्कृत भाषा में है।26 जो निम्नानुसार है -

श्री गणेश जी। श्रीराम जी। श्री आकसर जी। संतोक्षासंवोलंबोदरोहनुपाहे कंकोककल त्रयोत्रेसिधि बुध्योस्तनष्ट साधेतोरिवयतुर्भुजः।।1।। श्री सालिम सिंह जी श्री लाल सिंह जी श्री दलेल संध जी।। रचायस्ता श्री संवत 1789 बरसे साके 1654 परवर्तमाने उत्तरायणे श्री सुक्लपक्षे शिशिर श्रतु महामंगलपते मासोत्तम मासे माघ मासे शुक्ल पक्षे छ षष्टी को पंतथूर (पेदल परदेशी) पीवासरे कुण्ड करायो महाराजधिराज जी श्री जी (उम्मेद सिंह जी) की नेक राज्यों छो सो ................ मल राज्यो राजा जी श्री जी महाराज जी श्रीजी के राज्य में कुण्ड करायो बोहरा बीसनचंद जी सुत समावर समस्त नागर जात नागर ठाकूर कूल का सरा भंज ..... मेहता जात बोहरा नागर लतरी जहुपंछा जीव काल में भावी धान बैनीसागर तीका घाट 4 तीका नाम पसमी (पश्चिमी) संभा पूरब सामरेउरे उत्तर सांमोमन, दक्षिण समाजीव, सनुघाट, श्रघाट, इछाघाट, नघाट इ सारेघाट का नाम छेः555। कुंड श्रीनारान जी की पासुपुरन हुयो। राजा परजा साराको कल्याण कारणी छे जीके वास्ते नागर नाराण न तो परणाम छे, पोरवासते न राम राम छ कुण्ड में पुरणहुयोपारसत्न।।

बोहरा जी के कुण्ड का शिलालेख (1732 ई.)

सालिन्द्रीदरे की बावड़ी का शिलालेख (1756 ई.)


लाखेरी कस्बे से इन्द्रगढ़ जाते समय 3 किमी आगे सालिन्द्री दरे पर एक बावड़ी स्थित है। इसमें प्रवेश करते ही बांयी तरफ एक 1.5×1.5 वर्गफीट का लेख दीवार में लगा हुआ है जिसका पत्थर लाल है। अक्षरों का आकार 3/4×1/2 वर्ग इंच है। लेख की भाषा हाड़ौती है। इस बावड़ी का निर्माण 1756 ई. में रविकरण के पुत्र द्वारकादास की बहु सूरज कंवर द्वारा करवाया गया था।27

संवत् 1813 वर्षे फाल्गुन सुद 13 सोमवार बावड़ी भाही बाजे बहु दवारकादास सुत रवीकरणनात सुरजेकरणे बून्दी मध्य श्री उम्मेदसंघ जी लाखेरी मध्य उ सरंग को धणी श्री क्रेहरी श्री।

आसकरण जी की बावड़ी का स्तम्भ लेख (1756 ई.)


बून्दी जिले के ग्राम तलवास में बालाजी के मन्दिर के पास में निर्मित बावड़ी के पास के एक स्तम्भ पर 1756 ई. जेठ सुदी 15 बुधवार का एक लेख मिला है। लेख के अनुसार तलवास में प्रोहित प्रभुजी के पुत्र आसकरण जी ने बावड़ी का कार्य जन सेवार्थ 1755 ई. वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को आरम्भ करवाया और 1756 ई. जेठ सुदि 15 को सम्पत्र करवाया।28 इस लेख में श्यामजी पंचोली, तेजराम जी पटेल, मफतराम पटवारी, ब्राह्मण घासीराम आदि कई व्यक्तियों के नाम भी अंकित हैं। यह लेख एक स्तम्भ पर 15 पंक्तियों में अंकित है।

वि. सं. 1813
1. सिधिश्री गणेसायनमः। समत 1812 वरषै वैशाख
2. प्रवरतमाने मासोत मासे ............ मासे सुकल पखे
3. पड़वा वरसपतवार बावड़ी कराई फागण बुदी 8 आ
4. दितवार ................श्री बालाजी को मोजे
5. तलवास म प्रीहित प्रभुजी ततपुत्र प्रोहित आस
6. करणजी बावड़ी कराई तलवास मह आसगीर
7. पड़ श्यामजी पंचौली तेज रामजी पटेल मफत
8. राम पटवारी ब्राह्मण घासीराम उसल सोजी
9. रामपुरो हो (हुओ) ........ बरस एकम
10. समत 1813 का सालम
11. मती जेठ सुदी 15 वार बुध
12. वार उणापुण ..........................
13. उधरण करो....... जो षेमाजी पत
14. रायत ..............मल्लण काना
15. पटेल ........................।। 1।।

ठण्डी बावड़ी का शिलालेख (1759 ई.)


ठण्डी बावड़ी जयपुर कोटा राजमार्ग-12 पर आर.ए.सी. के कार्यालय परिसर में स्थित है। इस बावड़ी को कायस्थ पंचौली मायाराम माथुर पुत्र महाराम ने नरेश उम्मेद सिंह के शासन काल में 1759 ई. में बनवाया तथा वहा बाग भी लगवाया।29 बावड़ी के सामने दोनों ओर लाल रंग में सामने से बायीं ओर मोर पर सरस्वती एवं दायीं ओर गणेश जी के चित्र हैं। इसके प्रवेशद्वार पर दाहिने ओर एवं बायीं ओर दो ताखे बने हुए हैं। दायीं ओर की ताख (आला) खाली है एवं बायीं ओर की ताख में 23 लाइनों का एक 1.5 × 2 वर्ग फीट का शिलालेख लगा हुआ है जिसके अक्षरों का आकार 1/4 × 1/4 वर्ग इंच व लेख की भाषा पहले संस्कृत फिर हाड़ौती है। बावड़ी में नीचे की ओर 22 सीढ़ियों के बाद चौड़ा पाटा है उसके बाद फिर सीढ़ियाँ शुरू हो जाती हैं। बावड़ी में तिबारी है जो स्तम्भों पर टिकी है जिसके ऊपर बावड़ी का ढाणा है जहाँ से घिरनी द्वारा पानी निकाले जाने के चिह्न मौजूद हैं।30

श्री मंगलमूर्तेनमः। ।।श्री उम्मेदसिंह जी।। स्वस्ति श्रीर्भयोमंगलमभ्युदधक्षावरक्त।। श्री गणपति कुल देवो प्रसादात।। यबदामतविंदोवदति पर प्रधानं पुरुषंतधान्यो विश्वेद्वेतेकारणमीन्वदेवा तरमने।।1।। यं ब्रह्मावरूणेन्द्ररूद्रमस्तः स्तुवतिदित्येस्त्रवैः वेदेर्सोगणदत्रमोक्षश्रीतिषं सामगाः।। ध्यानावस्थितहतेनयन सामस्थति-यधोमिनोयस्यातंनययुः सुरवायेदेवाय तस्मैनमः।।2।। अथसवन्तसरेस्मिनुपति श्री विक्रमादित्यराज्यैसमयातित 1816 वर्ष शाके श्री शालिवाहन शाके 1681 प्रवर्तमाने षष्टाष्ट्योर्मध्ये विक्रमनामसंवत्सरे उत्तरायणेगते श्री सुर्य वृतरगोले ग्रीकस्टवोमासाणो मासोत्तम आसाढ़ मासे शुक्ल पक्षे सप्तम्यांपुर्ण्यतिथो घटी 50 पत्ररदविवासरे।। उत्तरा फाल्गुन मानक्रत्रघटी 34 पल 7 वरिधालू योगे घटी 34 पल 47 तात्कालिक गिरकरण एवं पंचागसुद दिने श्री सुर्यौदयात इष्टघटी 11 पल 25 समये सिंहलग्नोदये पृथ्वीपति एवं पंचागसुद दिने श्री सुर्यौदयात इष्टघटी 11 पल 25 समये सिंहलग्नोदये पृथ्वीपति पात्सयाह आलमगीर राज्ये।। महाराजाधिराज महाराव राजा श्री जी विजयराज्ये तस्म मुख्यामात्य कायस्थ जाति माथूराचय ये तो हो नगस्रा गोत्रे पुण्य पवित्र ठाकूर श्री हरराम जी तत्पुत्र ठाकुर जी महाराम जी तस्यात्मज धर्ममूर्ति गो ब्राह्मण प्रतिपालक मुद्रामान्य जी ठाकूर जी माया मजी के नवात्यारामौधतो चिरस्थायीभुतः।। तस्य ज्येष्ठ माता बन्नाबाई क निकटस्थ माता मानबाई दादी सदाबाई नानी हरकुंवरी तस्य पत्नी बहु जी नगीना तत्तपुत्र कुँवरजी दौलतराम जी हरकिशन जी।। आचार्य भदजान की बहू भज्योत सीर्खरस्ये अमरेष्व सिखववाल रूपोंनाईक दयाराम।। वाप्याराम को कार्यकर्ता भाई करमचंद।। दरोगो लक्षीराम गुजरगोड।। उस्ताकार घासी।। संगतरास शंभु।। तोवीरस्यावाभस्यातां अतसीकुसमोप मेघ कातिर्यमुना कुलक कंदब मध्यवर्तात नवगोयवधुत्स शाली वन भीलीवितनो तुमंगलीनि।।1।। संवत् 1810 का आसोजश्रुदी विजयदषमी क दीन आरंभ कीयो।। श्री परमेश्वर प्रतीए कोत्तर संकुल उद्धार निमत्त अनेक चतुर्वा फल प्राप्ति महामोक्षमाप्ति इष्ट फल प्राप्ति काम सिर्ध्यर्थमहापातक निवर्तयत्येवाप्पीरामोत्सर्ग कृतं।। शुभस्तु

ठण्डी बावड़ी का शिलालेख (1759 ई.)

सूंथड़ी की बावड़ी का शिलालेख (1776 ई.)


बून्दी से नैनवा मार्ग पर 3 मील की दूरी पर स्थित ग्राम सूंथड़ी में निर्मित एक बावड़ी से 1776 ई. का एक लेख प्राप्त हुआ है जिसमें कुल 18 पंक्तियाँ हैं। इस लेख के अनुसार महाजन कुल के साह माधवदास के पुत्र हेमराज ने अपने पौत्र सहित इस बावड़ी का निर्माण कार्य 1771 ई. में आरम्भ किया तथा 1776 ई. में इस कार्य को सम्पन्न किया है।31

यह शिलाखण्ड़ीय लेख हाड़ौती भाषा में है। लेख में कई व्यक्तियों के नाम अंकित है जो वणिक् परिवार से सम्बन्धित हैं। लेख में जिस शासक के राज्य काल में इस बावड़ी का निर्माण हुआ है उसका नाम नष्ट हो गया है परन्तु कालक्रम के अनुसार उस समय बून्दी के शासक विष्णुसिंह थे क्योंकि उनका राज्यकाल इसी समयावधि में रहा था।32 इसलिये माना जाता है कि उनके शासनकाल में इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। बावड़ी पर अंकित लेख निम्नानुसार है :-

श्री रामजी
1. श्री गणेशाय नमः।। स्वस्ति श्री गणेशां विष्णयोः प्रशादात लाभमंग
2. ला सदा .............अंक जनी पति कुमुदिनी प्राणेश्वरी .................
3. मर कि सुवराज वंदित पदो दैत्येन्द्र मंत्री शनिः ।। शुभ (खवा गणोगणपति)
4. विस्ने सलक्ष्मी .....................दैव विमला वापी शुभा निर्मिता।।1।। अथाश्रि
5. अष्ट वर्ग नाम संवत्सरे विक्रमार्क राजा संवत 1833 शाके 1698 प्रवर्तमानेउ
6. त्तरायणे ..............पक्षे तिथौ 5
7. श्रवण नक्षत्रे ...........39 को लवकरणे रा पंच शुद्धाद अ
8. .............गोपाल गोत्र सांवलिया ......जी तत्पुत्र
9. साहजी श्री माधवदास तत्पुत्र साहजी श्री हेमराज जी तत्पुत्र सोनाथजी
10. रामदत्तजी हर बिलास जी दीनानाथ जी .............
11. वद्धी कराई रविदतजी के बेटा 3 सावलजी बालमुकुद राधादास............बेटा
12. सोनथली मै महाराजजी श्री ............जी अम
13. ल मैं प्रगन नैनवा मै सोनथली मुकामों पण्डित सदासिवजी का अमल में डोरो
14. फेरो बावड़ी कोटरो .................
15. चार्य सो ती जीवन राम.....................
16. श्लोकः ।। ........हेमराजो तत्स ... मध्ये .................
17. ...............।।1।। बावड़ी को आरम्भ
18. संवत् 1828 का साल मैं .....संवत् 1833 का साल मैं

चौथमाता के बाग के कुण्ड का शिलालेख (1778 ई.)


बूंदी के जैतसागर होते हुए बाणगंगा पहुँचने पर पहाड़ी पर बने चौथमाता मन्दिर के नीचे यह चतुर्भुजाकार कुण्ड बना हुआ है। इसमें बांयी दीवार पर 2 × 1.50 वर्ग फीट आकार का शिलालेख उकेरित है। लेख में अक्षरों का आकार 0.50 × 0.50 वर्ग इंच है। लेख की भाषा हाड़ौती एवं संस्कृत तथा लिपि देवनागरी है।33 इस लेख से स्पष्ट होता है कि, कुण्डों के निर्माण विवाह के उपलक्ष्य में भी करवाये जाते थे। अपने पित्रों (पूर्वजों) को चाँद तारों के रूप में याद किया जाता था तथा उनकी याद में जलस्रोतों के नजदीक विभिन्न सुविधाओं से युक्त धर्मशालायें बनवाई जाती थी।34

केदारनाथ।। श्री राम।। श्री बुद्ध सिंह नमः। श्री गणेशायनमः।। स्वस्ति श्री गणेशां विकयो प्रशादातुत्तन मंगालम्फलप्रदया सत्आदिताया ग्रहाः सर्वसनक्रताव-शिवयः।। प्रगलानिप्रयछंतुदीधर्मायुयस्तिथा।।1।। प्रधास्मिन्साधास्तनोमि संवत्सरे विक्रमा-क्रराज्यातीत संवत् 1835 शान्तिवाहन शाके 1700 प्रवर्तमाने उत्तरायणे शिशिर ऋते माघ मासे शुक्ल पक्षे तिथो 13 शनिवासरे 14 पलानि 49 पुर्नर्वसून नक्षत्रेय 4 घटी 7 विकुंभयोगे 4/24 तैतलकरणो एवं पंचांग शुद्ध दिवसे प्रसादोत कुपानां उत्सर्गहर्त गढ़ बून्दी में महाराजधिराज महाराव राजा जी श्रीजी का राज में श्रीजी के निकट ब्राह्मण गुर्जर गौड़ नुवाल्या तिवाड़ी रघुवीर जी को पोत्र तिवाड़ी मोतीराम जी को पुत्र, तिवाड़ी रामलक्ष्मण जी नुवाल्या त्यान् बाग कुण्ड कूप लतनविर्माजकरि डोरो फेरो तिवाड़ी जी का पुत्र श्री प्रसाद जी का विवाह में डोरो फेरो दरोगा ई दने अनंदीराम सालोल्या त्यांकी वेदी का कर्ता श्रोती जीवनराम संवित्सरे कुतोयं, श्लोककर्ता जोशी स्योराम कृहमः प्रखरगुणयुक्तम् कुण्ड कुपं धधतत्सः आरम्भः धर्मबुहानिविविधितक्रयुक्तं वास्त्रे गुलनाभिराम।। कत्याप्रकारं युक्तं विश्रामारोधि, धर्मशाला विशालजी व्यास चंद्रतारं रघुपति भजनरत्रपित्रो।। श्री रक्तं।। शुभमस्तु कल्याणंअस्तु।।

जलेश्वर तालाब का शिलालेख (1795 ई.)


बून्दी के माण्डलगढ़ किले में स्थित जलेश्वर तालाब के किनारे पर यह लेख खुदा है। माण्डलगढ़ किला पुराने समय में बून्दी के हाड़ाओं के अधीन था। बाद में मेवाड़ के महाराणाओं का इस पर अधिकार हो गया। इस तालाब में जानवरों जैसे मछलियों इत्यादि को मारना मना है। यह लेख श्रावण सुदि 15 शुक्रवार 1795 ई. का है जो निम्नानुसार है।35

सिध श्री गणेशजी प्रसादातु। श्री एकलिंग जी प्रसादातु। महाराजाधिराज महाराणा श्री भीमस्यंधजी आदे सातु प्रतदुवे महता अंजस। प्रगणे मांडलगढ के हुवाल मेहता देवीचन्द्र हंसराज अप्रंच। मांडलगढ का तालाब जालेश्वर जी नहीं जीव जानवर मारे सो दरबार को तगसीर होली या सुरे लोपसी जी श्री एकलिंग पूगली जानवर मार खासी तो हिन्दु तो गाय खासी मूसलमान सूर खासी। अश्लोक। अपदंत परदंत जे पालता वसुन्धरा जे नरा सुरंग जायती यावच्चंद्र दिवाकरों। अपदंत परदत्र जो लोपती वसुन्धरा ........ संवत् 1822 श्रावण सुद्धि 15 शुक्रवार श्री रस्तु। तालाब मायली धरती हाक के पावे नहीं।

(ब) कोटा के शिलालेख
1. अरण्डखेड़ा की बावड़ी का शिलालेख (1615 ई.)


कोटा से 20 किलोमीटर दूर अरण्डखेड़ा ग्राम में एक बावड़ी बनी है। बावड़ी का प्रवेश द्वार पूर्वी दिशा की ओर है। उत्तरी पूर्वी कोने पर माताजी का मन्दिर होने के कारण इस बावड़ी का धार्मिक महत्त्व है। जहाँ पर दूर-दूर से लोग मन्नत माँगने आते हैं। उसके पास ही एक स्तम्भ लेख जमीन में पूर्ण गढ़ा हुआ था जिसे बाहर निकालने पर एक 7 लाइन का लेख लिखा हुआ है। इस स्तम्भलेख पर संवत् 1672 वरषे अंकित है जाे अपठनीय है -

सिद्ध श्री गणेशाय .................. 1672 वरषे ................... देवी (अपठनीय)36

अरण्डखेड़ा की बावड़ी का शिलालेख (1615 ई.)

1. कैथून के विभीषण कुण्ड का शिलालेख (1756 ई.)


कोटा से 25 किलोमीटर दूर कैथून एक कस्बा है। कैथून कस्बे के ऐतिहासिक प्राचीन विभीषण मन्दिर के पास एक चतुष्कोणीय कुण्ड है कुण्ड के पश्चिम किनारे पर एक छतरी है जिसके नीचे बाहर की तरफ सामने की ओर देखता हुआ एक शिलालेख जमीन में गढ़ा हुआ है। यह लेख 1756 ई. का है जो अप्रकाशित है।37 शिलालेख के अनुसार कुण्ड का जीर्णोदार कोटा के महाराव दुर्जनशाल (1723-1755 ई.) के समय में किसी गौतम परिवार के प्रधान व मुनीम ने करवाया था। शिलालेख में कुल 18 लाइनें हैं शिलालेख संस्कृत में है जिसमें 15 लाइनें पठ्नीय हैं।38

सीधे श्री गणेशाय ............. संवत्
1815 वर्षे शाके 1680 प्रवृतमाने उतरायेन
भादो मासो तम मासे मा प्रभासे शुक्ल पक्षे
पुनेते .............. 5 गुरूवार दीने कणा (कुण्ड) करायोसा
...... दतुराम जी साहा बुधनाथ जी को बेटो
तकी बहुन गोत खुहाले वाके कैथून
कोटा क ........ गणमान साहा श्री मद साहा जी
कोटा महाराज महाराव जी श्री
दुरजनसाल जी प्रधान चाहा श्री जा श्री
गोपालदास जी मुनीम रामदास न जी
केथान महवाल गीर जोशी क्षे मीराम
पंचोली जयचदजी ..........................
जोशी केसर राम गुर्जर गोड़
जसुराम जी .................... गपरराम....
मुकुदराम जी की काकी


जवाहर सागर तालाब का षिलालेख (1796 ई.)

3. जवाहर सागर तालाब का शिलालेख (1796 ई.)


कोटा से लगभग 2 मील पश्चिम में एक बहुत बड़ा तालाब है जिसका नाम जवाहर सागर है। इस तालाब को 1796 ई. में राजराणा जालिम सिंह जी की खवास (उपपत्नी) जव्हार साहेब ने बनवाया था। तालाब की पाल के नीचे एक पक्का कुआँ बना हुआ है। तालाब की पाल पक्की बनी हुई है। पाल पर कई पक्के तिबारे भी बने हुए है एक छतरी भी पक्की बनी हुई है। छतरी के उत्तर और दक्षिण की ओर पक्के मकान बने हैं जिसके अन्दर तिबारे हैं। सामने चौक है और आस-पास दीवार निर्मित है बाहर एक चबूतरा है।39 तालाब की पाल पर तालाब बनवाने का शिलालेख लगा हुआ है जिसका मूल पाठ निम्नलिखित है40 -

सूर्य, चन्द्र
श्री गोवर्धन नाथ जी
श्री नवनीत प्रिया जी
श्री गणेश। विनाभ्यानमः।

स्वस्ति श्री ऋद्धि वृद्धिज्जयां मंगलभय्युदय 9- वास्तु विक्रमार्क वाज्यात संवत 1856 शालिवाहन शाके 1918 प्रवर्तनाम शंवच्छरे दक्षिणायन गते श्री सूर्ये वृक्षा ऋतौ मासोतमे श्रावण शुक्ल 8 गुरौ 7/3 अनुराधा नक्षत्रे ब्रहामाम योगे 12/41 वघकर्णा एवं पंचागे शुभ तिथौ दलीपति..........विधमान महाराव जी श्री उम्मेदसिंह जी विजय राज्ये सेनापति राजराणा जालिमसिंह जी योग्य पत्नि जोहोराजी (ज्वार जी) तत्पुत्र गोवर्द्धनदास जी त्यान जवहार सागर तालाब बणयो मारफत साला सोलल जी डोड का प्रधान महंत जीवनराम जी पंचौली जय कृष्ण। उसता हीरानन्द। उसता सोजी।।

(स) झालावाड़ के शिलालेख


1.चाँदखेड़ी के तालाब का शिलालेख (1493 ई.)
झालावाड़ से 35 कि.मी. दूर पूर्व में स्थित खानपुर क्षेत्र का एक प्राचीन ग्राम मोहपुर है। यह स्थल मध्ययुगीन खींची राजपूतों की राजधानी रहा है। यहाँ के तालाब पर 1493 ई. का एक लेख है। यह लेख एक सती स्मारक है। इसमें धारनदेव खींची एक वीर शासक का उल्लेख है जो जायल (मारवाड़) स्थल गोत्र के थे। जायल के खींची इतिहास प्रसिद्ध रहे हैं। लेख में उनकी मृत्यु के उपरान्त उनकी देह के साथ उनकी दो रानियों के सती होने का हवाला है। लेख निम्न प्रकार हैं41 संवत 1550 साके 1415 आषाढ़ सुदी दसमीं सेमवारे (अर्थात 8 जुलाई 1493 ई.) कू राजतिलका श्री धारूदेव खींची जायलवाल के साथ धीरोदे बागड़नी अर सूरतदे कुछवाही सती हुई।।

यही का एक अन्य लेख राजा खींची कुंभदेव का मृत्यू लेख है इसमें उनकी सती रानियों का वर्णन है।

“सवंत् 1555 साके 1420 श्रावण बदी 10 शनिवार का दिन (जुलाई 1498 ई.) को मोढपुर का राजा श्री कुंभदेव जो जायलवाल धीरादेव खींची कू पुत्र थे, देव लोक को पधारया। साथ में कछवाही राणी छत्रवती अर दो सौलकिणी राणियाँ भी सती.........”

2. रातादोई जलाशय का शिलालेख (1493 ई.)
झालावाड़ मुख्यालय से पूर्व की ओर अकलेरा मार्ग पर 25 कि. मी. दूर असनावर कस्बा स्थित है। यहाँ से 7 कि.मी. दूर उत्तर दिशा में लावासल पंचायत के अन्तर्गत रातादेवी तीर्थ स्थल है। यह स्थल इतिहास में खींची राजपूत शासकों से जुड़ा है।

रातादेवी मन्दिर के ठीक सामने मानसरोवर नामक जलाशय है इसके लम्बे किनारे पर खींची शासकों के स्मारक व लेख है ये राजपूती परम्परा के आपसी सम्बन्धों को दर्शाते हैं। किनारे की पाल पर एक कलात्मक छतरी में एक शिलालेख 1493 ई. का है यह लेख महाराज गंगदास का मृत्यु लेख है42 इसके अलावा अन्य लेख है जो निम्नानुसार है -

(1) संवत् 1578 वर्षे पोष शुक्ल, ग्यारस, सोमवार (1521 ई.) का
(2) दिन राजा श्री रावश्रिय देवलोक गया वि.सं. 1550
(3) गंगादास मृत्यूलोक गये।।
वैषाख शुक्ल दशमी संवत् 1567 खँवास जी श्री गंगासिह जी सेठकरा पुत्र श्री रामजी देवलोक गया।।
(4) राजा हन्वतंत सिंह - संवत् 1565
(5) राजा हरिसिंह, संवत्, 1558
(6) राजा देवसिंह का पुत्र शिवसक्ति, संवत् 1566
(7) रावराजा शवदत्तसिंह, संवत् 1555
(8) शिसिंह अथवा श्योसिंह- संवत् 1551
(9) पुत्र महाराजा रणसिंह - संवत् 1587

3. क्षारबाग बावड़ी का शिलालेख (1500 ई.)
चांदखेड़ी (खानपुर) स्थित क्षारबाग बावड़ी के ऊपर पाषाण स्तम्भ पर अगहन वद् पाँच सोमवार 1500 ई. का लेख है। उसका भावार्थ यह है कि श्री राज श्री धारूदेव के बेटे शक्तुदेव के भाई कुंभदेव का बेटा श्री वर्मादेव की राणी रावतसिंह की पुत्री उम्मादे ने बावड़ी बनवाई।43 वर्तमान में ये लेख पानी की मार से धुंधले हो गये हैं - श्री राज श्री धारूदेव का पुत्र शक्तुदेव को भ्राता कुंभदेव का पुत्र सीरी वर्मादेव की राणी उमादे जो रावतसिंह की पुत्री..... ने याँ बावड़ी को निर्माण करवायों। संवत् 1557 ........।

4. उन्हेल की दबे ब्राह्मण की बावड़ी का शिलालेख (1630 ई.)
उन्हेल ग्राम के पश्चिमी दरवाजे के बायीं ओर दबे ब्राह्मणों की बावड़ी है। इस बावड़ी का निर्माण 1630 ई. में दवे वाधा व उसके भाइयों द्वारा करवाया गया। उनके पिता का नाम दवे नरसिंह और भाइयों के नाम दवेखेता व मंडा थे। बावड़ी का सूत्रधार महेशदास, धरमदास था। बावड़ी का निर्माण जनपुण्यार्थ करवाया गया था। इस बावड़ी पर एक लेख अंकित है जो निम्न है44 - संवत् 1687 बरसे मास वैशाख बदी
दबे नरसिंग सुत दबे।
वधा दबे खेता दबे मंडा सूत्रधार महेशदास
धरमदास ने बावड़ी कीधी राम पुन्यार्थ

5. उन्हेल की बावड़ी का शिलालेख (1637 ई.)


गंगधार से लगभग 15 किलो मीटर की दूरी पर दक्षिण दिशा में पठारी पर उन्हैल नामक एक प्राचीन ग्राम स्थित है। यह बावड़ी उन्हैल ग्राम के नागेश्वर (पार्श्वनाथ) मन्दिर के समीप स्थित है। गंगधार के राजा झाला दयालदास के राज्यकाल में 1637 ई. की वैशाख सुदी 3 शुक्रवार में इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया। इस बावड़ी का निर्माण मारवाड़ प्रदेश में स्थित गोलग्राम के निवासी गोलबाल जाति के व्यक्ति दुबे गोविन्द तत्पुत्र दुबे पीताम्बर, तत्पुत्र दुबे महीदास भाई, केसवभाई, नाथाबाई और मनोहरदास ने करवाया। इस बावड़ी का सूत्रधार महेश पुत्र धरमदास था । इस बावड़ी पर लगे हुए प्रस्तर लेख का मूल पाठ निम्नलिखित है -

श्रीरामजी सीधी श्री गणेशाय नमः।

संवत 1694 वरषेमास वैशाख सुदि 3 वार शुक्र नी खत्र पुस्य साके 1557 प्रवर्तमाने उत्तराणो गति श्री सूरज्या महामांगल्य प्रद्देबसंत (ऋ) तो पातसाह श्री साहजहाँ वीजे राज्ये। प्रागणे गंगराड़ जागीर झाला दयालदास जी उणेल ग्रामे नागेश्वर सनीधो गोलवास न्याती मारवाड़ देसे गोलेग्रामे निवासी दबे गौव्यदोत्म जो दबे पीतांवर सुतदेब महीदेस भाई केसव भाईनाथा मनोहरदास गऊ ब्राह्मण पालक तस्य सुक्रत बावड़ी मडाई। सुत्रधार महस सुत धरमदास न बावड़ी कीधी रामपुर माहे रहता वीस्न प्रीत्य सुभमस्तु ।45

उन्हेल की बावड़ी का शिलालेख (1637 ई.) 6. बोहरा की बावड़ी का शिलालेख (1642 ई.)
गंगधार से 15 किलोमीटर दक्षिण की ओर के ग्राम उन्हेल के पश्चिम दरवाजे से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर बोहरा जी की बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी पर स्थित प्रस्तर शिलालेख में अंकित है कि माघमास की शुक्ल पक्ष की पंचमी, 1642 ई. बृहस्पतिवार को मालवा क्षेत्र के अन्तर्गत गंगराड़ (वर्तमान गंगधार) परगने में स्थित ग्राम उन्हेल जो कि झाला दयालदास की जागीर में स्थित था तथा उस समय इस मन्दिर के समीप गोलवाल जाति और कश्यप गोत्र के बोहरा मुकुन्द के पुत्र बोहरा महेशदास उनके पुत्र कानजी और उनके भ्राताओ विष्णुदास, श्यामदास और गोकुल ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया। इस बावड़ी के शिल्पकार महेश का पुत्र धर्मदास था। शिलालेख का मूल पाठ निम्नानुसार है46

“संवत 1699 वरसे शाके 1564 प्रवर्तमाने रवि उतरायन गते श्री सूर्य वसंत रीतै महामांगल्य पद्दे माघ मासे शुक्ल पषो पुन्यतिथी गुरूवासरे अघसी मालव देसे प्रगड़ेगंगराड़ पातसाह श्री साहजहाँ विजयराज्य जागीर झाला रावत दयालदास ग्राम उणेल नांगा सानीधो गोलवाल गीन्यात कास्यप गोत्र बोहोरा मुकन्द सुत बोहोरा महेशदास सुत कान जी भ्रात स्यामजी भ्रात गौकल तस्य सुक्रत बावड़ी बधाई । “सूत्रधार महेश पुत्र सुत धरमदास ने बावड़ी की धी।”

बोहरा की बावड़ी का शिलालेख (1642 ई.) 7. बड़लिया वीरजी की बावड़ी (1643 ई.)
गंगधार के निकट स्थित ग्राम बड़लिया वीरजी से आधा कि. मी. दूर पश्चिम में एक बावड़ी है। बादशाह शाहजहाँ के युग में 1643 ई. में बगड़ावत नरहरदास और उसके भाइयों ने इस बावड़ी को निर्मित कराया। उस समय गंगधार नरेश रावत दयालदास की जागीर में यह प्रदेश था। इसमें गंगधार शासक रावत दयालदास झाला के समय का एक शिलालेख लगा है। लेख में सिलावट का नाम विलुप्त है। लेख का मूल पाठ निम्नानुसार है47

राम श्री गणेशाय नमः।। संवत् 1699 वरखे साके 1564 प्रवर्तमाने रवि उत्तरान गते श्री सूर्ये वसंत रीतौ महामांगल्य प्रदे मासोत्रम माघ सुकल पक्षे पंचम्यां पुन्य तीर्थो खी वासे पातसाह शाहजहाँ वीजे राज्ये मालवा देसे प्रगने गंगराड़ जागीर झाला दयालदास जी गाम बरड़िया बहाड़ावत देवकरण सुत बगड़ावत वीरजी सुत केशवदास सुत नरहरदास भ्रात तेजा भ्रात रामा भ्रात भारतल अचलदास राहामजी तस्य सुक्रत बावड़ी बंधाई सिलावट।।

8. दबीओं की बावड़ी का शिलालेख (1650 ई.)
उन्हेल के पश्चिम दरवाजे के बाहर दबीओ की बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी में एक प्रस्तर शिलालेख लगा हुआ है। इस लेख में सर्वप्रथम श्री गणेश और श्रीराम की स्तुति की गई है। इसके पश्चात बावड़ी के निर्माण की तिथि माघ मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी, सोमवार संवत् 1707 अंकित है। ग्राम उन्हेल परगना गंगराड़ (वर्तमान गंगधार) में नागेश्वर मन्दिर के समीप इसका निर्माण करवाया गया। उस समय इस भू-भाग पर रावदयाल दास झाला का राज्य था और भारत में बादशाह शाहजहाँ का साम्राज्य था। इस बावड़ी का निर्माण गोलवाल गाँव के निवासी पीताम्बर दुबे के पुत्र मनोहर ने कराया तथा इसका शिल्पकार महेश का पुत्र धरमदास तथा उसका भाई इसरसोना था। लेख में मंडलोई, टोडरमल और पटेल गोपालदास जाति सुथार का भी वर्णन है। इस लेख को कायत नाथू बागवान ने लिखा। प्रस्तर शिलालेख का मूल पाठ इस प्रकार है :-

सांब प्रसादात सीध दाता गणेश श्री रामो जयति गणेश गोत्रे देव्यौ प्रसादात संवत् 1707 वरसे शाके 1542 प्रर्वतमाने रवि उतरायन श्री सूर्ये शीशीर रतौ महामांगल्य प्रदभासोत्त में माघमासे सुकल पक्षे त्रयोदसी सोमवार नक्षत्र पुक्ष पातसाह भी साहजहाँ वीजेराज्ये प्रगणे गंगराड़ ग्रामे उणहल नागेश्वर सनीधो जागीर झालारावत श्री दयालदास जी गोलवाल वासी दूबे श्री 5 पीताम्बर सुत दबे मनोहर तस्य सुक्रत बावड़ी मंडावी सूत्रधार महेश सुत धरमदास भाई ईसर सोना बावड़ी बांधी रामपुर मध्वे रहता विष्णु प्रीतअरथ पटेली आठड़ा गोपालदास बाल सुधार राणस्या रावतदयाल दास सुंभवंतु कल्याण मस्तु मंडलोई टोडरमल लीखत कायथनाथू बागवान पदमषेता।48

दबीओं की बावड़ी का शिलालेख (1650 ई.) 9. जेतखेड़ी तालाब का शिलालेख (1699 ई.)
गंगधार से तीन कि. मी. की दूरी पर मण्डाला गाँव के लगता हुआ गाँव जेतखेड़ी है। जेतखेड़ी में एक दलसागर तालाब है उसके किनारे पर एक सीधा लेख खड़ा हुआ है जो गंगधार नरेश रावत झाला दयालदास का है। यह लेख उसकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र रावत प्रतापसिंह ने स्थापित करवाया था जिसका लेख निम्नानुसार है49

श्री गणेशाय नमः ।। स्वस्ति श्री मन्नपति वीक्रमार्क समयातीत कालात संवत् 1726 वर्षे साके 1588 प्रवर्तमाने उत्तरायने गते श्री सूर्य ग्रीष्म रितौ महामांगल्य मसोत्रम ये (ज्येष्ट) मासे शुक्ल पक्षे दषम्यां तीर्थो भृगुवासरें झालावंश महाराज रावत श्री नरहरीदासजी सुत महारावत श्री दयालदास जी सती तीन सहित बहुराठौड़ रूक्मावता तथा बहु मेड़तणी कुशलकुंअर तथा खवासण इन्द्रबाई रजपूत 105 सुउजैण की लड़ाई माहे काम आया जणारी छत्री तालाब री पाल पर रावत श्री प्रतापसिंह जी धी मातशाह अवरंग विजय राज्य।।

10. ठाकुर जी बावड़ी का शिलालेख (1786 ई.)
झालावाड़ एवं झालरापाटन के मध्य गिन्दौर नामक ग्राम स्थित है इसमें ठाकुर साहब का प्राचीन स्थान बड़ा ही श्रद्धाधाम है। यहाँ शीतल व सुस्वाद जल की एक कलात्मक बावड़ी है। इसकी दीवार पर इसके धार्मिक निर्माण का लेख अंकित है जो निम्नानुसार है50 -

श्री गणेशाय नमः
....... महाराव श्री रूपसिंह जी,
श्री राजस्थान घाटी का हाड़ा धरममूर्ति जी श्री
रूपसिहं जी.................... धरममूर्ति रावतजी श्री
इन्दरसींह जी, ग्रहे भाखान राठौड़ जी राव चंदर
कंवर राण जोधा जी डूंगर गाँव की बेटी
ठाकार श्री जसोत सिंह जी की पोती ठाकुर
श्री मानदेव जी, ने बावड़ी कराई संवत् 1843
का साल मह डोरो फेरो बावड़ी को नाम
चंदर बाई कंवर जी श्री .........................
सुत कंवर जी श्री
ईकलींग सिंह जी चीरंजीव उसताकार सलावट
जीम जी श्री श्री ........... कल्याण मल जी श्री श्री
पात श्री ............................


11. राजराजेश्वर मन्दिर की बावड़ी का शिलालेख


झालावाड़ नगर के मंगलपुरा क्षेत्र में श्री राजराजेश्वर शिव मन्दिर है इस मन्दिर से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण शिलालेख मन्दिर की बावड़ी के ऊपर स्थापित है। यह लेख शिव मन्दिर के निर्माण का है जो महाराज राणा पृथ्वीसिंह के समय निर्मित हुआ। मन्दिर के निर्माता राज्य के यशस्वी राजपुरोहित पं. जीवनराम रहे जो निष्णांत पंडित, राजनीतिज्ञ, राजा के प्रभावी परामर्शदाता तथा धर्माचार्य के रूप में प्रख्यात थे। संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण इस लेख का अनुवाद साहित्यकार पं. गदाधर भट्ट द्वारा किया गया जिसका सार संक्षेप निम्न है।

“पृथ्वीराज वरम राजपुरोहित जीवनरामः जयतु निर्मित शिव सदन लेख में महाराज जालिम सिंह, माधोसिंह, मदनसिंह एवं पृथ्वीराज जी की यश गाथा वर्णित है। लेख में इस राज्य के इष्ट देव द्वारकाधीश व नवनीत प्रिया की स्तुति भी है इस लेख में मन्दिर के चतुष्कोणाकार, वाटिका, गौशाला, बावड़ी का भी सुन्दर उल्लेख है।”

12. शान्तिनाथ जी जैन मन्दिर का शिलालेख
झालावाड़ से 7 कि.मी. दूर झालरापाटन में शान्तिनाथ जैन मन्दिर में एक बावड़ी है। इस बावड़ी के सम्बन्ध में मन्दिर परिसर में प्रवेश द्वार के दायीं ओर पत्थर पर एक लेख अंकित है जो जीर्णशीर्ण एवं टूटा हुआ है जो 13 पक्तियों में अंकित है एवं निम्नानुसार है।51

ऊँ श्री शान्तिनाथ जी जैन मन्दिर
की पंचायत बावड़ी
बावड़ी का जल श्री ठाकुरजी
क्षाल में काम आता है इसलिये
बावड़ी में नहाना, टट्टी के हाथ धोना
मना, कुल्ले करना व थूकना भी
...... डालना, बर्तन मांजना और कपड़े
...... न बिल्कुल मना है जो जैता स
...... को नहीं मानेगा उसे अपने धर्म
...... ओर मुसलमान नीयत को
है फिर भी कोई न......................
ओर सरकार का कसूर
वार ठहरेगा पाटन 9-8-18(9) 23 ई.


(द) बारां के शिलालेख
सोरसन माताजी के कुण्ड का शिलालेख


बारां से 45 किमी दूर सोरसन ग्राम में एक पुरातन माताजी का प्रसिद्ध मन्दिर स्थित है। मन्दिर के पास ही एक कुण्ड स्थित है, जिसे माताजी का कुण्ड कहते हैं। इस कुण्ड के पास ही एक 1x 2 वर्ग फीट का प्रस्तर शिलालेख अंकित है जिसमें कुण्ड के निर्माता के बारे में जानकारी मिलती है। शिलालेख वर्तमान में जीर्णशीर्ण अवस्था में है जो निम्नानुसार है।52

सोरसन माताजी के कुण्ड का शिलालेख श्रीराम जी 1 श्री कोठोगै ढेः गाव................ केथौन : बाच....................सीनाद़ ढे. दुबे
नराईन जी कौ बेटोः बोली भदर : जान..................... करायो संवत 1750


(ख) अभिलेखागारीय जल स्रोत


अभिलेखागारीय स्रोत हाड़ौती के जलस्रोतों के बारे में जानने का महत्त्वपूर्ण साधन है और इतिहास की दृष्टि से सर्वाधिक उपयोगी भी है। कोटा के अभिलेखागार में गाँव के समूह के अनुसार बस्ते बंधे हैं जिनमें उस गाँव की आर्थिक स्थिति एवं जलस्रोतों पर खर्च होने वाले व्यय का इन्द्राज है। जलस्रोतों के निर्माण और उनके रखरखाव के हिसाब का वर्णन भी बस्तों में मिलता है। इनकी भाषा में हाड़ौती, गुजराती व उर्दू का मिश्रण है।

महाराव रामसिंह विक्रम संवत् 1905 के समय की अभेरड़ा की बही में उल्लेख है कि अभेरड़ा के तालाब की पाल का किनारा गिर जाने पर धाबाई मियाजी जी के आदेश से आसोज सुदी 13 संवत् 1905 को किनारा बंधवाने के चतरा पटेल रावत के मार्फत मिट्टी डलवाकर ठीक करवाया जिस पर कुल 7 रुपये खर्च हुए। यह 7 रुपये खालसा की दुकानों से लेकर खर्च किये गये।53

हरिगढ़ तालका की बही में महाराव द्वारा रतनसिंह चन्द्रावत को एक बाग देने और उसके पास बने कुएँ से सिंचाई करने का उल्लेख है।54 भाण्डाहेड़ा तालके में ब्रजराज जी की दुकान के पास नाचन बावड़ी होने और उस पर एक सरकारी चौकी बनाये जाने का उल्लेख है। इसमें राज्य के आदेश से आषाढ सुदी 1 को पण्डित पंचौली के आदेश से पहाड़सिंह जी के मार्फत दीवार बनवायी गई एवं प्रतापसिंह के द्वारा केलू एवं किशन अरोड़ा द्वारा अन्य कार्यों पर रुपये खर्च किये गये हैं। इसके अलावा इस गाँव में एक सरकारी कुआँ ताल्लुकेदार मिर्जा घासी वेग के द्वारा खुदवाया गया जिसमें कुल 332 रुपये 8 आने खर्च होने का उल्लेख है। इसके अलावा इसी गाँव में एक अन्य कुएँ के खुदवाने पर 192 रुपये खर्च हुए। जिसमें छीतरिया जाति के लोगों ने कुएँ में से मिट्टी निकाली जिसमें उनको महेनताने में 112 रुपये 15 आने दिये गये और ज्वार अनाज भी दिया गया । 55कोटा के माणस गाँव मरम्मत खाते रंग तालाब में स्थित रंगबावड़ी के गिर जाने पर उसकी मरम्मत करवायी गयी। इसके चारों तरफ पाल बाँधकर पानी को साफ सुथरा कराया गया जिसमें 69 रुपये 15 आने खर्च हुए जिनमें मसाला का 42 रुपये 1 आना, भाटा का तलाया 28 रुपया साढे पाँच आना, भाटा गाड़ियों का 112 दर 5 सैकड़ा, कतला हाथ 100 तिकी लागत 3 रुपया 1 आना, व 19 रुपया 1 आना, 117 गाड़ियों का भाड़ा लगा, चारमण चूना 4 रुपया 4 आना, रेत गणेशपुरा की गाड़ियाँ चार जिसका खर्चा 3 आना, पानी निकालने हेतु चरस तेल 7 रुपया 2 आना, मजदूरी कार्य 26 रुपये 7 आना, चूनाई के 6 रुपये 2 आना खर्च हुए। इसके अलावा बावड़ी की कोठी खुदाई के 17 रुपये 15 आने, खुदाई मजदूरी लोग 57 खर्च 114 रुपये 25 पैसे छतरियाँ जाति के लोगों पर खर्च हुए।56 अटरू तालका में खारी बावड़ी होने और उस पर मन्सा पूर्ण गणेश जी का मन्दिर होने का उल्लेख है।57

खेड़ा तालका में मोती कुआँ से जमीन सिंचाई की जाती थी। इस इक्कीस बीघा जमीन को ठेके पर पिलाई को दी गयी जिसकी दर सवा दो रुपये के हिसाब से अड़तालीस रुपये हुए। जिसका हिसाब बही में दिया गया है। जिसमें सत्ताईस रुपये जमा करने एवं तरकारियों एवं चन्ना का भाव अंकित है।58 किशन विलास बाग के तालाब की पाल गिर जाने पर सावन सुदी 14 के दिन धाबाई मियाराम को आदेश मिलने पर दस रुपये में पाल पर मिट्टी डलवाने पर सवा नौ रुपये दो पैसे खर्च हुये थे।59 मौजा रायपुर के तालाब की पाल की मरम्मत को प्रत्येक साल के लिये ठेके पर दिया जाता था। जिसके पेटे सावन सुदी 1902 को तीन रुपया पन्द्रह पैसे राजकोष में जमा किये जान का उल्लेख है।60 कोटा रियासत के वाजेगावा व मुआना गाँव में कसाई गुलाम मोहम्मद के द्वारा नया कुआँ खुदवाया गया। जिसको राज्य की ओर से कुआँ खोदने के लिये कुदाली, फावड़ा दिये जिसका इन्द्राज बही में किया गया है।61 कावरियाँ की बावड़ी पर एक सूबेदार को लूट लेने एवं किशन विलास बाग में उसके द्वारा शिकायत करने पर सामान लूटने की लागत के बराबर तालका से हर्जाना देने का उल्लेख है।62 कोठी तालका के तालाब की पाल गिरने पर कलाल बक्षियों को मरम्मत के लिये साढे चार रुपये में ठेका देने का उल्लेख है।63

नन्द गाँव की बही में महाराव रामसिंह के समय अबली मीणी की बावड़ी की मरम्मत पर आने वाले खर्च की उल्लेख है। इस बावड़ी पर 34 रुपये साढ़े दस आने का खर्च टैक्स वसूल करने वाली चौकी के हर्जाने से किया गया।64

अबली मीणी का बाग की बावड़ी की मरम्मत 341 रु. 10 आने में की गई जिसमें से 241 रुपये 2 आना मसाला (चूना, चमका और रेत, सन) में खर्च हुए हैं। 10 रु. सवा दो आने कारीगर, मजदूर को दिये। इसकी मरम्मत आषाढ़ बदि 12 सम्वत् 1867 में करवायी गयी थी।

झाडू कस्बा रायपुर तालुका की बही में सम्वत् 1607 में वाजा हणोतिया में डाल्या माली के द्वारा कुआँ खुदवाये जाने का उल्लेख है। जिसमें 4 रुपये के खर्चे का हिसाब अंकित है।65 मौजा जगपुरा में दरोगा गाजी खाँ के मार्फत आखातोड़ के तालाब की किसानों की फसल की पिवाई के मरम्मत करवायी गयी, जिसमें कुल 6 रुपये 9 आने का खर्चा हुआ। जिसमें पोने दो रुपये कारीगरों व मजदूरों का खर्चा बलाई नाथा को दिया गया।66

बड़ी कचहरी मौजा बपावर तालका गाँव में एक नया कुआँ खुदवाया गया एवं मालियों के कुएँ में जल नहीं होने पर खुदाई करवायी जिसमें 23 रुपये 11 आने खर्च हुए।67

बड़ी कचहरी तालके के गाँव के बस्ता में मौजा राम खेड़ा में तालाब की मरम्मत के हिस्से 20 रुपया खर्च हुआ। इसके अलावा तालके के गाँवों में किसानों ने नये कुएँ खुदवाए जिसमें राजा के द्वारा कुदाली फावड़ा दिये गये। कुआँ दर 5 जिसमें 269 रुपये 10 आने खर्च हुए।

खजूरी तालके के गाँव में 12 कुएँ खुदवाने में 57 रुपये खर्च हुए एवं कुआँ बंधवाने में 10 रुपये खर्च हुए। लुणाहारे तालके में सवा चौदह रुपये में तीन अन्य कुएँ, हणोतिया में लुणाहारे एवं किशनगढ़ में एक-एक कुआँ खुदवाने में 5-5 रुपये खर्च हुए। सोरखण्ड तालका में 6 नये कुएँ खुदाई के 17 रुपये और पाल्या में 10 रुपये खर्च हुए। कस्बा मांगरोल में 9 रुपये 6 आने में दो कुएँ खुदवाने का उल्लेख है। इसके अलावा बपावर तालके में 4 कुएँ खुदवाने के 20 रुपये, फतेपुर में 2 कुओं के 10 रुपये, खजूरना में 3 कुओं के 15 रुपये, रहलावण में 4 कुओं के 20 रुपये, मौजा तुलझा में 1 कुआँ के 5 रुपये, अकलेरा में 8 कुएँ खुदवाये जिसके 10 रुपये खर्च हुए। रामखेड़ा में 6 कुएँ 30 रुपये में, कुवई तालका में 2 कुएँ 8 रुपये में, पाटन में 1 कुआँ 5 रुपये में, पाडलिया गाँव में 1 कुआँ 3 रुपया में खुदवाया। इन दोनों गाँवों के कुआें की मजदूरी 7 रुपये हुई इसके अलावा मौजा गढाण तालका में 6 कुओं पर 14 रुपये, पाडलिया में 4 कुएँ 8 रुपया, पासाहेडी में 3 कुएँ 6 रुपये में एवं मौजा दामोदरपुरा में 1 कुएँ पर 4 रुपये खर्च होने का उल्लेख है।68

मौजा नयापुरा में एक बावड़ी राजा द्वारा खुदवायी, जिसमें साढ़े पाँच रुपये खर्च हुए। मौजा दुई में नये कुएँ खुदवाने का आदेश हुआ जिसमें 100 रुपये खर्च हुए। जिनमें से 50 रुपये जनता से व बाकी 50 सरकार से मरम्मत के आदेश खर्च किये गये।69

मोहीचालका के गाँवों की बही में नये कुएँ खुदवाने में 381 रुपये 1 आना खर्च होने एवं सरकार द्वारा कुदाली, फावड़ा देने का उल्लेख है। आषाढ़ बुदि 8 को परवानगी धाबाई, मियाराम व जादू भवानीसिंह के मार्फत कुएँ खुदवाने में साढ़े नौ रुपये खर्च हुए70 खानपुर तालुका की बही में नयी बनवायी गयी सागर की बावड़ी गिरने का उल्लेख है, जिसमें पुनः गारा निकालकर जल निकालने का हुकुम वैशाख बुदि 1899 सम्वत् को परवानगी (आदेश कर्ता) बलदेव पंचौली के मार्फत हुआ। इसके अलावा साधु सन्तों के रहने के स्थान पर वैशाख बुद्धि 6 सम्वत् 1899 में परवानगी बोहरा बलराम के मार्फत कुआँ जड़ाने का हुकुम हुआ, जिसमें 8 नग औजार काम में लिये गये, जिसमें तीन मजदूर प्रतिदिन काम करते थे। जिसमें 1 रुपया 10 आने खर्च हुए। रूपाहेड़ा में एक छोटी कुई (बेवरी) खुदवायी जिसमें 26 कारीगरों ने काम किया और पौने दो रुपये खर्च हुए। मौजा देदिया के रास्ते पर एक छोटी कुई खुदाने में 24 लोगों ने काम किया ओर 26 टका खर्च हुआ। मौजा बपलावा खानपुर में सीताराम पटेल के कुएँ पर आषाढ़ सुदी 15 को मिट्टी भरवाने में 12 रुपये खर्च हुए।71

ब्राह्मण राधाकिशन नानजीराम ने सरकार की हलों की जमीन पर कुआँ खुदवाया जिसका पट्टा ज्ञानी जेठमल ने लालाराम को सम्वत् 1600 में देकर सरकार के रिकार्ड में दर्ज किया गया था।72 बृजलाल की दुकान तालके की बही में मौजा दीगोद के माल में कुआँ खुदवाने में 2 रुपये, मौजा कोठड़ी व मालीहेड़ा की माल में कुआँ खुदवाने में 311/2 रुपया खर्च होने का उल्लेख है। मौजा निहाणा में परगना पलायथा के पटेल मियाराम छिणोलिया के बाड़े में खास दो नये कुएँ खुदवाये। सीसवाली की बही में मौजा छतरपुरा में पेड़ लगाने हेतु कुआँ खुदवाया जिसमें बाबा मुकन्ददास को माघ सुदी 1 सम्वत् 1663 को फतेहमौहम्मद के हुकुम से 5 बीघा जमीन दी गयी। मौजा गमढाणा तालके की बही में तालके के महल में कुआँ खुदवाने में 116 रुपये खर्च हुए। यह कुआँ आषाढ़ सुदि 15 में लालाजी दियामल एवं हलकारा बालख्श के मार्फत कुआँ खुदवाया।73

(ग) समकालीन साहित्यिक स्रोत
(क) वीर विनोद


आधुनिक राजस्थान के इतिहास लेखकों में कविराज श्यामलदास का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मेवाड़ के महाराणा सज्जनसिंह ने कवि श्यामलदास की योग्यता को देखकर उनको अपना मुख्यमंत्री नियुक्त किया एवं प्रशासन के कार्य के साथ-साथ इतिहास लिखने की भी आज्ञा दी और वाणी विलास (सरस्वती भवन) नामक निजी पुस्तकालय कवि श्यामलदास के अधिकार में देकर इतिहास के कार्यालय की स्थापना कर इसका अलग फण्ड कायम किया। 1879 ई. में इतिहास कार्यालय के अन्तर्गत 15 वर्ष के लेखन के पश्चात ‘वीर विनोद’ नामक ग्रन्थ दो भागो में तैयार हुआ। श्यामलदास की योग्यता को देखकर राणा सज्जनसिंह ने 1879 ई. में उन्हें “कविराज” की उपाधि प्रदान की। उनकी इतिहास के प्रति अभिरुचि और लेखन प्रतिभा को देखकर उनको रायॅल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल का सदस्य एवं तत्पश्चात् लन्दन सोसाइटी का सदस्य बनाया गया। इतिहास के शोधपत्रों तथा इतिहास योग्यता के साथ प्रशासनिक गुणों के कारण भारत सरकार द्वारा श्यामलदास को 1888 ई. में “महामहोपाध्याय” की पदवी प्रदान की गई। राणा फतहसिंह के काल में 1886 ई. में वीर विनोद ग्रंथ छपकर तैयार हो गया था।74 कविराज को संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी का ज्ञान था और डिंगल का ज्ञान पैतृक रूप से अर्जित किया था। वीर विनोद में हाड़ौती क्षेत्र के जल स्रोतों के बारे में निम्न जानकारी दी गई।

वीर विनोद भाग दो के तृतीय प्रकरण में बूंदी के इतिहास, चाहमान से लेकर देवीसिंह तक 181 राजाओं की वंशावली, देवीसिंह का मीणों को मारकर बून्दी पर कब्जा करने और अंतिम समय तक के राजाओं की तवारीखों का उल्लेख है। वीर विनोद में बून्दी के जलस्रोतों का भी उल्लेख मिलता है। ग्रंथ में उल्लेख किया गया है कि- नदियाँ इस राज्य में चम्बल और बनास बहती है, लेकिन उसमें गिरने वाली छोटी नदियाँ मेज, सूख, घोड़ापछाड़ वगैरह बहुत है। तालाब भी इस राज्य में बहुत है, जिनमें से जैतसागर, फूलसागर, दुधारी का तालाब, कनक सागर, हींडोलिका तालाब और नैनवा के दोनों तालाब वगैरह बड़े हैं।75 ग्रंथ में वर्णित है कि जैतसागर तालाब में महाराव राजा बुद्धसिंह के अनुज जोधसिंह गणगौर उत्सव के समय अपनी पत्नी स्वरूपकंवर व कुछ साथियों सहित नौका विहार करते समय हाथी द्वारा नौका को उलट देने से गणगौर सहित मृत्यु को प्राप्त हो गये थे। तब से यह कहावत “हाड़ो ले डूब्यो गणगौर” प्रचलित हो गई। उस दिन से बूंदी में गणगौर का उत्सव प्रतिबन्धित हो गया।76

वीर विनोद के भाग तीन में कोटा की तवारीख में कोटा की भौगोलिक स्थिति का वर्णन है कि कोटा में चम्बल, कालिसिन्ध, उजार और नेवज नदियाँ बहती हैं। इसमें चम्बल और कालिसिन्ध बरसात के दिनों में पायाब नहीं होती, और बारह महीनों इनमें नावें चला करती है। राजधानी कोटा चम्बल नदी के दाहिने किनारे पर एक शहर पनाह के अन्दर आबाद है। मुसाफिर लोग नदी की तरफ से किश्तियों में बैठकर जा सकते है। शहर के पूर्व में दरख्तों से घिरे एक तालाब का उल्लेख है।77 जिसके किनारे महाराव के महल और एक बहुत बड़ा बुर्ज बना है।

झालावाड़ रियासत कोटा से निकली है। इस रियासत में बहने वाली नदियों का उल्लेख झालरापाटन की तवारीख में किया गया है। तवारीख में उल्लेख है कि पर्वन नदी दक्षिणी पूर्वी किनारे से इस रियासत में दाखिल होकर 50 मील बहने के बाद कोटा रियासत में दाखिल होती है। आधी दूर पर इसमें बड़ी नदी नीबज्ज आकर मिल जाती है। इस नदी को पार होने के दो घाट हैं। एक मनोहरथान पर और दूसरा भचूरनी मुकाम पर है। दक्षिण तरफ की कालिसिन्ध नदी में चट्टानें बहुत हैं और इसके ऊँचे किनारों पर दरख्त उगे हुए हैं। आहू नदी, दक्षिण पश्चिम कोने से बहकर रियासत में 60 मील तक गुजरने के बाद कोटा में दाखिल होती है। इस नदी के पेटे में चट्टानें कम हैं। सुकेत और भीलवाड़ी मुकाम पर नदी पर उतरने के घाट हैं। छोटी कालीसिन्ध, सिर्फ थोड़ी दूर तक राज्य के दक्षिण पश्चिम की तरफ बहती है। गंगराड़ में उससे पार उतरने की जगह है। इस रियासत में अक्सर बड़े कस्बों व मकामात में करीब तालाब व बंधें वगैरह है। जिनके जरिये से इन मकामात के आस-पास की जमीन सींची जाती है। झालरापाटन के नीचे का तालाब बड़ा है जहाँ से दो मील तक ईंटों की नहर बनी हुई है। जिसको जालिमसिंह ने बनवाया था। इसके जरिये से उस तालाब का पानी झालरापाटन के दूसरी तरफवाले गाँवों की जमीन को सेराब करता है। चन्द्रभागा नदी के बारे में कहावत है कि एक राजा जिसको कोढ़ की बीमारी थी। एक रोज शिकार खेलने के समय चितकबरे सुअर का पीछा करता हुआ उस मुकाम पर पहुँचा, जहाँ से यह नदी बहती है। पास ही एक तलाई में कुछ पानी भरा हुआ था। वह सुअर अपनी जान बचाने के लिये उस तलाई में कूद गया और तैरकर दूसरे किनारे पहुँचा तो उसका रंग बिल्कुल सियाह हो गया। राजा ने यह हाल देखा तो वह खुद भी पानी में कोढ़ मिट जाने के ख्याल से नहाया। नहाते ही बीमारी का निशान तक बाकी न रहा। उसी समय से यह मुकाम तीर्थ माना गया। जहाँ हर साल कार्तिक महीने में एक हफ्ते तक दूर-दूर के यात्रियों की भीड़ जमा रहती थी।78 इसके अलावा वैशाख महीने में पाटन तालाब के किनारे पर दूसरा बड़ा मेला होता था यहाँ मवैशी की खरीद फरोख्त होती थी।

(ख) मुहणोत नैणसी री ख्यात


मुहणोत नैणसी जयमलोत जोधपुर राज्य के सर्वोच्च पदाधिकारी जयमल जैसावत के पुत्र थे। इनके पिता राजा सूरसिंह की राज्य सेवा में कई परगनों के हाकिम और देश दीवान रहे थे। नैणसी की योग्यता को परखकर ही राजा गजसिंह ने 27 वर्ष की अवस्था में ही उसे अपनी राज्य सेवा में ले लिया था। मुहणोत नैणसी ने राज्य सेवा में रहते हुए बालोच के मुगलखां को मारकर फलोधी परगने मै79 और सोजत परगने में मेरो के हो रहे उपद्रव को दबाकर शान्ति स्थापित की और महाराजा जसवन्तसिंह के समय पोकरण पर अधिकार करने में अपना सहयोग दिया।80 सैनिक सेवा में रहकर मुहणोत नैणसी ने अपने सामरिक कौशल का परिचय दिया। अतः जसवन्तसिंह ने उन्हें कई परगनों के हाकिम और 1658 ई. में जोधपुर राज्य के देश दीवान पद पर नियुक्त किया।81 नैणसी पर मुख्यतया कड़ाई कर राजस्व के दोगुने पैसे वसूल करने और प्रजा पर अत्याचार का दोषारोपण होने पर महाराजा जसवन्तसिंह ने 1666 ई. में उसे पदच्युत कर बन्दी बना लिया।82 उस पर एक लाख रुपये कबूलात देने का दबाब डाला। नैणसी को बहुत आत्मग्लानि हुई। यही सोचकर 1670 ई. में नैणसी और उसके भाई सुन्दरदास दोनों ने आत्महत्या कर ली।

मुहणोत नैणसी री ख्यात, राजस्थान का प्रसिद्ध मारवाड़ी भाषा का अपनी कोटि का अनूठा मध्यकालीन इतिहास ग्रंथ है। नैणसी ने लगभग 33 वर्ष की अवस्था में यह योजना बनाई कि वह सभी राजपूत राज्यों का विस्तृत प्रमाणिक इतिहास लिखे। उसने 1643 ई. से 1666 ई. तक निरन्तर 23 वर्षों तक मुहणोत नैणसी ख्यात का संकलन और लेखन कार्य किया। नैणसी की ख्यात का सर्वाधिक महत्त्व इस बात से है कि नैणसी ने ख्यात में प्राप्त समग्र सामग्री साभार स्वीकार की है। इन्होंने लिखनेवाले, भेजनेवाले, सुनाने वालों के नाम ही नहीं, उनका पूरा परिचय भी दिया है। इनमें कई प्रसिद्ध डिंगल कवि और चारणजन है। नैणसी ने अपनी ख्यात में लगभग 6 शताब्दियों के जीवन और साहित्य का महत्त्वपूर्ण परिचय दिया है। अपभ्रंश भाषा की परम्परा से प्रभावित यह विवरण विक्रम सम्वत् 1300 से 1700 तक राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सभी प्रकार की गतिविधियों का विस्तृत आलेखन है।83 मुंशी देवी प्रसाद मुंसिफ ने नैणसी को राजस्थान का अबुल फजल और उनकी लिखी हुई ख्यात को “आईने अकबरी” की कोटि का इतिहास कहा है।84

बून्दी के चौहानों का इतिहास नामक अध्याय में उन्होंने बूंदी के भौगोलिक वर्णन में जलस्रोतों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “बून्दी शहर पहाड़ के पास बसा हुआ है। राजमहल पहाड़ों के मध्य है। वहाँ पानी का पूर्णतया अभाव है। शहर से ही पीने का पानी लाया जाता है। अरावली पहाड़ शहर से निकट है। पहाड़ पर वृक्ष बहुत हैं और पहाड़ की तलहटी में पानी बहुत है। शहर के पास ही बहुत पानी है, बड़ा तालाब सूरसागर है। तालाब के नाले से बाग बगीचों को सींचा जाता है। बाग में आम के पेड़ और चम्पा आदि पुष्पों के पौधे बहुत हैं। बून्दी के पास हाड़ौती के परगने महू खीचियों (चौहानों) का वतन जिसमें कालिसिन्ध नदी हमेशा बहती रहती है। यह नदी महू से सात कोस पर धूलकोट गाँव के पास होकर निकलती है। मूलरूप से यह गुड़गाँव से निकलती है। यह नदी गागरोन के गढ़ तले बहती है। महूँ परगना बून्दी से 30 कोस पर है। महू के कोट की पुश्ती के नीचे नदी सदा धीमी गति से बहती है। परन्तु उसका सेजा नहीं है। यह परगना हाड़ा भगवन्तसिंह ने जागीर में पाया है। उसके द्वारा तालाब बनाया जाने का उल्लेख है। गढ़ के पीछे की ओर सिन्ध नदी हमेशा बहती रहती है, जिसका नीर किले में लाया गया है। मुहणोत नैणसी की ख्यात में चार नदियों चम्बल, (काली) सिन्ध, पारओर, पूड़ण नदियों का उल्लेख है।85

बून्दी शहर भाखर1 लगती वसै छै। रावला घर2 भाखर के आधोफरे3 छै। पिण माहे पांणी मामूर4 नहीं। सहर आयो पीजे 5 भाखर वालार सहर लगतो6। वलारे भाखर में पाणी घणों। हर मांहै परवती7 पाणी घणो। वडो तलाब सूरसागर तिणरी मोरी8 छुटै छै निणसु वाध नाड9 घणा पीवे परगनों मऊ खीचियारो। उतनु मऊरा परगना मां है। सिन्ध भली नदी सदा बहती रहै छै। मऊसूं कोस 7 गाँव घुलकोट छै तठे नीसरे छै।10 पाणी मूल धुडवांणरों आवै छै11 आहीज12 नदी गढ़ गागुरणरै हेठै13 नीसरै छै। बून्दी थी कोस 30 मऊ छोटो सो सहर पिण छै। मऊरा कोटरा पठा14 हठै नदी उतार सदा वही रहे। सेझो15 को नहीं। हाड़ा भगवन्तसिंहरी जागीरी में पाई छै। सु भगवन्तसिंह बड़ा बड़ा मोहल16 तलाब नवा संवराया छै। गागुरण बून्दी थी कोस 30, गढ वासै17 नदी सिंध बहती सदा रहै छै। तिणरो पांणी गढ़ माहै वालियो छै18 नदी 4 हाड़ौती मांहे - चांवल19, सिंध, पार, पुरड़

- 1 पास 2 जागीरदार के घर 3 मध्य में 4 सर्वथा 5 शहर में आने पर पानी पीने को मिलता है 6 अरावली पहाड़ शहर के निकट 7 पास 8 मोरी बहती है 9 बाग और बाड़िया 10 निकलती है 11 गुड़गाँव के स्रोत का पानी 12 यही 13 नीचे 14 पानी को रोकने के लिये बाँध के रूप में बनाई गई दीवार 15 नदी नालों का पानी सोखने से कुआँ आदि में पानी का बहाव 16 महल 17 पीछे 18 जिसका पानी गढ में घेरकर लाया गया है 19 चम्बल जमीन के अन्दर का पानी

(ग) वंश भास्कर


चारण साहित्य की परम्परा में सूर्यमल्ल मिश्रण कृत ‘वंश भास्कर’ का साहित्य में अत्यधिक महत्त्व है। मध्यकालीन राजस्थान के भाषा वैचित्यपूर्ण साहित्यिक तथा अध्यनीय ऐतिहासिक काव्य ग्रंथों की विशिष्ट परम्परा की महत्त्वपूर्ण अन्तिम कड़ी होने के कारण “वंश भास्कर” का राजस्थान के साहित्यिक और ऐतिहासिक आधार सामग्री में उल्लेखनीय स्थान है।

‘वंश भास्कर’ के प्रणेता सूर्यमल्ल मिश्रण का जन्म 19 अक्टूबर 1815 ई. को बून्दी के एक गाँव हिरणा में हुआ था। इनके पिता चण्डीदान मिश्रण स्वयं भी अच्छे कवि और बून्दी के रावराजा रामसिंह के आश्रित विद्वान थे। सूर्यमल्ल मिश्रण शैशवावस्था में ही नितान्त कुशाग्र बुद्धि और अपूर्व स्मरण शक्ति के धनी थे। दस वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने “रामरंजाट” नामक रचना द्वारा लोगों को अपनी कवित्व शक्ति का भान करा दिया था। अपने आश्रयदाता बून्दी नरेश रामसिंह के अनुरोध पर सूर्यमल्ल ने ‘वंश भास्कर’ लिखने का निर्णय लिया, किन्तु ग्रंथ लिखने से पूर्व रामसिंह से यह वचन लिया की ग्रंथ में कथित वंश के गुण दोषों पर राज्यांकुश नहीं थोपा जायेगा। रामसिंह के आश्वासन पर सूर्यमल्ल मिश्रण ने 4 मई 1840 ई. को ‘वंश भास्कर’ लिखना प्रारम्भ किया। सोलह वर्ष निरन्तर लेखन प्रक्रिया से गुजरकर यह ग्रन्थ 1856 ई. में यकायक अपूर्ण रह गया। रावराजा रामसिंह ने इसे पूर्ण करने हेतु कवि सूर्यमल्ल से आग्रह करने पर 1860 ई. कतिपय अंश और जोड़े गये। इस ग्रंथ को बाद में उनके शिष्य और दत्तक पुत्र मुरारीदान द्वारा पूर्ण किया गया।

‘वंश भास्कर’ में भाषा की दृष्टि से राजस्थानी क्षेत्र की बोलियों के अतिरिक्त संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, मागधी, पैशाची, शौरसेनी, पिंगल, डिंगल और यावनी शब्दों का प्रयोग हुआ है। इस ग्रंथ में बून्दी राज्य के संस्थापक देवा हाड़ा से लेकर इस राजघराने के विभिन्न शासकों तथा उनके वंशजों की ब्योरेवार वंशावलियाँ, विवाह सम्बन्धों तथा अन्य कौटुम्बिक और क्षेत्रीय इतिहास के लिये महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।86 ‘वंश भास्कर’ के कवि सूर्यमल्ल ने अपने ग्रंथ में समयानुसार समय-समय पर शासकों द्वारा निर्माण करवाये गये जल स्रोतों के संबंध में विस्तृत वर्णन किया है।

‘वंश भास्कर’ के भाग-1 में पवित्र नदी गंगा की स्तुति को वर्णित करते हुए जन्हू की पुत्री जटा का आसन वाली, महादेव की स्त्री, सबको उत्पन्न करने वाली, पापों का संहार करने वाली, सुमेरू पर्वत से बहने वाली हिमालय पर्वत से उछलने वाली व अन्य गौरवमय शब्दों से वर्णित करते हुए गंगा को नमस्कार किया है।87

नमोस्तूर्मिचञपद्ध्रुवस्थानमीने नमस्तारकामण्डला ऽऽ स्फाललीनै।।
नमस्त्रय घ्वगे श्रर्म्म भूभृत्पताकै नमः पीतसिक्पत्रडित्वद्धलोके।। 11।।


इसके अलावा इसमें बहुत सी नदियों-गोमती, चमर्णवती, तुंगभद्रा, सिन्धु, अलकानन्द, अरुणा की महत्ता का महिमामण्डन किया गया है।88

वंश भास्कर के भाग-2 के चाहुवाण वंश वर्णन अध्याय में राजा रामसिंह के वंशजों द्वारा ब्राह्मणों, चारणों व पण्डितों को दिये गए दान का उल्लेख करते हुए उन्हें सतलज नदी व शतद्रु नदी की भूमि को आस-पास के ग्रामों को दिए जाने की जानकारी प्राप्त होती है।89

रीवा, मच्छीबार इक सतलज धारजह ।।
कालेन्द्रिय रू सतद्रुसेव्य रुप्पड़ गढ़ून सह।। 10।।


वंश भास्कर के भाग-3 में राजा अस्थिपाल का गोदावरी नदी के समीप नगर बसाकर रहने का उल्लेख है।90 वंश भास्कर के भाग-4 से चहुवाणवंश में कुमार देवी सिंह के द्वारा बून्दी में एक बावड़ी बनाकर ढोली को देने का उल्लेख किया है एवं बाणगंगा के प्रवाह को रोककर रावसुर्जन की माता द्वारा खुदवाये गए तालाब जिसे अब जैतसागर कहते हैं उल्लेख भी है।91

जिण समय तीन सै घरॉरी बसतीरा बूंदी ग्राम मै जिकण बापी बणाई डूमनू दीघी तिणा कारण डूमड़ाबाइ कही जै तिकरा आबूरा पोता अर जिकरारी बराई गोल्हा बाईरकहीजे तिरा गोल्हा 2 रा पुत्र उसारा जातिरा मीरा जैतारो अमल रहै।। अर बारागंगारो प्रवाह रोकि जिकरारो बणायो छोटो तलाब हाडॉ 61 रा राज मैं सुर्जन री माता बड़ो कीधो तो भी जिणनै अजै संसार 301 राही नामकरि जैतसागर कहै ।। 20।।

देवी सिंह द्वारा मीणों को मार बून्दी पर अधिकार करने से पूर्व उमरथुणा नामक ग्राम की सीमा में अपने पिता के नाम से चिंहवाले बावड़ी सहित श्रेष्ठ मन्दिर में बडेश्रवरी (बंगेश्वरी) की प्रतिमा को प्रतिष्ठित किया गया था। जिसमें हंडाधिराज बंगदेव ने आकर पूजा अर्चना भी की थी।

“कुमारतदूमरथुणाभिधनिवस थसीमपितृनामांकित वापिका को पेतसुमन्दिर बड्डे. श्वरदेवी प्रतिमाप्रति पटापन”

बून्दी के शासक भाणदेव या सुभाड़ देव के काल में घोर दुभिक्ष पड़ा जिसमें उसने तीन वर्ष तक संचय किया हुआ अनाज गरीबों में बाँट दिया और खितोलाव तालाब का निर्माण करवाया।

भूपहि खितल भनिय अप्प अकिय दुकाल इम
ममनामहु छितिमाहि करहु कछुरीति रहै किम
सुनिनृप पन्द्रहसहॅस 15000 कढि रुप्पय निजकोसन
बिक्खि समय सुभ बुल्लि निपुन सिल्पिन निर्दोसन


दुबलानतैं जु पवमानदिस पाई उचितथल कोस 2 पर कासार रचिय तसनामकरि विदित सु खितोलाव 2 बर (49)
नाम भवानीपुर नियत अब निबसथ जँहॅ आस
देवी खितोला सदन ताल गिनहु वह तास (50)

1 कासार-तालाब, 2 निबसथ-ग्राम

मन्त्री क्षेत्रल (खेतल) के प्रार्थना करने पर राजा का जनाये हुए स्थान पर पन्द्रह हजार रुपये खर्च करके बनिया के नाम को जनाने वाले खेतालोव तालाब का निर्माण करवाया क्योंकि बनिया खेता ने ही राजा को दुर्भिक्ष से आगाह किया था। इसके अलावा इसमें गोल्हू बावड़ी, धावड़वाब अथवा धाऊ की बावड़ी का उल्लेख भी मिलता है।92

बून्दी के शासक राव सुरताण के समय माण्डूपति ने यवन सेना लेकर बून्दी पर धावा बोल दिया। राव सुरताण ने कायरता का परिचय देते हुए युद्ध में शामिल नहीं हुआ। तब रायमल, कल्याणमल, सँहसमल और सातल जैसे सामन्तों ने घमासान युद्ध किया जिससे माण्डूपति घबराकर भाग गया। बून्दी दुर्ग के पूर्व द्वार के बाहर जो दो बावड़ियाँ बनी हुई इन दोनों का निर्माण सँहसमल और सात्तल ने करवाया ।93 राव सुर्जन के पुत्र राव भौज की पत्नी कुवॅरानी ने विक्रम संवत् 1625 को राजकुमार को जन्म दिया। राव भोज की माता जयवती ने इस उपलक्ष्य में एक बड़ा उत्सव किया। राव सुर्जन भी दिल्ली से अपने पौत्र की सूचना पर बून्दी आये तब राजा की माता ने इस अवसर पर तारागढ़ दुर्ग की पूर्व दिशा की ओर मीणों द्वारा बनवाये गये तालाब को बड़ा बनवाया। रुपये लगाकर व खुदाई करवाकर उसे गहरा करवाया और पाल का निर्माण करवाया। इसके बाद इस तालाब का नामकरण अपने नाम से किया। इस तालाब की पाल को पर्वत की तरह ऊँचा बनवाया और पाल के बाये हिस्से में बावड़ी की तरफ द्वार बनवाया और पुरानी सारी सीढ़ियों को तुड़वाकर पंक्तिबद्ध नई सीढ़ियों का निर्माण करवाया।94

“पल्लव जुहि मैनन किय तारागढ़ पुब्ब घां।
हड्डापति माइ हाल विस्तृत किय ताल ह्मां।
लक्खन खनिबे लगाई दीनन अवलंब दै।
रक्खन निज किति दम्मन लक्खन निकुरबं दै ।। 41।।
ताल सु गहिरो खुदाई अंकिय निज नामतै।
पालिहु गिरि प्रभान तास बंधिय बिधि बाम तैं।
बापि समदार तास सेतुहि बिच बंधयो।
सीढ़िन सुघराई पंति पद्धर पथ संधयो”।। 42।।


इस तालाब का नई पाल में बाएँ और दाएँ दो कोठरियाँ बनवाई और यहाँ एक कोठरी में शुद्ध (अच्छे) पत्थर पर उसका बीजक उत्कीर्ण करवाया। इसके अलावा गोल्हा द्वारा बनवाई गोला बावड़ी के अग्रिकोण वाली दिशा में जो हरिमन्दिर था उसका पूरा जीर्णोद्वार करवाकर रानी जयमति ने पूरी श्रद्धा के साथ नया मन्दिर बनवाया और भगवान के विग्रह के साथ लक्ष्मी की मूर्ति भी वहाँ स्थापित करवायी। इसी प्रकार एक नया तालाब और मन्दिर हाड़ा अर्जुन ने भी बून्दी में बनवाया और राजा सुर्जन के बून्दी आगमन पर इसका बड़ा उत्सव आयोजित किया गया।

अंदर अपसत्य सव्य रक्खिय दुव ओवरी ।
बीचक लिपि सव्य सुद्ध पत्थर तंह बिस्तरी ।
गोल्हा कृत बापी दिग सिखिदिस हरिगेह जो।
नूतन बिरच्यो अपुब्व जयवति अति नेहजो
लच्छी सह नारायण थाप्पिय तंह लाड सों
उच्छितपन मंदिर वह छन्न न कंहुं आड सो।। 44।।
नव इम सर मंदिर जुग अर्जुन तिय निर्मयो
भूपति अब आतहि तिन्ह उच्छव बिधि सौं भयो।


राव सुर्जन की मध्यम रानी कनकवती ने बून्दी के दुर्गापुरी गाँव में एक तालाब का निर्माण करवाया जिसे कनक सागर कहा गया है

“रानी मध्यमा 2 जो सुर्जन कै कनकवती
दुर्गापुरी ताके तँह ताल तिहि निर्मयो।
सो कनकसागर कहावत अब हू ख्यात
राम नरनाह देखो तबको खन्योगयो।95


राव सुर्जन ने काशी को अपना निवास स्थान बनाने के पश्चात् राजमहल का निर्माण, घाटों की इमारतें, सुन्दर बाग, मन्दिरों और 20 जलाशयों का निर्माण करवाया।

“सौध नव रचन उपक्रम लगाई शिल्पी।
चिति रचंना मैं मतिभान चुनि चाह सों।
बेल बिबुधालय निपान हु बनाइबे को,
बिबिध बिदग्ध राखि राज रूचि राह सों।


राव रतनसिंह की पहली रानी राजकुंवरी ने एक बापी (बावड़ी) का निर्माण करवाया जिसे बून्दी नगर के सभी चतुर लोग जानते हैं। पहले कटले के पास वाले पश्चिम द्वार से दक्षिण दिशा की ओर बल्लनोत वंशीय रानी का यश दिप-दिप करता है जो कई कवियों के काव्य की साक्षी से मंडित है। मन्दिर, जलाशय और बाग उपवन का निर्माण राजा रत्नसिंह ने करवाया और द्वारिका में भी भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया।96

रानी जेठी राजकुमारि बापी इक कीनी
बुंदीपुर वह बिदित चतुर लोकन इम चीनी।
पहिले कटले पास द्वार पच्छिम सन दक्खिन
जुपै बल्लनोति जस सरस बाढत कवि सक्खिन।
प्रभुगृह निपान उपवन पुनि सु रतन राज्य करतहु रचहि।
द्वारावतीहू इक हरिसदन मंडत मंह भावी सचहि।। 74।।


हाड़ा राजा भोज की अत्यन्त गुणवती पासवान फूललता ने झोझू नामक छोटे तालाब का पुनर्निर्माण करवाकर उसे बड़े जलाशय में परिवर्तित करवाया। कई हजार रुपये खर्च कर उस पासवान फुललता ने जो जलाशय बनवाया उसका नाम अपने नाम पर “फूलसागर” रखा97 जो 1602 ई. में पूर्ण हुआ था। चतुर राजा भोजराज ने भी एक नयनाभिराम उपवन का बून्दी में निर्माण करवाया जिसका नाम नवलक्खा रखा। अभी जहाँ पर ताल बना हुआ है उसके पूर्व में रामबाग नामक सुन्दर बाग विद्यमान था।98

भोज भुजिष्या जो भनिय, फुल्ललता गुन फार ।
तिहि लघु झोझू ताल को किय सु महा कासार।। 75।।
बहु संहसन करि दम्भ व्यय, नियत फुल्लसर नाम।
जिहि सक नवसर अष्टि जह रचिय ताल अभिराम।। 76।।
बिरच्यो उपवन भोज बुध, नवलक्खा तस नाम।
अब जंह ताल रू पुब्ब इत, रामबाग अभिराम।। 78।।


हाड़ा अर्जुन की गुहिलोत वंशीय पत्नी ने एक सुन्दर ताल (जलाशय) का निर्माण करवाया था। इस ताल के किनारे भगवान का एक मन्दिर भी बनवाया था। इस तालाब के निर्माण कार्य की देखभाल के लिये एक माधव नामक कायस्थ को नियुक्त किया था। उस ताल पर तारागढ़ दुर्ग की दिशा में एक घाट अभी भी माधव घाट के नाम से जाना जाता है।

तिम पहिलै गहिलोतनी, अर्जुन पतनी अत्थ ।
ताल रच्यो जो जयवतिय श्री हरिमंदिर सत्थ ।। 82।।
ताल काम पर नियत तब किय माधव कायस्थ।
अवहु तदंकित घट्ट इक, तारागढ़ दिस तत्थ ।। 83।।


हाड़ा राजा रत्नसिंह की माँ ने बून्दी में एक सुरम्य बावड़ी पूर्व में बनवाई थी। उसी तरह की एक नई बावड़ी मऊ क्षेत्र के गोपाना नामक गाँव में बनवाई। इसके साथ ही केशवपुर में राजा की माँ ने एक भव्य और सुन्दर उपवन का निर्माण करवाया । इस तरह रानी माँ ने तीन मन्दिर, दो सुन्दर बावड़ियाँ और एक सुरम्य उपवन का निर्माण कराकर जगत में यश अर्जित किया।

बापी इक पुब्वहि बनवाई रैन प्रसू बुदियपुर रम्य
बिरचिय तिमहि मऊ ग्रामन बिच गोपना दूजी जलगम्य
केसवपुर चोमां उपवन किय नृप माता इक रूचिर नवीन
मंदिर त्रय बापी द्धय मंजुल करि इक बेल सु जसजग कीन ।। 46।।


बून्दी नरेश राव भोज के शासन काल में कवि ईसरदास का एक कामदार (सचिव) रामलाल नामक बनिया था। उसे सुकवि ने अपनी जागीर का गाँव दोडूंढा देकर समृद्ध बनाया। इस सचिव रामलाल की कन्या का विवाह हम्मीर हाड़ा की जागीर हिंडोली में यह जानकर किया कि गाँव के नजदीक है और उसे यहाँ सुख मिलेगा। दोडूंढा गाँव में बरसात के दिनों में काफी दलदल हो जाता था। एक बार वह कन्या बिना बैलगाड़ी के पैदल ही अपने ससुराल आई। उस समय उसके पाँव कीचड़ मिट्टी से सने थे। उसने घर के बाहर पहुँचकर अपनी सास से पैर धोने के लिये पानी माँगने पर उसकी सास ने ताना दिया कि तेरे बाप के पास बहुत सारी संचित की हुई सम्पत्ति है इसलिये क्यों नहीं अपने पिता से कहकर मार्ग में तालाब बनवा लेती। फिर आराम से नाव में बैठकर आया करना जिससे तेरे पाँवों में कीचड़ न लगेगा। तब वणिक कन्या ने अपने पिता रामलाल को सास द्वारा दिया गया ताना सुनाया तो उसके पिता ने अपने खजाने से पैसा व्यय कर एक बड़ा तालाब बनवाया जिसका नाम रामसागर तालाब रखा गया । यह तालाब हिंडोली और दोडूंढा गाँव के मध्य में स्थित है।

“ईस्वर कै हुव सचिव इक बनिक राम बसु बित।
दोडुंढा कवि तिहि दयो, चहि सासन बस चित।। 51।।
कन्या हुव इक राम कै सो हम्मीर सुथान
हिंडोली ब्याही हुति, भनी समीप सुखभान।। 52।।
दोडुंढा पाउस दिनन कबहु न जाई कनी सु
आई घर रथते उतरि, स्वचरन पंक सनी सु ।। 53।।
सस्सू प्रति मंगिय सलिल, अघ्रिन धोवन अक्खि
बुल्ली वह तव बप्प कै, संचित धन जग सक्खि।। 54।।
कहि तासों व्यय करि कछुक, बिरचि तालमय बीच
नाव चढी आवहु निलय, कबहु न लग्गै कीच।। 55।।
इति अक्खिय तातहि यहै तिहि जल संभव तुल्लि।
रचिय रामसागर सर सु, खरच खजांना खुल्लि।। 56।।


राजा शत्रुशाल की तीसरी रानी राजकुमारी ने भी बून्दी से कोटा जाने वाले मार्ग पर बावड़ियों का निर्माण करवाया। राजा की पाँचवी चालुक्य वंशीय रानी सूरजकुँवरी ने क्षारबाग से दक्षिण दिशा में थोड़ी दूर पर बाग व बावड़ियाँ बनवाई। राजा की आठवीं राणावत रानी चंद्रकुँवरी द्वारा बनवाए हुए बाग और बावड़ी कुमारति के मार्ग पर अवस्थित है। राजा की दसवीं राठौड़ रानी कल्याण कुँवरी द्वारा बनवाई हुई बावड़ी और वाटिका दोनों बून्दी से दक्षिण दिशा में और क्षारबाग के पास ही स्थित है, जो इसके सुयस के बल की सूचना देते हैं। राजा की ग्यारवीं राठौड़ रानी फूल कुँवरी, जो अत्यन्त गुणवती थी, के द्वारा बनवायी गई बावड़ी और वाटिका बून्दी से माटूंडा जाने वाले मार्ग पर बून्दी से पूर्व दिशा की और विद्यमान है, जो इसकी कीर्ति के सूचक है। इसके अलावा अपने मृत स्वामी शत्रुशाल के साथ जलने वाली दूसरी पासवान अनारा के द्वारा बून्दी के शहर द्वार के बाहर बसे हुए छोटे से गाँव पुरा में एक बावड़ी और मन्दिर बनवाने का उल्लेख है।99

प्रिया चालुकी पंचमी सूरजकुमारि सनाम।
ऐकी हठी पहिलै जरत, अब सुजरी अभिराम।। 15।।
जाके बापी बाग जुग, अबहू सुजस अंकूर ।
क्षारबाग सन इत सु छवि, दिस दक्खिन कछु दूर ।। 16।।
रानी सप्तम हर कुमारि, उदित चालुकी आहि ।
रानाउति अष्टम रूचिर, चन्द्रकुमरिजस चाहि।। 17।।
जाके बापी बाग जुग, मिलत कुमारति मग्ग
इमहि जरी तंहं अष्टमी, करि किति उदग्ग।। 18।।
काबंधी दसमी कही, क्रम कल्यान कुमारि।
सोहुजरी अति प्रीति सह असह बिरह अवधारि ।। 19।।
बिदित बेल अस बापिका याके दक्खिन ओर
छारबाग के ढिगहि छबि, जे सूचत जस जोर।। 20।।
काबंधी एकादशी, फुल्लकुमारि गुन फीत
जो महलन बासी जरी भूप बिरह अवभीत ।। 21।।
जासबेल बापी जुग हि, मांटुदापुर मग्ग
अंकित जससूचक अबहु, लसत पुब्ब दिस लग्ग। 22।।
इम खवासि दूजी इंहा जरी अनारां जास
पुर साखापुर छत्रपुर बापि हरिगृह बास ।। 23।।


हाड़ा राजा शत्रुशाल ने अपनी धाय माँ पत्ती के नाम पर एक तालाब बनवाया। इस प्रताप सागर नामक तालाब का निर्माण करवाकर राजा ने यश अर्जित किया। राजा ने प्रताप सागर के निकट बहुत बड़े उच्छाह के साथ एक कुण्ड और एक छत्री अपनी धाय माँ पत्ती की स्मृति में बनवाए।

पत्ती नाम निज धाई पटु, ताके नाम तड़ाग
रूचि प्रताप सागर रूचिर, भूप भज्यो जसभाग ।। 70।।
एक कुण्ड छत्री उभय धन्य पती नृपधाई
किय प्रताप सागर निकट पहु मह अह पधराई।। 71।।


हाड़ा राजा भावसिंह ने अपने ही राज्य के वैष्णव संत आध्यामदास के कहने पर बून्दी से ईसान कोण में अवस्थित और लाखेरी नगर के पास एक मन्दिर और एक बापी (बावड़ी) का निर्माण करवाया। इस बावड़ी के निर्माण कार्य की देखरेख के लिये राजा ने जिस लूणकर्ण नामक कायस्थ को नियुक्त किया था। उसी लूणकर्ण के नाम से आज भी यह बावड़ी ‘लूणाबाव‘ के नाम से विख्यात है। इसके अलावा राजा ने फूलसरोवर के तट पर सुन्दर उपवन का निर्माण करवाकर नयनाभिराम फव्वारों का निर्माण भी करवाया था।100

पुर लक्खैरिय पास, दिपत कोण ईसान दिस
अधिप पूरि तस आस, मंदिर बापी निर्भये ।। 81।।
ताकि निर्मितकाज, लुणकरण कायथ ललित
रक्खि भाऊ अधिराज लूणावाय प्रसिद्ध हुव।। 82।।


हाड़ा राजा अनिरुद्ध की चालुक्य वंशीय रानी लाडकुँवरी ने दो बावड़ियों और एक बाग का निर्माण करवाया। हर्षदादेवी से पश्चिम दिशा वाले प्रदेश में एक बड़े विस्तार की बावड़ी के निर्माण पर बाईस हजार रुपये खर्च किये गये। इसके अतिरिक्त दूसरी बावड़ी शहर के बाहर वाले पुर अर्थात् देवपुरा के पास बनवाई और इसके पास ही सुन्दर बाग का निर्माण करवाया।

नाथाउति दूजी लाडकुमरि नमानां स्वीय,
बापी जुग बाग एक जाके बनवाये प्रभु ।। 7।।
देवी हर्षदा सों दीप पच्छिम प्रदेश पर
बापी बनी एक यह सों है बड़े विस्तार
साखापुर देवपुरा ताके जो समीप बापी
दूजी सो रू ताहि के समीप बाग छबिदार।। 8।।


राजा अनिरुद्ध की चौथी रानी बख्त कुँवरी ने बून्दी में पूर्व दिशा की ओर खान नामक खवास की हवेली के पास एक वापिका का निर्माण करवाया जो आज भी यश रूपी स्तम्भ की तरह साक्षी के रूप में विद्यमान है।101

कन्या फतैसिंह की नरूकी बख्त कुमारि कको,
र की बिबाहि कछवाही चोथी रूचिरूप ।
प्राची खाननामक खवास की हवेली पास,
जाकि बापिका है लख्यो पुष्य सत्र जसजूप।। 6।।


इसके अलावा अनिरुद्ध सिंह के धायभाई देवा ने शहर के बाहर वाले भाग में देवपुरा नामक गाँव बसाकर वहा पर बावड़ी, बाग व महल बनवाया।

नृप धात्रेयहु देव सनामक बाढिय जस जग मुख संवाद
निज आख्या करि देवपुरा नवसाखापुर यह रचिय सयान
वापि उपवन महल बनाई रू थिति किय तंह सुहि गिनि निज थान ।। 72।।


हाडा राजा बुधसिंह के अनुज जौधसिंह गणगौर उत्सव के समय अपनी पत्नी स्वरूपकँवर के साथ जैतसागर विहार करते समय हाथी द्वारा नौका को उलट देने से गणगौर सहित मृत्यु को प्राप्त हो गये।102 उम्मेद सिंह ने अपने काका जौधसिंह के मरने से प्रतिबन्धित किये गये गणगौर के उत्सव को बून्दी में सावन मास की शुक्ल पक्ष की तीज के दिन पुनः स्थापना करवायी और एक बड़ा महोत्सव जैतसागर तालाब पर करवाया। इसके दूसरे दिन अपराह्न में गरज कर पानी बरसा। पानी की अधिक आवक के कारण एक जोरदार धमाके के साथ तालाब का पाल टूट गई और देखते ही देखते पानी कोसों तक फैल गया।103 राजा ने तालाब की पाल की मरम्मत करवाकर पुनः तैयार करवाया।

इसके अतिरिक्त हाड़ा राव उम्मेद सिंह ने तारागढ़ दुर्ग के मध्य एक मन्दिर और एक कोस लम्बा चौड़ा तालाब बनवाया और देव विलास के पास अग्निकोण में एक बड़े कुण्ड का निर्माण कराया और अपने महल शिकारबुर्ज मात्र जड़ाऊ पत्थरों से निर्मित एक नहर (नाला) का निर्माण करवाया जो कुण्ड (छोटा तालाब) से जुड़ी है और कुण्ड के पानी का स्रोत भी है।

‘तारागढ बिच हरि सदन, आयत कोस निवान
विष्णुसिंह नृप चरित बिच रचित कहे त्रय थान ।। 51।।
तास ढिगहि सिखि कोन तंह, रचित कुंड अभिराम
तासॉ लगि आवाच्य तट, धवल तुंग निज धाम।। 58।।


राजा विष्णुसिंह के शासनकाल में उनकी उपपत्नी सुन्दरशोभा ने गाँव में तालाब बनवाया और इस तालाब के किनारे एक सुन्दर घाट का निर्माण करवाया।104
“सुन्दर घट बनायो, सुन्दरशोभा खवासि संभर की।
हरि मन्दिर जुत ठायो, प्रासादगन जह ताल तटपुर मैं।। 147।।


(घ) शत्रुशल्य चरित महाकाव्य


संस्कृत साहित्य के अद्वितीय महाकवि विश्वनाथ द्वारा रचित इस महाकाव्य का नाम हाड़ा राजा शत्रुशल्य के नाम के आधार पर रखा गया है। विश्वनाथ एक प्रसिद्ध राजवैध थे। इस महाकाव्य में 22 सर्ग हैं जिनमें प्रारम्भ के 10 सर्गो में राजा शत्रुशल्य के वंश का, उनके पिता, पितामह आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है। महाकाव्य में महाकवि की श्रेष्ठता व संपुलता में प्राकृतिक तत्वों का वर्णन भी मिलता है। इस महाकाव्य के पन्द्रहवें सर्ग में वनों के मार्ग का, पर्वतों व नदियों की शोभा का तथा उन्नीसवें सर्ग में 190 पद्यों में विस्तृत रूप से षड़ऋतुओं का वर्णन दर्शनीय है।105

वर्षा ऋतु का चित्रण :-
विशन स्वेश्मप्रतिहारभूमि
समीपतः पीनपयोध रांसः।
चिंर वियोगान्य लिनाम्बसन्ता
कान्तामय प्रावृषमैक्षोच्चै।। शत्रु 19/129

बसन्त ऋतु का चित्रण :-
उतुड.+गमड.लमृदडि.तभृड.गुञ
माकन्दवृन्दविकसत्पिकनादनादि
मन्दानिलोतरलवल्लिताभिनीत
प्रावर्त्यतर्तुपतिना रतिनाथनाटयम्।।
आलिंड.गन भुजविटपलता बलानां
सोत्कम्प सदधर पल्लव च चुम्बन।
किज्वासा स्तवककुंच स्पृशन्नशड्क
कामीवाल सदनिलोऽथ दक्षिणात्यः।।

(ड़) “सुर्जन चरित महाकाव्य”
सुर्जन चरित महाकाव्य के रचियता चन्द्रशेखर राव सुर्जन के राज्याश्रित कवि रहे हैं। महाकवि ने अपनी एक मात्र कृति सुर्जनचरित्र महाकाव्य के अन्तिम श्लोक में अपना कुछ परिचय दिया है। इस श्लोक के अनुसार वे गौड़ देश (बंगाल) के निवासी थे। उनके पिता का नाम जितामित्र तथा कुल नाम अम्बप्ठ था। काशी में रहकर राव सुर्जन के अनुरोध से उन्होंने इस महाकाव्य का प्रणयन किया था।106

सुर्जनचरित्र में वर्णित है कि राव सुर्जन का सम्राट अकबर के साथ युद्ध वि. सं. 1626 (1569 ई.) के बाद वृद्धावस्था में राव सुर्जन काशीवास करने लगे। वहीं वाराणसी में रहते हुए उन्होंने अनेक घाट और तालाब व अन्य जलाशय बनवाकर जनता के लिये धर्म का कार्य किया ।107 राव सुर्जन पवित्र तीर्थों का सेवन करते हुए मकर सक्रान्ति के समय गंगा यमुना के संगम पर पहुँचे। संगम पर अनेक प्रकार के दान देकर राजा ने तुलादान भी किया काशी में गंगा तट पर मणिकर्णिका नामक घाट भी बनवाया।

संदर्भ
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22. शोधार्थी द्वारा चित्र लिया जाकर वर्णित।
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26. शोधार्थी द्वारा वर्णित
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28. वरदा वर्ष 14 अंक 4, पृ.सं. 32 अक्टू.-दिसं. 1971
29. दुर्गाप्रसाद माथुर- उपरोक्त, पृ.सं. 243
30. शोधार्थी द्वारा चित्र लिया जाकर वर्णित
31. वरदा, उपरोक्त, पृ.सं. 35
32. एस. आर. खान - उपरोक्त, पृ.सं. 282
33. चौथमाता के बाग के कुण्ड का लेख
34. डॉ. पूनम सिंह- उपरोक्त, पृ.सं. 137
35. रतनलाल मिश्र - उपरोक्त, भाग 4 पृ.सं. 124,
36. शोधार्थी द्वारा जमीन से निकलवाया जाकर फोटो लेकर वर्णित किया गया
37. इतवारी पत्रिका, 17 फरवरी 1991 कोटा
38. प्रभात कुमार सिंघल -हिन्दुस्तान के बोलते पत्थर 16 अक्टू. 1983 कोटा
39. शोधार्थी द्वारा वर्णित
40. हाड़ौतिका, वर्ष 13, पृ.सं. 14, जुलाई-सित. 2008 शिकारखाना हवेली रेतवाली कोटा
41. जगदीश सिंह गहलोत - राजपूताने का इतिहास, (कोटा राज्य) भाग-2 पृ. सं. 31 हिन्दी साहित्य मन्दिर जोधपुर 1960
42. बी.एन. धोधियाल - झालावाड़ ड्रिस्टीक गजेटियर पृ.सं. 295 गर्वनमेन्ट सेन्ट्रल प्रेस जयपुर, 1964
43. जगदीश सिंह गहलोत - उपरोक्त पृ.सं. 31
44. ललित शर्मा - झालावाड़ के प्रमुख शिलालेख पृ. स. 41 मालव लोक संस्कृति प्रतिष्ठान, उज्जैन 2013
45. एस. आर. खान- उपरोक्त पृ.सं. 206-207
46. रतनलाल मिश्र- उपरोक्त, भाग 4 पृ.सं. 89
47. डॉ मनोहर सिंह राणावत (सं.)-शोध साधना वर्ष 16 अंक 12 पृ.सं. 75-81 सीतामऊ मंदसौर 1995
48. ललित शर्मा - उपरोक्त, पृ. सं. 40
49. एस. आर. खान- उपरोक्त, पृ.सं. 208-209
50. ललित शर्मा - उपरोक्त, पृ. स. 96
51. शोधार्थी द्वारा लेख में देखकर अंकित किया गया
52. शोधार्थी द्वारा वर्णित
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54. हरिगढ़ की बही, उपरोक्त
55. भाण्डाहेड़ा की बही, उपरोक्त
56. माणस गाँव की बही, उपरोक्त
57. अटरू तालका की बही, उपरोक्त
58. खेड़ा तालका का बही, बस्ता न. 72 मन्जिल 2, मध्यवर्ती शाखा राज. राज्य अभिलेखागार कोटा, संवत् 1904
59. किशन विलास की बही, उपरोक्त
60. रायपुर की बही, बस्ता उपरोक्त
61. वाजेगाँव की बही, उपरोक्त
62. कावरियाँ की बही, उपरोक्त
63. कोठी तालका की बही, उपरोक्त
64. नन्दगाँव की बही, भण्डार 2 मन्जिल 2 बस्ता संख्या 203 संवत् 1867
65. रायपुर तालका की बही, उपरोक्त।
66. जगपुरा की बही, उपरोक्त।
67. मौजा बपापर तालका की बही, भण्डार 2 मन्जिल-2, बस्ता संख्या 453 संवत् 1909
68. रामखेडा की बही, भण्डार 2 मन्जिल 2 बस्ता संख्या 453 खण्ड-2 बही संख्या 4 संवत् 1909
69. नयापुरा की बही, मन्जिल 2 बस्ता संख्या के प्रथम खण्ड का बही संख्या 1 संवत् 1903
70. मोहीचालका की बही, बस्ता न. 257 खण्ड़ -2 सम्वत् 1866
71. खानपुर तालका की बही, बस्ता न. 257 भाग-2 बही न. 3 सम्वत् 1899
72. बस्ता संख्या 182 बही न. 4 सम्वत् 1904
73. बृजलाल जी की दुकान तालके की बही, बस्ता न. 182 भाग- 2 बही न. 1 सम्वत् 1907
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80. डॉ. नारायणसिंह भाटी- उपरोक्त, भाग-2 पृ.सं. 303-304
81. डॉ. नारायणसिंह भाटी- उपरोक्त, भाग-1, पृ.सं. 132
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86. ठा. कृष्ण स्वरूप गुप्ता एवं डॉ. गोपाल वल्लभ व्यास- उपरोक्त, अध्याय-7 पृ.सं. 97-102
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88. उपरोक्त, भाग-1 पृ.सं. 349
89. उपरोक्त, भाग-2 पृ.सं. 1161
90. उपरोक्त, भाग-3 पृ.सं.1463
91. उपरोक्त, भाग-4 पृ.सं. 1161
92. उपरोक्त, भाग- 4 पृ.सं. 2148
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94. उपरोक्त पृ.सं. 3275
95. स्व. प. रामकरण आसोपा- उपरोक्त, भाग-5 पृ.सं. 2291
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97. प्रगतिशील राजस्थान - बून्दी, पृ.सं. 55, जनसम्पर्क निदेशालय राजस्थान जयपुर 1967
98. चन्द्रप्रकाश देवल-उपरोक्त, भाग- 5 पृ.सं. 3490
99. उपरोक्त, पृ.सं. 3954-57
100. उपरोक्त, भाग-6 पृ.सं. 4200
101. उपरोक्त, पृ.सं. 4205
102. उपरोक्त, भाग-5 पृ.सं. 2856
103. उपरोक्त, भाग-7, पृ.सं. 5342
104. उपरोक्त, भाग-8, पृ.सं. 6018
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106. उमा शर्मा - हाड़ौती के संस्कृत महाकाव्यों का ऐतिहासिक मूल्याकंन पृ.सं. 154
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