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हाड़ौती के प्रमुख जल संसाधन (Major water resources of Hadoti)

Author: 
अनुकृति उज्जैनियाँ
Source: 
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

भारत के प्राचीन ग्रंथों में आरम्भ से ही जल की महत्ता पर बल देते हुए इसके संचयन पर जोर दिया गया है। ‘जलस्य जीवनम’ के सिद्धान्त को चरितार्थ करते हुए विश्व की समस्त प्राचीन सभ्यताओं का विकास विभिन्न नदियों की घाटियों में हुआ है।1 इसका मुख्य कारण यह है कि जल मानव जीवन के सभी पक्षों से जुड़ा रहा है। जल की उपयोगिता के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए मानव समाज ने जल संचय अथवा जल संग्रह के ऐसे अनेक स्रोतों का निर्माण तथा अन्वेषण किया, जिनसे जलापूर्ति की समस्याओं का निराकरण किया जा सके।

हाड़ौती आरम्भ से अनेक जल स्रोतों से समृद्ध रहा है। लोक कल्याण की भावना से युक्त होने के कारण यहाँ के नरेशों ने समय-समय पर अनेक जल स्रोतों का निर्माण करवाया। हाड़ौती के कृषि प्रधान होने के कारण कृषि भूमि को सिंचित करने की आवश्यकता महसूस हुई परिणामस्वरूप यहाँ के शासकों ने अनेक तालाबों, कुण्डों, बावड़ियों को बनवाया। ये कुण्ड व बावड़ियाँ राज्य की जनता के लिये सदियों तक पीने योग्य पानी उपलब्ध करवाते रहे। हाड़ौती के यह जल स्रोत जहाँ एक ओर यहाँ के नरेशों की जन कल्याण की भावना की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं तो वहीं दूसरी ओर ये हमारी सांस्कृतिक जरूरतों को भी सदैव पूर्ण करते रहे हैं।

समाज के समृद्ध लोगों के अलावा कभी-कभी दास दासियों और कम सुविधा सम्पन्न लोग भी इन जलस्रोतों का निर्माण करवाते थे, जो निजी और सार्वजनिक उपयोग हेतु बनाये जाते थे। शहरी परकोटे के अन्दर बनी बावड़ियाँ निर्माता परिवार की महिलाओं के स्नान के उपयोग के लिये होती थी। विशेष अनुमति लेकर बावड़ियों का उपयोग रास्तों से गुजरने वाले व्यापारिक काफिलों द्वारा भी किया जाता था। इसके अलावा बाहर से साधारण या पेयजल स्रोत दिखने वाली ये बावड़ियाँ सैनिक अभियानों के समय व आपातकालीन स्थितियों में एक नये रूप में उभरकर सामने आती थी।2

बावड़ियों का निर्माण शिकार हेतु सुरक्षित स्थल के रूप में जिन्हें शिकारगाह के नाम से पुकारते हैं वहाँ आने वाले शिकारियों को सुरक्षा प्रदान कराने हेतु भी किया जाता था। बावड़ियों का उपयोग दाह संस्कार के पश्चात स्नान करने हेतु भी किया जाता था इसलिये ये प्रमाणिक है कि बावड़ियाँ सामाजिक गतिविधियों की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी थी।

बून्दी के जल संसाधन


छोटी काशी के नाम से प्राचीन काल से ही विख्यात रहा बून्दी अपनी कलात्मक बावड़ियों एवं कुण्डों की वजह से बावड़ियों का नगर कहा जाता है। बून्दी के जलस्रोत सांस्कृतिक वैभव को भी अपने में समेटे हुए हैं। बून्दी के प्रमुख जलस्रोत निम्न हैं -

डूमरा बावड़ी


बून्दी नगर के नाहर के चौहटे चारभुजा मंदिर के पश्च भाग में यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी को बून्दी के पूर्व अधिपति जैता मीणा का पितामह मीणा आबू ने 1178 ई. में बनवायी थी एवं इसके नजदीक ही अभयनाथ महादेव का मन्दिर भी बनवाया था। मीणा आबू ने इसे बावड़ी को अपने डूम (कबीला) को संकल्प कर बख्श दिया था। जिससे इस बावड़ी का नाम डूमरा बावड़ी विख्यात हुआ।3 इस बावड़ी की गहराई 46 फीट, लम्बाई 30 फीट, चौड़ाई 26 फीट है। इसमें 10 फीट चौड़ी 18 सीढियाँ कुंडी तक जाती हैं।4

बड़े तोपखाने के कोट की बावड़ी


बून्दी की इस बावड़ी को राव सुरजन हाड़ा के काका पूरणमल के पौत्र मानसिंह के पुत्र हम्मीर सिंह ने 1583 ई. में बनवाया।5 इस बावड़ी का निर्माण वास्तु विधि के अनुसार किया गया है। एल आकार की यह बावड़ी पूर्व मुखी है। बावड़ी की लम्बाई 70 फीट, चौड़ाई 14 फीट है जिसमें कुल 75 सीढियाँ हैं। इस बावड़ी के निर्माण में छोटे-छोटे पत्थरों व चूने का प्रयोग किया गया है।6

डहरी बावड़ी


यह बावड़ी रावले के मुख्य दरवाजे के बायीं तरफ राम बाग से सटी हुई उत्तरमुखी बावड़ी है। इसे राव राजा भोज की खवास (उपपत्नी) रूपागर ने 1602 ई. में बनवाया। एल आकार की इस बावड़ी की लम्बाई 45 फीट, चौड़ाई 18 फीट एवं गहराई 60 फीट है। इस बावड़ी के निर्माण का उद्देश्य राम बाग, रावले व सैनिकों के लिये जलापूर्ति करना था। बावड़ी के प्रवेश द्वार पर एक तिबारी विश्राम स्थल के लिये बनाई गई थी। इस बावड़ी के ढह जाने के कारण इसका पुनर्निर्माण किया गया, इसीलिये इसे डहरी (ढही) हुई बावड़ी के नाम से जाना जाता है।

शुक्ल बावड़ी


इसे राव राजा रतन सिंह के शासन काल में 1615 ई. में शुक्ल रुद्र द्वारा बनवाया गया था इसलिये इसे शुक्ल बावड़ी कहते हैं।7 एल आकार की उत्तरमुखी यह बावड़ी वाटर वर्क्स कार्यालय के पास है। इस बावड़ी की लम्बाई 60 फीट, चौड़ाई 15 फीट व गहराई 59 फीट है। बावड़ी में 28 सीढियाँ हैं। बावड़ी के उत्तर की तरफ शुक्लेश्वर महादेव का मंदिर व गणेश जी की भव्य प्रतिमा स्थापित है।8 राव भावसिंह जी ने पहले से बनी शुक्ल बावड़ी का ढाबा बनाकर इसका पानी दुर्ग की भीम बुर्ज के नीचे धारा से पहुँचाया एवं वहाँ काष्ठ कला के द्वारा किले तक जल पहुँचाने का प्रबन्ध किया।

चतरा धाबाई बावड़ी


इस बावड़ी का निर्माण राव राजा शत्रुसाल के शासन काल में उनके भाई महासिंह जी के धाबाई चतरा के बेटे बीका ने 1644 ई. में करवाया था9 एवं अपने पिता के नाम पर इसका नाम चतरा धाबाई की बावड़ी रखा। पूर्वा मुखी यह बावड़ी एल आकार में है। बावड़ी की कुल 46 सीढियाँ व 4 पाटे इसमें समलम्ब चतुर्भुज आकार में नीचे तक गई हैं जो पानी तक पहुँच को सुलभ बनाती हैं इस बावड़ी की गहराई 55 फीट है।10

कालाजी देवपुरा की बावड़ी


कालाजी की बावड़ी गाँव देवपुरा जिला बून्दी में सड़क के सहारे स्थित है। इसे राव अनिरुद्ध सिंह के धाभाई देवा पुत्र विजयराम गुर्जर ने राजधाय माँ श्रीमती जैसाबाई की स्मृति में बनवाया। इस बावड़ी का व्यय भी धाय माँ की जेब खर्च राशि से हुआ जिसे 1683 ई. में नरेश अनिरुद्ध सिंह के शासन काल में प्रारम्भ किया तथा यह बावड़ी 1695 ई. में राव राजा बुद्धसिंह के शासन काल में पूर्ण हुई। इस बावड़ी की गहराई 94 फुट, लम्बाई 120 फुट व चौड़ाई 26 फुट है।11 यह बावड़ी सार्वजनिक है और जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। बावड़ी द्विस्तरीय है बावड़ी का शिलालेख 13 लाइनों का है, जो अस्पष्ट एवं अपठनीय है।12

कालीजी देवपुरा की बावड़ी बून्दी

व्यास बावड़ी


बून्दी नगर के तिलक चौक में चारभुजा नाथ मंदिर की उत्तरी दिशा में स्थित इस बावड़ी का निर्माण राव राजा अनिरुद्ध सिंह के शासन काल में 1682 ई. में दधिचि ब्राह्मण व्यास कमल नयन जी ने करवाया।13 पूर्वाभिमुखी यह बावड़ी 40 फीट लम्बी, 12 फीट चौड़ी है। बावड़ी में 13x14 वर्ग फीट की कुंडी है एवं कुंडी तक बावड़ी में 23 सीढ़ियाँ बनी हैं। बावड़ी में समान आकार से पत्थरों की चुनाई की गई है। बावड़ी के निर्माण का उद्देश्य दाधीच लोगों द्वारा अपने मोहल्ले में जल उपलब्ध करवाना था।

खोड़ी की बावड़ी


बून्दी में मीरा दरवाजे के बायीं तरफ 50 मीटर की दूरी पर स्थित इस बावड़ी का निर्माण राव राजा विष्णु सिंह के शासन काल में 1792 ई. में सनाढ्य ब्राह्मणी सुखाबाई ने धर्मार्थ करवाया था।14 सुखी बाई जिसका एक पैर बाला की बीमारी के कारण खराब हो गया था। इसलिये यह बावड़ी खोड़ी की बावड़ी के नाम से प्रसिद्ध थी। एल आकार की पश्चिम मुखी इस बावड़ी का निर्माण वास्तुविद्यानुसार किया गया है। बावड़ी में स्थित 63 सीढ़ियाँ पत्थरों से बनाई गई है। बावड़ी की दीवार की ताक में एक शिलालेख लगा है। बावड़ी के जल का उपयोग मीरा दरवाजे के अन्दर रहने वाले नगरवासी एवं रक्षक करते थे।

खोजागेट की बावड़ी


बून्दी में खोजागेट के अन्दर दायीं तरफ स्थित इस बावड़ी को रावराजा शत्रुसाल के शासन काल में 1644 ई. में सीलोर के छीपे खोजा पुरुषोत्तम पुत्र गणेश ने बनवाया था। इसके परिक्षेत्र में खोजा गौत्र के छीपे रहा करते थे। इसलिये यहाँ के द्वार का नाम खोजागेट रखा। खोजागेट शहर पनाह के भीतर स्थित इस बावड़ी पर कमनियाँ लगी हैं। इस बावड़ी की सुरक्षा हेतु रावराजा शत्रुसाल ने परकोटे एवं दरवाजे भी 1654 ई. में बनवाये।15 पश्चिम मुखी यह बावड़ी 108 फीट लम्बी व 20 फीट चौड़ी है। इस बावड़ी के ऊपर 2 मंजिला दरवाजे बने हुये हैं। इन लम्बवत दरवाजों के ऊपर 22 फीट लम्बा व 8 फीट चौड़ा कबाण्या बनी हुई हैं। कबाण्या का अर्थ घुमावदार छज्जे एवं छतयुक्त भवन हैं। यह छज्जे प्राकृतिक शीतलता के लिये उपयोग किये जाते थे।16

गणेश बाग की बावड़ी


ग्राम देवपुरा में गणेश बाग में स्थित इस बावड़ी को राव राजा अनिरुद्ध सिंह की रानी नमाना वाले नाथावत जी श्रीमती लाड़कंवर ने बनवाकर अपनी खवास के नाम संकल्प कर दिया था। राव राजा बुद्धसिंह ने 1717 ई. में बावड़ी की उत्तर पूर्व दिशा में एक गणेश जी का मंदिर बनवाया था जहाँ गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर एक मेला भरता है। बावड़ी में उत्तर व दक्षिण में 2 प्रवेश द्वार होने के कारण इस बावड़ी का आकार अंग्रेजी के T वर्ण की तरह है। बावड़ी में कुल 38 सीढ़ियाँ हैं। बावड़ी का उपयोग धर्मशाला में रुकने वाले मुसाफिरों एवं गणेश बाग में जलापूर्ति हेतु किया जाता था।

पंडितजी की बावड़ी


पंडितजी की बावड़ी अंधोरा ग्राम तहसील इन्द्रगढ़ में स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण 1723 ई. में पुरोहित जसदेव के पुत्र हरदेव द्वारा ग्राम वासियों एवं कृषि भूमि की सिंचाई के लिये पुण्यार्थ करवाया गया था।17 उत्तराभिमुखी यह बावड़ी 50 फीट लम्बी व 15 फीट चौड़ी है। बावड़ी की कुल गहराई 50 फीट है। बावड़ी में कुल 50 सीढियाँ हैं।18 बावड़ी के प्रवेश द्वार पर चौखटे बनी हुई हैं। दायीं तरफ एक कीर्ति स्तम्भ गढ़ा हुआ है जिस पर बावड़ी बनाने का लेख उकेरा गया है। बावड़ी कलात्मक रहित एवं बहुत साधारण है।

बिबनबा बावड़ी


बून्दी से 4 कि.मी. दक्षिण-पूर्वी दिशा में बिबनवा गाँव के पश्चिमी दिशा में यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण राव सुभाण्डदेव के शासनकाल में 1485 ई. में बेगम बिबनबा ने करवाया और यहीं बिबनबा नामक गाँव बसाया।19 इस बावड़ी का निर्माण समरकंदी की सेना एवं बिबनबा ग्राम के लिये जलापूर्ति के लिये किया गया था। पूर्वाभिमुखी यह बावड़ी 74 फीट लम्बी व 18 फीट चौड़ी है। बावड़ी में कुल 40 सीढ़ियाँ हैं। बावड़ी की कुल गहराई 45 फीट है।

शिवजी की बावड़ी


बून्दी से 8 कि.मी उत्तर-पश्चिम दिशा में बोरखण्डी ग्राम के दायीं तरफ निजी खेत में यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण 1712 ई. में गुर्जर पिथा के पुत्र मोहन ने करवाया और छतरी में महादेव की स्थापना माधाचन्दजी बोरासुखा ने की।20 यह बावड़ी 60 फीट लम्बी व 10 फीट चौड़ी है। बावड़ी की 8वीं सीढी के बायीं दीवार पर एक शिलालेख अंकित है। बावड़ी में कुल 46 सीढियाँ तथा गहराई 60 फीट है।21 बावड़ी के निर्माण का उद्देश्य ग्राम वासियों एवं महादेव की छतरी के लिये जल उपलब्ध करवाना था।

चाँदशाह की चौकी की बावड़ी


बून्दी से बाणगंगा के रास्ते में क्षारबाग के सामने चाँदशाह के महल एवं बावड़ी बनी हुई है। इस स्थान पर चाँदशाह नाम का फकीर आकर रहने लगा था। इस फकीर के लिये राव नारायणदास राज में सरकारी खर्चे से महल व यह बावड़ी 1489 ई. में बनवाये गये।22 दक्षिणामुखी यह बावड़ी 50 फीट लम्बी व 12 फीट चौड़ी है। वर्तमान में इस बावड़ी के पानी का उपयोग चाँदशाह की मजार पर आने वाले श्रद्धालुओं हेतु हो रहा है।

सोमाणियों की बावड़ी


बून्दी नगर में धाभाई के चौक में स्थित इस बावड़ी का निर्माण राव राजा शत्रु शल्य जी के राज्य में सोमाणी वंश के लीला नारायण ने करवाया था।23 अंग्रेजी के एल आकार में पश्चिमामुखी यह बावड़ी 92 फीट लम्बी व 14 फीट चौड़ी है। इस बावड़ी में कुल 77 सीढ़ियां हैं। बावड़ी का निर्माण धर्मार्थ करवाया गया था।

तालाब गाँव की बावड़ी


बून्दी की हिड़ौली तहसील के तालाब गाँव में जोधसागर के किनारे राष्ट्रीय राजमार्ग के एक तरफ मंदिर व दूसरी तरफ यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी व मंदिर का निर्माण महाराव उम्मेदसिंह के शासन काल में महाराजा दीपसिंह की जागीरी के जोधसागर में 1756 ई. गुर्जर गोड़ ब्राह्मण बाई सुरूपा ने करवाया था।24 दक्षिणामुखी यह बावड़ी 45 फीट लम्बी व 15 फीट चौड़ी है। बावड़ी 45 फीट गहरी है। बावड़ी का निर्माण चूने से पत्थर की चिनाई करके दीवारों व पाटों पर पाषाण पट्टिकाएँ लगाकर किया गया है। बावड़ी के ढाणे के नीचे बनी तिबारी राहगीरों व स्थानीय निवासियों के आरामगाह के रूप में काम आती है।

सीसोला पनघट की बावड़ी


दुगारी गाँव के तालाब की दूसरी तरफ गाँव सीसोला में पूर्वाभिमुखी 60 फीट लम्बी व 17 फीट चौड़ी पनघट की बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण 1748 ई. में पुरोहित नवलराम जी ने करवाया था।25 इस बावड़ी में कुल 40 सीढ़ियां हैं और गहराई 25 फीट है। बावड़ी से जल निकासी हेतु पश्चिमी दिशा में बने ढाणे पर रस्सियों के निशान यह दर्शाते हैं कि इस बावड़ी से सिंचाई एवं पेयजल हेतु चड़स चलाये जाते थे। बावड़ी के लेख से स्पष्ट होता है कि बावड़ी पुण्यार्थ बनवाई गई थी। इस बावड़ी से महिलाएँ जल भर-भर कर ले जाती थी इसलिये इस बावड़ी को पनघट की बावड़ी कहा जाने लगा।

नौ चौकी की बावड़ी


सीसोला गाँव में स्थित नौ चौकी की बावड़ी का निर्माण 1736 ई. में पुरोहित भक्तिराम जी ने करवाया था26 एवं पास ही एक सराय भी बनवाई थी। पूर्वाभिमुखी नौ चौकी बावड़ी की लम्बाई 55 फीट व चौड़ाई 16 फीट है जिस पर विशाल स्तम्भोंयुक्त तिबारी बनी हुई है। बावड़ी के आस-पास देवताओं के नौ चौकियाँ होने के कारण इसका नाम नौ चौकी की बावड़ी पड़ा।

सीलोर बालाजी की बावड़ी


बून्दी से सीलोर मार्ग पर 3 कि.मी. दूर नहर के किनारे दायीं तरफ यह बावड़ी स्थित है। यहाँ बालाजी का चमत्कारी स्थान भी बना हुआ है। यह बावड़ी मीणों के शासन काल में मीणा जेता के कामदार जसराज गोलवाल राजपूत द्वारा 1226 ई. में बनवाई गई।27 इस बावड़ी में कुल 27 सीढ़ियां बनी हुई हैं। बावड़ी की गहराई 36 फीट है। इस बावड़ी से यहाँ की 30 बीघा जमीन की सिंचाई होती थी। बावड़ी का निर्माण सीलोर की तरफ जाने वाले राहगीर एवं युद्ध में पड़ाव डालने वाले सैनिकों की जलापूर्ति हेतु करवाया गया था।

सीलोर व्यास बावड़ी


सीलोर ग्राम के दायीं तरफ यह पश्चिममुखी बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण इणान्या व्यास सुखदेव जी के पुत्रों भगतीराम एवं हरीबख्श द्वारा 1615 ई. में सर्व कल्याण की भावना से करवाया था।28 यह बावड़ी 60 फीट लम्बी व 20 फीट चौड़ी है। इस बावड़ी में कुल 39 सीढ़ियां हैं एवं बावड़ी की गहराई 70 फीट है। बावड़ी के पूर्वी तरफ पानी निकासी हेतु बने ढाणे को बड़ी शिलाओं की मरगोलों पर टिकाया गया है। इस बावड़ी के पास एक शिखरबद्ध महादेव मंदिर बना हुआ है।

बंगेश्वरी माता की बावड़ी


बून्दी से बीजोलिया जाने वाले मार्ग पर बून्दी से 10 कि.मी. दूर मुख्य मार्ग से बायीं तरफ यह बावड़ी व प्राचीन बंगेश्वरी माता का मंदिर स्थित है। इस बावड़ी व मंदिर का निर्माण बंगदेव के समय बून्दी के संस्थापक देवसिंह के द्वारा करवाया जाकर अपने पिता के नाम पर बंगेश्वरी माता की बावड़ी रखा। पश्चिममुखी यह बावड़ी 45 फीट लम्बी व 12 फीट चौड़ी है। बावड़ी के प्रवेश द्वार पर बंगेष्वरी माता का मंदिर स्थित है। बावड़ी में कुल 25 सीढियाँ बनाई गई है जो इसके पानी तक पहुँच को सुलभ बनाती है। बावड़ी में चतुर्मुखी विष्णु, सिंह, गाय एवं एक अन्य आकृति को दरवाजे पर लगाया गया है।

रामगंज बालाजी की बावड़ी


बून्दी से 5 कि.मी. दूर बून्दी-कोटा मार्ग पर रामगंज बालाजी के मंदिर के सामने यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण महाराव अनिरुद्ध सिंह की धाय माँ जसी बाई के द्वारा 1682 ई. में करवाया गया था। इसे अनिरुद्ध सिंह ने जमीन सहित अपने वंशज सरदार सिंह को दान में दे दिया था।29 पूर्वाभिमुखी यह बावड़ी 60 फीट लम्बी व 15 फीट चौड़ी है। बावड़ी की गहराई 40 फीट है एवं बावड़ी में 25 सीढ़ियां बनाई गई है। इस बावड़ी का निर्माण बालाजी के मंदिर एवं वहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के धर्मार्थ किया गया था।

शालिन्दी दर्रे की बावड़ी


लाखेरी से इन्द्रगढ़ जाने वाले मार्ग पर शालिन्दी दर्रे पर यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण 1756 ई. में रविकरण के पुत्र द्वारकादास की बहु सूरज कंवर द्वारा करवाया गया था।30 इस बावड़ी की लम्बाई 107 फीट व चौड़ाई 25 फीट है। बावड़ी में कुल 51 सीढ़ियां हैं एवं बावड़ी की कुल गहराई 50 फीट है। बावड़ी का निर्माण पत्थरों की चूने से चिनाई कर किया गया है। बावड़ी में जल उपलब्ध है। बावड़ी के आस-पास गणेशजी एवं बालाजी के मंदिर हैं।

भाटों की बावड़ी


भाटों की बावड़ी बून्दी जिले की इन्द्रगढ़ तहसील के ग्राम लाखेरी गणेशपुरा में स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण 1667 ई. में रावराजा श्री भाव सिंह के राज्य काल में पुरोहित लीलापति तथा भाट नरहरदास ने करवाया। बावड़ी का नांगल भाट नरहरदास, हरीहरदास, खेमा, दीपाराम तथा नरहरदास की बहु इन पाँचों के द्वारा किया गया।31 यह बावड़ी 59 फीट लम्बी व 16 फीट चौड़ी है। बावड़ी में कुल 50 सीढ़ियां बनी हुई है। बावड़ी की गहराई 59 फीट है। भाटों द्वारा अपनी बस्ती एवं पशुओं के लिये जलापूर्ति की उद्देश्य से इस बावड़ी का पुण्यार्थ निर्माण करवाया था।

खजूरी बावड़ी


बून्दी से 16 कि.मी. दूरी पर पहाड़ियों के मध्य स्थित खजूरी गाँव से 3 कि.मी. आगे नले में प्राचीन मंदिर समूह के सामने यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण 1504 ई. में धर्ममूर्ति रावल ने करवाया था।32 बावड़ी का निर्माण गड्ढा खोदकर किया गया। बड़ी-बड़ी घनाकार पाषाण शिलाओं को एक के ऊपर एक रखकर बावड़ी की दीवारें व सीढ़ियां बनाई गई। पूर्वाभिमुखी यह बावड़ी 25 फीट लम्बी व 8 फीट चौड़ी बावड़ी में कुल 15 सीढ़ियां हैं। बावड़ी की गहराई 20 फीट है। बावड़ी के जल का उपयोग इसके पास बने आश्रम की जलापूर्ति एवं खेली बनाकर जंगली एवं पालतू जानवरों को जल की व्यवस्था हेतु होता था।

धावड़ की बावड़ी


धावड़ की बावड़ी को गुर्जर गंगाराम ने 1702 ई. में महाराव राजा बुद्धसिंह के शासन काल में चारागाह में मवेशियों की पेयजल समस्या के निदान के लिये निर्मित करवाया गया था। यहाँ पूर्व में एक बाग भी था जिसे भी गंगाराम ने भव्यता प्रदान की। यह बावड़ी ग्राम कुंवारती के रास्ते में स्थित है। इस बावड़ी की लम्बाई 48 फीट व चौड़ाई 20 फीट व गहराई 45 फीट है। बावड़ी में कुल 40 सीढ़ियां हैं। इस बावड़ी का निर्माण राहगीरों, बाग में पानी की पूर्ति एवं चारागाह में मवेशियों की पेयजल समस्या के समाधान हेतु किया गया था।33

हीराखाती की बावड़ी


बून्दी राष्ट्रीय राजमार्ग पर हिण्डोली से आधे किलोमीटर की दूरी पर शिखरबद्ध शिव मंदिर के सामने यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण 1654 ई. में हीराखाती की बहु पार्वती द्वारा करवाया गया था।34 अंग्रेजी के एल आकार में निर्मित यह बावड़ी 40 फीट लम्बी व 14 चौड़ी है। बावड़ी के निर्माण का उद्देश्य महादेव मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं व राहगीरों को जल उपलब्ध करवाना था। वर्तमान में यह बावड़ी आस-पास की भूमि की सिंचाई में प्रयुक्त हो रही है।

गुता ग्राम की बावड़ी


बून्दी से लाखेरी मार्ग पर गेण्डोली के थोड़ा आगे गुता ग्राम में सड़क किनारे यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण शाह पन्ना द्वारा गुता ग्राम की जनता, राहगीरों, पशुओं एवं कृषि भूमि की जलापूर्ति के उद्देश्य से धर्मार्थ करवाया गया था।35 बावड़ी उस समय गुता ग्राम के जलापूर्ति की मुख्य धुरी थी। पूर्वाभिमुखी यह बावड़ी 45 फीट लम्बी व 12 फीट चौड़ी है। बावड़ी की निर्माण शैली साधारण व कलात्मकता रहित है।

गेन्डोली बावड़ी


बून्दी से 40 कि.मी. दूर लाखेरी मार्ग पर छोटी एवं बड़ी गेन्डोली के मध्य मार्ग के बायीं तरफ यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी को महन्त के कहने पर श्री माधोलाल ने 1645 ई. में बनवाया था।36 पूर्वाभिमुखी अंग्रेजी के एल आकार में निर्मित यह बावड़ी 45 फीट लम्बी व 12 फीट चौड़ी है। बावड़ी में मिट्टी के भर जाने से सीढ़ियों की संख्या तथा गहराई ज्ञात करना संभव नहीं है। बावड़ी के लेख में अंकित है कि यह बावड़ी चार गाँवों के खेतों पर काम करने वाले किसानों एवं उनके मवेशियों की प्यास बुझाती थी एवं गाँव के बाहर होने के कारण राहगीरों के लिये भी जलापूर्ति का साधन थी।

डाटुन्दा बावड़ी


बून्दी से सथूर मार्ग पर स्थित डाटुन्दा के बाहर हरराज हाड़ा की छतरी के पास यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण रामलदेव के पुत्र नरबददेव की बहू बलंगा सोलंकनी के द्वारा करवाया गया था।37 पूर्वाभिमुखी इस बावड़ी की लम्बाई 50 व चौड़ाई 15 फीट व गहराई 45 फीट है। बावड़ी का निर्माण बड़े-बड़े घनाभकार पाषाण शिलाओं द्वारा किया गया है। बावड़ी के ढाणे के पास जानवरों की जलापूर्ति हेतु कलात्मक खेल बनी हुई है। बावड़ी में कुल 29 सीढ़ियां हैं। बावड़ी का निर्माण रण क्षेत्र में होने के कारण इसके जल का उपयोग युद्ध सैनिकों, चरवाहों, जंगली जानवरों के लिये होता था।

इमलियों की बावड़ी


बून्दी से सथूर मार्ग पर डाटुन्दा ग्राम के मध्य में इमलियों के वृक्षों के पास यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण 1570 ई. में माधो के पुत्र रामलदेव ने करवाया था।38 पूर्वाभिमुखी यह बावड़ी 62 फीट लम्बी व 20 फीट चौड़ी व 50 फीट गहरी है। बावड़ी का निर्माण कलात्मकता लिये हुये हैं। बावड़ी में लगी बड़ी-बड़ी पाषाण मरगोलें इंगित करती हैं कि इस बावड़ी से भारी मात्रा में एकसाथ जल निकाला जाता था।

धाबाइयों के नये गाँव की बावड़ी


बून्दी से दबलाना जाने वाले मार्ग पर 16 कि.मी. दूर धाबाइयों के नये गाँव के गढ़ के पास यह विशाल बावड़ी स्थित है। महाराव राजा श्री विष्णु सिंह जी के राज्य समय में मुख्य महामंत्री धाबाई गुर्जर ने बाग, बावड़ी एवं मंदिर का निर्माण 1795 ई. में करवाया था।39 जिसका उद्देश्य मंदिर, बाग एवं पास में बने धाबाई के महलों में जलापूर्ति करना था। यह बावड़ी धरातल से 3 फीट ऊँची है। बावड़ी के प्रवेश द्वार तक पहुँचने हेतु 6 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इस बावड़ी के प्रवेश द्वार के पास दायीं तरफ सगस बाबा की नई छतरी बनाई गई है।

अमरनाथ महादेव की बावड़ी


इस भव्य बावड़ी को कोतवाल रामचन्द्र दाबड़ा गौड़ ब्राह्मण पुत्र प्रेमा पौत्र चतुर्भज ने नरेश बुद्धसिंह के शासन काल में 1703 ई. में बनवाया था। रामचन्द्र नरेश भावसिंह का बड़ा कृपा पात्र था तथा उनके शासन काल में कोतवाल का कार्य करता था।

चैनराय जी के कटले की बावड़ी


चैनराय जी के कटले से चूड़ी बाजार एवं लाल बिहारी जी के मंदिर के रास्ते में यह बावड़ी काफी विशाल बनी हुई है। यह कटले के पश्चिमी दरवाजे के दक्षिण की ओर बनी हुई है। इसे राव भोज की पटरानी बालणोत जी ने 1601 ई. में बनवाया तथा सराय ओर बाग भी इन्हीं ने बनवाये।40

वैद्यनाथ महादेव के सामने की बावड़ी


वैद्यनाथ महादेव के सामने स्थित यह पूर्वमुखी बावड़ी जमना बावड़ी के नाम से प्रसिद्ध है। इस बावड़ी का निर्माण उम्मेदसिंह के शासनकाल में 1753 ई. में स्वामी महन्तनाथ की चैली जमना ने जनसहयोग लेकर बनवाया था। इसी बावड़ी के समीप स्वामी महन्तनाथ का स्थान भी स्थित है। जिसे उर्द्ध अंगा का स्थल भी कहा जाता है। एल आकार की इस बावड़ी का निर्माण वास्तु विधि के अनुसार किया गया है।

डाक बंगला बावड़ी


यह बावड़ी राव राजा शत्रुसाल के शासन काल में उनकी आठवीं रानी राणावत जी उदयपुर वाले श्रीमती चन्द्रकुमारी द्वारा 1639 ई. में बनवाई गई तथा आषाढ़ बुदी पूनम को डोरा किया गया।41 इस परिक्षेत्र में राव राजा रामसिंह के शासन काल में एक बाग भी 1903 ई. में बनवाया गया। बाद में यहाँ डाक बंगला एवं सर्किट हाउस के निर्माण हुए तथा इसकी परिसीमाओं का मन भावन सौंदर्यकरण किया गया।42

धौला देवरा की बावड़ी


इस बावड़ी को नरेश राव भावसिंह के शासन काल में 1673 ई. में चन्देरिया ब्राह्मण घासीराम द्वारा बनवाया गया। यह बावड़ी सामरिक महत्त्व रखती थी तथा इसे रण क्षेत्र के बीचों बीच सेनाओं की पेयजल की समस्या हल करने के लिये निर्मित करवाया गया था। शासकीय सेनाओं का यहाँ सतत पड़ाव रहता था। प्राचीन काल में यहाँ बहुचर्चित रणक्षेत्र भी था।43

सथूर दर्रा की बावड़ी


बून्दी नगर में मेंढक दरवाजे व बाला कुण्ड के मध्य में साधुआें की बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी को तुलसीदास दावड़ा ने 1638 ई. में रावराजा शत्रुसाल के शासन काल में बनवाया था। यह बावड़ी सथूर दर्रा के भीतर स्थित है तथा उत्तरमुखी है इस बावड़ी के पश्चिम की तरफ कई साधुओं के चबूतरे बने हैं इन्हीं साधुओं की जल आवश्यकता की पूर्ति हेतु इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया।

महादेवजी महाराज की बावड़ी


केशोरायपाटन तहसील के जोस्याखेड़ा ग्राम में महादेवजी महाराज की बावड़ी स्थित है। यह बावड़ी बहुस्तरीय सीढ़ियों वाली है, जिसमें चारों तरफ समानान्तर सीढ़ियाँ नीचे उतरती हैं। बावड़ी में वर्तमान में पानी है जिसका उपयोग आम जन द्वारा पीने एवं नहाने में किया जा रहा है।44

रामगंज कुण्ड


बून्दी से रामगंज बालाजी के रास्ते पर दाँयीं तरफ रेलवे पथ के पास एक कुण्ड बना हुआ है। जिसे रामगंज कुण्ड कहते हैं। आयताकार आकार में पूर्वाभिमुखी यह कुण्ड 40 फीट लम्बा व 35 फीट चौड़ा है। इस कुण्ड की कुल गहराई 52 फीट है। इस कुण्ड का निर्माण महाराव अनिरुद्ध सिंह के शासन काल 1711 ई. में अनिरुद्ध सिंह की धाय माँ जसी बाई, उनके पति विजयराम एवं पुत्र देवा ने करवाया था। इस कुण्ड का निर्माण बून्दी से कोटा जाने वाले राहगीरों, व्यापारियों, पशुओं व चरवाहों के लिये सुलभ जल उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से धर्मार्थ किया गया था। यह कुण्ड अब निजी कृषि भूमि में होने के कारण सिंचाई के लिये जलापूर्ति कर रहा है।

चौथमाता के बाग का कुण्ड


बून्दी से जेतसागर होते हुए बाणगंगा पहुँचने पर पहाड़ी पर प्रसिद्ध चौथमाता मंदिर स्थित है। इस मंदिर की पहाड़ी के नीचे बाग में एक कुण्ड स्थित है। इस कुण्ड का निर्माण महाराजा श्री उम्मेदसिंह के राज्य काल में इनके निकटस्थ ब्राह्मण गुर्जर गोड़ नुवाल्या तिवाड़ी मोती राम जी के पुत्र राम लक्ष्मण जी ने अपने पुत्र श्री प्रसादजी के विवाह उपलक्ष में इस बावड़ी का निर्माण यात्रियों के लिये धर्मार्थ करवाया गया था।45 45 फीट भुजा का यह वर्गाकार कुण्ड काफी कलात्मक व सुन्दर बना हुआ है। इस कुण्ड की गहराई 30 फीट है। कुण्ड में उत्तरी-पूर्वी दीवार पर एक शिलालेख लगा हुआ है।

बडारण कुण्ड


बून्दी के जैतसागर पाल के नीचे सड़क के किनारे यह कुण्ड स्थित है। 33 फीट बाहरी भुजा के वर्गाकार कुण्ड का आन्तरिक आकार 25 वर्ग फीट है। इस कुण्ड में चारों तरफ प्रवेश संभव है। इस कुण्ड का निर्माण महाराव राजा उम्मेद सिंह के समय में आरम्भ हुआ और महाराव विष्णु सिंह के शासन काल में 1755 ई. में पूर्ण हुआ। इस कुण्ड का निर्माण राज बडारण नृत सुन्दर द्वारा करवाया गया। इसलिये यह कुण्ड बडारण कुण्ड कहलाने लगा। कुण्ड की कुल गहराई 25 फीट है। कुण्ड का निर्माण पत्थर व चूने से किया गया है। कुण्ड के जल का उपयोग राहगीरों व स्थानीय जनता के जलापूर्ति हेतु किया जाता है।

ओगड़ का कुण्ड


बून्दी में बाणगंगा के आगे बायीं तरफ पुराने शमशान द्वार के दाँयें तरफ यह कुण्ड स्थित है। इस कुण्ड का निर्माण 1705 ई. में महाराव बुद्धसिंह के शासन काल में गोरख जी हाड़ा के बेटे रामसिंह जी के पोते द्वारिकादास हाड़ा ने करवाया था। इस कुण्ड के प्रवेश द्वार पर लगी साधुओं की प्रतिमाएँ स्पष्ट करती हैं कि साधुओं के अखाड़े में साधुओं के जलापूर्ति के उद्देश्य से इस कुण्ड का निर्माण करवाया गया था।

बोरखण्डी बालाजी का कुण्ड


बून्दी से 8 कि.मी. उत्तर-पश्चिम दिशा में बोरखण्डी ग्राम के बालाजी के मंदिर के पास यह प्राचीन कुण्ड स्थित है। इस कुण्ड का निर्माण राव नारायणदास के शासन काल में माधवसिंह एवं गोरा ने इस कुण्ड को बनवाया।46 दक्षिण-पश्चिम मुखी यह आयताकार कुण्ड 40 फीट लम्बा व 30 फीट चौड़ा है। इस कुण्ड के निर्माण का उद्देश्य सती स्थान पर आने वाले श्रद्धालुओं एवं कृषि भूमि की सिंचाई हेतु करवाया गया था।

अमरनाथ महादेव का बड़ा कुण्ड


इस भव्य कुण्ड को रावराजा शत्रुसाल के शासन काल में शत्रुसाल की धाय माँ प्रथादेवी ने बनवाना प्रारंभ किया जो नरेश बुद्ध सिंह के शासनकाल में 1695 ई. में बनकर पूर्ण हुआ। इस कुण्ड के ऊपर का हिस्सा दीवार उठवा कर नागर ब्राह्मण किशन चन्द्र ने राजा बुद्धसिंह के समय ही यहाँ बाग भी बनवाया।

हर्षदा माता के समीप का कुण्ड


चौगान गेट के पास हर्षद माता मन्दिर के पीछे यह कुण्ड स्थित है। यह कुण्ड जयपुरिया का कुण्ड कहलाता है क्योंकि इसे जयपुर के खत्री ने बनवाया। यह खत्री हलवाई का काम करता था तथा बून्दी में आकर बस गया था।47 इसे हर्षदा माता का इष्ट प्राप्त था इसलिये 1749 ई. में महाराव विष्णुसिंह जी के शासनकाल में हर्षदा माता का मंदिर भी बनवाया गया था। तथा इस कुण्ड का निर्माण भी 1749 ई. के लगभग हुआ। इस कुण्ड को राहगीरों की पेयजल व्यवस्था हेतु बनवाया गया था।

जैतसागर तालाब


बून्दी के उत्तर-पूर्व में स्थित इस तालाब को जैतसागर कहते हैं।48 बून्दी नगर के लोग इसे बड़ा तालाब भी कहते हैं। यह पहाड़ों के मध्य में स्थित एक सुन्दर तालाब है जिसको बून्दी के मीणा राजा जैता ने 13वीं शताब्दी में बनवाया था।49 राव सुर्जनसिंह की माता जयवंती ने 1568 ई. में इसे खुदवाकर तथा पाल बंधवाकर इसे बड़ा बनवाया था।50 इस तालाब को व्यवस्थित रूप जयवंती जी ने ही प्रदान करवाया था। इससे पहले यह पहाड़ों के मध्य स्थित एक बड़े नाले के रूप में था। राव सुर्जन की माता जयवंती द्वारा बनवाई गई तालाब की पाल अतिवृष्टि के कारण 1749 ई. के श्रावण शुक्ल 4 की रात्रि को खण्डित हो गई जिसे पुनः महाराव राजा विष्णुसिंह ने धाय भाई सुखराम की कामदारी में 1778 ई. में बनवाया।51 जैतसागर तालाब 4455 हेक्टेयर भूभाग में फैला हुआ है। यह वही जैतसागर तालाब है जिसमें महाराव राजा बुद्धसिंह के अनुज जोधसिंह गणगौर उत्सव के समय अपनी पत्नी स्वरूप कँवर व कुछ साथियों सहित नौका विहार करते समय हाथी द्वारा नौका को उलट देने से गणगौर सहित जल में डूब कर मृत्यु को प्राप्त हो गये थे।52

तब से यह कहावत है कि “हाड़ो ले डूब्यो गणगौर” प्रचलित हो गई। उसके बाद गणगौर का उत्सव दीर्घकाल तक प्रतिबन्धित रहा। राजपूतों की यह मान्यता है कि यदि ऐसे प्रतिबन्धित उत्सव के दिन राज परिवार में किसी पुत्र का जन्म हो जाए, तो उक्त उत्सव पुनः मनाना आरम्भ कर दिया जाता है। इसी क्रम में महाराव राजा रघुवीर सिंह के भ्राता बांसी के जागीदार रघुराज सिंह के पुत्र ईश्वरीसिंह जिन्हें कालान्तर में महाराव का उत्तराधिकारी मनोनीत किया गया था, का जन्म 8 मार्च 1893 ई. को हुआ। यह गणगौर का दिन था इसी कारण इस उत्सव को पुनः आरम्भ करने की घोषणा कर दी गई।53 इस प्रकार यह स्पष्ट है कि बून्दी की सांस्कृतिक परम्पराओं में बून्दी नरेश गणगौर की प्रतिमा को नौका में रखकर जैतसागर तालाब में नौका विहार करते थे।

जैतसागर तालाब के किनारे पर सुखमहल स्थित है।54 जिसका निर्माण महाराव राजा विष्णुसिंह ने 1778 ई. में करवाया तथा इसका नाम अपने धाय भाई सुखराम के नाम पर ही सुखमहल रखा। यह महल इस तालाब के नैसर्गिक सौन्दर्य को दोगुना कर देता है। सुखमहल की मुख्य इमारत जो कि तीन मंजिलि है, 3255 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैली हुई है। इसका एक भाग पानी में डूबा रहता है। सुखमहल मुख्य आधार से 40 फीट ऊँचाई अपने में समेटे हुए है। इस इमारत के आगे 7980 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला एक रमणीक उद्यान भी स्थित है, जहाँ 1886 ई. में रूडयार्ड किपलिंग ने दो रात्रि विश्राम किया था।55 किपलिंग उन दिनों सिविल एण्ड मिलेक्ट्री गजट में पत्रकार के रूप में कार्य करते थे। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि नरेशों के विशिष्ट आमंत्रित अति यहाँ पर भी आकर ठहरते थे। जैतसागर वर्षों से गढ़वाल, कामनहील, साबलर जैसे अप्रवासी पक्षियों के अलावा सारस, बगुले, बतखें जैसे हजारों पक्षियों का आश्रय स्थल बना हुआ है। कुछ समय के लिये यहाँ देश-विदेश से पक्षी भ्रमण के लिये भी आते हैं। बरसात में जब इस तालाब का ओटा (बाट-चद्दर) चलने लगता है उस समय यहाँ का दृश्य बड़ा सुहावना लगता है।56

जैतसागर तालाब बून्दी

कनक सागर


कनक सागर तालाब तात्कालिक बून्दी राज्य के दुर्गाहारी (दुगारी) गाँव में प्राकृतिक सौन्दर्य को अपने में समेटे हुए स्थित है। इसका निर्माण राव राजा सुर्जनसिंह (1554-1585 ई.) की रानी कनकवती ने 1570 ई. में करवाया था।57 इसलिये इसे कनक सागर कहा जाने लगा। दुर्गाहारी ग्राम उस समय रानी कनकवती की जागीर में था।58 कनक सागर बून्दी राज्य का सबसे विशाल तालाब है, जो चार वर्ग मील क्षेत्र में फैला हुआ है।59 तालाब जहाँ एक ओर दुर्गहारी ग्राम के आस-पास की हजारों एकड़ भूमि को सिंचित करता है। वहीं दूसरी ओर ग्राम की सांस्कृतिक व धार्मिक परम्पराओं का एक मात्र रक्षक भी है।

बून्दी राज्य के अन्तर्गत कनक सागर तालाब ही एक ऐसा तालाब है जहाँ सर्दी में ठण्डे देशों से सबसे ज्यादा अप्रवासी पक्षी सर्दी बिताने आते हैं। कनक सागर के अन्दर आधा दर्जन पहाड़ी टीले हैं, जिस पर पेड़ों के झुरमुट हैं। ऐसे ही एक टीले पर चतुर्भुज मंदिर स्थित है जिसे राव सुभाण्ड देव के शासन काल में 1458 ई. में हाड़ा पृथ्वी सिंह की पत्नी बालणोत जी ने बनवाया था। कनक सागर की पाल पर पालेश्वर महादेव का शिखरबद्ध मंदिर बना हुआ है। तालाब के पास में एक ऊँची पहाड़ की चोटी पर दुर्गहारी का दुर्ग बना हुआ है। इस दुर्ग का निर्माण राव रतन सिंह हाड़ा के शासन काल में सोलंकी रावत द्वारा 1619 ई. में करवाया गया था। यह तालाब अपने आस-पास के भूजल स्तर को ठीक बनाये रखने में सहायक है।

सिंहोलाव तालाब


बून्दी से 6 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में ठीकरदा ग्राम में 1318 हेक्टेयर भूभाग पर यह तालाब स्थित है जो पूर्व में जैतगढ़ तालाब के नाम से प्रसिद्ध था। इस तालाब को ठीकरदा के तत्कालीन जागीरदार सूरजमल हाड़ा पुत्र राव नारायण दास (बून्दी) नरेश ने कंवरपदी में 1527 ई. में बनवाया। बाद में बून्दी नरेश बनने पर राव सूरजमल ने इसे गहरा करा कर इसका नाम जैतगढ़ सागर रखा। इसे पुनः खुदवाने एवं इसका पुनर्निर्माण एवं पाल बनवाने का कार्य माटून्दा जागीरदार हाड़ा नरबद के पौत्र भीमसिंह के पुत्र सिंहदेव ने 1529 ई. में करवाया इसलिये इसे सिंहोलाव तालाब भी कहा जाता है।60 इस तालाब की पाल के सामने महाराव बुधसिंह के शासनकाल में इनकी रानी जयपुर की कछवाही जी ने 1813 ई. में जयनिवास ग्राम एवं माता का मंदिर बनवाया।61

चरखियों का कुआँ


चरखियों का कुआँ बून्दी के छोटे बाजार में स्थित है। यह एक गहरा कुआँ था, जिसे राव राजा विष्णुसिंह के समय 1777 ई. में बनवाया गया था। इस कुएँ से पानी खींचने के लिये ढाणें पर बड़ी चरखियाँ बनी हुई थी। जिन पर डोर लपटती जाती थी, इसलिये यह चरखियों के कुएँ के नाम से प्रसिद्ध था।

मेजनदी


मेजनदी का उद्भव भीलवाड़ा क्षेत्र से होता है। तथा बून्दी जिले में यह नेगढ़ गाँव के निकट प्रवेश कर उत्तर पूर्व दिशा में प्रवाहित होती है। डबलाना तक 16 किमी बहने के पश्चात यह पूर्ववर्ती होकर एकाएक दक्षिण की ओर मुड़ जाती है और बून्दी पर्वत श्रेणियों से रवटगढ़ के निकट मार्ग बनाती हुई श्रेणियों के समानान्तर प्रवाहित होकर सीनपुर ग्राम के निकट चम्बल में मिल जाती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ माँगली, बेजिन और कुशल है। अन्य सहायक नदियाँ हुनवालाया, बासोली की नदी, बाला नदी, नया गाँव की खाल, उदान, माचली है। माँगली मेज की प्रमुख सहायक नदी है जिस पर भीमतल प्रपात है। इसकी सहायक घोड़ा पछाड़ नदी बिजौलिया की झील से निकल कर माँगली नदी में मिल जाती है।62

कोटा के जल संसाधन


बारह बिवरियाँ
कोटा से 95 किमी दूर 300 वर्ष पूर्व करवाड़ में महाराजा आनन्दसिंह जी के शासनकाल में एक बनिये के द्वारा इन बिवरियों का निर्माण करवाया गया। कहा जाता है कि बनिये को स्वप्न में शिवजी ने अपनी प्रतिमा नदी में होने की बात कही। बनिये को नदी में बारह प्रतिमा व शिवलिंग मिले। उसने तुरन्त वहाँ बारह बिवरियों व कुण्ड का निर्माण करवाया। कुण्ड में पानी भरा है और कई बिवरियाँ पानी में डूबी हुयी हैं।63

रामपुरा की बावड़ी


कोटा से 65 किमी दूर 500 वर्ष पूर्व कोटा महाराज के द्वारा गाँव को पीने के पानी एवं नहाने के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यह रामपुरा गाँव यहाँ की बावड़ी की सुविधा को देखते हुए बस गया था। इस बावड़ी का निर्माण पत्थरों से हुआ है। यह बावड़ी ग्राम पंचायत के अधीन है।

अयाना की बावड़ी


कोटा से 78 किमी दूर 300 वर्ष पूर्व इस बावड़ी का निर्माण रियासत काल में नरेश जी महाराज के द्वारा करवाया गया था। यह बावड़ी गाँव के बीच में बनी हुयी है एवं तीन मन्जिल की है। इस बावड़ी पर लोग जिन्न महाराज की पूजा करते हैं।

चश्मे की बावड़ी


कोटा से 3 किमी दूर घण्टाघर में 250 वर्ष पूर्व हमाल जाति के सार्वजनिक सहयोग द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया। चश्में पानी का उर्दू शब्द होने के कारण इस बावड़ी को चश्मे की बावड़ी कहा जाता है। इस बावड़ी के पास एक चौक है जिसमें हमाल जाति का सामूहिक भोज बना करता है। वर्तमान में यह बावड़ी हमाल जाति के ट्रस्ट के अधीन है।64

तार बावड़ी


कोटा से 3 किमी दूर 307 वर्ष पूर्व कुन्हाड़ी ठिकाने वालों के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यहाँ पर कुन्हाड़ी ठिकाने वाले की तारबन्दी थी जिसमें एक तरफ हाथी घोड़े रहते थे व दूसरी तरफ जंगल था जिनके मध्य स्थित होने के कारण इसे तार बावड़ी कहा गया है। यह बावड़ी कुन्हाड़ी ठिकाने के अधीन है।65

नाथों की बावड़ी


कोटा से 73 किमी दूर नयागाँव में 250 वर्ष पूर्व नाथ सम्प्रदाय के लोगो ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। रियासत काल में यहाँ नाथ सम्प्रदाय के महात्मा तपस्या किया करते थे उन्होंने ही ग्रामीणों के सहयोग से पानी की व्यवस्था के लिये यह बावड़ी बनवायी थी। बावड़ी के पास ही उन महात्मा की चरण पादुका स्थापित कर स्मृति में समाधि स्थल का निर्माण करवाया गया है।

बड़ौद की बावड़ी


बड़ौद में तिवाड़ी जाति के समाज के लोगों ने 200 वर्ष पूर्व बड़ौद में इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यह बावड़ी जंगल में बनायी गयी थी। जिससे आने जाने वाले राहगीर इस बावड़ी का पानी पीते थे तथा जानवरों को भी पानी पिलाया जाता था। वर्तमान में कहा जाता है कि इस बावड़ी में स्नान करने वाले व्यक्तियों की बीमारियाँ दूर हो जाती हैं। इस बावड़ी की गहराई 60 फूट है।66

खारी बावड़ी


कोटा से 5 किमी दूर नान्ता ग्राम में 200 वर्ष पूर्व जनसहयोग द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी का पानी खारा होने के कारण इसे खारी बावड़ी कहा जाने लगा। इस बावड़ी का पानी सिंचाई व नहाने धोने के काम में लेते हैं।

हाड़ा की बावड़ी


निवाई नान्ता ग्राम में 250 वर्ष पूर्व हाड़ा सामन्तों के द्वारा बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यह दोमन्जिला बावड़ी है एवं इसके चारों तरफ तिबारियाँ बनी हुयी हैं। इस प्राचीन बनावट की बावड़ी की दीवारों पर बहुत से चित्र बने हुये हैं। बावड़ी को पूर्व में स्नान के लिये काम में लिया जाता था। वर्तमान में यह सार्वजनिक सम्पत्ति है।

भेरूजी की बावड़ी


नान्ता में 300 वर्ष पूर्व झाला शासकों के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। भैरूजी महाराज के नाम पर इसका नाम भैरू बावड़ी पड़ा। यह चारों तरफ तिबारियों से घिरी दोमंजिला बावड़ी है। यहाँ पर एक प्राचीन मन्दिर भी है। पूर्व में जल की आपूर्ति गाँव में इसी से होती थी। वर्तमान में यह बावड़ी सूख गयी है।

गोरूजी की बावड़ी


नान्ता में 250 वर्ष पूर्व झाला ठिकाने के द्वारा गाँव को पानी की सुविधा के लिये इस बावड़ी को बनवाया था। इसमें गोरूजी महाराज रहते थे इसलिये इस बावड़ी का नाम गोरूजी की बावड़ी पड़ा। इस बावड़ी के बीच में एक पुराना तिबारा बना हुआ है एवं तिबारे के ठीक नीचे पानी में पुरानी शैली का दरवाजा भी बना हुआ है इस बावड़ी के अन्दर दीवार में हनुमानजी का स्थान भी है इसकी दीवारें जर्जर अवस्था में हैं।67

खीमच की बावड़ी


कोटा से 60 किमी दूर खीचम गाँव में 400 वर्ष पूर्व बनिया समाज ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यह बावड़ी मन्दिर के पास है। इस बावड़ी के पानी का उपयोग बनिया समाज द्वारा पीने व नहाने के लिये किया जाता था। वर्तमान में बावड़ी में पानी भरा है परन्तु बावड़ी खण्डहर अवस्था में है।

राजपूतों की बावड़ी


खीमच में 350 वर्ष पूर्व सोलंकी राजपूतों ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यह बावड़ी खीमच के रास्ते पर बनी हुयी है। इस बावड़ी का निर्माण सिंचाई के लिये किया गया था। बावड़ी की गहराई 30 फीट है। बावड़ी का पानी सूख चुका है व बावड़ी जीर्णशीर्ण अवस्था में है।

छतरीवाली बावड़ी


लगभग 400 वर्ष पूर्व खीमच में बाबा गोस्वामी जी ने इस बावड़ी का निर्माण ग्रामवासियों के पानी पीने व नहाने के लिये किया गया था। इस बावड़ी की गहराई 60 फीट है। बावड़ी के कोने पर पंचमुखी शिव की मूर्ति भी स्थापित है। बावड़ी के पास गुसाई समाज की समाधियाँ व 19 छतरियाँ बनी हुई हैं।

फतमल की बावड़ी


खीमच में 200 वर्ष पूर्व गोस्वामी समाज ने ग्रामवासियों को पानी की सुविधा के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। वर्तमान में यह बावड़ी सिंचाई के काम आती है। बावड़ी में एक देवी माँ की मूर्ति भी है। वर्तमान में इसका पानी कम होता जा रहा है।68

छतरी वाली बावड़ी


कोटा से 80 किमी दूर निमाना ग्राम में इस बावड़ी का निर्माण 700 वर्ष पूर्व खीचीं राजपूतों के द्वारा करवाया था। इस बावड़ी के दोनों कोनों पर दो छतरियाँ बनी हुयी हैं जिसमें गाँव वाले पानी पीते थे। इस बावड़ी की गहराई 50 फीट है एवं वर्तमान में इस बावड़ी में पानी भरा है।

खेल की बावड़ी


कोटा से 80 किमी दूर पीपाखेड़ी ग्राम में 800 वर्ष पूर्व गोस्वामी समाज ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी की गहराई 45 फीट है। बावड़ी में शिवजी व गणेशजी महाराज का मन्दिर है। वर्तमान में इस बावड़ी के पानी से सिंचाई की जा रही है।

पन बावड़ी


पीपाखेड़ी में लगभग 500 वर्ष पूर्व छत्रसाल जी ने इस बावड़ी का निर्माण ग्रामवासियों के पानी पीने के लिये करवाया था। बावड़ी कजोड़ जी बैरवा की निजी सम्पत्ति है एवं उनके द्वारा इस बावड़ी की देखरेख की जा रही है। वर्तमान में बावड़ी सिंचाई के काम आ रही है।

फूटी बावड़ी


पीपाखेड़ी में 700 वर्ष पूर्व दुबे ब्राह्मण समाज ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी में पहले ब्राह्मण समाज के लोग ही पानी भरते थे व नहाते थे। अब यह बावड़ी मिट्टी से भर चुकी है। इस बावड़ी में भेरूजी महाराज का स्थान भी है। जिनकी शुभकार्य के पहले पूजा की जाती है।

महाजनों की बावड़ी


कोटा से 70 किमी दूर चेचट में महाजनों की बावड़ी का निर्माण कोटा दरबार के द्वारा करवाया गया था। यह प्राचीन समय में दरबार के अधीन थी और वर्तमान में मेड़तवाल समाज के अधिकार में है एवं पानी पीने के काम आती है। यह बावड़ी गोपाल जी के मन्दिर के समीप स्थित है।

छीपो की बावड़ी


चेचट में 300 वर्ष पूर्व छीपा समाज द्वारा नदी के किनारे इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी का उपयोग पेयजल हेतु किया जाता था। यह बावड़ी प्राचीन व कलात्मक है। इस बावड़ी के पास छीपा समाज का अखाड़ा मौजूद है जहाँ पर पहलवानी की जाती है।69

माताजी की बावड़ी


कोटा से 80 किमी दूर निमोदा में माताजी के मन्दिर के पास एक बावड़ी स्थित है जिसके पास माताजी का मन्दिर व एक छतरी भी है। नवरात्रों के समय श्रद्धालु बावड़ी में स्नान कर माताजी की पूजा करते हैं बावड़ी की स्थिति सामान्य है।

धुलेट की बावड़ी


कोटा से 60 किमी दूर धुलेट में 225 वर्ष पूर्व जनसहयोग से पानी पीने व नहाने धोने के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी के बीच में एक बरामदा बना हुआ है। वर्तमान में यह बावड़ी सूख चुकी है एवं जीर्णशीर्ण अवस्था में है।

खजूरी की बावड़ी


कोटा से 32 किमी दूर खजूरी ग्राम में 250 वर्ष पूर्व ठाकुर रूपसिंह जी ने ग्रामीणों के पानी की समुचित व्यवस्था करने के लिये धर्मार्थ में इस भव्य बावड़ी का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी में प्राचीन स्थापत्य कला के दर्शन किये जा सकते है। वर्तमान में यह बावड़ी स्थानीय ग्रामीणों का प्रमुख पेयजल स्रोत है।

ब्रजनगर की बावड़ी


कोटा से 30 किमी दूर ब्रजनगर में 225 वर्ष पूर्व रियासत काल में ब्रजबाई ने ग्रामीणों की पानी की समस्या को महसूस कर इस भव्य बावड़ी का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी के बरामदे में प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। वर्तमान में इस बावड़ी में पानी भरा हुआ है।70

चौमाकोट की बावड़ी


कोटा से 35 किमी दूर चौमाकोट में कोटा दरबार ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी के चारों ओर सीढ़ियाँ बनी हुयी हैं व एक पानी खींचने का ढाणा भी बना हुआ है। यह बावड़ी बहुत सुन्दर है तथा इस बावड़ी की देखरेख ग्राम पंचायत करती है।

जालिमपुरा की बावड़ी


कोटा से 35 किमी दूर जालिमपुरा में 300 वर्ष पूर्व रियासत काल में ब्राह्मण जाति के पोखरा गोत्र के लोगों के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी के बारे में कहावत है कि एक धनवान ब्राह्मण की बेटी का विवाह कोटा में किया था और उसके कहने पर बड़ौद से कोटा के बीच जगह-जगह कुएँ व बावड़ियाँ बनवायी गयी थी। वर्तमान में दीगोद सुल्तानपुर की मुख्य सड़क पर यह बावड़ी स्थित है। जिसका राज्य सरकार ने अकाल राहत कार्य के तहत जीर्णोद्धार करवाया है।

गगटाना का कुण्ड व बावड़ी


कोटा से 15 किमी दूर गगटाना में 400 वर्ष पूर्व महाराजा उम्मेदसिंह जी के समय में इस कुण्ड व बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। पहले 5 गाँवों के निवासी इस कुण्ड व बावड़ी से पानी पिया करते थे वर्तमान में यहाँ पर महात्मा जी का स्थान है। जिनका नाम सन्तराम प्रियदास जी था।

जालीपुरा की बावड़ी


कोटा से 10 किमी दूर जालीपुरा में 400 वर्ष पुरानी यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी को रियासत काल में झाला रानी ने बनवाया था। कहा जाता है कि झाला रानी एक रात यहाँ पर रुकी थी तथा ग्रामीणों की पानी की समस्या को सुनकर इस बावड़ी का निर्माण करवाया था एवं साथ में एक चबूतरा भी बनवाया था। इस बावड़ी की बनावट प्राचीन काल की है।

बनियानी की बावड़ी


कोटा से 35 किमी दूर बनियानी में 500 वर्ष पूर्व श्री ज्यामलजी महाराज के द्वारा ग्रामवासियों के नहाने व पीने के पानी के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी की गहराई 60 फीट है। बावड़ी में हाथी का चित्र व प्राचीन मूर्तियाँ भी लगी हुयी हैं। वर्तमान में यह बावड़ी जीर्णषीर्ण अवस्था में है।

बड़ोदिया की बावड़ी


कोटा से 25 किमी दूर बड़ोदिया में 300 वर्ष पूर्व जागीदार मदनसिंह के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यहाँ प्राचीन समय मीणा जाति के लोग रहा करते थे। उनके पानी पीने व नहाने के लिये यह बावड़ी बनवायी गयी थी। इस बावड़ी के अन्दर तीन कुण्ड बने हुए हैं। यह बावड़ी 60 फीट गहरी है इसमें सीढ़ियाँ लगी हुई हैं जिनकी सहायता से बावड़ी की सफाई की जाती है।71

बनेढिया की बावड़ी


कोटा से 48 किमी दूर गाँव बनेढिया में 400 वर्ष पूर्व महाराजा उम्मेदसिंह ने राहगीरों के पानी पीने के लिये इस बावड़ी को खुदवाया था। इस बावड़ी की गहराई 20 फिट है। वर्तमान में यह बावड़ी खण्डहर अवस्था में है।

कचोलिया की बावड़ी


कोटा से 33 किमी दूर ग्राम कचोलिया में 215 वर्ष पूर्व कोटा रियासत के द्वारा पेयजल के स्थायी समाधान हेतु इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। रियासत काल में दीगोद-सुल्तानपुर जाने वाले राहगीरों के लिये पेयजल हेतु इस बावड़ी में समुचित व्यवस्था थी। रियासत काल के बाद बावड़ी की स्थिति खराब हो गयी लेकिन कुछ वर्षों पूर्व राज्य सरकार द्वारा अकाल राहत कार्यों के तहत बावड़ी का जीर्णोद्धार करवाया गया है।

मूढ़ला की बावड़ी


कोटा से 19 किमी दूर मूंढला ग्राम में 250 वर्ष पूर्व नाथूलालजी व भैरूलाल गुजराती ब्राह्मणों के पूर्वजों ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। बावड़ी से पशुओं के लिये खेली भरी जाती है तथा गाँव वाले इस बावड़ी का प्रयोग स्नान आदि के लिये करते हैं।

भौरा की बावड़ी


कोटा से 30 किमी दूर लगभग 200 वर्ष पूर्व ग्रामवासियों द्वारा इस बावड़ी का निर्माण पेयजल व स्नान हेतु करवाया गया था। बावड़ी पर पशुओं के पानी पीने के लिये एक खेली बनी हुयी है तथा बावड़ी पर दो छतरियाँ बनी हुयी हैं। इस बावड़ी का जीर्णोद्धार ग्राम पंचायत द्वारा करवाया गया है।

पारलिया की बावड़ी


कोटा से 22 किमी दूर पारलिया गाँव में 250 वर्ष पूर्व पारलिया सेठों के द्वारा पेयजल हेतु व पशुओं के लिये व स्नान करने के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। पहले इस बावड़ी के नीचे 8 बीघा जमीन थी जो वर्तमान में स्थानीय लोगों ने अपने नाम करवा ली है। इस बावड़ी से पशुओं के लिये पानी की खेली भरी जाती थी वर्तमान में इस बावड़ी का पानी किसी काम नहीं आ रहा है।

पड़ासल्या की बावड़ी


कोटा से 35 किमी दूर पड़ासल्या ग्राम में 500 वर्ष पूर्व कोटा के राजा ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यह बावड़ी कुण्ड जैसी प्रतीत होती है। यह बावड़ी पूर्व में सिंचाई के काम आती थी तथा बावड़ी के पास बालाजी का मन्दिर बना हुआ है। इस बावड़ी के चारो ओर बावड़ी के नाम 2 बीघा जमीन है।

सनिजा बावड़ी


कोटा से 50 किमी दूर गाँव सनीजा में 250 वर्ष पूर्व कोटा दरबार ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी के निर्माण के सम्बन्ध में किंवदन्ती है कि किसी राजकुमारी की बग्घी जा रही थी। राजकुमारी को प्यास लगने पर ससुराल वालों से पानी माँगने पर कहा कि उसके पीहर वालों ने यहाँ पानी का कोई कुआँ नहीं खुदवाया है। उस समय यह बावड़ी खुदवायी गयी थी। वर्तमान में यह बावड़ी तालाब के बीच में है तथा इसके चारों ओर पानी भरा हुआ है।

सरोला बावड़ी


कोटा से 40 किमी दूर गाँव सरोला में लगभग 200 वर्ष पूर्व जागीर ठिकाना कुल्हाड़ी द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया। इस बावड़ी में गाँव वाले स्नान करते थे। इस बावड़ी के चारों ओर स्थित 2 बीघा जमीन में बालाजी व महादेव जी का मन्दिर बना हुआ है।

शीशफूल की बावड़ी


सुल्तानपुर में लगभग 400 वर्ष पूर्व रियासत काल में सुल्तानपुर से पूर्व दिशा में जंगली जानवरों व ग्रामीण मवेशियों के पेयजल हेतु स्थानीय जागीरदार ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। किवदन्ति है कि यहाँ पर मीणों व राजपूतों के मध्य युद्ध हुआ और मीणों के सरदार का शीश कटकर यहाँ पर गिरा, जिससे मीणा जाति के लोगों ने बावड़ी के पास उनके शीश की स्थापना कर पूजा अर्चना करने लगे। तभी से इस बावड़ी को शीश फूल की बावड़ी कहा जाता है।

सुनारों का कुआँ


सुल्तानपुर में 250 वर्ष पूर्व रियासत काल में पेयजल व्यवस्था के लिये इस कुएँ का निर्माण करवाया गया था। इस कुएँ की चौड़ाई 15 फीट है एवं ऊपर से नीचे तक सीढ़ियाँ बनी हुयी हैं जिनसे पानी निकाला जाता था। वर्तमान में यह कुआँ सुनार जाति के लोगों के आधिपत्य में है। कुएँ में पानी भरा हुआ है।

दुलाजी की बावड़ी


सुल्तानपुर में 250 वर्ष पूर्व रियासत काल में जागीरदार के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। लोगों का कहना है कि इस बावड़ी में मुस्लिम जाति के दुल्हेशाह बाबा की इस बावड़ी में गिरने से मौत हो गयी जिनसे उनके नाम से बावड़ी के पास मजार बनायी गयी जिसकी धार्मिक रूप से पूजा की जाती है। वर्तमान में बावड़ी खण्डहर अवस्था में है।

चरतराय जी की बावड़ी


350 वर्ष पूर्व सुल्तानपुर में रियासत काल में स्थानीय ग्रामीणों ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। बावड़ी के पास ही चरतराय जी का मन्दिर स्थित है। इस बावड़ी के पानी से ही भगवान पर जल चढ़ाया जाता था तथा बावड़ी से पेयजल व सिंचाई की जाती थी। मन्दिर की बनावट व गुम्बद बावड़ी की प्राचीनता स्थापत्य कला के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।

पक्की बावड़ी


कोटा से 28 किमी दूर उम्मेदपुरा गाँव में 225 वर्ष पूर्व महाराजा छत्रसाल ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इसकी मरम्मत कोटा दरबार के मेघसिंह जी द्वारा करवायी गयी थी। इस बावड़ी का 100 वर्ष पूर्व जीर्णोद्धार हुआ था। बावड़ी की ढही हुई दीवार का निर्माण ग्राम पंचायत द्वारा करवाया गया है।72

सीमलिया की बावड़ी


कोटा से 45 किमी दूर सीमलिया में 200 वर्ष पूर्व कोटा दरबार ने पेयजल एवं स्नान के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यह बावड़ी कुण्ड के आकार की बनी हुयी है। इस बावड़ी में घुमावदार सीढ़ियाँ बनी हुयी हैं और दो पानी खींचने के ढाणे बने हुए हैं। यह लगभग 50 फीट की गोलाई में बनी हुई है।

सामरिया की बड़ी बावड़ी


कोटा से 65 किमी दूर लगभग 200 वर्ष पूर्व कोटा नरेश द्वारा यह बावड़ी बनवायी गयी। प्राचीन समय में बावड़ी का उपयोग सिंचाई के रूप में किया जाता था। इस बावड़ी के चारों ओर कई पेड़ पौधे लगे होने के कारण दूर से यह बावड़ी दिखाई नहीं देती है। इस बावड़ी में हमेशा पानी भरा रहता है परन्तु वर्तमान में बावड़ी जीर्ण शीर्ण अवस्था में है।

हनुमान जी की बावड़ी


कोटा के सामरिया ग्राम में 200 वर्ष पूर्व किसी सेठ ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इसके निर्माण के सम्बन्ध में लोगों का कहना है कि प्राचीन समय में एक सेठ को फाँसी की सजा सुनाई गयी थी। सैनिक उनको कोटा ले जाते समय हनुमान जी के स्थान पर आकर रुके और उन्होंने एक गढ़ी हुयी प्रतिमा देखी। सेठ ने हनुमाजी से मन्नत माँगी कि यदि वह फाँसी की सजा से बच गये तो वापिस आकर मन्दिर व बावड़ी बनवा देंगे। कोटा जाते ही उनकी सजा माफ हो गयी। उन्होंने वापिस आते ही मन्दिर व बावड़ी का निर्माण करवाया।73

दीगोद की बावड़ी


कोटा से 70 किमी दूर 500 वर्ष पूर्व किसी राजा द्वारा गाँव दीगोद से पश्चिम में पेयजल हेतु इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यह बावड़ी केवल पत्थरों की बनी हुई है। इसमें भारी पत्थरों का प्रयोग किया गया है। यह बावड़ी शमशान में बनी है एवं सूखी हुई स्थिति में है।

देवली मांजी की बावड़ी कोटा से 38 किमी दूर देवली मांजी में 300 वर्ष पूर्व कोटा नरेश ने स्थानीय ग्रामीणों के पेयजल की समुचित व्यवस्था करने के लिये धर्मार्थ में इस भव्य बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी के दो कोनों पर छतरियाँ बनी हुयी हैं व पास में हनुमान जी का प्राचीन मन्दिर बना हुआ है। इस बावड़ी पर प्राचीन शिलालेख अंकित है। वर्तमान में यह बावड़ी सम्पूर्ण ग्रामीणों का प्रमुख पेयजल स्रोत है तथा इस बावड़ी की देखरेख स्थानीय ग्रामीणों के द्वारा की जाती है।74

उम्मेदगंज की बावड़ी


कोटा से 13 किमी दूर 500 वर्ष पूर्व कोटा दरबार शत्रुशाल सिंह ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी को हल्दी व माधु बावड़ी के नाम से भी जाना जाता है। इस बावड़ी में पर्याप्त पानी है जिसका उपयोग उम्मेदगंज के लोग स्नान करने व पीने में उपयोग लेते हैं।

जयाराम भगवत की बावड़ी


उम्मेदगंज में 400 वर्ष पूर्व इस बावड़ी का निर्माण कोटा दरबार उम्मेदसिंह जी ने अपने दरबार में नृत्य करने वाली ज्यामा बाई की याद में करवाया था। यह प्राचीनकाल की ऐतिहासिक प्रसिद्ध बावड़ी है। बावड़ी के पास प्राचीन बनावट का शाही दरवाजा भी है बावड़ी देखने के लिये विदेश से सैलानी व पर्यटक आते हैं।75

बड़ी बावड़ी


250 वर्ष पूर्व छत्रसाल जी ने खारी बावड़ी के सामने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी का उपयोग पीने के पानी के लिये लिया जाता था। इस बावड़ी में सीढ़ियाँ भी बनी हुयी हैं। इस बावड़ी का ग्रामीणों ने समय-समय पर जीर्णोद्धार भी करवाया है।

मंथ महाराज की बावड़ी


कोटा से 60 किमी की दूरी पर कनवास ग्राम में 225 वर्ष पूर्व नाना महात्मा ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। महात्मा नाना इस बावड़ी के पास ही रहते थे। एवं इस बावड़ी के पानी का उपयोग स्नान आदि के लिये किया जाता था। बावड़ी सामान्य अवस्था में है एवं इस बावड़ी का उपयोग ग्रामवासी स्वयं व जानवरों को पिलाने के काम में लेते हैं।

कतवारी बावड़ी


कोटा से 75 किमी दूर मोई खुर्द में 250 वर्ष पूर्व कोटा दरबार के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। प्राचीन समय में यह बावड़ी राहगीरों व जानवरों के पानी पीने के लिये बनवायी गयी थी। इस बावड़ी के पास जिन्दबाबा की मूर्ति है। मान्यता है कि जिन्दबाबा से सच्चे मन से मांगी जाने वाली हर मुराद पूरी होती है। इस बावड़ी की गहराई 30 फीट है और वर्तमान में इस बावड़ी में पानी नहीं है।

मदारिया की बावड़ी एवं कुण्ड


कोटा से 70 किमी मदारिया ग्राम में 200 वर्ष पूर्व ठाकुरों ने इस बावड़ी व कुण्ड का निर्माण किया था। बावड़ी का उपयोग सिंचाई व जानवरों को पानी पिलाने के लिये किया जाता था। कहते हैं कि जब से यह बावड़ी बनी है तब से इस बावड़ी का पानी कभी नहीं सूखा। मदारिया में ही गाँव के बीचों-बीच कुण्ड भी बना हुआ है। इस कुण्ड का निर्माण पीने के पानी के लिये करवाया गया था। बाद में इस कुण्ड का जीर्णोद्धार ग्राम पंचायत द्वारा करवाया गया। वर्तमान में बावड़ी व कुण्ड सूखा पड़ा है।

बनासा की बावड़ी


कोटा के ग्राम किशनपुरा में 200 वर्ष पूर्व कोटा दरबार ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। कोटा दरबार जब घूमने निकलते थे तो पानी का कहीं कोई स्रोत नहीं मिलता था तब कोटा दरबार ने गाँव में बावड़ी का निर्माण करवाया। यह बावड़ी 40 फीट गहरी है इस बावड़ी को बारह ढाणा की बावड़ी के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में इस बावड़ी में पानी नहीं है।76

व्यास बावड़ी


कोटा से 35 किमी दूर मण्डाना में 250 वर्ष पूर्व इस बावड़ी का निर्माण व्यासजी महाराज ने जंगल में करवाया था। यहाँ पर चरवाहे व जंगली जानवर पानी पीने आया करते थे। इस बावड़ी के दोनों ओर दो छतरियाँ बनी हुयी हैं एवं गणेश जी का मन्दिर भी है। वर्तमान समय में इस बावड़ी में पानी नहीं है।

हनुमान जी के मन्दिर की बावड़ी


कोटा से 11 किमी दूर मोतीपुरा में 250 वर्ष पूर्व ग्रामवासियों ने श्री हनुमानजी का मन्दिर व बावड़ी का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी का पानी पशुआें के पीने व नहाने धोने के काम लिया जाता था। यहाँ पर हनुमानजी की प्रतिमा स्थापित होने के कारण मन्दिर के नाम पर इस बावड़ी का नाम पड़ा। प्राचीन काल में यहाँ बीहड़ जंगल था एवं राजा महाराजा घूमने आया करते थे। वर्तमान में यह बावड़ी सार्वजनिक है व श्रीनाथ ट्रस्ट के अधीन है।

तीन मंजिला बावड़ी


मोतीपुरा में नहर के पास 425 वर्ष पूर्व इस बावड़ी का निर्माण कोटा नरेश ने करवाया था। यह बावड़ी तीन मंजिल में बनी हुयी है। इसकी तीनों मंजिलें एक समान है। वर्तमान में यह बावड़ी सरदार निर्मल सिंह के अधीन है तथा वह इसे सिंचाई के काम ले रहे हैं। ऐसी कलात्मक बावड़ी आस-पास में देखने को नहीं मिलती है।

मंवासा की बावड़ी


कोटा से 15 किमी दूर मंवासा में 200 वर्ष पूर्व रेबारी समाज ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। प्राचीनकाल में गाँव वालों के लिये ये जल का प्रमुख स्रोत था। इस बावड़ी के पास दो छतरियाँ बनी हुयी हैं। वर्तमान में इस बावड़ी के पानी का उपयोग स्नान करने में हो रहा है।

गाज की बावड़ी


कोटा से 35 किमी दूर मान्दलिया गाँव में 250 वर्ष पूर्व मान्दलिया के ठाकुर साहब ने अपनी पत्नी की याद में इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी की बनावट प्राचीन कालीन है। बावड़ी में पानी भरा है। जिसका उपयोग सिंचाई के लिये किया जा रहा है। बावड़ी जीर्णशीर्ण अवस्था में है। इस बावड़ी को छरेली की बावड़ी के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसके पास में छरेली के बहुत सारे पेड़ हैं। इस बावड़ी के जल के बारे में लोगों का कहना है कि आकाश में बादल छाने पर इसका पानी स्वतः ही बढ़ जाता है।

गिरधरपुरा की बावड़ी


गिरधरपुरा में 350 वर्ष पूर्व कोटा शासक ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यह स्थान प्राचीन काल में सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। राजा यहाँ पर अपनी सेना व युद्ध क्षेत्र की सामग्री रखते थे। इस बावड़ी को उन्होंने अपने सैनिकों की पेयजल की समस्या के समाधान के लिये बनवाया था। इसकी मान्यता है कि इसका पानी कभी नहीं सूखता। यह बावड़ी तीन मंजिला है एवं इसकी बनावट प्राचीन है।77

परल्या का कुआँ


कोटा से 30 किमी दूर परल्या गाँव में 600 वर्ष पूर्व जागीरदार सहाव परल्या ने इस कुएँ का निर्माण करवाया था। वर्तमान में यह कुआँ नहाने व धोने के काम आता है। इसके पास ही प्राचीन कला की बहुत अनूठी मूर्तियाँ हैं। इसमें सरस्वती की मूर्तियाँ प्राचीन शैली की बनी हैं।

डाबेडा की बावड़ी


कोटा से 45 किमी दूर गाँव डावेड़ा में 250 वर्ष पूर्व की बावड़ी का निर्माण गुरूजी महाराज ने करवाया था। उन्होंने अपने संतों की पानी की सुविधा के लिये यह बावड़ी बनवायी थी। यह बावड़ी तालाब के बीच में पानी में डूबी हुई है और जीर्ण शीर्ण अवस्था में है। इसके पास में ही हनुमानजी का मन्दिर भी है।78

आशारावल जी की बावड़ी


लाड़पुरा तहसील के कोथला ग्राम में 400 वर्ष पूर्व बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में लाल पत्थर से इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यह बावड़ी दो पहाड़ियों के मध्य स्थित है। जहाँ पर आशारावल जी महाराज तपस्या किया करते थे। औरंगजेब ने आशारावल जी से माफी के रूप में 7 गाँव गायों के घूमने व पानी के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इसकी बनावट प्राचीनतम है। यहाँ पर एक मन्दिर भी है। आने वाले श्रद्धालु बावड़ी में स्नान करते हैं।

भाटों की बावड़ी


कैथून में भाटों की बावड़ी लगभग 525 वर्ष पुरानी है। प्राचीन काल में भाटों ने इसकी स्थापना की थी। यह बावड़ी शीतला माता मन्दिर में स्थित है जिसकी हर अष्टमी को महिलाओं के द्वारा पूजा पाठ किया जाता है। बावड़ी का निर्माण पानी की समस्या के समाधान के लिये किया गया था। वर्तमान में भाट समाज द्वारा मन्दिर व बावड़ी की देखभाल की जा रही है।

शाहपुरा की बावड़ी


कैथून में 500 वर्ष पूर्व बादशाह अकबर ने यहाँ के मुस्लिम समाज के लोगों के नमाज पढ़ने के लिये एक मस्जिद व नमाजियों के स्नान करने के लिये एक बावड़ी का निर्माण करवाया। इस बावड़ी में पानी मौजूद है एवं इसकी देखरेख व मस्जिद कमेटी के द्वारा की जाती है।

बगीची की बावड़ी


कोटा से 46 किमी दूर दीपपुरा में राजा छत्रसाल जी की रानी ने 18 बीघा भूमि पर बावड़ी व बगीची का निर्माण किया था राजा छत्रसाल जी के कोई सन्तान नहीं थी। उनकी मृत्यु के बाद रानी ने उम्मेदसिंहजी को गोद लिया था और उसे राजा बनाकर बावड़ी के पास रानी ने गढ़ का निर्माण करवाया और यहाँ पर रहने लगी। इस बावड़ी की बनावट प्राचीन है। वर्तमान में यह बावड़ी सार्वजनिक है। इसकी देखभाल देवस्थान विभाग की ओर से की जाती है।

चारणहेड़ी की बावड़ी


कोटा से 28 किमी दूर चारणहेड़ी गाँव में प्राचीन बनावट की 400 वर्ष पूर्व की बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण चारण जमींदार के समय पीने के पानी के समाधान हेतु बनवाया था। इस बावड़ी के ठीक ऊपर की दीवार पर जिन्द महाराज का स्थान भी बना हुआ है। बावड़ी का पानी पीने के व सिंचाई के काम आता है। इस बावड़ी की मरम्मत गाँव की पंचायत के द्वारा करवायी जाती है।

ताथेड़ की बावड़ी


कोटा से 12 किमी दूर ताथेड़ में 300 वर्ष पूर्व कोटा दरबार के समय में इस बावड़ी का निर्माण करवाया था परन्तु वर्तमान समय में यह बावड़ी जीर्ण शीर्ण अवस्था में है व जानवरों को पानी पिलाने के काम आती है। इसकी बनावट प्राचीन शैली की होने के कारण पर्यटन के रूप में प्रसिद्ध है।

जगतपुरा की बावड़ी


कोटा से 22 किमी दूर जगतपुरा में रियासत काल की ग्रामीणों द्वारा बनवायी गयी बावड़ी स्थिति है। इस बावड़ी पर तीन ढाणे बने हुए हैं जिन पर तीन रहट चलते हैं तथा एक पानी की डबल नाली 150 फीट लम्बी बनी हुयी है इस बावड़ी के पानी को पीने व सिंचाई के काम में लिया जाता है।

रहट की बावड़ी


कोटा से 30 किमी दूर अरण्डखेड़ा में 325 वर्ष पूर्व राजा भीम सिंह द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इसका पानी पहले रहट से निकाला जाता था इसलिये इसको रहट की बावड़ी के नाम जानते हैं। इसका पानी सिंचाई के काम में लिया जाता था एवं वर्तमान में इसका पानी नहाने, धोने व पीने के काम में लिया जाता है।

अरल्या की बावड़ी


कोटा से 30 किमी दूर अरल्या गाँव में 500 वर्ष पूर्व अरल्या के ठाकुर साहब ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी का निर्माण पानी व नहाने की सुविधा को ध्यान में रखते हुए करवाया गया था। यह बावड़ी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है तथा इसका उपयोग गाँव वाले करते हैं।

महादेव जी कुण्ड


कोटा से 74 किमी दूर गोणती गाँव में 600 वर्ष पूर्व भादूनाथ जी योगी के द्वारा इस कुण्ड का निर्माण करवाया गया था। इस कुण्ड में 27 फीट पानी के भीतर एक शिवलिंग स्थापित है जिसकी लम्बाई 5 फीट है। इस दिन कुण्ड में पानी खाली किया जाता है। इस कुण्ड में नहाने से दाद, खुजली तथा अन्य चर्म रोग पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। इस बावड़ी का रखरखाव सार्वजनिक रूप से किया जाता है।79

भीतरिया कुण्ड


कोटा से 10 किमी दूर भीतरिया गाँव में कोटा दरबार उम्मेदसिंह ने इस कुण्ड का निर्माण करवाया था। इस कुण्ड की विशेषता यह कि इसमें गर्मी के दिनों में पानी ठण्डा रहता है और सर्दियों के दिनों में गर्म रहता है। पहले कोटा दरबार यहाँ पर घूमने व स्नान करने आते थे। कोटा दरबार ने यहाँ बगीचा व एक मन्दिर बनवाया था। कुण्ड व मन्दिर दोनों चम्बल नदी के किनारे स्थित हैं।80

आकोड़िया का कुण्ड


कोटा से 90 किमी दूर आकोड़िया में लगभग 200 वर्ष पूर्व स्थानीय ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से जल व्यवस्था के लिये इस कुण्ड का निर्माण करवाया गया था। यह कुण्ड ग्रामीणों का प्रमुख जल स्रोत है। यह कुण्ड कलात्मक रूप से बना हुआ है एवं सामान्य अवस्था में है।

खाजी का कुण्ड


कोटा से 38 किमी दूर सुल्तानपुर में 400 वर्ष पूर्व हाड़ा राजपूतों के शासनकाल में पेयजल के स्थायी समाधान हेतु इस कुण्ड का निर्माण करवाया गया था। रियासत काल के बाद स्थानीय मुस्लिम जाति के खाजी ने कई वर्षों तक अपना आधिपत्य जमाए रखा जिससे इस कुण्ड को खाजी का कुण्ड कहा जाता है। इस कुण्ड में पानी है तथा एक छतरी बनी हुई है व एक शिवमन्दिर भी है। इस कुण्ड के पानी को शिवलिंग पर चढ़ाने के काम में लिया जाता है।

ताखेश्वर का कुण्ड


कोटा जिले में नागदा कोटा के मध्य रामगंजमण्डी से 8 मील दूर ताखेश्वर महादेव के समीप यह प्राकृतिक कुण्ड स्थित है। इस कुण्ड से ताखली नदी निकलती है। महादेव का मन्दिर होने के कारण इस कुण्ड का जल पूजा व अर्चना के में काम लिया जाता है श्रावणमास व महाशिवरात्रि पर यहाँ मेला भरता है।81

नहरावली का कुण्ड


कोटा से 64 किमी दूर हींगी ग्राम में नहरावली का कुण्ड स्थित है। स्थानीय ग्रामीणों द्वारा अपने आराध्य देव की पूजा अर्चना करने हेतु इस मन्दिर का निर्माण करवाया गया था। इस कुण्ड में जो भी सच्चे मन से नहाता है उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है इस कुण्ड में पानी की कमी कभी नहीं होती है।

क्षारबाग का कुण्ड


सामरिया ग्राम में 200 वर्ष पूर्व साधुओं के द्वारा इस कुण्ड का निर्माण करवाया गया। प्राचीन समय में यहाँ पर बाग था। इस बाग में साधु ठहरा करते थे उन्होंने ही इस बाग में कुण्ड का निर्माण करवाया था। इसका उपयोग नहाने धोने व पीने के काम में लिया जाता था। इसके तीन ओर सीढ़ियाँ बनी हुयी हैं।

चित्तौड़ा का कुण्ड


कोटा से 60 किमी की दूरी पर सांगोद तहसील के ग्राम कनवास में इस प्राचीन बनावट के कुण्ड का निर्माण 200 वर्ष पूर्व रियासत काल में किया गया था। पूर्व समय में इस कुण्ड के पानी का उपयोग पीने के लिये व जानवरों को पिलाने के लिये किया जाता था।

गिरधरपुरा का कुण्ड


कोटा के 250 वर्ष पुराने कोटा से 48 किमी दूर गिरधरपुरा में इस कुण्ड का निर्माण कोटा रियासत के विद्वान सारोला वाले पण्डित के पूर्वजों ने करवाया था। कोटा का मुख्य गाँव होने के कारण गिरधरपुरा के उत्तर में यह कुण्ड बनवाया गया था। वर्तमान में कुण्ड खाली है एवं इसका पानी सूख चुका है।

चार छतरियों का कुण्ड


कोटा की रियासत काल में 500 वर्ष पूर्व कैथून में जनसहयोग के द्वारा इस कुण्ड का निर्माण पानी की समस्या को देखते हुए करवाया गया था। तथा जमीन की सिंचाई भी इसके द्वारा की जाती थी। इस कुण्ड पर चार छतरियाँ बनी हुयी हैं जो धार्मिक दृष्टि से अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं।82

ताथेड़ का कुण्ड


कोटा से 12 कि. मी. दूर ताथेड़ में 300 वर्ष पुराना कोटा दरबार के समय का कुण्ड पानी की समस्या होने पर बनवाया गया था। प्राचीन शैली के कुण्ड का निर्माण चूना पत्थर आदि से किया गया है। वर्तमान में इस कुण्ड के चारों तरफ खेती की जा रही है एवं कुण्ड जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

दीगोद का तालाब


कोटा से 25 किमी दूर दीगोद में 200 वर्ष पूर्व उम्मेदसिंह जी के पूर्वजों द्वारा इस तालाब का निर्माण करवाया गया था। यह तालाब लोगों के स्नान करने व पशुआें के लिये बनवाया गया था। इसमें चार घाट बने हैं जो जीर्णशीर्ण अवस्था में हैं।

बड़ा तालाब


दीगोद में 400 वर्ष पूर्व कोटा दरबार द्वारा इस तालाब का निर्माण स्नान करने व पशुओं को पानी पिलाने के लिये बनवाया गया था। तालाब पर स्नान करने के लिये दो घाट बने हैं एवं तीन छतरियाँ बनी हुयी हैं।

दाता का तालाब


कोटा से 76 किमी दूर दाता ग्राम में जनसहयोग से इस तालाब का निर्माण कृषि भूमि की सिंचाई, कृषि कार्य एवं ग्रामवासियों के उपयोग के लिये किया गया था। इस तालाब की दीवार पक्की बनी हुयी है जो लगभग 100 फीट लम्बी तथा 10 फीट चौड़ी है।

हरिपुरा का तालाब


कोटा से 42 किमी दूर हरिपुरा में 750 वर्ष पुराना कोटा के महाराज का बनवाया हुआ तालाब है जिसका निर्माण जंगली जानवरों की पेजयल की व्यवस्था के लिये करवाया गया था। यह तालाब पहाड़ी की तलहटी में स्थित है जिससे सम्पूर्ण पहाड़ी का पानी तालाब में आता है। तालाब के तीन ओर कच्ची मिट्टी की पाल बनी हुई है तथा पाल के पास में बहुत सारे पेड़ लगे हैं जिससे यह बहुत सुन्दर दिखायी देती है।

पदमपुरा का तालाब


कोटा से 45 किमी दूर पदमपुरा गाँव में कोटा रियासत का बनाया हुआ पहाड़ियां के बीच यह तालाब स्थित है। इस तालाब में सालभर पानी भरा रहता है। तालाब में स्नान करने के लिये दो घाट बने हुए हैं तथा तीनों तरफ मिट्टी की कच्ची दीवार बनी है। तालाब के मुख्य पाल पर मन्दिर व स्कूल बना हुआ है। इसका उपयोग पशुओं को पानी पिलाने के लिये किया जाता है।

रामसागर तालाब


कोटा से 43 किमी दूर रावठा गाँव में लगभग 750 वर्ष पूर्व कोटा दरबार द्वारा इस तालाब का निर्माण करवाया था। इस तालाब को दो पहाड़ों के बीच में पक्की दीवार बनाकर बनाया हुआ है। इसके पास में एक तीन मंजिला शिकारगाह बना है जहाँ से राजा शिकार करते थे। वर्तमान में इस तालाब का पानी जानवरों को पिलाने के काम में लिया जाता है। इस तालाब के पास हनुमानजी का मन्दिर भी है।

रावठा का तालाब


कोटा से 50 किमी दूर खीची राजाओं के द्वारा इस तालाब का निर्माण करवाया गया था। यह तालाब चूना व मिट्टी का बना हुआ है। इस तालाब की पाल कई हिस्सों में टूट चुकी है। वर्तमान में स्थानीय ग्रामीण तालाब में सिंचाई करते हैं व मवेशियों को पानी पिलाते हैं। यहाँ तालाब की पाल पर बादल महल बना है जो जर्जर अवस्था में है।

रानपुर का तालाब


कोटा से 20 किमी दूर रानपुर ग्राम में प्राचीन काल में कोटा शहर को बाढ़ से बचाने के लिये कोटा दरबार द्वारा इस तालाब का निर्माण करवाया था। यहाँ पर जानवरों के पीने के पानी की व्यवस्था भी हैं एवं इस तालाब के पानी से सिंचाई भी की जाती है। इस तालाब के बीच में दो कुएँ भी हैं। इस तालाब की बनावट प्राचीन है। ग्रामवासियों के द्वारा ही इस कुएँ की मरम्मत करवायी जाती है।

गोदल्याहेड़ी का तालाब


कोटा से 22 किमी दूर 200 वर्ष पुराना यह तालाब जनसहयोग से बनवाया गया था। इस तालाब की मिट्टी बहुत गुणकारी मानी जाती है तथा यहाँ के लोग इसके पानी को बहुत पवित्र मानते हैं। इस तालाब का निर्माण कच्ची मिट्टी से किया गया है। यह तालाब सार्वजनिक है तथा सभी ग्रामवासी इसमें स्नान करते हैं।83

प्रहलादपुरा का कुआँ


कोटा से 20 किमी दूर गाँव प्रहलादपुरा में 200 वर्ष पूर्व का कुआँ स्थित है। इस कुएँ का निर्माण श्री पन्नालाल गुर्जर के पूर्वजों ने गाँव वालों की पानी की सुविधा के लिये किया था। इसके पानी का उपयोग सिंचाई के लिये किया जाता है। इस कुएँ की बनावट प्राचीन शैली की है तथा यह सामान्य अवस्था में है।

राजपूतों का कुआँ


कोटा से 22 किमी दूर राजपूरा में 200 वर्ष पूर्व कोटा नरेश द्वारा इस कुएँ का निर्माण करवाया गया था। इस प्राचीन स्मारक का निर्माण पीने के पानी की सुविधा के लिये किया गया था। यहाँ पर 200 स्तम्भों पर स्थित हौद बना हुआ है एवं घुमावदार सीढ़ियाँ बनी हुयी हैं। वर्तमान में यह कुआँ अच्छी अवस्था में है।

देव कृष्ण गुर्जर का कुआँ


कैथून में 200 वर्ष पुराना देव कृष्ण गुर्जर के दादाजी का बनाया हुआ कुआँ स्थित है। यह कुआँ प्राचीन बनावट से बना हुआ है इस कुएँ के पानी का उपयोग सिंचाई में किया जाता था। वर्तमान में यहाँ पर बिजली की व्यवस्था है। कुएँ के दोनों ओर रहट से पानी निकालने के लिये प्राचीन समय के ढाणे बने हुए हैं। वर्तमान में कुआँ सामान्य अवस्था में है।

भोपन का कुआँ


कैथून में 200 वर्ष पूर्व भोपा समाज की विधवा के द्वारा इस कुएँ का निर्माण करवाया गया था बाद में इस कुएँ व यहाँ की जमीन को मुस्लिम समुदाय को बेच दिया गया। वर्तमान में इस समुदाय द्वारा इस कुएँ के पानी को सिंचाई के काम में लिया जा रहा है।84

अरल्या का मोती कुआँ


अरल्या में 450 साल पूर्व का ठाकुर साहब का बनवाया हुआ कुआँ स्थित है। यह कुआँ सिंचाई की सुविधा हेतु बनवाया गया था। ठाकुर साहब के द्वारा अपने घोड़े मोती के नाम पर इस कुएँ का नाम रखा गया। मोती कुआँ वर्तमान में उनके वंशजों के अधीन है। कुएँ में बिजली का पम्प भी लगा हुआ है जो खेती के काम आता है।

राज का कुआँ


कोटा से 10 किमी दूर अर्जुनपुरा में चूना पत्थर का बना हुआ 400 वर्ष पुराना कुआँ है। इस कुएँ का निर्माण उम्मेद सिंह जी के कार्यकाल में गाँव में पानी की समस्या के समाधान हेतु बनवाया था। इस कुएँ की 3 फीट मोटी दीवार 57 फीट की गहराई तथा 24 फीट का आकार है। वर्तमान में कुआँ जीर्णषीर्ण अवस्था में है एवं कोई काम नहीं आ रहा है।

चरेल का नया कुआँ कोटा से 85 किमी दूर 200 वर्ष पूर्व राज दरबार ने इस कुएँ का निर्माण करवाया था। यह कुआँ गाँव चरेल से एक किलोमीटर नदी के किनारे बना हुआ है। इस कुएँ से पहले सिंचाई की जाती थी। यह कुआँ 13 फीट की गोलाई में बना हुआ है। वर्तमान में यह कुआँ जर्जर व सूखा पड़ा है।

दलापुरा का कुआँ


कोटा से 25 किमी दूर दलापुरा में 200 वर्ष पूर्व महाराज के समय इस कुएँ का निर्माण करवाया गया था। यह कुआँ प्राचीन काल की बनावट का अनुपम उदाहरण है। प्राचीन समय में कुएँ से मनुष्य व जानवरों को पानी पिलाया जाता था। इस कुएँ की गहराई 90 फीट है। इस कुएँ का जीर्णोद्धार जलदाय विभाग द्वारा करवाया गया है व गाँव वालों के पानी पीने के काम आता है।

प्रेमपुरा का कुआँ


कोटा से 41 किमी दूर तोरण पंचायत के प्रेमपुरा ग्राम में 700 वर्ष पूर्व धाकड़ समाज के द्वारा इस कुएँ का निर्माण गाँव वालों की पानी की समस्या के निवारण के लिये करवाया गया था। वर्तमान में इस कुएँ की देखभाल गाँव के निर्मल सिंह के द्वारा की जा रही है।

बादली का कुआँ


250 वर्ष पूर्व रियासत काल में सुल्तानपुर में किसी जागीरदार ने इस कुएँ का निर्माण करवाया था। ग्रामीणों का यह पेयजल का मुख्य स्रोत है तथा खेती की सिंचाई के रूप में भी उपयोग किया जाता है। वर्तमान में स्थानीय निवासियों द्वारा कुएँ को मिट्टी से भर दिये जाने के कारण इसके अवशेष मात्र मौजूद हैं।

मशीन वालों का कुआँ


सुल्तानपुर में 200 वर्ष पूर्व रियासत काल में पेयजल की सुचारू व्यवस्था हेतु इस कुएँ का निर्माण करवाया गया था। रियासत काल के बाद स्थानीय मुस्लिम निवासी भवरलाल ने इस कुएँ को अपने आधिपत्य में ले लिया जिनके पूर्वजों ने गाँव में सिंचाई की कई मशीनें लगा रखी थीं। उनको मशीन वालों के नाम से जाना जाने के कारण कुएँ का नाम भी उनके नाम पर पड़ गया।

उम्मेदगंज का कुआँ


मोतीपुरा में 400 वर्ष पूर्व रियासत काल में कोटा नरेश ने इस कुएँ का निर्माण करवाया था। इस कुएँ की बनावट प्राचीन शैली की है तथा इसके ऊपर माता के त्रिशूल लगे हुए हैं। लोग इनको पूजने के लिये दूर-दूर से आते हैं। इस कुएँ से सिंचाई की जाती है वर्तमान में यह कुआँ जीर्णशीर्ण अवस्था में है।

नान्ता महल के जल स्रोत


कोटा से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर पश्चिमी दिशा में नांता नामक एक प्राचीन ग्राम है। यह ग्राम कोटा राज्य के प्रसिद्ध दीवान झाला जालिम सिंह का पैतृक जागीरी ग्राम था। राजराणा जालिम सिंह जी की पत्नी जिन्हें गोड़ जी साहेब कहा जाता था ने महल में गोविन्द देव जी का मन्दिर और महल के उत्तर में एक बावड़ी भी खुदवाई थी एवं महल के पूर्व में लगभग आधा मील की दूरी पर एक कुआँ भी खुदवाया। राजराणा जालिम सिंह जी की खवास (उपपत्नी) जवाई बाई ने नांता के दक्षिण में लगभग दो मील की दूरी पर एक तालाब बनवाया।85

चम्बल नदी


राजस्थान और मध्य प्रदेश से होकर बहने वाली नदी चम्बल का मूल नाम ‘चर्मणावती’ है। इसका उल्लेख महाभारत में चामबेला और गंभीरा नाम से किया गया है। ऐसी कथा है कि राजा रतिदेव ने महायज्ञ किया और हजारों पशुओं की बलि दे डाली। तभी भारी वर्षा हुई और पशुओं की चमड़ी के ढेर से जलधारा बह निकाली और यह धारा चर्मणावती (चंबल) कहलायी।86

चम्बल यमुना की सहायक नदी है। इसका उद्गम 854 मी. की ऊँचाई पर विध्यांचल की श्रेणियों में मध्य प्रदेश के इन्दौर जिले के महू के पास मानपुर नामक स्थान से होता है। इसकी लम्बाई 960 कि.मी. है। यह करीब 320 कि.मी तक उत्तरी दिशा में मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा तक बहती है। यहाँ से यह राजस्थान में प्रवेश कर 30 किमी के बाद दायीं और मुड़ती है और उत्तर पूर्व की दिशा में बहने लगती है। कोटा बून्दी जिलों में काफी दूरी तक सीमा बनाती हुयी यह नदी हाड़ौती के हृदय स्थल का निर्माण करती है। लगभग 520 किमी तक उत्तर पूर्वी दिशा में बहने के बाद मालवा पठार से निकलने वाली कालिसिन्ध नोनेर ग्राम के निकट इसमें मिलती है तथा 251 कि.मी. तक राजस्थान मध्य प्रदेश की सीमा रेखा बनाती है। अरावली पर्वतश्रेणी से निकलने वाली बनास नदी रामेसर गाँव के पास बायीं ओर से आकर इसमें मिलती है। यहाँ से चम्बल नदी बायीं ओर मुड़कर दक्षिण-पूर्व की दिशा में बहती हुयी उतरप्रदेश में प्रवेश करती है। उतरप्रदेश में 46 कि.मी. बहने के बाद चम्बल नदी इटावा जिले में साहन के पास यमुना नदी में मिल जाती है।87

चम्बल की सहायक नदियाँ कालिसिन्ध, पार्वती, मेज तुरेल है। चम्बल नदी उत्तर की ओर कोटा शहर तक बहती है। चम्बल नदी अपने विस्तृत बीहड़ भूमि खड्ड के लिये यह प्रसिद्ध है।

ऐसा माना जा रहा है कि बेसिन की बीहड़ भूमि में वर्तमान भूगर्भिक समय में हल्का उत्थापन हुआ है तथा यह भूमि यमुना के जलोढ़ मैदान में वहाँ जाकर मिल जाती है जहाँ भू-दृश्य यमुना के अन्य सहायक नदियों द्वारा विस्तृत रूप से चम्बल के पूर्व तथा पश्चिम में निक्षारित होता है।88

चम्बल नदी में 1ः41 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का पानी आता है। यद्यपि यह एक बरसाती नदी है लेकिन वर्षाकाल में यह 30-31 मीटर ऊँची बहने लगती है और इसका फैलाव क्षेत्र 730 मीटर तक हो जाता है। चम्बल नदी की विशाल जलराशि को विनाश से विकास की ओर मोड़ने के उद्देश्य से प्रेरित चम्बल नदी परियोजना मध्य प्रदेश एवं राजस्थान सरकार के संयुक्त प्रयासों का प्रतिफल है। इस नदी पर कई बाँध तथा बैराज बनाकर सिंचाई तथा जलविद्युत योजनाओं का विकास किया गया है जिनमें गाँधी सागर, राणा प्रताप सागर, जवाहर सागर तथा कोटा बैराज प्रसिद्ध है।

सर्वप्रथम 1943 ई. में उदयपुर के निकट जावर की जस्ते की खानों के लिये सस्ती जलविद्युत उपलब्ध करवाने के लिये कोटा, उदयपुर एवं जयपुर की रियासतों ने कोटा के पास चम्बल पर बाँध बनाने की योजना बनाई थी किन्तु दुर्भाग्यवश यह पूर्ण न हो सकी। 1945 में पुनः यह योजना बनी। 100 करोड़ रुपये की लागत वाली चम्बल बहुउद्देशीय परियोजना 1953 में आरम्भ होकर तीन चरणों में पूर्ण हुयी।

1. प्रथम चरण- प्रथम चरण में गाँधी सागर बाँध, गाँधी सागर विद्युत गृह, कोटा सिंचाई बाँध एवं दोनों ओर नहरों के निर्माण का कार्य किया गया।

2. द्वितीय चरण- राणा प्रताप सागर बाँध, राणा प्रताप विद्युत गृह का निर्माण कार्य सम्पन्न किया गया।

3. तृतीय चरण- इसके अन्तर्गत जवाहर सागर बाँध एवं जवाहर सागर विद्युत गृह निर्माण कार्य पूर्ण हुआ।

गाँधी सागर बाँध एवं विद्युतगृह- गाँधीसागर बाँध चम्बल परियोजना का प्रथम बाँध है जो मन्दसौर जिले के चौरासीगढ़ दुर्ग से लगभग 8 किलोमीटर नीचे रामपुरा-भानपुरा पठारों के बीच चम्बल नदी पर 1959 ई. में निर्मित किया गया था। चम्बल एक ऐसी नदी है जिसका अपार जल इस बाँध के निर्माण से पहले बिना किसी उपयोग के ही बह जाता था। इस जल राशि का उपयोग राष्ट्र-कल्याण में करने के लिये ही चम्बल नदी पर सर्वप्रथम गाँधीसागर बाँध का निर्माण किया गया। जिसका लाभ केवल मध्य प्रदेश को ही नहीं बल्कि राजस्थान को भी मिल रहा है।

यह बाँध 513.5 मीटर लम्बा एवं 62 मीटर ऊँचा है। गाँधी सागर का क्षेत्रफल 580 वर्ग किलोमीटर एवं जल संग्रह क्षमता 77460 लाख घनमीटर है तथा उपयोगी जल ग्रहण क्षमता 69200 लाख घनमीटर है। विद्युत उत्पादन हेतु इस बाँध पर 23 हजार किलोवाट क्षमता वाली पाँच इकाइयाँ स्थापित की गई हैं जिनकी सम्मिलित उत्पादन क्षमता 115 हजार किलोवाट है। प्रत्येक टरबाइन से उपयोग के बाद निकलने वाले जल द्वारा कोटा बैराज से, जो चम्बल परियोजना का सबसे नीचे का बाँध है के दोनों तरफ दो नहरें निकाली गई गई हैं। दायीं ओर से निकाली गई नहर की जल क्षमता 6660 क्यूसेक है। यह नहर 425 किलोमीटर लम्बी है। इस नहर का 127 किलोमीटर भाग राजस्थान तथा शेष 298 किलोमीटर मध्य प्रदेश में है। इसकी सहायक नहरों की लम्बाई 560 किलोमीटर है। बायीं नहर 65 किलोमीटर बहती हुई अन्त में बून्दी जिले की मेजा नदी में जाकर मिल जाती है। इसकी जल क्षमता 1270 क्यूसेक है। इन दोनों नहरों से कोटा, बून्दी, टोंक व सवाईमाधोपुर जिलों की लगभग 4.5 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई हो रही है। बाँध के निर्माण में नींव का बहुत महत्त्व है और विशेष रूप से नदी की धारा में जहाँ पर बाढ़ के पानी की निकासी हेतु उत्पलव मार्ग का निर्माण किया जाता है। इसलिये नदी तल की सभी कमजोर चट्टानों को हटाकर समुचित रूप से सीमेंट, कंकरीट ग्राउटिंग करके संभावित दबावों को वहन करने योग्य एक मजबूत आधार तैयार किया गया। बाँध के नीचे का दबाव कम करने के लिये एक “ड्रेनेज गैलरी निकास दीर्घा” का निर्माण किया गया, जिसमें 7.5 से 10 सें. मी. व्यास के 12 से 15 मी. गहरे तथा 6 मी. के अन्तराल पर छेद किए गए हैं। उत्पलव मार्ग बकैट के नीचे भी जल निकासी प्रणाली का प्रावधान है। गाँधी सागर बाँध के उत्पलव मार्ग के निर्माण में पत्थरों की चिनाई के साथ-साथ सीमेंट, कंकरीट का भी उपयोग किया गया है। पूरे बाँध के निर्माण में 1.7 लाख घनमीटर कंकरीट का उपयोग हुआ है। विभिन्न प्रकार के दबावों को वहन करने हेतु लौह मिश्रित कंकरीट का भी उपयोग किया गया है। निर्माण की दृष्टि से यह बाँध चिनाई का बाँध (मेसनरी डैम) है, जो पत्थर की चिनाई से बना है। इसके निर्माण में मुख्य सामग्री लाल सीमेंट जिसमें 25 प्रतिशत मिलाया हुआ ईंट का बुरादा था, प्रयोग की गई थी। इसकी संरचना में “कुनू साइफन” का निर्माण एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

तकनीकी दृष्टि से इस बाँध का मुख्य भाग जल-विद्युतगृह है, जो कि बाँध के नीचे दाहिनी ओर 93.3 मी. लंबे तथा 17.7 मी. चौड़े आकार का बनाया गया है। यह लौह मिश्रित कंकरीट की संरचना है। इस विद्युतगृह (बिजलीघर) की स्थापित क्षमता 115 हजार किलोवाट है। इसमें प्रत्येक 23 हजार किलोवाट की 5 इकाइयाँ निर्मित की गई हैं। विद्युतगृह का मुख्य भाग “जनरेटर हॉल” है, जो कि 32 लौह मिश्रित कंकरीट के खंभे पर आधारित है। इसमें लगे तीन जनरेटरों की विशेषता विद्युत उत्पादन के लिये इलेक्ट्रिकल शैफ्ट सिस्टम का प्रावधान, वोल्टेज विनियमन के लिये चुंबकीय एम्पलीफायर का प्रयोग एवं न्यूट्रल इन्सोलेशन है। चौथी विद्युत उत्पादन इकाई के लिये पारम्परिक एक्साइटेशन और वोल्टेज विनियमन का प्रावधान है तथा द्वितीय चरण की ओर न्यूट्रल को प्रतिरोधक द्वारा अर्थिंग ट्रांसफॉर्मर से भूमि से जोड़ दिया गया है।89

राणा प्रताप सागर बाँध एवं विद्युत गृह- गाँधी सागर से 48 किलोमीटर दूर राजस्थान में चम्बल नदी पर चित्तौड़गढ़ जिले के रावतभाटा में चुलिया जल-प्रपात के निकट यह बाँध बनाया गया है जहाँ नदी अत्यन्त संकीर्ण घाटी से गुजरती है। इस बाँध की लम्बाई 1100 मीटर व ऊँचाई 36 मीटर है। यह बाँध 1970 ई. में 31 करोड़ की लागत से पूर्ण हुआ था। इसके जलाशय का क्षेत्र 113 वर्ग किलोमीटर है और इससे निकाली गई नहरों से लगभग 1.2 लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई की जाती है। बाँध के ठीक नीचे जल विद्युत गृह बनाया गया है। जिसमें 43000 किलोवाट विद्युत क्षमता की चार इकाइयाँ सक्रिय हैं। इसके निकट ही राजस्थान परमाणु शक्ति गृह भी बना है।

जवाहर सागर बाँध एवं विद्युत गृह- इस बाँध का निर्माण राजस्थान में राणा प्रताप सागर बाँध से 33 किलोमीटर दूर उत्तर में बोरावास गाँव के समीप किया गया है। यह बाँध 440 मीटर लम्बा एवं 45 मीटर ऊँचा है। पहले दो बाँधों से छोड़ा गया जल ही मुख्यतः इसमें आता है। इस बाँध के नीचे की ओर निर्मित विद्युत गृह में 33-33 हजार किलोवाट विद्युत क्षमता की तीन इकाइयाँ हैं, जिनकी कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 99 हजार किलोवाट है। यह एक बहुमुखी परियोजना है, जिसका निर्माण बिजली उत्पन्न करने, बाढ़ को नियंत्रित करने के लिये तथा जलग्रहण क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा के लिये किया गया है।

चम्बल परियोजना राजस्थान एवं मध्य प्रदेश दोनों राज्यों के लिये बड़ी लाभप्रद रही है। इसमें दोनों राज्यों की लगभग 6 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई एवं 3.86 लाख किलोवाट जल-विद्युत का उत्पादन हो रहा है। इस प्रकार कोटा, लाखेरी सवाईमाधोपुर, उदयपुर, चितौड़गढ़ जयपुर साँभर किषनगढ़ झालावाड़ आदि नगरों एवं मध्य प्रदेश राज्य के मन्दसौर, रतलाम उज्जैन, ग्वालियर आदि नगरों का द्रुतगति से औद्योगिक विकास हो रहा है। उपरोक्त के अतिरिक्त इस परियोजना से मिट्टी के कटाव पर रोक, मत्स्य पालन, वृक्षारोपण, मलेरिया पर नियन्त्रण, पेयजल की सुविधा जैसे उद्देश्यों की पूर्ति हो रही है।90

पार्वती नदी


पार्वती नदी मध्य प्रदेश में देवास के दक्षिण पूर्व की पहाड़ियों से निकलकर उत्तर की दिशा में बहती है। लगभग 300 किमी मध्य प्रदेश में बहने के बाद कुम्भराज के उत्तर-पश्चिम में कोटा जिले में प्रवेश करती है। मांगरोल के उत्तर में यह राजस्थान व मध्य प्रदेश की सीमा 100 किमी तक बनाते हुए सवाईमाधोपुर जिले में खण्डार के दक्षिण पूर्व में चम्बल में मिल जाती है।91

झालावाड़ के जल संसाधन
बाई जी की बावड़ी


झालावाड़ नगर के बीच में शिवमन्दिर से जुड़ी हुई बाई जी की बावड़ी स्थित है। 150 फीट गहरी इस बाई जी की तिमंजिला बावड़ी का निर्माण अब से 200 वर्ष पूर्व हुआ था। इसकी पहली मंजिल से पाताली धरातल तक कलात्मक सीढ़ियाँ हैं। दो मंजिलों में कलात्मक झरोखे बनाये गये हैं। प्रकोष्ठों की दृढ़ दिवारों तथा मजबूत प्लास्टर उस समय की निर्माण सामग्री की उत्कृष्टता का बोध कराते हैं। नगर की धार्मिक मान्यताओं की प्रतीक इस बावड़ी का पानी सूख गया है।

व्यासों की बावड़ी


झालावाड़ से लगभग 35 किमी पर खानपुर तहसील में व्यासों की बावड़ी स्थित है जो कि जनता की सार्वजनिक सम्पत्ति है। इस बावड़ी का निर्माण रियासत काल में 200 वर्ष पूर्व दरबार के पुरोहित (कामदार) व्यास जी के द्वारा करवाया गया था जो कि गाँव वालों के लिये पानी की व्यवस्था हेतु किया गया था। इस बावड़ी की बनावट बहुत प्राचीन है। वर्तमान में यह बावड़ी सामान्य अवस्था में है।

अंधेरा बाग की बावड़ी


झालावाड़ से 25 किमी की दूरी पर स्थित ग्राम बोरदामड़ के अंधेरा बाग में यह बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण लगभग 700 वर्ष पूर्व खीचीं राजपूतों के द्वारा करवाया गया था। बावड़ी की बनावट बहुत प्राचीन है। इस बावड़ी के पास में ठाकुर साहब का चबूतरा है। इस बावड़ी से प्राचीन समय में सिर्फ खीचीं राजपूत पानी पीते थे और नहाने के काम लेते थे। इस बावड़ी की गहराई 50 फुट है। इसकी विशेषता इसकी प्राचीन बनावट है।

त्रिमुखी बावड़ी


झालावाड़ से 33 किमी दूरी पर खानपुर के ग्राम सारोला कला में यह बावड़ी स्थित है। लगभग 300 वर्ष पूर्व कोटा दरबार के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। प्राचीन कालीन इस बावड़ी के तीन मुख होने के कारण इसे त्रिमुखी बावड़ी कहा गया है। इस बावड़ी के प्रवेशद्वार पूर्व, पश्चिम व दक्षिण दिशा में है। पश्चिममुख पर हनुमानजी का मन्दिर है। इस बावड़ी की तीनों दिशाओं पर छतरियाँ बनी हुयी हैं तथा तीनों छतरियों पर शिवलिंग स्थापित हैं। यह बावड़ी वर्तमान में सूखी हुई है। इस बावड़ी का धार्मिक महत्त्व भी है।

राज बावड़ी


झालावाड़ से 49 किमी दूरी पर खानपुर तहसील में जोलपा ग्राम में यह राजबावड़ी स्थित है। रियासत काल में इस गाँव के स्थायी पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण कोटा दरबार के राजवंशों के द्वारा ग्रामीणों के पेयजल की सुचारु व्यवस्था हेतु इस बावड़ी का निर्माण करवाया। बावड़ी प्राचीन राजपूतों की स्थापत्य शैली का मुख्य उदाहरण है। बावड़ी के बीचों बीच महलनुमा भवन बना हुआ है जिसके चारों कोनों पर छतरियाँ बनी हुयी हैं। वर्तमान में ग्रामीण बावड़ी को पेयजल हेतु उपयोग लेते हैं। इस बावड़ी का धार्मिक महत्त्व भी है।

केसर बावड़ी


झालावाड़ से 40 किमी दूरी पर पिड़ावा तहसील के ग्राम सुनेल में केसर बावड़ी स्थित है। इस बावड़ी का निर्माण 400 वर्ष पूर्व इन्दौर के महाराजा होल्कर ने ग्रामवासियों की पानी की व्यवस्था के लिये करवाया था। यहाँ से ग्रामवासी पीने का पानी भरने व स्नान करने के लिये इसका उपयोग किया करते थे। वर्तमान में यह बावड़ी सार्वजनिक है एवं जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

सुदामा बावड़ी


जिला मुख्यालय से 57 किमी दूरी पर पिड़ावा तहसील में स्थित मंगसीपुर ग्राम में सुदामा की बावड़ी है जो लक्ष्मीनारायण पाटीदार की निजी सम्पति है। लगभग 298 वर्ष पूर्व स्थानीय निवासी श्री रघुदासजी पाटी गुजरात से यहाँ आकर बसे थे। उन्होंने यहाँ पर एक मन्दिर, बावड़ी एवं हवेली का निर्माण करवाया था। इस बावड़ी का निर्माण ग्रामवासियों के लिये पीने के पानी की समुचित व्यवस्था हेतु करवाया गया था। वर्तमान में यह बावड़ी सामान्य अवस्था में है।

जैन मन्दिर बावड़ी


झालावाड़ से 40 किमी दूरी पर सुनेल ग्राम में 500 वर्ष पूर्व जैन समाज ने इस बावड़ी का एवं जैन मन्दिर का निर्माण करवाया था। यह बावड़ी जैन समाज की निजी सम्पत्ति है एवं खण्डहर अवस्था में है। मन्दिर में स्थित होने के कारण इस बावड़ी का धार्मिक महत्त्व है।92

क्यासरा की बावड़ी


झालावाड़ से लगभग 95 कि.मी. की दूरी पर गंगधार तहसील के क्यासरा गाँव में एक बावड़ी स्थित है। बावड़ी के निर्माण के सम्बन्ध में तिथि स्पष्ट नहीं है, परन्तु माना जाता है कि 500 वर्ष पूर्व गंगधार के हाकिम भट्टनाथ जी के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया। भट्टनाथ महंत व सिद्ध पुरूष थे। उन्होंने ग्रामीण के पेयजल की समुचित व्यवस्था के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया। बावड़ी का सम्पूर्ण निर्माण प्राचीन कलाकृति से किया गया है। बावड़ी के पास ऐतिहासिक महादेव मन्दिर में शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग पर चढ़ाने के लिये इस बावड़ी के जल का उपयोग लिया जाता था। यह बावड़ी चूना एवं पत्थर से बनी है। वर्तमान में बावड़ी में ग्रामीणों के द्वारा नलकूप से पानी का उपयोग लिया जा रहा है।

गोरवालों की बावड़ियाँ


झालावाड़ से 140 किमी दूर गंगधार के उन्हेल ग्राम में गोरवालों की बावड़ियाँ स्थित हैं। माना जाता है कि 400 वर्ष पूर्व गोरवाल समाज द्वारा इन बावड़ियों का निर्माण करवाया गया। यहाँ पर गाँव के सामने वाली बावड़ी को दरवाजे वाली बावड़ी भी कहते हैं। दूसरी को औरों की बावड़ी कहते हैं। इन बावड़ियों की बनावट काफी प्राचीन है। इनके निर्माण में चूना व पत्थर का प्रयोग लिया गया है। इनमें से एक बावड़ी पर ब्राह्मणों का और दूसरी पर हरिजनों का अधिकार है क्योंकि ये बावड़ियाँ इनके खेतों के पास में हैं। इन बावड़ियों से सिंचाई होती है परन्तु वर्तमान में ये बावड़ियाँ जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं।

नन्दपुर लुहारिया की बावड़ी


झालावाड़ से 120 किमी दूरी पर भवानीमंडी सड़क मार्ग पर नन्दपुर लुहारिया में यह बावड़ी स्थित है। माना जाता है कि 300 वर्ष पूर्व जयपुर दरबार के हाड़ा ने इस बावड़ी का निर्माण जयपुर के महाराजा के कहने पर करवाया था। इस बावड़ी का उपयोग पीने के पानी एवं नहाने के लिये किया जाता था। वर्तमान में बावड़ी ग्राम पंचायत के अधीन है एवं इसमें पम्पों के द्वारा पानी का उपयोग सिंचाई में लिया जाता रहा है।

बड़ के बालाजी की बावड़ी


झालावाड़ कस्बे में बड़ के बालाजी मन्दिर रोड पर एक बावड़ी स्थित है जिसे रानीजी की बावड़ी कहते हैं। यह बावड़ी आगे से बहुत संकरी है क्योंकि आगे के आधे हिस्से पर लोगों द्वारा घर बना लिया है। प्रवेश द्वार पर एक चौड़ा पाटा एवं 9 सीढ़ियाँ पानी में उतरती हैं। वहीं पर एक जीर्ण-शीर्ण छतरी बनी है जिस पर बावड़ी के अन्त में 6 गोलाकार अरहट (ठाणे) बने हैं जिनके नीचे कलात्मक डिज़ाइन की हुई है। बावड़ी पूर्व पश्चिम देखती है। यह बावड़ी अपनी ऐतिहासिक एवं शिल्प सौन्दर्य में बेजोड़ है।93

मंगलपुरा की बावड़ी


झालावाड़ के मंगलपुरा कस्बे में कन्या विद्यालय के पास एक छोटी बावड़ी स्थित है। बावड़ी कस्बे के व्यस्ततम क्षेत्र में है। बावड़ी के प्रवेशद्वार पर एक बड़ा लकड़ी का प्रवेशद्वार बना है। बावड़ी करीब 25 फुट चौड़ी एवं 75 फुट लम्बी है 50 फुट के अन्तराल पर एक चबूतरा बना है जिस पर लोगों ने अतिक्रमण कर घर बना लिये हैं। बावड़ी के दोनों ओर चौड़े पाटिये लगे हैं और दोनों तरफ 4-4 ताखे बने हैं जो खाली हैं। सामने की ओर दो अरहट लगे हैं। अतिक्रमण के दूसरी तरफ भी बावड़ी का कुछ हिस्सा है जिस पर सामने की ओर कंगूरेदार डिजाइन बनी है।94

मोती कुण्ड


झालावाड़ जिला मुख्यालय से 105 किमी की दूरी पर गंगधार तहसील के ग्राम डग में प्राचीन बनावट का मोती कुण्ड स्थित है। लगभग 200 वर्ष पूर्व गुरूजी गंगादासजी के द्वारा इस कुण्ड का निर्माण करवाया गया। इसके निर्माण के बारे में कहा जाता है कि कोटा दरबार ने एक बार यहाँ पर गुरूजी को पालकी लेकर आने के लिये भेजा क्योंकि दरबार बीमार थे। तब पालकी वालों को इसी कुण्ड में बैठाकर गुरूजी ने डुबकी लगाई और यहीं से चम्बल में निकले तथा कोटा महाराज का इलाज करके वापिस लौट आये व पालकी वालों को वापिस भेज दिया। यह चमत्कार देखकर कोटा दरबार खुश हुए और उन्होंने दो गाँव गुरूजी को दान में देने चाहे लेकिन गुरूजी ने मना कर दिया। वर्तमान में यह कुण्ड निजी सम्पत्ति है और महंत त्रिलोक दास भगवान बैरागी के अधीन है।

मोडी की झर का कुण्ड


झालावाड़ से लगभग 30 किमी दूर मोड़ी की झर ग्राम में इस कुण्ड का निर्माण कई वर्ष पूर्व करवाया गया था। यहाँ प्राचीन शिवलिंग भी है और मन्दिर में यह कुण्ड स्थित है। इस कुण्ड की विशेषता है कि इसमें दो फीट पानी रहता है। कुण्ड से दिन रात चाहे जितना पानी निकालने पर भी पानी खत्म नहीं होता है। यह स्थान पहाड़ों के मध्य एवं धार्मिक स्थान होने से यहाँ काफी भक्त आते हैं।95

रानीजी की तलाई


जोलप्पा ग्राम में लगभग 200 वर्ष पूर्व कोटा दरबार की महारानी के द्वारा इस तलाई का निर्माण करवाया गया था। यह तालाब जोलप्पा गाँव से दक्षिणी पूर्वी दिशा में स्थित है। यह तलाई ग्रामीण जन के मवेशियों हेतु बनवाया गया था। तलाई की मुख्य दीवार पत्थर से बनी हुयी है व मुख्य दीवार पर हनुमानजी की प्रतिमा है। वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा तलाई की मरम्मत भी करवायी गयी है। इस तलाई में ग्रामीण मवेशियों को पेयजल पिलाते हैं और स्नान व सिंचाई के रूप में उपयोग में लेते हैं।

उन्हैल का तालाब


झालावाड़ जिला मुख्यालय से 140 कि.मी. दूरी पर गंगधार तहसील के उन्हैल ग्राम में एक प्राचीन तालाब स्थित है जो केवल मिट्टी का बना हुआ है। इस तालाब का निर्माण लगभग 600 वर्ष पूर्व उन्हैल के अंजमा समाज के द्वारा सामूहिक रूप से बनवाया गया था। इस तालाब के किनारे नहाने के घाट भी बनवाये गये थे और एक तरफ ढाणा बनवाया गया था, जिससे यह पानी खींचने के काम आता था वर्तमान के केवल अवशेष बचे हैं।

दलसागर तालाब


झालावाड़ मुख्यालय से लगभग 130 किमी दूरी पर जेतखेड़ी ग्राम में दलसागर तालाब स्थित है। लगभग 250 वर्ष पूर्व गंगधार के शासक दलपतसिंह के द्वारा इस तालाब का निर्माण करवाया गया। दलपतसिंह महान शासक व धर्मपरायण जागीरदार थे उसने ग्रामीणों व मवेशियों के पेयजल हेतु सती स्मारकों के पास तालाब का निर्माण करवाया जहाँ पर प्राचीन घाट व कच्ची दीवार बनवायी गयी। यह तालाब 100 बीघा जमीन में स्थित है। इस तालाब की बनावट प्राचीन है जो चूना पत्थर से बना हुआ है। इस तालाब का जीर्णोद्धार ग्राम पंचायत के द्वारा करवाया गया है। वर्तमान में इस तालाब का उपयोग ग्रामीण लोगों द्वारा मवेशियों को पानी पिलाने में किया जाता है।96

गोमती सागर तालाब


यह राज्य का सबसे प्राचीन तालाब है। इस तालाब के निर्माता का नाम ‘जस्सु‘ लकड़हारा बताते हैं।97 इस तालाब के बाँध की लम्बाई 3100 फीट, चौड़ाई (मोटाई) 10 फीट और ऊँचाई 15 फीट है। यह तालाब पत्थर और मिट्टी से बना हुआ है। कोटा राज्य के राजराणा जालिम सिंह ने इस तालाब से एक तीन किमी. पक्की नहर का निर्माण कृषिभूमि की सिंचाई के लिये करवाया था।98 जिसके माध्यम से रियासत काल में 150 एकड़ क्षेत्र की सिंचाई होती थी एवं झालरापाटन नगर के पेयजल की व्यवस्था भी इसी के माध्यम से होती थी। अतः रियासत की ओर से तालाब के जल को दूषित न करने के निर्देश दिये गये थे।

मोती कुआँ


झालावाड की गंगधार तहसील के डग ग्राम में मोती कुआँ स्थित है। इस कुएँ का निर्माण 200 वर्ष पूर्व ठाकुर मोदी सिंह के द्वारा करवाया गया था। रियासत काल में ठाकुर मोदी सिंह राजपूत यहाँ के जागीरदार थे। उनके द्वारा राहगीरों व ग्रामीणों के लिये पेयजल की समुचित व्यवस्था हेतु इस कुएँ का निर्माण करवाया था। यह कुआँ तालाब के पास है एवं चूना पत्थर से बना हुआ है। यह ग्राम पंचायत की राजकीय सम्पत्ति है एवं वर्तमान में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

संगम घाट


झालावाड़ की गंगधार तहसील में दो नदियों पर संगम घाट स्थित है। इस घाट का निर्माण झाला जालिमसिंह के द्वारा करवाया गया था। यह घाट दो छोटी नदियों छोटी कालीसिन्ध एवं जालिपा नामक नदी के मिलन पर स्थित है। यहाँ पर स्त्रियाँ कार्तिक माह में उपवास कर स्नान (कार्तिक स्नान) करती हैं। यहाँ पर गर्गऋषि की तपोभूमि है। यह धार्मिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण स्थान है।

कालिसिन्ध


कालिसिन्ध नदी मध्य प्रदेश में इन्दौर नगर के पूर्व में उदयसागर के पास से निकलती है।99 यहाँ से उत्तर की ओर प्रवाहित होती हुई यह झालावाड़ जिले में रायपुर के निकट प्रवेश करती है। उत्तर की ओर बहती हुयी मुकुन्दवाड़ा श्रेणियों में अपना मार्ग बनाती है। उजाड़ नदी भी इसकी एक छोटी शाखा के रूप में आकर मिलती है। परवन नदी भी कालिसिन्ध की एक सहायक नदी है जो छीपाबडौद, अटरू सांगोद क्षेत्र में प्रवाहित होती हुई पलायता के निकट कालिसिन्ध में मिल जाती है।100 गागरोन के निकट आहू नदी इसमें आकर मिलती है। आहू नदी से मिलकर यह दरें पहाड़ को काटती हुई ठीक उत्तर दिशा में बहकर पीपल्दा गाँव के पास चम्बल से मिलती है। कालिसिन्ध नदी पर सुपर थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट बनाया गया है इसकी विद्युत क्षमता 1200 मेगावाट है एवं अनुमानित लागत 7723 करोड़ है। यह प्रोजेक्ट 2230 बीघा जमीन पर बनाया गया है इस परियोजना हेतु पानी का जलस्रोत कालिसिन्ध नदी है। कालिसिन्ध नदी पर भवरासा ग्राम में इस हेतु एक बाँध का निर्माण किया गया है। जो सिंचाई एवं विद्युत उत्पादन हेतु काम में लिया जाता है।

चन्द्रभागा नदी


चन्द्रभागा नदी के विषय में अनुश्रुति है कि एक बार शूकर के शिकर से शापित होकर क्षय रोगी बने मालवा के राजा चन्द्रसेन यहाँ आये थे। उन्होंने अपनी साधना से यहाँ भगवान शिव को प्रसन्न किया था तब शिवकृपा एवं चन्द्रसेन के भाग्य से यहाँ चन्द्रभागा नामक नदी प्रकट हुई। नदी स्नान करते ही राजा का कोढ़ दूर हो गया। राजा चन्द्रसेन ने यहाँ चन्द्रावती नगरी बसाई तथा नदी को चन्द्रभागा नाम दिया। पुरातत्व विभाग द्वारा यहाँ लगाये गए बोर्ड पर उक्त अनुश्रुति को प्रमाणित करती पंक्तियाँ लिखी हैं-

चन्द्रसेन को भागते प्रकट हि सुरसरि आय।
ऐहि कारण तिय नाम से भागा चन्द्र कहाय।।


झालरापाटन कस्बा चन्द्रभाग नदी के किनारे पर स्थित है यह नदी नगर के पश्चिम की ओर बह कर आती है तथा दक्षिण हिस्से को छूती हुई उत्तर में मुड़ कर कालिसिन्ध नदी में मिल जाती है। चन्द्रभागा नदी के किनारे झालावाड़ जिले का सबसे बड़ा मेला लगता है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर झालरापाटन नगर के समीप चन्द्रभागा नदी के किनारे इस मेले का आयोजन पशुपालन विभाग द्वारा किया जाता है। मेले में हजारों की संख्या में विभिन्न प्रकार के पशुओं का क्रय-विक्रय होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पावन चन्द्रभागा नदी में स्नान करते हैं।101

बारां के जल संसाधन
इकलेरा बावड़ी


बारां से 19 किमी दूरी पर पूर्व कोटा दरबार द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी का निर्माण पेजयल हेतु व पशुओं के पानी के लिये किया गया था। कुछ सालों पूर्व वर्षा के पानी का बहाव बावड़ी से होकर जाने से बावड़ी पूरी तरह मिट्टी में दब गई थी। बावड़ी के पास ही बालाजी का मन्दिर व मोती छगजी का चबूतरा है।

बेगन बावड़ी


बारां से 30 किमी दूर बेगन ग्राम में लगभग 300 वर्ष पूर्व कोटा दरबार ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। जागीरी के समय पेयजल व स्नान हेतु बावड़ी बनवायी गयी थी। बाद में गाँव वालों के द्वारा भेरूजी व शिवजी का चबूतरा बनवाया गया। जिनकी वर्तमान में श्रद्धा के साथ पूजा की जाती है।

भुमा साहब की बावड़ी


बमुलिया ग्राम में 250 वर्ष पूर्व भुमाशाह के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यह बावड़ी प्राचीन ढंग से बनी है। इसके ढाणे के पास में जिन्न बाबा का स्थान है। प्राचीन समय इसका पानी पीने व नहाने तथा सिंचाई के काम में लेते थे। वर्तमान समय में इस बावड़ी का पानी सूख गया है एवं उसमें मिट्टी भर गयी है।

करमा जी की बावड़ी


बारां से 5 किमी दूर मांगरोल रोड पर यह बावड़ी स्थित है। 200 वर्ष पूर्व ठाकुर सवाई सिंहजी ने अपने परिवार के लोगों के लिये पर्व त्यौहार पर स्नान करने हेतु इस बावड़ी का निर्माण करवाया। पहले गाँव छोटे-छोटे टुकड़ों में पहाड़ों में बसा था बाद में सवाई सिंह जी ने गढ़ी सवाईराम बसाया था। यह बावड़ी उत्तर दक्षिण देखती हुयी है। रोड पर जिन्द बाबा का स्थान एवं बावड़ी में भेरूजी का स्थान होने के कारण इसकी धार्मिक महत्ता है। यह बावड़ी I आकार में है एवं कुण्ड वर्गाकार है जिसमें पानी खींचने का ढाणा एवं 2 घिरणियाँ लगी हैं। सीढ़ियों के ऊपर कमरे के आकार में तिबारी बनी है। प्रत्येक महीने की एकादशी को यहाँ जिन्द बाबा की पूजा होती है।102

गढ़ की बावड़ी


बारां से 200 वर्ष पूर्व राजा मोतीसिंह द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। प्राचीन समय में बावड़ी का उपयोग नहाने व पीने के काम लिया जाता था। यह प्राचीन गढ़ की बावड़ी है। इसका निर्माण उन्होंने अपने निवास स्थान पर पानी की व्यवस्था के लिये व नहाने के लिये करवाया था। यह बावड़ी पर्यटन स्थल के रूप में जानी जाती है तथा जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

मीरा बाई की बावड़ी


बारां से लगभग 18 किमी दूर 450 वर्ष पूर्व रियासत काल में मीराबाई के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इसमें बरामदे के दोनों तरफ जिन्द व माताजी का मन्दिर है। यह बावड़ी तीन मंजिल की बनी हुयी है। इसका उपयोग पानी पीने के काम में लिया जाता था।

कालाखेड़ा की बावड़ी


बारां से 25 किमी दूर कालाखेड़ा में 400 वर्ष पूर्व गांग के एक भामाशाह के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इसका पानी पीने व नहाने के काम लिया जाता था। यह प्राचीन ढंग से बनी बावड़ी है। इस बावड़ी का कुआँ जगन्नाथ पटेल द्वारा करवाया गया। वर्तमान में यह बावड़ी जीर्ण-शीर्ण व सूखी पड़ी है।

मण्डोला की बावड़ी


बारां से 11 किमी दूर मण्डोला ग्राम में गाँव के चार पटेलों के द्वारा पानी की समस्या के स्थायी समाधान के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। प्राचीन समय की इस बावड़ी को धार्मिक व पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है। वर्तमान में जीर्ण-शीर्ण अवस्था की इस बावड़ी पर पंचायत का अधिकार है।

दीलोदा की बावड़ी


बारां से 18 किमी दूर 233 वर्ष पूर्व दीलोदा के ठाकुर जोरसिंह नाथावत के पूर्वजों द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था एवं बावड़ी के पास ही पूजा अर्चना के लिये एक मन्दिर का निर्माण भी करवाया। बावड़ी का पानी पेयजल के लिये उपयोग में लिया जाता है। वर्तमान में पृथ्वीसिंहजी ने इस बावड़ी का नवनिर्माण करवाया है।

गोरधनपुरा की बावड़ी


बारां से 11 किमी दूर गोरधनपुरा गाँव में 500 वर्ष पूर्व के राजा के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यह बावड़ी प्राचीन समय की है। इस बावड़ी के पास हनुमानजी व गणेशजी का प्राचीन मन्दिर होने के कारण इसकी धार्मिक महत्ता है। इस बावड़ी के पास सन्त निवास बनाया गया है जहाँ महात्मा निवास करते हैं।

खील खुली माताजी की बावड़ी


बारां से 18 किमी दूर बोहत में 400 वर्ष पूर्व नागा साधुओं द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। पूर्व में नागा साधु यहाँ निवास करते थे। कहा जाता है कि इस बावड़ी के अन्दर खील खुली माता का मन्दिर होने के कारण इस बावड़ी को उपरोक्त नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यह बावड़ी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।103

मकबरा बावड़ी


बारां से 30 किमी दूर मांगरोल में लगभग 350 वर्ष पूर्व कोटा रियासत के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी के पास एक मकबरा बना हुआ है जहाँ पर मुस्लिम लोग नमाज अदा करते थे। उसी के नाम से इस बावड़ी का नाम मकबरा बावड़ी रखा गया था। वर्तमान में बावड़ी को सीढ़ियों की ओर से बन्द करके इसका पानी गाँव को पिलाने व पानी की टंकी भरने के काम लिया जाता है।104

सोरती बावड़ी


बारां से 27 किमी दूर सोरती बावड़ी में 300 वर्ष पूर्व कोटा रियासत के महाराव के द्वारा जनसेवार्थ एवं मवेशियों को पानी हेतु इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी का दरवाजा व सीढ़ियाँ प्राचीन बनावट की हैं। इस बावड़ी में भरपूर पानी है। आस-पास की कृषि भूमि को सींचने के काम में लिया जाता है।105

पानी की बावड़ी


बारां से 65 किमी दूर खटका ग्राम में लगभग 300 वर्ष पूर्व राजपूत ठीकाने के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण पेयजल हेतु करवाया गया था। यह कुण्ड के आकार में अन्दर बावड़ी बनी हुयी है। वर्तमान में यह बावड़ी गाँव/स्थानीय ग्रामीणों के पानी पीने एवं सिंचाई के काम आ रही है।

मुण्डियर की बावड़ी


बारां से 80 किमी दूर मुण्डियर में 200 वर्ष पूर्व रियासत काल में आने जाने वालों के लिये इस बावड़ी को बनवाया गया था। बाद में यहाँ पर इसी बावड़ी के नजदीक एक हनुमानजी की छतरी बना दी गई। इस बावड़ी में पानी कभी भी कम नहीं होता है। यह बावड़ी गाँव की पूर्व दिशा में प्राचीन बनावट से बनी हुयी है। इस बावड़ी का पानी पीने योग्य है।

पोखारामजी की बावड़ी


बारां से 86 किमी दूर शाहाबाद में 500 वर्ष पूर्व पोखराम के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था पूर्व में आने जाने वाले लोगों के लिये पीने का पानी नहीं होने के कारण यह बावड़ी पहाड़ी के रास्ते पर बनवायी गयी। यह बावड़ी बहुत ही सुन्दर बनी हुयी है। इसमें प्राचीन बनावट का दरवाजा है और दरवाजे के ऊपर तिबारी लगी हुई है। वर्तमान में यह बावड़ी सार्वजनिक है एवं इसमें पानी रहता है।

सती की बावड़ी


बारां से 100 किमी दूर सनवाड़ा की पश्चिमी दिशा में पूर्व महाराजाओं ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। बावड़ी के पास राजवंश की सती के चबूतरे पर दो प्रतिमाएँ हैं जिसके नाम पर इस बावड़ी का नाम सती की बावड़ी पड़ा। बावड़ी के पास हनुमानजी का मन्दिर बना हुआ है जहाँ दूर-दूर से लोग दर्शन करने आते हैं। यह बावड़ी सार्वजनिक है।

बमौरी घाटा की बावड़ी


बारां से 30 किमी दूर बमौरी घाटा में 300 वर्ष पूर्व कोटा महाराज ने इस बावड़ी को यहाँ के स्थानीय निवासियों की पीने के पानी व पशुओं के लिये बनवाया था। वर्तमान में बावड़ी के आस-पास के लोग इसके पानी को उपयोग में लेते हैं।

कालिका माता बावड़ी


बमौरी घाटा में 500 वर्ष पूर्व कोटा रियासत काल के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। लोगों का कहना है कि प्राचीन समय में यहाँ पर जंगल था और जानवरों को चराने के लिये ग्रामवासी यहाँ पर आते थे इसलिये पानी के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। बावड़ी का नाम कालिका माता बावड़ी पड़ने के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है।

मजिनाग मन्दिर की बावड़ी


बारां से 90 किमी दूर करनाल में 500 वर्ष पूर्व की प्राचीन बावड़ी का निर्माण रियासत काल में राहगीरों व जानवरों को पानी पिलाने की व्यवस्था हेतु किया गया था। इस बावड़ी की गहराई 30 फीट है। वर्तमान में इस बावड़ी के पानी को कोई काम में नहीं लेते हैं। बावड़ी के पास प्राचीन मन्दिर है जिसमें महावीर जी की मूर्ति है।

दीगोद की बावड़ी


बारां से 87 किमी दूर दीगोद जागीर में यहाँ के मुखिया के द्वारा 200 वर्ष पूर्व इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया। गाँव की पश्चिम दिशा में स्थित इस बावड़ी को प्राचीन कलाकृति से पत्थरों पर गढ़ाई कर बनाया गया है जो 17वीं शताब्दी की स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है। बावड़ी के पास शिवजी का मन्दिर स्थापित है। वर्तमान में बावड़ी का पानी सूख चुका है।

फलिया की बावड़ी


बारां से 90 किमी दूर 300 वर्ष पूर्व में खीचीं राजपूतों के द्वारा फलिया में इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। प्राचीन समय में राजा महाराजा जंगल में शिकार खेलने आते थे तब इस बावड़ी का पानी पीने व स्नान करने के काम में लेते थे। वर्तमान में यह बावड़ी स्थानीय नागरिकों के अधीन है।

अमलावदा की बावड़ी


बारां से 22 किमी दूर 300 वर्ष पूर्व रियासत काल में इस बावड़ी का निर्माण किया गया था। प्राचीन समय में यहाँ के राजा को अमलावदा के नाम से जाना जाता था। इस बावड़ी के पानी का उपयोग लोग नहाने व पीने के काम लेते थे व जानवर भी यहाँ पर पानी पीते थे। वर्तमान में यह बावड़ी खण्डहर हो चुकी है।

गडारी की बावड़ी


बारां से 80 किमी दूर गडारी गाँव में 400 वर्ष पूर्व खीचीं राजपूत के द्वारा पानी पीने व स्नान करने के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। वर्तमान में यह बावड़ी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है व खण्डहर हो चुकी है।106

कांकड़दा की बावड़ी


बारां से 20 किमी दूर कांकड़दा गाँव से 3 किमी दूर खेतों में यह बावड़ी बनी है जो कि 200 वर्ष पूर्व की प्राचीन बावड़ी है। वर्तमान में इस बावड़ी पर स्थानीय नागरिकों ने चबूतरे का निर्माण कर दिया है। बावड़ी के अवशेष मात्र मौजूद हैं।

संतराम बाग की बावड़ी


बारां से 32 किमी दूर भवरगढ़ में 500 वर्ष पूर्व बाबा सन्तराम ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। बावड़ी का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा में है। बावड़ी के पास स्थित मन्दिर में हनुमान जी व गणेश जी की प्रतिमा लगी हुई है। पास में एक बाग स्थित है। व इसके आस-पास 7.5 बीघा जमीन स्थित है।

किला बावड़ी


भवरगढ़ में लगभग 500 वर्ष पूर्व किले में इस बावड़ी का निर्माण कोटा दरबार ने करवाया था। किले में माँ आशापाला का मन्दिर भी है। इसमें दो कमरे व तिबारी तथा 6 बुर्ज बने हैं। इस बावड़ी का धार्मिक महत्त्व है।

पदमपुरा की बावड़ी


बारां से 20 किमी दूर पदमपुरा में 300 वर्ष पूर्व रियासत काल में एक राजपूत के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। उस समय यहाँ पर खीचिंयों का शासन था। किंवदन्ती है कि राजपूत दुल्हन को प्यास लगने पर वर पक्ष द्वारा ताना मारने पर दुल्हन के पिता ने उसी समय बावड़ी का निर्माण करवा दिया। वर्तमान में यह जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है लेकिन इसका पानी कभी नहीं सूखता है।

पगारा की बावड़ी


बारां से 42 किमी पगारा गाँव में 600 वर्ष पूर्व हीरालाल जी कांछी के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। हीरालाल जी कांछी पूर्व में जमीदार पटेल हुआ करते थे। इस बावड़ी से हीरालालजी अपनी जमीन में सिंचाई करते थे और खेतों के बीच मकान बनाकर निवास करते थे। वर्तमान में उनके वंषज यहीं रह रहे हैं। बावड़ी के पानी से वर्तमान में भी सिंचाई की जाती है।

ब्रह्म साहब की बावड़ी


बारां से 48 किमी दूर रामगढ़ में 400 वर्ष पूर्व रियासत काल में महाराजाओं के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यह बावड़ी जीर्ण शीर्ण हालत में है। इस बावड़ी का उपयोग नहाने, धोने व पीने के काम में लिया जाता था।

काचकरण जी की बावड़ी


रामगंज में 300 वर्ष पूर्व में रियासत काल में काचकरण के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इसका उपयोग पानी पीने के काम में लिया जाता था। वर्तमान में इस बावड़ी की स्थिति सामान्य है।

देवरा की बावड़ी


बारां से 32 किमी दूर शोभागपुरा में 250 वर्ष पूर्व समस्त ग्रामीणों ने सार्वजनिक रूप से इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यहाँ पर एक प्राचीन बनावट का चबूतरा बना है उस पर देव महाराज की मूर्तियाँ स्थापित हैं। इस बावड़ी को उसी समय इस स्थान पर आने जाने वालों के लिये पानी पीने के लिये खुदवाई गयी थी। यह बावड़ी वर्तमान में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

मोरेली की बावड़ी


बारां से 72 किमी दूर 200 वर्ष पूर्व राजा महाराजाओं द्वारा प्राचीन काल में जानवरों व ग्रामीणवासियों के पेयजल के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी के पास हनुमान जी का मन्दिर है जिनकी धार्मिक रूप से पूजा की जाती है। इसलिये इस बावड़ी को बंधा हनुमानजी वाली बावड़ी के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यह बावड़ी सार्वजनिक है।

खेल बावड़ी


बारां से 66 किमी दूर निपानिया ग्राम में 750 वर्ष पूर्व खींची राजाओं के द्वारा जानवरों व ग्रामवासियों के पेयजल के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी के पास जानवरों को पानी पीने के लिये खेल बनायी गयी थी जिसे बावड़ी के पानी से भरा जाता था इसलिये इसे खेल बावड़ी के नाम से जाना जाता है। बावड़ी के पास में छतरी भी बनी है।

रामदास जी की बावड़ी


बारां से 65 किमी दूर छबड़ा में 800 वर्ष पूर्व संध्यादास जी महाराज के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यहाँ पर नागाओं का स्थान रहा है। कहा जाता है कि पुराने समय में घी खत्म हो जाने पर कुण्ड से पानी निकालकर रसोई तैयार की गयी थी। वर्तमान में बावड़ी खण्डहर अवस्था में सूखी पड़ी है।

झालीजी की बावड़ी


बारां से 35 किमी दूर नागदा करिया में इस बावड़ी को जागीरदार झाला ठाकुर ने अपनी रानी झालीजी की याद में बनवाया था। इस बावड़ी को स्थानीय निवासी नहाने व पानी पीने के काम लेते हैं। पंचायत के द्वारा इस बावड़ी की मरम्मत करवायी गयी है।107

बालाखेड़ा की बावड़ी


बारां के बालाखेड़ा के पास अलीपुरा ग्राम में स्थित इस बावड़ी को 800 वर्ष पूर्व के आस-पास तत्कालीन शासकों द्वारा यात्रियों के विश्राम व पानी के लिये बनवाया गया था। बावड़ी में सकस जी नाम से जिन्द महाराज का निवास है जिनकी पूजा होती है। बावड़ी भव्य स्वरूप में विद्यमान है। पास में चतुर्भुजनाथजी का मन्दिर होने के कारण इसका धार्मिक महत्त्व है।

बालदड़ा की बावड़ी


बारां से 32 किमी दूर बालदड़ा में 250 वर्ष पूर्व रियासत काल में इसका निर्माण राहगीरों के आराम व पानी पीने के लिये करवाया गया था। इस बावड़ी पर महाराज सिन्धुपुरी जी तपस्या करते थे इसलिये बाद में इस जगह का नाम सिन्धुपुरी ग्राम रखा गया। इस बावड़ी की गहराई 20 फीट है। वर्तमान समय में इस बावड़ी में पानी है।

बिसोली माताजी की बावड़ी


बारां से 38 किमी दूर बड़गाँव में 200 वर्ष पूर्व उधा नायक के पूर्वजों ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। जब बिसोलीं माता का मन्दिर बनवाया तब यहाँ विराट् जंगल था। तथा पानी की आस-पास कोई व्यवस्था नहीं थी तब बिंजारों ने पानी की समुचित व्यवस्था हेतु यह बावड़ी बनवायी थी। बावड़ी के एक हिस्से में जिन्द बाबा का स्थान है। इस बावड़ी का जीर्णोद्धार राज्य सरकार द्वारा करवाया गया है। ग्रामीण इसे आज भी पेयजल के लिये काम में ले रहे हैं। बिसोली माता की बावड़ी के प्रवेशद्वार के दायीं तरफ एक श्वेत प्रस्तर पर जिन्द महाराज की मूर्ति दीवार में स्थापित है जिसके नीचे अंकित है कि मांगीलाल बंजारों के पुत्र नेना ग्राम बड़गाँव तहसील मांगरोल जिला कोटा ने सम्वत 2043 की बैशाख सुदी 3 को जिन्द महाराज की माताजी को स्थापित किया।108

बिसोली माता की बावड़ी बारां

गोकुल जी की बावड़ी


बारां से 21 किमी दूर बड़वा ग्राम में 200 वर्ष पूर्व गोकुल जी के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। प्राचीन काल में बावड़ी पीने के पानी का मुख्य स्रोत था तथा इसके पानी से खेतों में सिंचाई की जाती थी। वर्तमान में यह बावड़ी जीर्णषीर्ण अवस्था में है।

खेल भराई बावड़ी


बड़वा में 200 वर्ष पूर्व रियासत काल में इस प्राचीन बावड़ी का निर्माण जागीरदारों के द्वारा करवाया गया था। इस बावड़ी के पास में खेल बनी हुयी है जिसे पानी से भरवाई की जाती थी इसलिये इसका नाम खेल भराई की बावड़ी पड़ा। इसका निर्माण जानवरों के पानी पीने के लिये करवाया गया था। वर्तमान में इसका पानी सूख चुका है।109

छतरी हाली बावड़ी


बड़वा में लगभग 500 वर्ष पूर्व गौड़ राजपूत शासन काल में पीने के पानी के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी पर एक छतरी है जिस पर अस्पष्ट लेख लिखा हुआ है। प्राचीन समय में इस बावड़ी से सिंचाई की जाती थी। वर्तमान में यह बावड़ी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

जमनापरी बावड़ी


बारां से 21 किमी दूर बड़वा ग्राम में यह बावड़ी स्थित है। बावड़ी उत्तर दक्षिण देखती हुयी I आकार में स्थित है। बड़वा में 280 वर्ष पूर्व जमनापरी के महाराज द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। जमनापरी जी नाथ सम्प्रदाय एक सिद्ध आदमी थे, उन्होंने यहाँ पर समाधि ली थी। महात्माओं की जमात के समय पानी की समस्या से निजात के लिये इस बावड़ी को बनवाया गया था। इस बावड़ी में प्राचीन मूर्तियाँ व स्थापत्य कला का अच्छा उपयोग हुआ है। इस बावड़ी में 6-6 सीढ़ियाँ के छः स्तर हैं। प्रत्येक स्तर पर 4 X 12 वर्ग फीट का पाटा बना है। बावड़ी के तिबारे पर सामने गणेश जी की मूर्ति स्थापित हैं। इस बावड़ी के प्रवेश द्वार पर एक शिलालेख उत्कीर्ण है जो अपठ्नीय है। इस बावड़ी के परिसर में 5 समाधि स्थल व एक सती स्तम्भ लगा है। जिन पर सम्वत 1824 अंकित है। बावड़ी में दो तांके बनी हैं। जिसमें दायीं ओर शेर पर सवार दुर्गा एवं बायीं ओर नन्दी पर शिव पार्वती विराजमान हैं।110

गढ़ की बावड़ी


बड़वा में 250 वर्ष पूर्व रियासत काल में स्थानीय जागीरदार द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यह बावड़ी गढ़ के परकोटे में स्थित रजवाड़ों की प्रमुख बावड़ी थी। यहाँ पर रानियाँ स्नान करने आया करती थीं। यह बावड़ी निरन्तर मिट्टी में ढहती जा रही है। स्थानीय लोगों द्वारा इसकी कोई देखरेख नहीं की जा रही है।

महादेव मन्दिर की बावड़ी


बारां से 27 किमी दूर भोज्याखेड़ी में 300 वर्ष पूर्व जागीरदार ने गाँव वालों की पीने के पानी व नहाने के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यह बावड़ी महादेवजी के मन्दिर में बनी है मन्दिर व बावड़ी का जीर्णोद्धार जनप्रतिनिधियों द्वारा करवाया गया है। वर्तमान में बावड़ी को पशुओं को पानी पिलाने के काम में लिया जाता है।

पोखरा बावड़ी


बारां से 35 किमी दूर रायथल रोड पर यह बावड़ी स्थित है। यह उत्तर दक्षिण देखती हुई भव्य बावड़ी है। पाटोन्दा में 300 वर्ष पूर्व पोखरमल जी द्वारा इस बावड़ी का निर्माण पेयजल की स्थायी सुविधा के लिये करवाया गया था। रियासत काल में गाँव में पेयजल का यह मुख्य स्रोत था। इस बावड़ी में भोमसिंहजी भारण का स्थल जिन्द बाबा के रूप में पूजनीय है। यह स्थान बावड़ी के पश्चिमी छोर पर है जहाँ हर रविवार व हर माह की एकादशी को दर्शनार्थी दर्शन हेतु आते हैं। इस बावड़ी व जिन्द बाबा के स्थान का जीर्णोद्धार दानदाताओं के द्वारा करवाया गया था। बावड़ी निर्माता के नाम पर इसका नाम पोखर बावड़ी पड़ा। इस बावड़ी की देखरेख विकास सेवा समिति द्वारा की जा रही है।111

पचेल खुर्द की बावड़ी


बारां से 35 किमी दूर पचेल खुर्द में 500 वर्ष पूर्व नागा बाबा श्री रामपुरी जी महाराज के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यह बावड़ी अन्ता-मांगरोल सड़क के ठीक पश्चिम में है। बावड़ी की भव्यता को चार चाँद लगाती हुई यहाँ पर लगभग एक दर्जन प्राचीन छतरियाँ एवं चबूतरे हैं। बावड़ी के एक छोर पर नदी बहती है। बावड़ी के एक तरफ गणेश जी व दूसरी तरफ सरस्वती जी की प्रतिमा है।112

खावंताजी की बावड़ी


बारां से 30 किमी दूर पलायथा में लगभग 400 वर्ष पूर्व राजा द्वारा इस बावड़ी का निर्माण पेयजल व स्नान हेतु किया गया था। बावड़ी के पास में एक सती एवं गणेश जी का चबूतरा स्थित है। वर्तमान में बावड़ी सामान्य अवस्था में है एवं दर्शनीय स्थल है।

कलकल्या महाराज की बावड़ी


पलायथा में 300 वर्ष पूर्व ठाकुर उकार सिंह जी के पूर्वजों ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यह बावड़ी पेयजल हेतु काम आती थी। बावड़ी पलायथा से गुलाबपुरा रोड़ पर स्थित है एवं सार्वजनिक है।

मन्दिर परिसर की बावड़ी


पलायथा में 500 वर्ष पूर्व पलायथा ठिकाने द्वारा महादेवजी, माताजी, सावलाजी मन्दिर एवं बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यहाँ लोग बावड़ी का जल ग्रहण एवं स्नान करने के बाद मन्दिर में आराधना करते थे। यह बावड़ी सार्वजनिक है।

सरकन्या की बावड़ी


बारां से 38 किमी दूर सरकन्या में 500 वर्ष पूर्व गुसांई समाज के महात्माओं के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। वर्तमान में बावड़ी में पानी है। बावड़ी के सामने दक्षिण दिशा में देखता हुआ हनुमानजी का मन्दिर है व बावड़ी के पास नागा गुसाई समाज की समाधि है। बावड़ी के हिस्से में 8 बीघा पक्की जमीन है।

खारी बावड़ी


बारां से 24 किमी दूर अन्ता में 200 वर्ष पूर्व रियासत के राजा द्वारा बावड़ी व माताजी की प्रतिमा यहाँ स्थापित की गयी थी। यह बावड़ी पानी की स्थायी समस्या के समाधान के लिये ग्रामवासियों के लिये बनवायी गई थी। इस बावड़ी की बनावट प्राचीन है।

जिन्द महाराज की बावड़ी


अन्ता में 250 वर्ष पूर्व कोटा रियासत के महाराजा द्वारा इस बावड़ी को बनवाया गया था। यह रजवाड़ों की प्रमुख बावड़ी थी। यहाँ पर राजा रानी स्नान किया करते थे। इस बावड़ी के मुख्य द्वार पर जिन्द बाबा की प्रतिमा स्थापित है जिसकी धार्मिक रूप से पूजा की जाती है। यह बावड़ी गढ़ के परकोटे में स्थित हैं। इसकी बनावट प्राचीन काल की है। वर्तमान में बावड़ी में साफ व स्वच्छ पानी है व इसका उपयोग पेयजल के लिये किया जाता है।113

मोठपुर की बावड़ी


बारां के अटरू तहसील में मोठपुर के क्षारबाग में एक बावड़ी बनी हुयी है। इस बावड़ी का निर्माण राजदरबार द्वारा करवाया गया था। बावड़ी के कीर्ति स्तम्भ पर वि. सं. 1557 अगहन बदी सोमवार का एक लेख खुदा हुआ है जो इस बावड़ी के निर्माण के संबंध में जानकारी देता हैं।114

तेजाजी की बावड़ी


बडोरा में लगभग 800 वर्ष पूर्व शेरगढ़ के राजा द्वारा यहाँ पर तेजाजी का स्थान होने के कारण इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। प्राचीन समय में यहाँ के निवासी पीने के पानी व नहाने के काम में इस बावड़ी का उपयोग करते थे। वर्तमान में बावड़ी का पानी सूख गया है। यह बावड़ी ग्राम पंचायत के अधीन है।

कंकाली जी बावड़ी


बारां से 25 किमी दूर कुन्जेर में 300 वर्ष पूर्व कोटा दरबार के द्वारा कंकाली माताजी के मन्दिर के पास भक्तजनों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यहाँ पर पहले स्थानीय निवासी इस बावड़ी को पानी को पीने व नहाने के काम में लेते थे। वर्तमान में यह बावड़ी जागीरदार के वंशज के अधीन है।

रतनपुरा की बावड़ी


बारां से 40 किमी दूर रतनपुरा में गुर्जर जाति के लोगों द्वारा 300 वर्ष पूर्व इस कुण्ड व बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यहाँ पर उनके पूज्य देवता देवनारायण जी का स्थान है। इनकी बनावट प्राचीन है एवं वर्तमान में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

सरसोडिया की बावड़ी


बारां से 60 किमी दूर सरसोडिया ग्राम में 800 वर्ष पूर्व खीचीं दरबार द्वारा ग्राम वालों को पीने के पानी व नहाने और पशुआें को पानी पिलाने के लिये इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस बावड़ी का कुछ हिस्सा ही शेष रहा है बाकी का हिस्सा मिट्टी में दब गया है। यह बावड़ी ग्राम पंचायत के अधीन है।

गढ़ी की पुरानी बावड़ी


कुन्जेड़ में लगभग 300 वर्ष पूर्व यहाँ के जागीरदार खीचीं के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यह बावड़ी गढ़ी के पास है इसको जागीरदार अपने निजी काम में लेते थे। वर्तमान में यह बावड़ी उनके वंशजों के अधीन है। इस बावड़ी में वर्तमान में पानी नहीं है व कचरे से भरी हुई है।

घोड़ा बावड़ी


बारां से 36 किमी दूर अटरू में 600 वर्ष पूर्व हाड़ा शासकों ने इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। यह बावड़ी स्थानीय लोगों के पानी पीने के काम आती थी। इस बावड़ी का निर्माण राजा के घोड़ों की याद में करवाया गया था इसलिये इसे घोड़ों की बावड़ी कहते हैं। वर्तमान में यह बावड़ी ग्राम पंचायत के अधीन है।

बोहत ग्राम की बावड़ी


बारां से 15 किमी दूर बोहत ग्राम में तेजाजी के चौक में यह दक्षिण देखती हुयी बावड़ी स्थित है। बावड़ी का आकार I जिसमें छः स्तर में सीढ़ियों के बाद कलात्मक तिबारी व कुण्ड बना है। बावड़ी के पास ही तेजाजी के स्थान पर एक पत्थर पर लेख उत्कीर्ण है जिस पर सम्वत 1801 ब्रजमन श्री राजस शत्रुशाल जी अंकित है। इसी समय बावड़ी का निर्माण करवाया गया होगा। बावड़ी के ढाणे के पीछे बनी खेल पर एक प्रस्तर पर सम्वत 1995 में 150 रुपये में कोली नारायण को खेली का ठेका देने का उल्लेख है। यह एक कलात्मक बावड़ी है जिसमें कंगूरे का अलंकरण है। कहा जाता है कि इस बावड़ी के पानी से कुकर खाँसी का इलाज होता है।115

बोहत गाँव की बावड़ी बून्दी

देवकरण जी की बावड़ी


बारां के मांगरोल कस्बे से बाहर 3 किमी की दूरी पर यह पश्चिम देखती हुयी बावड़ी स्थित है। स्थानीय महात्मा देवकरण जी का समाधि स्थल होने के कारण इस बावड़ी का नाम देवकरण जी की बावड़ी पड़ा। यह बावड़ी I आकार में है जिसमें बहुस्तरीय सीढ़ियों की प्रथम पाट में बने ताकें में जिन्द बाबा का स्थान है। इस बावड़ी पर देवकरण जी की पूजा होती है। सम्भवत यह बावड़ी कोटा दरबार के शत्रुशाल जी के द्वारा बनवायी गयी थी। एकादशी को यहाँ पर मेला भरता है।116

सिन्धपुरी की बावड़ी


बारां से 30 किमी दूर अन्ता रोड़ पर सिन्धपुरी में यह बावड़ी स्थित है। यह बावड़ी I आकार की उत्तर दक्षिण देखती हुई है। इस बावड़ी की सीढ़ियों के पास बने तांके में गणेश जी स्थापित हैं। बावड़ी में वर्गाकार कुण्ड व ढाणे पर तीन घिरनियाँ बनी हैं। ढाणे पर आयताकार छतरी का निर्माण स्थानीय निवासी एवं जगराज के सुपुत्र पटेल मोरूलाल, चिंरजी, धनराज, ब्रजराज मीणा द्वारा सम्वत 2053 में कराये जाने का उल्लेख है।117

देवनारायण जी का कुण्ड


बारां से 10 किमी दूर बाराना में 200 वर्ष पूर्व गुर्जर समाज द्वारा पूजा अर्चना हेतु एक मन्दिर और उसके पास एक कुण्ड का निर्माण करवाया गया था। कुण्ड के बारे में कहा जाता है कि इसके पानी से कीड़े मर जाते हैं। किसान कुण्ड का पानी लेकर फसल में छिड़काव करते हैं।

मण्डोला का कुण्ड


200 वर्ष पूर्व मण्डोला में एक मन्दिर व कुण्ड का निर्माण दादूपंथियों के द्वारा करवाया गया था। प्राचीन समय में दादूपंथी लोग यहाँ निवास करते थे और वे यहाँ तपस्या करते थे। वर्तमान में यह कुण्ड सामान्य अवस्था में है और लोग इसमें स्नान करते हैं।

लेवा का कुण्ड


बारां से 16 किमी दूर लेवा में 500 वर्ष पूर्व कोटा ठिकाने ने इस कुण्ड का निर्माण करवाया। यह कुण्ड बहुत गहरा है एवं इसमें झरोखे बने हुए हैं। इस कुण्ड का निर्माण एक रात में करवाया गया था। यह कुण्ड स्नान व पशुआें को पानी पिलाने के काम आता था। इस कुण्ड के पास एक पानी की खेली व हनुमानजी की छतरी बनी हुयी है। कुण्ड के चारों ओर 3 बीघा जमीन है। इस कुण्ड को जनद कुण्ड के नाम से जाना जाता है।

शाहजी का कुण्ड


बारां से 85 किमी दूर हसावदा शाहजी में यहाँ के मुखिया पटेल शाहजी महाजन द्वारा पेयजल हेतु सार्वजनिक रूप से उपयोग हेतु नदी के किनारे इस कुण्ड का निर्माण किया गया था। प्राचीन काल में इस कुण्ड के चारों ओर बाग बगीचा बना हुआ था। यहाँ पर कुण्ड के पास हनुमानजी का का मन्दिर बना हुआ है। वर्तमान में कुण्ड से गाँव में पेयजल आपूर्ति भी की जाती है। कुण्ड का जीर्णोद्धार ग्राम पंचायत द्वारा करवाया गया है।

सीताबाडी के कुण्ड


बारां से 43 कि.मी. दूर केलवाडा ग्राम से कोटा-शिवपुरी मार्ग से सीताबाडी के लिये रास्ता जाता है। यहाँ पर लगभग आधा दर्जन पवित्र जल कुण्ड एवं मन्दिरों की शृंखला दर्शनीय है। जल कुण्डों के परिसर में ही मन्दिर होने के कारण कुण्डों में स्नान का सिलसिला वर्ष भर चलता है। सूर्य कुण्ड लक्ष्मण कुण्ड, व सीता कुण्ड में स्नान करने की परम्परा है। भरत कुण्ड में स्नान नहीं किया जाता है। लक्ष्मण कुण्ड परिसर में लक्ष्मण प्रतिमा, सूर्य कुण्ड में राधा-कृष्ण एवं महादेव, लवकुश कुण्ड में सीता के साथ लवकुश की प्रतिमाएँ, सीता कुण्ड में सीताजी की प्रतिमा स्थापित है।118

रामगढ़ किले का कुण्ड


रामगढ में 400 वर्ष पूर्व रियासत काल में महाराजाओं ने इस कुण्ड का निर्माण करवाया था। यहाँ 900 फीट ऊँचा किला है और कुण्ड भी यहाँ पर स्थित है। यहाँ पर जाने के लिये अन्नपूर्णा व कृपणा मयी माताजी के मन्दिर पर जाने के बाद 2 कि.मी. पहाड़ पर चढ़कर इस स्थान पर पहुँचा जा सकता है। इस कुण्ड को राजा महाराजा नहाने के उपयोग में लेते थे। ये पहाड़ के ऊपर स्थित होने के बाद भी जब से बना है तब से लेकर आज तक इसमें पानी भरा हुआ है।

तोपिया मिया का कुण्ड


बारां से 64 किमी दूर आचोली ग्राम में 500 वर्ष पूर्व रियासत काल में राजा के द्वारा यह कुण्ड व बाग बनवाया गया था। श्री रमेशजी पुरोहित के पूर्वजों को यह बाग व कुण्ड राजा ने पुरस्कार के रूप में दिया था। इस कुण्ड के ऊपर गणेश जी का मन्दिर बना होने के कारण इसका धार्मिक महत्त्व है।119

वरला कुण्ड


बारां से 25 किमी दूर ठीकरिया नागदा में 50 वर्ष पूर्व रियासत काल में महाराजा मुकुन्दसिंहजी की धर्मपत्नी महारानी के द्वारा इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यह धार्मिक कुण्ड है। इस कुण्ड के ऊपर हनुमाजी का प्राचीन मन्दिर है, जिसमें हनुमानजी की प्रतिमा स्थापित है। यह कुण्ड कालीसिन्ध नदी के किनारे बना हुआ है। इस कुण्ड के बारे में कहावत है कि कुण्ड में स्नान करने से चर्मरोग व कोढ़ जैसी बीमारियाँ दूर हो जाती हैं।120

दह का कुण्ड


बारां से 25 किमी दूर ठीकरिया ग्राम में 500 वर्ष पूर्व रियासत काल के समय मुकुन्दसिंह की धर्मपत्नी महारानी द्वारा एक साथ सात कुण्डों का निर्माण करवाया था। यह दह का कुण्ड नदी के अन्दर बना हुआ है, जिसे कुण्डी का दह कहते हैं। यहाँ पर ऐतिहासिक शिवलिंग का प्रारूप बना हुआ है व नदी का पानी लगातार बह रहा है।

नागदा के शिव मन्दिर का कुण्ड


कोटा से 35 कि.मी. दूर स्थित नागदा मे एक प्राचीन शिव मन्दिर है। शिव मन्दिर के निकट ही एक कुण्ड है। इस कुण्ड का निर्माण प्रताप सिंह पुत्र माधो सिंह जी जागीरदार नागदा के द्वारा करवाया गया था। कुण्ड के गौमुख से जल का झरना निरन्तर बहता रहता है। कहते हैं कि पहले यहाँ सात कुण्ड थे, परन्तु अब दो ही शेष हैं। अपने प्राचीन अवशेषों एवं प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण यह स्थान आस-पास के लोगों की शृ़द्धा का केन्द्र है।121

तेजाजी का कुण्ड


ठीकरिया नागदा में 300 वर्ष पूर्व का कुण्ड यहाँ के जागीरदार द्वारा बनवाया गया था। यह कुण्ड कालिसिन्ध नदी पर बना हुआ है। कालिसिन्ध नदी के पानी व मिट्टी के कारण यह कुण्ड नीचे दबा हुआ है एवं इस कुण्ड के अवशेष मात्र दिखायी दे रहे हैं। यहाँ पर तेजाजी का स्थान होने के कारण यह आस्था का केन्द्र है।

नागेश्वर कुण्ड


ठीकरिया नागदा में 400 वर्ष पूर्व महाराज मुकुन्दसिंह जी की महारानी ने इस कुण्ड का निर्माण करवाया था। इस कुण्ड में 5 घाट है। इस कुण्ड के रास्ते में 100 गज पर एक सती स्मारक भी है। इस कुण्ड व मन्दिर के नाम पर 24 बीघा जमीन हैं, जो तीन पुजारियों 8 बीघा आरती करने वाले, 8 बीघा पत्र वाले व 8 बीघा जलहरी चट्टान वाले के नाम है।122

गणगौरा कुण्ड


बड़वा में 250 वर्ष पूर्व महात्माओं के द्वारा इस कुण्ड का निर्माण करवाया गया था। यहाँ पर रानी गणगौर के दिन सुरंग द्वारा आती थी। इस कुण्ड के पास दो प्राचीन समाधियाँ बनी हैं। वर्तमान में इस कुण्ड का पानी सुख चुका है और सुरंग भी बन्द हो गयी है। यह कुण्ड सार्वजनिक है।

खीचिंयों का कुण्ड


बारां से 60 किमी दूर बडोरा में 500 वर्ष पूर्व खीचीं शासकों के कार्यकाल में इस कुण्ड का निर्माण करवाया गया था। उसके बाद यह कुण्ड किसी सेठ के अधिकार में आ गया। तीन पीढ़ियों बाद सेठ के वंशजों ने इसे धाकड़ो को बेच दिया तभी से यह कुण्ड उनके पास है। वर्तमान में इस कुण्ड में पम्प लगा है एवं इसे सिंचाई के काम में लिया जाता है।

कानूगो का कुण्ड


कुन्जेड़ में 300 वर्ष पूर्व कोटा दरबार के कानूगो के द्वारा इस कुण्ड का निर्माण किया गया है जो कि यहाँ के निवासियों के पानी पीने व नहाने के काम आता था। इसके चारों तरफ दीवार थी जो वर्तमान में जीर्ण-शीर्ण है। यहाँ पर एक अस्पष्ट एवं अपठनीय शिलालेख भी खुदा हुआ है। वर्तमान में यह कुण्ड कानूगो के वंशजों के अधीन है।

टाटोन के कुण्ड


बारां से 53 किमी दूर टाटोन में 800 वर्ष पूर्व किसी सिद्ध पुरुष के द्वारा इस कुण्ड का निर्माण करवाया था। यहाँ पर सभी समाजों, तेलियों, सुनारों, हरिजनों के अलग-अलग कुण्ड हैं। इसमें ऋतु के अनुसार पानी ठण्डा व गर्म रहता है। इनकी गहराई 5 फीट है। इनमें कभी पानी कम नहीं होता है। ये सार्वजनिक हैं।

गणेश जी का कुण्ड


अटरू में 500 वर्ष पूर्व तत्कालिन शासकों के द्वारा इस कुण्ड का निर्माण करवाया था। यहाँ पर प्राचीन समय का गणेश मन्दिर है, साथ ही इस बावड़ी को बनवाया गया था इसलिये इसे गणेश जी के कुण्ड के नाम से जाना जाता है। यह कुण्ड धार्मिक आस्था का केन्द्र है। इस कुण्ड में यहाँ के लोग पीने का पानी व स्नान करने के काम में लेते हैं। यह कुण्ड पुरातत्व विभाग की राजकीय सम्पत्ति है।123

बाबाजी के बाग का कुण्ड


बारां जिले के मांगरोल कस्बे में कोटा दरबार द्वारा बनवाया गया एक प्राचीन कुण्ड बाणगंगा नदी के किनारे पर स्थित है। पूर्व-पश्चिम देखता हुआ यह आयताकार कुण्ड द्विस्तरीय है जिसमें 3-3 के क्रम में सीढ़ियाँ नीचे उतरती हैं। कुण्ड के एक तरफ तीन तरफ से खुली कलात्मक तिबारी बनी है। यह कुण्ड राजघराने के नहाने के काम में लिया जाता था। कुण्ड के पास एक बरामदा व कमरा बना है। जो कपड़े बदलने के काम लिया जाता था। कुण्ड के पास राजदरबार के पूर्वजों के समाधिस्थल व छतरियाँ बनी है। गणगौर उत्सव पर गणगौर की यहाँ पर आरती की जाती है एवं मेला भरता है। स्थानीय नागरिकों के लिये यह आस्था का केन्द्र है।124

मोठपुर का तालाब


बारां से 55 किमी दूर मोठपुर में 800 वर्ष पूर्व खीचीं दरबार के द्वारा पशुओं काे पानी की सुविधा एवं पुरुषों के नहाने के लिये यह तालाब बनवाया गया था। इस पर नहाने के प्राचीन घाट भी बने हुए हैं। यह तालाब 50 बीघा क्षेत्रफल में फैला हुआ है इसमें साल भर पानी रहता है। इसके घाट जीर्ण-शीर्ण हो गये हैं। यह तालाब सिंचाई विभाग के अधीन है।

पुरेनी सनदोकड़ा का तालाब


बारां से 127 किमी दूर पुरेनी सन्दोकड़ा में 400 वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के नखर ठिकाने के राजा किसी मुसीबत के कारण भाग कर आये थे और जंगल में अपना निवास बनाकर 12 वर्ष रहे थे। उसी समय यहाँ पर उन्होंने एक कुआँ बनवाया और उसके पास चारों ओर चार खम्भों पर चार छतरियाँ बनवायी थी और यह तालाब बनवाया था। कहा जाता है कि इसके पानी से कुष्ठरोग दूर हो जाता है।

कल्याण कुई प्रथम


बारां से 60 किमी दूर शेरगढ़ में 200 वर्ष पूर्व स्थानीय निवासियों के द्वारा इस कुईं का निर्माण करवाया गया था। लोगों का कहना है कि प्राचीन समय में अकाल पड़ा था तब यह कुईं बनवायी गयी थी। यह सौन नदी पर स्थित है इसका पानी पशुओं व खेती के काम में आता है। यह ग्राम पंचायत के अधीन है एवं कुछ समय पहले इसकी मरम्मत करवायी गयी है।

कल्याण कुईं द्वितीय


शेरगढ़ में 400 वर्ष पूर्व कल्याण राम जी भगवान के नाम पर उनके भक्त द्वारा इस कुईं का निर्माण करवाया गया था। प्राचीन समय में शेरगढ़ में कल्याण जी का मन्दिर था। यह कुईं दोनों तरफ से पहाड़ के बीच स्थित है इसका निर्माण पीने के पानी व जंगल में पशुओं के पानी के लिये करवाया गया था। इस कुईं के चारों तरफ घना जंगल है तथा यह सार्वजनिक कुईं हैं।

मांगरोल का कुआँ


मांगरोल में 500 वर्ष पूर्व आरामशाह के वंशजों के द्वारा बनवाया हुआ एक कुआँ स्थित है जिसे आरामशाह दाता ने अपने चिमटे से खोदा था वो एक चमत्कारी संत थे। यहाँ पर उनकी एक मजार भी बनी हुयी है।

संदर्भ
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74. पुरा सम्पदा सर्वेक्षण भाग-ठ
75. उपरोक्त, भाग-ड़
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85. हाड़ौतिका वर्ष 13 अंक 3 पृ. सं. 12-14, शिकारखाना हवेली रेतवाली कोटा, 2008
86. राधाकान्त भारती- भारत की नदियाँ, पृ.सं. 7 नेशनल बुक ट्रस्ट इन्डिया नई दिल्ली 1987
87. राधाकान्त भारती- उपरोक्त, पृ.सं. 18-19
88. माजिद हुसैन, रमेश सिंह- भारत का भूगोल, पृ.सं. 314-15 टाटा मक्ग्रा हिल एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड़ न्यू दिल्ली 2009
89. राधाकान्त भारती- उपरोक्त, पृ.सं. 63-64
90. माजिद हुसैन, श्री रमेश सिंह,-उपरोक्त, पृ.सं. 819
91. डॉ महेश नारायण निगम, डॉ अनिल कुमार तिवारी - राजस्थान का भूगोल पृ.सं. 30 राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर 1998
92. पुरा सम्पदा सर्वेक्षण भाग-1 जिला झालावाड़, जवाहर कला केन्द्र जयपुर 2008
93. शोधार्थी द्वारा वर्णित
94. शोधार्थी द्वारा वर्णित
95. पुरा सम्पदा सर्वेक्षण भाग-2 जवाहर कला केन्द्र जयपुर
96. जेतखेड़ी का शिलालेख
97. बलदेव प्रसाद मिश्र राजस्थान का इतिहास (भ्रमण वृतान्त) भाग-2, पृ.सं. 1073 खेमराज श्रीकृष्णदास मुम्बई 1982
98. ललित शर्मा - राजराणा जालिमसिंह पृ.सं. 151, झालावाड़ विकास मंच, झालावाड़ 2014
99. डॉ. महेश नारायण निगम, डॉ. अनिल कुमार तिवारी- उपरोक्त पृ.सं. 29-30,
100. डॉ. अनिल कुमार तिवाड़ी, डॉ. हरिमोहन सक्सेना- उपरोक्त, पृ.सं. 184
101. डॉ. मोहनलाल गुप्ता- कोटा संभाग का जिलेवार सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन पृ. सं. 122 राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर 2009
102. शोधार्थी द्वारा वर्णित
103. शोधार्थी द्वारा वर्णित
104. शोधार्थी द्वारा वर्णित
105. पुरा सम्पदा सर्वेक्षण, भाग-अ जिला बारां जवाहर कला केन्द्र जयपुर 2008
106. उपरोक्त, भाग-ब
107. शोधार्थी द्वारा वर्णित
108. शोधार्थी द्वारा वर्णित
109. शोधार्थी द्वारा वर्णित
110. शोधार्थी द्वारा वर्णित
111. शोधार्थी द्वारा वर्णित
112. पुरा सम्पदा सर्वेक्षण भाग-द
113. शोधार्थी द्वारा वर्णित
114. मोहनलाल गुप्ता- कोटा संभाग का जिलेवार ऐतिहासिक व सांस्कृतिक अध्ययन पृ. सं. 96
115. शोधार्थी द्वारा वर्णित
116. शोधार्थी द्वारा वर्णित
117. शोधार्थी द्वारा वर्णित
118. मोहनलाल गुप्ता- उपरोक्त, पृ. सं. 86
119. पुरा सम्पदा सर्वेक्षण भाग-स
120. शोधार्थी द्वारा वर्णित
121. मोहन लाल गुप्ता- उपरोक्त, पृ.सं. 69
122. शोधार्थी द्वारा वर्णित
123. पुरातत्व सर्वेक्षण भाग-ई
124. शोधार्थी द्वारा वर्णित

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