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सी. वी. रमण की जलचेतना और भारत के जल सम्बन्धी प्रयास


चन्द्रशेखर वेंकट रमणचन्द्रशेखर वेंकट रमणप्रायः हम सभी लोग हमारे एकमात्र विशुद्ध भारतीय नोबेल विजेता वैज्ञानिक सर सी. वी. रमण यानि चन्द्रशेखर वेंकट रमण को उनके भौतिक शास्त्र के अनुसन्धानों विशेष रूप से प्रकाश विज्ञान के उनके रमन प्रभाव के लिये जानते हैं। सूक्ष्म अवलोकन किया जाये तो वास्तव में रमण के शोधों का जल से गहरा सम्बन्ध है। रमन प्रभाव की उत्पत्ति के आधार में समुद्री जल के नीले रंग के दिखने के प्रश्न के वैज्ञानिक समाधान समाहित हैं।

कहते हैं कि सन 1921 में जब सर सी. वी. रमण ऑक्सफोर्ड में आयोजित हुई विश्वविद्यालयों की कांग्रेस में भाग लेकर जलयान से भारत वापस आ रहे थे, तभी भूमध्य सागर के जल के अद्भुत नीलेपन ने रमण के वैज्ञानिक अवचेतन में खलबली मचा दी और वापस कलकत्ता विश्वविद्यालय पहुँचकर उन्होंने सात वर्षों तक अथक वैज्ञानिक विश्लेषण किये और अन्ततः गणितीय व सैद्धान्तिक व्याख्याओं के आधार पर पहली बार प्रकाश के प्रकीर्णन की व्याख्या ने समुद्र के नीले होने के राज दुनिया के समक्ष खोल दिये।

इस तरह रमन प्रभाव के नाम से विख्यात इस घटना ने प्लांक की क्वांटम परिकल्पना की पुष्टि करते हुए मानो प्रकाश को प्रकाशमार्ग दिखा दिया। इसी खोज ने सर सी.वी. रमण को वर्ष 1930 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार का विजेता बना दिया। 28 फरवरी 1928 को सी. वी. रमण ने रमन प्रभाव की खोज की थी, इसी स्मृति में भारत में इस दिन को प्रत्येक वर्ष 'राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' के रूप में मनाया जाता है। अल्बर्ट आइंस्टाइन ने एक बार सी वी रमण के लिये कहा था कि सी वी रमण ही वे प्रथम वैज्ञानिक थे जिन्होंने स्वीकारा और दर्शाया कि फोटोन की ऊर्जा द्रव्य के भीतर आंशिक रूपान्तरण कर सकती है। मुझे अब भी याद है कि इस खोज का हम सब पर गहरा प्रभाव हुआ था।’

एक ओर जहाँ रमण ने ध्वनिक, अल्ट्रासोनिक, प्रकाशीय, चुम्बकत्व और क्रिस्टल भौतिक में बड़े-बड़े शोध किये, वहीं खगोल-विज्ञान और मौसमी-विज्ञान से लेकर शरीर-विज्ञान और संगीत तक में भी उनकी विशेष अभिरुचियों के कारण ये विषय भी उनकी युगान्तरकारी मेधा से सिंचित हुए। फिर जल का विषय कैसे छूट सकता था।

रमण के कुल 475 प्रकाशित शोध-पत्रों और असाधारण प्रबन्धों व निबन्धों में से “The Elixir of Life” नामक उनका सर्वाधिक लोकप्रिय निबन्ध है। इसमें उन्होंने जल को जीवन का अमृत घोषित किया है। इस निबन्ध में उन्होंने विशेष रूप से तत्कालीन मिस्र की सभ्यता के विकास में नील नदी के जल की महत्ता का उदाहरण देते हुए विश्व में समस्त जीवों (पौधों व प्राणियों) के जीवन के लिये जल को अमृत तुल्य कहा है। वहीं जल के दूसरे स्वरूप का जिक्र करते हुए यह भी दर्शाया है कि मृदा अपरदन के समय जल कितना भयावह भी हो जाता है।

आज भी हमारे देश के कुछ निजी स्कूलों में उनका यह निबन्ध अंग्रेजी विषय की पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाया जाता है। लगभग 1960 के दशक में लिखा गया सी. वी. रमण का यह निबन्ध जल की महत्ता के दृष्टिकोण से आज भी उतना ही प्रासंगिक बना हुआ है या कि यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान में इसके मायने कहीं अधिक बढ़ गए हैं। सी. वी. रमण ने अपने इस निबन्ध में जल के प्राकृतिक सौन्दर्य से लेकर पौधों, प्राणियों और मनुष्यों के लिये इसकी अमृतमयी भूमिका के साथ-साथ भविष्य में इसके संरक्षण की भी स्पष्ट चेतावनी दे दी थी।

भारत ने रमण के जल संरक्षण के संकेतों को पहचाना है और इसलिये स्वतंत्रता के बाद से ही इस दिशा में विशेष ध्यान भी दिया गया है। भारत सरकार द्वारा जल सहित अन्य प्राकृतिक संसाधनों से सम्बन्धित तथ्यों के लिये 1951 में निर्मित किये गए राष्ट्रीय संसाधन और वैज्ञानिक अनुसन्धान नामक एक मंत्रालय के बाद से उसमें सामयिक व परिस्थितिजन्य परिवर्तनों के साथ आज का जल संसाधन मंत्रालय रमण के उस जीवन अमृत जल की सुरक्षा का उत्तरदायित्व निभा रहा है।

देश के जल संसाधनों के सुव्‍यवस्‍थित विकास से सम्बन्धित समस्त पहलुओं की समग्र आयोजना और इसके समन्‍वय के लिये राष्ट्रीय जलनीतियों के तहत राष्‍ट्रीय जल संसाधन परिषद और राष्ट्रीय जल बोर्ड के सहयोग से जल संसाधन मंत्रालय कार्य कर रहा है। यह देश के जल संसाधनों के विकास और विनिमयन हेतु नीतिगत दिशा-निर्देश और कार्यक्रम बनाने के लिये उत्तरदायी है।

जल संसाधन मंत्रालय ने एकीकृत जल संसाधन विकास और प्रबन्धन के माध्‍यम से सभी राज्‍यों के अन्दर और बाहर जल का संरक्षण करने, जल के दुरुपयोग को कम करने और एक समान वितरण सुनिश्चित करने के प्रमुख उद्देश्‍यों को पूरा करने के लिये राष्‍ट्रीय जल मिशन बनाया।

भूमण्डलीय जलवायु परिवर्तन को दृष्टिगत रखते हुए राष्‍ट्रीय जल मिशन सहित आठ जल मिशनों के माध्‍यम से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से उत्‍पन्‍न चुनौतियों का सामना करने के लिये एक परिकल्‍पना निर्धारित की गई।

वर्तमान में जल संसाधन मंत्रालय के अधीन केन्‍द्रीय जल आयोग, केन्‍द्रीय मृदा और सामग्री अनुसन्धानशाला, केन्‍द्रीय भूजल बोर्ड, केन्‍द्रीय जल और विद्युत अनुसन्धानशाला, बाणसागर नियंत्रण बोर्ड, सरदार सरोवर निर्माण सलाहकार समिति, गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग, फरक्‍का बाँध परियोजना, ऊपरी यमुना नदी बोर्ड, नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण, तुंगभद्रा बोर्ड, बेतवा नदी बोर्ड, ब्रह्मपुत्र बोर्ड, राष्‍ट्रीय जल विकास अभिकरण, राष्‍ट्रीय जल विज्ञान संस्‍थान, जल और भूमि प्रबन्धन का पूर्वोत्‍तर क्षेत्र संस्‍थान, नेशनल प्रोजेक्‍टस कंस्‍ट्रक्‍शन कारपोरेशन लिमिटेड और वाप्‍कोस लिमिटेड जैसे अनेक सम्बद्ध और अधीनस्‍थ कार्यालय, सांविधिक निकाय, पंजीकृत और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम भारत के जलविश्लेषण और जल संरक्षण सम्बन्धी विविध कार्यों में संलग्न हैं।

ये सभी जल सम्बद्ध कार्य विभिन्न केन्‍द्रीय और राज्य स्तरीय योजनाओं के तहत देश में जल संसाधन सूचना प्रणाली का विकास, बाढ़ पूर्वानुमानों, जल विज्ञान परियोजना, भूमि जलप्रबन्धन और विनियमन, जल अनुसन्धान और विकास, मानव संसाधन विकास/क्षमता निर्माण, राष्‍ट्रीय जल अकादमी, भूजल प्रशिक्षण संस्‍थान, सूचना, शिक्षा और संचार, सिंचाई प्रबन्धन, बाँध पुनरूज्‍जीवन और सुधार कार्यक्रम, जल निकायों की मरम्‍मत, नवीकरण और संरक्षण, नदी बेसिन प्रबन्धन और सीमावर्ती क्षेत्रों में कार्यों से सम्बन्धित कामों के सुचारु ढंग से संचालन के लिये किये जाते हैं।

रमण के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचा जाये तो इन सभी प्रबन्धनों के साथ-साथ देश के जल संसाधनों में जल की गुणवत्ता का परीक्षण भी उतना ही मायने रखता है। इस कार्य के लिये देश के जलविज्ञान संस्‍थानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

भारत में सन 1978 में जलविज्ञान के समस्‍त पहलुओं पर वैज्ञानिक कार्यों में सहयोग देने के साथ-साथ व्‍यवस्‍थित रूप से इनका समन्‍वयन तथा प्रसार करने के लिये राष्‍ट्रीय जलविज्ञान संस्‍थान, रुड़की की स्‍थापना की गई थी। इस संस्‍थान का मुख्‍यालय रुड़की (उत्‍तराखण्ड) में स्‍थित है तथा बेलगाँव, जम्‍मू, काकीनाडा एवं सागर में इसके चार क्षेत्रीय केन्द्र तथा गुवाहाटी एवं पटना में दो बाढ़ प्रबन्धन अध्‍ययन केन्द्र भी हैं।

शैक्षिक स्तर पर इस समय भारत में जलवैज्ञानिक विश्लेषणों के लिये विशेष पाठ्यक्रमों और प्रशिक्षणों को संचालित करने वाले और भी अनेक संस्थान हैं, जो देश के भावी जलवैज्ञानिकों को तैयार कर रहे हैं। इनमें अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई, एम.एस. बड़ौदा विश्वविद्यालय, वड़ोदरा, श्री गुरू गोबिंद सिंह जी कॉलेज जल प्रबन्धन (सिविल) ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, नांदेड़, क्षेत्रीय इंजीनियरी कॉलेज जल संसाधन इंजीनियरी और प्रबन्धन विभाग, तिरुचिरापल्ली, आन्ध्र विश्वविद्यालय, विशाखापत्तनम, अन्नामलाई विश्वविद्यालय हाइड्रोजियोलॉजी विभाग, अन्नामलाई नगर, दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, सिविल इंजीनियर, द्रव-विज्ञान तथा बाढ़ नियंत्रण विभाग, दिल्ली, इंजीनियरी कॉलेज, जल संसाधन विकास तथा सिंचाई इंजीनियरी विभाग, रायपुर, आईआईटी मद्रास द्रव-विज्ञान और जल संसाधन इंजीनियरी एवं सिविल इंजीनियरी विभाग, चेन्नई, जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकीय विश्वविद्यालय हैदराबाद, षणमुगा कला विज्ञान प्रौद्योगिकी और अनुसन्धान जल विज्ञान और जल संसाधन अकादमी तंजावूर, भारत यूनिवर्सिटी (भारत उच्चतर शिक्षा और जल विज्ञान और जल संसाधन अनुसन्धान संस्थान), चेन्नई जैसे प्रमुख संस्थानों सहित इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय भी इंजीनियरी और सिंचाई और जल प्रबन्धन में डिग्रियाँ प्रदान करते हैं। इन संस्थानों में जल विज्ञान का अध्ययन रासायनिक जल विज्ञान, पारिस्थितिकी जल विज्ञान, हाइड्रोजियोलॉजी, हाइड्रोइन्फारमैटिक्स, हाइड्रोमिटियोरोलॉजी, भूतल जल-विज्ञान नामक विविध जलवैज्ञानिक शाखाओं के अन्तर्गत किया जाता है।

समुद्र विज्ञान को भले ही व्यावहारिक तौर पर जलविज्ञान में शामिल नहीं किया गया है, परन्तु सी. वी. रमण के नीले समुद्री जल के विश्लेषण और अन्य समुद्री अनुसन्धानों के भी अपने विशेष महत्त्व होते हैं। अतः भारत की लम्बी समुद्री तटरेखा और देश की 37 प्रतिशत जनता की इस पर निर्भरता तथा देश के 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल की तुलना में 10 से 15 लाख वर्ग किमी की अतिरिक्त महाद्वीपीय खाड़ी क्षेत्र वाले 20 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) का ध्यान रखने वाले भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अन्तर्गत आने वाले समुद्र विज्ञान संस्थाओं में समुद्री जलों से सम्बन्धित अनुसन्धान किये जाते हैं।


भारत सरकार द्वारा जल सहित अन्य प्राकृतिक संसाधनों से सम्बन्धित तथ्यों के लिये 1951 में निर्मित किये गए राष्ट्रीय संसाधन और वैज्ञानिक अनुसन्धान नामक एक मंत्रालय के बाद से उसमें सामयिक व परिस्थितिजन्य परिवर्तनों के साथ आज का जल संसाधन मंत्रालय रमण के उस जीवन अमृत जल की सुरक्षा का उत्तरदायित्व निभा रहा है। देश के जल संसाधनों के सुव्‍यवस्‍थित विकास से सम्बन्धित समस्त पहलुओं की समग्र आयोजना और इसके समन्‍वय के लिये राष्ट्रीय जलनीतियों के तहत राष्‍ट्रीय जल संसाधन परिषद और राष्ट्रीय जल बोर्ड के सहयोग से जल संसाधन मंत्रालय कार्य कर रहा है।

इन संस्थानों में मौसम /जलवायु पैरामीटरों, समुद्र स्थिति, भूकम्पों, सुनामियों और पृथ्वी प्रणाली से सम्बन्धित अन्य परिघटनाओं के पूर्वानुमानों के साथ-साथ समुद्री संसाधनों (सजीव एवं निर्जीव) के अन्वेषण और दोहन हेतु समुद्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर भी कार्य किये जाते हैं। इनके अलावा अंटार्कटिक/आर्कटिक तथा दक्षिणी महासागर अनुसन्धान भी शामिल हैं।

भारत के महासागर नीति संकल्प में परिभाषित एकता निर्माण एवं विशेषज्ञता प्राप्त प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए देश में कुछ प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों जैसे राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (एनआईओ), गोवा, राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) चेन्नई, राष्‍ट्रीय अंटार्कटिक एवं समुद्री अनुसन्धान केन्‍द्र, (एनसीएओआर) गोवा, भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना एवं सेवा केन्द्र (आईएनसीओआईएस) हैदराबाद, परियोजना निदेशालय, एकीकृत तटीय एवं समुद्री क्षेत्र प्रबन्धन (पीडी-आईसीएमएएम) चेन्नई तथा समुद्री सजीव संसाधन एवं पारिस्थितिकी केन्द्र (सीएमएलआरई) कोच्चि में उत्कृष्ट समुद्री अनुसन्धान सम्पादित किये जाते हैं।

इन संस्थानों में समुद्री आपदा पूर्व चेतावनी सहायता, चक्रवात पूर्वानुमान, भूकम्प प्रेक्षण, पूर्वानुमान और प्रशमन, पूर्वानुमान प्रदर्शन, मानसून परिवर्तनीयता, तूफान महोर्मि, सुनामी चेतावनी प्रणाली, समुद्री प्रेक्षण प्रणाली, समुद्र विज्ञान व समुद्री सेवाएँ, समुद्री रंग अनुसन्धान, समुद्री मॉडलिंग, समुद्री प्रेक्षण प्रणाली, समुद्री सर्वेक्षण संसाधन और प्रौद्योगिकी, गहरा समुद्र प्रौद्योगिकी विकास, एकीकृत गहरा समुद्र खनन प्रणाली का विकास, एकीकृत महासागर वेधन कार्यक्रम (आईओडीपी), प्रौद्योगिकी प्रदर्शित जलयानों की आरम्भण, समुद्री सेंसरों, इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों और समुद्री ध्वानिकी यंत्रों की स्थापना, समुद्री ऊर्जा के दोहन का अध्ययन, अपतटीय अवसंरचनाओं एवं समुद्र संस्त‍र खनिजों के अध्ययन तटीय और समुद्री पारिप्रणाली विषयों पर गम्भीर रूप से अनुसन्धान कार्य व अध्ययन चल रहे हैं।

विज्ञान की नितनूतन उत्कृष्ट तकनीकों के आविर्भाव ने जल-विज्ञान और समुद्र विज्ञान की जल-विज्ञान प्रक्रियाओं के गूढ़ अध्ययनों में सैद्धान्तिक दृष्टिकोणों को कई नए आयाम दिये हैं।

एक बात जरुर है कि जहाँ एक ओर देश के ये जल संस्थान जल गुणवत्ता से लेकर जल संरक्षण की दिशा में निरन्तर प्रयासरत रहते हैं, फिर भी व्यावहारिक स्तर पर स्थिति यह है कि भारत का एक बड़ा भूभाग जल समस्याओं से गुजर रहा है।

जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और जीवनशैली में परिवर्तन के कारण तेजी से बढ़ रही जल की माँग, जलस्रोतों में बढ़ते प्रदूषण और बाढ़, अधिक भू-कटाव तथा सूखे जैसी प्राकृतिक जल सम्बन्धी आपदाओं ने देश में जल सुरक्षा के लिये गम्भीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। इनको दृष्टिगत रखते हुए भारतीय जल संस्थान सम्बन्धित समस्त आँकड़ों जैसे वर्षा, हिम वर्षा, भू-आकृति विज्ञान, जलवायु, सतही जल, भूजल, जल गुणवत्ता, पारिस्थितिकी, जल निकासी, सिंचित क्षेत्र, हिमनद इत्यादि सम्बन्धित सभी आँकड़ों को सुव्यवस्थित ढंग से समेकित करते हैं तथा आजकल डाटाबेस विकसित किये जा रहे हैं।

बिल्कुल अद्यतन जल संरक्षण की बात की जाये तो पिछले वर्ष ही मार्च 2017 में विश्व बैंक ने 17.5 करोड़ डॉलर की एक राष्ट्रीय जलविज्ञान परियोजना को अपनी स्वीकृति दी। इससे भारतीय जल संस्थानों को जहाँ अपने-अपने क्षेत्रों में जल की स्थिति का आकलन करने में सहायता मिली है, बल्कि बाढ़ व सूखे को लेकर संवेदनशीलता की स्थिति भी कम हुई है। इसके पहले भी भारत ने अपनी कई बड़ी जल परियोजनाओं पर सफलतापूर्वक काम किये हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के 4500 बड़े-बड़े बाँध में 220 अरब घनमीटर जल के संरक्षण की क्षमता रखते हैं और 11 मिलियन कुओं को जल पुनर्भरण द्वारा पुनर्जीवित किया जा सकता है। देश में जल संरक्षण एवं प्रबन्धन को सुदृढ़ बनाने, नदियों के बहाव की निगरानी करने और जल संरक्षण एवं प्रदूषण निवारण आदि के लिये एक ‘जल क्रान्ति अभियान’ नामक एकीकृत योजना भी चल रही है। इसके अलावा कृषि सिंचाई योजना, जल निकायों की मरम्मत, नवीकरण एवं पुनरुद्धार, एकीकृत वाटरशेड मैनेजमेंट कार्यक्रम, राष्ट्रीय जल मिशन कार्यक्रम, त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम, बाँध पुनरुद्धार एवं सुधार परियोजना आदि भी क्रियारत हैं।

यह भी सही है कि कभी-कभी इन सभी कामों का व्यावहारिकता में दिखना बहुत जरूरी होता है, जो भारत में कम ही होता है। हमेशा से आवश्यकता इस बात की रही है कि देश और उसकी योजनाएँ और उसके प्रयास सही मायनों में वो सब कुछ करके दिखाएँ जिसका आह्वान सी. वी. रमण की जलचेतना ने आज से बरसों पहले किया था। तभी सच्चे अर्थों में हम राष्ट्रीय विज्ञान दिवस को सार्थक रूप दे पाएँगे। प्रयास ऐसे हों जो सर सी. वी. रमण के कालजयी निबन्ध “The Elixir of Life” के प्रति अपनी वैज्ञानिक निष्ठा के सजीव प्रतीक साबित हो सकें।


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