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जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण

Author: 
डॉ. दिनेश मणि
Source: 
आईसेक्ट विश्विद्यालय द्वारा अनुसृजन परियोजना के अन्तर्गत निर्मित पुस्तक जलवायु परिवर्तन - 2015

जलवायु परिवर्तनजलवायु परिवर्तनजलवायु पर्यावरण को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कारक है, क्योंकि जलवायु से प्राकृतिक वनस्पति, मिट्टी, जलराशि तथा जीव जन्तु प्रभावित होते हैं। जलवायु मानव की मानसिक तथा शारीरिक क्रियाओं पर प्रभाव डालती है। मानव पर प्रभाव डालने वाले तत्वों के जलवायु सर्वाधिक प्रभावशाली है क्योंकि यह पर्यावरण के अन्य कारकों को भी नियंत्रित करती है।

सृष्टि के विकास-क्रम में अतीत में यह देखा गया है कि जलवायु में छोटे बदलाव से लेकर बड़े बदलाव तक हुए हैं जैसे अफ्रीका के सहारा क्षेत्र की भू-दृश्यों से भरी झील कुछ ही सदियों मेें एक अनुपजाऊ मरुस्थल में परिवर्तित हो गई। अब अनेक वैज्ञानिकों को भय है कि वर्तमान में ग्रीन हाउस के निर्माण से उत्पन्न गैसों से भी बड़ी संख्या में परिवर्तन हो सकता है।

अनेक वैज्ञानिकों का यह विश्वास है कि गैसें ग्रहों के तापमान में क्रमिक वृद्धि करके पृथ्वी पर गम्भीर रूप से जीवन को दुर्लभ बनाती है। अन्य विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं अपितु इनका यह मानना है कि पृथ्वी का तापमान सदियों से घटता-बढ़ता रहा है तथा जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालीन प्रभाव को अभी समझने की जरूरत है।

वैश्विक तापन के परिणामस्वरूप पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हुई है। ध्रुवों की बर्फ तेजी से पिघलने लगी है जिसके कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। ओजोन परत के क्षरण से पराबैंगनी किरणों के दुष्प्रभाव बढ़ने लगे हैं। न केवल मानव जीवन बल्कि पशु-पक्षी और वनस्पतियों पर भी प्रदूषित पर्यावरण का प्रभाव पड़ रहा है। कई दुर्लभ प्रजातियाँ नष्ट हो चुकी हैं। पशु-पक्षियों की संख्या घट रही है। बाढ़, सूखा, समुद्री तूफान, चक्रवात, भूकम्प भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएँ भी बढ़ी हैं।

वैश्विक तापन का पर्यावरण पर प्रभाव


वैश्विक तापन का सबसे स्पष्ट और कदाचित सबसे सर्वव्यापी और भयंकर दुष्परिणाम है वायुमंडल का निरन्तर गर्म होते जाना। वर्षों तक गहन अध्ययनों के बाद वैज्ञानिकों ने यह पाया कि पृथ्वी का ताप निश्चय ही बढ़ रहा है। 19वीं शताब्दी के मध्य से लेकर अब तक पृथ्वी के ताप में 0.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो गई है और यदि हालत यही रहे तो हर दशक में पृथ्वी के ताप में 0.2 से 0.5 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो सकती है और इक्कीसवीं सदी के मध्य तक भूमंडल का ताप 2 से 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। यह ताप वृद्धि उपध्रुवीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक होगी।

पृथ्वी की जलवायु के निरन्तर गर्म होते जाने के सम्भावित दुष्परिणाम होंगे-


बहुत बड़े क्षेत्रों में सूखा पड़ना, वनों का सूख जाना, धरती में दारारें पड़ जाना, वन्य प्राणियों का विनाश हो जाना और ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ का पिघलना, सागर की सतह का ऊँचा उठ जाना, आदि। जलवायु के गर्म होते रहने से सूखों की विकरालता में वृद्धि हो जाएगी और वे पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में जल्दी-जल्दी आने लगेंगे और वन सूख जाएँगे। ऐसा भी हो सकता है कि वनों का स्वरूप ही बदलने लगे। इससे उनमें वन्य प्राणियों का रहना दूभर हो जाएगा। उन्हें अन्य प्रदेशों मेें जाना पड़ेगा अथवा वे नष्ट हो जाएँगे। इनके साथ ही चक्रवात और टॉरनेडो अधिक विनाशकारी हो जाएँगे।

शीत प्रदेशों, विशेष रूप से टुंड्रा, की बर्फ पिघलने लगेगी जिससे वहाँ बड़े-बड़े दलदलमय क्षेत्र बन जाएँगे। उन क्षेत्रों में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन अधिक मात्रा में उत्पन्न होने लगेगी जिसके परिणामस्वरूप हाउस प्रभाव भी तीव्रतर हो जाएँगे।

वैश्विक तापन के कुप्रभाव पृथ्वी के 71 प्रतिशत भाग को घेरे सागरों पर भी पड़ेंगे। उनका पानी गर्म होकर फैलने लगेगा। साथ ही जलवायु के अधिक गर्म हो जाने से ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में जमी बर्फ पिघलने लगेगी। उससे बनने वाली जल विशाल मात्रा भी सागरों में मिल जाएगी। परिणामस्वरूप सागरों की सतह ऊँची उठ जाएगी जिससे निचले तटीय प्रदेश पानी में डूब जाएँगे। बांग्लादेश जैसे निचले क्षेत्रों के अधिकांश भाग जलमग्न हो जाएँगे।

वैश्विक तापन के परिणामस्वरूप पिछली एक शताब्दी में संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट पर सागर-सतह एक फुट ऊँची हो गई है और अगले सौ वर्षों में उसके एक फुट और ऊँचे जाने की सम्भावना है। उसके फलस्वरूप ही काफी बड़े तटीय क्षेत्रों के डूबने की आशंका हो जाएगी। अब सोचिए कि अगर ग्रीनलैंड की हिमकिरीट (आइसकैप) के पिघलने से सागर के जल का स्तर लगभग 6 मीटर ऊँचा उठ जाता है तब क्या हालत होगी? ऐसा वास्तव में यदि हो जाता है तब हमारे देश के भी अनेक तटीय क्षेत्र और बन्दरगाह डूब जाएँगे। हालैंड जैसे देश तो जहाँ इस समय भी सागर को रोकने के लिये दीवार (डाइक) बनानी पड़ती है, शायद पूरे के पूरे जलमग्न हो जाएँ।

कुछ वैज्ञानिकों का यह भी अनुमान है पृथ्वी के ताप में बढ़ोत्तरी के फलस्वरूप ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के हिमकिरीट तक पिघलने के स्थान पर और बढ़ जाएँगे। इस बारे में वे यह तर्क देते हैं कि पृथ्वी के ताप में वृद्धि होने से वायुमंडल की जलवाष्प को वहन करने की क्षमता बढ़ जाएगी। इसलिये ध्रुवीय क्षेत्रों में अधिक हिमपात होने लगेगा। परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर सागरों में जल स्तर नीचे गिर जाएगा वहाँ दूसरी ओर धु्रवीय प्रदेशों में अधिक बर्फ जमने लगेगी।

पृथ्वी के तापमान के बढ़ने का प्रभाव सम्पूर्ण पर्यावरण पर पड़ेगा। इसका एक प्रभाव यह होगा कि पहाड़ों पर तथा अन्य स्थानों पर जो बर्फ है वह पिघलेगी। इस प्रकार बर्फ के पिघलने से सागरों में पानी की मात्रा बढ़ेगी। दूसरी ओर तापमान के बढ़ने से सागरों में उपस्थित पानी का आयतन बढ़ेगा। ऐसी स्थिति में सागर तल के ऊपर उठने की प्रबल सम्भावना होगी।

कई स्थानों पर समुद्र तल के ऊपर उठने के प्रमाण भी सामने आने लगे हैं। प्रशान्त महासागर में स्थित द्वीप तुवालू में लोग अपने घरों को छोड़कर दूसरे स्थानों को जाने लगे हैं। दूसरी ओर उत्तर ध्रुवीय प्रदेश में भालुओं की संख्या में कमी के प्रमाण भी मिले हैं। जिसे वैज्ञानिक इस मामले से जोड़ रहे हैं कि उस क्षेत्र में बर्फ कम हो रही है और उन भालुओं के वास स्थान पर एक प्रकार से उजड़ रहे हैं।

भारत में भी ऐसी घटनाएँ घट रही हैं जिन्हें लोग समुद्र तल के उठने की प्रक्रिया से जोड़ रहे हैं। सुन्दरबन में काफी बड़ा क्षेत्र पूरी तरह से जलमग्न हो चुका है। जादवपुर विश्वविद्यालय के एक अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि पिछले 30 वर्षों में सुन्दरबन क्षेत्र में 259 वर्ग कि.मी. भूमि लुप्त हो चुकी है। वहाँ का घोड़ामारा नामक इलाके का क्षेत्रफल अब केवल 5.17 वर्ग कि.मी. रह गया है, जबकि 1969 में उस इलाके का क्षेत्रफल इसके लगभग दोगुना था। इसके अतिरिक्त उसी क्षेत्र में दो द्वीप पूरी तरह से लुप्त हो चुके हैं।

ऐसा उस क्षेत्र में पहले भी होता रहा है। नए द्वीप बनते रहे हैं तथा पुराने द्वीप लुप्त होते रहें। परन्तु इस समय जिस प्रकार से यह प्रक्रिया चल रही है उसके विषय में वैज्ञानिकों को विश्वास है कि इसके पीछे जलवायु में होने वाले उस परिवर्तन की मुख्य भूमिका है जो पृथ्वी पर मानवीय क्रियाकलाप के कारण हो रही है, अर्थात इस सम्बन्ध में पृथ्वी के तापमान में वृद्धि की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पृथ्वी जिस प्रकार गरम हो रही है उससे मुम्बई को काफी खतरा है। इसके अतिरिक्त अन्य तटीय क्षेत्रों को भी खतरा हैै।

विश्व में 180 देश ऐसे हैं जहाँ कम ऊँचाई वाले क्षेत्रों में लोग बसते हैं और चिन्ता का विषय यह है कि 70 प्रतिशत देश ऐसे हैं जहाँ 50 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहर ऐसे क्षेत्रों में बसे हैं, जहाँ तबाही की आशंका बहुत अधिक है। इनमें टोक्यो, न्यूयार्क, जकार्ता, शंघाई, ढाका, मुम्बई, आदि शामिल हैं। ऐसे क्षेत्र में बाढ़ तथा प्रबल समुद्री तूफान आने की सम्भावना अधिक होगी।

यदि कुल तटीय क्षेत्र की बात की जाये जहाँ इस प्रकार का खतरा है तो वहाँ की जनसंख्या काफी अधिक है। अगर केवल भारत, चीन, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और वियतनाम के विषय में विचार किया जाये तो ऐसे क्षेत्र में लगभग 65 करोड़ लोग बसते हैं। यदि स्थिति पर काबू नहीं पाया जा सका तो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को वहाँ से हटाना पड़ सकता है।

यदि इस प्रकार के क्षेत्र में आबादी और अधिक बढ़ी तो समस्या की गम्भीरता और अधिक बढ़ जाएगी। इसीलिये वैज्ञानिकों की सलाह है कि ऐसे क्षेत्र में आबादी को बढ़ने नहीं दिया जाना चाहिए। मालदीव के मामले में तो स्थिति और भी गम्भीर हो सकती है। वहाँ कुल मिलाकर 1190 द्वीप हैं और समुद्र तल से उनकी औसत ऊँचाई 1.5 मीटर है। इसलिये अगर समुद्र तल थोड़ा भी ऊपर उठेा तो बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा। इससे मिलती-जुलती स्थिति अन्य कई स्थानों पर भी है।

अगर उन जगहों पर समुद्र तल आधा से एक मीटर ऊपर उठता है तो बड़े पैमाने पर तबाही होगी। बांग्लादेश की स्थिति ऐसी है, कि अगर समुद्र तल केवल आधा मीटर ऊपर उठता है तो लगभग एक करोड़ लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा। यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि ऐसे क्षेत्र में केवल लोगों का विस्थापन नहीं होगा, कृषि उद्योग तथा अन्य सुविधाएँ भी प्रभावित होंगी।

पर्यावरण निम्नीकरण


पर्यावरण जैव मण्डल का आधार है, लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के बाद से विकास की जो तीव्र प्रक्रिया अपनाई गई है उसमें पर्यावरण के आधारभूत नियमों की अवहेलना की गई जिसका परिणाम पारिस्थितिक असन्तुलन एवं पर्यावरणीय निम्नीकरण के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित है। आज विश्व के विकसित देश हों अथवा विकासशील देश, कोई भी पर्यावरण प्रदूषण के कारण उत्पन्न गम्भीर समस्या से अछूता नहीं है।

1970 के दशक में ही यह अनुभव किया गया कि वर्तमान विकास की प्रवृत्ति असन्तुलित है एवं पर्यावरण की प्रतिक्रिया उसे विनाशकारी विकास में परिवर्तित कर सकती है। तब से लेकर वर्तमान वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या के समाधान हेतु कई योजनाएँ प्रस्तुत की गईं, समाधानमूलक उपायों पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ।

बावजूद इसके वास्तविक उपलब्धियाँ अति न्यून ही रहीं। तो इसका तात्पर्य यह निकाला जाये कि वैश्विक स्तर पर ईमानदार प्रयास नहीं किये गए। साथ ही विभिन्न राष्ट्रों ने राष्ट्रीय आर्थिक विकास को कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण माना एवं पर्यावरणीय असन्तुलन के प्रति उदासीन बने रहे। उन तथ्यों की समीक्षा से पूर्व आवश्यकता है कि संक्षेप में उन समस्याओं पर विचार किया जाये जो पर्यावरणीय प्रदूषण को उत्पन्न कर रही हैं एवं जिनके कारण सम्पूर्ण जैव जगत के साथ समक्ष गम्भीर चुनौती उत्पन्न हो गई है।

वैश्विक तापन के कारण प्रकृति मेें बदलाव आ रहा है। कहीं भारी वर्षा तो कहीं सूखा, कहीं लू तो कहीं ठंड। कहीं बर्फ की चट्टानें टूट रही हैं तो कहीं समुद्री जल स्तर में बढ़ोत्तरी हो रही है। आज जिस गति से ग्लेशियर पिघल रहे हैं इससे भारत और पड़ोसी देशों को खतरा बढ़ सकता है। वैश्विक ताप से फसल-चक्र भी अनियमित हो जाएगा। इससे कृषि उत्पादकता भी प्रभावित होगी। मनुष्यों के साथ-साथ पक्षी भी इस प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। वैश्विक तापन पक्षियों के दैनिक क्रियाकलाप और जीवन-चक्र को प्रभावित करता है।

वैश्विक तापन में सर्वाधिक योगदान कार्बन डाइऑक्साइड का है। 1880 से पूर्व वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 280 पीपीएम थी, जो आज आईपीसीसी रिपोर्ट के अनुसार 379 पीपीएम हो गई है। कार्बन डाइऑक्साइड की वार्षिक वृद्धि दर गत वर्षों में (1995-2005) 1.9 पीपीएम वार्षिक है।

आईपीसीसी ने भविष्यवाणी की है कि सन 2100 आते-आते इसके तापमान में 1.1 से 6.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोत्तरी हो सकती है। सदी के अन्त तक समुद्री जलस्तर मेें 18 से 58 सेमी. तक वृद्धि की सम्भावना है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2080 तक 3.20 अरब लोगों को पानी उपलब्ध नहीं होगा। 60 करोड़ लोग भूखे मरेंगे। इससे अल्पविकसित देशों को हानि होगी। अल्पाइन क्षेत्रों और दक्षिणी अमेरिका के अमेजन वन के समाप्त हो जाने की सम्भावना है। प्रशान्त क्षेत्र के कई द्वीप जलमग्न हो जाएँगे।

वैश्विक तापन के संकेत


1. फैलती बीमारियाँ
2. ऋतुओं का समय पूर्व आगमन
3. वनस्पति और जीवों के क्रिया-कलाप में परिवर्तन
4. पानी के ताप में वृद्धि से प्रवाल-भित्ति संकट में
5. भारी वर्षा, बाढ़, बर्फबारी, सूखा आदि।

वैश्विक तापन के प्रभाव


1. तापमान में तीव्र बढ़ोत्तरी
2. समुद्री जल स्तर में वृद्धि
3. पहाड़ों से पिघलते ग्लेशियर
4. जल संकट

पृथ्वी के तापमान पर प्रभाव


यह तो तय है कि पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। पर कितना बढ़ेगा, यह निश्चित रूप से बताना कठिन है। सामान्य परिसंचारी मॉडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा दोगुनी करने पर देखा गया कि तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ गया पर इसके अन्य प्रभाव भी देखे गए जैसे तापमान बढ़ने के कारण जलवाष्प ज्यादा बनेगी, जो ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न कर आधा डिग्री सेल्सियस तापमान और बढ़ाएगी।

ज्यादा तापमान के कारण बर्फ पिघलेगी, जिससे धूप का परावर्तन कम होगा, अवशोषण ज्यादा होगा। परिणामस्वरूप आधा डिग्री सेल्सियस तापमान और बढ़ जाएगा। ज्यादातर मॉडलों से पता लगा है कि कार्बन डाइऑक्साइड दोगुनी करने पर ऊँचाई पर बादल ज्यादा बनेंगे, पर मध्यम ऊचाई के बादलों में कमी आएगी। परिणामस्वरूप दो डिग्री सेल्सियस तापमान और बढ़ जाएगा।

उल्लेखनीय है कि बादल ग्रीन हाउस प्रभाव को सीधा प्रभावित करते हैं। इस तरह कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा दोगुनी होने पर पृथ्वी की औसत तापमान कुल चार डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा।

पर्यावरण हितैशी जीवनशैली की आवश्यकता


आज प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को कम-से-कम करने के साथ पर्यावरण को संरक्षित रखते हुए दीर्घकालिक यानी सतत विकास की आवश्यकता है। पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली अपनाकर पृथ्वी को बचाया जा सकता है। इसके लिये हर कदम पर ऊर्जा की बचत कर और भूमि एवं जंगलों का संरक्षण करके पर्यावरण के अनुकूल माहौल बना सकते हैं।

पूरी दुनिया को वृक्षारोपण द्वारा पुनः हरा-भरा बनाना होगा और जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कमी लानी होगी। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा जैसे प्रदूषण मुक्त ऊर्जा स्रोतों को ज्यादा-से-ज्यादा अपनाना होगा। इन उपायों से निश्चित ही इस धरती को जलवायु परिवर्तन के खतरों से बचाने में मदद मिल सकती है। इनके अलावा पृथ्वी ग्रह को जलवायु के संकट से बचाने के लिये सभी को प्रयास करने होंगे तभी यह ग्रह सुन्दर और जीवनमय बना रहेगा। इसके लिये हमें प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कुशलता और पूरी दक्षता के साथ करना होगा। ह

में जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिये ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने वाली प्रौद्योगिकियों को अपनाने एवं इस दिशा में नई प्रौद्योगिकियों के विकास को प्रोत्साहित करना होगा। इस प्रयास में हमें परम्परागत ज्ञान का भी सहारा लेना होगा ताकि जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने की दिशा में हमारा प्रयास सफल होने के साथ ही पूरे समाज को जोड़ने वाला हो। इस प्रकार सभी की भागीदारी के द्वारा जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटा जा सकता है।

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