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प्रदूषण के विरुद्ध सार्थक पहल है ग्रीन बजट

Author: 
ललित गर्ग
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, मार्च 2018

ग्रीन बजटग्रीन बजटयह जगजाहिर है कि पिछले दो-तीन दशक से दिल्ली में सरकार की उपेक्षा एवं लापरवाही के कारण प्रदूषण बड़ी समस्या बनी हुई है। दिल्ली का प्रदूषण विश्वव्यापी चिन्ता का विषय बन चला है। कई अन्तरराष्ट्रीय विशेषज्ञ यहाँ तक कह चुके हैं कि दिल्ली रहने लायक शहर नहीं रह गया है।

जाहिर है, प्रदूषण के गहराते संकट के मद्देनजर सरकारी उपायों के बेअसर होने के बाद पहले राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण और सुप्रीम कोर्ट ने डीजल से चलने वाले वाहनों को इस समस्या का एक सबसे प्रमुख कारक माना है। लेकिन क्या डीजल से चलने वाले वाहन अचानक दिल्ली की समस्या बन गए हैं?

काफी समय पहले दिल्ली में सार्वजनिक बसों और ऑटोरिक्शा को डीजल के बजाय सीएनजी से चलाना इसीलिये अनिवार्य किया गया था कि प्रदूषण पर काबू पाया जा सके। लेकिन उसके बाद डीजल से चलने वाली कारों की तादाद बढ़ती गई और इस पर गौर करना किसी को जरूरी नहीं लगा। जब इससे मुश्किल बढ़ने लगी है तो फिर सरकार सक्रिय दिखाई दी और उसने एक घोषणा सम और विषम नम्बरों वाली कारों को अलग-अलग दिन चलाने के रूप में की। लेकिन इसके भी व्यावहारिकता पर सवाल उठने लगे हैं।

सवाल यह भी है कि क्या कुछ तात्कालिक कदम उठा कर दिल्ली में प्रदूषण की समस्या से पार पाया जा सकता है? लेकिन यहाँ मुख्य प्रश्न बढ़ते प्रदूषण के मूल कारणों की पहचान और उनकी रोकथाम सम्बन्धी नीतियों पर अमल से जुड़े हैं। दिल्ली में वाहन के प्रदूषण की ही समस्या नहीं है, हर साल ठंड के मौसम में जब हवा में घुले प्रदूषक तत्त्वों की वजह से जन-जीवन पर गहरा असर पड़ने लगता है, स्मॉग फॉग यानी धुआँ युक्त कोहरा जानलेवा बनने लगता है, तब सरकारी हलचल शुरू होती है।

विडम्बना यह है कि जब तक कोई समस्या बेलगाम नहीं हो जाती, तब तक समाज से लेकर सरकारों तक को इस पर गौर करना जरूरी नहीं लगता। दिल्ली में प्रदूषण और इससे पैदा मुश्किलों से निपटने के उपायों पर लगातार बातें होती रही हैं और विभिन्न संगठन अनेक सुझाव दे चुके हैं। लेकिन उन्हें लेकर कोई ठोस पहल अभी तक सामने नहीं आई है। हर बार पानी सिर से ऊपर चले जाने के बाद कोई तात्कालिक घोषणा होती है और फिर कुछ समय बाद सब पहले जैसा चलने लगता है।

पिछले पाँच सालों के दौरान दिल्ली में वाहनों की तादाद में 97 फीसद बढ़ोतरी हो गई। इनमें अकेले डीजल से चलने वाली गाड़ियों की तादाद तीस प्रतिशत बढ़ी। कभी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद डीजल से चलने वाली नई गाड़ियों का पंजीकरण रोक दिया जाता है, लेकिन सवाल है कि पहले से जितने वाहन हैं और फिर नई खरीदी जाने वाली गाड़ियाँ आबोहवा में क्या कोई असर नहीं डालेंगी? इस गम्भीर समस्या के निदान की ओर यदि दिल्ली सरकार जागी है तो इसे केजरीवाल सरकार की पहली सूझबूझ पूर्ण पहल कही जाएगी।

जाहिर है, दिल्ली की जिम्मेदारी सम्भाल रही सरकार का यह सबसे बड़ा फर्ज भी है कि वह प्रदूषण पर काबू करके इस शहर को रहने लायक बनाए। इसी को ध्यान में रखकर ग्रीन बजट में दिल्ली सरकार के चार विभागों पर्यावरण, ट्रांसपोर्ट, पावर और पीडब्ल्यूडी से जुड़ी 26 योजनाओं को शामिल किया गया है और इनके जरिए प्रदूषण नियंत्रण का अभियान शुरू किया जा रहा है।

सरकार ने प्रस्ताव किया है कि जो लोग सीएनजी फिटेड कार खरीदेंगे उन्हें रजिस्ट्रेशन चार्ज में 50 प्रतिशत की छूट मिलेगी। दिल्ली के रेस्तराँ अगर कोयले वाले तंदूर की जगह इलेक्ट्रिक या गैस तंदूर काम में लाते हैं तो सरकार उन्हें प्रति तंदूर 5 हजार रुपए तक की सब्सिडी देगी। 10 केवीए या इससे अधिक क्षमता के डीजल जेनरेटर की जगह इलेक्ट्रिक जेनरेटर का इस्तेमाल करने पर सरकार की तरफ से इसके लिये 30 हजार रुपए तक की सब्सिडी दी जाएगी।

प्रदूषण के चिन्ताजनक स्तर तक बढ़ने के मद्देनजर राज्य सरकारों की ओर से कई घोषणाएँ सामने आती रहती हैं। हाल ही में दिल्ली सरकार ने वर्ष 2018-19 के अपने बजट को ‘ग्रीन बजट’ का रूप देकर नई एवं सार्थक पहल की है। पहली बार देश की किसी सरकार ने प्रदूषण की जानलेवा समस्या पर अपने बजट में आर्थिक प्रावधान किये हैं, प्रदूषण को नियंत्रित करने का मन बनाया है। हर समय किसी-न-किसी विवाद को खड़ा करके अपनी शक्ति को व्यर्थ करने वाली दिल्ली सरकार की पर्यावरण के प्रति जागरुकता एवं प्रदूषण मुक्ति की दिशा में कदम बढ़ाना, एक नई सुबह की आहट है।इंडस्ट्रियल एरिया में पाइप्ड नेचुरल गैस का इस्तेमाल करने पर एक लाख रुपए तक की मदद सरकार की ओर से मिलेगी। दिल्ली देश का पहला ऐसा राज्य बनने जा रहा है, जहाँ जनवरी से लेकर दिसम्बर तक पूरे साल प्रदूषण का रीयल टाइम डेटा जुटाया जाएगा। सरकार ने एक हजार लो फ्लोर इलेक्ट्रिक बसें लाने का लक्ष्य भी रखा है। शहर में हरित इलाके बढ़ाए जाएँगे। इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी भी बनाई जा रही है।

दिल्ली सरकार ने प्रदूषण से लड़ने की जो इच्छाशक्ति दिखाई है, वह देश के अन्य राज्यों की सरकारों के लिये एक मिसाल है। दिल्ली सरकार को अपनी इन योजनाओं पर अमल में दृढ़ता दिखानी होगी, हालांकि शहरवासियों के सहयोग से इसे एक आन्दोलन का रूप भी दिया जा सकता है। दिल्ली सरकार की इस सार्थक पहल में केन्द्र सरकार एवं दिल्ली के उपराज्यपाल को भी सहयोगी बनना चाहिए।

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से जुड़ी कुछ मूलभूत समस्याएँ मसलन आवास, यातायात, पानी, बिजली इत्यादि भी उत्पन्न हुई। नगर में वाणिज्य, उद्योग, गैर-कानूनी बस्तियों, अनियोजित आवास आदि का प्रबन्ध मुश्किल हो गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली का प्रदूषण के मामले में विश्व में चौथा स्थान है। दिल्ली में 30 प्रतिशत वायु प्रदूषण औद्योगिक इकाइयों के कारण है, जबकि 70 प्रतिशत वाहनों के कारण है।

खुले स्थान और हरे क्षेत्र की कमी के कारण यहाँ की हवा साँस और फेफड़े से सम्बन्धित बीमारियों को बढ़ाती है। प्रदूषण का स्तर दिल्ली में अधिक होने के कारण इससे होने वाली मौतें और बीमारियाँ स्वास्थ्य पर गम्भीर संकट को दर्शाती है। इस समस्या से छुटकारा पाना सरल नहीं है।

हमें दिल्ली को प्रदूषण मुक्त करना है तो एक-एक व्यक्ति को उसके लिये सजग होना होगा। जो दिखता है वह सब नाशवान है। शाश्वत तो केवल वही है जो दिखता नहीं। जो नाशवान है उसे हम स्थायी नहीं कर सकते पर उसे शुद्ध तो रख सकते हैं। प्रकृति ने जो हमें पर्यावरण दिया है और हवा, जल, सूर्य जिसे रोज नया जीवन देते हैं, उसे हम प्रदूषित नहीं करें।

इस क्षेत्र में सरकार, न्यायालय स्वायत्त संस्थाएँ और पर्यावरण चिन्तक आगे आए हैं। इनके साझा सहयोग से प्रदूषण की मात्रा में कुछ कमी तो आई है परन्तु इसके लिये आम जनता के रचनात्मक सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता है। तभी हम दिल्ली को प्रदूषण मुक्त कर सकेंगे। दिल्ली सरकार की पहल से पहले हमें स्वयं से शुरुआत करनी होगी।

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