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समावेशी विकास व अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण का द्वन्द

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ग्रीन सिग्नल्स, 2015

यह पुस्तक पर्यावरण के प्रति संशय भरी दृष्टि रखने वाले व्यक्ति को पर्यावरण के प्रति आस्थावान बनने के बारे में है, पर उस कहानी को कहने के लिये मुझे एकदम शुरू से आरम्भ करना होगा।

ग्रीन सिग्नल्सग्रीन सिग्नल्सयूपीए सरकार के पुनः निर्वाचित होने के बाद 2009 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मुझे पर्यावरण एवं वन विभाग के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का पद देने की पेशकश ने (जो कैबिनेट मंत्री के दर्जे से तनिक कमतर था) मुझे हैरान किया क्योंकि मेरी पृष्ठभूमि एक आर्थिक प्रशासक की थी। पहले मैं वाणिज्य एवं ऊर्जा विभाग में मंत्री रहा। सरकारी अधिकारी के तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्रालय, योजना आयोग, उद्योग मंत्रालय और ऊर्जा सलाहकार परिषद में अपनी सेवाएँ दी थी।

ऐसा नहीं है कि मैं पर्यावरण के जुड़े मुद्दों से अनभिज्ञ या उदासीन था। मेरे करीबी दोस्तों में कई पर्यावरण प्रशासक (एनवायरनमेंटल एडमिनिस्ट्रेटर ) टीएन सेशन और समर सिंह, पर्यावरणविद टीएन खोसू और सैयद ज़हूर क़ासिम, पर्यावरण कार्यकर्ता अनिल अग्रवाल और अशोक खोसला और अकादमिक माधव गाडगिल और महेश रंगराजन शामिल रहे हैं। इसके अलावा मैंने पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर लिखा और भाषण भी दिया है।1

पदभार ग्रहण करने के तत्काल बाद मैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने गया जिन्होंने मुझे पहले 1986 में योजना आयोग में नियुक्त किया था और जिनके साथ मैंने सरकार एवं कांग्रेस पार्टी दोनों में काम किया था। उनसे मिलने के बाद मुझे मालूम हुआ कि उन्होंने इस पद के लिये मेरा चयन पर्यावरण मंत्रालय में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और उसमें पारदर्शिता एवं जवाबदेही की संस्कृति विकसित करने के लिये किया था। उन्होंने मुझसे कहा कि भारत, पारिस्थितिकीय सरोकारों की अनदेखी नहीं कर सकता, पर हमें उच्च आर्थिक विकास दर को बनाए रखने की अनिवार्यता को भी नहीं भूलना चाहिए। अन्त में उन्होंने मुझे सलाह दी कि जलवायु परिवर्तन पर अन्तरराष्ट्रीय वार्तालापों में भारत को समाधान का हिस्सा होना चाहिए, भले हमने समस्या को उत्पन्न नहीं किया है। इसके साथ ही उनकी मुझसे यह भी अपेक्षा थी कि मैं पर्यावरण सम्बन्धी वैश्विक वार्तालापों में भारत की सकारात्मक और रचनात्मक छवि प्रस्तुत करुँ।

प्रधानमंत्री के तीन सूत्री निर्देश थे, मंत्रालय के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना, उच्च विकास का पर्यावरण संरक्षण के साथ सन्तुलन बिठाना और भारत के बारे में वैश्विक समझदारी में परिवर्तन लाना।

प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने नवम्बर 1980 में पृथक पर्यावरण विभाग का गठन किया। पर्यावरण से जुड़े मुद्दों से उन्हें गहरा लगाव था। यही वजह है कि वो कई उल्लेखनीय अधिनियमों एवं नियमावलियों के निर्माण में व्यक्तिगत रूप से जुड़ी रहीं, जिनमें वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 (Wildlife (Protection) Act of 1972), वन संरक्षण अधिनियम 1980 (Forest (Conservation) Act of 1980) और वायु (प्रदूषण निरोध व नियंत्रण) अधिनियम 1981 (Air (Pollution Prevention and Control) Act, 1981) सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

उनके बाद प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने जनवरी 1985 में इस विभाग के दायरे को विस्तार देते हुए ‘वन’ को कृषि मंत्रालय से अलग कर ‘वन एवं पर्यावरण मंत्रालय’ नामक स्वतंत्र मंत्रालय का गठन किया। निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में ‘राष्ट्र के नाम’ अपने पहले सम्बोधन (6 जनवरी 1985) में राजीव गाँधी ने ‘नेशनल वेस्टलैंड बोर्ड’ (National Westland Board) के गठन और गंगा नदी की सफाई के राष्ट्रीय कार्यक्रम को आरम्भ करने की घोषणा की। दिसम्बर 1984 में अभूतपूर्व भोपाल गैस-त्रासदी के बाद पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 (Environment Protection Act 1986) को कानून का जामा पहनाना भी एक उपलब्धि थी।

1980 के दशक के आखिरी दिनों में सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product - GDP) में बढ़ोत्तरी को प्राथमिकता देने के पैरोकारों और पर्यावरण संरक्षण की वकालत करने वाले समूहों के बीच खींचतान की शुरुआत हुई। इसका परिणाम पर्यावरण से जुड़े कानूनों के कार्यान्वयन को लेकर उत्पन्न विवादों के रूप में सामने आया। निवेश और आर्थिक विकास पर जोर बढ़ने की वजह से 1990 के दशक में स्थिति बदली अगले दो दशकों में मंत्रालय के बारे में आम समझदारी में दो स्पष्ट कोण उभरे और यह बस एक रबर स्टाम्प मात्र बनकर रह गया। यही वजह रही कि एक समाचार पत्र ने इसे ‘एटीएम मंत्रालय’ तक की संज्ञा दे डाली। उन दिनों आम समझ थी कि इस मंत्रालय में बैठे लोगों को अपनी जरूरत के हिसाब से मोल्ड किया जा सकता है। बेशक, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मन में भी मंत्रालय की यही छवि रही होगी, जब उन्होंने मुझे सुनिश्चित करने के लिये प्रेरित किया कि पर्यावरण नियमावली औद्योगिक लाइसेंसिंग का नया रूप न बन जाये जिसे उन्होंने जुलाई 1991 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के सम्पूर्ण राजनीतिक समर्थन और राकेश मोहन एवं मेरे जैसे सहयोगियों की बदौलत 1990 के आरम्भ में समाप्त कर दिया था।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस लुईस ब्रांडीस की सौ साल पुरानी टिप्पणी में काफी सच्चाई है, “काश कि दिन की रोशनी लोगों के कामों को शुद्ध कर सकती क्योंकि सूर्य की किरणें शुद्ध करने वाली होती हैं।” लेकिन अगले पच्चीस महीनों में मैंने सीखा कि भारतीय परिस्थितियों में सूर्य की रोशनी अक्सर झुलसा और जला सकती है। पर धूप चाहे जितनी तेज हुई, मैं दृढ़तापूर्वक अड़ा रहा क्योंकि पारदर्शिता न केवल उत्तरदायित्व के लिये महत्त्वपूर्ण है, बल्कि जवाबदेह और जिम्मेवार नीति-निर्माण और प्रशासन के लिये भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

मैंने पहला परिवर्तन यह किया कि अपने कार्यालय में काँच का दरवाजा लगवाया जैसाकि पहले भी जिस किसी मंत्रालय में रहा, वहाँ कराया था। पर यह अभी भी अनुत्तरित था कि मैं सारभूत ढंग से क्या करता जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित होती? इस समस्या का समाधान मुझे श्री हरीश साल्वे जी से मिला जो उन दिनों सुप्रीम कोर्ट में वन-मामलों की पीठ में बतौर एमाइकस क्यूरे कार्यरत थे। उनसे बातचीत के दौरान पारदर्शिता के लिये मेरे प्रयासों को एक विशेष गुण प्राप्त हुआ। उन्होंने एक टिप्पणी की जो मेरे दिमाग में बैठ गई। मुझे याद है कि उन्होंने कहा था कि मंत्री अगर अपने निर्णय के कारणों को स्पष्ट रूप से लिखित में बताएँ और उसे तत्काल सार्वजनिक कर दें तो काफी हद तक विवादों से बचा जा सकता है। इससे मुझे ‘मुखर आदेश’ का विचार आया जो आमतौर पर न्यायपालिका में चलता है, सरकार में प्रचलित नहीं है। हालांकि इससे पारदर्शिता तो बहुत आई, पर मुझे स्वीकार करना होगा कि विवादों को टालने में इसका असर मामूली रहा।

मैंने देखा कि मेरा काम इसे सुनिश्चित करना है कि अधिकारी अपने पेशेगत निर्णय बिना किसी भय या पक्षपात के करें। मैंने यह भी महसूस किया कि मंत्रालय का जनहित से जुड़े होने के कारण पर्यावरणीय मामलों से सम्बन्धित ‘मुखर आदेशों’2 ने लोगों को स्वतः सक्रिय किया। सूचना के अधिकार के अन्तर्गत आवेदन देने और प्रश्न पूछने का इन्तजार नहीं करना पड़ा। इससे खुलेपन और उत्तरदायित्व- बोध को मजबूती मिली।

1980 के दशक के आखिरी दिनों में सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोतरी को प्राथमिकता देने के पैरोकारों और पर्यावरण संरक्षण की वकालत करने वाले समूहों के बीच खींचतान की शुरुआत हुई। इसका परिणाम पर्यावरण से जुड़े कानूनों के कार्यान्वयन को लेकर उत्पन्न विवादों के रूप में सामने आया। निवेश और आर्थिक विकास पर जोर बढ़ने की वजह से 1990 के दशक में स्थिति बदली अगले दो दशकों में मंत्रालय के बारे में आम समझदारी में दो स्पष्ट कोण उभरे और यह बस एक रबर स्टाम्प मात्र बनकर रह गया।

इन ‘मुखर आदेशों’ में मैंने निर्णयों का औचित्य स्थापित किया जिसमें विशेषज्ञों की सलाह और सिफारिशों को एक किनारे रखकर दूसरे कारकों जैसे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मसलों से जुड़े सरोकारों का विशेष ध्यान रखा गया। पहला ‘मुखर आदेश’3 आनुवंशिक रूप से संशोधित बैंगन (बीटी बैंगन) के व्यावसायिक उत्पादन पर प्रतिबन्ध लगाने के बारे में था।

पारदर्शिता के लिये मैंने भाषण को भी एक आधार बनाया। अधिकांश मंत्री दूसरों के द्वारा तैयार नीरस भाषण पढ़ देते हैं, पर मेरा तरीका परम्परागत शैली का नहीं था इसलिये मुझे भाषण तैयार करने के लिये किसी का इन्तजार नहीं करना होता था। मैंने सोचा कि विभिन्न विषयों पर मेरे विचारों के बारे में लोगों की समझदारी और जागरुकता बढ़ाने में इस ‘दबंग सिंहासन’ का उपयोग फलप्रद ढंग से किया जा सकता है। अलबत्ता, दूसरों के भाषण लिखने में पूरा जीवन गुजार देने के बावजूद अपने लिये लिखना एकदम नया अनुभव था, खासकर बिना तैयारी के बोलने का अभ्यस्त होने की वजह से।

मंत्रियों को अक्सर सार्वजनिक भाषण4 देने के लिये कहा जाता है, मेरे लिये यह नए विचारों और अवधारणाओं को अभिव्यक्त करने का अवसर बन गया जो मंत्रालय के कार्यभार के बारे में परम्परागत समझदारी और तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था की चुनौतियों के प्रति जवाबदेही के लिहाज से महत्त्वपूर्ण था। मकसद बड़ी तस्वीर दिखाना था, ताकि पर्यावरण को महज परिरक्षण और संरक्षण की बजाय व्यापक फलक पर देखने की आवश्यकता को प्रचारित किया जा सके और जन-स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन के साथ इसका सम्बन्ध भी स्थापित किया जा सके।

मेरा सारभूत सन्देश रूढ़िवादों से बचते हुए ‘मध्यम मार्ग’ अपनाने की आवश्यकता बताना था, रूढ़िवाद चाहे ‘अभी उन्नति, नतीजा बाद में’ किस्म की हो या नागरिक समाज के बहुसंख्यक कार्यकर्ताओं की हो, जो उच्च जीडीपी विकास दर के विचार से ही बैर रखते हैं। दोनों स्थितियाँ एकदम विपरीत दिखती हैं जिनके समर्थक एक-दूसरे से बात करने के बजाय एक-दूसरे के बारे में बात करते हैं।

दोनों पक्ष, ऐसा अक्सर लगा, बहुलता के विचार से ही बेहद असहज थे जो उदार लोकतंत्र का आधारभूत चिन्ह होता है। तकनीकीविद और विशेषज्ञों की सोच थी कि हर नीतिगत समस्या का एक तर्कसंगत समाधान है, इसलिये बहस की कोई आवश्यकता नहीं है। जबकि कार्यकर्ता विश्वास करते थे कि वास्तविक लोकप्रिय संकल्प और भावना को वे अकेले पहचानते और उसका प्रतिनिधित्व करते हैं और इसलिये बहस की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरी इच्छा बीच के रास्ते पर चलने की थी, यह जानते हुए कि इसमें दोनों पक्षों का प्रहार झेलने का जोखिम था।

जन-सुनवाई सार्वजनिक पक्षपोषण का दूसरा रूप है। व्यापक भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिये कि मंत्रालय या मैं भागीदारों के चयन को प्रभावित नहीं करें, इन जन-सुनवाइयों को अहमदाबाद स्थित सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एजुकेशन (सीईई) (Center for Environment Education (CEE)) द्वारा आयोजित और संचालित किया गया। जन-सुनवाइयों की पहली शृंखला बीटी-बैंगन के व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने के मसले पर जनवरी-फरवरी 2010 में बंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद, कोलकाता, नागपुर, चंडीगढ़ और भुवनेश्वर में आयोजित हुई जिसमें आठ हजार से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। जन-सुनवाइयों की दूसरी शृंखला नई समुद्र तटीय नियमावलियों (New coastal zone regulation) को अन्तिम रूप देने के लिये पुरी, चेन्नई, मुम्बई, गोवा और कोच्ची में आयोजित हुई जिसमें लगभग पाँच हजार लोगों ने हिस्सा लिया। इन पारस्परिक क्रियाओं की तीसरी शृंखला ग्रीन इण्डिया मिशन (Green India Mission - GIM) के बारे में थी और वे गुवाहाटी, पुणे, देहरादून, जयपुर, भोपाल और मैसूर में आयोजित हुई। इन बैठकों में लगभग डेढ़ हजार लोगों ने हिस्सा लिया।

इन बैठकों में से प्रत्येक में मेरा उद्देश्य सभी हितधारकों, जिनके विचार विविधतापूर्ण और आलोचनात्मक हो सकते थे, को सरकार के विचारों से अवगत करना था। विविधतापूर्ण विचारों के एक प्लेटफॉर्म पर स्थिति का कोलाहलपूर्ण होना लाजमी होता है, जैसा कई बार हुआ भी। इस तरह के बैठकों से सम्पूर्ण मतैक्य कायम करना, एक व्यापक सर्वानुमति बनाना मेरा लक्ष्य था।

हितधारकों के साथ दो अन्य सार्वजनिक परामर्श अभूतपूर्व साबित हुए। कुन्नूर में फरवरी 2010 में हुई पहली सार्वजनिक पारस्परिक क्रिया थी जिसमें ‘पश्चिमी घाट विशेषज्ञ पारिस्थितिकी समिति’ (Western Ghats Specialist Ecology Committee) के गठन का रास्ता बना जिसके अध्यक्ष माधव गाडगिल बनाए गए जिनकी सिफारिशों ने एक सनसनी पैदा की और सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों तरह की प्रतिक्रियाएँ हुईं। गुवाहाटी में दूसरा विशाल पारस्परिक संवाद सितम्बर 2010 में हुआ। यह पूर्वोत्तर राज्यों खासकर अरुणाचल प्रदेश के अपार पनबिजली क्षमता के विकास के बारे में था। मैंने इस क्षेत्र की पनबिजली नीति पर पुनर्विचार करने का अनुरोध करते हुए प्रधानमंत्री को रिपोर्ट सौंपी जिस पर काफी हलचल हुई, फिर मैंने सोचा कि अपनी सरकार को भी भिन्न और विरोधी विचारों के प्रति संवेदनशील बनाना महत्त्वपूर्ण है।

अपनी व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का तीसरा रास्ता संसद की गतिविधियों में मंत्रियों की सक्रिय हिस्सेदारी है। संसद सदस्यों को सार्वजनिक मसलों के बारे में पूरी जानकारी देना और लोकसभा एवं राज्यसभा दोनों सदनों में महत्त्वपूर्ण विषयों पर बहस आयोजित करना इस सक्रियता को प्रकट करने का एक ढंग है। स्वतः सक्रिय होने और सांसदों को प्रश्न करने एवं बहस की माँग करने के लिये प्रोत्साहित करने का विचार था। मैं इस तरह के कुछेक अवसर पैदा करने में सफल रहा।5

मैं जानता था कि मेरी शैली के साथ-साथ मेरे कार्यों से भी निश्चित रूप से आलोचनाओं के द्वार खुल जाएँगे और सचमुच यही हुआ। परन्तु, तब मैंने महसूस किया कि इसने मुझे देश के सबसे प्रभावशाली मंच से अपनी बातों को तर्कपूर्ण ढंग से रखने का अवसर भी दिया है जिनका न केवल बड़े पैमाने पर प्रचार और तर्क-वितर्क होगा, बल्कि वे लिखित दस्तावेजों का हिस्सा भी बनेंगे। इससे मुझे अक्सर विभिन्न दृष्टिकोण अपनाने और उन्हें लेकर आशंकाओं को दूर करने का अवसर मिला। इससे जिन नीतियों और परिवर्तनों को मैं प्रस्तुत कर रहा था, उन्हें व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता मिल सकी। वे संसद में महज बहस और वाद-विवाद के विषय नहीं थे। मैंने सांसदों को पत्र लिखा- कुछेक बार व्यक्तिगत तौर पर, कई बार सांसदों के समूह को और कुछ अवसरों पर सभी सांसदों को। मैंने कुछेक बार मंत्रिमंडल के सहयोगियों को लिखा ताकि पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के प्रति वे संवेदनशील बनें और योजना बनाने की प्रक्रिया में इन मुद्दों पर विचार किया जा सके। इसके लिये मंत्रालय द्वारा उन्हें जरूरी सूचनाएँ उपलब्ध कराई और पर्यावरण के प्रश्नों पर व्यापक वचनबद्धता में उनको शामिल किया गया।

पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के मेरे अभियान का अन्तिम और महत्त्वपूर्ण मुद्दा मुख्यमंत्रियों और राज्य सरकारों में अपने समकक्षों के साथ कार्य करना था। हमारी संघात्मक संरचना में राज्यों के साथ सहमति कायम करना केन्द्र सरकार का कर्तव्य है। आखिरकार नीतिगत निर्णयों का कार्यान्वयन राज्य और स्थानीय सरकार को करना होता है। निर्णय करने की प्रक्रिया में राज्यों को शामिल नहीं करने से कार्यान्वयन में प्रतिरोध हो सकता है जिससे सर्वोत्तम नीतियों का भी प्रयोजन नष्ट हो सकता है। कई मामलों में राज्य सरकारों से मिली सूचनाएँ निर्णय लेने में अनिवार्य होती हैं क्योंकि वे जमीनी स्तर पर आवश्यकताओं और मनोभावों का बेहतर आकलन करने की स्थिति में होती हैं।6 अधिकांश राज्यों के मुख्यमंत्री मेरे सभी निर्णयों से प्रसन्न नहीं थे।7 लेकिन मैंने जहाँ भी सम्भव था, एक कारगर सन्तुलन बनाने की कोशिश की ताकि केन्द्र सरकार की नीतियों या निर्देशों से समझौता किये बिना उनके सरोकारों को समाहित किया जा सके।8

सरकार और पार्टी में मेरा पिछला प्रोफाइल स्वच्छंद विकास और अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के पक्षधर के तौर पर थी जिसे उद्योग जगत और विकास के पक्षधर सुविधाजनक पाते थे जबकि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से घनिष्ठ जुड़ाव और वाणिज्य मंत्रालय में मेरा कार्यकाल, जहाँ लगातार मैंने बागवानी सेक्टर पर जोर दिया जिससे पर्यावरणविदों को प्रसन्नता थी। मैं कोई अड़ियल पर्यावरणविद नहीं था, बल्कि ‘पहले विकास’ की राह पर भी भटका था। इसका मतलब था कि मैं लगातार समझौते की दिशा में काम करता रहा।

जनता के साथ पारदर्शिता बरतना मेरे निर्णय लेने की पद्धति में निश्चित ही एक प्रमुख आधार था। साथ ही मैंने प्रधानमंत्री के साथ अपनी प्राथमिकताओं, पद्धति और निर्णयों के बारे में संवाद करते रहना आवश्यक समझा। केवल इसलिये नहीं कि वे प्रधानमंत्री हैं बल्कि डॉ. मनमोहन सिंह को मैं किसी दूसरे से अधिक जानता था और वे आर्थिक उन्नति के सरोकारों में डूब नहीं गए थे बल्कि पारिस्थितिकीय प्राथमिकताओं से भी पूरी तरह अवगत और संवेदनशील थे।

मैं उन्हें अक्सर लिखता था। मेरे प्रत्येक राजनीतिक सन्देश को वो पढ़ते और समय पर उत्तर भी देते। कई बार मैंने जिन मुद्दों को उठाया, उन पर प्रधानमंत्री कार्यालय और सम्बन्धित मंत्रालयों द्वारा आगे की कार्रवाई भी की गई। लिहाजा पूर्वोत्तर की पनबिजली परियोजनाओं के बारे में उनको लिखे मेरे पत्र पर ऊर्जा मंत्रालय ने ‘क्युमुलेटिव इम्पेक्ट असेसमेंट’ (Cumulative Impact Assessment) के सन्दर्भ में बात करना आरम्भ कर दिया। फुकुशिमा परमाणु हादसे के बाद लिखे मेरे पत्र से हमारे अपने परमाणु संयंत्रों में सुरक्षा प्रणाली लगाने की विस्तृत तैयारी हुई। कोयला खनन के मामले में ‘करो, मत करो’ (Dos & Don’ts) के बारे में मेरे पत्र पर आगे का रास्ता निकालने के लिये तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व में मंत्रिमंडलीय समूह का गठन हुआ।

प्रधानमंत्री ने अपनी ओर से भी मुझे लिखा। जब (जैसे-नवी मुम्बई हवाई अड्डा और महेश्वर पनबिजली परियोजना के मामले में) मेरे रुख से नाराज मुख्यमंत्रियों का पत्र उनके पास आया या उद्योगपतियों ने उन्हें लिखा जिनका प्रस्ताव किसी कारणवश विशेषकर उदाहरण के तौर पर (मध्य प्रदेश में महान की कोयला खदान के) पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव की वजह से अटक गया था, या मेरे मंत्रिमंडलीय सहयोगियों ने लिखा जो मेरे फैसलों (जैसे-शरद पवार बीटी बैंगन के मामले में) से सहमत नहीं थे। मैं प्रधानमंत्री के सामने अपने रूख के औचित्य को हमेशा स्पष्ट करता था पर उन्होंने कभी भी मुझे अपनी मान्यताओं के खिलाफ जाने के लिये नहीं कहा। लेकिन कभी-कभी मुझे यह समझाने की कोशिश जरूर की कि पारिस्थितिकीय संरक्षण की बात एकदम जायज है पर भारत को अभी अधिक तेजी से आर्थिक उन्नति करने की जरूरत है। मैं उनसे पूरी तरह असहमत नहीं था, पर मेरी राय थी कि इस तेज आर्थिक विकास को भी निश्चित तौर पर टिकाऊ होना चाहिए। उन्होंने मेरी दलीलों को कितनी गम्भीरता से लिया, यह 12वीं पंचवर्षीय योजना में स्पष्ट हुआ जो तेज, समावेशी टिकाऊ विकास को अपना लक्ष्य बताता है। ‘टिकाऊ’ शब्द का शामिल किया जाना बड़ी बौद्धिक जीत थी जो डॉ. सिंह की व्यक्तिगत पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता की वजह से हुई। वे भारतीय उद्यमियों और उद्यमों की हर हाल में आर्थिक गतिविधियों में लगे रहने के उत्साह ‘एनिमल स्पिरिट’ (Animal spirits) को उन्मुक्त छोड़ने की चर्चा अक्सर किया करते थे।

पारिस्थितिकीय सरोकारों को उच्च आर्थिक विकास के साथ सन्तुलित करना एक बड़ी चुनौती थी और यह विवादपूर्ण भी साबित हुआ क्योंकि इससे सम्बन्धित विकल्प दुखदायी थे। एक तरफ पर्यावरणीय सुरक्षा और संरक्षण की माँग और दूसरी तरफ आर्थिक उन्नति की आवश्यकता के बीच वाद-विवाद अपरिहार्य है। दोनों ही स्थितियाँ अच्छी हैं जो रुसी दार्शनिक इसैया बर्लिन के विचार से भी मालूम होता। वे ‘निराशाजनक परिस्थिति को असहनीय विकल्प की परिघटना’ कहते हैं। ऐसे में व्यवस्था सुचारु रूप से चलाने के लिये किसी भी परिस्थिति में सतर्कतापूर्वक सन्तुलन बनाए रखना जरूरी था। लेकिन यह कार्य मेरे लिये मेरी सोच से ज्यादा कठिन सिद्ध हुआ।

सरकार और पार्टी में मेरा पिछला प्रोफाइल स्वच्छंद विकास और अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के पक्षधर के तौर पर थी जिसे उद्योग जगत और विकास के पक्षधर सुविधाजनक पाते थे जबकि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से घनिष्ठ जुड़ाव और वाणिज्य मंत्रालय में मेरा कार्यकाल, जहाँ लगातार मैंने बागवानी सेक्टर पर जोर दिया जिससे पर्यावरणविदों को प्रसन्नता थी। मैं कोई अड़ियल पर्यावरणविद नहीं था, बल्कि ‘पहले विकास’ की राह पर भी भटका था। इसका मतलब था कि मैं लगातार समझौते की दिशा में काम करता रहा।

प्रधानमंत्री की हिदायतों पर गौर करते हुए और अपनी समझदारी के आधार पर मेरा मानना था कि प्रचलित मान्यता के विपरीत एक पर्यावरण मंत्री का काम केवल देश के पर्यावरण और वनों का संरक्षण करना नहीं है। सरकार का एक जिम्मेवार सदस्य होने के नाते पर्यावरण मंत्री को पर्यावरणीय सुरक्षा और संरक्षण के काम के साथ-साथ सरकार के व्यापक लक्ष्यों, उच्च आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन सुनिश्चित करने से सन्तुलन भी बिठाना होता है। मेरा काम यह सुनिश्चित करना था कि उच्च आर्थिक विकास का लक्ष्य इस ढंग से प्राप्त किया जाये कि पारिस्थितिकी के लिहाज से टिकाऊ हो साथ ही ऐसे उपाय करना जिससे पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित हो और मानवीय एवं औद्योगिक गतिविधियों का पर्यावरण पर घातक प्रभाव न्यूनतम हो।

यह मेरे लिये नया विचार नहीं था। पर्यावरण मंत्री के काम का मोटा खाका प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने खींच दिया था। पहले पहल स्टॉकहोम में जून 1972 में मानवीय पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में इन्दिरा गाँधी ने, (सम्मेलन में मेजबान स्वीडन के प्रधानमंत्री ओलाफ पाल्मे के अतिरिक्त वे इकलौती सरकार प्रमुख थीं) कहा कि हम पर्यावरण को और अधिक दरिद्र करना नहीं चाहते, लेकिन बहुत सारे लोगों की भयंकर गरीबी को क्षण भर के लिये भी भूल नहीं सकते। क्या गरीबी और उसे दूर करने की आवश्यकता सबसे बड़े प्रदूषणकारी हैं? पर्यावरण में सुधार गरीबी की अवस्था में नहीं हो सकता। न ही विज्ञान और तकनीकों के उपयोग के बिना गरीबी दूर की जा सकती है।9 उनकी समझ साफ थी कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं, जन्मगत दुश्मनी संरक्षण और विकास के बीच नहीं होकर कुशलता के नाम पर मनुष्य और पर्यावरण का अनवरत शोषण के बीच है।10

व्यावहारिक समस्या यह थी कि दिवंगत प्रधानमंत्री के शब्द एकदम स्पष्ट ढंग से मेरे पास पहुँच गए। जिस दिन मैंने मंत्री के रूप में पदभार सम्भाला, मंत्रालय की एक वैधानिक संस्था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (Genetic Engineering Approval Committee - GEAC) की बैठक बीटी बैंगन के व्यावसायिक उत्पादन के प्रस्ताव पर विचार करने के लिये थी। जीईएसी की सिफारिशें जल्दी ही मेरे पास अनुमोदन के लिये आई जिसने मुझे जटिल विषय पर कठिन फैसला लेने के लिये प्रेरित किया। यह ऐसा फैसला था जिसने मंत्री के तौर पर कर्तव्य-निर्वाह के मेरे तौर-तरीकों को तैयार किया। इससे मेरे कामकाज के प्रशंसक पैदा हुए तो दुनिया भर में कटु आलोचकों की फौज भी खड़ी हो गई।

पहले दिन से ही यह एकदम स्पष्ट था कि पर्यावरण मंत्री के रूप में मेरा काम आसान नहीं होगा। मुझे कुछ कड़े फैसले करने होंगे। मैं बर्लिन के शब्दों में ‘चुनने के लिये अभिशप्त था और हर चुनाव के साथ क्षति हो सकती थी।’ प्रत्येक चुनाव और निर्णय विकास बनाम पर्यावरण के विवाद में योगदान करते। भारत ने स्टॉकहोम के उस दिन के बाद आज लम्बी दूरी तय कर ली है। देश उच्च विकास दर के रास्ते पर है, लोगों की आकांक्षाएँ और उनकी आवश्यकताएँ कई गुना बढ़ गई हैं।

एक तरफ विकसित होती अर्थव्यवस्था की आवश्यकताएँ, जिसमें उद्योग जगत प्राकृतिक संसाधनों तक आसान पहुँच चाहता है और सरकार अधिक रोजगार पैदा करना चाहती है ताकि अधिक-से-अधिक लोग उस विकास-कथा में हिस्सेदार बन सके जिसकी रचना भारत करना चाहता है। दूसरी तरफ आबादी के बड़े तबके की आजीविका प्रकृति के साथ घनिष्ठता से जुड़ी हुई है- चाहे किसान हो जो अधिकांशतः अच्छी फसल के लिये मानसून पर निर्भर रहते हैं या आदिवासी आबादी हो जो लघु वनोपजों और जलावन के लिये जंगलों पर निर्भर रहते हैं।

ऐसा विश्वास करना गलत होगा कि आर्थिक उन्नति और विकास के साथ कोई पर्यावरणीय क्षति अपरिहार्य नहीं होगी। इसके साथ ही यह सोचना भी भ्रमात्मक है कि पर्यावरणीय संरक्षण आर्थिक उन्नति में अवरोध है। लेकिन ऐसी आर्थिक उन्नति सुनिश्चित करने के लिये जो टिकाऊ और पर्यावरण के लिहाज से ठीक हो, सभी से त्याग करने की अपेक्षा होगी। लेकिन यह त्याग व्यक्तिगत लाभ के लिये नहीं होगा, न ही यह कुछ ही लोगों के लिये लाभकारी होगा। यह ऐसे विकल्प के लिये सुदृढ़ आधार तैयार करेगा जो सार्वजनिक बेहतरी के लिये होगा।

दुर्भाग्य से विकास बनाम पर्यावरण विवाद का समाधान करने का कोई रामबाण इलाज नहीं है। यह उद्योग या पर्यावरण के बीच चुनाव का मामला भी नहीं है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि चयन ही नहीं किया जाना है। इसका मतलब केवल इतना है कि इसके लिये कोई निर्धारित पैटर्न या फार्मूला उपलब्ध नहीं है। मैंने अपने काम को हेनरी किसिंगर (Henry Kissinger) के विचार से देखूँ तो उसे मैंने ‘सन्तुलित असन्तोष’ के रूप में देखा। सचमुच मेरे कार्यकाल के आखिर तक यह निश्चित रूप से वही था। उन्नति के हिमायतियों ने मुझे ‘श्रीमान नहीं’ कहा तो संरक्षणवादियों ने मुझ पर पर्याप्त साहसी नहीं होने और अपेक्षा के अनुसार कार्य नहीं करने के आरोप लगाए।

पल-पल बदलती दुनिया के दबावों और खिंचावों ने एक चीज स्पष्ट कर दी है कि पर्यावरणीय सरोकार अधिक दिनों तक हमारे उच्च विकास दर की अनवरत तलाश के समानान्तर नहीं चल सकते। पर्यावरणीय सरोकारों को न केवल दीर्घकालीन आर्थिक निर्णयों के केन्द्र में रहना होगा, बल्कि कभी-कभी मुख्य संचालक शक्ति भी बनना होगा।

ऐसे भी अवसर आये जब निर्णय पर्यावरण लॉबी के पक्ष में झुका दिखा, विकास की परियोजना का अहित हुआ। उदाहरण के लिये, मैं भागीरथी नदी पर बन रही तीन पनबिजली परियोजनाओं को लेकर कठिन निर्णय लेने की स्थिति में था। काफी विचार-विमर्श और उत्तराखण्ड के राजनीतिज्ञों के विरोध के बावजूद मैंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि इन तीनों परियोजनाओं को व्यापक पारिस्थितिकीय सरोकारों (साथ ही धर्म से सम्बन्धित सरोकारों) को देखते हुए रद्द कर दिया जाये। न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करने की शर्त सभी पनबिजली परियोजनाओं पर लगाए जाएँ और पारिस्थितिकीय प्रभाव का घाटीवार आकलन करने का शासनादेश जारी किया जाये।

कभी-कभी सन्तुलन का प्रश्न केवल पर्यावरणीय संरक्षण और उन्नति के बीच नहीं रह जाता। यह वर्तमान की उन्नति के अपेक्षाओं और भविष्य में उन्नति की सम्भावनाओं को सुनिश्चित करने के बीच सन्तुलन बिठाना हो जाता है। यह संघर्ष पश्चिमी घाट के मामले में स्पष्ट रूप से दिखा। माधव गाडगिल विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों का स्वागत और निन्दा दोनों हुई जिससे के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में समीक्षा समिति का गठन करना पड़ा, उसकी सिफारिशें भी विवादपूर्ण साबित हुईं। पश्चिमी घाट में नई प्रजाति के पौधे और जीवों की नस्लों की खोज होते रहने से मेरा यह विश्वास पुख्ता हुआ कि आलोचनाओं के बावजूद मैं सही था।

सभी परिस्थितियाँ इस तरह विवादपूर्ण नहीं होती और वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये इस ढंग से समाधान खोजे जा सकते हैं जो भविष्य की सुरक्षा करें। तटीय नियामक क्षेत्र अधिसूचना- 2011 (coastal regulation zone notification - 2011) पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकताओं के साथ आर्थिक उन्नति को सन्तुलित करने के सहयोगी प्रयास का एक उदाहरण था। भारत के 7000 किलोमीटर लम्बे समुद्र तटीय क्षेत्र में कोई 25-30 करोड़ लोग निवास करते हैं। समुद्र तट सामरिक महत्त्व के हैं और इसकी सुरक्षा इस पर निर्भर आजीविका के लिये भी करनी होगी। समुद्र तट एक पारिस्थितिकीय और आर्थिक सम्पदा है। तटीय क्षेत्रों में अधिसंरचनाएँ विकसित की जानी चाहिए, साथ ही ऐसी प्रणाली बनाने की आवश्यकता भी है जो जलवायु परिवर्तन के निर्विवाद रूप से हानिकारक प्रभावों का सामना कर सके। 2011 की अधिसूचना ने संवेदनशील इलाकों जैसे- मुम्बई, केरल और गोवा के लिये विशेष व्यवस्था की है, हालांकि ‘हर कीमत पर विकास’ के पक्षधरों ने जितनी माँग की थी उस सीमा तक नहीं, परन्तु यह निश्चित ही पूर्ववर्ती नियमावली से कम प्रतिबन्धकारी थी।

पर्यावरण कोई ऐसा गूढ़ या तकनीकी मसला नहीं है जिस पर ‘विशेषज्ञ की राय’ आवश्यक हो बल्कि यह लोगों और उनके दैनिक जीवन से जुड़ा मसला है इसलिये मैंने अपने दरवाजे सभी के लिये खोल दिये। मैंने नीति-निर्माण की प्रक्रिया में न केवल अधिक विशेषज्ञों को शामिल करने का व्यवस्थित प्रयास किया बल्कि सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों, संरक्षणवादियों, अकादमिक लोगों, प्रशासकों, औद्योगिक विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया।

सन्तुलन की तलाश केवल प्रतिद्वन्द्वी समूहों की न्यायसंगत माँगों को पूरा करने के लिये आवश्यक नहीं थी, बल्कि यह अहसास करने के लिये भी थी कि पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय सरोकारों की अनदेखी गरीबी उन्मूलन के लक्ष्यों और देश को निरन्तर उच्च-विकास के पथ पर ले जाने पर भी प्रतिकूल असर डालेगा। इस लिहाज से बहस को उन्नति बनाम पर्यावरण के परिप्रेक्ष्य से अलग हटकर फिर से परिभाषित करने की जरूरत थी। यह बहस दरअसल निरर्थक है और अपनी मौजूदा स्वरूप में पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकीय सुरक्षा कभी जीत नहीं सकती।

पर्यावरणीय मसलों का समाधान करने और गरीबी न्यूनीकरण के बीच मजबूत और असन्दिग्ध सम्बन्ध है। पर्यावरणीय मसले जैसे- वायु और जल प्रदूषण का स्पष्ट प्रभाव जन-स्वास्थ्य पर होता है और इसके साथ उत्पादनशीलता के मसले जुड़े होते हैं। भारत के लिये इन निहितार्थों पर विचार करना आवश्यक है क्योंकि वह उच्च विकास दर की दौड़ में देर से शामिल हुआ है। लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने की जरूरत का मतलब टिकाऊ उच्च विकास दर सुनिश्चित करना है लेकिन इसका यह मतलब कदापि नहीं होता कि हम वही गलती करें जो दूसरे देशों ने की है।

पर्यावरण से सम्बन्धित नीतियों की रचना और संचालन की अनेक चुनौतियाँ हैं क्योंकि इसे इस तरह से करना होता है कि वह प्रतियोगी माँगों और दबावों एवं खिंचावों को सन्तुलित करे। जोखिम और कीमत भी बहुत ऊँची है और सही काम करने और अच्छे फैसले के बीच लकीर अक्सर धुँधली होती हैं। मैं सचेत था कि मेरे फैसले का प्रभाव, अच्छा या बुरा, पर्यावरण मंत्री के नाते मेरे कार्यकाल से अधिक समय तक टिका रहेगा। इसलिये, मेरा कर्तव्य बनता है कि इसे सुनिश्चित करुँ कि अपने फैसलों और कार्रवाइयों की सक्षमता और परिशुद्धता पर मुझे सचमुच दृढ़ विश्वास हो।

हम जो नीतियाँ बनाते हैं और हम जो निर्णय करते हैं, वे उतनी ही अच्छी होती हैं जैसे तथ्य (इनपुट) मिले होते हैं। अलग-अलग मतों वाले लोगों के लिये भी उचित प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराना भी मेरी समझ से आवश्यक होता है। इससे सुनिश्चित होता है कि मनुष्य के गलत कामों का दिखते रहना’ और ‘अच्छे लोगों के बुनियादी कामों का छिप जाने’ की घटनाएँ पूरी तरह खत्म भले न हो, न्यूनतम जरूर हो जाएगी। मैं बताना चाहता था कि पर्यावरण कोई ऐसा गूढ़ या तकनीकी मसला नहीं है जिस पर ‘विशेषज्ञ की राय’ आवश्यक हो बल्कि यह लोगों और उनके दैनिक जीवन से जुड़ा मसला है इसलिये मैंने अपने दरवाजे सभी के लिये खोल दिये। मैंने नीति-निर्माण की प्रक्रिया में न केवल अधिक विशेषज्ञों (खासकर युवाओं) को शामिल करने का व्यवस्थित प्रयास किया बल्कि सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों, संरक्षणवादियों, अकादमिक लोगों, प्रशासकों, औद्योगिक विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया। विभिन्न मसलों का समाधान करने के लिये स्पष्ट और समयबद्ध शासनादेश के साथ समितियों और कार्यबलों का गठन किया गया। इन समितियों ने भारतीय हाथी के संरक्षण, चीता के पुनर्प्रस्तुतिकरण जो भारत में पिछले दो हजार सालों में विलुप्त हो गया अकेला स्तनपायी जानवर है, बोटेनिकल सर्वे ऑफ इण्डिया (Botanical Survey of India) और जूलॉजिकल सर्वे अॅाफ इण्डिया (Zoological Survey of India) का पुनरुद्धार, प्लास्टिक कचरे, ई-कचरे व हानिकारक कचरे के निपटारे के बारे में नई नियमावली लागू करना, उच्चस्तरीय और विवादपूर्ण परियोजनाओं की समीक्षा करना जैसे वेदान्ता, पोस्को और लवासा, वन्यजीवों के संरक्षण से सम्बन्धित कानूनों को शक्तिशाली बनाना, जैवविविधता के संरक्षण के लिये बने कानूनों को लागू करना और वनाधिकार कानून 2006 के कार्यान्वयन का आकलन करने का कार्य किया।

मंत्रालय में केवल ‘विशेषज्ञों’ का ही स्वागत नहीं होता था। मेरा हमेशा से विश्वास रहा है कि युवाओं को समुचित मार्गदर्शन और प्रोत्साहन मिले तो सरकार की अधिक सहायता कर सकते हैं। उनके पास उत्साह होता है जो संशय और अनुभव से कलुषित नहीं हुआ होता। मेरे आरम्भिक सलाहकारों में दो लवराज कुमार और आबिद हुसैन ने सरकार के दरवाजे तेज और जिज्ञासु युवाओं के लिये खोले और उन्हें प्रतिष्ठान को चुनौती देने की आजादी दी और उन्हें संरक्षण भी दिया। इस परम्परा को कायम रखते हुए जिससे मैं लाभान्वित हुआ था, मैंने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय प्रशिक्षण कार्यक्रम आरम्भ किया जिसने काफी युवाओं को आकर्षित किया जिनमें युवा महिलाओं की संख्या कहीं ज्यादा थी। राष्ट्रीय पर्यावरण विज्ञान फेलो कार्यक्रम अगली पीढ़ी के मानव संसाधन तैयार करने का दूसरा प्रयास था। इसे आमतौर पर हम नहीं जानते कि पर्यावरण के मामले देखने वाले भारत सरकार के पहले दो सचिव, डॉ. टी एन खोसू और डॉ. सैयद जहूर कासिम प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे, पर बाद में यह पद भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के लिये सुरक्षित हो गया। मैं बहुत इच्छुक था कि मंत्रालय की वैज्ञानिक सामर्थ्य में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हो। फेलो कार्यक्रम फरवरी 2010 में आरम्भ हुआ। यह 35 वर्ष से कम उम्र के पोस्ट डॉक्टरेट रिसर्चर्स के लिये था जो देश और विदेश के चुने हुए संस्थानों में पर्यावरण विज्ञान, इंजीनियरिंग और तकनीक के क्षेत्र में अग्रिम कतार में कार्य करने के लिये उत्सुक हो। हर साल 30 लाख रुपए की दस फेलोशिप दी जानी थी जो भारतीय मानदंडों के लिहाज से अच्छी रकम होती है। इस पहल के माध्यम से मुझे उच्च स्तरीय भारतीय वैज्ञानिकों का एक कैडर और नेटवर्क तैयार कर लेने की उम्मीद थी जो परिशुद्ध विज्ञान के आधार पर हमारे पारिस्थितिकीय एजेंडा को निर्धारित करते।

चुनाव निश्चित रूप से वास्तविक तथ्यों और सूचनाओं के आधार पर किया जाना चाहिए। इसे सुनिश्चित करने की जरूरत थी कि मूल्यांकन निरपेक्ष और न्यायपूर्ण ढंग से किये जाएँ। इसके लिये तौर-तरीकों में बदलाव की जरूरत थी, नए प्रतिष्ठानों की जरूरत थी। प्रतिष्ठान बनाने में समय लगता लेकिन फैसला यहाँ और अभी ही करना था। इन उपायों के लाभ और महत्त्व के बावजूद, वैज्ञानिक और अनुभवजन्य तथ्यों के आधार पर फैसला सुनिश्चित करने का यह समाधान नहीं था। मंत्रालय में आये अधिकांश प्रस्तावों के लिये मुखर आदेशों की आवश्यकता नहीं थी। प्रश्न यह था कि वास्तविक तथ्यों के आधार यह कैसे सुनिश्चित हो कि पर्यावरणीय गिरावट से सुरक्षा, न्यूनीकरण और निपटारा करने के लिये निर्धारित शर्तों का पालन किया गया है?

इन प्रश्नों का उत्तर देने वाले समाधान प्रस्तुत करने के प्रयास में मैं एक नए प्रतिष्ठान का गठन करने पर विचार कर रहा था। वन एवं पर्यावरण मंजूरी चाहने वाली परियोजनाओं के मूल्यांकन और आकलन करने के लिये एक स्थायी संगठन। लेकिन मेरे इस विचार को मूर्तरूप लेने में इसे कई जरूरी प्रक्रियाओं से गुजरना था। पहले से प्रचलित व्यवस्था अनुसार इन कार्यों के लिये पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के अलावा कुछ तदर्थ समितियाँ थीं जो समय-समय पर बैठती थीं, निर्णय करती थीं कि किस परियोजना को अनुमति देनी चाहिए और किन शर्तों पर। इन समितियों का तदर्थ स्वरूप और किसी खास बैठक में बड़ी संख्या में परियोजनाओं को विचारार्थ लेने से कई बार उचित मूल्यांकन कठिन हो जाता, अक्सर अतिरिक्त जानकारियों की जरूरत होती ताकि उचित फैसला सुनिश्चित हो सके, जिससे फैसला आने में विलम्ब होता। परियोजनाओं की निरन्तर निगरानी के लिये भी कोई व्यवस्था नहीं थी जिससे अक्सर अनुमति दिये जाने के समय निर्धारित शर्तें महज औपचारिकता बनकर रह जाती थीं।

अपने कार्यकाल का अच्छा खासा समय मैंने एक पेशेवर और स्वतंत्र संस्था की रूपरेखा तैयार करने में लगाया, पहले राष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण प्राधिकार के नाम से एक संस्था सामने आई जो मोटे तौर पर अमेरीका के एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन एजेंसी (Environment Protection Agency) की तर्ज पर बनी थी और बाद में भारतीय परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए इसका विकास ‘राष्ट्रीय पर्यावरणीय मूल्यांकन और निगरानी प्राधिकार’ (National Environmental Appraisal and Monitoring Authority) नाम से हुआ जिसे परियोजनाओं का तथ्यों के आधार पर मूल्यांकन करने और फिर कार्यान्वयन की निरन्तर निगरानी करने का कार्य सौंपा गया। मेरा मानना था कि यह पूर्वानुमान और भविष्यवाणी की दिशा में एक नया रास्ता खोल देगी। एक स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण उन अनिश्चितताओं और बाधाओं को दूर कर देगा जो पर्यावरण नियमावलियों के कार्यान्वयन को प्रभावित करती हैं। प्रस्तावित प्राधिकरण की रूपरेखा विभिन्न हितधारकों और दूसरे सम्बन्धित व्यक्तियों के लिये सार्वजनिक पहुँच में रखी गई ताकि ऐसी प्रणाली के विकास के लिये व्यापक बहस हो सके जो अपनी जिम्मेवारियों का सही ढंग से निर्वाह कर सके। इसके अतिरिक्त मैंने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जिसे निगरानी-कार्य को उन्नत बनाने के लिये सुझाव देना था जिसमें दुर्भाग्य से कुछ हद तक शिथिलता थी और वह प्रभावशाली न बन सका।

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 धारा-5 के अन्तर्गत केन्द्र सरकार को उल्लंघन के मामले में नोटिस जारी करने का अधिकार है। इस प्रावधान का इस्तेमाल पूर्व में किफायत से किया जाता था, इतना किफायत से कि इसे करीब-करीब भुला दिया गया था। पर्यावरण मानकों का पालन नहीं होने के मामलों में मैंने इस प्रावधान का प्रयोग करना आरम्भ किया।

भरपूर प्रयास करने के बावजूद मैं इस योजना को फलित होते नहीं देख सका क्योंकि मुझे जुलाई 2011 में ग्रामीण विकास विभाग का कैबिनेट मंत्री बना दिया गया। हालांकि सरकार के लिये इस योजना पर समयबद्ध ढंग से काम करना जनवरी 2014 में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से अनिवार्य हो गया।11

जब चुनाव किये जाते हैं तब शिकायतों का होना स्वाभाविक होता है। इनका निराकरण किसी गतिशील व्यवस्था का आधार होता है। हालांकि वास्तविक या कथित शिकायत का निवारण ऐसा नहीं हो सकता कि उपचार बीमारी से खराब हो। भारतीय न्याय व्यवस्था पर काफी बोझ है और इसकी गति धीमी है, इसलिये शिकायतों का निपटारा बहुत अधिक समय लेता है। यह मेरे हस्तक्षेप का दूसरा फलक था- एक अपीलीय प्राधिकरण का गठन जो स्वतंत्र, सुलभ और तेज हो। हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद एक नए संस्थान की रूपरेखा तैयार हुई।

पर्यावरण से सम्बन्धित मसलों के निपटारे के लिये नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (National Environment Tribunal) और राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण (National Environment Appellate Authority) थे, पर वे दुर्घटनाओं या केवल उत्तरदायित्व के विशिष्ट मामलों तक सीमित थे। बड़े पैमाने पर हुए हादसे के मामलों में मुकदमा करने और पर्यावरणीय नुकसान के लिये व्यापक दावों पर निर्णय करने में भारत न्यायिक तौर पर असमर्थ था।

इस स्थिति का निदान करने की आवश्यकता से राष्ट्रीय हरित पंचाट (National Green Tribunal) का विचार उत्पन्न हुआ। यह अर्द्ध-न्यायिक संस्था गलत कार्यों को दुरुस्त करने में जवाबदेही तय करने से आगे जा सकती थी। आज्ञापालन नहीं होने पर भारी जुर्माना लगाने का अधिकार इसकी संरचना में ही था, जिससे दोषियों के लिये दोबारा गलती करना आर्थिक रूप से काफी महंगा पड़ने वाला था। राष्ट्रीय हरित पंचाट एकल न्यायिक फोरम था जहाँ पर्यावरण से सम्बन्धित सभी उल्लेखनीय विवादों का निपटारा हो सकता था।

राष्ट्रीय हरित पंचाट की स्थापना 2010 में संसद द्वारा कानून बनाकर की गई, यह भारत की पहली न्यायिक संस्था बनी जो ‘प्रदूषणकारी भुगतान करे’ (polluter pays) के सिद्धान्त पर चलती है। राष्ट्रीय हरित पंचाट की स्थापना में मेरी भूमिका होने के बावजूद इसने मेरे कुछ फैसलों पर सवाल उठाए12 और मुझे व्यक्तिगत तौर पर फटकारा। यह इस तथ्य का प्रमाण है कि मैं एक ऐसी व्यवस्था बनाने में सफल रहा जिस पर हितधारक अपनी चिन्ताओं और सरोकारों के न्यायपूर्ण निपटारे के लिये विश्वास और भरोसा कर सकते हैं।

संस्थानों को समय की आवश्यकता होती है और हमारे जैसे लोकतंत्र में इसके साथ बहस और वाद-विवाद अपरिहार्य होता है। इतना ही नहीं, यह साधारण तौर पर होने वाला काम नहीं हो सकता। यह एक बात थी कि सार्वजनिक भाषणों, व्याख्यानों और संसदीय बहसों में आर्थिक उन्नति के व्यापक धरातल पर पर्यावरण को रखकर बात करें, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर ठोस कार्रवाई करना एकदम अलग बात थी। ये उपाय केवल संकेत नहीं थे कि पर्यावरण मंत्रालय अपने अधिदेशों के कार्यान्वयन को लेकर गम्भीर है बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना भी था जो सुनिश्चित करे कि प्रक्रियाओं के बारे में पहले से अनुमान लगाया जा सकता है, संघर्ष और मुकदमेबाजी की सम्भावनाएँ कम हों और आर्थिक उन्नति की माँगों के साथ पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता के सन्तुलन की गुंजाईश बने।

मेरी आरम्भिक कार्रवाइयों में सबसे विवादास्पद (निश्चित ही ‘हर कीमत पर विकास’ के पक्षधरों के बीच) 2 अगस्त 2009 का सर्कुलर था जो वनाधिकार कानून 2006 के प्रावधानों का तार्किक परिणाम था।13 इस सर्कुलर ने ग्रामसभा की लिखित सहमति प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया कि उनके वनाधिकारों का निपटारा हो गया है और उन्हें वन क्षेत्र के परिवर्तन से कोई एतराज नहीं है।14

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 धारा-5 के अन्तर्गत केन्द्र सरकार को उल्लंघन के मामले में नोटिस जारी करने का अधिकार है। इस प्रावधान का इस्तेमाल पूर्व में किफायत से किया जाता था, इतना किफायत से कि इसे करीब-करीब भुला दिया गया था। पर्यावरण मानकों का पालन नहीं होने के मामलों में मैंने इस प्रावधान का प्रयोग करना आरम्भ किया। अनेक उद्योगों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, खासकर उन्हें जो गंगा की कन्नौज-वाराणसी के बीच 740 किलोमीटर की अत्यधिक प्रदूषित धारा में असंशोधित कचरा प्रवाहित कर रहे थे। महाराष्ट्र की लवासा परियोजना, छत्तीसगढ में जिंदल कोयला खदान परियोजना और गुजरात में अडानी की मुंद्रा बन्दरगाह परियोजना इत्यादि भी इनमें शामिल हैं। यह प्रक्रिया परियोजना के प्रस्तावक को अपना पक्ष रखने और सुधारात्मक उपाय करने की अनुमति देती है। इन कार्रवाइयों की काफी आलोचना हुई, जिसमें राजनीतिक वर्ग का विरोध भी शामिल है। मैं मानता हूँ कि यह पर्यावरण मंत्रालय और उसके प्रशासनिक ढाँचे की ईमानदारी को कुछ हद तक स्थापित करने में सहायक हुआ। इसने एक स्पष्ट सन्देश भी दिया कि प्रदूषणकारियों को भुगतना होगा और नियम का उल्लंघन करने वाले चाहे कितने शक्तिशाली और ऊँचे रसूख वाले हों, उनके गलत कार्यों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

मुझे खासकर उद्योग जगत के लोगों द्वारा ऐसे व्यक्ति के तौर पर देखा जाता था जो पर्यावरण का हथौड़ा चलाकर आर्थिक उन्नति को अवरुद्ध कर रहा है, जबकि दूसरे मानते थे कि मुझे यह सब छोड़ देने में अधिक दिन नहीं लगेंगे और मैं ‘किसी भी कीमत पर पहले उन्नति’ चाहने वाले समूह का हिस्सा बन जाऊँगा। नियमों का पूर्वानुमान ऐसी चीज थी जिसके बारे में कारपोरेट और उद्योगों के अगुवा लगातार कहते रहते थे, लेकिन पूर्वानुमान एक तरफा नहीं हो सकता। व्यवसाय जगत को यह जानने की जरूरत है कि कानून और नियमावलियों का प्रयोग न्यायपूर्वक और सब पर समान ढंग से होगा, यह भी महत्त्वपूर्ण है कि व्यवसाय और उद्योगों को पता हो कि उल्लंघन होने पर सभी के साथ समान कार्रवाई होगी।

पर्यावरण नियमावलियों के अपरिभाषित क्षेत्रों को कम करने के लिहाज से अनुमति देने की प्रक्रिया में मैंने कई परिवर्तनों का प्रबन्ध किया। पहला यह सुनिश्चित करना था कि परियोजनाओं को विकसित करने और उनमें खासकर कोयला और खनिज खनन से जुड़े क्षेत्रों जैसे-बिजली और इस्पात, पर्यावरण अनुमति को वन-अनुमति के लिये दबाव बनाने या प्रभावित करने में इस्तेमाल नहीं करें। यह आम प्रचलन हो गया था कि वन-अनुमति को पहले से प्राप्त मान लिया जाये, विकासकर्ता पर्यावरण-अनुमति के आधार पर काम आरम्भ कर देते और परियोजना पर हुए खर्च का ब्यौरा दिखाकर वनभूमि के उपयोग में परिवर्तन की माँग करते।

समस्या का जन्म कुछ हद तक पर्यावरण और वन-अनुमति की प्रक्रिया और समय में अन्तर होने की वजह से होता था। पर्यावरण-अनुमति परियोजना के विकासकर्ता को दी जाती थी जबकि वन-अनुमति राज्य सरकार को दी जाती थी, जो वनभूमि की मालिक थी जिस पर परियोजना लगेगी। सम्बन्धित राज्य सरकार द्वारा परियोजना का परीक्षण कर लेने के बाद केन्द्र सरकार वन-अनुमति देती थी। इसमें अक्सर सलाह करने की जरूरत होती थी और समय लगना तर्कसंगत था। इस समय का उपयोग अक्सर अनुमति के लिये दबाव बनाने में होता। इस परिस्थिति का निदान आदेशों के दो स्तरों के माध्यम से किया गया। पहला आदेश पर्यावरण-अनुमति के लिये आवेदन करने के पहले परियोजना-विकासकर्ता को वन-अनुमति प्रदान करने के बारे में था। दूसरा आदेश यह परियोजना विकासकर्ता का कर्तव्य बनाता था कि वह सम्बन्धित कोयला या खनिज क्षेत्र के लिये आवश्यक अनुमति प्राप्त कर ले जहाँ से कच्चा माल लिया जाएगा और इसे पर्यावरण अनुमति लेने के समय विभाग के सामने प्रस्तुत करें। अनुमति देने की प्रक्रिया की शुद्धत्ता को सशक्त बनाने के लिये मैंने पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट और पर्यावरण प्रबन्धन योजना बनाने वाले परामर्शदाताओं की आधिकारिक मान्यता को अनिवार्य करने की व्यवस्था आरम्भ की। कई मामलों में ये रिपोर्ट खराब गुणवत्ता की होती थी, अक्सर मूर्खतापूर्वक ‘काटो और चिपकाओ’ शैली की, जिससे विशेषज्ञ मूल्य निर्धारण समिति द्वारा समुचित आकलन कठिन हो जाता था। बाद में अधिक जानकारी और स्पष्टीकरण माँगने से भी अनुमति देने में विलम्ब होता था। परियोजनाओं को अनुमति देने में क्षेत्रवार ढंग अपनाने की आवश्यकता थी। यह समस्या केवल नदी घाटी या कतिपय जोखिमपूर्ण पारिस्थितिकी वाले इलाके जैसे पश्चिमी घाट में ही नहीं थी, औद्योगिक संकुल उन इलाकों के प्रमुख उदाहरण हैं जहाँ पर्यावरण सूचक संकटपूर्ण स्थिति में हैं। 2009 में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board - CPCB) ने 88 महत्त्वपूर्ण औद्योगिक समूह का समेकित पर्यावरणीय अाकलन किया। यह आकलन कम्प्रिहेंसिव एनवायरनमेंटल पॉल्यूशन इंडेक्स (comprehensive environmental pollution index - CEPI) के आधार पर किया गया जिसे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली (Indian Institute of Technology - IIT Delhi) की अगुवाई में अनेक प्रमुख अकादमिक संस्थानों ने विकसित किया था। वे संस्थान जमीनी स्तर पर आकलन करने के कार्य में भी शामिल थे। इन 88 औद्योगिक समूहों में से 43 को ‘अत्यधिक प्रदूषित’ चिन्हित किया गया, उनके सीईपीआई स्कोर सत्तर या उससे अधिक थे।

पहली बार संशोधित मानदंड में ओजोन, खतरनाक वाष्पशील जैविक पदार्थ और भारी धातुओं के लिये मानक भी शामिल किये गए। नियमावली और मानक महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन समान रूप से यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वे वर्तमान परिस्थिति और जरूरतों के प्रति उत्तरदायी हैं। इस सन्दर्भ में संशोधित परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक ने जन स्वास्थ्य की बढ़ती चिन्ताओं-साँस की बीमारियों की बढ़ती घटनाओं का ख्याल भी रखा।

इस स्थिति का निराकरण करने के लिये मंत्रालय ने 13 जनवरी 2010 को इन ‘अत्यधिक प्रदूषित’ औद्योगिक समूहों में नई परियोजना (और वर्तमान परियोजनाओं के विस्तार) को पर्यावरणीय अनुमति देने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। विचार था कि उद्योगों और सम्बन्धित राज्य सरकारों को पर्यावरण के उपचार के कार्यों के लिये प्रोत्साहित किया जाये। प्रतिबन्ध को तब तक लागू रहना था जब तक इलाके के प्रदूषण स्तर में सुस्पष्ट सुधार दिखने नहीं लगे। इसके लिये राज्य सरकार को उपचार योजना तैयार करनी थी, उसकी समीक्षा एवं अनुमोदन सीपीसीबी करता और फिर राज्य एवं स्थानीय सरकारों को उसे लागू करना था। यह एक गतिशील प्रक्रिया होती, इरादा पर्यावरण सूचकों को काबू में रखना और स्वीकार्य स्तर के भीतर रखना था। प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने में प्रतिबन्ध बेहतरीन औजार था।

वर्तमान नियमावली नई आवश्यकताओं को हमेशा पूरा नहीं करती, वायु गुणवत्ता मानक को पहली बार उनके बनने के पन्द्रह वर्षों के बाद संशोधित किया गया और उन्हें यूरोपीय संघ के सख्त मानकों के अनुसार बनाया गया। औद्योगिक और आवासीय क्षेत्रों के वायु प्रदूषण के लिये एकल मानक लागू किया गया और मैं इस विचार का था कि संशोधित राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक उत्सर्जन को घटाने के लिये ‘स्वच्छ ईंधन’ के उपयोग को प्रोत्साहित करेगा। पहली बार संशोधित मानदंड में ओजोन, खतरनाक वाष्पशील जैविक पदार्थ और भारी धातुओं के लिये मानक भी शामिल किये गए। नियमावली और मानक महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन समान रूप से यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वे वर्तमान परिस्थिति और जरूरतों के प्रति उत्तरदायी हैं। इस सन्दर्भ में संशोधित परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक ने जन स्वास्थ्य की बढ़ती चिन्ताओं-साँस की बीमारियों की बढ़ती घटनाओं का ख्याल भी रखा। यह भारत में ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन को रोकने की जरूरत के लिहाज से भी उपयुक्त है।

तौर-तरीकों में बदलाव केवल इसलिये जरूरी नहीं था कि विकास की सीढ़ी पर चलने की देश की इच्छा के व्यापक ढाँचे में हम पर्यावरण के मसलों को कैसे समझते हैं? यह मंत्रालय और न्यायपालिका के बीच के सम्बन्धों में बदलाव, बाजारीकरण के प्रभाव के साथ ही अपनी गतिविधियों के केन्द्र में विज्ञान व देश के वन क्षेत्रों की सुरक्षा और संरक्षण में प्रशासन की भूमिका के लिये भी जरूरी था। कई वर्षों से न्यायपालिका ने ही हमारे प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी पर लगातार आक्रमण से कारगर सुरक्षा प्रदान किया था। न्यायिक सक्रियता-1984 से ही पर्यावरण संरक्षण की चर्चा के केन्द्र में रही। दरअसल यह कार्यपालिका की सुस्ती और दुराचार का स्वाभाविक परिणाम था। वर्षों तक संसद द्वारा पारित कानूनों के कार्यान्वयन को कार्यपालिका द्वारा बड़े पैमाने पर नजरअन्दाज किये जाने के कारण अदालतों ने न्यायिक समीक्षा के अधिकारों का प्रयोग करते हुए कार्यपालिका की भूमिका को धीरे-धीरे कम कर दिया। यह कार्यपालिका पर दबाव डालने का समय था कि उठो और गिनती में आओ।

इस प्रकार, न्यायपालिका के साथ साझेदारी बनाने खासतौर से सुप्रीम कोर्ट के साथ, मेरी आरम्भिक प्राथमिकताओं में एक बन गया था। 1995 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केरल और कर्नाटक में वनों की अनधिकृत कटाई रोकने के लिये टी एन गोदावर्मन थिरूमुलपद की एक याचिका स्वीकार की। यह याचिका एक फोरम बन गई जिसमें वन और बाद में पर्यावरण के व्यापक प्रश्नों से सम्बन्धित सभी मामले नत्थी कर दिये गए और सुनवाई हुई। एक बार मैंने मूल याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि के बारे में पूछताछ की जो मुकदमेबाजी की ऐसी सम्पन्न विरासत छोड़ गया था तो मुझे बताया गया कि इस युगांतकारी फैसले को अपना नाम देने के सिवा उसकी कोई भूमिका बहुत पहले नहीं रही।15

दायर होने और इस मुकदमे से नत्थी होने वाले मामलों की संख्या इस तेजी से बढ़ी कि सुप्रीम कोर्ट को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों की एक अलग खंडपीठ-‘फॉरेस्ट बेंच’ का गठन करना पड़ा जो केवल वन और पर्यावरण के मामलों को सूनने और निर्णय करने के लिये खासतौर से शुक्रवार दोपहर में बैठती थी और आज भी बैठती है। कुछ मामले दूसरों की अपेक्षा अधिक पेचीदा थे और विद्वान न्यायाधीशों ने जल्दी ही महसूस कर लिया कि उन मामलों की सुनवाई के लिये आवेदन विशेषज्ञों द्वारा तैयार कराना चाहिए जिन मामलों की अधिक विस्तृत छानबीन की जरूरत थी। इस प्रकार केन्द्रीय सशक्त समिति (central empowered committee - CEC) का जन्म हुआ। इस समिति में तीन अधिकारी रखे गए जो सभी पर्यावरण और वन-प्रशासन की पृष्ठभूमि के थे। इस खण्डपीठ और सीईसी का विस्तार एवं पहुँच 2008 तक इतनी बढ़ गई कि कार्यपालक गतिविधियों जैसे वन-अनुमति प्रदान करना भी हाथ में ले लिया। इसमें सबसे उल्लेखनीय वेदान्ता को ओड़िशा में बॉक्साइट का खनन करने के लिये स्तर-1 की अनुमति प्रदान करना था।

पदभार ग्रहण करने के पहले सप्ताह के भीतर मैं सुनिश्चित करना चाहता था कि मंत्रालय और न्यायपालिका के बीच कार्यपालक गतिविधियों को लेकर विभाजन के बजाय सद्भावपूर्ण सामंजस्य स्थापित हो जाये। मैं सीईसी के अधिकारियों से मिला जो ऐसा ही विचार रखते थे। हमारी पहली चुनौती क्षतिपूरक वनीकरण प्रबन्धन और योजना प्राधिकरण (Compensatory Afforestation Management and Planning Authority - CAMPA) के विचार को पुनर्जीवित करना था। अक्टूबर 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि एक कैम्पा कोष की स्थापना की जाएगी जिसमें वन भूमि का उपयोग करने वाली एजेंसियों से क्षतिपूर्ति के तौर पर प्राप्त सारी रकम जमा की जाएगी। अप्रैल 2004 में पूर्ववर्ती राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबन्धन (एनडीए) सरकार में मेरे मंत्रालय ने कैम्पा का गठन किया और मई 2008 में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार ने क्षतिपूरक वनीकरण कोष विधेयक (Compensatory afforestation fund bill) लोकसभा में पेश किया ताकि कैम्पा को वैधानिक आधार दिया जा सके। लेकिन वन और पर्यावरण मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने इस विधेयक को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह राज्यों के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। विधेयक लोकसभा से पारित हो गया, पर राज्यसभा से पारित नहीं हो सका।

परिणाम हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के स्थापित कोष सात वर्षों तक निलम्बित खाता में पड़ा रहा। मैं और मेरे सहयोगी कानून मंत्री वीरप्पा मोइली, सीईसी, अटार्नी जनरल जी ई वहनवती और अदालत के सहयोगी वकील अर्थात एमाइकस क्यूरे से मिले ताकि कोई समाधान निकले जिससे इस खाते में बन्द रकम हमें मिल सके। मेरा ध्यान सुप्रीम कोर्ट के 5 मई 2006 के एक आदेश की ओर दिलाया गया जिसमें सीईसी के अनुमोदन पर तदर्थ कैम्पा के गठन का निर्देश दिया गया था ताकि कोष संग्रह किया जा सके। (जो 30 अक्टूबर 2002 के बाद से राज्यों में जमा था।) वैधानिक संस्था के गठन होने तक इस संस्था के कार्यरत रखने का इरादा था। जब मैंने मंत्री के तौर पर पदभार ग्रहण किया तब तक कैम्पा खाता में लगभग 1 हजार करोड़ जमा हो गए थे।

आखिरकार, हमने 10 जुलाई 2009 को सुप्रीम कोर्ट की ‘फॉरेस्ट बेंच’ (forest bench) में यह अनुरोध करते हुए हलफनामा दायर किया कि तदर्थ कैम्पा समिति को संलग्न विस्तृत निर्देशावली के आधार पर कार्यरत किया जाये। अटार्नी जनरल जो मंत्रालय की ओर से उपस्थित हुए, के साथ-साथ अदालत के सहयोगी वकील ने स्वतंत्र रूप से अदालत से अनुरोध किया कि हलफनामा और तदर्थ कैम्पा के सुझावों को स्वीकार किया जाये जो सीईसी द्वारा समर्थित है। नतीजा हुआ कि फॉरेस्ट बेंच ने हमारे अनुरोध को स्वीकार कर लिया। कुल लगभग एक हजार करोड़ रुपए प्राकृतिक वनों के पुनर्सृजन और वनीकरण की गतिविधियाँ को संचालित करने के मकसद से 2009-10 में राज्यों को हस्तान्तरित किये गए। यह बड़ा ही व्यक्तिगत सन्तोष का क्षण था क्योंकि मैं पदभार ग्रहण करने के दो महीने के भीतर बड़ी अड़चन दूर करने में सफल रहा था जो करीब आठ साल से अटका हुआ था, यह सभी सम्बन्धित व्यक्तियों के लिये सन्तोषप्रद था।

मैंने जब वन एवं पर्यावरण मंत्री के रूप में कार्यभार सम्भाला, तो मेरे सामने यह स्पष्ट था कि हम पर्यावरणीय नियमावलियों के मामले में ‘1991 के समय’ में थे। हमें अपने पर्यावरण का नियमन करने के लिये अधिक नवाचारी ढंग अपनाने की जरूरत थी। नियमन के परम्परागत ‘इंस्पेक्टर राज’ मॉडल की अन्तर्निहित सीमाएँ थीं, घूस माँगे जाने का जोखिम तो सदा मौजूद था।

भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले लगभग तीस वर्षों के दौरान बहुत बदल गई। हम नियोजित समाजवादी अर्थव्यवस्था से बदलकर, इंस्पेक्टर राज के बन्धनों से हमेशा के लिये मुक्त हो गए, ऐसी अर्थव्यवस्था बने जिसमें बाजार की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी और जहाँ निजी क्षेत्र गतिशील था।

भारत, ‘अधिकार और नियंत्रण’ के युग में पीछे छूट गया था, अभी भी यह पर्यावरण नियमावलियों के क्षेत्र में विकल्प’ चुनने की स्थिति में नहीं था। मेरा विश्वास है कि पर्यावरण नियमावलियों में बाजार की एक भूमिका है। पेंच इसे समझने में है कि कहाँ बाजार फायदेमन्द हो सकता है और इसे सुनिश्चित करना कि बाजार का इस्तेमाल कैसे कारगर ढंग से जनहित में किया जा सकता है।

मैंने जब वन एवं पर्यावरण मंत्री के रूप में कार्यभार सम्भाला, तो मेरे सामने यह स्पष्ट था कि हम पर्यावरणीय नियमावलियों के मामले में ‘1991 के समय’ में थे। हमें अपने पर्यावरण का नियमन करने के लिये अधिक नवाचारी ढंग अपनाने की जरूरत थी। नियमन के परम्परागत ‘इंस्पेक्टर राज’ मॉडल की अन्तर्निहित सीमाएँ थी, घूस माँगे जाने का जोखिम तो सदा मौजूद था। भारत में पर्यावरण के क्षेत्र में कुछ सर्वाधिक प्रगतिशील और व्यापक कानून हैं, हमें ऐसी नियमावलियों की आवश्यकता थी जिनका कार्यान्वयन कुछेक इंस्पेक्टरों के सहारे हो सके। हमें ऐसी पद्धति की ओर बढ़ने की आवश्यकता थी जो तकनीकों का लाभ उठाए और बाजार का उपयोग करके पर्यावरण कानूनों एवं नियमावलियों का पालन सुनिश्चित करे।

इस सन्दर्भ में मैंने एस्थर डूफलो (Esther Duflo) (जो दुनिया के सबसे प्रमुख अर्थशास्त्रियों में से एक के रूप में प्रसिद्ध हैं।) के नेतृत्व में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Massachusetts institute of technology -MIT) और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (Howard university) की एक टीम को उत्सर्जन व्यापार व्यवस्था का खाका तैयार करने के लिये कहा जिससे वायु प्रदूषण का सामना किया जा सके। विचार था कि औद्योगिक इकाइयों के बीच एक बाजार-आधारित स्व-नियमन की व्यवस्था लागू किया जाये जिसमें प्रदूषणकारी पदार्थों के उत्सर्जन का मूल्य निर्धारित हो। प्रत्येक यूनिट की एक सीमा निर्धारित होगी कि उसे कितनी मात्रा में प्रदूषणकारी पदार्थों का उत्सर्जन करने की छूट है और अगर वह इकाई उस सीमा से अधिक उत्सर्जन करती है तो उसे दूसरी ऐसी इकाई से उत्सर्जन-क्रेडिट खरीदना होगा जो अपने उत्सर्जन को निर्धारित सीमा से कम रखने का प्रबन्ध करने में सफल रहा हों। घरेलू उत्सर्जन व्यापार योजना की पायलट योजना को तमिलनाडु, गुजरात और महाराष्ट्र में आरम्भ किया गया। रीयल-टाइम ऑनलाइन उत्सर्जन रिपोर्टिंग, जो इस प्रणाली में जरूरी होता है, ने अपने आप उल्लेखनीय पारदर्शिता ला दी।

यह योजना अमेरिका में अम्लीय वर्षा से निपटने के अनुभवों के आधार पर बनी थी जहाँ सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 40 प्रतिशत घट गया और बचत 1990 के दशक के मध्य में एक खरब डॉलर प्रतिवर्ष हुआ। चीली में 1990 के आरम्भिक दिनों में कुल सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर के मामले में उत्सर्जन समायोजन व्यापार कार्यक्रम और यूरोपीय संघ में कार्बन डाइऑक्साइड के लिये उत्सर्जन व्यापार कार्यक्रम चले। उत्सर्जन व्यापार पायलट कार्यक्रम अभी कार्यान्वयन के दौर में है। इसने हमें नए तौर-तरीकों को लागू करने में आने वाली चुनौतियों को जाँचने में सहायता की, यह ऐसा कार्यक्रम है जो भारत में पर्यावरण नियमावलियों को लागू करने में बाजार का इस्तेमाल करता है। मैं मानता हूँ कि भारत में पर्यावरण नियमावलियों को लागू करने में भविष्य में बाजार की व्यवस्था के इस्तेमाल को मजबूत करने में पायलट कार्यक्रम से मिले अनुभव काफी उपयोगी होंगे।

यहाँ भी मैं कुछ विवादों में फँस गया। उद्योगों ने इसे आगे की ओर बढ़ा कदम कहकर स्वागत किया और पर्यावरणविदों ने कहा कि मैं नियमावलियों का परित्याग कर रहा हूँ। मुझे दुखी होकर यह कहना पड़ा कि नियमावलियों का कार्यान्वयन करने के बाजार-हितैषी ढंग हो सकते हैं, जिन्हें विनियमित किया जाना है, उन्हें इंस्पेक्टरों के चंगुल से बचाने का यही रास्ता है।

काश! पर्यावरण मंत्रालय में मेरे प्रयासों की अन्तर-ध्वनि मानसिकता (और अधिक नाजुक रूप से बन्द दिमाग) बन पाती। वनों और वन-संरक्षण के मामले ने अनोखी चुनौती पेश की थी। वन प्रशासन को अपने ढंग बदलने की जरूरत थी। वे स्वयं को देश के वनों के इकलौते संरक्षक समझते थे और हर किसी को अतिक्रमणकारी, जबकि उन्हें यह स्वीकार करना चाहिए था कि लोगों का बड़ा समुदाय वहाँ सदा से मौजूद रहा है। खासकर आदिवासी आबादी जिनका दैनिक जीवन व आजीविका वनों पर निर्भर है। अधिकांश क्षेत्रों में मैंने पाया कि वन अधिकारी कुछ अपवादों को छोड़कर ऐसे लोगों को प्राकृतिक वनों के संरक्षण और पुनर्सृजन में साझीदार नहीं मानते थे। दूसरी चुनौती वन्यजीव संरक्षणवादियों द्वारा पेश की गई जो वन-प्रशासन की तरह स्थानीय आबादी को बाघ और दूसरे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास क्षेत्र में अनाधिकार घुसपैठिया मानते थे।

इन दो रुझानों ने एक अन्य अधिक गम्भीर चुनौती को जन्म दिया जो वनक्षेत्रों में माओवादियों की बढ़ती पैठ के रूप में सामने आई। संयोग से वनक्षेत्र हमारे समाज के सबसे अविकसित क्षेत्र और सर्वाधिक वंचित समुदायों के निवास स्थल हैं। वनों से सम्पन्न इलाके, खनिजों से सम्पन्न इलाके, माओवाद प्रभावित इलाके और आदिवासी इलाके अनेक राज्यों झारखण्ड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़ और आन्ध्रप्रदेश, में मिले जुले हैं। निस्सन्देह, यह साधारण समझदारी है कि वन प्रशासन का असंवेदनशील रवैया खासतौर से गार्ड और रेंजर के स्तर पर उपनिवेशकालीन कानूनों जैसे भारतीय वन अधिनियम 1927 (Indian forest act 1927) के सहारे जो बर्ताव करते हैं, वह माओवादियों को प्रचार-प्रसार करने का बेहतरीन अवसर प्रदान करते हैं।

उपाय यह सुनिश्चित करना था कि संरक्षणवादी और वन-अधिकारी दोनों अपने तौर-तरीकों को देश की जमीनी सच्चाई के साथ समायोजित करते। मेरा प्रयास उन्हें घसीटकर, बल्कि ठोक-पीटकर और विरोध करने के बावजूद इक्कीसवीं सदी में ले आना था। इस लिहाज से मैंने कष्टकारक भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 68 में संशोधन करने के लिये विशेष रूप से पहल किया ताकि वनवासियों और आदिवासियों का अनावश्यक उत्पीड़न और मामूली मामलों में कैद होने की घटनाओं में कमी आये और लगभग जबरदस्ती बाँस को गैरकाष्ठ वनोपज के रूप में पुनर्वर्गीकरण कराया और उसे उपजाने, परिवहन करने और आखिरकार बेचने का अधिकार ग्रामसभा को प्रदान किया।

बाँस के मामले में महाराष्ट्र के माओवादग्रस्त जिला गढ़चिरौली के मेंढा लेखा गाँव की पहल बहुत ही सफल रही और ग्रामसभा की वार्षिक आय एक करोड़ रूपए से अधिक हो गई और इसकी प्रशंसा उन लोगों ने भी की जो मेरे कार्यकाल को लेकर दुविधाग्रस्त थे। जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान और मैंने बाँस के परिवहन का ट्रांजिट पासबुक स्थानीय गोंड सरदार देवाजी तोफा (Devaji Tofa) को दिया तो उन्होंने बड़ा ही दिलचस्प बात कही। उन्होंने कहा कि दिल्ली, मुम्बई में हमारी सरकार, मेंढा लेखा में हम ही सरकार। मैंने सभी मुख्यमंत्रियों को इस पहल की अनुकृति तैयार करने के लिये लिखा। शुरुआत उन इलाकों से हो सकती थी जहाँ वनाधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत सामुदायिक वन अधिकार प्रदान कर दिये गए थे हालांकि, मुझे कोई बड़ी सफलता नहीं मिली। मार्च 2013 में जब मैं ग्रामीण विकास मंत्री था, मुझे कींचित सफलता दिख सकी। ओड़िशा के कालाहांडी जिला के जामगुड़ा गाँव, आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जिला के दादुगुला और मुनासारापल्ली गाँवों में ग्रामसभा ने बाँस के व्यापार पर नियंत्रण कायम कर लिया था।

परिषद का गठन 1986 में बड़ी उम्मीदों के साथ हुआ था और मेरी कोशिश इसे नया जीवन देने का था। किसी पर्यावरण मंत्री को अपना काम गम्भीरता से करने में कैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, इसका बेहतरीन उदाहरण कोयला खनन परियोजनाओं को अनुमति देने के मामलों में वनों में ‘करें और न करें’ के बीच फर्क करना होता है।

माओवादी चुनौती का सामना करने के लिये अन्य पहल भी किये गए थे। राज्यों को वन क्षेत्रों में सामाजिक और दूसरी अधिसंरचनाएँ स्थापित करने के लिये वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 (Forest (Conservation) Act, 1980) के अन्तर्गत अनुमति प्राप्त करने की अनिवार्यता में छूट दी गई। मैंने मुख्यमंत्रियों से आग्रह किया कि जहाँ भी सम्भव हो स्थानीय युवकों की भर्ती की प्रक्रिया आरम्भ करें, खासकर आधुनिक और ऐसे पदों पर जिनसे वन प्रशासन का आम लोगों से सम्पर्क होता है ताकि लोगों को वन प्रशासन का नया चेहरा लोगों को नजर आये। अनेक राज्यों में कई वर्षों के अन्तराल के बाद वन रक्षक, रेंजर इत्यादि पदों पर भर्ती आरम्भ हुए।

भारतीय वन सेवा (Indian forest service - IFS) की परीक्षा संघ लोक सेवा आयोग द्वारा केवल अंग्रेजी में ली जाती है। केवल विज्ञान स्नातक इसके पात्र होते हैं। मैंने महसूस किया कि यह पुराने समय की चीज है और अपने वरिष्ठ आईएफएस सहकर्मियों के ऐतराज पर मैंने संघ लोकसेवा आयोग के साथ यह मामला उठाया। अफसोस है कि यह मामला मेरे कार्यकाल में हल नहीं हो सका लेकिन, एक काम कराने में मैं कामयाब रहा कि भारतीय वानिकी शोध और शिक्षा परिषद (Indian Council of Forestry Research and Education - ICFRE) के सशक्तिकरण के लिये एकमुश्त 100 करोड़ रुपए अनुदान देने के लिये वित्तमंत्री मान गए जो अनेक वर्षों से सुस्त पड़ा था। परिषद का गठन 1986 में बड़ी उम्मीदों के साथ हुआ था और मेरी कोशिश इसे नया जीवन देने का था।

किसी पर्यावरण मंत्री को अपना काम गम्भीरता से करने में कैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, इसका बेहतरीन उदाहरण कोयला खनन परियोजनाओं को अनुमति देने के मामलों में वनों में ‘करें और न करें’ के बीच फर्क करना होता है। विडम्बना है कि मेरे सामने यह बात कोल इण्डिया के एक पूर्व अध्यक्ष के माध्यम से आई जो पहले से यह जान लेना चाहते थे कि किन परियोजनाओं को अनुमति मिलेगी और किनको आगे बढ़ने की अनुमति नहीं मिल सकेगी। समस्या इसलिये उत्पन्न हुई क्योंकि बड़े कोयला भण्डार सघन वनों के बीच स्थित थे। कमजोर वनों के इलाके में खनन से कोई परेशानी नहीं थी, पर पेड़ों की बहुलता वाले सघन वन के इलाके में यह निश्चित ही परेशानी का कारण था क्योंकि घने प्राकृतिक वन एक बार नष्ट हो गए तो हमेशा के लिये चले जाते हैं। मानवकृत वृक्षारोपण कभी प्राकृतिक वनों के विकल्प नहीं हो सकते जो मूल्यवान और अपूरणीय जैवविविधता का भण्डार होने के अलावा कार्बन को उल्लेखनीय रूप से घटाने और ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में भी सहायक होते हैं। मैंने एक अध्ययन कराया जिसका आकलन था कि हमारे वनक्षेत्र ग्रीनहाउस गैसों के वार्षिक उत्सर्जन के आठ से दस प्रतिशत हिस्से को सोख लेते हैं।

‘करें-नहीं करें’ मामले ने मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत कष्ट पहुँचाया। बिजली मंत्रालय में कनिष्ठ मंत्री के रूप में काम किये होने और उस मामले के साथ पहले से सम्पर्क होने की वजह से मैं बिजली उत्पादन क्षमता में बड़े पैमाने पर बढ़ोत्तरी की आवश्यकता को जानता था और यह भी जानता था कि लघु से मध्यम अवधि में कोयला ही अकेला विकल्प है जिसका भारत में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा भण्डार है। फिर भी शुद्ध अन्तःकरण से मुझे कड़ा रुख अपनाना पड़ा, इसलिये नहीं कि मैं उलटा चलना चाहता था या मुझे पर्यावरण का महत्त्व दिखाना था, बल्कि सीधी-सी बात यह थी कि मुझे यह सही काम लगा जिसे किया जाना चाहिए। मैं संसाधनों के बेहतरीन उपयोग और भविष्य के लिये संरक्षण की आवश्यकता को लेकर काफी सचेत था। मैं यह भी मानता था कि हमारी कोयला खनन कम्पनियों को अधिक पर्यावरण-हितैषी होना और उत्पादन में अधिक कुशल होना और अपनी तकनीकी सक्षमता को अधिक उन्नत बनाने की आवश्यकता है।

कुछ अवसरों पर कोयला खनन के लिये आवश्यकताओं को समायोजित करने में मैं सक्षम हुआ, लेकिन आधा से अधिक मामलों में मेरे प्रयास को कोयला और अधिसंरचना लॉबी ने पूरा नहीं किया। कई बार जिन कम्पनियों को हरी झंडी नहीं मिल सकी, वे स्थायी रूप से मेरा विरोधी हो गईं और कुछ विडम्बनापूर्ण ढंग से क्योंकि उनमें से कई मेरे नजदीकी व्यक्तिगत दोस्त थे और उनके साथ मेरा बेहतरीन सम्बन्ध था। यह ‘करें-नहीं करें,’ बहस जिसने मुझे अपने ही सहकर्मियों के बीच काफी अलोकप्रिय बना दिया, इस पुस्तक का प्रमुख अंग है।

वन क्षेत्रों में कोयला खनन के मामले में मेरा रवैया सूक्ष्म भेदयुक्त था, लेकिन यह सूक्ष्म भेद सार्वजनिक बहसों में अधिकतर नष्ट हो गया। पर्यावरणवादी दुख प्रकट करते हैं कि मैं बहुत आगे नहीं बढ़ा और कई बार समझौते कर लिये। उद्योग दावा करते है कि मैंने निवेश के माहौल को गम्भीर नुकसान पहुँचाया। मैं यह बताने की कोशिश कर रहा था कि मूल्यांकन मामलावार किया जाये क्योंकि इसे ठीक से समझा नहीं गया। यह ऐसा मामला था जिसमें अगर ‘मैं करता’ तो धिक्कारा जाता, अगर ‘मैं नहीं करता’ तो धिक्कारा जाता। स्थिति को परमाणु ऊर्जा के मामले में मेरे रूख ने अधिक बिगाड़ दिया और जिसके बारे में मेरा विश्वास है कि सांढ़ को लाल कपड़ा दिखाना था। मेरा दृढ़ विश्वास था कि भारत को अपनी बिजली आपूर्ति क्षमता में परमाणु ऊर्जा के योगदान को बढ़ाना होगा। इसे वर्तमान लगभग 3.5 प्रतिशत से बढ़ाकर अगले दो दशकों में कम-से-कम 20 प्रतिशत तक ले जाना होगा। वही लोग जिन्होंने वेदान्ता के मामले में मेरे रुख की प्रशंसा की थी, जैतापुर परमाणु ऊर्जा पार्क को अनुमति देने की निन्दा करने लगे, तब फुकुशिमा दुर्घटना अखबारों में छाई हुई थी। मैं विश्वास करता हूँ कि परमाणु प्रकल्पों की सुरक्षा को लेकर लोगों की चिन्ता पूरी तरह गलत नहीं है लेकिन इन चिन्ताओं का सामना लोगों की बेहतर पहुँच और स्वतंत्र नियामक संस्था के माध्यम से किया जा सकता है जिस पर लोग भरोसा कर सकें।

विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक अस्थिर सन्तुलन कायम करने के निरन्तर प्रयास से एक महत्त्वपूर्ण सवाल पैदा हुआ। हम उसका प्रबन्धन कैसे करेंगे जिसका आकलन हमने नहीं किया है? अगर हमें पर्यावरण संरक्षण के लिये अधिक मजबूत मामला बनाना है तो निश्चित तौर पर वस्तुनिष्ट ढंग से पर्यावरण को हुए नुकसान का मूल्य बताना होगा जो हमारी विकास प्रक्रिया की वजह से हुआ।

परम्परागत रूप से राष्ट्रीय आमदनी के मूल्यांकन के लिये अर्थशास्त्री जीडीपी और एनडीपी का आकलन करते हैं। जिसका उपयोग भौतिक पूँजी के खातों में होता हैं हालांकि, जीडीपी को ‘हरित जीडीपी’ (Green gross domestic product) में बदलने की कोई स्वीकृत पद्धति नहीं है जिससे राष्ट्रीय आमदनी पैदा करने की प्रक्रिया में प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण होना प्रकट होता।

यही कारण था कि अगस्त 2010 में मैंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि कैम्ब्रिज के विशिष्ट अर्थशास्त्री और पर्यावरणीय अर्थशास्त्र के गुरुओं में एक पार्थ दासगुप्ता (Partha Dasgupta) की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन करें। दासगुप्ता समिति जिसमें प्रसिद्ध अर्थशास्त्री विजय केलकर, नितिन देसाई, कौशिक बासु और टीसीए अनंत भी थे, को राष्ट्रीय हरित खाता (National green account) की रूपरेखा विकसित करने का जिम्मा सौंपा गया जो राष्ट्रीय माइक्रो-इकोनॉमिक लेखा प्रणाली के अंग के रूप में पर्यावरणीय लागत को प्रतिबिम्बित करेगा। दासगुप्ता समिति ने अपनी रिपोर्ट सुदृढ़ रूपरेखा और कार्यान्वयन की योजना के साथ अप्रैल 2013 में प्रधानमंत्री को सौंप दी।

दासगुप्त समिति की रिपोर्ट नए तरह की पूँजी ‘मानव पूँजी’ और ‘प्राकृतिक पूँजी’,देश की पारिस्थितिकी, भूमि, पानी और मिट्टी इत्यादि संसाधनों को राष्ट्रीय लेखा में शामिल करने की बात करती है। रिपोर्ट आर्थिक उन्नति के नए प्रतिमान का प्रस्ताव करती है। उन्नति को अधिक प्रचलित ‘जीडीपी प्रति व्यक्ति’ में परिभाषित करने के बजाय ‘सम्पत्ति प्रति व्यक्ति’ में परिभाषित करती है जैसे, यह सम्भव है कि वनों से सम्पन्न किसी देश की ‘जीडीपी प्रति व्यक्ति’ काठ का निर्यात करने से बढ़ रही हो, लेकिन उसकी ‘सम्पत्ति प्रति व्यक्ति’ घट रही हो क्योंकि उसकी प्राकृतिक पूँजी (इस मामले में वन) खत्म हो रही है जबकि जीडीपी बढ़ रही है। रिपोर्ट तर्क देती है कि यह नया प्रतिमान जिसमें हम राष्ट्र की ‘प्रति व्यक्ति सम्पत्ति’ में परिवर्तन को मापते हैं, जीडीपी प्रति व्यक्ति के परम्परागत प्रतिमान की अपेक्षा देश के कल्याण का अधिक सशक्त आकलन प्रदान करती है। दासगुप्त समिति ने हरित राष्ट्रीय लेखा (National green account) तैयार करने के लिये योजना प्रस्तुत किया, जिसे लागू करने की जिम्मेवारी सरकार की थी।

2009 में जब मैंने मंत्रालय का कार्यभार सम्भाला तब जलवायु परिवर्तन का मसला अन्तरराष्ट्रीय चर्चा के केन्द्र में था। मेरे सामने यह स्पष्ट था कि जलवायु परिवर्तन का मसला संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में प्रतिवर्ष केवल वार्ताकारों और मंत्रियों के विचार विमर्श करने का ‘बन्द मसला’ नहीं हो सकता। भारत के हर तीन आदमी में से दो रोजगार के लिये कृषि पर निर्भर रहते हैं वहीं लगभग 30 करोड़ लोग समुद्र तटीय क्षेत्रों में निवास करते हैं, इसलिये जलवायु परिवर्तन भारत की वास्तविक समस्या है। पिछले कुछ वर्षों में अनगिनत वैज्ञानिक अध्ययनों ने, जिसमें ‘जलवायु परिवर्तन पर अन्तर-सरकारी समिति (आईपीसीसी)’ का आकलन भी शामिल है, जलवायु परिवर्तन का जल उपलब्धता, खाद्य उपलब्धता और सुरक्षा, तटीय क्षेत्रों और आजीविका प्रभाव पर जोर दिया है। जलवायु परिवर्तन का मानसून पर प्रभाव, समुद्र के स्तर में बढ़ोत्तरी, हिमालय के ग्लेशियरों का पीछे हटना और हमारी नदी प्रणालियों विशेषकर गंगा के स्वास्थ्य पर प्रभाव, वन विनाश की बढ़ती दर के साथ कार्बन अवशोषणों की क्षमता में गिरावट जो अपने प्राकृतिक संसाधनों का अधिक-से-अधिक दोहन करने की हमारी दयाहीन आवश्यकता के साथ-साथ होता है। सब एक सरल तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि जलवायु परिवर्तन उतना ही देशी मसला है जितना अन्तरराष्ट्रीय। यह स्थानीय आजीविका का मसला है, उतना ही यह वैश्विक साझेदारी का मसला है। जलवायु परिवर्तन की समस्याओं को दूर करना अन्तहीन अन्तरराष्ट्रीय वार्ताओं का विषय भर रह जाये, यह न केवल गलत है, बल्कि स्वाभाविक रूप से हानिकारक है।

एक अर्थ में मैं जलवायु परिवर्तन वार्तालापों की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठा रहा था जो इस मसले को अन्तरराष्ट्रीय वार्ताओं के अधिकार क्षेत्र के लिये आरक्षित मानता था। लेकिन ऐसे पेचीदा मसले का समाधान करने के लिये शुरूआत कैसे करें? विशेष रूप से यह देखते हुए कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध अधिकतर वैज्ञानिक अध्ययन पश्चिम से उत्पन्न हुए हैं, ऐसे शोधकर्ताओं द्वारा किये गए हैं जो भारतीय परिस्थितियों और मजबूरियों से हमेशा परिचित नहीं होते? मेरी समझ से जवाब अपनी वैज्ञानिक क्षमता विकसित करना और उनके कार्यों को सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराना था, ताकि वह सामने आ सके और जब निर्णय हों तब उनका ख्याल किया जा सके। अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने कभी कहा था कि निर्णय उनके द्वारा किया जाता है जो दिखा सकें। भारतीय वैज्ञानिक समुदाय ने दिखाया नहीं है और भारत की जनसंख्या भले विश्व का 17 प्रतिशत है, हमारी आवाज जलवायु परिवर्तन और उसे नियंत्रित करने वाले विज्ञान की विवादग्रस्त वैश्विक समस्या पर विचार-विमर्श में नहीं सूनी जाती।

इसे सुनिश्चित करने के विचार के साथ कि आगामी विचार-विमर्शों में भारतीय कहानी का प्रतिबिम्बन हो, मैंने जलवायु परिवर्तन आकलन के लिये भारतीय नेटवर्क (Indian Network on Climate Change Assessment - INCCA) का गठन किया जो भारतीय वैज्ञानिकों का एक समूह है जिसे भारत में जलवायु परिवर्तन के बारे में अपनी खोज को समकक्ष-समूह में समीक्षा कर प्रकाशित करना था। नेटवर्क में भारत के 125 शोध संस्थानों के 250 वैज्ञानिक एकत्र हुए और अन्तरराष्ट्रीय संगठनों के साथ साझीदारी कायम किया।

मैंने आईएनसीसीए को भारतीय आईपीसीसी के तौर पर बनाना चाहा था। यह जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में भारत में वर्तमान आधे-अधूरे प्रयासों की बुनियाद पर खड़ा हुआ और कई प्रकार से महत्त्वपूर्ण था। पहला, यह व्यापक कार्यक्रम था, जिसमें अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र और जलवायु परिवर्तन के प्रत्येक उल्लेखनीय आयामों जैसे ब्लैक कार्बन का अध्ययन, ग्लेशियरों और वर्षापात के तौर-तरीकों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव इत्यादि को समेटा गया था। दूसरा, इसने संस्थानों और वैज्ञानिकों की बड़ी संख्या को काम में लगाया जिनमें निजी क्षेत्र और देश से बाहर कार्यरत वैज्ञानिक भी थे ताकि सर्वोत्तम उपलब्ध विशेषज्ञों को एकीकृत ज्ञान नेटवर्क में जोड़ा जा सके। तीसरा, यह चलते रहने वाला कार्यक्रम होगा, एक बार में समाप्त नहीं हो जाएगा, इसके परिणाम सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए जाएँगे ताकि समकक्ष समूह में समीक्षा, बहस और वाद-विवाद हो सके। चौथा, यह कार्यक्रम क्षमता निर्माण करेगा जिससे जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की अगली पीढ़ी तैयार हो सके। मेरा मनोरथ था कि भारत में बेहतरीन जलवायु नीति-निर्माण का सारतत्व तीन एम- मेजरिंग, मॉडलिंग और मॉनिटरिंग, नमूना निर्माण और निगरानी बन सके।

2009 में जब मैंने मंत्रालय का कार्यभार सम्भाला तब जलवायु परिवर्तन का मसला अन्तरराष्ट्रीय चर्चा के केन्द्र में था। मेरे सामने यह स्पष्ट था कि जलवायु परिवर्तन का मसला संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में प्रतिवर्ष केवल वार्ताकारों और मंत्रियों के विचार-विमर्श करने का ‘बन्द मसला’ नहीं हो सकता। भारत के हर तीन आदमी में से दो रोजगार के लिये कृषि पर निर्भर करते हैं वहीं लगभग 30 करोड़ लोग समुद्र तटीय क्षेत्रों में निवास करते हैं, इसलिये जलवायु परिवर्तन भारत की वास्तविक समस्या है।

यदि जलवायु परिवर्तन के घरेलू पक्षों को रेखांकित करना और इसकी प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाना कुछ लोगों को वार्तालाप में सम्मिलित भारत की स्थिति को कमजोर करता दिखा तो अन्तरराष्ट्रीय वार्तालापों में मेरा ढंग, उनकी समझ से अनधिकृत के सिवा कुछ नहीं लगेगा। प्रधानमंत्री ने इसे आरम्भ में ही स्पष्ट कर दिया था कि यद्यपि जलवायु परिवर्तन की समस्या में भारत का योगदान बहुत कम है, फिर भी वे चाहते थे कि इसके वैश्विक समाधान में भारत को हिस्सेदारी हो।

मुझे भारत की छवि बदलने का जिम्मा सौंपा गया था। इस विवादग्रस्त वैश्विक समस्या ने जो करीब दो दशकों से वैज्ञानिकों, नौकरशाहों और राजनेताओं को परेशान किया है, का समाधान खोजने में भारत को अनवरत ‘ना’ कहने वाले से बदलकर पहले से सक्रिय हिस्सेदार बनाने की जिम्मेवारी मेरी थी। भारत के लिये अधिक सकारात्मक और पहले से सक्रिय भूमिका निभाने तक अपने राष्ट्रीय हितों पर नजरें गड़ाए रहना, मेरे लिये अभिशाप जैसा नहीं था। वास्तव मे मैं इस विचार का था और हूँ कि वार्तालाप में कोई स्थिति पत्थर की लकीर नहीं होती। वार्तालाप में हमारा रुख अपने राष्ट्रीय हित से लगातार निर्देशित और उस पर आधारित होना चाहिए। इसमें हमें आर्थिक उन्नति को बचाने की आवश्यकता, गरीबी उन्मूलन का एजेंडा, घरेलू पर्यावरण नीतियों को जारी रखना और आगे बढ़ाना तथा जलवायु परिवर्तन वार्तालापों को अपनी विदेश नीति के लक्ष्यों को पूरा करने के लिये अपने शस्त्रागार के हिस्से के रूप में उपयोग करना जैसे मुद्दों पर बल देना चाहिए। इनमें से कोई वैश्विक कल्याण, जलवायु परिवर्तन की वैश्विक समस्या से निपटने के लिये एक जीवन्त और व्यावहारिक अन्तरराष्ट्रीय प्रयास की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

मुझे अन्तरराष्ट्रीय वार्तालापों के परिणामों को स्वरूप देने में भारत के लिये नेतृत्व ग्रहण करने का एक अवसर दिखा। ऐसा करने में भारत अपने विकास की गुंजाईश और विदेश नीति के एजेंडा को बचाने में कामयाब होगा, यहाँ तक कि इससे भारत की छवि को अन्तरराष्ट्रीय वार्तालापों में हमेशा ना कहने वाले से बदलकर समाधान खोजने में पूर्व-सक्रिय बन सकेगा। (यह छवि जलवायु परिवर्तन वार्तालाप में आगे बढ़ी)। इसका मतलब वार्तालाप में अपनी स्थिति को त्यागना नहीं है। इसका मतलब है कि आप दो कदमों पर चलना चाहते हैं। इसका मतलब राष्ट्रीय हितों का त्याग किये बिना वार्तालाप में अपनी स्थिति को बदली हुई परिस्थिति के अनुसार समायोजित करना है। इसका मतलब है कि भारत को मजबूत रुख रखते हुए बातचीत करनी है जो घरेलू मोर्चे पर पूर्व-सक्रिय ढंग से काम करने, मूलभूत नीतिगत कार्रवाई करने से आएगा। हमारे सामने चीन और अमेरिका का उदाहरण मौजूद है। इन देशों ने अन्तरराष्ट्रीय वार्तालापों में ‘कठोर’ रुख अपनाया, जबकि जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभाव का मुकाबला करने के लिये घरेलू मोर्चे पर उपाय किये। मेरी समझ से भारत दो दुनिया के बीच टंगा हुआ है, बड़ी शक्तियों के साथ वार्ता की मेज पर है और गरीबी एवं वंचना के मामले में इसकी तुलना उप-सहारा देशों के साथ की जा सकती है। यह भारत को ऐसी स्थिति प्रदान करता है जिसमें वह ऐसा समाधान खोजकर चैम्पियन बन सकता है जो सभी प्रकार के देशों के लिये उपयुक्त हो। इसने भारत को स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता बनने का अवसर दिया है। अब यह भारत पर है कि वह इस अवसर का लाभ उठाए।

लेकिन घरेलू समझदारी, मीडिया का बड़ा हिस्सा, प्रभावशाली नागरिक संगठन, राजनीतिक और अधिकारी वर्ग, वार्तालाप के रुख में परिवर्तन और पूर्व-सक्रिय घरेलू एजेंडा को आत्मसमर्पण के चिन्ह के तौर पर देखता है। वार्तालाप के परम्परागत रुख से मेरा पहला ‘विच्छेद’ जलवायु परिवर्तन पर ‘यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज’ (United Nations Framework Convention on Climate Change - UNFCCC) के कोपेनहगेन वार्ता 2009 के पहले हुआ। जलवायु परिवर्तन का सामना करने में ‘कुछ अधिक’ करने के लिये विकासशील देशों, उभरती अर्थव्यवस्थाएँ जैसे भारत (चीन भी) पर बढ़ते दबाव से मैं बखूबी परिचित था। कोपेनगहेन में दिसम्बर 2009 में जलवायु समझौते पर केन्द्रित बातचीत में उन्नत विकासशील देशों जैसे अपने देश पर अधिक ध्यान था।

अन्तरराष्ट्रीय मानस-चित्र में भारत और चीन अक्सर एक साथ रखे जाते हैं, कारण उनकी बड़ी जनसंख्या, बढ़ती आर्थिक ताकत होना है। वार्तालाप में हमने जी 77 की छतरी के तले चीन के साथ मिलकर काम किया। चूँकि चीन बड़ी अर्थव्यवस्था है और हमसे अधिक उन्नत है, इसलिये उसने अक्सर हमें आवरण प्रदान किया। लेकिन कोपेनहगेन के पहले मैं भयभीत था कि बीजिंग आगे बढ़कर अपना अलग समझौता कर लेगा और भारत को अकेला छोड़ देगा। चीन ने अपनी जीडीपी का 40-45 प्रतिशत उत्सर्जन तीव्रता को कम करने की घोषणा कर दी। नई दिल्ली को भी कुछ करने की आवश्यकता थी या कम-से-कम कुछ करते हुए दिखने की आवश्यकता थी। इस मौके पर मैं बेसिक-चार उन्नत विकासशील देशों- ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन के समूह को सक्रिय करने का फैसला किया। चारों देश विकास के ग्राफ में अलग-अलग स्थानों पर होने के बावजूद अपने विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में साझा हित रखते थे।

मैंने केवल बेसिक के साथ ही सम्बन्ध विकसित करना नहीं चाहा, मैं दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) देशों के पास भी पहुँचा और क्षेत्रीय हितों की चर्चा करने के लिये एक मंच विकसित करने का अनुरोध किया। मुझे हताश करते हुए सार्क समूह सन्तोषजनक ढंग से आगे नहीं बढ़ा हालांकि मेरी पहल पर भारतीय अनुदान से मालदीव में दक्षेस तटीय क्षेत्र प्रबन्धन केन्द्र (SAARC Coastal Zone Management Center Maldives) और भूटान में दक्षेस वानिकी केन्द्र (Saarc Forestry Center Bhutan) की स्थापना हो सकी। क्षेत्रीय स्तर पर कैलाश-मानसरोवर पारिस्थितिकी (Kailash-Mansarovar Ecosystem) को लेकर मैं नेपाल के साथ सम्बन्ध जोड़ सका, लेकिन बांग्लादेश के साथ मिलकर सुन्दरबन पारिस्थितिकी फोरम (Sundarbans Ecosystem Forum) स्थापित करने का मेरा प्रयास सफल नहीं हो सका।

मेरा विचार था कि दूसरे विकासशील देशों के साथ मजबूत सम्बन्ध बनाने का मतलब यह नहीं होता और नहीं होना चाहिए कि विकसित देशों के साथ साझेदारी विकसित नहीं करना है। भारत जी-20 (G-20) और मेजर इकोनॉमिक फोरम (Major Economies Forum - MEF) का सदस्य है और औद्योगिक देशों के साथ संवाद जारी रखा है तथा साझेदारी विकसित कर रहा है जो इसे सुनिश्चित करने के लिये महत्त्वपूर्ण है कि भारत की आवश्यकताओं और विचारों को उचित स्थान प्राप्त हो सके। इसी सन्दर्भ में मैंने पर्यावरण से सम्बन्धित मसलों पर भारत-अमेरिका संयुक्त कार्य समूह की स्थापना के लिये काम किया। यह कार्यसमूह अन्य बातों के अलावा शीतलीकरण गैसों जैसे हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) का उपयोग घटाने पर केन्द्रित था। यह मामला जलवायु वार्तालापों में उठा और उसमें भारत एवं दूसरे देशों जैसे अमेरिका के विचारों में फर्क था। कार्य समूह मतभेदों को दूर करने और स्वीकार्य समाधान की दिशा में एक साथ काम करने की व्यवस्था था।

मेरा प्रयास दूसरे देशों, विकासशील और विकसित दोनों के साथ निकट और कार्यकारी सम्बन्ध विकसित करने का था। कोपेनहेगेन और फिर कानकुन में यूएनएफसीसीसी वार्तालापों के दौरान मेरी कोशिश द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और बहुपक्षीय स्तरों पर सम्पर्क साधना था जो भारत को ऐसा स्थान दिलाने के प्रयासों का हिस्सा था जिससे वैश्विक कार्रवाई की बनावट में नई दिल्ली को अधिक महत्त्व मिलना सुनिश्चित हो सके, साथ ही विकास के मामले में हमारे हित सुरक्षित रह सकें।

मुझे ईमानदारी से यह स्वीकार करना चाहिए कि बीस साल पहले मैं कट्टरपंथी ढंग से जीडीपी विकास को किसी दूसरी चीज से पहले रखता था। मैं मानता था कि भारत की समस्याओं का उत्तर जीडीपी विकास में है। मैं आज भी विकास में भरोसा रखता हूँ, लेकिन अब मैं इसे केवल जीडीपी को विकास के बराबर नहीं रखता। मैं मानता हूँ कि हमें सम्पत्ति बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। मैं अभी भी मानता हूँ कि विकास नितान्त आवश्यक है, पर विकास का टिकना समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित हो कि विकास के लाभ सभी को सुनिश्चित रूप से प्राप्त होंगे और लक्ष्य रहे कि तेज विकास का ढंग ऐसा हो जिसका पर्यावरण पर प्रभाव और परिणाम अधिक नकारात्मक न हो।

यह पुस्तक उस सफर की साक्षी है। यह कोशिश करती है कि उन विभिन्न प्रकार की अड़चनों, अक्सर परस्पर विपरीत, को सामने लाएँ जिसका सामना सतत विकास की रूपरेखा तैयार करने में भारत को करना पड़ता है। इसमें मैंने अपने सभी ‘मुखर आदेशों’ को शामिल किया है जिनमें प्रत्येक ऐसे आवश्यक चयन को प्रकट करते हैं जिनका भविष्य में भारत को आवश्यकता होगी क्योंकि भारत उच्च आर्थिक विकास के साथ पारिस्थितिकीय हितों को सन्तुलित रखना चाहता है। इसमें मेरे कुछ भाषण और सार्वजनिक व्याख्यान, पत्र और संसदीय बहसों को भी शामिल किया गया हैं जो मेरे फैसलों और नीतिगत हस्तक्षेपों को प्रभावित करने वाली मेरी सोच को प्रकट करते हैं।

वन और पर्यावरण मंत्री के नाते मेरा कार्यकाल निसन्देह उथल-पुथल वाला था। उसकी आज भी चाहे तो सराहना की जाती है या आलोचना होती है। यह पुस्तक आत्मरक्षा या आलोचकों को जवाब देने की कोशिश नहीं है। यह पुस्तक किसी भी तरह से मेरे पच्चीस महीनों के कार्यकाल का पूरा ब्यौरा प्रस्तुत नहीं करती। यह चयनात्मक है और उन मसलों को फोकस में लाती है जिन्होंने हलचल पैदा की और विवादस्पद हो गए। इस प्रकार यह राजनीतिक संस्मरण नहीं है जो पुराने बैर का गुबार निकालने और मेरी वाहवाही करने के लिये हो। मुझे उम्मीद है कि यह पुस्तक मंत्री के तौर पर मेरे कार्यकाल पर इतनी जोरदार प्रतिक्रियाएँ क्यों हुईं उसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं पर कुछ सीमा तक प्रकाश डालेगी। लेकिन किसी दूसरी चीज से अधिक यह पुस्तक पर्यावरण मंत्री के नाते मेरे फैसलों और कार्रवाइयों की बेहतर समझदारी कायम करने में सहायक होगी, साथ-ही-साथ उन चुनौतियों को स्पष्ट करेगी जिसका भारत को विकास की चाहत में सामना करना पड़ रहा है। पारिस्थितिकीय सुरक्षा से सम्बन्धित मसले अब राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडा और विकास की बहसों की मुख्यधारा के प्रमुख हिस्सा हैं। मैं सोचना चाहता हूँ कि यह कुछ हद तक पर्यावरण मंत्री के नाते मेरे प्रयासों और हस्तक्षेपों की वजह से हुआ है।

सन्दर्भ
1. ग्लोबलाइजेशन एंड इकोलॉजिक सिक्यूरिटी, व्याख्यान, द फाउंडेशन ऑफ इकोलॉजिकल सिक्यूरिटी, अक्टूबर 2002,। पुनर्प्रस्तुत संमर सिंह (सम्पा.) 2007, इकोलॉजिकल सिक्यूरिटी : द फाउंडेशन ऑफ सस्टनेबल डेवेलपमेंट. नई दिल्ली, शिप्रा पब्लिकेशन। द एसएचजी रिवोल्यूशनः ह्वाट नेक्स्ट, सिल्वर जुबली लेक्चर, सोसाइटी फॉर द प्रोमोशन ऑफ वेस्टलैंड डेवेलपमेंट (मई 2007) और ‘बुश फायर्स ओवर क्योटो प्रोटोकाल, इण्डिया टूडे (25 जून 2001), पुनर्प्रस्तुत-रमेश,जयराम 2000 कौटिल्य टूडे, नई दिल्ली, रिसर्च प्रेस। ‘डिमांड फॉर ए स्टेटमेंट एंड डिस्कशंस ऑन इस्सू एराइजिंग आउट ऑफ द यूनाइटेड नेशन्स क्लाइमेट चेंज कान्फ्रेंस। मैटर्स रेज्ड विथ परमिशन, राज्यसभा, 14 दिसम्बर 2005, इस पुस्तक में पहला प्रश्न शामिल किया गया है।

2. ‘‘मुखर आदेशों ’के साथ मैंने उन रिपोर्टों, पत्रों और दूसरी सामग्री को भी सार्वजनिक किया जिन्होंने फैसलों पर असर डाला था।

3. कुल मिलाकार चौदह मुखर आदेश जारी हुए और सभी इस पुस्तक में शामिल किये गए हैं।

4. दो वर्ष की अवधि के दौरान ऐसे आठ सार्वजनिक व्याख्यान हुए और उन सभी को इस पुस्तक में शामिल किया गया है। मैंने इस पुस्तक में फिनलैंड की संसद में दिये अपने भाषण को भी शामिल किया है हालांकि उस समय मैं ग्रामीण विकास मंत्री था, पर चूँकि यह उन मसलों के बारे में है जिनसे पर्यावरण मंत्री रहते मेरा मुठभेड़ हुआ था और उन कामों का परिणाम है जिसे मैंने किया था। इसमें संयुक्त राष्ट्र महासचिव के उच्च स्तरीय वैश्विक सतत विकास समिति में मेरी भागीदारी भी शामिल है।

5. संसद के दोनों सदनों में विभिन्न नियमों के अन्तर्गत विभिन्न विषयों पर 2009-11 के बीच हुई बहसें, जैसे-पूर्वोत्तर में बड़े बाँधों का पर्यावरण पर प्रभाव, गंगा नदी की अवस्था, बाघों की घटती संख्या पर चिन्ता, जलवायु परिवर्तन और अन्तरराष्ट्रीय वार्तालाप, नदियों और झीलों का प्रदुषण मुम्बई बन्दरगाह के निकट तेल छलकना उन विषयों में प्रमुख है।

6. बीटी बैंगन के व्यावसायिक उत्पादन पर प्रतिबन्ध लगाने के मेरे फैसले को राज्यों से आई प्रतिक्रियाओं ने प्रभावित किया। सभी मुख्यमंत्रियों या उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों ने दलगत सीमा को दरकिनार कर मुझसे यह अनुरोध करते हुए लिखा था कि बीटी बैंगन के व्यावसायिक उत्पादन की अनुमति नहीं दें।

7. नियमगिरि पहाड़ी में बाक्साइट खनन के लिये वन विभाग की अनुमति को रद्द करने के फैसले ने ओड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को प्रसन्न नहीं किया। न ही मुम्बई के शहरी इलाके पुनर्विकास में निजी भागीदारी को रोकने के मेरे फैसले की महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने प्रशंसा की। मुझे कांग्रेस और गैर कांग्रेस दोनों मुख्यमंत्रियों की नाराजगी झेलनी पड़ी। दलगत राजनीति करने के आरोपों के विपरीत मैं सभी पक्षों को नाराज करने वाला बन गया था। कुछ कांग्रेस सांसद मेरे रुख से इसलिये अप्रसन्न थे क्योंकि वे पश्चिमी घाट या कोयला खनन इत्यादि से सम्बन्धित थे।

8. नवी मुम्बई हवाईअड्डा के लिये अनुमति मुम्बई में नया हवाईअड्डा की आवश्यकता और सुंदरी वनों (मैंग्रोव) के लिये पारिस्थितिकीय सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता के बीच समझौते का रास्ता निकालने का एक उदाहरण है। सुंदरी वन समुद्री स्तर बढ़ने से प्राकृतिक सुरक्षा देने के साथ ही तटीय कटाव से भी सुरक्षा प्रदान करके महानगर को महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय सेवा प्रदान करते हैं।

9. ‘मैन एंड नेचर’, मानव पर्यावरण पर पहला संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में भाषण, स्टॉकहोम, 14 जून 1972

10. आईबीआईडी

11. उपरोक्त मंत्रालय से मेरे हटने के बाद स्वतंत्र नियामक स्थापित करने का उत्साह फीका पड़ गया। जनवरी 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय के लफार्जे खनन मुकदमें में 2001 के फैसले को लागू करने का आदेश दिया, उसने भारत सरकार को 31 मार्च 2014 तक एक पर्यावरण नियामक स्थापित करने का निर्देश दिया था। हालांकि नियामक की नियुक्ति आज तक नहीं हुई।

12. मार्च 2014 में राष्ट्रीय हरित पंचाट ने वन सलाहकार समिति की सिफारिशों को नामंजूर करने के लिये मुझे फटकारा जो उन नीतियों पर आधारित थी जिन्हें मैंने ही बनाया था और छत्तीसगढ़ में हसदेव-अरण्य के सघन वन क्षेत्र में कोयला खनन का अनुमोदन करने के लिये भी फटकारा। मेरे इन कार्यों का कारण 23 जून 2011 के ‘मुखर आदेशों’ में विस्तार से बताया गया है जिन्हें इस पुस्तक में शामिल किया गया है।

13. सन्दर्भ-अनुसूचित जाति और अन्य परम्परागत वनवासी (वनाधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006

14. इस सर्कुलर ने वेदान्ता और पोस्को के बारे में फैसले में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की जिसके बारे में ‘मुखर आदेशों’ को इस पुस्तक में शामिल किया गया है। हालांकि, यह स्वीकार करना आवश्यक है कि वनाधिकार कानून 2006 के प्रावधानों के आलोक में जिसमें दावा करने के लिये कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है, आदेश को लागू करना टकराव की स्थिति पैदा करेगा क्योंकि परियोजनाओं को समयबद्ध ढंग से अनुमति देनी होती है। इसे संशोधित करना आवश्यक है अन्यथा सर्कुलर की प्रकृति परामर्श जैसी है और इसके उल्लंघन के खराब परिणाम अभी दिखने वाले हैं।

15. टी.एन.गोदावर्मन बनाम भारत सरकार (रिट याचिका 202, वर्ष 1995)



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