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कहाँ बह जाती हैं बड़ी-बड़ी योजनाएँ

Author: 
मनोहर सिंह राठौर
Source: 
कादम्बिनी, मई, 2018

जल समस्या के समाधान के लिये हर सरकार ने बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाई हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर न तो ये योजनाएँ दिखाई दीं और न ही इनके परिणाम। जल समस्या जस की तस है। आखिरकार ये योजनाएँ गईं तो कहाँ गईं।

जल की उपलब्धता व उपभोग की तस्वीर पूरे विश्व में बहुत तेजी से बदल रही है। पानी अन्तरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर चिन्ता का विषय बन गया है। एक तरफ वैज्ञानिकों ने अनेक उपलब्धियाँ हासिल की हैं, तो दूसरी तरफ जल की उतनी ही समस्या बढ़ती जा रही है। तब प्रश्न उठता है कि इतने विकास के बावजूद क्या सरकार व समाज पानी का प्रबन्धन टिकाऊ रूप से करने में क्यों असमर्थ रहा?

इसका कारण स्पष्ट रूप से सरकार की नीतियाँ और समाज की विफलता है या प्राकृतिक कारण है? पानी का प्रबन्धन इतना जटिल क्यों है? इसका मुख्य कारण पानी की उपलब्धता एवं उपभोग, भौगोलिक परिस्थितियाँ एवं पानी के स्रोत पर निर्भर करता है। हर प्रदेश व काल में पानी के उपभोग व उपलब्धता में सामंजस्य न होना ही मुख्य कारण है।

एक और मुख्य कारण यह है कि पानी के बिना किसी भी वस्तु का उत्पादन नहीं हो सकता है। चाहे वह खेत में हो, कारखाने में, खदानों में या चाँद पर भेजने के लिये रॉकेट ही क्यों न हो? इन सभी में पानी की प्रचुर मात्रा की आवश्यकता होती है। पानी का मुख्य स्रोत वर्षा ही है, जो जमीन पर आकर नदियों के रूप में भरकर अलग-अलग क्षेत्रों पानी उपलब्ध कराती है। वहीं वर्षाजल का कुछ भाग जमीन में उतरकर भूजल के रूप में उपलब्ध होता है।

पानी की उपलब्धता में नदियों का बहुत बड़ा योगदान है। आज देशव्यापी नदियों की दुर्दशा चिन्ता का विषय है। भारत की सभी नदियाँ आज प्रायः प्रदूषित हो चुकी हैं व छोटी नदियाँ अपना अस्तित्व खोने के कगार पर खड़ी हैं। भूजल का अत्यधिक दोहन होने के कारण भूजल की उपलब्धता व गुणवत्ता आज बड़ी समस्या बन गई है। भारत में जल प्रबन्धन के प्रयास आजादी के साथ ही शुरू हो गए थे।

भारत जब आजाद हुआ था, तब देशव्यापी भुखमरी की स्थिति थी, क्योंकि खाद्यान्नों की अत्यधिक कमी थी, इसलिये आजादी के तुरन्त बाद सरकार ने निर्णय किया कि जल संवर्धन व कृषि में उपयोग के लिये बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण किया जाए। उन बाँधों ने हमें भुखमरी से तो मुक्ति दिलाई, किन्तु आज जल संकट एक बड़ी समस्या उभरकर सामने आ गई। इस संकट का मुख्य कारण हमारे विकास की नीति, जल नीति व शहरीकरण काफी हद तक जिम्मेदार हैं।

तब प्रश्न उठता है कि पिछले 70 वर्षों में सरकार की बड़ी-बड़ी जल योजनाएँ बनीं तो, लेकिन हमारे जल संकट का निवारण क्यों नहीं कर पाईं? निवारण तो दूर, नई तरह की जल समस्या से आज आमजन त्रस्त हैं। जल समस्याओं में मुख्य समस्या शुद्ध पेयजल उपलब्धता है। कृषि के लिये जल उपलब्धता एवं उद्योगों के लिये भी आज बड़ी समस्याएँ हैं। जल उपभोग व जल का निस्तारण, इनमें हमसे बड़ी चूक हुई है। जिसके कारण आज पानी के सभी स्रोत प्रायः प्रदूषित हो गये।

आजादी के बाद प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर 11वीं पंचवर्षीय योजना तक 72 लाख करोड़ रुपये का जल क्षेत्रों में निवेश हुआ। यह निवेश मुख्यतः वृहत एवं मध्यम जलाशयों को बनाने एवं उनकी भण्डारण क्षमता बढ़ाने में खर्च हुआ। परिणामस्वरूप सिंचित खेती में काफी बढ़ावा हुआ, किन्तु इस भारी निवेश से सिंचाई क्षमता के सृजन का आकलन 460 लाख हेक्टेयर किया गया था, किन्तु वास्तव में मात्र 350 लाख हेक्टेयर का ही हो पाया।

हमारी सभी बड़ी परियोजनाएँ समय सीमा एवं लागत की सीमा से ग्रस्त हैं। जितने समय में वे पूरी की जानी थी, उससे कहीं ज्यादा समय व लागत में भी कई गुना बढ़ोत्तरी हुई है। जिसके परिणामस्वरूप जल उपलब्धता का लक्ष्य समय पर पूरा नहीं हो सका। स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक निवेश सतही जल पर केन्द्रित किया गया। यद्यपि कई दशकों में पेयजल व सिंचाई, दोनों का मुख्य स्रोत भूजल सामने आया है। वास्तव में तो खाद्यान्नों में स्वावलम्बन भूजल सिंचाई से ही प्राप्त हुआ है। सतही जल योजनाओं ने तो कई प्रकार की पर्यावरणीय समस्याओं व जल विवादों को जन्म दिया है।

जल समस्याओं का समाधान न होते हुए देख सरकार ने नदियों को आपस में जोड़ने की महत्त्वाकांक्षी योजना भी समाज के सामने रखी। जो काफी हद तक प्रकृति के विपरीत व कई पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म दे सकती है। पिछले कुछ वर्षों में हमारी बड़ी नदियों में मुख्यतः गंगा नदी के लिये बहुत ही वृहत योजना बनाई गई।

अगर हम पिछले 70 सालों की जल प्रयोजनाओं का इतिहास देखें तो ज्ञात होता है कि सबसे ज्यादा जल योजनाओं पर महाराष्ट्र में खर्च हुआ, किन्तु यह सभी जनित है कि आज सबसे ज्यादा सूखा व जल की किल्लत महाराष्ट्र प्रान्त में ही है। यह परिणाम इस बात का सूचक है कि हमारी जल नीतियों व प्रबन्धन में बड़ा दोष रहा है। पहला दोष तो बड़ी योजनाओं के उद्देश्य व उससे जुड़ी राजनीति व भ्रष्टाचार हैं। दूसरी कमी सरकार का यह अहंकार की पानी की समस्याओं का हल बिना समाज की भागीदारी से किया जा सकता है। तीसरा दोष गलत औद्योगीकरण व शहरीकरण की नीतियाँ हैं। जिसमें जल के उपयोग व निस्तारण के कारण बढ़ता जल प्रदूषण है।

चौथा महत्त्वपूर्ण दोष-समाज यह मानकर चलता है कि पानी उपलब्ध कराना चुनी हुई सरकार की जिम्मेदारी है और वह भी मुफ्त! जिसके कारण सृजन व उपभोग की पारम्परिक संस्कृति को भुलाकर समाज द्वारा पानी का दुरुपयोग शुरू हो गया। हमारी सभी जल योजनाओं की उपलब्धता अपेक्षा से कम ही रही है। इसका एक कारण योजना बनाते समय उपलब्धता व उपभोग का सही ढंग से विश्लेषण नहीं किया जाना है। साथ ही समाज की भागीदारी भी सुनिश्चित नहीं की गई है।

सरकार यह मानकर जल की योजनाओं में निवेश करती रही कि समाज को भुखमरी से एवं रफ्तार से हमारी जनसंख्या बढ़ रही है, हमारे संसाधन छोटे पड़ते जा रहे हैं। इस विकास की अवधारणा के कारण जल की माँग में व पूर्ति में काफी अन्तर दिखाई दे रहा है। अब समय आ गया है जब हमें बड़ी योजनाओं को एक तरफ रखकर हर गाँव स्तर व भौगोलिक क्षेत्र को ध्यान में रखकर समाज की सक्रिय साझेदारी के साथ इस समस्या का समाधान करना होगा। वर्षाजल का सही भण्डारण व उपयोग ही हमारी आने वाली जल समस्याओं का समाधान होगा और समाज में पानी के महत्त्व को फिर से स्थापित करना होगा।

(लेखक सीईडीएस, जयपुर में निदेशक हैं)

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